शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 19 October 2013

बीबी बसन्त लता जी - जीवन परिचय

ॐ श्री साँई राम जी


बीबी बसन्त लता जी
श्री कलगीधर पिता जी की महिमा अपरम्पार है, श्री आनंदपुर में चोजी प्रीतम ने बड़े कौतुक किए| अमृत तैयार करके गीदड़ों को शेर बना दिया| धर्म, स्वाभिमान, विश्वास, देश-भक्ति तथा प्रभु की नई जोत जगाई| सदियों से गुलाम रहने के कारण भारत की नारी निर्बल हो कर सचमुच ही मर्द की गुलाम बन गई तथा मर्द से बहुत डरने लगी| सतिगुरु नानक देव जी ने जैसे स्त्री जाति को समानता तथा सत्कार देने का ऐलान किया था, वैसे सतिगुरु जी ने स्त्री को बलवान बनाने के लिए अमृत पान का हुक्म दिया| अमृत पान करके स्त्रियां सिंघनी बनने लगीं तथा वह अपने धर्म की रक्षा स्वयं करने लगी| उनको पूर्ण ज्ञान हो गया कि धर्म क्या है? अधर्मी पुरुष कैसे नारी को धोखा देते हैं विश्वास के जहाज पार होते हैं|

ऐसी बहुत-सी सहनशील नारियों में से एक बीबी बसन्त लता थी, वह सतिगुरु जी के महल माता साहिब कौन जी के पास रहती और सेवा किया करती थी| नाम बाणी का सिमरन करने के साथ-साथ वह बड़ी बहादुर तथा निडर थी| उसने विवाह नहीं किया था, स्त्री धर्म को संभाल कर रखा था| उसका दिल बड़ा मजबूत और श्रद्धालु था|

बीबी बसन्त लता दिन-रात माता साहिब कौर जी की सेवा में ही जुटी रहती| सेवा करके जीवन व्यतीत करने में ही हर्ष अनुभव करती थी|

माता साहिब कौर जी के पास सेवा करते हुए बसन्त लता जी की आयु सोलह साल की हो गई| किशोर देख कर माता-पिता उसकी शादी करना चाहते थे| पर उसने इंकार कर दिया| अकाल पुरुष ने कुछ अन्य ही चमत्कार दिखाए| श्री आनंदपुर पर पहाड़ी राजाओं और मुगलों की फौजों ने चढ़ाई कर दी| लड़ाई शुरू होने पर खुशी के सारे समागम रुक गए और सभी सिक्ख तन-मन और धन से नगर की रक्षा और गुरु घर की सेवा में जुट गए|

बसन्त लता ने भी पुरुषों की तरह शस्त्र पहन लिए और माता साहिब कौर जी के महल में रहने लगी और पहरा देती| उधर सिक्ख शूरवीर रणभूमि में शत्रुओं से लड़ते शहीद होते गए| बसंत लता का पिता भी लड़ता हुआ शहीद हो गया| इस तरह लड़ाई के अन्धेरे ने सब मंगलाचार दूर किए, बसन्त लता कुंआरी की कुंआरी रही|

जैसे दिन में रात आ जाती है, तूफान शुरू हो जाता है वैसे सतिगुरु जी तथा सिक्ख संगत को श्री आनंदपुर छोड़ना पड़ा, हालात ऐसे हो गए कि और ठहरना असंभव था| पहाड़ी राजाओं तथा मुगल सेनापतियों ने धोखा किया| उन्होंने कुरान तथा गायों की कसमें खाईं मर मुकर गए| प्रभु की रज़ा ऐसे ही होनी थी|

सर्दी की रात, रात भी अन्धेरी| उस समय सतिगुरु जी ने किला खाली करने का हुक्म कर दिया| सब ने घर तथा घर का भारी सामान छोड़ा, माता साहिब कौर तथा माता सुन्दरी जी भी तैयार हुए| उनके साथ ही तैयार हुए तमाम सेवक| कोई पीछे रह कर शत्रुओं की दया पर नहीं रहना चाहता था| अपने सतिगुरु के चरणों पर न्यौछावर होते जाते| बसन्त लता भी माता साहिब कौर के साथ-साथ चलती रही| अपने वीर सिंघों की तरह शस्त्र धारण किए| चण्डी की तरह हौंसला था| वह रात के अन्धेरे में चलती गई| काफिला चलता गया| पर जब अन्धेरे में सिक्ख संगत झुण्ड के रूप में दूर निकली तो शत्रुओं ने सारे प्रण भुला दिए और उन्होंने सिक्ख संगत पर हमला कर दिया| पथ में लड़ाईयां शुरू हो गईं| लड़ते-लड़ते सिक्ख सरसा के किनारे पहुंच गए|

वाहिगुरु ने क्या खेल करना है यह किसी को क्या पता? उस के रंगों, कौतुकों और भाग्यों को केवल वह ही जानता है और कोई नहीं जान सकता| उसी सर्दी की पौष महीने की रात को अंधेरी और बादल आ गए| बादल बहुत जोर का था| आंधी ने राहियों को रास्ता भुला दिया| उधर शत्रुओं ने लड़ाई छेड़ दी सिर्फ बहुमूल्य सामान लूटने के लिए| इस भयानक समय में सतिगुरु जी के सिक्खों ने साहस न छोड़ा तथा सरसा में छलांग लगा दी, पार होने का यत्न किया| चमकती हुई बिजली, वर्षा और सरसा के भयानक बहाव का सामना करते हुए सिंघ-सिंघनियां आगे जाने लगे|

बसन्त लता ने कमरकसा किया हुआ था और एक नंगी तलवार हाथ में ले रखी थी| उस ने पूरी हिम्मत की कि माता साहिब कौर की पालकी के साथ रहे, पर तेज पानी के बहाव ने उसे विलग कर दिया, उन से बह कर विलग हो गई और अन्धेरे में पता ही न लगा किधर को जा रही थी, पीछे शत्रु लगे थे| नदी से पार हुई तो अकेली शत्रुओं के हाथ आ गई| शत्रु उस को पकड़ कर खान समुन्द खान के पास ले गए| उन्होंने बसन्त लता को नवयौवना और सौंदर्य देखकर पहले आग से शरीर को गर्मी पहुंचाई फिर उसे होश में लाया गया| शत्रुओं की नीयत साफ नहीं थी, वह उसे बुरी निगाह से देखने लगे|

समुन्द खान एक छोटे कस्बे का हाकिम था| वह बड़ा ही बदचलन था, किसी से नहीं डरता था और मनमानियां करता था| वह बसन्त लता को अपने साथ अपने किले में ले गया| बसन्त लता की सूरत ऐसी थी जो सहन नहीं होती जाती थी| उसके चेहरे पर लाली चमक रही थी|समुन्द खान को यह भी भ्रम था की शायद बसन्त लता गुरु जी के महलों में से एक थी| जैसे कि मुगल हाकिम और राजा अनेक दासियां बेगमें रखते हैं| उसने बसन्त लता को कहा -'इसका मतलब यह हुआ कि तुम पीर गोबिंद सिंघ की पत्नी नहीं|'

बसन्त लता-'नहीं! मैं एक दासी हूं, माता साहिब कौर जी की सेवा करती रही हूं|'

समुन्द खान-'इस का तात्पर्य यह हुआ कि स्वर्ग की अप्सरा अभी तक कुंआरी है, किसी पुरुष के संग नहीं लगी|'

बसन्त लता-'मैंने प्रतिज्ञा की है कुंआरी रहने और मरने की| मैंने शादी नहीं करवानी और न किसी पुरुष की सेविका बनना है| मेरे सतिगुरु मेरी सहायता करेंगे| मेरे धर्म को अट्टल रखेंगे| जीवन भर प्रतिज्ञा का पालन करूंगी|'

समुन्द खान-'ऐसी प्रतिज्ञा औरत को कभी भी नहीं करनी चाहिए| दूसरा तुम्हारा गुरु तो मारा गया| उसके पुत्र भी मारे गए| कोई शक्ति नहीं रही, तुम्हारी सहायता कौन करेगा?'

बसन्त लता-'यह झूठ है| गुरु महाराज जी नहीं मारे जा सकते| वह तो हर जगह अपने सिक्ख की सहायता करते हैं| वह तो घट-घट की जानते हैं, दुखियों की खबर लेते हैं| उन को कौन मारने वाला है| वह तो स्वयं अकाल पुरुष हैं| तुम झूठ बोलते हो, वह नहीं मरे|'

समुन्द खान-'हठ न करो| सुनो मैं तुम्हें अपनी बेगम बना कर रखूंगा, दुनिया के तमाम सुख दूंगा| तुम्हारे रूप पर मुझे रहम आता है| मेरा कहना मानो, हठ न करो, तुम्हारे जैसी सुन्दरी मुगल घरानों में ही शोभा देती है| मेरी बात मान जाओ|'

बसन्त लता-'नहीं! मैं भूखी मर जाऊंगी, मेरे टुकड़े-टुकड़े कर दो, जो प्रतिज्ञा की है वह नहीं तोड़ूंगी| धर्म जान से भी प्यारा है| सतिगुरु जी को क्या मुंह दिखाऊंगी, यदि मैं इस प्रतिज्ञा को तोड़ दूं?'

समुन्द खान-'अगर मेरी बात न मानी तो याद रखो तुम्हें कष्ट मिलेंगे| उल्टा लटका कर चमड़ी उधेड़ दूंगा| कोई तुम्हारा रक्षक नहीं बनेगा, तुम मर जाओगी|'

बसन्त लता-'धर्म के बदले मरने और कष्ट सहने की शिक्षा मुझे श्री आनंदपुर से मिली थी| मेरे लिए कष्ट कोई नया नहीं|'

समुन्द खान-'मैं तुम्हें बन्दीखाने में फैकूंगा| क्या समझती हो अपने आप को, अन्धेरे में भूखी रहोगी तो होश टिकाने आ जाएंगे|'

बसन्त लता-'गुरु रक्षक|'

समुन्द खान ने जब देखा कि यह हठ नहीं छोड़ती तो उसने भी अपने हठ से काम लिया| उसको बंदीखाने में बंद कर दिया| उसके अहलकार उसे रोकते रहे| किसी ने भी सलाह न दी कि बसन्त लता जैसी स्त्री को वह बन्दीखाने में न डाले| मगर वह न माना, बसन्त लता को बन्दीखाने में डाल ही दिया| परन्तु बसन्त लता का रक्षक सतिगुरु था| गुरु जी का हुक्म भी है:

राखनहारे राखहु आपि || सरब सुखा प्रभ तुमरै हाथि ||



बसन्त लता को बन्दीखाने में फैंक दिया गया| बन्दीखाना नरक के रूप में था, जिस में चूहे, सैलाब मच्छर इत्यादि थे| मौत जैसा अंधेरा रहता| किसी मनुष्य के माथे न लगा जाता| ऐसे बन्दीखाने में बसन्त लता को फैंक दिया गया| पर उसने कोई दुःख का ख्याल न किया|
वाह! भगवान के रंग पहली रात बसन्त लता के सिर उस बन्दीखाने में आई| दुश्मन पास न रहे| उसे अन्धेरे में अकेली बैठी हुई को अपना ख्याल भूल गया पर सतिगुरु जी वह सतिगुरु जी के परिवार का ख्याल आ गया| आनंदपुर की चहल-पहल, उदासी, त्याग तथा सरसा किनारे अन्धेरे में भयानक लड़ाई की झांकियां आंखों के आगे आईं उसका सुडौल तन कांप उठा| सिंघों का माता साहिब कौर की पालकी उठा कर दौड़ना तथा बसन्त लता का गिर पड़ना उसको ऐसा प्रतीत हुआ कि वह बन्दीखाने में नहीं अपितु सरसा के किनारे है, उसके संगी साथी उससे बिछुड़ रहे हैं| वह चीखें मार उठी-'माता जी! प्यारी माता जी! मुझे यहां छोड़ चले हो, किधर जाओगे? मैं कहां आ कर मिलूं? आपके बिना जीवित नहीं रह सकती, गुरु जी के दर्शन कब होंगे? माता जी! मुझे छोड़ कर न जाओ! तरंग के बहाव में बही हुई बसन्त लता इस तरह चिल्लाती हुई भाग कर आगे होने लगी तो बन्दीखाने की भारी पथरीली दीवार से उसका माथा टकराया| उसको होश आई, वह सरसा किनारे नहीं बल्कि बंदिखाने में है, वह स्वतंत्र नहीं, कैदी है| उफ! मैं कहां हूं? उसके मुंह से निकला|

पालथी मार कर नीचे बैठ गई तथा दोनों हाथ जोड़ कर सतिगुरु जी के चरणों का ध्यान किया| अरदास विनती इस तरह करने लगी- 'हे सच्चे पातशाह! कलयुग को तारने वाले, पतित पावन, दयालु पिता! मुझ दासी को तुम्हारा ही सहारा है| तुम्हारी अनजान पुत्री ने भोलेपन में प्रण कर लिया था कि तुम्हारे चरणों में जीवन व्यतीत करूंगी| माता जी की सेवा करती रहूंगी| गुरु घर के जूठे बर्तन मांज कर संगतों के जूते साफ कर जन्म सफल करूंगी.....दाता! तुम्हारे खेल का तुम्हें ही पता है| मैं अनजान हूं कुछ नहीं जानती, क्या खेल रचा दिया| सारे बिछुड़ गए, आप भी दूर चले गए| मैं बन्दीखाने में हूं, मेरा रूप तथा जवानी मेरे दुश्मन बन रहे हैं| हे दाता! दया करो, कृपा करो, दासी की रक्षा कीजिए| दासी की पवित्रता को बचाओ| यदि मेरा धर्म चला गया तो मैं मर जाऊंगी, नरक में वास होगा| मुझे कष्ट के पंजे में से बचाओ| द्रौपदी की तरह तुम्हारा ही सहारा है, हे जगत के रक्षक दीन दयालु प्रभु!

'राखनहारे राखहु आपि || सरब सुखा प्रभ तुमरै हाथि ||'

विनती खत्म नहीं हुई थी कि बन्दीखाने में दीये का प्रकाश उज्ज्वल हुआ| प्रकाश देख कर उसने पीछे मुड़ कर देखा तो एक अधेड़ उम्र की स्त्री बन्दीखाने के दरवाजे में खड़ी थी|

आने वाली स्त्री ने आगे हो कर बड़े प्यार, मीठे तथा हंसी वाले लहजे में बसन्त लता को कहना शुरू किया-

पुत्री! मैं हिन्दू हूं, तुम्हारे लिए रोटी पका कर लाई हूं, नवाब के हुक्म से पकाई है| रोटी खा लो बहुत पवित्र भोजन है|'

बसन्त लता-'मुझे तो भूख नहीं|'

स्त्री-'पुत्री! पेट से दुश्मनी नहीं करनी चाहिए| यदि सिर पर मुसीबत पड़ी है तो क्या डर, भगवान दूर कर देगा| यदि दुखों का सामना करना भी पड़े तो तन्दरुस्त शरीर ही कर सकता है| रोटी तन्दरुस्त रखती है, जो भाग्य में लिखा है, सो करना तथा खान पड़ता है, तुम समझदार हो|'
बसन्त लता-'रोटी से ज्यादा मुझे बन्दीखाने में से निकाल दो तो अच्छा है, मैंने तुर्कों के हाथ का नहीं खाना, मरना स्वीकार, जाओ! तुम से भी मुझे डर लग रहा है, खतरनाक डर, मैंने कुछ नहीं खाना, मैं कहती हूं मैंने कुछ नहीं खाना|'

स्त्री-'यह मेरे वश की बात नहीं| खान के हुक्म के बिना इस किले में पत्ता भी नहीं हिल सकता| हां, खान साहिब दिल के इतने बुरे नहीं है, अच्छे हैं, जरा जवान होने के कारण रंगीले जरूर हैं| वह तुम्हारे रूप के दीवाने बने हुए हैं| मैं हिन्दू हूं, चन्द्रप्रभा मेरा नाम है| डरो मत, रोटी खा लो|'

बसन्त लता-'क्या सबूत है कि तुम हिन्दू हो?'

स्त्री-'राम राम, क्या मैं झूठ बोलती हूं| मेरा पुत्र खान साहिब के पास नौकर है| हम हिन्दू हैं| यह हिन्दुओं को बहुत प्यार करते हैं, अच्छे हैं|'

बसन्त लता-'पर मुझे तो कैद कर रखा है, यह झूठ है?'

स्त्री-'मैं क्या बताऊं, यह मन के बड़े चंचल हैं| तुम्हारे रूप पर मोहित हो गए हैं| वह इतने मदहोश हुए हैं कि उन को खाना-पीना भी भूल गया| कुछ नहीं खाते-पीते, बस तुम्हारा फिक्र है|'

बसन्त लता-'इसका मतलब है कि वह मुझे....|'

स्त्री-(बसन्त लता की बात टोक कर) नहीं, नहीं! डरने की कोई जरूरत नहीं, वह तुम्हारे साथ अन्याय नहीं करेंगे| समझाऊंगी मेरी वह मानते हैं, तुम्हारे साथ जबरदस्ती नहीं करेंगे| यदि तुम्हारी मर्जी न हो तो वह तुम्हारे शरीर को भी हाथ नहीं लगाएंगे| बहुत अच्छे हैं, यूं डर कर शरीर का रक्त मत सुखाओ|

बसन्त लता-'माई तुम्हारी बातें अच्छी नहीं, तुम जरूर....|'

स्त्री-'राम राम कहो पुत्री| तुम्हारे साथ मैंने कोई धोखा करना है, फिर तुम्हारा मेरा धर्म एक, रोटी खाओ| राम का नाम लो| जो सिर पर बनेगी सहना, मगर भूखी न मरो| भूखा मरना ठीक नहीं|'

चन्द्रप्रभा की प्रेरणा करने और सौगन्ध खाने पर बसन्त लता ने भोजन कर लिया| वह कई दिनों की भूखी थी, खाना खा कर पानी पिया और सतिगुरु महाराज का धन्यवाद किया|

वह दिन बीत गया तथा अगला दिन आया| समुन्द खान की रात बड़ी मुश्किल से निकली, दिन निकलना कठिन हो गया| वह बंदीखाने में गया तथा उसने जा कर बसन्त लता को देखा|

बसन्त लता उस समय अपने सतिगुरु जी का ध्यान लगा कर विनती कर रही थी| जब समुन्द खान ने आवाज़ दी तो वह उठ कर दीवार के साथ लग कर खड़ी हो गई तथा उसकी तरफ ऐसे देखने लगी, जिस तरह भूखी शेरनी किसी शिकार की तरफ देखती है कि शिकारी के वार करने से पहले वह उस पर ऐसा वार करे कि उसकी आंतड़ियों को बाहर खींच ले, पर वह खड़ी हो कर देखने लगी कि समुन्द खान क्या कहता है|

'बसन्त लता!' समुन्द खान बोला| 'यह ठीक है कि तेरा मेरा धर्म नहीं मिलता, मगर स्त्री-पुरुष का कुदरती धर्म तो है| तुम्हारे पास जवानी है, यह जवानी ऐसे ही व्यर्थ मत गंवा| आराम से रहो| तुम्हारे साथी नहीं रहे| उनको लश्कर ने चुन-चुन कर मार दिया है| तुम्हारा गुरू........|'

पहले तो बसन्त लता सुनती रही| मगर जब समुन्द खान के मुंह से 'गुरु' शब्द निकला तो वह शेरनी की तरह गर्ज कर बोली, 'देखना! पापी मत बनना! मेरे सतिगुरु के बारे में कोई अपशब्द मत बोलना, सतिगुरु सदा ही जागता है, वह मेरे अंग-संग है|'

मैं नहीं जानता तुम्हारे गुरु को| जो खबरें मिली हैं, वह बताती हैं कि गुरु सब खत्म..... कोई नहीं बचा| सारा इलाका सिक्खों से खाली है| मैं तुम्हें नहीं छोड़ सकता| तेरे रूप का दीवाना हो गया हूं| कहना मानो.....अगर अब मेरे साथ खुशी से न बोली तो समझना-मैं बलपूर्वक उठा लूंगा|

ज़ालिम दुश्मन के मुंह से ऐसे वचन सुन कर बसन्त लता भयभीत नहीं हुई| उसको अपने सतिगुरु महाराज की अपार शक्ति पर मान था| उसने कहा-'मैं लाख बार कह चुकी हूं मैं मर जाऊंगी, पर किसी पुरुष की संगत नहीं करनी| मेरा सतिगुरु मेरी रक्षा करेगा| मेरे साथ जबरदस्ती करने का जो यत्न करेगा, वह मरेगा.....मैं चण्डी हूं| मेरी पवित्रता का रक्षक भगवान है| वाहिगुरु! सतिगुरु!'

पिछले शब्द बसन्त लता ने इतने जोर से कहे कि बन्दीखाना गूंज उठा| एक नहीं कई आवाज़ें पैदा हुईं| यह आवाज़ें सुन कर भी समुन्द खान को बुद्धि न आई| वह तो पागल हो चुका था| वासना ने उसको अंधा कर दिया था|

'मैं कहता हूं, कहना मान जाओ! तेरी रक्षा कोई नहीं कर सकता तुम मेरे....!' यह कह कर वह आगे बढ़ा और उसने बसन्त लता को बांहों में लेने के लिए बांहें फैलाई तो उसकी एक बांह में पीड़ा हुई| उसी समय बसन्त लता पुकार उठी-

'ज़ालिम! पीछे हट जा! वह देख, मेरे सतिगुरु जी आ गए| आ गए!' बसन्त लता को सीढ़ियों में रोशनी नजर आई| बसन्त लता के इशारे पर समुन्द खान ने पीछे मुड़ कर देखा तो उस को कुछ नजर न आया| उस ने दुबारा बसन्त लता को कहा-'ऐसा लगता है कि तुम पागल हो गई हो| डरो मत, केवल फिर मेरे साथ चल, नहीं तो.....|'

'अब मैं क्यों तेरी बात मानूं? मेरे सतिगुरु जी आ गए हैं, मेरी सहायता कर रहे हैं|' बसन्त लता ने उत्तर दिया|

'देखो! महाराज देखो! यह ज़ालिम नहीं समझता, इसको सद्-बुद्धि दो, इसको पकड़ो, धन्य हो मेरे सतिगुरु! आप बन्दीखाने में दासी की पुकार सुन कर आए|'

समुन्द खान आगे बढ़ने लगा तो उसके पैर धरती से जुड़ गए, बाहें अकड़ गई, उसको इस तरह प्रतीत होने लगा जैसे वह शिला पत्थर हो रही थी| उस के कानों में कोई कह रहा था -

'इस देवी को बहन कह, अगर बचना है तो कह बहन|'

अद्भुत चमत्कार था, उधर बसन्त लता दूर हो कर नीचे पालथी मार कर दोनों हाथ जोड़ कर कहने लगी, 'सच्चे पातशाह! आप धन्य हो तथा मैं आप से बलिहारी जाती हूं| सतिनाम! वाहिगुरु हे दाता! आप ही तो अबला की लाज रखने वाले हो, दातार हो|'

समुन्द खान घबरा गया उसको इस तरह अनुभव हुआ जैसे कोई अगोचर शक्ति उसके सिर में जूते मार रही थी| उसकी आंखों के आगे मौत आ गई तथा वह डर गया| उसके मुंह से निकला, 'हे खुदा! मुझे क्षमा करें, कृपा करो! मैं कहता हूं, बहन लता-बहन बसन्त लता!'

यह कहने की देर थी कि उसके सिर पर लगने वाले जूते रुक गए| एक बाजू हिली तो उसने फिर विनती की-हे खुदा! हे सतिगुरु जी आनंदपुर वाले सतिगुरु जी कृपा करो! मैं आगे से ऐसी भूल कदापि नहीं करूंगा, बसन्त लता मेरी बहन है| बहन ही समझूंगा, जहां कहेगी भेज दूंगा| मैं कान पकड़ता हूं|' इस तरह कहते हुए जैसे ही उसने कानों की तरफ हाथ बढ़ाए तो वह बढ़ गए| उसकी बांह खुल गई तथा पैर भी हिल गए| उसका शरीर उसको हल्का-हल्का-सा महसूस होने लगा| उसने आगे बढ़ कर बसन्त लता के पैरों, पर हाथ रख दिया तथा कहा -

'बहन! मुझे माफ करो, मैं पागल हो गया था, तुम्हारा विश्वास ठीक है| तुम पाक दामन हो, मुझे क्षमा करो|'

'सतिगुरु की कृपा है, मैं कौन हूं, सतिगुरु जी ही तुम्हें क्षमा करेंगे| मैं बलिहारी जाऊं सच्चे सतिगुरु से| बसन्त लता ने उत्तर दिया तथा उठ कर खड़ी हो गई| समुन्द खान बसन्त लता को बहन बना कर बन्दीखाने में से बाहर ले आया तथा हरमों में ले जा कर बेगमों को कहने लगा-'यह मेरी बहन है|'

बसन्त लता का बड़ा आदर सत्कार हुआ, उसको देवी समझा गया| कोई दैवी शक्ति वाली पाकदामन स्त्री तथा उसको बड़ी शान से अपने किले से विदा किया, घुड़सवार साथ भेजे| वस्त्र तथा नकद रुपए दिए| उसी तरह जैसे एक भाई अपनी सगी बहन को देकर भेजता है| चंद्र प्रभा भी उसके साथ चल पड़ी तथा रास्ते में पूछते हुए 'सतिगुरु जी, किधर को गए|' वह चलते गए आखिर दीने के मुकाम पर पहुंचे जहां सतिगुरु जी रुके थे| सतिगुरु जी के महल माता सुंदरी जी तथा साहिब देवां जी भी घूमते-फिरते पहुंच गए|

बसन्त लता ने जैसे ही सतिगुरु जी के दर्शन किए तो भाग कर चरणों पर गिर पड़ी| चरणों का स्पर्श प्राप्त किया| आंखों में से श्रद्धा के आंसू गिरे| दाता से प्यार लिया|

Friday, 18 October 2013

राजा जनक - जीवन परिचय

ॐ साँई राम जी



राजा जनक

जनक जी एक धर्मी राजा थे| उनका राज मिथिलापुरी में था| वह एक सद्पुरुष थे| न्यायप्रिय और जीवों पर दया करते थे| उनके पास एक शिव धनुष था| वह उस धनुष की पूजा किया करते थे| आए हुए साधू-संतों को भोजन खिलाकर स्वयं भोजन करते थे|

लेकिन एक दिन एक महात्मा ने राजा जनक को उलझन में डाल दिया| उस महात्मा ने राजा जनक से पूछा-हे राजन! आप ने अपना गुरु किसे धारण किया है?

यह सुन कर राजा सोच में पड़ गया| उसने सोच-विचार करके उत्तर दिया-हे महांपुरुष! मुझे याद है कि अभी तक मैंने किसी को गुरु धारण नहीं किया| मैं तो शिव धनुष की पूजा करता हूं|

यह सुनकर उस महात्मा ने राजा जनक से कहा-राजन! आप गुरु धारण करो| क्योंकि इसके बिना जीवन में कल्याण नहीं हो सकता और न ही इसके बिना भक्ति सफल हो सकती है| आप धर्मी एवं दयावान हैं|

'सत्य वचन महाराज|' राजा जनक ने उत्तर दिया और अपना गुरु धारण करने के लिए मन्त्रियों से सलाह-मशविरा किया| तब यह फैसला हुआ कि एक विशाल सभा बुलाई जाए| उस सभा में सारे ऋषि, मुनि, पंडित, वेदाचार्य बुलाए जाएं| उन सब में से ही गुरु को ढूंढा जाए|

सभा बुलाई गई| सभी देशो में सूझवान पंडित, विद्वान और वेदाचार्य आए| राजा जनक का गुरु होना एक महान उच्च पदवी थी, इसलिए सभी सोच रहे थे कि यह पदवी किसे प्राप्त हो, किसको राजा जनक का गुरु बनाया जाए| हर कोई पूर्ण तैयारी के साथ आया था| सभी विद्वान आ गए तो राजा जनक ने उठकर प्रार्थना कि 'हे विद्वान और ब्राह्मण जनो! यह तो आप सबको ज्ञात ही होगा कि यह सभा मैंने अपना गुरु धारण करने के लिए बुलाई है| परन्तु मेरी एक शर्त यह है कि मैं उसी को अपना गुरु धारण करना चाहता हूं जो मुझे घोड़े पर चढ़ते समय रकाब के ऊपर पैर रखने पर काठी पर बैठने से पूर्व ही ज्ञान कराए| इसलिए आप सब विद्वानों, वेदाचार्यों और ब्राह्मणों में से अगर किसी को भी स्वयं पर पूर्णत: विश्वास है तो वह आगे आए| आगे आ कर चन्दन की चौकी पर विराजमान हो पर यदि चन्दन की चौकी पर बैठ कर मुझे ज्ञान न करा सका तो उसे दण्डमिलेगा| क्योंकि सभा में उस की सबने हंसी उड़ानी है और इससे मेरी भी हंसी उड़ेगी| इसलिए मैं सबसे प्रार्थना करता हूं कि योग्य बल बुद्धि वाला सज्जन ही आगे आए|

यह प्रार्थना करके धर्मी राजा जनक अपने आसान पर बैठ गया| सभी विद्वान और ब्राह्मण राजा जनक की अनोखी शर्त सुनकर एक दूसरे की तरफ देखने लगे| अपने-अपने मन में विचार करने लगे कि ऐसा कौन-सा तरीका है जो राजा जनक को इतने कम समय में ज्ञान करा सके| सब के दिलों-दिमाग में एक संग्राम शुरू हो गया| सारी सभा में सन्नाटा छा गया| राजा जनक का गुरु बनना मान्यता और आदर हासिल करना, सब सोचते और देखते रहे| चन्दन की चौकी की ओर कोई न बढ़ा| यह देखकर राजा जनक को चिंता हुई| वह सोचने लगा कि उसके राज्य में ऐसा कोई विद्वान नहीं? राजा ने खड़े हो कर सभा में उपस्थित हर एक विद्वान के चेहरे की ओर देखा| लेकिन किसी ने आंख न मिलाई| राजा जनक बड़ा निराश हुआ|

कुछ पल बाद एक ब्राह्मण उठा, उसका नाम अष्टावकर था| जब वह उस चन्दन की चौकी की ओर बढ़ने लगा तो उसकी शारीरिक संरचना देखकर सभी विद्वान और ब्राह्मण हंस पड़े| राजा भी कुछ लज्जित हुआ| उस ब्राह्मण की कमान पर दो बल थे| छाती आगे को और पेट पीछे को गया हुआ था| टांगें टेढ़ी थीं और हाथों का तो क्या कहना, एक पंजा है ही नहीं था तथा दूसरे पंजे की उंगलियां जुड़ी हुई थीं| जुबान चलती थी और आंखें तथा चेहरा भी ठीक नहीं था| वह आगे होने लगा तो मंत्री ने उसको रोका और कहा-पुन: सोच लीजिए! राजा जनक की संतुष्टि न हुई तो मृत्यु दण्ड मिलेगा| यह कोई मजाक नहीं है, यह राजा जनक की सभा है|

अष्टावकर बोला-हे मन्त्री! यह बात आपको कहने का इसलिए साहस पड़ा है क्योंकि मैं शरीर से कुरुप दिखता हूं| हो सकता है गरीब और बेसहारा हूं| आपके मन में भी यह भ्रम आया होगा कि मैं शायद लालच के कारण आगे आने लगा हूं| इससे यह प्रतीत होता है कि जैसे इस भरी सभा में कोई ज्ञानी नहीं, कोई राजा का गुरु बनने की योग्यता नहीं रखता, वैसे आप भी अज्ञानी हो| आप ने अपने जैसे अज्ञानियों को ही बुलाया है| पर मैं सभी से पूछता हूं क्या ज्ञान का सम्बन्ध आत्मा और दिमाग के साथ है या किसी के शरीर के साथ? जो सुन्दर शरीर वाले, तिलक धारी, ऊंची कुल और अच्छे वस्त्रों वाले बैठे हैं, वह आगे क्यों नहीं आते? सभी सोच में क्यों पड़ गए हो? मेरे शरीर की तरफ देख कर हंसते हुए शर्म नहीं आती, क्योंकि शरीर ईश्वर की रचित माया है| उसने अच्छा रचा है या बुरा| जिसको तन का अभिमान है, उसको ज्ञान अभिमान नहीं हो सकता, अष्टावकर गुस्से से बोला| उसकी बातें सुन कर सभी तिलकधारी राज ब्राह्मण शर्मिन्दा हो गए| उन सब को अपनी भूल पर पछतावा हुआ|

राजा जनक आगे बढ़ा| उसने हाथ जोड़ कर कहा, 'आओ महाराज! अगर आप को स्वयं पर विश्वास है तो ठीक है| मेरी संतुष्टि कर देना|'

अष्टावकर चन्दन की चौकी पर विराजमान हो गया| उसी समय राजा ने घोड़ा मंगवाया| वह घोड़ा हवा से बातें करने वाला था| उसकी लगाम बहुत पक्की थी| अष्टावकर ने घोड़े की ओर देखा| तदुपरांत राजा जनक की तरफ देख कर कहने लगा, 'हे राजन! यदि मैंने आपको ज्ञान करा दिया तो आप ने मेरा शिष्य बन जाना है|'

'यह तो पक्की बात है!' राजा जनक ने उत्तर दिया|

'जब मैं आपका गुरु बन गया और आप मेरे शिष्य तो मुझे दक्षिणा भी अवश्य मिलेगी|' अष्टावकर ने कहा|

'यह भी ठीक है महाराज! आपको दक्षिणा मिलनी चाहिए|' राजा जनक ने आगे से कहा|

'क्योकि मैंने आप को ज्ञान का उपदेश उस समय देना है, जब आपने रकाब के ऊपर पैर रखना है और फिर आपने घोड़ा दौड़ा कर दूर निकल जाना है, इसलिए मेरी दक्षिणा पहले दे दीजिए| परन्तु दक्षिणा तन, मन और धन किसी एक वस्तु की हो|' अष्टावकर बोला|

राजा जनक सोच में पड़ गया कि बात तो ठीक है| दक्षिणा तो पहले ही देनी पड़ेगी| पर दक्षिणा दूं किस वस्तु की तन की, मन की या धन की| इन तीनों का सम्बन्ध ही जीवन से है| अगर एक भी कम हो जाए तो हानि होगी, जीवन सुखी नहीं रहता| यह अनोखा ऋषि है, इसकी बातें भी अनोखी हैं| राजा सोचता रहा पर उसको कोई बात न सूझी| वह कोई भी फैसला न कर सका|

राजा जनक ने कहा, 'महाराज! मुझे राजमहल में जाने की आज्ञा दीजिए| मैं वापिस आ कर आपको बताऊंगा कि मैं किस वस्तु की दक्षिणा दे सकता हूं|'

'आप जा सकते हैं|' अष्टावकर ने आज्ञा दी|

यह सुन कर सारी सभा में सन्नाटा छा गया| सभी विद्वान सोचने लगे कि यह कुरुप ब्राह्मण अवश्य गुणी है|

राजा जनक राजमहल में चला गया और अष्टावकर चंदन की चौकी पर विराजमान हो गया| उसकी पूजा होने लगी| जैसे कि गुरु धारण करने से पहले गुरु पूजा करनी पड़ती है|

राजा जनक महल में पहुंचा और रानी से कहा-जिसको मैं गुरु धारण करने लगा हूं, वह तन, मन और धन में से एक को दक्षिणा में मांगता है| बताओ मैं क्या दूं, क्योंकि आप मेरी दुःख सुख की साथी हो|

यह सुन कर रानी सोच में पड़ गई| कुछ समय सोच कर उसने कहा-'हे राजन! यदि धन दान किया तो दुःख प्राप्त होगा, गरीबी आएगी, यदि तन दान किया तो कष्ट उठाना पड़ेगा, अच्छा यही है कि आप मन को दक्षिणा में दे दीजिए| मन को देने से कोई कष्ट नहीं होगा|

'राजा जनक विचार करने लगा कि रानी ने जो सलाह दी है वह ठीक है या नहीं| पर विचार करके वह भी इसी परिणाम पर पहुंचा और सभा में आकर उसने हाथ जोड़ कर अष्टावकर को कहा-'मैं गुरु दक्षिणा में मन अर्पण करता हूं| अब मेरे मन पर आपका अधिकार हुआ|'

'चलो ठीक है| अब आप घोड़े पर चढ़ने की तैयारी करें| आपका मन मेरा है तो मेरा कहना अवश्य मानेगा|' अष्टावकर ने आज्ञा की| सभा में बैठे सब हैरान हो गए कि यह राजा जनक का गुरु बनने लगा है, कैसे कुरुप व्यक्ति के भाग्य जाग पड़े|

राजा घोड़े के ऊपर चढ़ने लगा, सभी रकाब में पैर रखा ही था कि अष्टावकर बोला, राजन! मेरे मन की इच्छा नहीं कि आप घोड़े के ऊपर चढ़ो| यह सुनकर राजा ने उसी समय रकाब से पैर उठा कर धरती पर रख लिए तथा अष्टावकर की ओर देखने लगा| घोड़े के ऊपर चढ़ने की उसकी मन की इच्छा दूर हो गई| उसी समय अष्टावकर ने दूसरी बार कहा-राजन! मेरा मन चाहता है कि आस-पास का लिबास उतार दिया जाए| राजा जनक उसी समय वस्त्र उतारने लगा तो उसको ज्ञान हुआ, मन पर काबू पाना, मन के पीछे स्वयं न लगना ही सुखों का ज्ञान है| मन भटकता रहता है| राजा जनक ने उसी समां अष्टावकर के चरणों में माथा झुका दिया और कहा, 'आप मेरे गुरु हुए|'

उसी समय खुशी के मंगलाचार होने लग पड़े| यज्ञ शुरू हो गया| बड़े-बड़े ब्राह्मणों को अष्टावकर के चरणों में लगना पड़ा|

राजा जनक के बारे में भाई गुरदास जी फरमाते हैं :-

भगत वडा राजा जनक है गुरमुख माइआ विच उदासी|
देव लोक नो चलिआ गण गंधरब सभा सुख वासी|
जमपुर गईया पुकार सुणि विललावन जीअ नरक निवासी|
धरमराइ नों आखिओनु सभनां दी कर बंद खलासी|
करे बेनती धरमराइ हऊ सेवक ठाकुर अबिनासी|
गहिने धरिअनु एक नाऊ पापां नाल करै निरजासी|
पासंग पाप न पुजनी गुरमुख नाऊ अतुल न तुलासी|
नरकहु छुटे जीअ जंत कटी गलहु सिलक जम फासी|
मुकति जुगति नावै की दासी|

राजा जनक बहुत बड़ा प्रतापी हुआ, जो माया में उदास था| गुरु धारण करने के बाद उसने बहुत भक्ति की| मन को ऐसा बना लिया कि माया का कोई भी रंग उस पर प्रभाव नहीं डालता था| मोह माया, लोभ, अहंकार तथा वासना, काम का जोश भी उसके मन की इच्छा अनुसार हो गया| वह राजा भक्त बन गया|

एक दिन उसके मन में आया कि आखिर मैं भक्ति करता हूं.....क्या पता भक्ति का असर हुआ है कि नहीं? क्यों न परीक्षा लेकर देखा जाए| बात तो अहंकार वाली थी पर उसके मन में आ गई| जो मन में आए वह हो जाता है|

एक दिन राजा ने अद्भुत ही कौतुक रचा| उसने एक तेल का कड़ाहा गर्म करवाया| उस छोटे कड़ाहे के पास बिछौना बिछा कर उस पर अपनी सबसे सुन्दर स्त्री को कहा कि वह लेट जाए| जब स्त्री लेट गई तो राजा जनक ने एक पैर कड़ाहे में रखा और एक उस स्त्री के बदन पर| वह अडोल खड़ा रहा| अग्नि ने उसको जरा भी आंच न आने दी|....और रानी की सुन्दरता, पैर द्वारा शरीर के स्पर्श ने उसके खून को न गरमाया, गर्म तेल उबलता था, रानी की जवानी दोपहर में थी| यह देखकर लोग राजा जनक की जै जै बोलने लगे| वह धर्मात्मा-बड़ा भक्त बन गया| उसके पश्चात राजा को कभी माया ने न भरमाया|

प्रतापी राजा जनक की कथा बड़ी विस्तृत है| यदि पूरी कथा बयान करने लगे तो ग्रन्थों के ग्रन्थ बन जाएंगे| भक्त की कथाएं ही खत्म न हों| आपका अन्तिम समय आ गया| पंचतत्व शरीर को छोड़ कर अगली दुनिया की तरफ जाना था| शरीर को जैसे ही आत्मा ने छोड़ा तो कुदरत की तरफ से अपने आप ही बेअंत शंख बजने लग गए, नरसिंघे बोले, मंगलाचार की ध्वनियां उत्पन्न हुईं| कहते हैं देवता और गन्धर्व आए, अप्सराएं आईं| भक्त जन और नेक आत्माओं के दल स्वागत करने के लिए आए|

कहते हैं, जनक ने जो भक्ति का दिखावा किया था, वह परमात्मा के दरबार में उसका अहंकार लिखा गया| जब देवता लेने के लिए आए तो परमात्मा ने हुक्म दिया-हे देवताओं! राजा जनक को नरक वाले रास्ते से देवपुरी ले आना, क्योंकि उसके अहंकार का फल उसको अवश्य मिले| यहां बे-इंसाफी नहीं होती, इंसाफ होता है| बस इतना ही काफी है| उसका फूलों वाला बिबान उधर से ही आए|

जिस तरह परमात्मा का हुक्म था, सब ने उसी तरह ही मानना था| देवताओं ने राजा जनक का बिबान नरकों की तरफ मोड़ लिया| नरक आया| नरकों में हाहाकार मची हुई थी| जीव पापों और कुकर्मों का फल भुगत रहे थे| कोई आग में जल रहा था तो कोई उल्टा लटकाया हुआ था और नीचे आग जल रही थी| कई आत्माओं को गर्म तेल के कड़ाहों में डाला हुआ था| तिलों की तरह कोहलू में पीसे जा रहे थे| हैरानी की बात यह थी कि वह न मरते थे और न जीते थे| आत्माएं दुःख उठाती हुई तड़प रही थीं| नरक की तरफ देख कर राजा जनक ने पूछा-यह कौन-सा स्थान है? नरक के राजा यमदूत ने कहा-महाराज! यह नरक है, उन लोगों के लिए जो संसार में अच्छे काम नहीं करते रहें, अब दुःख उठा रहे हैं|

राजा जनक ने कहा-इन सब को अब छोड़ देना चाहिए| बहुत दुःख उठा लिया है| देखो कैसे मिन्नतें कर रहे हैं|

यम-परमात्मा की आज्ञा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता| हां, यदि कोई पुण्य का फल दे तो इनको भी छुटकारा मिल सकता है|

राजा जनक को रहम आ गया| उसने कहा-मेरे एक पल के सिमरन का फल लेकर इन को छोड़ दो|

यमों ने तराजू मंगवाया| एक तरफ राजा जनक के सिमरन का फल रखा गया और दूसरी तरफ नरकगामी आत्माएं बिठाईं| धीरे-धीरे सभी नरकगामी आत्माएं तराजू पर चढ़ गईं| नरक खाली हो गया| आत्माएं राजा जनक के साथ ही स्वर्ग की ओर चल पड़ीं| बड़े प्रताप और शान से राजा जनक परमात्मा के दरबार में उसके देव लोक में पहुंचा|


Thursday, 17 October 2013

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 46

ॐ सांई राम

आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं, हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है, हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...



साँई नगरी शिर्डी से बाबा जी के पहले दर्शनों का सीधा प्रसारण आज प्रात: काल 04:00 बजे 

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 46
बाबा की गया यात्रा - बकरों की पूर्व जन्मकथा
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इस अध्याय में शामा की काशी, प्रयाग व गया की यात्रा और बाबा किस प्रकार वहाँ इनके पूर्व ही (चित्र के रुप में) पहुँच गये तथा दो बकरों के गत जन्मों के इतिहास आदि का वर्णन किया गया है ।

Wednesday, 16 October 2013

भक्त बेनी जी - जीवन परिचय


ॐ साँई राम जी
 


भक्त बेनी जी


भक्तों की दुनिया बड़ी निराली है| प्रभु भक्ति करने वालों की गिनती नहीं हो सकती| इस जगत में अनेकों महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने प्रभु के नाम के सहारे जीवन व्यतीत किया तथा वह इस जगत में अमर हुए, जबकि अन्य लोग जो मायाधारी थे, मारे गए तथा उनका कुछ न बना| ऐसे पुरुषों में ही भक्त बेणी जी हुए हैं| आपका वास्तविक नाम ब्रह्म भट्ट बेणी था| आपका जन्म सम्वत १६७० विक्रमी में 'असनी' गांव में हुआ| आप जाति के ब्राह्मण थे और इतने निर्धन थे कि जीवन से उदास हो गए थे| रात-दिन यही विचार करते रहते थे कि मानव जीवन का अन्त कर लें, अगला जीवन क्या पता कैसे हो| हो सकता है कि यदि इस जन्म दुखी हैं तो अगले जन्म में सुखी हो जाएंगे| ऐसी ही दलीलें किया करते थे, क्योंकि भूखे बच्चों का रोना उनसे न देखा जाता| हर रोज़ पत्नी झगड़ा करती| वह इसी माया की कमी के दुखों से तंग आ गया तथा हर रोज़ मन ही मन क्लेश करने लगे|bhagat-beni-ji-an-introduction

वह उदास हो कर घर से चल पड़े| अचानक रास्ते में उनको एक महांपुरुष मिला| उनके साथ वचन-विलास हुए तो उन्होंने पूछा, 'हे बेणी! किधर चले हो?'

बेणी-'महाराज क्या बताऊं, घर में बहुत गरीबी है| इस भूखमरी की दशा ने दुखी किया है| समझ नहीं आता क्या करूं-यही मन करता है कि आत्मघात कर लूं| पत्नी तथा बच्चे अपने-आप भूख से मर जाएंगे| ऐसा सोच कर बाहर को चला हूं|

महांपुरुष-'मरने से दुःख दूर नहीं होते| आत्महत्या करेगा तो आत्मा दुखी होगी, नरकों का भागी बनेगा| मेहनत करो, यदि कोई और मेहनत नहीं करनी तो प्रभु भक्ति की ही मेहनत किया करो| जो भक्ति करता है, परमात्मा उसकी सारी कामनाएं पूरी करता है| जीवों की चिंता परमात्मा को है| कर्म गति है, कर्मों का फल भोगना पड़ता है| किसी जन्म में ऐसा कर्म हुआ है, जो यह दुःख के दिन देखने पड़े| अब तो प्रभु की भक्ति करो तो ज़रूर भला होगा|

उस महांपुरुष का उपदेश बेणी को अच्छा लगा| मन पर प्रभाव पड़ा तो जंगल की ओर चला गया| वह जा का कर भक्ति करने लगा| इस तरह कुछ दिन बीत गए| भाई गुरदास जी ने यह शब्द उच्चारा -


गुरमुख बेणी भगति करि जाई इकांत बहै लिव लावै |
करमकरै अधिआतमी होरसु किसै न अलख लखावै |
घर आइआजां पूछिअै राज दुआरि गइआ आलावै|
घर सभ वथू मंगीअनिवल छल करिकै झत लंघावै |
वडा साग वरतदा ओहु इक मन परमेसर धिआवै ||
पैज सवारै भगत दी राजा होइकै घरि चलिआवै |
देइ दिलासा तुसि कै अनगिनती खरची पहुंचावै |
ओथहुंआइआ भगत पासि होइ दिआल हेत उपजावै |
भगत जनां जैकारकरावै |

जिसका परमार्थ है - महांपुरुष के कथन अनुसार बेणी बाहर एकांत में समाधि लगा कर भक्ति करने के लिए मन एकाग्र कर लेता पर भक्त गुप्त रखने लग पड़ा| किसी को उसने नहीं बताया था, जब वह घर आता तो पत्नी पूछती कहां से आए हो?'

राज दरबार में कथा करता हूं| जब कथा समाप्त होती भोग पड़ेगा तो अवश्य ही राजा दक्षिणा देगा| वह धन पदार्थ बहुत होगा, सारी जरूरतें पूरी हो जाएंगी|

यह सुन कर बेणी जी की पत्नी क्रोधित होकर आपे से बाहर हो गई| उसने कहा-'चूल्हे में पड़े तुम्हारा राजा!' कथा का क्या पता कब भोग पड़ेगा| आप मुझे भोजन सामग्री ला दो नहीं तो घर मत लौटना|

अपनी पत्नी के इस तरह के कटु वचन सुनकर बेणी चुपचाप जंगल को चला गया| भक्ति में जा लगा| ऐसी सुरति प्रभु से जुड़ी कि सब कुछ भूल गया| पत्नी का रोना याद न आया| भूखमरी तथा अपनी भूख याद न रही केवल परमात्मा को याद करता गया|

उधर अन्तर्यामी प्रभु ने सत्य ही भक्त की भक्ति सुन ली| अपने सेवक की लाज रखने के लिए, अपने नाम की महिमा व्यक्त करने के लिए उन्होंने राजा का रूप धारण किया तथा भोजन सामग्री की गाड़ियां भर लीं| धन ढोया तथा जा कर बेणी की पत्नी को पूछा - 'ब्रह्म भट्ट बेणी का घर यही है?'

बेणी की पत्नी-'जी, यही है| पता नहीं कहां उजड़ा है? परमात्मा ने राजा के अहलकार के रूप में कहा, 'वह राज दरबार में कथा करते हैं| भोजन सामग्री भेजी है| अन्न है, वस्त्र, मीठा, घी, संभाल लो| कथा पूरी होने पर बहुत कुछ मिलेगा|' बेणी की पत्नी को लाज आई कि वह झूठ नहीं कहते थे, सत्यता ही राजा के दरबार में जाते थे, यूं ही क्रोध किया| उसने सारा सामान रख लिया तथा खुश हो कर बेणी जी को याद करने लगी, यह भी कह दिया, 'जी! सुबह कुछ नाराज होकर गए हैं, उनको शीघ्र भेज देना|'

प्रभु यह लीला देखकर प्रसन्न हो गए तथा सीधे बेणी जी के पास पहुंचे, उनको जा कर होश में लाया तथा कहा-'होश करो तुम्हारी भक्ति स्वीकार हुई! जाओ, तुम्हारी सारी आवश्यकताएं पूरी हुईं| किसी बात की कमी नहीं रह गई|' बेणी जी ने साक्षात् दर्शन किए| वचन सुने पर जब आगे बढ़ कर नमस्कार करने लगे तो प्रभु अपनी माया शक्ति से अदृश्य हो गए|

सारा कौतुक देखकर भक्त बेणी भक्ति करने से उठे तथा खुशी से गद्गद् हो कर वापिस घर को चल दिए| जब घर आए तो उनकी पत्नी उनको प्रसन्नचित्त हो कर मिली| चरणों में माथा टेका, 'मुझे क्षमा करना नाथ! मैं तो भूल गई भूख ने तंग किया था| अयोग्य बातें मुंह से निकल गईं| मुझे क्षमा कीजिए, आप तो सब कुछ जानते हो| राजा का अहलकार सब कुछ दे गया| अब किसी बात की कमी नहीं| प्रभु ने बात सुन ली|'

बेणी सुन कर प्रसन्न हो गया कि यह सब कुछ प्रभु भक्ति का फल है, जो माया आई तथा साथ ही घर की माया (स्त्री) भी खुश हो गई|

बेणी जी ने भक्ति करते रहने का मन बना लिया तथा प्रसिद्ध भक्त बना| उनकी बाणी श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में भी विद्यमान है| आप की बाणी का शब्द है-

तनि चंदनु मसतकि पाती || रिद अंतरि कर तल काती ||
ठग दिसटि बगा लिव लागा || देखि बैसनो प्रान मुख भागा ||१||
कलि भगवत बंद चिरांमं || क्रूर दिसटि रता निसि बादं ||१||रहाउ ||
नितप्रति इसनानु सरीरं || दुइ धोती करम मुखि खीरं ||
रिदै छुरी संधिआनी || पर दरबु हिरन की बानी ||२||
सिलपूजसि चक्र गनेसं || निसि जागसि भगति प्रवेसं ||
पग नाचसि चितु अकरमं || ए लंपट नाच अधरमं ||३||
म्रिग आसणु तुलसी माला || कर ऊजल तिलकु कपाला ||
रिदै कूडु कंठि रुद्रांख || रे लंपट क्रिसनु अभाखं ||४||
जिनि आतम ततु न चीन्हिआ || सभ फोकट धरम अबीनिआ ||
कहु बेणी गुरमुखि धिआवै ||बिनु सतिगुर बाट न पावै ||५||१||

जिसका परमार्थ - उपदेश देते हैं, पंडित को कहते हैं, हे पंडित! जरा सुनो तो तुम्हारे हृदय में प्रभु भक्ति भी है| ...तभी तो ब्राह्मण भूखे मरते हैं, भक्ति नहीं करते अपितु आडम्बर करते हैं| आप फरमाते हैं - हे पंडित! तन को चंदन से तथा माथे को चंदन के पत्ते लगा कर शीतल रखते हो, पर कभी सोचा है तुम्हारे हृदय में तो कटार है| भाव खोट है| हरेक से धोखा करने तथा बगुले की तरह बेईमानी की समाधि लगा कर बैठते हो की कोई संदेह न करे जब मौका मिले तो खा पी जाए| उपर से तो विष्णु भक्त लगता है, जैसे ज्ञान नहीं होती तथा रात को सूरत कुत्ते की तरह हो जाती है| पाप कर्म की तरफ भागा फिरता हुआ काम क्रोध की तरफ जाता है| स्त्री का गुलाम बनता है| चोरी करके खाता है| दो धोती रखता, स्नान करता, जुबान से मीठे बोल बोलता है| मन में बेईमानी, पराया माल लूटने तथा उठाने की आदत है| आप का जीवन कैसा है?

वाह रे पंडित! द्वारिका, काशी आदि जा कर तन पर कष्ट उठाता, पत्थर की पूजा करता हुआ पत्थर रूप बन गया है| लाभ कुछ नहीं| लोगों से माया लेने तथा धोखा करने के लिए नाचता है, गाता है तथा कई प्रकार की लीला करता है| वाह! तेरे ढ़ोंग कभी मृगछाला बिछा कर बैठ गया, कभी तुलसी की माला, चंदन का तिलक, जुबान से जाप, पर कभी यह नहीं सोचा कि हृदय किधर दौड़ता है| ख्याल तो नारी भोग की तरफ दौड़ते हैं| हे पंडित! यह दिखावा हैं| ज्ञान की आवश्यकता है| आवश्यकता है प्रभु को युद्ध हृदय से याद किया जाए| मन की वासनाएं रोकी जाए तो प्रभु परमात्मा से मेल होता है|

ऐसा उपदेश देने लग पड़े| परमात्मा ने ऐसा भाग्य बनाया कि उनके घर में कोई भी कमी न रही| वह भजन बंदगी करते रहे| आज उनके नगर असनी में उनकी याद मनाई जाती है| प्रभु को जो स्मरण करते हैं, लोग उनको स्मरण करते हैं| ऐसी नाम की महिमा है| हे जिज्ञासु जनो! भक्ति एवं नाम का सिमरन करो ताकि कलयुग में कल्याण हो|

Monday, 14 October 2013

भक्त शेख फरीद जी - जीवन परिचय


ॐ साँई राम जी



भक्त शेख फरीद जी


देखु फरीद जु थीआ दाड़ी होई भूर || 
अगहु नेड़ा आइआ पिछा रहिआ दूरि || १ ||

शेख फरीद जिनका पूरा नाम फरीद मसऊद शकर गंज था|शेख फरीद जी का जन्म 1172 ई० में गाँव खोतवाल जिला मुल्तान में हुआ| इनके पिता का नाम शेख जमान सुलेमान तथा माता का नाम मरियम था|इनकी माता धर्मात्मा इस्लामी तालीम की ज्ञाता थी| वह शुद्ध ह्रदय वाली व ईमानदार थी| उसकी शिक्षा का प्रभाव फरीद जी के ऊपर बचपन में ही बहुत पड़ा| आप १२ साल से पहले ही कुरान मजीद अध्यन्न कर गए|यह भी कहा जाता है कि मौखिक रूप से पहले ही याद कर लिया तथा धार्मिक परिपक्व हो गए| इनके पिता मशहूर सूफी थे|



शेख फरीद जी के पूर्वज सुल्तान महमूद गजनवी के साथ संबंध रखते थे| आप के पिता गजनवी के भतीजे थे| सुलेमान पहले हिंद आ गया,फिर वहाँ से लाहौर आ बैठा| सुलेमान का फकीरी दायरा कायम हों गया|लाहौर से उठ कर जंगली इलाके मुलक की तरफ चले गए|अनत में पाकपटन में अपना स्थान कायम कर लिया|वहीं शेख फरीद जी का जन्म हुआ|

शेख फरीद जी का जन्म गुरु नानक देव जी से पहले पाँच सौ साल पहले माना जाता है|एक दिन माता ने तपस्या के बारे में बताया तो आप ने विचार बना लिया कि युवा होकर तपस्या करेंगे|जब युवा हुए, चेतना आयी तो घर से तपस्या के लिए निकल पड़े|

उन्होंने बारह साल जंगल में काटे| उनके बाल बढ़ गए व जुड़ गए| प्रभु का सिमरन करते हुए गर्मी-सर्दी में रहकर वन की पीलू, करीरो के डेले, थोहर का पक्का फल आदि खा लेते| कभी-कभी वृक्ष के पत्ते भी खा लेते| उनके मन में बारह साल भक्ति करके अहंकार आ गया| उन्होंने चिडियों को कहा "मर जाओ"| सचमुच ही चिडिया मर गई| "जीवित हो जाओ" वह सचमुच ही जीवित हो गई|उन्हें लगा कि उनकी भक्ति पूरी हो गई है| रिद्धिया-सिद्धिया मिल गई हैं| अच्छा हो गया है|

अहंकार में भरे हुए फरीद जी पास के गाँव में पहुंच गए| अपनी प्यास बुझाने के लिए कुएँ की तरफ चल दिए| वहाँ पर एक स्त्री पानी का डोल निकालती व भरकर उल्टा देती| फरीद जी ने कहा कन्या! मुझे पानी पिलाओ मैं दूर से आया हूँ|

परन्तु उस कन्या ने फरीद जी की तरफ ध्यान न दिया और अपने कार्य में लगी रही| फरीद जी क्रोधित हो गए और कहने लगे - "मैं कब से कह रहा हूँ मुझे पानी पिलाओ| जमीन पर पानी फैंकने से तुम्हें क्या लाभ?"

कन्या ने उत्तर दिया मेरी बहन का घर जल रहा है, आग बुझा रही हूँ| मेरी बहन का घर यहाँ से बीस कोस दूर है| फरीद जी यह सुनकर बहुत हैरान हुए| कन्या ने कहना शुरू किया कि यहाँ चिड़िया नहीं जिनको कहोगे "मर जाओ" तो वह मर जाएँगी तथा कहोगे "उड़ जाओ" तो उड़ जाएँगी| यहाँ यह नहीं|

यह बात सुनकर फरीद जी दंग रह गए कि उसे यह बात कहाँ से ज्ञात हुई| आप चाहे मुझे पानी न पिलाए परन्तु यह सारी शक्ति जानने तथ आग बुझाने की कहाँ से प्रप्त की?

कन्या ने उत्तर दिया "सेवा तथा पति प्रेम करती हूँ| यही तपस्या है अहंकार नहीं|" भला आपने तो परीक्षा की, प्रभु की परीक्षा मन में संदेह उत्पन किया| ऐसा हरगिज नहीं करना चाहिए था| फरीद जी ने पानी पिया और क्या देखते हैं कि कुआँ खाली है, न डोल, न फिरनी, न वह स्त्री| अकेले फरीद जी वहाँ खड़े थे| वह हैरान हो गए और जान गए कि परमात्मा ने यह सारा खेल रचा है|

घर पहुँचे तो माँ ने देखा कि पुत्र के बाल जुड़े हुए हैं| वह उसे सवारने लगी| फरीद जी को पीड़ा महसूस हुई| माँ कहने लगी पुत्र! जिन वृक्षों के पत्ते तोडकर खाते थे तो उनको पीड़ा नहीं होती थी? इसतरह दूसरों को दुःख देने से पीड़ा अनुभव होती है| सबमे अल्लाह का नूर है चाहे कोई पक्षी है या परिंदा| उन्हें ज्ञात हो गया कि उनकी भक्ति अभी अधूरी है| जो की थी चिड़ियों की परीक्षा में गवा ली| इस तरह उनके मन में दूसरी बार तपस्या करने का ध्यान आया|

बाबा फरीद ने फिर घर छोड़ दिया| धरती पर गिरी हुई चीज़ ही खाते, वृक्ष से पत्ता तक न तोड़ते| इस तरह कई साल बीत गए| उनका शरीर कमजोर हो गया| प्रभु दर्शन की लालसा थी| पर भगवान के दर्शन नहीं होते थे| उस समय की शारीरिक व मानसिक अवस्था को फरीद जी ने इस तरह बयान किया है -


कागा करंग ढंढोलिआ सगला खाइआ मासु || 
ऐ दुई नैना मति छुहउ पिर देखन की आस || १९ ||

भव- शरीर पिंजर मात्र ही रह गया है| इस तरह कई साल भक्ति करते बीत गए परमेश्वर नहीं आया| प्रभु के दर्शन एक दो बार हुए| मन को संतुष्ठी हुई पर पूर्णता प्राप्त नहीं हुई| उन्हें यह ज्ञात हो गया कि बिना मुरशद धारण किए मन को संतोष प्राप्त नहीं हो सकता| इसलिए गुरु धरण करना जरुरी है|

गुरु की ख़ोज में फरीद जी अजमेर में चिश्ती साहिब के पास पहुँच गए| उन्हें मुरशद मानकर सेवा करने लगे| भक्ति के लिए सेवा व श्रद्धा दो गुण चाहिए थे| आप डटकर सेवा करते रहे| आपकी सेवा गुरु को स्नान कराने की थी| स्वयं ही अग्नि जलानी और पानी गर्म करना| एक दिन खूब बारिश हुई| उस काल में माचिस न होने के कारण अग्नि संभालकर रखनी पड़ती थी| फरीद जी को चिंता हो गई| उसी भयंकर तूफान में डेरे से बाहर निकल पड़े और उन्होंने देखा कि वेश्या की बैठक में अग्नि जल रही है| फरीद जी निडरता के साथ अन्दर चले गए| उन्हें देखकर वेश्या मन ही मन कुछ ओर ही सोचती रही लेकिन उसका सोचना फरीद जी के विपरीत था| उन्होंने कहा माता जी! अग्नि चाहिए| यदि अग्नि न मिली तो स्नान कैसे होगा और चिश्ती जी खुदा की बंदगी कैसे करेंगे|

यह सुनकर कुकर्मी वेश्या हँस पड़ी और कहने लगी कि मुझे भी किसी चीज़ की आवश्कता है|
फरीद जी - किस चीज़ की आवश्कता है?
वेश्या - आपकी| मुझे आपकी आँखे बहुत प्यारी लगी हैं| अगर आप मुझे अपनी आँख की पुतली देंगे तो अग्नि अवश्य ही मिल जायेगी|
इतिहास में लिखा है - जैसे ही वेश्या ने तेज चाकू लिया और आँख पर लगाया उसे अचानक धक्का लगा और पीछे गिर गई| लेकिन फरीद की आँख पर घाव हो गया| उसने आँख पर पट्टी बाँध दी और फरीद जी तो अग्नि देकर फरीद जी से क्षमा माँगने लगी|

अपने नियम के अनुसार फरीद जी ने प्रातकाल अग्नि जलाई, पानी गर्म किया और गुरु जी को स्नान कराया| गुरु जी ने पूछा फरीद आँख पर पट्टी क्यों बांध रखी है? फरीद जी हाथ जोड़ कर खड़े रहे| "पट्टी खोल दो" गुरु जी ने हुक्म किया| जैसे की पट्टी खोली आँख पर कोई घाव नहीं था| आँख वैसे की वैसी थी| मुरशद ने वचन किया, तुम्हारी सेवा परवान हुई, तपस्या भी पूर्ण हुई| अहंकार मत करना|नम्रता अपनाना और खुदा को सदा याद रखना| रिद्धियां - सिद्धियां सदा आपके साथ रहेंगी| अपने घर जाकर खुदा की महिमा गाओ|

इस प्रकार हजरत चिश्ती साहिब प्रसन्नता पूर्वक वर देते गए और बाबा फरीद जी उनके चरण पकड़कर श्रवण करते हुए कृतार्थ हो गए|

बाबा फरीद जी अपने घर पाक पटन लौट आए और इस्लाम धर्म का प्रचार करने लगे| नेकी, सत्य और विनय का प्रकाश चारों तरफ जगमगा गया तथा आपकी गद्दी का यश दूर - दूर तक फ़ैल गया| जो भी उस गद्दी पर विराजमान होता उसका नाम फरीद रखा जाता| अब भी यह गद्दी करामाती गद्दी मानी जाती है|



साहितिक देन:

श्री गुरुग्रंथ साहिब में आप की बाणी के सलोक विद्यमान हैं जिन्हें "सलोक फरीद जी" कहा जाता है| इनकी सारी ही बाणी कल्याणकारी तथा उपदेश प्रदान करने वाली है|

Sunday, 13 October 2013

आज देवो के देव, श्री साँईं देव जी की पुण्यतिथि हैं



आज देवो के देव, श्री साँईं देव जी की पुण्यतिथि हैं

बाबा जी के श्री चरणों में अरदास हैं कि वह अपनी कृपा दृष्टि अपने सभी भक्तों पर बरसाने की कृपा करे.....

ॐ साँईं श्री साँईं जय जय साँईं ॐ साँईं श्री साँईं जय जय साँई ॐ साँईं श्री साँईं जय जय साँई

आप सब भी मेरे साथ इस मंत्र को तीन बार बोलकर श्री जी के श्री चरणों मे अपनी हाज़री जरूर लगाऐ

बाबा जी की कृपा आप सभी पर सदैव बनी रहे

ॐ श्री साँईं राम जी


श्री साँई समाधी मन्दिर

हिन्दुओं में यह प्रथा प्रचलित है कि जब किसी मनुष्य का अन्तकाल निकट आ जाता है तो उसे धार्मिक ग्रन्थ आदि पढ़कर सुनाये जाते है । इसका मुख्य कारण केवल यही है कि जिससे उसका मन सांसारिक झंझटों से मुक्त होकर आध्यात्मिक विषयों में लग जाय और वह प्राणी कर्मवश अगले जन्म में जिस योनि को धारण करे, उसमें उसे सदगति प्राप्त हो । सर्वसाधारण को यह विदित ही है कि जब राजा परीक्षित को एक ब्रहृर्षि पुत्र ने शाप दिया और एक सप्ताह के पश्चात् ही उनका अन्तकाल निकट आया तो महात्मा शुकदेव ने उन्हें उस सप्ताह में श्री मदभागवत पुराण का पाठ सुनाया, जिससे उनको मोक्ष की प्राप्ति हुई । यह प्रथा अभी भी अपनाई जाती है । महानिर्वाण के समय गीता, भागवत और अन्य ग्रन्थों का पाठ किया जाता है । बाबा तो स्वयं अवतार थे, इसलिये उन्हें बाहृ साधनों की आवश्यकता नहीं थी, परन्तु केवल दूसरों के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करने के हेतु ही उन्होंने इस प्रथा की उपेक्षा नहीं की । जब उन्हें विदित हो गया कि मैं अब शीघ्र इस नश्वर देह को त्याग करुँगा, तब उन्होंने श्री. वझे को रामविजय प्रकरण सुनाने की आज्ञा दी । श्री. वझे ने एक सप्ताह प्रतिदिन पाठ सुनाया । तत्पश्चात ही बाबा ने उन्हें आठों प्रहर पाठ करने की आज्ञा दी । श्री. वझे ने उस अध्याय की द्घितीय आवृति तीन दिन में पूर्ण कर दी और इस प्रकार 11 दिन बीत गये । फिर तीन दिन और उन्होंने पाठ किया । अब श्री. वझे बिल्कुल थक गये । इसलिये उन्हें विश्राम करने की आज्ञा हुई । बाबा अब बिलकुल शान्त बैठ गये और आत्मस्थित होकर वे अन्तिम श्रण की प्रतीक्षा करने लगे । दो-तीन दिन पूर्व ही प्रातःकाल से बाबा ने भिक्षाटन करना स्थगित कर दिया और वे मसजिद में ही बैठे रहने लगे । वे अपने अन्तिम क्षण के लिये पूर्ण सचेत थे, इसलिये वे अपने भक्तों को धैर्य तो बँधाते रहते, पर उन्होंने किसी से भी अपने महानिर्वाण का निश्चित समय प्रगट न किया । इन दिनों काकासाहेब दीक्षित और श्रीमान् बूटी बाबा के साथ मसजिद में नित्य ही भोज करते थे । महानिर्वाण के दिन (15 अक्टूबर को) आरती समाप्त होने के पश्चात् बाबा ने उन लोगों को भी अपने निवासस्थान पर ही भोजन करके लौटने को कहा । फिर भी लक्ष्मीबाई शिंदे, भागोजी शिंदे, बयाजी, लक्ष्मण बाला शिम्पी और नानासाहेब निमोणकर वहीं रह गये । शामा नीचे मसजिद की सीढ़ियों पर बैठे थे । लक्ष्मीबाई शिन्दे को 9 रुपये देने के पश्चात् बाबा ने कहा कि मुझे मसजिद में अब अच्छा नहीं लगता है, इसलिये मुझे बूटी के पत्थर वाड़े में ले चलो, जहाँ मैं सुखपूर्वक रहूँगा । ये ही अन्तिम शब्द उनके श्रीमुख से निकले । इसी समय बाबा बयाजी के शरीर की ओर लटक गये और अन्तिम श्वास छोड़ दी । भागोजी ने देखा कि बाबा की श्वास रुक गई है, तब उन्होंने नानासाहेब निमोणकर को पुकार कर यह बात कही । नानासाहेब ने कुछ जल लाकर बाबा के श्रीमुख में डाला, जो बाहर लुढ़क आया । तभी उन्होंने जोर से आवाज लाई अरे । देवा । तब बाबा ऐसे दिखाई पड़े, जैसे उन्होंने धीरे से नेत्र खोलकर धीमे स्वर में ओह कहा हो । परन्तु अब स्पष्ट विदित हो गया कि उन्होंने सचमुच ही शरीर त्याग दिया है ।

बाबा समाधिस्थ हो गये – यह हृदयविदारक दुःसंवाद दावानल की भाँति तुरन्त ही चारों ओर फैल गया । शिरडी के सब नर-नारी और बालकगण मसजिद की ओर दौड़े । चारों ओर हाहाकार मच गया । सभी के हृदय पर वज्रपात हुआ । उनके हृदय विचलित होने लगे । कोई जोर-जोर से चिल्लाकर रुदन करने लगा । कोई सड़कों पर लोटने लगा और बहुत से बेसुध होकर वहीं गिर पड़े । प्रत्येक की आँखों से झर-जर आँसू गिर रहे थे । प्रलय काल के वातावरण में तांडव नृत्य का जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है, वही गति शिरडी के नर-नारियों के रुदन से उपस्थित हो गई । उनके इस महान् दुःख में कौन आकर उन्हें धैर्य बँधाता, जब कि उन्होंने साक्षात् सगुण परब्रहृ का सानिध्य खो दिया था । इस दुःख का वर्णन भला कर ही कौन सकता है ।

अब कुछ भक्तों को श्री साई बाबा के वचन याद आने लगे । किसी ने कहा कि महाराज (साई बाबा) ने अपने भक्तों से कहा था कि भविष्य में वे आठ वर्ष के बालक के रुप में पुनः प्रगट होंगे । ये एक सन्त के वचन है और इसलिये किसी को भी इन पर सन्देह नहीं करना चाहिये, क्योंकि कृष्णावतार में भी चक्रपाणि (भगवान विष्णु) ने ऐसी ही लीला की थी । श्रीकृष्ण माता देवकी के सामने आठ वर्ष की आयु वाले एक बालक के रुप में प्रगट हुये, जिनका दिव्य तेजोमय स्वरुप था और जिनके चारों हाथों में आयुध (शंख, चक्र, गटा और पदम) सुशोभित थे । अपने उस अवतार में भगवान श्रीकृष्ण ने भू-भार हलका किया था । साई बाबा का यह अवतार अपने बक्तों के उत्थान के लिये हुआ था । तब फिर संदेह की गुंजाइश ही कहाँ रह जाती है । सन्तों की कार्यप्रणाली अगम्य होती है । साई बाबा का अपने भक्तों के साथ यह संपर्क केवल एक ही पीढ़ी का नहीं, बल्कि यह उनका पिछले 72 जन्मों का संपर्क है । ऐसा प्रतीतत होता है कि इस प्रकार का प्रेम-सम्बन्ध विकसित करके महाराज (श्रीसाईबाबा) दौरे पर चले गये और भक्तों को दृढ़ विश्वास है कि वे शीघ्र ही पुनः वापस आ जायेंगें ।

अब समस्या उत्पन्न हुई कि बाबा के शरीर की अन्तिम क्रिया किस प्रकार की जाय । कुछ यवन लोग कहने लगे कि उनके शरीर को कब्रिस्तान में दफन कर उसके ऊपर एक मकबरा बना देना चाहिये । खुशालचन्द और अमीर शक्कर की भी यही धारणा थी, परन्तु ग्राम्य अधिकारी श्री. रामचन्द्र पाटील ने दृढ़ और निश्चयात्मक स्वर में कहा कि तुम्हारा निर्णय मुझे मान्य नहीं है । शरीर को वाड़े के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी नहीं रखा जायेगा । इस प्रकार लोगों में मतभेद उत्पन्न हो गया और वह वादविवाद 36 घण्टों तक चलता रहा ।

बुधवार के दिन प्रातःकाल बाबा ने लक्ष्मण मामा जोशी को स्वप्न दिया और उन्हें अपने हाथ से खींचते हुए कहा कि शीघ्र उठो, बापूसाहेब समझता है कि मैं मृत हो गया हूँ । इसलिये वह तो आयेगा नहीं । तुम पूजन और कांकड़ आरती करो । लक्ष्मण मामा ग्राम के ज्योतिषी, शामा के मामा तथा एक कर्मठ ब्राहृमण थे । वे नित्य प्रातःकाल बाबा का पूजन किया करते, तत्पश्चात् ही ग्राम देवियों और देवताओं का । उनकी बाबा पर दृढ़ निष्ठा थी, इसलिये इस दृष्टांत के पश्चात् वे पूजन की समस्त सामग्री लेकर वहाँ आये और ज्यों ही उन्होंने बाबा के मुख का आवरण हटाया तो उस निर्जीव अलौकिक महान् प्रदीप्त प्रतिभा के दर्शन कर वे स्तब्ध रह गये, मानो हिमांशु ने उन्हें अपने पाश में आबदृ करके जड़वत् बना दिया हो । स्वप्न की स्मृति ने उन्हें अपना कर्तव्य करने को प्रेरित कर दिया । फिर उन्होंने मौलवियों के विरोध की कुछ भी चिंता न कर विधिवत् पूजन और कांकड़ आरती की । दोपहर को बापूसाहेब जोन भी अन्य भक्तों के साथ आये और सदैव की भांति मध्याहृ की आरती की । बाबा के अन्तिम श्री-वचनों को आदरपूर्वक स्वीकार करके लोगों ने उनके शरीर को बूटी वाड़े में ही रखने का निश्चय किया और वहाँ का मध्य भाग खोदना आरम्भ कर दिया । मंगलवार की सन्ध्या को राहाता से सब-इन्स्पेक्टर और भिन्न-भिन्न स्थानो से अनेक लोग वहाँ आकर एकत्र हुए । सब लोगों ने उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया । दूसरे दिन प्रातःकाल बम्बई से अमीर भाई और कोपरगाँव से मामलेदार भी वहां आ पहुँचे । उन्होंने देखा कि लोग अभी भी एकमत नहीं है । तब उन्होंने मतदान करवाया और पाया कि अधिकांश लोगों का बहुमत वाड़े के पक्ष में ही है । फिर भी वे इस विषय में कलेक्टर की स्वीकृति अति आवश्यक समझते थे । तब काकासाहेब स्वयं अहमदनगर जाने को उघत् हो गये, परन्तु बाबा की प्रेरणा से विरक्षियों ने भी प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया और उन सबने मिलकर अपना मत भी वाड़े के ही पक्ष में दिया । अतः बुधवार की सन्ध्या को बाबा का पवित्र शरीर बड़ी धूमधाम और समारोह के साथ वाड़े मे लाया गया और विधिपूर्वक उस स्थान पर समाधि समाधि बना दी गई, जहाँ मुरलीधर की मूर्ति स्तापित होने को थी । सच तो यह है कि बाबा मुरलीधर बन गये और वाड़ा समाधि-मन्दिर तथा भक्तों का एक पवित्र देवस्थान, जहाँ अनेको भक्त आया जाया करते थे और अभी भी नित्य-प्रति वहाँ आकर सुख और शान्ति प्राप्त करते है । बालासाहेब भाटे और बाबा के अनन्य भक्त श्री. उपासनी ने बाबा की विधिवत् अन्तिम क्रिया की ।

जैसा प्रोफेसर नारके को देखने में आया, यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि बाबा का शरीर 36 घण्टे के उपरांत भी जड़ नहीं हुआ और उनके शरीर का प्रत्येक अवयव लचीला (Elastic) बना रहा, जिससे उनके शरीर पर से कफनी बिना चीरे हुए सरलता से निकाली जा सकी ।

ईंट का खण्डन
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बाबा के निर्वाण के कुछ समय पूर्व एक अपशकुन हुआ, जो इस घटना की पूर्वसूचना-स्वरुप था । मसजिद में एक पुरानी ईंट थी, जिस पर बाबा अपना हाथ टेककर रखते थे । रात्रि के समय बाबा उस पर सिर रखकर शयन करते थे । यह कार्यक्रम अने वर्षों तक चला । एक दिन बाबा की अनुपस्थिति में एक बालक ने मसजिद में झाड़ू लगाते समय वह ईंट अपने हाथ में उठाई । दुर्भाग्यवश वह ईंट उसके हाथ से गिर पड़ी और उसके दो टुकड़े हो गये । जब बाबा को इस बात की सूचना मिली तो उन्हें उसका बड़ा दुःख हुआ और वे कहने लगे कि यह ईंट नहीं फूटी है, मेरा भाग्य ही फूटकर छिन्न-भिन्न हो गया है । यह तो मेरी जीवनसंगिनी थी और इसको अपने पास रखकर मैं आत्म-चिंतन किया करता था । यह मुजे अपने प्राणों के समान प्रिय थी और उसने आज मेरा सात छोड़ दिया है । कुछ लोग यहाँ शंका कर सकते है कि बाबा को ईंट जैसी एक तुच्छ वस्तु के लिये इतना शोक क्यों करना चाहिये । इसका उत्तर हेमाडपंत इस प्रकार देते है कि सन्त जगत के उद्घार तथा दीन और अनाक्षितों के कल्याणार्थ ही अवतीर्ण होते है । जब वे नरदेह धारण करते है और जनसम्पर्कमें आते है तो वे इसी प्रकार आचरण किया करते है, अर्थात् बाहृ रुप से वे अन्य लोगों के समान ही हँसते, खेलते और रोते है, परन्तु आन्तरिक रुप से वे अपने अवतार-कार्य और उसके ध्येय के लिये सदैव सजग रहते है ।

भक्त परमानंद जी - जीवन परिचय


ॐ साँई राम जी

आप सभी को नव दुर्गा जी के नवरात्रों की हार्दिक शुभ कामनायें


भक्त परमानंद जी

भूमिका:

भक्त परमानंद जी अतीत ज्ञानी, विद्वान, हरि भक्त तथा कवि हुए हैं|


परिचय:

आपका जन्म गाँव बारसी जिला शोलापुर में हुआ| आपका समय 1606 विक्रमी के निकट का है| जब भक्ति लय जोरो पर चल रही थी| आपने अधिकतर समय वृन्दावन में गुजारा| आप मुम्बई की तरफ के रहने वाले थे|


आपने उपदेश दिया:

हे मनुष्य! इतिहास की कथा सुनकर तुमने क्या किया| यह जो कथा कहानियाँ सुनी, वह नाशवान भक्ति है| सच्ची भक्ति तो तेरे अन्दर आई ही नहीं| सारी उमर डींगे मरता रहा| किसी भूखे को कमाई में से दान तक नहीं दिया| पराई निन्दा, क्रोध, लिंग वासना तो छोड़ी ही नहीं| यही बड़ी बीमारियाँ हैं| इसलिए तुमने जितनी भी भक्ति की वह भी व्यर्थ ही गई|

हे पुरुष तुम रहा रोकते रहे| ताक भी लगाई रखी| ताले तोड़ दिए| इन कामों ने परलोक में तुम्हारी निन्दा कराई और निरादर भी हुआ| तुम्हारे यह सारे कार्य मूर्खो वाले हैं| तुमने शिकार खेलना नहीं छोड़ा| जीव हत्या करते रहे| कभी पक्षी पर भी दया नहीं की| और तो और सतसंग में जाकर हरि यश नहीं सुना| तो बताओ तुम्हारा कल्याण कैसे होगा? इस प्रकार उन्होंने सबको उपदेश दिया|


साहित्य देन:

भक्त परमानंद जी के निम्नलिखित ग्रंथ मिलते हैं -

परमानंद सागर
परमदास पद
दान लीला
ध्रुव चरित्र

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