शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 8 January 2022

श्री साँई चरणों में एक अरदास

ॐ सांँई राम जी


श्री साँई चरणों में एक अरदास

किस विधि करूं मैं तेरी पूजा
किस विधि देवा तुझे रिझाऊँ
नंगे पाँव मैं चल कर आऊँ
या व्रत रख कर तुझे मनाऊँ

मूर्ख हूँ मैं ये मैंने प्रभु माना
पर अब मैं तुझे पाने की विधि जानूं
भूखे को भोजन प्यासे को पानी
निर्वस्त्र को पहले दुशाला ओढ़ाऊं
पहले भेंट तेरे नाम की चढ़ाऊँ
तब तेरे दर का पट खुला मैं पाऊँ

क्युं ना करूं चाकरी तेरी
भाये मुझे भाकरी तेरी
नीम के मीठे पत्ते तेरे
दुख हर लेते सारे मेरे

नियत सच्ची और दिल हो खरा
तेरे दर की ओर मुख जिसने करा
सावन के अंधे भांति दिखे सब हरा
जिसके सिर पर साँई नाथ हाथ धरा

हाथ रखे सिर पर साँई
नहीं मामूली सी बात
धर्म कर्म के काम जो करें
मिलती उसे ही ये सौगात

सिर पर हाथ फिरा कर साँई
गिलहरी कर दो ज्युँ राम ने कर दी
शबरी के झुठे बेर भी खा कर
उसकी दुनिया खुशहाल कर दी

ढुंढे मन क्यों तेरा बावला
साँई सदा तेरे आस पास हैं
नज़र ना आये तो गम ना कर
वे तो सिर्फ एक अहसास हैं

मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे
सब है साँई के चौबारे
हम ही फर्क करे धर्म का
साँई यहां नित्य फेरा मारे
नाविक के भांति श्रध्दा रख नांव में
तेरी दुनिया खुशहाल करेंगे साँई 
जीवन अपना अर्पण कर साँई छांव में

(ऐसा कहा जाता है कि प्रभु श्री राम जी के द्वारा हाथ फेरने के बाद ही गिलहरी के शरीर पर रेखायें अंकित हुई थी)

Friday, 7 January 2022

एक साँई ही रखते है सिर पर सच्चा हाथ

ॐ सांँई राम जी


ना हसीं का साथी ना गम का साथ
कोई ना मीत अपना सब पैसे की सौगात
लेकर देने का दस्तूर पुराना है मेरे दोस्त
एक साँई ही रखते है सिर पर सच्चा हाथ


मांग रहा सब जग साँई से
मैं मांगू साँई, बस साँई से
पिता तुल्य भगवान श्री साँई
हर फर्ज निभाते धर रूप माई

मांगू हाथ फैला, बिछा कर पल्ला
मैं क्या मांगू किछु स्थिर ना रहा
गर एक नजर डाल दे मेरा साँई
मेरा मुझमे कुछ फिर ना रहा

मुझमे अवगुण साँई नाथ बहुतेरे
तार मेरी नईया ओ माधव मेरे
तेरी कृपा के तार बजा कर
कर दे दूर अब मन के अंधेरे

करता कारक तुम हो स्वामी
मैं हूँ मूर्ख ठहरा खलकामी
करोगे उजला मेरा भी मन
बस एक बार साँई भर दो हामी

मेरी कलम उठे तेरा नाम लिखे
सबके भाग्य साँई आप लिखे
पुण्य भी डाल दो दास की झोली
अब तक तो नसीब में बस पाप लिखे

पापी पाप कमा रहे, करे ढोल पीट गुणगान
अंतर्यामी सद्गुरु साँई तू है सब जानी जान
करदे कृपा की वर्षा अब तो मेरे भाग्य विधाता
डाल कर मेरे इस नीरस जीवन में प्राण

तेरा मेरा, मेरा तेरा नाता जन्म जन्म का
कृपा जो हो तेरी मेरे साँई तार बजे इस मन का
सुर की नदिया बहे कर कलकल
नाम रहे जिव्हा पर तेरा हर पल

साँई साँई जपते जपते
लू मै आखिरी सांस
तेरा दास बन गणु कहाऊँ
बस इतनी सी है अरदास

दास गणु बनू तेरी महफिल का
ऐसी मुझ बदनसीब की तकदीर कहाँ
कुत्ता ही बना लो अपने दर का साँई
पूंछ से जमीं साफ करूं पग रखे भक्त जहाँ

Thursday, 6 January 2022

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 39

 ॐ सांई राम



आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं, हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है, हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 39 - बाबा का संस्कृत ज्ञान
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गीता के एक श्लोक की बाबा द्घारा टीका, समाधि मन्दिर का निर्माण ।

इस अध्याय में बाबा ने गीता के एक श्लोक का अर्थ समझाया है । कुछ लोगों की ऐसी धारणा थी कि बाबा को संस्कृत भाषा का ज्ञान न था और नानासाहेब की भी उनके प्रति ऐसी ही धारणा थी । इसका खंडन हेमाडपंत ने मूल मराठी ग्रंथ के 50वें अध्याय में किया है । दोनों अध्यायों का विषय एक सा होने के कारण वे यहाँ सम्मिलित रुप में लिखे जाते है ।


प्रस्तावना
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शिरडी के सौभाग्य का वर्णन कौन कर सकता है । श्री द्घारिकामाई भी धन्य है, जहाँ श्री साई ने आकर निवास कियाऔर वहीं समाधिस्थ हुए ।

शिरडी के नरनारी भी धन्य है, जिन्हें स्वयं साई ने पधारकर अनुगृहीत किया और जिनके प्रेमवश ही वे दूर से चलकर वहाँ आये । शिरडी तो पहले एक छोटा सा ग्राम था, परन्तु श्री साई के सम्पर्क से विशेष महत्त्व पाकर वह एक तीर्थ-क्षेत्र में परिणत हो गया ।

शिरडी की नारियां भी परम भाग्यशालिनी है, जिनका उनपर असीम और अभिन्न विश्वास के परे है । आठों पहर-स्नान करते, पीसते, अनाज निकालते, गृहकार्य करते हुये वे उनकी कीर्ति का गुणगान किया करती थी । उनके प्रेम की उपमा ही क्या हो सकती है । वे अत्यन्त मधुर गायन करती थी, जिससे गायकों और श्रोतागण के मन को परम शांति मिलती थी ।


बाबा द्वारा टीका
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किसी को स्वप्न में भी ज्ञात न था कि बाबा संस्कृत के भी ज्ञाता है । एक दिन नानासाहेब चाँदोरकर को गीता के एक श्लोक का अर्थ समझाकर उन्होंने लोगों को विस्मय में डाल दिया । इसका संक्षिप्त वर्णन सेवानिवृत्त मामलतदार श्री. बीय व्ही. देव ने मराठी साईलीला पत्रिका के भाग 4, (स्फुट विषय पृष्ठ 563) में छपवाया है । इसका संक्षिप्त विवरण Sai Baba’s Charters and Sayings पुस्तक के 61वें पृष्ठ पर और The Wonderous Saint Sai Baba के पृष्ठ 36 पर भी छपा है । ये दोनों पुस्तकें श्री. बी. व्ही. नरसिंह स्वामी द्घारा रचित है । श्री. बी. व्ही. देव ने अंग्रेजी में तारीख 27-9-1936 को एक वत्तक्व्य दिया है, जो कि नरसिंह स्वामी द्घारा रचित पुस्तक के भक्तों के अनुभव, भाग 3 में छापा गया है । श्री. देव को इस विषय की प्रथम सूचना नानासाहेब चाँदोरकर वेदान्त के विद्घान विघार्थियों में से एक थे । उन्होंने अनेक टीकाओं के साथ गीता का अध्ययन भी किया था तथा उन्हें अपने इस ज्ञान का अहंकार भी था । उनका मत था कि बाबा संस्कृत भाषा से सर्वथा अनभिज्ञ है । इसीलिये बाबा ने उनके इस भ्रम का निवारण करने का विचार किया । यह उस समय की बात है, जब भक्तगण अल्प संख्या में आते थे । बाबा भक्तों से एकान्त में देर तक वार्तालाप किया करते थे ।


नानासाहेब इस समय बाबा की चरण-सेवा कर रहे थे और अस्पष्ट शब्दों में कुछ गुनगुना रहे थे ।

बाबा – नाना, तुम धीरे-धीरे क्या कह रहे हो ।
नाना – मैं गीता के एक श्लोक का पाठ कर रहा हूँ ।
बाबा – कौन सा श्लोक है वह ।
नाना – यह भगवदगीता का एक श्लोक है ।
बाबा – जरा उसे उच्च स्वर में कहो ।
तब नाना भगवदगीता के चौथे अध्याय का 34वाँ श्लोक कहने लगे ः-

“तद्घिद्घि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः ।।“

बाबा – नाना, क्या तुम्हें इसका अर्थ विदित है ।
नाना – जी, महाराज ।
बाबा – यदि विदित है तो मुझे भी सुनाओ ।
नाना – इसका अर्थ है – तत्व को जानने वाले ज्ञानी पुरुषों को भली प्रकार दंडवत् कर, सेवा और निष्कपट भाव से किये गये प्रश्न द्घारा उस ज्ञान को जान । वे ज्ञानी, जिन्हें सद्घस्तु (ब्रहम्) की प्राप्ति हो चुकी है, तुझे ज्ञान का उपदेश देंगें ।

बाबा – नाना, मैं इस प्रकार का संकुल भावार्थ नहीं चाहता । मुझे तो प्रत्येक शब्द और उसका भाषांतरित उच्चारण करते हुए व्याकरणसम्मत अर्थ समझाओ ।

अब नाना एक-एक शब्द का अर्थ समझाने लगे ।
बाबा – नाना, क्या केवल साष्टांग नमस्कार करना ही पर्याप्त है ।
नाना – नमस्कार करने के अतिरिक्त मैं प्रणिपात का कोई दूसरा अर्थ नहीं जानता ।
बाबा – परिप्रश्न का क्या अर्थ है ।
नाना – प्रश्न पूछना ।
बाबा – प्रश्न का क्या अर्थ है ।
नाना – वही (प्रश्न पूछना) ।
बाबा – यदि परिप्रश्न और प्रश्न दोनों का अर्थ एक ही है, तो फिर व्यास ने परिउपसर्ग का प्रयोग क्यों किया क्या व्यास की बुद्घि भ्रष्ट हो गई थी ।
नाना – मुझे तो परिप्रश्न का अन्य अर्थ विदित नहीं है ।
बाबा – सेवा । किस प्रकार की सेवा से यहाँ आशय है ।
नाना – वही जो हम लोग सदा आपकी करते रहते है ।
बाबा – क्या यह सेवा पर्याप्त है ।
नाना – और इससे अधिक सेवा का कोई विशिष्ट अर्थ मुझे ज्ञात नही है ।
बाबा – दूसरी पंक्ति के उपदेक्ष्यंति ते ज्ञानं में क्या तुम ज्ञान शब्द के स्थान पर दूसरे शब्द का प्रयोग कर इसका अर्थ कह सकते हो ।
नाना – जी हाँ ।
बाबा – कौन सा शब्द ।
नाना – अज्ञानम् ।
बाबा – ज्ञानं के बजाय उस शब्द को जोड़कर क्या इस श्लोक का अर्थ निकलता है ।
नाना - जी नहीं, शांकर भाष्य में इस प्रकार की कोई व्याख्या नहीं है ।
बाबा – नहीं है, तो क्या हुआ । यदि अज्ञान शब्द के प्रयोग से कोई उत्तम अर्थ निकल सकता है तो उसमें क्या आपत्ति है ।
नाना – मैं नहीं जानता कि उसमें अज्ञान शब्द का किस प्रकार प्रयोग होगा ।
बाबा – कृष्ण ने अर्जुन को क्यों ज्ञानियों या तत्वदर्शियों को नमस्कार करने, उनसे प्रश्न पूछने और सेवा करने का उपदेश किया था । क्या स्वयं कृष्ण तत्वदर्शी नहीं थे । वस्तुतः स्वयं ज्ञान स्वरुप ।
नाना – जी हाँ, वे ज्ञानावतार थे । परन्तु मुझे यह समझ में नहीं आता कि उन्होंने अर्जुन से अन्य ज्ञानियों के लिये क्यों कहा ।
बाबा – क्या तुम्हारी समझ में नहीं आया ।

अब नाना हतभ्रत हो गये । उनका घमण्ड चूर हो चुका था । तब बाबा स्वयं इस प्रकार अर्थ समझाने लगे ।

1. ज्ञानियों को केवल साष्टांग नमस्कार करना पर्याप्त नहीं है । हमें सदगुरु के प्रति अनन्य भाव से शरणागत होना चाहिये ।

2. केवल प्रश्न पूछना पर्याप्त नहीं । किसी कुप्रवृत्ति या पाखंड, या वाक्य-जाल में फँसाने, या कोई त्रुटि निकालने की भावना से प्रेरित होकर प्रश्न नहीं करना चाहिये, वरन् प्रश्न उत्सुतकापूर्वक केवल मोक्ष या आध्यात्मिक पथ पर उन्नति प्राप्त करने की भावना से ही प्रेरित होकर करना चाहिये ।

3. मैं तो सेवा करने या अस्वीकार करने में पूर्ण स्वतंत्र हूँ, जो ऐसी भावना से कार्य करता है, वह सेवा नहीं कही जा सकती । उसे अनुभव करना चाहिये कि मुझे अपने शरीर पर कोई अधिकार नहीं है । इस शरीर पर तो गुरु का ही अधिकार है ौर केवल उनकी सेवा के निमित्त ही वह विघमान है ।

इस प्रकार आचरण करने से तुम्हें सदगुरु द्घारा ज्ञान की प्राप्ति हो जायेगी, जैसा कि पूर्व श्लोक में बताया गया है । नाना को यह समझ में नहीं आ सका कि गुरु किस प्रकार अज्ञान की शिक्षा देते है ।

बाबा – ज्ञान का उपदेश कैसा है । अर्थात् भविष्य में प्राप्त होने वाली आत्मानुभूति की शिक्षा । अज्ञान का नाश करना ज्ञान है । (गीता के श्लोक 18-66 पर ज्ञानेश्वरी भाष्य की ओवी 1396 में इस प्रकार वर्णन है – हे अर्जुन । यदि तुम्हारी निद्रा और स्वप्न भंग हो, तब तुम स्वयं हो । वह इसी प्रकार है । गीता के अध्याय 5-16 के आगे टीका में लिखा है – क्या ज्ञान में अज्ञान नष्ट करने के अतिरिक्त कोई और भेद भी है ) । अंधकार नष्ट करने का अर्थ प्रकाश है । जब हम द्घैत नष्ट करने की चर्चा करते है, तो हम अद्घैत की बात करते है । जब हम अंधकार नष्ट करने की बात करते है तो उसका अर्थ है कि प्रकाश की बात करते है । यदि हम अद्घैत की स्थिति का अनुभव करना चाहते है तो हमें द्घैत की भावना नष्ट करनी चाहिये। यही अद्घैत स्थिति प्राप्त हने का लक्षण है । द्घैत में रहकर अद्घैत की चर्चा कौन कर सकता है । जब तक वैसी स्थिति प्राप्त न हो, तब तक क्या उसका कोई अनुभव कर सकता है ।

शिष्य श्री सदगुरु के समान ही ज्ञान की मूर्ति है । उन दोनों में केवल अवस्था, उच्च अनुभूति, अदभुत अलौकिक सत्य, अद्घितीय योग्यता और ऐश्वर्य योग में भिन्नता होती है । सदगुरु निर्गुण निराार सच्चिदानंद है । वस्तुतः वे केवल मनुष्य जाति और विश्व के कल्याण के निमित्त स्वेच्छापूर्वक मानव शरीर धारण करते है, परन्तु नर-देह धारण करने पर भी उनकी सत्ता की अनंतता में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती । उनकी आत्मोपलब्धि, लाभ, दैविक शक्ति और ज्ञान एक-से रहते है । शिष्य का भी तो यथार्थ में वही स्वरुप है, परन्तु अनगिनत जन्मों के कारण उसे अज्ञान उत्पन्न हो जाता है और उसी के वशीभूत होकर उसे भ्रम हो जाता है तथा अपने शुदृ चैतन्य स्वरुप की विस्मृति हो जाती है । गीता का अध्याय 5 देखो । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुहृन्ति जन्तवः । जैसा कि वहाँ बतलाया गया है, उसे भ्रम हो जाता है कि मैं जीव हूँ, एक प्राणी हूँ, दुर्बल और अस्सहाय हूँ । गुरु इस अज्ञानरुपी जड़ को काटकर फेंक देता है और इसीलिये उसे उपदेश करना पड़ता है । ऐसे शिष्य को जो जन्म-जन्मांतरों से यह धारणा करता आया है कि मैं तो जीव, दुर्बल और असहाय हूँ, गुरु सैकड़ों जन्मों तक ऐसी शिक्षा देते है कि तुम ही ईश्वर हो, सर्वशक्तिमान् और समर्थ हो, तब कहीं जाकर उसे किंचित मात्र भास होता है कि यथार्थ में मैं ही ईश्वर हूँ । सतत भ्रम में रहने के कारण ही उसे ऐसा भास होता है कि मैं शरीर हूँ, एक जीव हूँ, तथा ईश्वर और यह विश्व मुझ से एक भिन्न वस्तु है । यह तो केवल एक भ्रम मात्र है, जो अनेक जन्म धारण करने के कारण उत्पन्न हो गया है । कर्मानुसार प्रत्येक प्राणी को सुखःदुख की प्राप्ति होती है । इस भ्रम, इस त्रुटि और इस अज्ञान की जड़ को नष्ट करने के लिये हमें स्वयं अपने से प्रश्न करना चाहिये कि यह अज्ञान कैसे पैदा हो गया । वह अज्ञान कहाँ है और इस त्रुटि का दिग्दर्शन कराने को ही उपदेश कहते है ।



अज्ञान के नीचे लिखे उदाहरण है –
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1. मैं एक जीव (प्राणी) हूँ ।
2. शरीर ही आत्मा है । (मैं शरीर हूँ)
3. ईश्वर, विश्व और जीव भिन्न-भिन्न तत्व है ।
4. मैं ईश्वर नहीं हूँ ।
5. शरीर आत्मा नहीं है, इसका अबोध ।
6. इसका ज्ञान न होना कि ईश्वर, विश्व और जीव सब एक ही है ।

जब तक इन त्रुटियों का उसे दिग्दर्शन नहीं कराया जाता, तब तक शिष्य को यह कभी अनुभव नहीं हो सकता कि ईश्वर, जीव और शरीर क्या है, उनमें क्या अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है तथा वे परस्पर भिन्न है या अभिन्न है अथवा एक ही है । इस प्रकार की शिक्षा देना और भ्रम को दूर करना ही अज्ञान का ज्ञानोपदेश कहलाता है । अब प्रश्न यह है कि जीव जो स्वयं ज्ञान-मूर्ति है, उसे ज्ञान की क्या आवश्यकता है । उपदेश का हेतु तो केवल त्रुटि को उसकी दृष्टि में लाकर अज्ञान को नष्ट करना है ।

बाबा ने आगे कहा –

1. प्रणिपात का अर्थ है शरणागति ।
2. शरणागत होना चाहिये तन, मन, धन से (अर्थात् अनन्य भाव से) ।
3. कृष्ण अन्य ज्ञानियों को ओर क्यों संकेत करते है । सदभक्त के लिये तो प्रत्येक तत्व वासुदेव है । (भगवदगीता अ. 7-19 अर्थात् कोई भी गुरु अपने भक्त के लिये कृष्ण है) और गुरु शिष्य को वासुदेव मानता है और कृष्ण इन दोनों को अपने प्राण और आत्मा ।
(भगवदगीता अ. 7-18 पर ज्ञानदेव की टीका) चूँकि श्रीकृष्ण को विदित था कि ऐसे अनेक भक्त और गुरु विघमान है, इसलिये उनका महत्व बढ़ाने के लिये ही श्रीकृष्ण ने अर्जुन से ऐसा उल्लेख किया ।



समाधि-मन्दिर का निर्माण
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बाबा जो कुछ करना चाहते थे, उसकी चर्चा वे कभी नहीं करते थे, प्रत्युत् आसपास ऐसा वातावरण और परिस्थिति निर्माण कर देते थे कि लोगों को उनका मंथर, परन्तु निश्चित परिणाम देखकर बड़ा अचम्भा होता था । समाधि-मन्दिर इस विषय का उदाहरण है । नागपुर के प्रसिद्घ लक्षाधिपति श्रीमान् बापूसाहेब बूटी सहकुटुम्ब शिरडी में रहते थे । एक बार उन्हें विचार आया कि शिरडी में स्वयं का एक वाड़ा होना चाहिए । कुछ समय के पश्चात जब वे दीक्षित वाड़े में निद्रा ले रहे थे तो उन्हें एक स्वप्न हुआ । बाबा ने स्वप्न में आकर उनसे कहा कि तुम अपना एक वाड़ा और एक मन्दिर बनवाओ । शामा भी वहीं शयन कर रहा था और उसने भी ठीक वैसा ही स्वप्न देखा । बापूसाहेब जब उठे तो उन्होंने शामा को रुदन करते देखकर उससे रोने का कारण पूछा ।



तब शामा कहने लगा –

अभी-अभी मुझे एक स्वप्न आया था कि बाबा मेरे बिलकुल समीप आये और स्पष्ट शब्दों में कहने लगे कि मन्दिर के साथ वाड़ा बनवाओ । मैं समस्त भक्तों की इच्छाएँ पूर्ण करुँगा । बाबा के मधुर और प्रेमपूर्ण शब्द सुनकर मेरा प्रेम उमड़ पड़ा तथा गला रुँध गया और मेरी आँखों से अश्रुओं की धारा बहने लगी । इसलिये मैं जोर से रोने लगा । बापूसाहेब बूटी को आश्चर्य हुआ कि दोनों के स्वप्न एक से ही है । धनाढ्य तो वे थे ही, उन्होंने वाड़ा निर्माण करने का निश्चय कर लिया और शामा के साथ बैठकर एक नक्शा खींचा । काकासाहेब दीक्षित ने भी उसे स्वीकृत किया और जब नक्शा बाबा के समक्ष प्रस्तुत किया गया तो उन्होंने भी तुरंत स्वीकृति दे दी । तब निर्माण कार्य प्रारम्भ कर दिया गया और शामा की देखरेख में नीचे मंजिल, तहखाना और कुआँ बनकर तैयार हो गया । बाबा भी लेंडी को आते-जाते समय परामर्श दे दिया करते थे । आगे यतह कार्य बापूसाहेब जोग को सौंप दिया गया । जब कार्य इसी तरह चल ही रहा था, उसी समय बापूसाहेब जोग को एक विचार आया कि कुछ खुला स्थान भी अवश्य होना चाहिये, बीचोंबीच मुरलीधर की मूर्ति की भी स्थापना की जाय । उन्होंने अपना विचार शामा को प्रकट किया तता बाबा से अनुमति प्राप्त करने को कहा । जब बाबा वाड़े के पास से जा रहे थे, तभी शामा ने बाबा से प्रश्न कर दिया । शामा का प्रश्न सुनकर बाबा ने स्वीकृति देते हुए कहा कि जब मन्दिर का कार्य पूर्ण हो जायगा, तब मैं स्वयं वहाँ निवास करुँगा, और वाड़े की ओर दृष्टिपात करते हुए कहा जब वाड़ा सम्पूर्ण बन जायगा, तब हम सब लोग उसका उपभोग करेंगे । वहीं रहेंगे, घूमेंगे, फिरेंगे और एक दूसरे को हृदय से लगायेंगे तथा आनन्दपूर्वक विचरेंगे । जब शामा ने बाबा से पूछा कि क्या यह मूर्ति के मध्य कक्ष की नींव के कार्य आरम्भ का शुभ मुहूर्त्त है । तब उन्होंने स्वीकारात्मक उत्तर दे दिया । तभी शामा ने एक नारियल लाकर फोड़ा और कार्य प्रारम्भ कर दिया । ठीक समय में सब कार्य पूर्ण हो गया और मुरलीधर की एक सुन्दर मूर्ति बनवाने का प्रबन्ध किया गया । अभी उसका निर्माण कार्य प्रारम्भ भी न हो पाया था कि एक नवीन घटना घटित हो गई । बाबा की स्थिति चिंताजक हो गई और ऐसा दिखने लगा कि वे अब देह त्याग देंगे । बापूसाहेब बहुत उदास और निराश से हो गये । उन्होंने सोचा कि यदि बाबा चले गये तो बाड़ा उनके पवित्र चरण-स्पर्श से वंचित रह जायगा और मेरा सब (लगभग एक लाख) रुपया व्यर्थ ही जायेगा, परन्तु अंतिम समय बाबा के श्री मुख से निकले हुए वचनों ने (मुझे बाड़े में ही रखना) केवल बूटीसाहेब को ही सान्त्वना नहीं पहुँचाई, वरन् अन्य लोगों को भी शांति मिली । कुछ समय के पश्चात् बाबा का पवित्र शरीर मुरलीधर की मूर्ति के स्थान पर रख दिया गया । बाबा स्वयं मुरलीधर बन गये और वाड़ा साईबाबा का समाधि मंदिर । उनकी अगाध लीलाओं की थाह कोई न पा सका । श्री. बापूसाहेब बूटी धन्य है, जिनके वाड़े में बाबा का दिव्य और पवित्र पार्थिव शरीर अब विश्राम कर रहा है ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।*********************************************************

Wednesday, 5 January 2022

God can be secured with Love Alone

ॐ सांई राम


God can be secured with Love Alone


This is a small story in the Mahabharata. With a view to get Lord Krishna exclusively for herself, Satyabhama, one of His consorts, went to Sage Narada and requested him to tell her some way, a short-cut, by which she can achieve her objective.
Narada is the one who imparts Wisdom. Wanting to teach Satyabhama a lesson, he decided to stage a small drama. He told her that there is a ritual in which she gives away her husband as a gift (daan) to someone and then buys him back by paying money, equivalent in weight to the weight of the Lord. Narada said that Krishna will belong solely to Satyabhama under all circumstances if she went through this ritual. Satyabhama was lured into the plan.
He asked for a big balance to be brought, and then invited Krishna to sit on one of the pans. Krishna of course knew very well what Narada was up to, and smilingly obliged the sage. Narada then asked Satyabhama to place gold on the other pan. But lo and behold! No matter how much gold was placed on the other pan, the scale refused to become even.
Sathyabhama felt utterly frustrated. Narada saw an excellent opportunity in the situation and told Satyabhama that since she is not able to give gold needed to equal her husband?s weight, he was taking away Krishna; from that day, Krishna would not belong to her; He would belong to him.
In that situation, Satyabhama thought of Rukmini and went in search of her. She found her performing Tulsi pooja. After hearing what Satyabhama had to say, Rukmini remarked, ?God belongs to all and resides in every being as the Eternal Indweller. No one can have a monopoly of God, nor is it good to even entertain such a desire.?
The gold was then removed and Narada now asked Rukmini to try and somehow match Krishna?s weight. Rukmini replied, ?O sage, I believe Krishna?s Form can be balanced just by uttering His Name, and that is what I am going to do.?
Narada was not prepared to accept such a scheme and said, ?The Form is visible and tangible whereas the Name is not. I want you to match Krishna?s Form with something that has a form.?
Rukmini agreed. She took a tulsi leaf in her hand and prayed:
O God, Who is worshipped with leaf, flowers, fruits, and water,
If it be true that You submit Yourself
When You are offered Pure Love instead of all these,
I pray that You be balanced by Your Name,
And then tilt the scale with this tulsi leaf.
So praying, Rukmini placed the tulsi leaf on the empty pan & said, ?Krishna!? Immediately the scale became even, and the pan carrying Krishna went up instantly; the Lord had been more than matched!
This story teaches that the Lord submits Himself only to pure devotion; He cannot be obtained in any other way; least of all, He cannot ever be bought! There is nothing greater than pure bhakti, which is why it is given such an exalted status in Indian culture.
Our ancients held that devotion is more precious and valuable than all the material wealth one can dream of. It is this wealth that man should really seek instead of gold. In fact, it is the bounden duty of man to acquire this wealth; and he does not have to go far to seek it, for this treasure is already locked up within him.


GOVARDHAN PUJA RECOMMENDE​D DURING KARTIK MAAS

By giving charity, performing austerities, bathing in sacred rivers, chanting sacred mantras, or worshiping the Brahmanas and the Supreme Personality of Godhead at the Godavari, Mount Simla, Mayapuri, Kumbhaga, Pushkara, Pushya-nakshatra, Kurukshetra, Ravi-graha, Candra-graha, Kashi, Phalguna, Naimisharanya, Ekadashi, Shukara, Kartiki, Ganamuktida, Janmashtami, Madhupuri, Khandava, Dvadasi, Kartiki, Purnima, Vateshvara-maha-vata, Makararka, Prayaga, Barhishmati, Vaidhati, Ayodhya-sarayu-tira, Sri Rama-navami-dina, Shiva-caturdasi, Baijanatha- subha-vana, Darsa, Soma-vara, Ganga-sagara-sangama, Dasami, Setubandha, Sri Rangam, or Saptami-dina, one attains great pious result. O best of Brahmanas, by visiting Govardhan Hill once, one attains a pious result ten million times greater than all those pious deeds together.
Giriraj's appearance in Vraja
Following an inquiry by Nanda Maharaj to his brother Upananda about the appearance of Giriraj Govardhan in Vrindavan, Upananda related the story as told by Pitamaha Bhishma (citing the Garga Samhita) to Maharaj Pandu, the father of the Pandavas, who had also asked the same question.
Once in Goloka Vrindavan, Lord Sri Krishna informed Srimati Radharani that She should prepare for Their descent to this our material universe to appear on the Earth planet (Jambu dwip) to enact Their transcendental pastimes. Srimati Radharani replied that unless Vraja Dhama, the Yamuna and Govardhan Hill were present there, She would like not come. Krishna assured His Beloved that Vraja Dhama, the Yamuna and Giriraj Govardhan had already made Their appearance on the Earth planet, and were awaiting Srimati's and Krishna's coming.
In ancient times, thousands of years before this conversation between Radha and Krishna, the Vedas say that mountains were living entities who would move, grow and fly and land anywhere they liked.
Once in the land of Salmali Dvipa, Dronachal's (the personified mountain) wife gave birth to a son named Govardhan. At the time of Govardhan's birth all the demigods appeared in the sky and showered flowers upon him. The great mountains, led by the Himalayas and Sumeru came, offering their respects and prayers, praising Govardhan for having descended from Goloka Vrindavana. They accepted Govardhan as their King, described Him as the "crown jewel of Vraja," and performed parikrama of Govardhan.
At the beginning of Satya Yuga, the great sage Pulastya Muni came to Salmali dvipa. Seeing the beautiful Govardhan covered with many lovely creepers, flowers, rivers, caves and chirping birds, Pulastya Muni felt that Govardhan was capable of granting liberation. He then went to meet Dronachal, who immediately offered his respects and inquired from the sage what service he could render.
Pulastya Muni informed Dronachal that he was on pilgrimage to all the holy places, and that he resided in Kashi. He explained that although Kashi was so auspicious due to the presence of the Ganga flowing through the city, there were no hills possessed of such beauty as Govardhan. He asked Dronachal if he would give his son Govardhan to him so that he could bring Govardhan to Kashi, so that he could perform his tapasya in the pristine environment of the hill.
Dronachal did not want to give up Govardhan and began crying in thoughts of possible separation from his son. Govardhan, not wanting to see Pulastya Muni become angry and curse his father, asked the rishi how he would be able to carry him all the way to Kashi. Pulastya Muni said he would carry him in his right hand. Govardhan agreed to go with the sage giving one condition; if the sage put him down anywhere during the course of the journey, he would not be able to lift him again. Pulastya Muni agreed, and left, carrying Govardhan in his right hand.
On the way to Kasi Pulastya Muni passed through Vraja. Govardhan saw the beauty of the place and wished to remain there. Govardhan then arranged for Pulastya Muni to feel the need to relieve himself, so Pulastya Muni attended to the call of nature, putting Govardhan down. When Pulastya Muni returned, he was unable to again lift Govardhan to any degree, despite the tremendous strength he was using to do so.
In great anger Pulastya Muni then cursed Govardhan that He would daily sink into the ground, to the extent of one mustard seed a day. When Govardhan first came to Vraja in the beginning of Satya Yuga, he was 64 miles long, 40 miles wide, and 16 miles high. It is explained that after 10,000 years of the Kali Yuga, Govardhan (and Yamuna Devi) will completely disappear.
After narrating the wonderful story of Govardhan's appearance, (another brother of Nanda Maharaj), Sunanda informed Nanda Maharaja that as long as Govardhan Hill and the river Yamuna remained manifest, Kali Yuga would not take its full effect. Sunanda Prabhu also explained that anyone who is fortunate enough to hear the description of the appearance of Giriraj Govardhan would be freed from all sins.
There is also another legend which relates that during Treta Yug when Lord Rama appeared, Mount Govardhan prayed to Hanuman Maharaj to utilize his stones and boulders in building the bridge to Lanka as he wanted to serve the Lord. When Sri Rama heard his prayer, just at that time, the bridge was completed. Sri Rama then promised Govardhan that in the age of Dwapara when He would appear as Krishna in Vraja, He would daily play and perform pastimes in and around Govardhan and also lift him on His hands for 7 days and 7 nights.
During Krishna’s praktya lila, He alongwith his cowherd friends, would spent their entire day around Giriraj Govardhan. While the cows would happily graze on the fresh tender grass, Krishna and his friends would frolic in the shaded groves and caves of the hill and dive into the cool sarovars and kunds which surround Govardhan.
As the best of servitors, Govardhan Hill provides Krishna and Balarama and the inhabitants of Vrindavan with all the necessities of life. Cool pure drinking water from its many waterfalls, pure honey, succulent fruits, wonderful varieties of herbs, roots, fruits, creepers and fresh flowers. Govardhan also provides various minerals and precious gems that the cowherd boys use to decorate Krishna and Balarama and themselves as well.
Govardhan is also fortunate to provide well-hidden caves and natural stone sitting places for the divine couple where they perform their sweet, loving pastimes. In this way, Giriraj Maharaj is the most confidential servitor of Sri Radha Krishna, being a witness of their intimate pastimes.
The Vedas declare that Govardhan Maharaj is non-different from the Supreme Personality of Godhead, Lord Krishna Himself. When Sri Chaitanya Mahaprabhu visited Vraja in the year 1515, He refused to step on Govardhan Hill because He regarded Govardhan as the body of Lord Krishna. At the time of the Annakuta ceremony, Krishna declared that He and Govardhan Hill are one and the same. Because Govardhan Hill is non-different from Krishna Himself, the rocks from Govardhan are worshipable just like a Deity of Krishna.
In fact, the stones known as Govardhan-sila do not need to be installed as they are already considered to be worshipful Deities. Many great devotees have worshiped the silas from Govardhan such as Sanatana Gosvami Raghunatha dasa Gosvami and Lord Caitanya Mahaprabhu Himself.
Govardhan Hill is envisioned to be in the shape of a peacock resting with its head tucked into its side. Its face is considered to be Kusuma-sarovara, its neck Manasi-ganga, its mouth Mukharavinda, its two eyes Radha-kunda and Syama-kunda, the beginning of its tail Balarama Sthali and the end Punchari-kunda.
In the holy month of Kartik, thousands of devotees perform the parikrama of Giriraj Maharaj revelling in the joyful, transcendental atmosphere of Govardhan. They walk barefoot the 23 km path around Govardhan, or perform dandavat parikrama, which may take weeks, chanting the Lord’s name and glorifying Giriraj Maharaj praying for pure loving devotion unto the lotus feet of Sri Sri Radha Giridhari.

Tuesday, 4 January 2022

साँईं बाबा जी ने कहा था :

 ॐ सांँई राम



साँईं बाबा जी ने कहा था :

"मै तुम्हारे ह्रदय मे विराजमान हूँ, सभी जीवित प्राणियों के ह्रदय में, मै ही व्याप्त हूँ" |

"चाहे इस संसार में तुम कही भी जाओ, में हर जगह तुम्हारे साथ ही जाता हूँ | तुम्हारा ह्रदय ही मेरा घर है; में तुम्हारे अंत:करण में निवास करता हूँ" |

"चाहे इस संसार में तुम कही भी जाओ, में हर जगह तुम्हारे साथ ही जाता हूँ | तुम्हारा ह्रदय ही मेरा घर है; में तुम्हारे अंत:करण में निवास करता हूँ" |

मुझे सबसे ज्यादा प्यारा वो भक्त है जो हर किसी जरुरतमंद इंसान की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहता हो और हर किसी के सुख और दुःख में शामिल होता हो और किसी गरीब, बेसहारा जरुरतमंद इंसान की मदद करना ही तो मेरी भक्ति करना है ......अल्लहा मालिक !!

Monday, 3 January 2022

दुख की जड़े खत्म कर दो साँई, बस कह दो हमारे दिल मे रहोगे

ॐ सांँई राम जी


कब से सहते आये हो
और कहो कब तक सहोगे
दुख की जड़े खत्म कर दो साँई
बस कह दो हमारे दिल मे रहोगे


ना धरती ना आकाश
ना अंधेरा ना प्रकाश
इस दिल को तो मिले सकून
जब होते है बाबा आस पास


विज्ञान कहे प्रकाश गति
ना कोई सके पछाड़
दुखियों के दुख हरने पल में
साँई पहुंचे 7 समुद्र भी पार


हीरे में कुछ चमक नही
खेल ये प्रकाश रचाये
रचना लिखते आनंद से
लीला साँई दिखाये


रचना लिखी आनंद से
आनंद सब जग पाये
अमृत बरसे वाणी से

जिस हृदय साँई समाये

Sunday, 2 January 2022

बाबा मुझे भी इंसान बना दो

ॐ सांई राम



बाबा मुझे भी इंसान बना दो
तुम्हारे दर पर खड़ा हूँ
थक गया हूँ जीवन से
सर से सारा भार उतार दो
झूठ, फरेब, क्रोध, मोह के
चक्रव्यूह में फसा हुआ हूँ
माया के जाल से
मुझे आज मुक्त करा दो
जीवन की तीखी धूप ने
मेरी भावनाओं को झुलसा दिया है
इस तपती धूप पर
अपनी ठंडी छाव बिछा दो

करूणा, क्षमा का वास
जीवन से मिट गया है
इस कठोर दिल को
दया का पाठ पढ़ा दो
धन दौलत की आस ने
बिखेर दिया है मुझे
इस टूटे हुए आईने को
समेट लो अपने हाथों में

आज तेरे दर पर आया हूँ
खाली ना लौट के जाऊंगा
तेरे विश्वास को अपनी
आत्मा में बसाऊंगा
तुझे अपना बनाऊंगा
जीवन की हर ठोकर खायी है मैंने
अब ना अपनी गलती दोहराऊंगा
थाम लुगा तेरा आंचल
और इंसान बनके जाऊंगा

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