शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Tuesday, 29 September 2020

श्री साईं लीलाएं - ऊदी के चमत्कार से पुत्र-प्राप्ति

ॐ सांई राम


कल हमने पढ़ा था.. कुत्ते की पूँछ

श्री साईं लीलाएं

ऊदी के चमत्कार से पुत्र-प्राप्ति


शिरडी के पास के गांव में लक्ष्मीबाई नाम की एक स्त्री रहा करती थी| नि:संतान होने के कारण वह रात-दिन दु:खी रहा करती थी| जब उसको साईं बाबा के चमत्कारों के विषय में पता चला तो वह द्वारिकामाई मस्जिद में आकर वह साईं बाबा के चरणों पर गिरने ही वाली थी कि साईं बाबा ने तुरंत उसे कंधों से थाम लिया और बोले- "मां, यह क्या करती हो ?"

लक्ष्मी बुरी तरह से रोने लगी|



साईं बाबा बोले - "माँ, रोने की जरा भी जरूरत नहीं है| अब तुम यहां आ गई हो तो भगवान तुम्हारे दुःख अवश्य ही दूर करेंगे|"

लक्ष्मी ने दोनों हाथों से अपने आँसू पोंछे और बोली - "साईं बाबा ! मेरा दुःख तो आप जानते ही हैं|"

"हां, माँ ! मुझे सब पता है|"

"तो तब मेरा दुःख दूर करो न बाबा !" - वह रुंधे स्वर में बोली|

"अवश्य दूर होगा, ईश्वर पर भरोसा रखो|"

फिर साईं बाबा ने अपनी धूनी में से भभूति उठाकर उसे दी और बोले - "चुटकीभर इसे खा लेना और चुटकीभर अपने पति को खिला देना| तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी|"

लक्ष्मीबाई ने पूर्ण श्रद्धा के साथ बाबा की दी हुई भभूति अपने आँचल के एक छोर में बांध ली और बाबा का गुणगान करती वापस अपने गांव आ गयी| साईं बाबा के कहे अनुसार एक चुटकी भभूति पति को खिलाने के बाद दूसरी चुटकी भभूति उसने स्वयं खा ली| उसे साईं बाबा पर पूरी श्रद्धा और विश्वास था|

सही समय पर वह गर्भवती हो गयी| उसकी खुशी की कोई सीमा न रही| वह सारे गांव में हर समय साईं बाबा का गुणगान करती घूमती-फिरती थी|

उसके गांव का प्रधान दादू साईं बाबा का कट्टर विरोधी था| वह साईं बाबा को भ्रष्ट मानता था| साईं बाबा भ्रष्ट आदमी है| वह हिन्दू है, न मुसलमान| ऐसा आदमी भ्रष्ट माना जाता है| लक्ष्मी द्वारा गांव में बाबा का गुणगान करते फिरना उसे बहुत बुरा लगा|

उसने लक्ष्मी को बुलाकर डांटा - "तू साईं बाबा का नाम लेकर उसका प्रचार करती क्यों फिरती है ?"

"साईं बाबा बहुत पहुंचे हुए महापुरुष हैं|"

"तेरा दिमाग खराब हो गया है|" प्रधान गुस्से से आगबबूला हो गया|

उसने लक्ष्मी को बहुत बुरी तरह से डांटा और धमकाया और आगे से फिर कभी साईं बाबा का नाम न लेने का आदेश सुना दिया| पर वह भला कहां मानने वाली थी, उसने साईं बाबा का गुणगान पहले की तरह करना जारी रखा| इस पर गांव-प्रधान और बुरी तरह से जल-भुन गया| उसने लक्ष्मी को सबक सिखाने की सोची|

लक्ष्मी गर्भवती है| यदि किसी तरह से इसका गर्भ नष्ट कर दिया जाये, तो वह पागल हो जायेगी और साईं बाबा का गुणगान करना बंद कर देगी| अपने मन में ऐसा विचार कर प्रधान ने लक्ष्मीबाई को गर्भपात की अचूक दवा दे दी| उसने यह चाल इस प्रकार चली कि लक्ष्मीबाई को इस बारे में जरा-सा भी संदेह न हुआ|

जब दवा ने अपना असर दिखाना शुरू किया तो लक्ष्मी बुरी तरह से घबरा गयी|

"हे भगवान् ! यह क्या हो गया ? साईं बाबा ने मुझे यह किस अपराध की सजा दी है, अथवा मुझसे ऐसी क्या भूल हो गयी है जिसका दण्ड साईं बाबा मुझे इस प्रकार दे रहे हैं ?"

वह तुरंत शिरडी की ओर भागी|

गिरते-पड़ते हुए वह शिरडी आयी| द्वारिकामाई मस्जिद आकर वह साईं बाबा के सामने बुरी तरह से विलाप करने लगी| साईं बाबा मौन बैठे रहे| लक्ष्मी बिलख-बिलख कर अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगने लगी| साईं बाबा ने उसे एक चुटकी भभूति देकर कहा - "इसे खा ले| जा भाग यहां से, सब ठीक हो जायेगा| चिंता मत कर|"

लक्ष्मी ने तुरंत साईं बाबा की आज्ञा का पालन किया| भभूति खाते ही उसका रक्तस्त्राव बंद हो गया| ठीक इसी समय प्रधान की हालात मरणासन्न हो गयी| वह मुंह से खून फेंकने लगा| उसे अत्यंत घबराहट होने लगी| वह समझ गया कि यह सब साईं बाबा का ही चमत्कार है|"

उसे अपनी गलती का अहसास हो गया|

वह भागकर शिरडी पहुंचा और साईं बाबा के चरणों में गिरकर अपनी गलती के लिए क्षमा याचना करने लगा| बाबा ने उसे क्षमा कर दिया| वह ठीक हो गया|

लक्ष्मीबाई ने सही समय पर एक बच्चे को जन्म दिया| उसकी मनोकामना पूरी हो गयी| प्रधान ने भी खुशियां मनायीं और वह साईं बाबा की जय-जयकार करने लगा|

लक्ष्मीबाई अपना पुत्र लेकर साईं बाबा के पास आयी और उसे साईं बाबा के चरणों में डाल दिया| साईं बाबा ने उसे आशीर्वाद दिया|

अब साईं बाबा की जय-जयकार दूर-दूर तक गूंजने लगी थी| उनका नाम और प्रसिद्धि फैलती जा रही थी| उनके भक्तों की संख्या में भी निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही थी| लोग बड़ी दूर-दूर से उनके दर्शन करने के लिए आने लगे थे|


शिरडी के पास के गांव में लक्ष्मीबाई नाम की एक स्त्री रहा करती थी| नि:संतान होने के कारण वह रात-दिन दु:खी रहा करती थी| जब उसको साईं बाबा के चमत्कारों के विषय में पता चला तो वह द्वारिकामाई मस्जिद में आकर वह साईं बाबा के चरणों पर गिरने ही वाली थी कि साईं बाबा ने तुरंत उसे कंधों से थाम लिया और बोले- "मां, यह क्या करती हो ?"

लक्ष्मी बुरी तरह से रोने लगी|

साईं बाबा बोले - "माँ, रोने की जरा भी जरूरत नहीं है| अब तुम यहां आ गई हो तो भगवान तुम्हारे दुःख अवश्य ही दूर करेंगे|"

लक्ष्मी ने दोनों हाथों से अपने आँसू पोंछे और बोली - "साईं बाबा ! मेरा दुःख तो आप जानते ही हैं|"

"हां, माँ ! मुझे सब पता है|"

"तो तब मेरा दुःख दूर करो न बाबा !" - वह रुंधे स्वर में बोली|

"अवश्य दूर होगा, ईश्वर पर भरोसा रखो|"

फिर साईं बाबा ने अपनी धूनी में से भभूति उठाकर उसे दी और बोले - "चुटकीभर इसे खा लेना और चुटकीभर अपने पति को खिला देना| तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी|"

लक्ष्मीबाई ने पूर्ण श्रद्धा के साथ बाबा की दी हुई भभूति अपने आँचल के एक छोर में बांध ली और बाबा का गुणगान करती वापस अपने गांव आ गयी| साईं बाबा के कहे अनुसार एक चुटकी भभूति पति को खिलाने के बाद दूसरी चुटकी भभूति उसने स्वयं खा ली| उसे साईं बाबा पर पूरी श्रद्धा और विश्वास था|

सही समय पर वह गर्भवती हो गयी| उसकी खुशी की कोई सीमा न रही| वह सारे गांव में हर समय साईं बाबा का गुणगान करती घूमती-फिरती थी|

उसके गांव का प्रधान दादू साईं बाबा का कट्टर विरोधी था| वह साईं बाबा को भ्रष्ट मानता था| साईं बाबा भ्रष्ट आदमी है| वह हिन्दू है, न मुसलमान| ऐसा आदमी भ्रष्ट माना जाता है| लक्ष्मी द्वारा गांव में बाबा का गुणगान करते फिरना उसे बहुत बुरा लगा|

उसने लक्ष्मी को बुलाकर डांटा - "तू साईं बाबा का नाम लेकर उसका प्रचार करती क्यों फिरती है ?"

"साईं बाबा बहुत पहुंचे हुए महापुरुष हैं|"

"तेरा दिमाग खराब हो गया है|" प्रधान गुस्से से आगबबूला हो गया|

उसने लक्ष्मी को बहुत बुरी तरह से डांटा और धमकाया और आगे से फिर कभी साईं बाबा का नाम न लेने का आदेश सुना दिया| पर वह भला कहां मानने वाली थी, उसने साईं बाबा का गुणगान पहले की तरह करना जारी रखा| इस पर गांव-प्रधान और बुरी तरह से जल-भुन गया| उसने लक्ष्मी को सबक सिखाने की सोची|

लक्ष्मी गर्भवती है| यदि किसी तरह से इसका गर्भ नष्ट कर दिया जाये, तो वह पागल हो जायेगी और साईं बाबा का गुणगान करना बंद कर देगी| अपने मन में ऐसा विचार कर प्रधान ने लक्ष्मीबाई को गर्भपात की अचूक दवा दे दी| उसने यह चाल इस प्रकार चली कि लक्ष्मीबाई को इस बारे में जरा-सा भी संदेह न हुआ|

जब दवा ने अपना असर दिखाना शुरू किया तो लक्ष्मी बुरी तरह से घबरा गयी|

"हे भगवान् ! यह क्या हो गया ? साईं बाबा ने मुझे यह किस अपराध की सजा दी है, अथवा मुझसे ऐसी क्या भूल हो गयी है जिसका दण्ड साईं बाबा मुझे इस प्रकार दे रहे हैं ?"

वह तुरंत शिरडी की ओर भागी|

गिरते-पड़ते हुए वह शिरडी आयी| द्वारिकामाई मस्जिद आकर वह साईं बाबा के सामने बुरी तरह से विलाप करने लगी| साईं बाबा मौन बैठे रहे| लक्ष्मी बिलख-बिलख कर अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगने लगी| साईं बाबा ने उसे एक चुटकी भभूति देकर कहा - "इसे खा ले| जा भाग यहां से, सब ठीक हो जायेगा| चिंता मत कर|"

लक्ष्मी ने तुरंत साईं बाबा की आज्ञा का पालन किया| भभूति खाते ही उसका रक्तस्त्राव बंद हो गया| ठीक इसी समय प्रधान की हालात मरणासन्न हो गयी| वह मुंह से खून फेंकने लगा| उसे अत्यंत घबराहट होने लगी| वह समझ गया कि यह सब साईं बाबा का ही चमत्कार है|"

उसे अपनी गलती का अहसास हो गया|

वह भागकर शिरडी पहुंचा और साईं बाबा के चरणों में गिरकर अपनी गलती के लिए क्षमा याचना करने लगा| बाबा ने उसे क्षमा कर दिया| वह ठीक हो गया|

लक्ष्मीबाई ने सही समय पर एक बच्चे को जन्म दिया| उसकी मनोकामना पूरी हो गयी| प्रधान ने भी खुशियां मनायीं और वह साईं बाबा की जय-जयकार करने लगा|

लक्ष्मीबाई अपना पुत्र लेकर साईं बाबा के पास आयी और उसे साईं बाबा के चरणों में डाल दिया| साईं बाबा ने उसे आशीर्वाद दिया|

अब साईं बाबा की जय-जयकार दूर-दूर तक गूंजने लगी थी| उनका नाम और प्रसिद्धि फैलती जा रही थी| उनके भक्तों की संख्या में भी निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही थी| लोग बड़ी दूर-दूर से उनके दर्शन करने के लिए आने लगे थे|

कल चर्चा करेंगे..संकटहरण श्री साईं

==ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ==
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें । 

Monday, 28 September 2020

श्री साईं लीलाएं - कुत्ते की पूँछ

ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. दयालु साईं बाबा

श्री साईं लीलाएं


कुत्ते की पूँछ


पंडितजी चुपचाप बैठे अपने भविष्य के विषय में चिंतन कर रहे थे| उन्हें पता ही नहीं चला कि कब एक आदमी उनके पास आकर खड़ा हो गया है| जब पंडितजी ने कुछ ध्यान न दिया तो, उसने स्वयं आवाज दी|

"राम-राम पंडितजी|"

पंडितजी चौंक गये|

"क्या बात है, किस सोच में पड़े हो ?"

पंडितजी ने देखा तो देखते ही रह गये| उनके सामने लक्ष्मण खड़ा था|

"लक्ष्मण...तुम...|"

"हां पंडितजी|"

"कब आये ?" -पूछा पंडितजी ने|

"बस सीधे आपके पास ही चला आ रहा हूं|" लक्ष्मण पंडितजी के पास बैठ गया|

पंडितजी अभी भी उसे एकटक देखे जा रहे थे| कोई दो साल के बाद लक्ष्मण को देखा था| लक्ष्मण शिरडी का मशहूर बदमाश था| दो साल की सजा भुगतने के बाद अब वह जेल से सीधा आ रहा था| लक्ष्मण का इस दुनिया में कोई न था| वह एकदम अकेला था| आवारागर्दी, चोरी, गुंडागर्दी, छेड़छाड़, मारपीट करना ही उसके काम थे|

लक्ष्मण बोला - "क्या बात है, बड़े चुपचाप और उदास से बैठे हैं आज आप ?"

"हां|" - पंडितजी ने एक गहरी सांस छोड़ते हुए कहा|

"क्या बात हो गयी ?"

"कुछ न पूछ लक्ष्मण ! इस गांव में एक चमत्कारी बाबा आया है| उसने मेरा सारा धंधा-पानी ही चौपट कर दिया है| अब तो भूखों मरने की नौबत आ गयी है|"

लक्ष्मण आश्चर्य से बोला - "कौन है वह ?"

"लोग उसको साईं बाबा कहते हैं|"

"अच्छा कहां का है वह ?"

"क्या पता ?" पंडितजी ने कहा - "तुम अपना हालचाल कहो|"

"बस ! सीधा जेल से छूटते ही यहां चला आ रहा हूं|" लक्ष्मण मुस्कराया - "यदि तुम कहो तो बाबा को अपना चमत्कार दिखा दूं|" और वह हँसने लगा|

वैसे इससे पहले कई बार लक्ष्मण की सहायता से पंडित अपने विरोधियों को धूल चटवा चुका था| वह सोचने लगा, सांप की उस चमत्कारी घटना के कारण, जो स्वयं उसके साथ घटित हुई थी, वह भुला न पा रहा था|

"बोलो पंडितजी ! क्या विचार है ?"

"कोशिश कर लो !"

"कोशिश क्यों ? मैं करके दिखा दूंगा| एक ही दिन में छोड़कर भाग जाएगा|" लक्ष्मण हँसने लगा|

"जैसी तुम्हारी इच्छा|"

"क्या मैं तुम्हारे लिए इतना छोटा-सा काम नहीं कर सकता हूं ?" लक्ष्मण ने कहा - "आपके तो बहुत अहसमान हैं मुझ पर|"

"पंडित चुप रह गया|"

"कहां रहता है वह चमत्कारी बाबा ?"

"द्वारिकामाई मस्जिद में|"

"क्या पता, कभी वह मुसलमान बन जाता है और कभी हिन्दू ! क्या है वह, कुछ पता नहीं|"

"ठीक है, मैं देख लूंगा उसे|"

"जरा सावधानी से|" पंडित बोला - "सुना है, बड़ा चमत्कारी है वह|"

"अच्छा-अच्छा|" लक्ष्मण बोला - "ख्याल रखूंगा|"

"ठीक है सुबह-शाम मेरे यहां आकर खाना खा गया जाया करो| रात मैं बरामदा सोने के लिए है ही|"

लक्ष्मण चला गया|

पंडित चिंता में पड़ गया| कहीं फिर उसने आत्मघाती कदम तो नहीं उठा लिया| यदि चमत्कार हो गया तो इस बार साईं बाबा उसे माफ नहीं करेगा| वह परेशान था कि आखिर यह साईं है क्या ?

लक्ष्मण पंडित के पास से उठकर सीधे द्वारिकामाई मस्जिद गया| टूटी-फूटी द्वारिका मस्जिद का कायाकल्प देखकर वह हैरान रह गया| मस्जिद में चहल-पहल थी| साईं बाबा की धूनी जली हुई थी| वह उनकी धूनी के पास जाकर बैठ गया|

साईं बाबा के पास उनके शिष्य बैठे थे| लक्ष्मण ने देखा, साईं बाबा कोई विशेष नहीं है| दुबला-पतला, इकहरा बदन है| एक ही हाथ में जमीन सूंघ जाएगा| हां, चेहरे पर एक अजीब-सा आकर्षक-तेज अवश्य था|"

साईं बाबा ने लक्ष्मण की ओर नजर उठाकर भी न देखा| अजनबी होने के बावजूद उससे पूछताछ न की|

शिष्यगण चले गए| लक्ष्मण अकेला बैठा रह गया|

उसकी उपस्थिति की सर्वथा उपेक्षा कर साईं बाबा आँखें मूंदकर लेट गए| मौका अच्छा जानकर, लक्ष्मण बाबा को धमकी देने के बारे में विचार कर रहा था|

इससे पहले कि वह कुछ बोलता, साईं बाबा ने स्वयं कहा -

"मैं जानता हूं कि तू मुझे मारने आया है|"

यह बात सुनते ही लक्ष्मण बुरी तरह से चौंक गया| वह बुरी तरह घबरा गया|

"मार, मार दे मुझे और अपनी इच्छा पूरी कर ले|"

साईं बाबा का चेहरा बुरी तरह से तमतमा गया|

लक्ष्मण को काटो तो खून न था| वह काठ के समान जड़ होकर रह गया| साईं बाबा का रौद्र रूप देखकर वह घबरा गया| उसका शरीर पसीने से तर-ब-तर हो गया|

"कोई हथियार लाया है या खाली हाथ आया है?" - साईं बाबा बोले|

वह घबरा गया|

"बोल, जवाब दे|"

लक्ष्मण पसीने-पसीने हो गया| वह घबराकर साईं बाबा के चरणों पर गिर गया और गिड़गिड़ाने लगा - "क्षमा कर दो बाबा| क्षमा कर दो|"

"मेरे पैर छोड़|"

"जब तक आप मुझे क्षमा नहीं करेंगे, तब तक मैं आपके पैर नहीं छोड़ूंगा| आप तो अंतर्यामी हैं| मैं आपकी महिमा को न जान सका|"

"जा माफ किया| नेक आदमी बन|"

लक्ष्मण चुपचाप सिर झुकाकर चला गया|

तब साईं बाबा खिलखिलाकर हँस पड़े| एकदम बच्चों के समान थी उनकी हँसी| यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि कुछ समय पूर्व उनका रूप बेहद रौद्र हो गया था|

साईं बाबा के पास उनका एक शिष्य आया, तो वह बड़बड़ा रहे थे - "कुत्ते की पूँछ क्या भला कभी सीधी हो सकती है ?"

शिष्य इस बात को समझ न पाया|

लक्ष्मण ने पंडित के पास जाकर हाथ जोड़कर सारा किस्सा बताया, तो पंडित का मन ग्लानी, पश्चात्ताप से भर गया| वह साईं बाबा को मान गया| उसने साईं बाबा का विरोध करना बंद कर दिया और उनका परमभक्त बन गया|


कल चर्चा करेंगे... ऊदी के चमत्कार से पुत्र-प्राप्ति

==ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ==
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें । 

Sunday, 27 September 2020

श्री साईं लीलाएं - दयालु साईं बाबा

 ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. बाबा के विरुद्ध पंडितजी की साजिश

श्री साईं लीलाएं

दयालु साईं बाबा


दोपहर का समय था!

साईं बाबा खाना खाने के बाद अपने भक्तों से वार्तालाप कर रहे थे कि अचानक सारंगी के सुरों के साथ तबले पर पड़ी थाप से मस्जिद की गुम्बदें और मीनारें गूंज उठीं|

सब लोग चौंक उठे| दूसरे ही क्षण मस्जिद के दालान पर सारंगी के सुरों और तबलों की थापों के साथ घुंघरों की रुनझुन भी गूंज उठी| सभी शिष्य एक रूपसी नव नवयौवना की ओर देखने लगे| जिसके सुंदर बदन पर रेशमी घाघरा तथा चोली थी| जब वह नाचते हुए तेजी के साथ गोल-गोल चक्कर काटती थी, तो उसका रेशमी घाघरा गोरी-गोरी टांगों से ऊपर तक उठ जाता था|


चोली बहुत तंग और छोटी इतनी थी कि देखने वाले को शर्म आती थी| कजरारी आँखों से वासना छलक रही थी| वह अपने में मग्न होकर, सब-कुछ खोकर नाच रही थी|

सभी शिष्य बड़ी हैरानी से उसे देखने लगे| उन सबको बहुत आश्चर्य हो रह था कि वह कहां से आ गयी ? जरूर किसी आस-पास के गांव की होगी| उसका नृत्य करना भी बड़ा आश्चर्यजनक था|


वह नाचती रही| घुंघरूओं की ताल, सारंगी के सुर और तबलों की थाप बराबर गूंजती रही| अचानक साईं बाबा धीरे से उठे और नर्तकी की ओर बढ़ने लगे|

नर्तकी नाच रही थी| साईं बाबा एक पल उसे देखते रहे और फिर उन्होंने एकदम झुझ्कर नर्तकी के थिरकते पैर पकड़ लिये|

"बस करो मां, बस भी करो मां, तुम्हारे ये कोमल पैर इतनी देर तक नाचते-नाचते थक गए होंगे|" -साईं बाबा ने कहा और नर्तकी के पैर दबाने लगे|

थिरकते पैर एकदम रुक गये| घुंघरू थम गए|

तभी एक दर्दभरी चींख गूंज गयी - "बचाओ...बचाओ...सांप...सांप...|"

सबने चौंककर उस तरफ देखा, जिधर से आवाज आ रही थी|

मस्जिद के खम्बे के पीछे पंडित और गणेश खड़े थे| दोनों के सामने काला नाग फन फैलाये खड़ा था| उसने पंडितजी की कलाई में डस लिया था| वह छटपटाते हुए चींख रहे थे|

"अरे नाग कहां से आया ?" कई लोग चौककर बोले|

साईं बाबा मुस्कराते हुए उस नाग की ओर बढ़ने लगे|

देखते-देखते वह नाग मोटी रस्सी के रूप में बदल गया| लोगों के आश्चर्य की सीमा न रही|

बुरी तरह से थर-थर कांपते हुए गणेश ने एक नजर उस उस्सी पर डाली और साईं बाबा के पैर पकड़ लिये|

मुझे क्षमा कर दो बाबा, मैं पापी हूं| सारा कुसूर मेरा ही है| कहते-कहते वह रोने लगा|

नर्तकी का सारा बदन भय से कांप रहा था|

"साईं बाबा मुझे माफ...कर दो ...मैं तुम्हें... अपना शत्रु... समझता रहा था| मेरे सारे शरीर में जहर फैल चुका है| मुझे क्षमा कर दो...साईं बाबा ...!"

साईं बाबा ने अपना हाथ आकाश की ओर उठाकर कहा - "फौरन उतर जा...|"

"तुम्हें कुछ नहीं होगा पंडितजी...तुम्हें कुछ नहीं होगा...| यह तुम्हारी आत्मा का सारा पाप खत्म कर देगा|"

पंडितजी लगभग बेहोश हो गये थे| उनके मुंह से झाग निकल रहा था| सारा शरीर लगभग नीला पड़ चुका था| बड़बड़ाना शुरू हो गया था| सबको पंडितजी की हालात देखकर यह विश्वास हो चला था कि अब पंडितजी का बचना संभव नहीं है| साईं बाबा ने पंडितजी का सिर अपनी गोद में रख रखा था और बार-बार बड़बड़ा रहे थे - "चला जा, चला जा|"

सब लोग आश्चर्य से यह दृश्य देख रहे थे|

कुछ ही देर बाद पंडितजी के शरीर का रंग पहले की तरह हो गया| उनकी बंद आँखें खुलने लगीं| शरीर में मानो चेतना का संचार शुरू हो गया| पंडितजी का यह रूप परिवर्तन देख सबको राहत मिली| अब उनको यह विश्वास हो गया कि पंडितजी की जान बच गयी|

साईं बाबा का चमत्कार सभी आँखें फाड़े आश्चर्य से देख रहे थे|

थोड़ा समय और बीता| पंडितजी उठकर बैठ गए, जैसे उन्हें कुछ हुआ ही न हो| तभी द्वारकामाई मस्जिद की गुम्बदें और मीनारें साईं बाबा की जय-जयकार भी गूंज उठीं|

कल चर्चा करेंगे... कुत्ते की पूँछ

ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं

बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें । 

Saturday, 26 September 2020

श्री साईं लीलाएं - बाबा के विरुद्ध पंडितजी की साजिश

 ॐ सांई राम


कल हमने पढ़ा था.. पानी से दीप जले

श्री साईं लीलाएं

बाबा के विरुद्ध पंडितजी की साजिश

पंडितजी साईं बाबा को गांव से भगाने के विषय में सोच-विचार कर रहे थे कि तभी एक पुलिस कोंस्टेबिल आता दिखाई दिया| पंडितजी ने उसे दूर से ही पहचान लिया था| उसका नाम गणेश था| वह पंडितजी के पास आता-जाता रहता था|


थाने में जितने भी पुलिस कर्मचारी थे, गणेश उन सबमें ज्यादा चालबाज था| लोगों को किसी भी फर्जी केस में फंसा देना तो उसके बायें हाथ का खेल था| रिश्वत लेने में उसका कोई सानी नहीं था| जो भी नया थानेदार आता वह अपनी लच्छेदार बातों, हथकंडों से उसे अपनी और मिला लेता था| फिर सीधे-सादे गांववासियों को सताना शुरू कर देता था| पंडितजी भी इस काम में उसकी भरपूर सहायता करते थे|
उस आया देखकर पंडितजी के मन को थोड़ी-सी शांति मिली|

"आओ, आओ गणेश !" पंडितजी बोले, फिर हाथ पकड़कर अपने पास चौकी पर बैठा लिया|

"कैसे हालचाल हैं पंडितजी ?" - गणेश ने पूछा|

"बहुत बुरा हाल है|" पंडितजी दु:खभरे स्वर में बोले - "कुछ न पूछो| जब से साईं बाबा गांव में आया है, मेरा तो सारा धंधा ही चौपट होकर रह गया है| उनकी भभूती ने मेरा औषधालयबंद कर दिया| लोगों ने मंदिर में आना भी छोड़ दिया है| दुकानदार सुबह-शाम मंदिर आ जाते थे, उनसे थोड़ी-बहुत आमदनी हो जाती थी, पर दीपावली से वह भी बंद हो गयी|"

"वो कैसे ?"

पंडितजी दीपावली की सारी घटना सुनाने के बाद कहा - "गणेश भाई ! यदि यहीं तक होता तो चिंता की कोई बात न थी| मेरे पास खेत हैं| उन खेतों से इतनी आमदनी हो जाती थी कि बड़े मजे से दिन गुजर जाते| लेकिन खेतों में काम करने वाले मजदूरों ने खेतों में काम करने से मना कर दिया है| फसल का समय आ रहा है, यदि खेतों में समय पर फसल न बोयी तो साल भर खाऊंगा क्या ? मैं तो इस साईं से बहुत ही दु:खी हूं|

"जब से साईं इस गांव में आया है आमदनी तो हम लोगों की भी कम हो गयी है| न तो गांव में लड़ाई-झगड़ा होता है और न चोरी-डकैती| साईं के आने से पहले गांव से खूब आमदनी होती थी| अब तो फूटी कौड़ी भी हाथ नहीं लग रहा है|" -गणेश ने भी अपना दु:खड़ा सुनाया|

"तो कोई ऐसा उपाय सोचो जिससे यह ढोंगी गांव छोड़कर भाग जाए|" -पंडितजी ने कहा|

गणेश सोच में पड़ गया|

पंडितजी नाश्ता लेने अंदर चले गए|

नाश्ता करने के बाद एक लम्बी डकार लेते हुए गणेश ने रहस्यपूर्ण स्वर में कहा - "पंडितजी, पुलिस के जितने भी बड़े-बड़े अफसर हैं, वह सब इस साईं के चेले बन गए हैं| यदि उनसे इसके विरुद्ध कोई शिकायत की जाएगी तो वे सुनेंगे ही नहीं| दो-चार बार कभी साईं के विरुद्ध कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन अभी अपनामुंह भी नहीं खोल पाया था कि अफसरों ने फटकारते हुए कहा - "खबरदार, जो साईं के विरुद्ध एक शब्द भी कहा| वह इंसान नहीं भगवान का अवतार हैं|" उनकी डांट खाकर चुप रह जाना पड़ा| इसलिए उनसे तो उम्मीद करना ही बेकार है| यदि साईं को गांव से कोई निकाल सकता है तो वह सिर्फ गांववाले|"

"भला गांव वाले उसे क्यों गांव से निकालने लगे ?" -पंडितजी बोले|

"देखो, पंडितजी ! गांव वाले बहुत सीधे-सादे होते हैं| उन्हें झूठ और धोखे से बहुत घृणा होती है| उनका चाल-चलन एकदम साफ-सुथरा होता है| वह उस आदमी को कभी भी बर्दाश्त नहीं कर सकते, जिसका चाल-चलन ठीक नहीं होता और उस आदमी को तो किसी भी कीमत पर नहीं, जिसे वे साधु-महात्मा, सिद्ध या अपना गुरु मानते हैं| साईं कुंवारा है और पंडितजी आप तो जानते ही हैं कि इस दुनिया में ऐसा कोई भी पुरुष नहीं है, जो औरत से बच सके| यदि किसी तरह किसी औरत के साथ साईं बाबा का सम्बंध बनाया जा सके, कोई औरत उसे अपने जाल में फंसा ले तो फिर साईं का पत्ता साफ|"

"साईं का तो किसी औरत से सम्बंध नहीं है| वह तो प्रत्येक स्त्री को माँ कहता है| उसके चाल-चलन के बारे में तो आज तक कोई ऐसी-वैसी बात सुनी ही नहीं गई है|" -पंडितजी ने कहा|

"नहीं है तो क्या हुआ, इस दुनिया में कौन-सा ऐसा काम है, जिसे न किया जा सके|" गणेश ने एक आँख दबाते हुए मुस्कराकर कहा - "बस पैसों की जरूरत है| यदि मेरे पास थोड़े-से रुपये होते तो मैं इस साईं को कल ही गांव से भगा दूं|"

"तुम रुपयों की चिंता बिल्कुल मत करो| ये बताओ कि साईं को भगाओगे कैसे ?" -पंडितजी ने बेचैनी से पहलू बदलते हुए पूछा|

गणेश ने पंडितजी की ओर मुस्कराकर देखते हुए कहा- "जरा अपना कान इधर लाइए|"

पंडितजी अपना कान गणेश के मुंह के पास ले गये| गणेश धीरे-धीरे फुसफुसाकर उन्हें अपनी योजना समझाने लगा| पंडितजी के चेहरे से ऐसा प्रकट हो रहा था|कि जैसे वह उसकी योजना से पूरी तरह सहमत हैं|

वह उठकर अंदर चले गये और जब वापस लौटे, तो उनके हाथ में कपड़े की एक थैली थी, जो रुपयों से भरी हुई थी|

"लो गणेश !" -पंडितजी ने रुपयों की थैली गणेश की ओर बढ़ाते हुए कहा- "पूरे पांच सौ हैं|"

गणेश ने थैली झपटकर अपने झोले में रख ली और उठकर बोला- "अच्छा पंडितजी, अब आज्ञा दीजिए| चार-पांच दिन तो लग ही जायेंगें, तब आपसे मुलाकत होगी|"

"ठीक है|" पंडितजी ने कहा- "तुम रुपयों की चिंता बिल्कुल मत करना| इस साईं को गांव से निकलवाने के लिए तो मैं अपना सब कुछ दांव पर लगा सकता हूं|"

गणेश मुस्कराया और फिर चल दिया|



कल चर्चा करेंगे... दयालु साईं बाबा
ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===

बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Friday, 25 September 2020

श्री साईं लीलाएं - पानी से दीप जले

 ॐ सांई राम




परसों हमने पढ़ा था.. साईं बाबा का आशीर्वाद

श्री साईं लीलाएं
  
पानी से दीप जले

साईं बाबा जब से शिरडी में आये थेवे रोजाना शाम होते ही एक छोटा-सा बर्तन लेकर किसी भी तेल बेचने वाले दुकानदार की दुकान पर चले जाते और रात को मस्जिद में चिराग जलाने के लिए थोडा-सा तेल मांग लाया करते थे|


दीपावली से एक दिन पहले तेल बेचने वाले दुकानदार शाम को आरती के समय मंदिर पहुंचेसाईं बाबा के मांगने पर वे उन्हें तेल अवश्य दे दिया करते थेपरंतु साईं बाबा के बारे में उनके विचार कुछ अच्छे नहीं थे|उन्हें साईं बाबा के पास मस्जिद में जाकर बैठना अच्छा नहीं लगता थावहां का वातावरण उन्हें अच्छा नहीं लगता थावह उनकी भावनाओं से मेल नहीं खाता थाशाम को दुकान बंद करने के बाद वह मंदिर में पंडित के साथ गप्पे मारनादूसरों की बुराई करना अच्छा लगता थासाईं बाबा की निंदा करने पर पंडितजी को बड़ा आत्मसंतोष प्राप्त होता था|
"देखा भाईकल दीपावली है और शास्त्रों में लिखा है कि दीपावली के दिन जिस घर में अंधेरा रहता हैवहां लक्ष्मी नहीं आती हैजो भी लक्ष्मी का थोड़ा-बहुत अंश उस घर में होता हैवह भी चला जाता हैसुनोकल जब साईं बाबा तेल मांगने आएं तो उन्हें तेल ही न दिया जाएवैसे तो उनके पास सिद्धि-विद्धि कुछ है नहींऔर यदि होगी भी तो कल दीपावली के दिन मस्जिद में अंधेरा रहने के कारण लक्ष्मीउसका साथ छोड़कर चली जाएगी|"

"
यह तो आपने मेरे मन की बात कह दी पंडितजी ! हम लोग भी कुछ ऐसा ही सोच रहे थेहम कल साईं बाबा को तेल नहीं देंगे|" एक दुकानदार ने कहा|

"
मैं तो सोच रहा हूं कि तेल बेचा ही न जाएपूरा गांव उसका शिष्य बन गया है और उसकी जय-जयकार करते नहीं थकतेगांव में शायद ही दो-चार के घर इतना तेल हो कि कल दीपावली के दीए जला सकेंबस हमारे चार-छ: घरों में ही दीए जलेंगे|" - दूसरे दुकानदार ने कहा|

"
हांयही ठीक रहेगा|" पंडितजी तुरंत बोले - "सचमुच तुमने बिल्कुल ठीक कहा हैमैंने तो इस बारे में सोचा भी नहीं था|

"
फिर यह तय हो गया कि कल कोई भी दुकानदार तेल न बेचेगा चाहे कोई कितनी ही कीमत क्यों न दे|"अगले दिन शाम को साईं बाबा तेल बेचने वाले की दुकान पर पहुंचेउन्होंने कहा - "सेठजीआज दीपावली हैथोड़ा-सा तेल ज्यादा दे देना|"

"
बाबाआज तो तेल की एक बूंद भी नहीं हैकहां से दूं सारा तेल कल ही बिक गयासोचा था कि सुबह को जाकर शहर से ले आऊंगात्यौहार का दिन होने के कारण दुकान से उठने की फुरसत ही नहीं मीलीआज तो अपने घर में भी जलाने के लिए तेल नहीं है|" दुकानदार ने बड़े दु:खी स्वर में कहा|साईं बाबा आगे बढ़ गए|तेल बेचने वाले सभी दुकानदार ने यही जवाब दिया|साईं बाबा खाली हाथ लौट आये|तभी एक कुम्हार जो उनका शिष्य थाउन्हें एक टोकरी दीये दे गया|साईं बाबा के मस्जिद खाली हाथ लौटने पर उनके शिष्यों को बड़ी निराशा हुईउन्होंने बड़ी खुशी के साथ दीपावली के कई दिन पहले से ही मस्जिद की मरम्मत-पुताई आदि करना शुरू कर दी थीउन्हें आशा थी कि अबकी बार मस्जिद में बड़ी धूमधाम के साथ दीपावली मनायेंगेरात भर भजन-कीर्तन होगाकई शिष्य अपने घर चले गएघर से पैसे और तेल खरीदने के लिए चल पड़ेवह जिस भी दुकानदार के पास तेल के लिए पहुंचतेवह यही उत्तर देता कि आज तो हमारे घर में भी जलाने के लिए तेल की एक बूंद भी नहीं है|सभी शिष्य-भक्तों को निराशा के साथ बहुत दुःख भी हुआवे सब खाली हाथ मस्जिद लौट आए|

"
बाबा ! गांव का प्रत्येक दुकानदार यही कहता है कि आज तो उसके पास अपने घर में जलाने के लिए भी तेल की एक बूंद भी नहीं है|"

"
तो इसमें इतना ज्यादा दु:खी होने कि क्या बात है दुकानदार सत्य ही तो कह रहे हैंसच में ही उनकी दुकान और घर में आज दीपावली की रात को एक दीया तक जलाने के लिए तेल की एक बूंद भी नहीं हैदीपावली मनाना तो उनके लिए बहुत दूर की बात है|" साईं बाबा ने मुस्कराते हुए कहा और फिर मस्जिद के अंदर बने कुएं पर जाकर उन्होंने कुएं में से एक घड़ा पानी भरकर खींचा|भक्त चुपचाप खड़े उनको यह सब करते देखते रहेसाईं बाबा ने अपने डिब्बेजिसमें वह तेल मांगकर लाया करते थेउसमें से बचे हुए तेल की बूंदे उस घड़े के पानी में डालीं और घड़े के उस पानी को दीयों में भर दियाफिर रूई की बत्तियां बनाकर उन दीयों में डाल दीं और फिर बत्तियां जला दींसारे दिये जगमग कर जल उठेयह देखकर शिष्यों और भक्तों की हैरानी का ठिकाना न रहा|

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इन दीयों को मस्जिद की मुंडेरोंगुम्बदों और मीनारों पर रख दोअब ये दिये कभी नहीं बुझेंगेमैं नहीं रहूंगा तब भी ये इसी तरह जगमगाते रहेंगे|"साईं बाबा ने वहां उपस्थित अपने शिष्यों और भक्तजनों से कहा और फिर एक पल रुककर बोले - "आज दीपावली का त्यौहार हैलेकिन गांव में किसी के घर में भी तेल नहीं हैजाओप्रत्येक घर में इस पानी को बांट आओलोगों में कहना कि दिये में बत्ती डालकर जला देंदीये सुबह सूरज निकलने तक जगमगाते रहेंगे|"

"
बोलो साईं बाबा की जय!" सभी शिष्यों और भक्तों ने साईं बाबा का जयकारा लगाया और घड़ा उठाकर गांव में चले गएसभी प्रसन्न दिखाई दे रहे थे|दीपावली की रात का अंधकार धीरे-धीरे धरती पर उतरने लगा थातब तेल बेचने वाले दुकानदारों और पंडितजी के घर को छोड़कर प्रत्येक घर में साईं बाबा के घड़े का पानी पहुंच गया था|साईं बाबा के शिरडी में आने के बाद में शिरडी और आस-पास के मुसलमान हिन्दुओं के साथ दीपावली का त्यौहार बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाने लगे थे और हिन्दुओं ने भी ईद और शब्बेरात मनानी शुरू कर दी थीपूरा गांव दीयों की रोशनी से जगमगा उठाउन दीयों की रोशनी अन्य दिन जलाए जाने वाले दीयों से बहुत तेज थीपूरे गांव भर में यदि कहीं अंधेरा छाया हुआ था तो वह पंडितजी और तेल बेचने वाले दुकानदारों के घर में|दुकानदार मारे आश्चर्य के परेशान थे कि कल शाम तो जो बर्तन तेल से लबालब भरे हुए थेइस समय बिल्कुल खाली पड़े थेजैसे उनमें कभी तेल भरा ही न गया होयही दशा पंडितजी की भी थीशाम को जब उनकी पत्नी दीये जलाने बैठी तो उसने देखा तेल की हांडी एकदम खाली पड़ी हैउसने बाहर आकर पंडितजी से तेल लाने के लिए कहा|

"
तुम चिंता क्यों करती हो मैं अभी लेकर आता हूं|पंडितजी हांडी लेकर जब तेल बेचने वाले दुकानदारों के पास पहुंचेवे सब भी अपने माथे पर हाथ रखे इसी चिंता में बैठे थे कि बिना तेल के वह दीपावली कैसे मनायेंगे ?जब पंडितजी ने दुकान पर जाकर तेल मांगातो वे बोले - "पंडितजीन जाने क्या हुआकल शाम को ही हम लोगों ने तेल ख़रीदा थासुबह से एक बूंद तेल नहीं बेचालेकिन अब देखा तो तेल की एक बूंद भी नहीं हैबर्तन इस तरह खाली पड़े हैंजैसे इनमें कभी तेल था ही नहीं|" सभी दुकानदार ने यही कहानी दोहरायी|आश्चर्य की बात तो यह थी कि तेल से भरे बर्तन बिल्कुल ही खाली हो गए थेन घर में तेल की एक बूंद थी और न ही दुकान मेंपूरा गांव रोशनी से जगमगा रहा थाकेवल तेल बेचने वाले दुकानदारों और पंडितजी के घर में अंधकार छाया हुआ था|

"
यह सब साईं बाबा की ही करामात हैहम लोगों ने उन्हें तेल देने से मना किया था और उसने कहा था कि आज तो हमारे घर और दुकान में एक बूंद भी तेल नहीं है|" -एक दुकानदार ने कहा - "चलो बाबा के पास चलकर उनसे माफी मांगें|"फिर तेल बेचने वाले सभी दुकानदार साईं बाबा के पास पहुंचेउनसे माफी मांगने लगे - "बाबाहम आपकी महिमा को नहीं समझ पाएहमें क्षमा करेंहम लोगों से बहुत बड़ा अपराध हुआ हैहमने आपसे झूठ बोला था|" -दुकानदारों ने साईं बाबा के चरणों में गिरते हुए कहा|

"
इंसान गलतियों का पुतला हैअपराधी तो वह हैजो अपने अपराध को छिपाता हैजो अपने अपराध को स्वीकार कर लेता हैवह अपराधी नहीं होतातुमने अपराध नहीं किया|" -साईं बाबा ने दुकानदारों को उठाकर सांत्वना देते हुए कहा और फिर उनकी ओर देखते हुए बोले - "तात्याअभी उस घड़े में थोड़ा-सा पानी हैउसे इन लोगों के घरों में बांट आओ - और सुनो पंडितजी के घर भी दे आनाउन बेचारों के घर में भी तेल की एक बूंद भी नहीं है|"तात्या सभी दुकानदारों के घरों में घड़े का पानी बांट आयापरंतु पंडितजी ने लेने से इंकार कर दियासारा गांव दीयों की रोशनी से जगमगा रहा थाइसके बावजूद अभी भी एक घर में अंधेरा छाया हुआ था और वह घर था पंडितजी कादीपावली के दिन उनके घर में अंधेरा ही रहाएक दीपक जलाने के लिए भी तेल नहीं मिलासाईं बाबा के गांव में कदम रखते ही लक्ष्मी तो उनसे पहले ही रूठ गयी थी और दीपावली के दिन घर में अंधेरा पाकर तो बिलकुल ही रूठ गयीकुछ दुकानदारों जो मंदिर में सुबह-शाम जाया करते थेदीपावली की रात से उन्होंने मंदिर में आना छोड़ दियासाईं बाबा की भभूत के कारण उनका औषधालय तो पहले ही बंद हो चुका थामजदूरों ने खेतों में काम करने से मना कर दियातो पंडितजी का क्रोध अपनी चरम सीमा को लांघ गया|

"
इस ढोंगी साईं बाबा को गांव से भगाए बिना अब काम नहीं चलेगा|" पंडितजी न मन-ही-मन फैसला किया| 
कल चर्चा करेंगे..बाबा के विरुद्ध पंडितजी की साजिश
ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

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