शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Wednesday, 18 September 2019

Sai Baba's miracles

ॐ सांई राम




Some characteristics of Sai Baba's miracles are

Baba knew details of every one coming to Him, the details that happened in their life and details of what they had thought of in past or were thinking in present. This happened every day, with many. So a book is required to record them all.

Healing : Sai Baba used to take ailments and physical sufferings on to His body. Number of incident have been recorded where a devotee (or a near relative) would have high fever. Sai Baba's body would become hot with fever, and tremble as it happens with a fever patient. After few minutes Sai Baba would become normal and so would be the devotee. Same as fever other ailments like huge boil on the body would appear on Sai Baba body, same size and same place the devotee would be suffering. The devotee would be free from the ailment after the same. Sai Baba used to say and to His near devotees still listen and feel it, "I take upon the troubles and ailments of my devotees on myself." Such is the love of Guru Sai Baba. For the devotees who feels his grace He is not God. He is a loving companion. A Father, A Mother, A Friend, A God who can be worshiped, and much much more. It would be better to call Sai Baba of Shirdi as love incarnate. There are many miracles where devotees got free from stubborn diseases and ailments.

Another miracle deals with His sacred and divine presence. Devotees who saw Sai Baba would feel drawn towards His love and compassion. The love and compassion would be felt too much for them. The mind would be filled with unknown love and easiness and joy. Eyes would flow with tears unkown. Hair on the body would stand on their end. Overall the experience cannot be put in words, those who feels knows. Nobody can describe love. It has to be felt and lived. Same is true for divine love and sacred experience.



Sai Baba appears in Physical form to His devotees. There are many records where a devotee far away from Shirdi would see Sai Baba appearing, talking and guiding. This happens even after Sai Baba leaving His physical body (MahaSamadhi). Same as described about in dreams there are records of Sai Baba appearing in physical form also happens with those who have never herd of Sai Baba of Shirdi

Sai Baba when was in physical body would sometime shout and scream in Dwarkamai. To the newly onlooker it was just crazy, mad ! Why is the holy man shouting or screaming. It was out His immense love. Would you believe this amazing miracle with Capt. Jahanghir F. Daruwala which happened during world war 1. Well it happened.

Miracle of progeny. Sai Baba was and is known for helping His devotees looking for offspring. There are many incidents that narrates how the parents wishing to have children but were deprived of due to medical reasons. Two miracles in the early days of Shirdi changed the peoples view towards the mad Sufi Fakir, called Sai Baba. Other one after the lighting the lamps with oil was a close devotee who did not had children prayed to Baba for having the children. Soon after devotees wife got pregnant and gave birth to a child. Even these days so many devotees visit the holy shrine of Sai Baba (Sai Baba Mandir, Samadhi Temple) in Shirdi for the same and get positive results.

Sai Baba in dreams. One more characteristic of Sai Baba is appearance in dreams of various devotees. Records shows that so many devotees who had never seen or herd of Sai Baba, first had a vision of Sai Baba in dreams and than after some more or less time sees the Picture of Sai Baba and realized, hey this is the same saint with kerchief on His head who appeared in my dreams.

Tuesday, 17 September 2019

साँचा साँई नाम, सबका मालिक एक हैं ये कभी मत भूल

ॐ सांँई राम जी


सुगम जो चाहो करना दूर्गम पथ
हाँकों उजले कर्मों की ओर रथ
कांटे भी बन सकते हैं कोमल फूल
सबका मालिक एक हैं ये कभी मत भूल

झूठ नहीं हैं सत्य हैं वाणी
दीपक जलते जहाँ संग पानी
उदी की भी महिमा हैं निराली
साँई ने नीम भी मीठी कर डाली
और करिश्मों की क्या करे बात
गंगा यमुना बहे चरणों मे साथ
चरण नहीं यह हैं स्वर्ग समाना
भव से हुआ पार जो साँई को जाना

काहे करें तू हठ ओ पगले
साँई सिमर, साँई को जपले
इस जन्म की साँई नाम कमाई
संवार देगी तेरे जन्म भी अगले

झूठे बोल ना जीवन में घोल
सच हैं समझ ले तू अनमोल
साँई हैं साँचा जग नरक समान
सौंप दे साँई को जीवन की कमान

नाम ही नहीं सिर्फ एक सार भी हैं
शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप परिवार ही हैं
जहाँ के मुखिया बाबा तारणहार हैं
साँई सम शोभा वाला यह घरबार हैं

साँई हाथ जिस डोर को थामे
नहीं हो सकता वह कभी लाचार
हर संभव प्रयास साँई राम का
तेरी मुश्किल से होगा दो चार

Monday, 16 September 2019

आज मेरे मन के सांँई ने मुझसे कहा...

ॐ सांई राम





साँईं नमो नमः .....
श्री साँईं नमो नमः ......
जय जय साँईं नमो नमः .....
सद्गुरु साँईं नमो नमः ... ....!!!

 

बंधन जहाँ के सब ही है झूठे
साँईं से तेरा नाता न टूटे
बाबा के रंग में रंगते जाओ
साँईं राम साँईं राम रटते जाओ

 
यूँ तो साँईं नाम उच्चारण,
संभव साँईं कृपा से होवे
साँईं नाम है कण कण में,
फिर कण कण साँईं को कैसे उच्चारे
केवल साँईं समर्पण ही,
प्रभु नाम की शक्ति उन्हीं से पायें
धन्य है वोजिस प्राणी के मुख से,
साँईं नाम स्तुत रटवाये


आज मेरे मन के सांँई ने मुझसे कहा -

जब दिल हो उदास
बस आँखें बंद कर लेना
और न हो कोई पास
तो खुद से तुम कह देना
बस आँखें बंद कर लेना
देखो तुम यूँ न रोना
अपनी प्यारी आँखें को
आंसू में न डुबोना
जब भी आये मेरी याद
बस आँखें बंद कर लेना
समझना मैं जानता हूँ तुम्हारा हाल
मैं नज़र नहीं आता पर होता हूँ
बिलकुल तेरे करीब तेरे हृदय में बसा सदा
तुम मुझे अपना दर्द बता देना
मत होना उदास
बस आँखें बंद कर लेना

Sunday, 15 September 2019

शिरडी तीर्थ स्थान

ॐ सांँई राम



शिरडी तीर्थ स्थान

साँईं बाबा का निवास सथान होने के कारण शिरडी की प्रसिद्धि देश भर में फैली है और शिरडी को लोग तीर्थ स्थान मानते हैं। शिरडी में यात्रियों, दर्शकों और भक्तों के ठहरने के लिये एक ही स्थान था जिसका नाम “साठे का बाड़ा” था। हरि विनायक साठे ने नीम पेड़ के आसपास की जमीन खरीद कर वहाँ लोगों के ठहरने के लिये एक बाड़ा बनवा दिया। नीम वृक्ष को चबूतरे से घेर दिया। सन् 1909 ई. में नाना साहब चान्दोरकर के कहने पर बम्बई के सालिसिटर हरि सीताराम उर्फ काका साहब दीक्षित साँईं बाबा के दर्शन के लिये शिरडी आये। वे एक बार लन्दन में ट्रेन से गिर गये थे जिससे उनके एक पैर में लंगड़ापन आ गया था। जब वे साईं बाबा से मिले तब उन्होंने कहा कि “पाँव के लँगड़ेपन की कोई बात नहीं है, मेरे मन के लंगड़ेपन को दूर कर दीजिये।” साँईं बाबा की कृपा से काका साहब दीक्षित के पैर और मन दोनों का लंगड़ापन ठीक हो गया। काका साहब दीक्षित इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने साँईं बाबा के निकट शिरडी में ही रहने का निश्चय कर लिया। उन्होंने अपने रहने और दूसरे भक्तों के ठहरने के लिये एक बाड़ा शिरडी में बवनाया जो “दीक्षित बाड़ा” के नाम से जाना जाता है। नागपुर के धनी श्रीमान बापू साहब बूटी को साईं बाबा ने एक बार आँव की भयंकर बीमारी से और दूसरी बार हैजे से ठीक कर दिया। बापू साहब बूटी ने करोड़ों रुपये खर्च कर शिरडी में बाड़ा बनवा दिया। इस प्रकार शिरडी में तीन बाड़ा हो गये जहाँ आगन्तुक भक्त ठहरने लगे।
श्रीमान बूटी ने भव्य बाड़ा उसी स्थान पर बनवाया जहाँ पर साँईं बाबा के परिश्रम से फूलों का बगीचा तैयार हो गया था। बापू साहब बूटी के उसी बाड़े में साँईं बाबा का समाधि मन्दिर स्थित है जहाँ प्रतिदिन हजारों यात्री दर्शन करने के लिये आते हैं। साईं बाबा तो अन्तर्यामी थे। ऐसा लगता है कि उन्हें पहले से ही ज्ञात था कि उनका समाधि मन्दिर वहीं बनेगा। तभी तो पहले वहाँ उनके करकमलों से बगीचा लगा और बाद में वहीं उनकी समाधि बनी। अपनी मना समाधि के कुछ वर्ष पहले साँईं बाबा ने कहा था, “मेरे संसार से चले जाने के बाद भी मैं अपने समाधि के माध्यम से बात करूँगा।” उनकी यह भविष्यवाणी सच हुई। वे आज भी अपने भक्तों को नये नये अनुभव कराते हैं।


आपने कभी साँईं को देखा है ?
साँईं गरीबो का ...........
साँईं को पाना हैं या मिलना हैं तो किसी गरीब की मदद
कर के देखो वहां से साँईं की झलक उस मददगार को होगी
यकीन न हो तो आजमा के देखो.............

Saturday, 14 September 2019

नाव चले ना जीवन की, बिन साँई खेवनहार

ॐ सांँई राम जी


माँ-बाप, बहन-भाई का नाता
मनुष्य मृत्यु लोक में निभाता
सच्चा संबंधी हैं विश्व विधाता
बाकी सब यही हैं रह जाता
प्रभु से मिलने की खातिर ही
धरती पर रिश्तो का हल चलाता

झूठे बंधन और झूठे नाते
हम सभी सदा रहे निभाते
खेल मालिक का समझ ना पाते
भेजा जिसने जिस कर्म की खातिर
नया जीवन पाकर हम भूले जाते

नाव चले ना जीवन की
बिन साँई खेवनहार
और नहीं एक साँचा साँई
जग का तारणहार

सच्ची बात हैं सुन मेरे भाई
कर्म नेक कमा कहे मेरे साँई
जीवन को ना व्यर्थ टटोल
तन को ना माया से तोल
कर ले कमाई कुछ नेक
देखे सबका मालिक एक
बोली बोल सदा तू मीठी
तन जा मिले आखिर में मिट्टी

कहा से लाऊँ ऐसी स्याही
जो गुण तेरे लिखे मेरे साँई
नभ में भी कोई छोड़ तो होगा
तेरा गुणगान ना हमसे होगा
अनंत गुणों की हो तुम खान
कैसे भक्ति चढ़े परवान
अति लघु बुद्धि हमने पाई
लिखवाते हैं स्वयं श्री साँई

देना हो गर साँई तो मेघा सी दो भक्ति
कलम में दो गणु सम रचना की शक्ति
अनंत गुण तेरे गाता रहे यह तेरा दास
लता जी जैसी सुर में घोल दो मिठास

Friday, 13 September 2019

यूँ ही एक दिन चलते-चलते सांँई से हो गई मुलाकात।

ॐ सांई राम



यूँ ही एक दिन चलते-चलते सांँई से हो गई मुलाकात। 
जब अचानक सांँई सच्चरित्र की पाई एक सौगात। 
फिर सांँई के विभिन्न रूपों के मिलने लगे उपहार। 
तब सांँई ने बुलाया मुझको शिरडी भेज के तार। 
सांँई सच्चरित्र ने मुझ पर अपना ऐसा जादू डाला। 
सांँई नाम की दिन-रात मैं जपने लगा फिर माला। 
घर में गूँजने लगी हर वक्त सांँई गान की धुन। 
मन के तार झूमने लगे सांँई धुन को सुन। 
धीरे-धीरे सांँई भक्ति का रंग गाढ़ा होने लगा। 
और सांँई कथाओं की खुश्बूं में मन मेरा खोने लगा। 
सांँई नाम के लिखे शब्दों पर मैं होने लगी फिदा। 
अब मेरे सांँई को मुझसे कोई कर पाए गा ना जुदा। 
हर घड़ी मिलता रहे मुझे सांँई का संतसंग। 


सांँई मेरी ये साधना कभी ना होवे भंग। 
सांँई चरणों में झुका रहे मेरा यह शीश। 
सांँई मेरे प्राण हैं और सांई ही मेरे ईश। 
भेदभाव से दूर रहूँ,शुद्ध हो मेरे विचार। 
सांँई ज्ञान की जीवन में बहती रहे ब्यार |

Thursday, 12 September 2019

श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 15

ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं 
हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है

हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और  शान्ति का अनुभव करवाएगा
किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है



श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 15

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नारदीय कीर्तन पदृति , श्री. चोलकर की शक्कररहित चाय , दो छिपकलियाँ ।
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पाठकों को स्मरण होगा कि छठें अध्याय के अनुसार शिरडी में राम नवमी उत्सव मनाया जाता था । यह कैसे प्रारम्भ हुआ और पहने वर्ष ही इस अवसर पर कीर्तन करने के लिये एक अच्छे हरिदास के मिलने में क्या-क्या कठिनाइयाँ हुई, इसका भी वर्णन वहाँ किया गया है । इस अध्याय में दासगणू की कीर्तन पदृति का वर्णन होगा ।
नारदीय कीर्तन पदृति
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बहुधा हरिदास कीर्तन करते समय एक लम्बा अंगरखा और पूरी पोशाक पहनते है । वे सिर पर फेंटा या साफा बाँधते है और एक लम्बा कोट तथा भीतर कमीज, कन्धे पर गमछा और सदैव की भाँति एक लम्बी धोती पहनते है । एक बार गाँव में कीर्तन के लिये जाते हुए दासगणू भी उपयुक्त रीति से सज-धज कर बाबा को प्रणाम रने पहुँचे । बाबा उन्हें देखते ही कहने लगे, अच्छा । दूल्हा राजा । इस प्रकार बनठन कर कहाँ जा रहे हो । उत्तर मिला कि कीर्तन के लिये । बाबा ने पूछा कि कोट, गमछा और फेंटे इन सब की आवश्यकता ही क्या है । इनकों अभी मेरे सामने ही उतारो । इस शरीर पर इन्हें धारण करने की कोई आवश्यकता नहीं है । दासगणू ने तुरन्त ही वस्त्र उतार कर बाबा के श्री चरणों पर रख दिये । फिर कीर्तन करते समय दासगणू ने इन वस्त्रों को कभी नहीं पहना । वे सदैव कमर से ऊपर अंग खुले रखकर हाथ में करताल औ गले में हार पहन कर ही कीर्तन किया करते थे । यह पदृति यघपि हरिदासों द्घारा अपनाई गई पदृति के अनुरुप नहीं है, परन्तु फिर भी शुदृ तथा पवित्र हैं । कीर्तन पदृति के जन्मदाता नारद मुनि कटि से ऊपर सिर तक कोई वस्त्र धारण नहीं करते थे । वे एक हाथ में वीणा ही लेकर हरि-कीर्तन करते हुए त्रैलोक्य में घूमते थे ।
श्री चोलकर की शक्कररहित चाय
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बाबा की कीर्ति पूना और अहमदनगर जिलों में फैल चुकी थी, परन्तु श्री नानासाहेब चाँदोरकर के व्यक्तिगत वार्ताँलाप तथा दासगणू के मधुर कीर्तन द्घारा बाबा की कीर्ति कोकण (बम्बई प्रांत) में भी फैल गई । इसका श्रेय केवल श्री दासगणू को ही है । भगवान् उन्हें सदैव सुखी रखे । उन्होंने अपने सुन्दर प्राकृतिक कीर्तन से बाबा को घर-घर पहुँचा दिया । श्रोताओं की रुचु प्रायः भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है । किसी को हरिदासों की विदृता, किसी को भाव, किसी को गायन, तो किसी को चुटकुले तथा किसी को वेदान्त-विवेचन और किसी को उनकी मुख्य कथा रुचिकर प्रतीत होती है । परन्तु ऐसे बिरले ही है, जिनके हृदय में संत-कथा या कीर्तन सुनकर श्रद्घा और प्रेम उमड़ता हो । श्री दासगणू का कीर्तन श्रोताओं के हृदय पर स्थायी प्रभाव डालता था । एक ऐसी घटना नीचे दी जाती है ।



एक समय ठाणे के श्रीकौपीनेश्वर मन्दिर में श्री दासगणू कीर्तन और श्री साईबाबा का गुणगान कर रहे थे । श्रोताओं मे एक चोलकर नामक व्यक्ति, जो ठाणे के दीवानी न्यायालय में एक अस्थायी कर्मचारी था, भी वहाँ उपस्थित था । दासगणू का कीर्तन सुनकर वह बहुत प्रभावित हुआ और मन ही मन बाबा को नमन कर प्रार्थना करने लगा कि हे बाबा । मैं एक निर्धन व्यक्ति हूँ और अपने कुटुम्ब का भरण-पोशण भी भली भाँति करने में असमर्थ हूँ । यदि मै आपकी कृपा से विभागीय परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया तो आपके श्री चरणों में उपस्थित होकर आपके निमित्त मिश्री का प्रसाद बाँटूँगा । भाग्य ने पल्टा खाया और चोलकर परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया । उसकी नौकरी भी स्थायी हो गई । अब केवल संकल्प ही शेष रहा । शुभस्य शीघ्रम । श्री. चोलकर निर्धन तो था ही और उसका कुटुम्ब भी बड़ा था । अतः वह शिरडी यात्रा के लिये मार्ग-व्यय जुटाने में असमर्थ हुआ । ठाणे जिले में एक कहावत प्रचलित है कि नाठे घाट व सहाद्रि पर्वत श्रेणियाँ कोई भी सरलतापूर्वक पार कर सकता है, परन्तु गरीब को उंबर घाट (गृह-चक्कर) पार करना बड़ा ही कठिन होता हैं । श्री. चोलकर अपना संकल्प शीघ्रातिशीघ्र पूरा करने कि लिये उत्सुक था । उसने मितव्ययी बनकर, अपना खर्च घटाकर पैसा बचाने का निश्चय किया । इस कारण उसने बिना शक्कर की चाय पीना प्रारम्भ किया और इस तरह कुछ द्रव्य एकत्रित कर वह शिरडी पहुँचा । उसने बाबा का दर्शन कर उनके चरणों पर गिरकर नारियल भेंट किया तथा अपने संकल्पानुसार श्रद्घा से मिश्री वितरित की और बाबा से बोला कि आपके दर्शन से मेरे हृदय को अत्यंत प्रसन्नता हुई है । मेरी समस्त इच्छायें तो आपकी कृपादृष्टि से उसी दिन पूर्ण हो चुकी थी । मसजिद में श्री. चोलकर का आतिथ्य करने वाले श्री बापूसाहेब जोग भी वहीं उपस्थित थे । जब वे दोनों वहाँ से जाने लगे तो बाबा जोग से इस प्रकार कहने लगे कि अपने अतिथि को चाय के प्याले अच्छी तरह शक्कर मिलाकर देना । इन अर्थपूर्ण शब्दों को सुनकर श्री. चोलकर का हृदय भर आया और उसे बड़ा आश्चर्य हुआ । उनके नेत्रों से अश्रु-धाराएँ प्रवाहित होने लगी और वे प्रेम से विहृल होकर श्रीचरणों पर गिर पड़े । श्री. जोग को अधिक शक्कर सहित चाय के प्याले अतिथि को दो यह विचित्र आज्ञा सुनकर बड़ा कुतूहल हो रहा था कि यथार्थ में इसका अर्थ क्या है बाबा का उद्देश्य तो श्री. चोलकर के हृदय में केवल भक्ति का बीजारोपण करना ही था । बाबा ने उन्हें संकेत किया था कि वे शक्कर छोड़ने के गुप्त निश्चय से भली भाँति परिचित है ।

बाबा का यह कथा था कि यदि तुम श्रद्घापूर्वक मेरे सामने हाथ फैलाओगे तो मैं सदैव तुम्हारे साथ रहूँगा । यघपि मैं शरीर से तो यहाँ हू, परन्तु मुझे सात समुद्रों के पार भी घटित होने वाली घटनाओं का ज्ञान है । मैं तुम्हारे हृदय में विराजीत, तुम्हारे अन्तरस्थ ही हूँ । जिसका तुम्हारे तथा समस्त प्राणियों के हृददय में वास है, उसकी ही पूजा करो । धन्य और सौभाग्यशाली वही है, जो मेरे सर्वव्यापी स्वरुप से परिचित हैं । बाबा ने श्री. चोलकर को कितनी सुन्दर तथा महत्वपूर्ण शिक्षा प्रदान की ।


दो छिपकलियों का मिलन
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अब हम दो छोटी छिपकलियों की कथा के साथ ही यह अध्याय समाप्त करेंगे । एक बार बाबा मसजिद में बैठे थे कि उसी समय एक छिपकली चिकचिक करने लगी । कौतूहलवश एक भक्त ने बाबा से पूछा कि छिपकली के चिकचिकाने का क्या कोई विशेष अर्थ है । यह शुभ है या अशुभ । बाबा ने कहा कि इस छिपकली की बहन आज औरंगाबाद से यहाँ आने वाली है । इसलिये यह प्रसन्नता से फूली नहीं समा रही है । वह भक्त बाबा के शब्दों का अर्थ न समझ सका । इसलिये वह चुपचाप वहीं बैठा रहा । इसी समय औरंगाबाद से एक आदमी घोडे पर बाबा के दर्शनार्थ आया । वह तो आगे जाना चाहता था, परन्तु घोड़ा अधिक भूखा होने के कारण बढ़ता ही न था । तब उसने चना लाने को एक थैली निकाली और धूल झटकारने कि लिये उसे भूमि पर फटकारा तो उसमें से एक छिपकली निकली और सब के देखते-देखते ही वह दीवार पर चढ़ गई । बाबा ने प्रश्न करने वाले भक्त से ध्यानपूर्वक देखने को कहा । छिपकली तुरन्त ही गर्व से अपनी बहन के पास पहुँच गई थी । दोनों बहनें बहुत देर तक एक दूसरे से मिलीं और परस्पर चुंबन व आलिंगन कर चारों ओर घूमघूम कर प्रेमपूर्वक नाचने लगी । कहाँ शिरडी और कहाँ औरंगाबाद । किस प्रकार एक आदमी घोड़े पर सवार होकर, थैली में छिपकली को लिये हुए वहाँ पहुँचता है और बाबा को उन दो बहिनों की भेंट का पता कैसे चल जाता है-यह सब घटना बहुत आश्चर्यजनक है और बाबा की सर्वव्यापकता की घोतक है ।
शिक्षा
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जो कोई इस अध्याय का ध्यानपूर्वक पठन और मनन करेगा, साईकृपा से उसके समस्त कष्ट दूर हो जायेंगे और वह पूर्ण सुखी बनकर शांति को प्राप्त होगा ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 11 September 2019

साँईं का गुनगान करेगा, हम सब का कल्याण

ॐ सांँई राम



मिल के कर लो
खुल के कर लो
साँईं का गुनगान
साँईं का गुनगान करेगा
हम सब का कल्याण


सुबह शाम साँईं की आरती उतार लो
साँईं की भक्ति से ख़ुद को संवार लो
मानो कहना नहीं तो वरना

रहेंगे भटकते प्राण


सच्चे मन से जो साँईं दरबार में आया
जो भी कामना की है उसने वो पाया
साँईं कृपा से हो जाते हैं
निर्धन भी धनवान
भक्तों की सुनते सदा मन की पुकार साँईं
झोलियों में भरते सदा अपना प्यार साँईं
हर सुख का दाता है जग में साँईं का ध्यान

मिल के कर लो
खुल के कर लो
साँईं का गुनगान
साँईं का गुनगान करेगा
हम सब का कल्याण

Tuesday, 10 September 2019

जब से साँई तुझे देखा, लगता है जैसे जन्नत देखी

ॐ सांँई राम जी


अजब तेरी सूरत देखी
गजब तेरी मूरत देखी
जब से साँई तुझे देखा
लगता है जैसे जन्नत देखी

एक तेरे मुखड़े की सादगी
लाती है दिल मे दिवानगी
कोई और सनम अब कैसे भाये
जिसे साँई के दर पनाह मिल जाये

तेरा था बस तेरा ही रहूँगा
दिल का हाल किस से कहूँगा
तू ही है पिता तू ही है माई
तू ही राम तू ही है कन्हाई
मेरे अंग संग आप सहाई 
मेरे सदगुरू साँई साँई साँई

ना दुखी रहे कोई छाये खुशी की बहार
हर जन को मिल जाये साँई तेरा प्यार
ना भूख ना प्यास का रहे कोई भय
हर तरफ सब जग दिखे साँई मय

कृपा की आदत तुम्हारी
हौसला बढ़ाती है हमारी
बस एक मुस्कान तुम्हारी
जान निकाल देती है हमारी

वाह रे जादूगर देखी तेरी जादूगरी
ना गम हमारा ना खुशी रही हमारी
एक आह भी ना निकली हमारे मुख से
और तूने पल में विपदा हर ली हमारी

ना बंसी और ना ही धनुष उठाया
हर पीड़ा का हल तूने उदी बनाया
राम रहमान की बोली मिलीजुली
तुमने हर मजहब को नेक बताया
खून के रंग और पानी की प्यास का
दे कर वास्ता नया पाठ सिखलाया
अनोखी बानगी ने हमे दिवाना बनाया
सारा जग साँई रंग मे रंगा हुआ पाया

For Donation

For donation of Fund/ Food/ Clothes (New/ Used), for needy people specially leprosy patients' society and for the marriage of orphan girls, as they are totally depended on us.

For Donations, Our bank Details are as follows :

A/c - Title -Shirdi Ke Sai Baba Group

A/c. No - 200003513754 / IFSC - INDB0000036

IndusInd Bank Ltd, N - 10 / 11, Sec - 18, Noida - 201301,

Gautam Budh Nagar, Uttar Pradesh. INDIA.