शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Monday, 20 May 2019

साप्ताहिक ध्यान लाभ

ॐ सांँई राम


आया जब जब वार प्रिय सोम
हर हर महादेव बोले मेरा रोम रोम
दिन आया जब फिर मंगलकारी
बजरंगी जी ने हर विपदा टारी
करते हैं हर काम वह शुध्द
जब आये गणपति का दिन बुध
सबसे उत्तम दिन हैं गुरुवार
सजता हमारे साँई का दरबार
कम ना आंके शुक्र की लीला
कान्हा की बंसी छेड़े तान सुरीला
अति लाभप्रद दिन होता हैं शनि
शनिदेव भक्त पर ना आये हानि
सूर्य देव करते जग उजियार
नमन करो जब आये रविवार

Sunday, 19 May 2019

साईं तुम्हे मेरा शाष्टांग प्रणाम||

ॐ सांई राम 


साईं तुम्हे मेरा शाष्टांग प्रणाम ||

करते हो तुम सबका कल्याण,
द्वार पे तेरे जो भी आए खाली हाथ नही जाए,
बनाते हो तुम सबके बिगडे काम,
साईं तुम्हे मेरा शाष्टांग प्रणाम ||


अपने मन मन्दिर में जिसने तुम्हे बैठाया,
उन सभी को तुमने गले लगाया,
कर दिया उनका कल्याण साईं,
साईं तुम्हे मेरा शाष्टांग प्रणाम ||


तुम हो दीन दुखियों के सहाई,
सबकी पीड़ा तुमने अपनाई,
सबकी बिगड़ी तुने ही बनाई,
साईं तुम्हे मेरा शाष्टांग प्रणाम ||

पनाह दे दो हमे भी अपनी शरण में,
जीवन भर रहेंगे तुम्हारी चरण में,
देखकर तुम्हे हम जी लेंगे,
साईं तुम्हे मेरा शाष्टांग प्रणाम ||


कुविचारों को हमारे आप,
मिटा दो अपने आप,
बुरे पथ से हम बचे,
सच्चाई के पथ पर हम चले,
ऐसा कर दो हमारा कल्याण,
साईं तुम्हे मेरा शाष्टांग प्रणाम ||



"तीनों लोको में गुरु के समान दाता कोई ओर अन्य नहीं है,
इसलिए अनन्य भाव से समर्पण कर उनकी परम शरण में जाना चाहिए" ||

Saturday, 18 May 2019

साईं का रूप बना के, आया है डमरू वाला ||

ॐ सांई राम





दु:ख को बोझ समझने वाले कौन तुझे समझाए,
साँई तेरी ख़ातिर ख़ुद पर,
कितना बोझ उठाए कितना बोझ उठाए ||

वो ही तेरे प्यार का मालिक,
वो ही तेरे संसार का मालिक,
हैरत से तू क्या तकता है,
दीया बुझ कर जल सकता है,
वो चाहे तो रात को दिन,
और दिन को रात बनाए,
साँई तेरी ख़ातिर ख़ुद पर,
कितना बोझ उठाए कितना बोझ उठाए ||

तन में तेरा कुछ भी नहीं है,
शाम सवेरा कुछ भी नहीं है,
दुनिया की हर चीज़ उधारी,
सब जाएंगे बारी-बारी,
चार दिन के चोले पर काहे इतना इतराए,
साँई तेरी ख़ातिर ख़ुद पर,
कितना बोझ उठाए कितना बोझ उठाए ||

देख खुला है इक दरवाज़ा,
अंदर आकर ले अंदाज़ा,
पोथी-पोथी खटकने वाले,
पड़े हैं तेरी अक्ल पे ताले,
कब लगते हैं हाथ किसी के चलते फिरते साए,
साँई तेरी ख़ातिर ख़ुद पर
कितना बोझ उठाए कितना बोझ उठाए ||


!! हर हर महादेव !!
साईं का रूप बना के,
आया है डमरू वाला ||
गंगा में विसर्जित कर दी,
शिव ने सर्पो की माला ||
साईं का रूप बना के,
आया है डमरू वाला ||
माँ अन्नपूर्णा का सदा आपके घर पर वास रहे ||

Friday, 17 May 2019

जबसे बढ़ा सांई से रिश्ता दुनियां छूटी जायें

ॐ सांई राम


जबसे बढ़ा सांई से रिश्ता
दुनियां छूटी जाय
हम आऐ सांई के द्वारे
धरती कहीं भी जाय

चहूं ओर तूफ़ान के धारे,
मैली हवा वीरान किनारे
जीवन नैया सांई सहारे
फिर भी चलती जाय
जबसे बढ़ा सांई से रिश्ता
दुनिया छूटी जाय

नाम सिमर ले जब तक दम है,
बोझ ज़ियादा वक्त भी कम है
याद रहे दो दिन की उमरिया
पल पल घटती जाय
जबसे बढ़ा………………

मेरे बाबा सुन लो, मन की पुकार को।
शरण अपनी ले लो, ठुकरा दूँगा संसार को।

ठुकराया है दुनिया ने, देकर खूब भरोसा
अब न खाने वाला, इस दुनिया से धोखा
करो कृपा न भूलूँ मैं, तेरे इस उपकार को।
शरण अपनी ले लो, ठुकरा दूँगा संसार को।

जीवन बन गया बाबा, सचमुच एक पहेली
जाने कब सुलझेगी, मेरे जीवन की पहेली
राह दिखाना भोले, अपने भक्त लाचार को।
शरण अपनी ले लो, ठुकरा दूँगा संसार को।

तेरे सिवा न कोई है, जिसको कहूँ मैं अपना
लगता होगा पूरा न , जो भी देखा है सपना
तुम्ही जानो कैसे, मिलेगा चैन बेकरार को।
शरण अपनी ले लो, ठुकरा दूँगा संसार को।

Thursday, 16 May 2019

श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 49

ॐ सांई राम जी 
श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 49





आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं , हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम  घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...

श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 49

हरि कानोबा, सोमदेव स्वामी, नानासाहेब चाँदोरकर की कथाएँ ।
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प्रस्तावना
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जब वेद और पुराण ही ब्रहमा या सदगुरु का वर्णन करने में अपनी असमर्थता प्रगट करते है, तब मैं एक अल्पज्ञ प्राणी अपने सदगुरु श्रीसाईबाबा का वर्णन कैसे कर सकता हूँ । मेरा स्वयं का तो यतह मत है कि इस विषय में मौन धारण करना ही अति उत्तम है । सच पूछा जाय तो मूक रहना ही सदगुरु की विमल पताकारुपी विरुदावली का उत्तम प्रकार से वर्णन करना है । परन्तु उनमें जो उत्तम गुण है, वे हमें मूक कहाँ रहने देत है । यदि स्वादिष्ट भोजन बने और मित्र तथा सम्बन्धी आदि साथ बैठकर न खायेंतो वह नीरस-सा प्रतीत होता है और जब वही भोजन सब एक साथ बैठकर खाते है, तब उसमें एक विशेष प्रकार की सुस्वादुता आ जाती है । वैसी ही स्थिति साईलीलामृत के सम्बन्ध में भी है । इसका एकांत में रसास्वादन कभी नहीं हो सकता । यदि मित्र और पारिवारिक जन सभी मिलकर इसका रस लें तो और अधिक आनन्द आ जाता है । श्री साईबाबा स्वयं ही अंतःप्रेरणा कर अपनी इच्छानुसार ही इन कथाओं को मुझसे वर्णित कर रहे है । इसलिये हमारा तो केवल इतना ही कर्तव्य है कि अनन्यभाव से उनके शरणागत होकर उनका ही ध्यान करें । तप-साधन, तीर्थ यात्रा, व्रत एवं यज्ञ और दान से हरिभक्ति श्रेष्ठ है और सदगुरु का ध्यान इन सबमें परम श्रेष्ठ है । इसलिये सदैव मुख से साईनाम का स्मरण कर उनके उपदेशों का निदिध्यासन एवं स्वरुप का चिनत्न कर हृदय में उनके प्रति सत्य और प्रेम के भाव से समस्त चेष्टाएँ उनके ही निमित्त करनी चाहिये । भवबन्धन से मुक्त होने का इससे उत्तम साधन और कोई नहीं । यदि हम उपयुक्त विधि से कर्म करते जाये तो साई को विवश होकर हमारी सहायता कर हमें मुक्ति प्रदान करनी ही पड़ेगी । अब इस अध्याय की कथा श्रवण करें ।


हरि कानोबा
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बम्बई के हरि कानोबा नामक एक महानुभाव ने अपने कई मित्रों और सम्बन्धियों से साई बाबा की अनेक लीलाऐं सुनी थी, परन्तु उन्हें विश्वास ही न होता था, क्योंकि वे संशयालु प्रकृति के व्यक्ति थे । अविश्वास उनके हृदयपटल पर अपना आसन जमाये हुये था । वे स्वयं बाबा की परीक्षा करने का निश्चय करके अपने कुछ मित्रों सहित बम्बई से शिरडी आये । उन्होंने सिर पर एक जरी की पगड़ी और पैरों में नये सैंडिल पहिन रखे थे । उन्होंने बाबा को दूर से ही देखकर उनके पास जाकर उन्हें प्रणाम तो करना चाहा, परन्तु उनके नये सैंडिल इस कार्य में बाधक बन गये । उनकी समझ में नही आ रहा था कि अब क्या किया जाय । तब उन्होंने अपने सैंडिल मंडप क एक सुरक्षित कोने में रखे और मसजिद में जाकर बाबा के दर्शन किये । उनका ध्यान सैंडिलों पर ही लगा रहा । उन्होंने बड़ी नम्रतापूर्वक बाबा को प्रणाम किया और उनसे प्रसाद और उदी प्राप्त कर लौट आये । पर जब उन्होंने कोने में दृष्टि डाली तो देखा कि सैंडिल तो अंतद्घार्न हो चुके है । पर्याप्त छानबीन भी व्यर्थ हुई और अन्त में निराश होकर वे अपने स्थान पर वापस आ गये ।

स्नान, पूजन और नैवेघ आदि अर्पित करक वे भोजन करने को तो बैठे, परन्तु वे पूरे समय तक उन सैंडिलों के चिन्तन में ही मग्न रहे । भोजन कर मुँह-हाथधोकर जब वे बाहर आये तो उन्होंने एक मराठा बालक को अपनी ओर आते देखा, जिसके हाथ में डण्डे के कोने पर एक नये सैंडिलों का जोड़ा लटका हुआ था । उस बालक ने हाथ धोने के लिये बाहर आने वाले लोगों से कहा कि बाबा ने मुझे यह डण्डा हाथ में देकर रास्तों में घूम-गूम कर हरि का बेटा जरी का फेंटा की पुकार लगाने को कहा है तथा जो कोई कहे कि सैंडिल हमारे है, उससे पहले यह पूछना कि क्या उसका नाम हरि और उसके पिता का क (अर्थात् कानोबा) है । साथ ही यह भी देखना कि वह जरीदार साफा बाँधे हुए है या नही, तब इन्हें उसे दे देना । बालक का कथन सुनकर हरि कानोबा को बेहद आनन्द व आश्चर्य हुआ । उन्होंने आगे बढ़कर बालक से कहा कि ये हमारे ही सैंडिल है, मेरा ही नाम हरि और मैं ही क (कानोबा) का पुत्र हूँ । यह मेरा जरी का साफा देखो । बालक सन्तुष्ट हो गया और सैंडिल उन्हें दे दी । उन्होंने सोचा कि मेरी जरी का साफा देखो । बालक सन्तुष्ट हो गया और सैंडिल उन्हें दे दी । उन्होंने भी सोचा कि मेरी जरीदार पगड़ी तो सब को ही दिख रही थी । हो सकता है कि बाबा की भी दृष्टि में आ गई हो । परन्तु यह मेरी शिरडी-यात्रा का प्रथम अवसर है, फिर बाबा को यह कैसे विदित हो गया कि मेरा ही नाम हरि है और मेरे पिता का कानोबा । वहतो केवल बाबा की परीक्षार्थ वहाँ आया था । उसे इस घटना से बाबा की महानता विदित हो गई । उसकी इच्छा पूर्ण हो गई और वह सहर्ष घर लौट गया ।
सोमदेव स्वामी
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अब एक दूसरे संशयालु व्यक्ति की कथा सुनिये, जो बाबा की परीक्षा करने आया था । काकासाहेब दीक्षित के भ्राता श्री. भाईजी नागपुर में रहते थे । जब वे सन् 1906 में हिमालय गये थे, तब उनका गंगोत्री घाटी के नीचे हरिद्घार के समीप उत्तर काशी में एक सोमदेव स्वामी से परिचय हो गया । दोनों ने एक दूसरे के पते लिख लिये । पाँच वर्ष पश्चात् सोमदेव स्वामी नागपुर में आये और भाईजी के यहां ठहरे । वहाँ श्री साईबाबा की कीर्ति सुनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई तथा वहाँ श्री साईबाबा के दर्शन करने की तीव्र उत्कंठा हुई । मनमाड और कोपरगाँव निकल जाने पर वे एक ताँगे में बैठकर शिरडी को चल पड़े । शिरडी के समीप पहुँचने पर उन्होंने दूर से ही मसजिद पर दो ध्वज लहरते देखे । सामान्यतः देखने में आता है कि भिन्न-भिन्न सन्तों का बर्ताव, रहन-सहन और बाहृ सामग्रियाँ प्रायः भिन्न प्रकार की ही रहा करती है । परन्तु केवल इन वस्तुओं से ही सन्तों की योग्यता का आकलन कर लेना बड़ी भूल है । सोमदेव स्वामी कुछ भिन्न प्रकृति के थे । उन्होंने जैसे ही ध्वजों को लहराते देखा तो वे सोचने लगे कि बाबा सन्त होकर इन ध्वजों में इतनी दिलचस्पी क्यों रखते है । क्या इससे उनका सन्तपन प्रकट होता है । ऐसा प्रतीत होता है कि यह सन्त अपनी कीर्ति का इच्छुक है । अतएव उन्होंने शिरडी जाने का विचार त्याग कर अपने सहयात्रियों से कहा कि मैं तो वापस लौटना चाहता हूँ । तब वे लोग कहने लगे कि फिर व्यर्थ ही इतनी दूर क्यों आये । अभी केवल ध्वजों को देखकर तुम इतने उद्गिग्न हो उठे हो तो जब शिरडी में रथ, पालकी, घोड़ा और अन्य सामग्रियाँ देखोगे, तब तुम्हारी क्या दशा होगी । स्वामी को अब और भी अधिक घबराहट होने लगी और उसने काह कि मैंने अनेक साधु-सन्तों के दर्शन किये है, परन्तु यह सन्त कोई बिरला ही है, जो इस प्रकार ऐश्वर्य की वस्तुएँ संग्रह कर रहा है । ऐसे साधु के दर्शन न करना ही उत्तम है, ऐसा कहकर वे वापस लौटने लगे । तीर्थयात्रियों ने प्रतिरोध करते हुए उन्हें आगे बढ़ने की सलाह दी और समझाया कि तुम यह संकुचित मनोवृत्ति छोड़ दो । मसजिद में जो साधु है, वे इन ध्वजाओं और अन्य सामग्रियों या अपनी कीर्ति का स्वप्न में भी सोचविचार नहीं करते । ये सब तो उनके भक्तगण प्रेम और भक्ति के कारण ही उनको भेंट किया करते है । अन्त में वे शडी जाकर बाबा के दर्शन करने को तैयार हो गये । मसजिद के मंडप में पहुँच कर तो वे द्रवित हो गये । उनकी आँखों से अश्रुधारा बहले लगी और कंठ रुँध गया । अब उनके सब दूषित विचार हवा हो गये और उन्हें अपने गुरु के शब्दों की स्मृति हो आई कि मन जहाँ अति प्रसन्न औ आकर्षित हो जाय, उसी स्थान को ही अपना विश्रामधाम समझना । वे बाबा की चरण-रज में लोटना चाहते थे, परन्तु वे उनके समीप गये तो बाबा एकदम क्रोधित होकर जोर-जोर से चिल्लाकर कहने लगे कि हमारा सामान हमारे ही साथ रहने दो, तुम अपने घर वापस लौट जाओ । सावधान । यदि फिर कभी मसजिद की सीढ़ी चढ़े तो । ऐसे संत के दर्शन ही क्यों करना चाहिये, जो मसजिद पर ध्वजायें लगाकर रखे । क्या ये सन्तपन के लक्षण है । एक क्षण भी यहाँ न रुको । अब उसे अनुभव हो गया कि बाबा ने अपने हृदय की बात जान ली है और वे कितने सर्वज्ञ है । उसे अपनी योग्यता पर हँसी आने लगी तथा उसे पता चल गया कि बाबा कितने निर्विकार और पवित्र है । उसने देखा कि वे किसी को हृदय से लगाते और किसी को हाथ से स्पर्श करते है तथा किसी को सान्तवना देकर प्रेमदृष्टि से निहारते है । किसी को उदी प्रसाद देकर सभी प्रकार से भक्तों को सुख और सन्तोष पहुँचा रहे है तो फिर मेरे साथ ऐसा रुक्ष बर्ताव क्यों । अधिक विचार करने पर वे इसी निष्कर्ष पर पहुँचे कि इसका कारण मेरे आन्तरिक विचार ही थे और इससे शिक्षा ग्रहण कर मुझे अपना आचरण सुधारना चाहिये । बाबा का क्रोध तो मेरे लिये वरदानस्वरुप है । अब यह कहना व्यर्थ ही होगा, कि वे बाबा की शरण मे आ गये और उनके एक परम भक्त बन गये ।


नानासाहेब चाँदोरकर
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अन्त में नानासाहेब चाँदोरकर की कथा लिखकर हेमाडपंत ने यह अध्याय समाप्त किया है । एक समय जब नानासाहेब म्हालसापति और अन्य लोगों के साथ मसजिद में बैठे हुए थे तो बीजापुर से एक सम्भ्रान्त यवन परिवार श्री साईबाबा के दर्शनार्थ आया । कुलवन्तियों की लाजरक्षण भावना देखकर नानासाहेब वहाँ से निकल जाना चाहते थे, परन्तु बाबा ने उन्हे रोक लिया । स्त्रियाँ आगे बढ़ी और उन्होंने बाबा के दर्शन किये । उनमें से एक महिला ने अपने मुँह पर से घूँघट हटाकर बाबा के चरणों में प्रणाम कर फिर घूँघट डाल लिया । नानासाहेब उसके सौंद4य से आक4षित हो गये और एक बार पुनः वह छटा देखने को लालायित हो उठे । नाना के मन की व्यथा जानकर उन लोगों के चले जाने के पश्चात् बाबा उनसे कहने लगे कि नाना, क्यों व्यर्थ में मोहित हो रहे हो । इन्द्रयों को अपना कार्य करने दो । हमें उनके कार्य में बाधक न होना चाहिये । भगवान् ने यह सुन्दर सृष्टि निर्माण की है । अतः हमारा कर्तव्य है कि हम उसके सौन्दर्य की सराहना करें । यह मन तो क्रमशः ही स्थिर, होता है और जब सामने का द्घार खुला है, तब हमें पिछले द्घार से क्यों प्रविष्ट होना चाहिये । चित्त शुदृ होते ही फिर किसी कष्ट का अनुभव नहीं होता । यदि हमारे मन में कुविचार नहीं है तो हमें किसी से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं । नेत्रों को अपना कार्य करने दो । इसके लिये तुम्हें लज्जित तथा विचलित न होना चाहिये । उस समया शामा भी वही थे । उनकी समझ में न आया कि आखिर बाबा के कहने का तात्पर्य क्या है । इसलिये लौटते समय इस विषय में उन्होंने नाना से पूछा । उस परम सुन्दरी के सौन्दर्य को देखकर जिस प्रकार वे मोहित हुए तता यह व्यथा जानकर बाबा ने इस विषय पर जो उपदेश उन्हें दिये, उन्होंने उसका सम्पूर्ण वृतान्त उनसे कहकर शामा को इस प्रकार समझाया – हमारा मन स्वभावतः ही चंचल है, पर हमें उसे लम्पट न होने देना चाहिये । इन्द्रयाँ चाहे भले ही चंचल हो जाये, परन्तु हमें अपने मन पर पूर्ण नियंत्रण रखकर उसे अशांत न होने देना चाहिये । इन्द्रियाँ तो अपने विषयपदार्थों के लिये सदैव चेष्टा कि यही करती है, पर हमें उनके वशीभूत होकर उनके इच्छित पदार्थों के समीप न जाना चाहिये । क्रमशः प्रयत्न करते रहने से इस चंचलता को नियंत्रित किया जा सकता है । यघपि उन पर पूर्ण नियंत्रण सम्भव नहीं है तो भी हमें उनके वशीभूत न होना चाहिये ।

प्रसंगानुसार हमें उनका वास्तविक रुप से उचित गति-अवरोध करना चाहिये । सौन्दर्य तो आँखें सेंकने का विषय है, इसलिये हमें निडर होकर सुन्दर पदार्थों की ओर देखना चाहिये । यदि हममें किसी प्रकार के कुविचार न आवे तो इसमें लज्जा और भय की आवश्यकता ही क्या है । यदि मन को निरिच्छ बनाकर ईश्वर के सौन्दर्य को निहारो तो इन्द्रियाँ सहज और स्वाभाविक रुप से अपने वश में आ जायेगी और विषयानन्द लेते समय भी तुम्हें ईश्वर की स्मृति बनी रहेगी । यदि उसे इन्द्रियों के पीछे दौड़ने तथा उनमें लिप्त रहने दोगे तो तुम्हारा जन्म-मृत्यु के पाश से कदापि छुटकारा न होगा । विषयपदार्थ इंद्रियों को सदा पथभ्रष्ट करने वाले होते है । अतएव हमें विवेक को सारथी बनाकर मन की लगाम अपने हाथ में लेकर इन्द्रिय रुपी घोड़ों को विषयपदार्थों की ओर जाने से रोक लेना चाहिये । ऐसा विवेक रुपी सारथी हमें विष्णु-पद की प्राप्ति करा देगा, जो हमारा यथार्थ में परम सत्य धाम है और जहाँ गया हुआ प्राणी फिर कभी यहाँ नहीं लौटता ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

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Wednesday, 15 May 2019

अंधेरी ज़िन्दगी में एक सवेरा दे दो, धरती आसमां के बीच बसेरा दे दो,

 ॐ सांई राम




अंधेरी ज़िन्दगी में एक सवेरा दे दो,
धरती आसमां के बीच बसेरा दे दो,
जीवन के तूफान में एक किनारा दे दो,
साईं नाथ अपने चरणों में आसरा दे दो,
अपनी रहमत का नज़ारा दे दो ||


शिरडी वाले सांई बाबा तू ही है एक हमारा,
जो भी तेरे दर पर आता मिलता उसे सहारा,
तुझसे लगन लगाके जोत जलाके,
भूल गया भूल गया मैं तो भूल गया,
ओ सांई बाबा सारी दुनिया भूल गया ||

सुबह शाम शिरडी वाले में फेरु तेरी माला,
तुझमें मन्दिर तुझमें मस्जिद तुझमें ही गुरुद्वारा,
तू है सारे जग का मालिक तू सारे जग का रखवाला,
तेरी भक्ति में सांई जी भूल गया भूल गया,
ओ सांई बाबा सारी दुनिया भूल गया ||

अंधियारे को दूर करे पानी से दीप जलाये,
तेरे दर पे जो आये उसे सच्ची राह दिखाये,
उसको सब कुछ भी मिल जाये जो तुझमें खो जाये,
शिरडी वाले सांई बाबा दुनिया भूल गया मैं,
ओ मैं तो भूल गया भूल गया,
ओ सांई बाबा सारी दुनिया भूल गया..... ||

Tuesday, 14 May 2019

जहां बनाऊँ कुटी मैं सांई, वहीं धाम तेरा बन जाए

ॐ सांई राम



घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय

घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ

जहां बनाऊँ कुटी मैं सांई
वहीं धाम तेरा बन जाए

तेरे चरण की धूल उठाऊँ
फिर दीवारो पे लेप लगाऊ

सांई जी दया करके
दरवाज़े पर श्रद्धा सबूरी लिखना

घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय
उस घर के अन्दर सांई
तेरा इक मन्दिर होवे

मन्दिर अन्दर मेरे सांई
तेरी सुन्दर मूरत होवे

मन भावों का हार बनाऊँ
तब इच्छा पूरी होवे

साँझ सवेरे उन भावों का
तुमको हार पहनाऊँ
घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय

भक्तिभाव से भरा हुआ
उस घर में परिवार होवे
श्यामा-तात्या हों संग में
और भगत म्हालसापति होवे
भक्तमंडली वहां विराजे
और लक्ष्मी बाई होवे
चारों पहर की होय आरती
नित-नित दर्शन होवे
घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय

गुरूवार के रोज़ वहां
सांई तेरा भंडारा होवे
हलुआ पूरी और खिचड़ी
भोग वहां लगता होवे
सांई के हाथों हांडी में
कुछ भोजन पकता होवे
सांई प्रेम से भोग लगावें
जूठन मोहे मिल जावे
घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय

चैत मास में नवमी के दिन
उर्स भरे मेला होवे
यशुदा नन्दन पालने झूलें
राम जन्म  सुन्दर होवे
सांई नाथ कि चले पालकी
मैं भी नाचूँ गाऊँ

घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय ||





Monday, 13 May 2019

श्री साँई उदी मंत्र

ॐ सांई राम


संस्कृत

परमम् पवित्रं बाबा  विभूतिम
परमम् विचित्रं लीला विभूतिम
परमार्थ ईष्टार्थ मोक्ष प्रधानम
बाबा विभूतिम इदम अस्रयामी

English Translation

Sacred Holy and Supreme is Baba's VibhuthiPouring Forth in brilliant stream, this play of Vibhuthi.So auspicious is its might, it grants liberationBaba's Vibhuthi, its power protects me

When we recite this mantra, we say “I take refuge in the supremely sacred vibhuti of the Lord, the wonderful vibhuti which bestows liberation, the sacred state which I desire to attain.”
Since this mantra is so powerful, we should recite it with respect and with sincerity in order that we gain the full benefit from it.

Vibhuti is a reminder that ash is the end product of all matter. Vibhuti has also an aspect of immortality, which makes it a fit offering for worshipping God. Only the Vibhuti remains unchanged, since it is the final result of the annihilation of the five elements of creation. It is symbolic of the ultimate reality that remains when our ego is burnt away by the fire of illumination.

"The Vibhuti that you smear on your forehead is intended to convey the basic spiritual lesson that everything will be reduced to ashes, including the brow that wears it".


  

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