शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 5 February 2022

साईं सच्चा सिरजनहार, साईं नाम कमा लै साईं सभदा पालनहार

ॐ सांई राम


साईं सच्चा सिरजनहारसाईं नाम कमा लै
साईं सभदा पालनहारसाईं नाम कमा लै


हीरे मोती सारे ओयेएथे छड जांवेंगा
मौत जदों नेड़े आईफिर पछ्तांवेंगा


छड माया दा संसार साईं नाम कमा लै
साईं सभदा पालनहारसाईं नाम कमा लै


पाप पुन सारे ओहनूसौंप दे तू बंदिया
शीश साईं चरना च झुका दे हुण बंदिया


साईं सभदा बक्शनहार, साईं नाम कमा लै
साईं सभदा पालनहारसाईं नाम कमा लै


जिंना लयी पापां भरी, कमाई करी जाणा एं
अंत समे च किसे कम्म नहियों आणा एं


तूँ अपणा जनम सवारसाईं नाम कमा लै
साईं सभदा पालनहारसाईं नाम कमा लै


गरीब ते मसूम दी तू, सेवा करी जांवेंगा
पशुआं ते पंछियाँ दी सेवा करी जांवेंगा

हो जावेगा अद्धारसाईं नाम कमा लै
साईं सभदा पालनहारसाईं नाम कमा लै

Friday, 4 February 2022

मेरा इक साथी है, बड़ा ही भोला भला है

ॐ सांई राम




आइये आज आप सभी को मैं,
अपने एक भोले भाले एवं इस जग से निराले
एक साथी से रूबरू कराता चलू...


मेरा इक साथी है, बड़ा ही भोला भला है
मिले ना उस जैसा, वो जग से निराला है
जब जब दिल यह उदास होता है
मेरा शिर्डी वाला मेरे पास होता है

जब तक रहा अकेला, बड़ा दुःख पाया मैं
जब जब दुःख ने घेरा बड़ा घबराया मैं
इस साड़ी दुनिया में, साईं का सहारा है
मिले ना उस जैसा, वो जग से निराला है
जब जब दिल यह उदास होता है
मेरा शिर्डी वाला मेरे पास होता है

नयी नयी पहचान, बदल गयी रिश्ते में
साइयां मेरा सौदा, पट गया सस्ते में
गिरा मैं जब जब भी, उसी ने संभाला है
मिले ना उस जैसा, वो जग से निराला है
जब जब दिल यह उदास होता है
मेरा शिर्डी वाला मेरे पास होता है

मेरा इक साथी है, बड़ा ही भोला भला है
मिले ना उस जैसा, वो जग से निराला है
जब जब दिल यह उदास होता है
मेरा शिर्डी वाला मेरे पास होता है

जब जब मुझ पर कोई संकट आता है
मेरा साईं झट से दौड़ा आता है
जब जब दिल यह उदास होता है
मेरा शिर्डी साईं मेरे पास होता है

मेरा इक साथी है, बड़ा ही भोला भला है
मिले ना उस जैसा, वो जग से निराला है
वो जग से निराला है, वो जग से निराला है
वो जग से निराला है, वो जग से निराला है

Thursday, 3 February 2022

श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 41 - चित्र की कथा, चिंदियों की चोरी और ज्ञानेश्वरी के पठन की कथा।

 ॐ साँई राम



आप सभी को शिर्डी के साँईं बाबा ग्रुप की और से साँईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं , हम प्रत्येक साँईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साँईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साँईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साँईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साँईं चरणों में क्षमा याचना करते है...


श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 41 - चित्र की कथा, चिंदियों की चोरी और ज्ञानेश्वरी के पठन की कथा।


गत अध्याय में वर्णित घटना के नौ वर्ष पश्चात् अली मुहम्मद हेमाडपंत से मिले और वह पिछली कथा निम्निखित रुप में सुनाई ।

एक दिन बम्बई में घूमते-फिरते मैंने एक दुकानदार से बाबा का चित्र खरीदा । उसे फ्रेम कराया और अपने घर (मध्य बम्बई की बस्ती में) लाकर दीवाल पर लगा दिया । मुझे बाबा से स्वाभाविक प्रेम था । इसलिये मैं प्रतिदिन उनका श्री दर्शन किया करता था । जब मैंने आपको (हेमाडपंत को) वह चित्र भेंट किया, उसके तीन माह पूर्व मेरे पैर में सूजन आने के कारण शल्यचिकित्सा भी हुई थी । मैं अपने साले नूर मुहम्मद के यहाँ पड़ा हुआ था । खुद मेरे घर पर तीन माह से ताला लगा था और उस समय वहाँ पर कोई न था । केवल प्रसिदृ बाबा अब्दुल रहमान, मौलाना साहेब, मुहम्मद हुसेन, साई बाबा ताजुद्दीन बाबा और अन्य सन्त चित्रों के रुप में वही विराजमान थे, परन्तु कालचक्र ने उन्हें भी वहाँ न छोड़ा । मैं वहाँ (बम्बई) बीमार पड़ा हुआ था तो फिर मेरे घर में उन लोगों (फोटो) को कष्ट क्यों हो । ऐसा समझ में आता है कि वे भी आवागमन (जन्म और मृत्यु) के चक्कर से मुक्त नहीं है । अन्य चित्रों की गति तो उनके ओभाग्यनुसार ही हुई, परन्तु केवल श्री साईबाबा का ही चित्र कैसे बच निकला, इसका रहस्योदघाटन अभी तक कोई नहीं कर सका है । इससे श्री साईबाबा की सर्वव्यापकता और उनकी असीम शक्ति का पता चलता है ।


कुछ वर्ष पूर्व मुझे मुहम्मद हुसेन थारिया टोपण से सन्त बाबा अब्दुल रहमान का चित्र प्राप्त हुआ था, जिसे मैंने अपने साले नूर मुहम्मद पीरभाई को दे दिया, जो गत आठ वर्षों से उसकी मेज पर पड़ा हुआ था । एक दिन उसकी दृष्टि इस चित्र पर पड़ी, तब उसने उसे फोटोग्राफर के पास ले जाकर उसकी बड़ी फोटो बनवाई और उसकी कापियाँ अपने कई रिश्तेदारों और मित्रों में वितरित की । उनमें से एक प्रति मुझे भी मिली थी, जिसे मैंने अपने गर की दीवाल पर लगा रखा था । नूर मुहम्मद सन्त अब्दुल रहमान के शिष्य थे । जब सन्त अब्दुल रहमान साहेब का आम दरबार लगा हुआ था, तभी नूर मुहम्मद उन्हें वह फोटो भेंट करने के हेतु उनके समक्ष उपस्थित हुए । फोटो को देखते ही वे अति क्रोधित हो नूर मुहम्मद को मारने दौड़े तथा उन्हें बाहर निकाल दिया । तब उन्हें बड़ा दुःख और निराशा हुई । फिर उन्हें विचार आया कि मैंने इतना रुपया व्यर्थ ही खर्च किया, जिसका परिणाम अपने गुरु के क्रोध और अप्रसन्नता का कारण बना । उनके गुरु मूर्ति पूजा के विरोधी थे, इसलिये वे हाथ में फोटो लेकर अपोलो बन्दर पहुँचे और एक नाव किराये पर लेकर बीच समुद्र में वह फोटो विसर्जित कर आये । नूर मुहम्मद ने अपने सब मित्रों और सम्बन्धियों से भी प्रार्थना कर सब फोटो वापस बुला लिये (कुल छः फोटो थे) और एक मछुए के हाथ से बांद्रा के निकट समुद्र में विसर्जित करा दिये ।

इस समय मैं अपने साले के घर पर ही था । तब नूर मुहम्मद ने मुझसे कहा कि यदि तुम सन्तों के सब चित्रों को समुद्र में विसर्जित करा दोगे तो तुम शीघ्र स्वस्थ हो जाओगे । यह सुनकर मैंने मैनेजर मैहता को अपने घर भेजा और उसके द्घारा घर में लग हुए सब चित्रों को समुद्र में फिकवा दिया । दो माह पश्चात जब मैं अपने घर वापस लौटा तो बाबा का चित्र पूर्ववत् लगा देखकर मुझे महान् आश्चर्य हुआ । मं समज न सका कि मेहता ने अन्य सब चित्र तो निकालकर विसर्जित कर दिये, पर केवल यही चित्र कैसे बच गया । तब मैंने तुरन्त ही उसे निकाल लिया और सोचने लगा कि कहीं मेरे साले की दृष्टि इस चित्र पर पड़ गई तो वह इसकी भी इति श्री कर देगा । जब मैं ऐसा विचार कर ही रहा था कि इस चित्र को कौन अच्छी तरह सँभाल कर रख सकेगा, तब स्वयं श्री साईबाबा ने सुझाया कि मौलाना इस्मू मुजावर के पास जाकर उनसे परामर्श करो और उनकी इच्छानुसार ही कार्य करो । मैंने मौलाना साहेब से भेंट की और सब बाते उन्हें बतलाई । कुछ देर विचार करने के पस्चात् वे इस निर्णय पर पहुँचे कि इस चित्र को आपको (हेमाडपंत) ही भेंट करना उचित है, क्योकि केवल आप ही इसे उत्तम प्रकार से सँभालने के लिये सर्वथा सत्पात्र है । तब हम दोनों आप के घर आये और उपयुक्त समय पर ही यतह चित्र आपको भेंट कर दिया । इस कथा से विदित होता है कि बाबा त्रिकालज्ञानी थे और कितनी कुशलता से समस्या हल कर भक्तों की इच्छायें पूर्ण किया करते थे । निम्नलिखित कथा इस बात का प्रतीक है कि आध्यात्मिक जिज्ञासुओं पर बाबा किस प्रकार स्नेह रखते तथा किस प्रकार उनके कष्ट निवारण कर उन्हें सुख पहुँचाते थे ।

चिन्दियों की चोरी और ज्ञानेश्वरी का पठन
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श्री. बी. व्ही. देव, जो उस समय डहाणू के मामलेदार थे, को दीर्घकाल से अन्य धार्मिक ग्रन्थों के साथ-साथ ज्ञानेश्वरी के पठन की तीव्र इच्छा थी । (ज्ञानेश्वरी भगवदगीता पर श्री ज्ञानेश्वर महाराज द्घारा रचित मराठी टीका है ।) वे भगवदगीता के एक अध्याय का नित्य पाठ करते तथा थोड़े बहुत अन्य ग्रन्थों का भी अध्ययन करते थे । परन्तु जब भी वे ज्ञानेश्वरी का पाठ प्रारम्भ करते तो उनके समक्ष अनेक बाधाएँ उपस्थित हो जाती, जिससे वे पाठ करने से सर्वथा वंचित रह जाया करते थे । तीन मास की छुट्टी लेकर वे शिरडी पधारे और तत्पश्चात वे अपने घर पौड में विश्राम करने के लिये भी गये । अन्य ग्रन्थ तो वे पढ़ा ही करते थे, परन्तु जब ज्ञानेश्वरी का पाठ प्रारम्भ करते तो नाना प्रकार के कलुषित विचार उन्हें इस प्रकार घेर लेते कि लाचार होकर उसका पठन स्थगित करना पड़ता था । बहुत प्रयत्न करने पर भी जब उनको केवल दो चार ओवियाँ पढ़ना भी दुष्कर हो गया, तब उन्होंने यह निश्चय किया कि जब दयानिधि श्री साई ही कृपा करके इस ग्रन्थ के पठन की आज्ञा देंगे, तभी उसकी श्रीगणेश करुँगा । सन् 1914 के फरवरी मास में वे सहकुटुम्ब शिरडी पधारे । तभी श्री. जोग ने उनसे पूछा कि क्या आप ज्ञानेश्वरी का नित्य पठन करते है । श्री. देव ने उत्तर दिया कि मेरी इच्छा तो बहुत है, परन्तु मैं ऐसा करने में सफलता नहीं पा रहा हूँ । अब तो जब बाबा की आज्ञा होगी, तभी प्रारम्भ करुँगा । श्री, जोग ने सलाह दी कि ग्रन्थ की एक प्रति खरीद कर बाबा को भेंट करो और जब वे अपने करकमलों से स्पर्श कर उसे वापस लौटा दे, तब उसका पठन प्रारम्भ कर देना । श्री. देव ने कहा कि मैं इस प्रणाली को श्रेयस्कर नहीं समझता, क्योंकि बाबा तो अन्तर्यामी है और मेरे हृदय की इच्छा उनसे कैसे गुप्त रह सकती है । क्या वे स्पष्ट शब्दों में आज्ञा देकर मेरी मनोकामना पूर्ण न करेंगें ।

श्री. देव ने जाकर बाबा के दर्शन किये और एक रुपया दक्षिणा भेंट की । तब बाबा ने उनसे बीस रुपये दक्षिणा और माँगी, जो उन्होंने सहर्ष दे दिया । रात्रि के समय श्री. देव ने बालकराम से भेंट की और उनसे पूछा आपने किस प्रकार बाबा की भक्ति तथा कृपा प्राप्त की है । बालकराम ने कहा मैं दूसरे दिन आरती समाप्त होने के पश्चात् आपको पूर्ण वृतान्त सुनाऊँगा । दूसरे दिन जब श्री. देवसाहब दर्शनार्थ मसजिद में आये तो बाबा ने फिर बीस रुपये दक्षिणा माँगी, जो उन्होंने सहर्ष भेंट कर दी । मसजिद में भीड़ अधिक होने के कारण वे एक ओर एकांत में जाकर बैठ गये । बाबा ने उन्हें बुलाकर अपने समीप बैठा लिया । आरती समाप्त होने के पश्चात जब सब लोग अपने घर लौट गये, तब श्री. देव ने बालकराम से भेंट कर उनसे उनका पूर्व इतिहास जानने की जिज्ञासा प्रगट की तथा बाबा द्घारा प्राप्त उपदेश और ध्यानादि के संबंध में पूछताछ की । बालकराम इन सब बातों का उत्तर देने ही वाले थे कि इतने में चन्द्रू कोढ़ी ने आकर कहा कि श्री. देव को बाबा ने याद किया है । जब देव बाबा के पास पहुँचे तो उन्होंने प्रश्न किया कि वे किससे और क्या बातचीत कर रहे थे । श्री. देव ने उत्तर दिया कि वे बालकराम से उनकी कीर्ति का गुणगान श्रवण कर रहे थे । तब बाबा ने उनसे पुनः 25 रुपये दक्षिणा माँगी, जो उन्होंने सहर्ष दे दी । फिर बाबा उन्हें भीतर ले गये और अपना आसन ग्रहण करने के पश्चात् उन पर दोषारोपण करते हुए कहा कि मेरी अनुमति के बिना तुमने मेरी चिन्दियों की चोरी की है । श्री. देव ने उत्तर दिया भगवन । जहाँ तक मुझे स्मरण है, मैंने ऐसा कोई कार्य नहीं किया है । परन्तु बाबा कहाँ मानने वाले थे । उन्होंने अच्छी तरह ढँढ़ने को कहा । उन्होंने खोज की, परन्तु कहीं कुछ भी न पाया । तब बाबा ने क्रोधित होकर कहा कि तुम्हारे अतिरिक्त यहाँ और कोई नहीं हैं । तुम्ही चोर हो । तुम्हारे बाल तो सफेद हो गये है और इतने वृदृ होकर भी तुम यहां चोरी करने को आये हो । इसके पश्चात् बाबा आपे से बाहर हो गये और उनकी आँखें क्रोध से लाल हो गई । वे बुरी तरह से गालियाँ देने और डाँटने लगे । देव शान्तिपूर्वक सब कुछ सुनते रहे । वे मार पड़ने की भीआशंका कर रहे थे कि एक घण्टे के पश्चात् ही बाबा ने उनसे वाड़े में लौटने को कहा । वाड़े को लौटकर उन्होंने जो कुछ हुआ था, उसका पूर्ण विवरण जोग और बालकराम को सुनाया । दोपहर के पश्चात बाबा ने सबके साथ देव को भी बुलाया और कहने लगे कि शायद मेरे शब्दों ने इस वृदृ को पीड़ा पहुँचाई होगी । इन्होंने चोरी की है और इसे ये स्वीकार नहीं करते है । उन्होंने देव से पुनः बारह रुपये दक्षिणा माँगी, जो उन्होंने एकत्र करके सहर्ष भेंट करते हुए उन्हें नमस्कार किया । तब बाबा देव से कहने लगे कि तुम आजकल क्या कर रहे हो । देव ने उत्तर दिया कि कुछ भी नहीं । तब बाबा ने कहा प्रतिदिन पोथी (ज्ञानेश्वरी) का पाठ किया करो । जाओ, वाडें में बैठकर क्रमशः नित्य पाठ करो और जो कुछ भी तुम पढ़ो, उसका अर्थ दूसरों को प्रेम और भक्तिपूर्वक समझाओ । मैं तो तुम्हें सुनहरा शेला (दुपट्टा) भेंट देना चाहता हूँ, फिर तुम दूसरों के समीप चिन्दियों की आशा से क्यों जाते हो । क्या तुम्हें यह शोभा देता है ।



पोथी पढ़ने की आज्ञा प्राप्त करके देव अति प्रसन्न हुए । उन्होंने सोचा कि मुझे इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो गई है और अब मैं आनन्दपूर्वक पोथी (ज्ञानेश्वरी) पढ़ सकूँगा । उन्होंने पुनः साष्टांग नमस्कार किया और कहा कि हे प्रभु । मैं आपकी शरण हूँ । आपका अबोध शिशु हूँ । मुझे पाठ में सहायता कीजिये । अब उन्हें चिन्दियों का अर्थ स्पष्टतया विदित हो गया था । उन्होंने बालकराम से जो कुछ पूछा था, वह चिन्दी स्वरुप था । इन विषयों में बाबा को इस प्रकार का कार्य रुचिकर नहीं था । क्योंकि वे स्वंय प्रत्येक शंका का समाधान करने को सदैव तैयार रहते थे । दूसरों से निरर्थक पूछताछ करना वे अच्छा नहीं समझते थे, इसलिये उन्होंने डाँटा और क्रोधित हुए । देव ने इन शब्दों को बाबा का शुभ आर्शीवाद समझा तथा वे सन्तुष्ट होकर घर लौट गये ।
यह कथा यहीं समाप्त नहीं होती । अनुमति देने के पश्चात् भी बाबा शान्त नहीं बैठे तथा एक वर्ष के पश्चात ही वे श्री. देव के समीप गये और उनसे प्रगति के विषय में पूछताछ की । 2 अप्रैल, सन् 1914 गुरुवार को सुबह बाबा ने स्वप्न में देव से पूछा कि क्या तुम्हें पोथी समझ में आई । जब देव ने स्वीकारात्मक उत्तर न दिया तो बाबा बोले कि अब तुम कब समझोगे । देव की आँखों से टप-टप करके अश्रुपात होने लगा और वे रोते हुए बोले कि मैं निश्चयपूर्वक कह रहा हूँ कि हे भगवान् । जब तक आपकी कृपा रुपी मेघवृष्टि नहीं होती, तब तक उसका अर्थ समझना मेरे लिये सम्भव नहीं है और यह पठन तो भारस्वरुप ही है । तब वे बोले कि मेरे सामने मुझे पढ़कर सुनाओ । तुम पढ़ने में अधिक शीघ्रता किया करते हो । फिर पूछने पर उन्होंने अध्यात्म विषयक अंश पढ़ने को कहा । देव पोथी लाने गयेऔर जब उन्होंने नेत्र खोले तो उनकी निद्रा भंग हो गई थी । अब पाठक स्वयं ही इस बात का अनुमान कर लें कि देव को इस स्वप्न के पश्चात् कितना आनंद प्राप्त हुआ होगा ।

(श्री. देव अभी (सन् 1944) जीवित है और मुझे गत 4-5 वर्षों के पूर्व उनसे भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था ।

जहाँ तक मुझे पता चला है, वह यही है कि वे अभी भी ज्ञानेश्वरी का पाठ किया करते है । उनका ज्ञान अगाध और पूर्ण है । यह उनके साई लीला के लेख से स्पष्ट प्रतीत होता है) । (ता. 19.10.1944)

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

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Wednesday, 2 February 2022

मैनू रसता वखा दे साईयाँ

ॐ सांई राम



मैनू रसता वखा दे साईयाँ
कोल अपणे बुला लै साईयाँ


जनम ल्या सी, काहदे लई आये सी
साईं असी भूल गए, केहड़े कम आये सी

तूं ही हुण दस साईयाँ
मैनू रसता वखा दे साईयाँ


तेरे वज्जों ही ता साईं जग च उजाला ये
तेरा रूप साईं सारे जग तो निराला ये

रूप अपणा वखा दे साईयाँ
मैनू रसता वखा दे साईयाँ


शिर्डी च साईं तेरी मूरत पियारी ये
दस साईं आवां कींवें, हुकम ना जारी ये

मैनू शिर्डी बुला लै साईयाँ
मैनू रसता वखा दे साईयाँ


मेरे पाप दुःख सारे साईं आ के हर लओ
मेहरां वाला हथ मेरे सिर ते वी रख लओ

मीह सुखां दा वसा दे साईयाँ
मैनू रसता वखा दे साईयाँ

Tuesday, 1 February 2022

ये तो जग के, पालनहार हमारे साँईं बाबा

ॐ सांई राम



साँईं साँईं साँईं साँईं
ये तो जग के, पालनहार
हमारे साँईं बाबा
ये तो सबपे ही, कृपा का आधार
हमारे साँईं बाबा
ये तो सब के ही, बक्शनहार
हमारे साँईं बाबा, हमारे साँईं बाबा
शिर्डी में वो सदा विराजे
चमत्कार हर पल दिखलाते
वो तो भक्तों के हैं सरताज़
ये तो सब के ही, ये तो सब के ही,
ये तो सब के ही, बक्शनहार
हमारे साँईं बाबा
साँईं साँईं मेरे बाबा साँईं
जो भी इनको हर पल ध्यावे
इनकी कृपा का सुख वो पावे
ये तो सबके ही, प्राणाधार
हमारे साँईं बाबा, हमारे साँईं बाबा
इन सा देव न देखा जग में
उदी से जीवन बदले पल में
ये तो जन्मों के, तारनहार
हमारे साँईं बाबा, हमारे साँईं बाबा
ओ शिर्डी में रहने वाले
सबको दरस दिखाने वाले
दर्शन दो इक बार, हमारे साँईं बाबा
ये तो सब के ही, बक्शनहार
साँईं बाबा, साँईं बाबा,
ये तो सबपे ही, कृपा का आधार
हमारे साँईं बाबा

Monday, 31 January 2022

मुझ पे तूँ अपना हक तो जमाता है, ये तो मेरे कर्म है सांँई..

 ॐ सांँई राम



मैं ना चाहूँ इतना सुख सांँई,
जिसमे हो तुझे भुलाने का दुःख सांँई,
कभी-कभी ही लेकिन फिर भी
मुझ पे तूँ अपना हक तो जमाता है,
ये तो मेरे कर्म है सांँई..


 सबके संकट दूर करेंगे
सबके संकट दूर करेंगे
बाबा शिर्डी वाले

पधारो--पधारो--पधारो --पधारो
सारे जग के वाली
साँईं--- साँईं--- साँईं ---साँईं

जीवन का आधार है साँईं
करुणा का भंडार है साँईं
साँईं नाम है जिस जिह्वा पर
उसने मुक्ति पा ली
पधारो, सारे जग के वाली
पधारो--पधारो--पधारो --पधारो
सारे जग के वाली
साँईं--- साँईं--- साँईं ---साँईं

प्रेम का पाठ पढ़ाने वाले
करुणा रस बरसाने वाले
श्रद्धा सबुरी भर जीवन में
कर देते खुशहाली
पधारोसारे जग के वाली
पधारो--पधारो--पधारो --पधारो
सारे जग के वाली
साँईं--- साँईं--- साँईं ---साँईं

सच्चे मन से शिर्डी जाते
खाली झोली भर ले आते
सच्चे मन से शिर्डी जाते
खाली झोली भर ले आते
सब पे करते है किरपा  वो
करें  भक्तों की रखवाली
पधारोसारे जग के वाली
पधारो--पधारो--पधारो --पधारो
सारे जग के वाली
साँईं--- साँईं--- साँईं ---साँईं

और किसी फिर राह चले क्यों
बंधन में फिर और बंधें क्यों
और किसी फिर राह चले क्यों
बंधन में फिर और बंधें क्यों
जन्म जन्म के बंधन छूटें
साँईं हैं, गर रखवाली
पधारो, सारे जग के वाली
पधारो--पधारो--पधारो --पधारो
सारे जग के वाली
साँईं--- साँईं--- साँईं ---साँईं

सबके संकट दूर करेंगे
 
सबके संकट दूर करेंगे
बाबा शिर्डी वाले
पधारो--पधारो--पधारो --पधारो
सारे जग के वाली
साँईं--- साँईं--- साँईं ---साँईं
पधारो, सारे जग के वाली
सबके संकट दूर करेंगे
सबके संकट दूर करेंगे
बाबा शिर्डी वाले
साँईं--- साँईं--- साँईं ---साँईं

Sunday, 30 January 2022

चरण नहीं यह हैं स्वर्ग समाना, भव से हुआ पार जो साँई को जाना

 ॐ सांँई राम जी



सुगम जो चाहो करना दूर्गम पथ
हाँकों उजले कर्मों की ओर रथ
कांटे भी बन सकते हैं कोमल फूल
सबका मालिक एक हैं ये कभी मत भूल

झूठ नहीं हैं सत्य हैं वाणी
दीपक जलते जहाँ संग पानी
उदी की भी महिमा हैं निराली
साँई ने नीम भी मीठी कर डाली
और करिश्मों की क्या करे बात
गंगा यमुना बहे चरणों मे साथ
चरण नहीं यह हैं स्वर्ग समाना
भव से हुआ पार जो साँई को जाना

काहे करें तू हठ ओ पगले
साँई सिमर, साँई को जपले
इस जन्म की साँई नाम कमाई
संवार देगी तेरे जन्म भी अगले

झूठे बोल ना जीवन में घोल
सच हैं समझ ले तू अनमोल
साँई हैं साँचा जग नरक समान
सौंप दे साँई को जीवन की कमान

नाम ही नहीं सिर्फ एक सार भी हैं
शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप परिवार ही हैं
जहाँ के मुखिया बाबा तारणहार हैं
साँई सम शोभा वाला यह घरबार हैं

साँई हाथ जिस डोर को थामे
नहीं हो सकता वह कभी लाचार
हर संभव प्रयास साँई राम का
तेरी मुश्किल से होगा दो चार

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