शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 3 October 2020

श्री साईं - लीलाएं जब जौहर अली बाबा जी के चेले बने

 ॐ सांई राम



कल हमने पढ़ा था.. कुश्ती के बाद बाबा में बदलाव 
श्री साईं लीलाएं
जब जौहर अली बाबा जी के चेले बने

साईं बाबा और मोहिद्दीन की कुश्ती के कुछ वर्षों के बाद जौहर अली नाम का एक मुस्लिम फकीर रहाता में अपने शिष्यों के साथ रहने आयावह हनुमान मंदिर के पास एक मकान में डेरा जमाकर रहने लगावह अहमदनगर का रहने वाला थाजौहर अली बड़ा विद्वान थाकुरान शरीफ की आयातें उसे मुंहजुबानी याद थींमीठी बोली उसकी अन्य विशेषता थीधीरे-धीरे रहाता के श्रद्धालु जन उससे प्रभावित होकर उसके पास आने लगेउसके पास आने वाला व्यक्ति उसका बड़ा सम्मान करता थापूरे रहाता में उसकी वाहवाही होने लगी थीधीरे-धीरे उसने रहाता के लोगों का विश्वास प्राप्त कर बहुत सारी आर्थिक मदद भी हासिल कर ली थी|


इसके बाद उसने हनुमान मंदिर के पास में ही ईदगाह बनाने का निर्णय लियालेकिन इस विषय को लेकर वहां के लोगों के साथ उसका विवाद हो गयाविवाद बढ़ जाने पर उसे रहाता छोड़कर शिरडी में शरण लेनी पड़ीशिरडी में वह साईं बाबा के साथ मस्जिद में रहने लगावहां पर भी उसने अपनी मीठी बोली के बल पर लोगों का दिल जीत लिया|साईं बाबा उसे पूरी तरह से पहचानते थेमगर उसे टोकते न थेसाईं बाबा के कुछ न कहने पर बाद में उस फकीर की इतनी हिम्मत बढ़ गयी कि वह लोगों को यह बताने लगा कि साईं बाबा उसके शिष्य हैंएक दिन उसने साईं बाबा से कहा - "तू मेरा चेला बन जा|" साईं बाबा ने कोई ऐतराज नहीं किया और उसी पल 'हांकर दीवह फकीर उन्हें लेकर रहाता चला गयागुरु (जौहर अली) अपने शिष्य ( साईं बाबा) की योग्यता को नहीं जानता थालेकिन शिष्य (साईं बाबा) गुरु (जौहर अली) के अवगुणों को भली-भाँति जानते थेइतना सब कुछ जानते हुए भी साईं बाबा ने कभी भी जौहर अली का अपमान नहीं किया और पूरी निष्ठा भाव से अपने गुरु के प्रति कर्त्तव्य का निर्वाह करते हुएगुरु की तरह सेवा कीउसकी प्रत्येक बात सर-आँखों पर रखी और तो और साईं बाबा ने उसके यहां पानी तक भी भरा|लेकिन जब कभी साईं बाबा की इच्छा होती तो वह अपने गुरु जौहर अली के साथ शिरडी में भी आया करते थेपर उनका रहना-सहना रहाता में ही थालेकिन बाबा के भक्तों को उनका रहाता में रहना अच्छा नहीं लगता थाउन्हें अपने साईं बाबा वापस चाहिये थेइसलिये सारे भक्त मिलकर बाबा को रहाता से वापस शिरडी लाने के लिए गएवहां पर भक्तों की साईं बाबा से ईदगाह के पास मुलाकात हुईबाबा के भक्तों ने उन्हें अपने रहाता आने का कारण बताया तो बाबा ने उन्हें फकीर के गुस्से के बारे में समझाते हुए वापस भेजना चाहापरंतु उन लोगों ने वापस जाने से इंकार कर दियाउनके बीच अभी बातचीत चल ही रही थी कि तभी वह फकीर वहां आ पहुंचा और जब उसे यह पता चला कि वह लोग उसके शिष्य (साईं बाबा) को लेने आये हैं तो वह गुस्से में लाल-पीला हो गया|वह फकीर बोला - "तुम इस बच्चे को ले जाना चाहते होयह नहीं जायेगा|" फिर दोनों पक्षों में काफी वाद-विवाद होने लगाअंत में लोगों की जिद्द के आगे फकीर सोच में पड़ गया और अंत में यह निर्णय हुआ कि गुरु-शिष्य दोनों ही शिरडी में रहेंआखिर दोनों शिरडी वापस आकर रहने लगे|इस तरह उन्हें बहुत दिन शिरडी में रहते हुए बीत गएतब एक दिन शिरडी के एक महात्मा देवीदास और जौहर अली दोनों में धर्म-चर्चा होने लगीतो उसमें अनेक दोष पाए गयेमहात्मा देवीदास साईं बाबा के चाँद पाटिल के साले के लड़के की बारात में शिरडी आने से 12 वर्ष पूर्व शिरडी आये थेउस समय उनकी उम्र लगभग 10-12 वर्ष की रही होगी और वह हनुमान मंदिर में रहते थेवे सुंदर और बुद्धिमान थेयानी वे ज्ञान और त्याग की साक्षात् मूर्ति थेतात्यापाटिलकाशीनाथ तथा अन्य कई लोग उन्हें गुरु की तरह मानते और उनका सम्मान करते थेतब हारने के डर से जौहर अली रात में ही भागकर बैजापुर गांव में चला गयाफिर कई वर्षों के बाद एक दिन वह शिरडी आया और साईं बाबा के चरणों में गिरकर रोकर माफी मांगने लगाउसने साईं बाबा की महत्ता को दिल से स्वीकार कर लियाउसका भ्रम मिट चुका था कि वह स्वयं गुरु है और साईं बाबा उसके शिष्य|उसकी सच्ची भावना जानकर साईं बाबा ने उसे समझाया और फिर आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग बताया|

कल चर्चा करेंगे..रोहिला के प्रति प्रेम 

ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं

बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें । 

Friday, 2 October 2020

श्री साईं लीलाएं - कुश्ती के बाद बाबा में बदलाव

ॐ सांई राम



परसों हमने पढ़ा था.. संकटहरण श्री साईं 

श्री साईं लीलाएं

कुश्ती के बाद बाबा में बदलाव
अपने शुरूआती जीवन में साईं बाबा भी पहलवान की तरह रहते थेशिरडी में मोहिद्दीन तंबोली नाम का एक पहलवान रहा करता थाबाबा से एक बार किसी बात पर कहा-सुनी हो गईजिसके फलस्वरूप उसने बाबा को कुश्ती लड़ने कि चुनौती दे डालीबाबा अंतर्मुखी थेफिर भी उन्होंने उसकी चुनौती को स्वीकार कर लिया|


फिर दोनों में बहुत देर तक कुश्ती होती रहीआखिर में बाबा उससे कुश्ती में हार गयेमोहिद्दीन से कुश्ती में हार जाने के बाद बाबा के रहन-सहन और पहनावे में अचानक बदलाव आ गयाअब बाबा कफनी पहना करतेलंगोट बांधते और सिर पर सफेद कपड़ा बांधतेजिससे सिर ढंक जाएआसन व सोने के लिये बाबा टाट का एक टुकड़ा ही प्रयोग में लिया करते थेबाबा फटे-पुराने कपड़े पहनकर ही संतुष्ट रहते थेबाबा सदैव अलमस्त रहते और कपड़ाखाना इस चीजों पर उनका ध्यान तक नहीं होता|


साईं बाबा सदैव यही कहते थे - "गरीबी अव्वल बादशाहीअमीरी से लाख सवाईगरीबों का अल्लाह भाई|' इसका अर्थ यह है कि अमीरी से बड़ी बादशाहत गरीबी में हैइसका कारण यह है कि गरीब का भाईबंधु या सहायक अल्लाहईश्वर हैयदि इस पर विचार किया जाये तो अमीर को अनेकों तरह की चिंताएं हर समय घेरे रहती हैंवह सदैव उन्हीं में पड़ा रहता हैलेकिन गरीब व्यक्ति सदैव ईश्वर को ही याद करता रहता हैवैसे भी अभावों में हीगरीबी में ही ईश्वर याद आता है अन्यथा कोई ईश्वर को याद नहीं करताजो व्यक्ति ईश्वर की भक्ति में लीन रहता हैवह निश्चिंत रहता हैनिश्चिंत रहने वाला व्यक्ति ही वास्तव में बादशाह हैइसीलिए शायद बाबा ऐसा उच्चारण किया करते थे|कुश्ती का शौक पुणे तांबे के वैश्य संत गंगागीर को भी थावे भी अक्सर शिरडी आते-जाते रहते थेएक समय जब वह कुश्ती लड़ रहे थे तब अचानक ही उनके मन में कुश्ती त्याग देने का भाव पैदा हो गयाफिर एक अवसर अपर उन्हें ऐसा महसूस हुआजैसे कोई उनसे कह रहा हो कि भगवान के साथ खेलते हुए शरीर को त्याग देने में ही इस जीवन की सार्थकता है|वस्तुत: यह उनकी अन्तर्रात्मा की आवाज थीजिसका अर्थ यह था कि परमात्मा के श्रीचरणों में लगन लगाओइस अन्तर्रात्मा की आवाज को सुनने के बाद संत गंगागीर के मन में इस संसार से पूरी तरह वैराग्य पैदा हो गया और वे पूर्णरूपेण आध्यात्म की ओर प्रवृत्त हो गए|इसके बाद में उन्होंने पुणे तांबे के नजदीक ही एक मठ बनाया और उसमें अपने शिष्यों के साथ रहने लगेवहीं पर रहकर उन्होंने मोक्ष की प्राप्ति की|मोहिद्दीन से कुश्ती में हार जान के बाद साईं बाबा में भारी परिवर्तन पैदा हो गया थाबाबा अब पूरी तरह से अंतर्मुखी हो गये थेबाबा अब न तो किसी से मिलते-जुलते थे और न ही किसी से बात किया करते थेयदि कोई उनके पास अपनी समस्या आदि लेकर जाता था तो बाबा उसका मार्गदर्शन अवश्य करते थेउनके श्रीमुख से परमार्थ विचार ही निकलते और उन अमृत बोलों को सुनने वाले धन्य हो जाते|कुश्ती की घटना के बाद बाबा की जीवनचर्या भी पूरी तरह से बदल गयी थीअब बाबा का ठिकाना दिन में नीम के पेड़ के नीचे होता जहां पर वे बैठकर अपने स्वरूप (आत्मा) में लीन रहतेइच्छा होने पर गांव की मेड़ पर नाले के किनारे एक बबूल के पेड़ की छाया में बैठ जाते थेसंध्या समय बाबा वायु सेवन के लिए स्वेच्छानुसार विचरण करते थे|इच्छा होने पर बाबा कभी-कभार नीम गांव भी चले जाया करते थेवहां के बाबा साहब डेंगले से साईं बाबा को विशेष लगाव थाबाबा साहब डेंगले के छोटे भाई नाना साहब डेंगले थेउन्होंने दो विवाह किएफिर भी वे संतान सुख से वंचित थेएक बार नाना साहब को उनके बड़े भाई बाबा साहब ने शिरडी जाकर साईं बाबा के दर्शन कर उनसे आशीर्वाद लेने को कहानाना साहब ने अपने बड़े भाई की आज्ञा का पालन करते हुए शिरडी जाकर साईं बाबा के दर्शन किएसाईं बाबा के दर्शन और आशीर्वाद के परिणामस्वरूप एक निश्चित अवधि के बाद नाना साहब को पुत्र की प्राप्ति हो गई|ऐसे ही लोगों की मुरादें पूरी होती रहीं और साईं बाबा की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैलती चली गयीअब चारों ओर से अधिक संख्या में लोग बाबा के दर्शन करने के लिए रोजाना शिरडी आने लगेबाबा अपने किसी भी भक्त को निराश नहीं करते और अपना आशीर्वाद देकर उसकी मनोकामना को पूर्ण करते|द्वारिकामाई मस्जिद में साईं बाबा को उनके भक्त दिनभर घेरकर बैठे रहते थेरात को बाबा टूटी-फूटी हुई मस्जिद में सोया करते थेबाबा का रहने का ठिकाना द्वारिकामाई मस्जिद थावह दो हिस्सों में टूटी-फूटी इमारत थीबाबा वहीं रहतेसोते और वहीं बैठक लगातेबाबा के चिलमतम्बाकूटमरेललम्बी कफनीसिर के चारों ओर लपेटने के लिए एक सफेद कपड़ा और सटका थाकुल जमा सामन था जो बाबा सदैव अपने पास रखा करते थेबाबा अपने सिर पर उस सफेद कपड़े को कुछ इस ढंग से बांधा करते थे कि कपड़े का एक किनारा बाएं कान के ऊपर से होकर पीठ पर गिरता हुआ ऐसा लगता था जैसे कि बाबा ने बालों का जूड़ा बना रखा होबाबा उस सिर पर बांधने वाले कपड़े को कई-कई सप्ताह तक नहीं धोया करते थे|साईं बाबा सदैव नंगे पैरों ही रहा करते थेउन्होंने अपने पैरों में कभी भी जूते-चप्पल या खड़ाऊँ आदि पहनने का उपयोग नहीं किया थाआसन पर बैठने के नाम पर बाबा के पास टाट का एक टुकड़ा थाजिसे वे दिन के समय अपने बैठने के काम में लिया करते थेसर्दी से बचने के लिए एक धूनी हर समय जलती रहती थी और आज भी वह धूनी मौजूद हैबाबा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके धूनी तापते थेधूनी में वे छोटे-छोटे लकड़ियों के टुकड़े डालते रहते थेऐसा करके बाबा अपनी अहंइच्छा और आसक्तियों की आहुति दिया करते थेकभी-कभी लकड़ी के गट्ठर पर हाथ रखे बाबा धूनी को टकटकी लगाये देखते रहते थेबाबा की जुबान पर सदैव 'अल्लाह मालिकका उच्चारण रहता था|बाबा के पास हर समय भक्तों का तांता लगा रहता थाउस मस्जिद की पुरानी हालत और स्थानाभाव को देखते हुए बाबा के शिष्यों ने सन् 1912 में उसे मरम्मत करके नया रंग-रूप प्रदान कर दियाबाबा जब कभी भाव-विभोर हो जाया करते थे तो वे तब अपने पैरों में घुंघरूं बांधकर काफी देर तक नाचते-गाते रहेत थेयह दृश्य बहुत खूबसूरत होता था|

कल चर्चा करेंगे..जब बाबा जौहर अली के चेले बने 

===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Thursday, 1 October 2020

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 23

 ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं
हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है |

हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है|

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 23
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योग और प्याज, शामा का सर्पविष उतारना, विषूचिका (हैजी) निवारणार्थ नियमों का उल्लंघन, गुरु भक्ति की कठिन परीक्षा ।
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प्रस्तावना
वस्तुतः मनुष्य त्रिगुणातीत (तीन गुण अर्थात् सत्व-रज-तम) है तथा माया के प्रभाव से ही उसे अपने सत्-चित-आनंद स्वरुप की विस्मृति हो, ऐसा भासित होने लगता है कि मैं शरीर हूँ । दैहिक बुद्घि के आवरण के कारण ही वह ऐसी धारणा बना लेता है कि मैं ही कर्ता और उपभोग करने वाला हूँ और इस प्रकार वह अपने को अनेक कष्टों में स्वयं फँसा लेता है । फिर उसे उससे छुटकारे का कोई मार्ग नहीं सूझता । मुक्ति का एकमात्र उपाय है – गुरु के श्री चरणों में अचल प्रेम और भक्ति । सबसे महान् अभिनयकर्ता भगवान् साई ने भक्तों को पूर्ण आनन्द पहुँचाकर उन्हें निज-स्वरुप में परिवर्तित कर लिया है । उपयुक्त कारणों से हम साईबाबा को ईश्वर का ही अवतार मानते है । परन्तु वे सदा यही कहा करते थे कि मैं तो ईश्वर का दास हूँ । अवतार होते हुए भी मनुष्य को किस प्रकारा आचरण करना चाहिये तथा अपने वर्ण के कर्तव्यों को किस प्रकार निबाहना चाहिए, इसका उदाहरण उन्होंने लोगो के समक्ष प्रस्तुत किया । उन्होंने किसी प्रकार भी दूसरे से स्पर्द्घा नहीं की और न ही किसी को कोई हानि ही पहुँचाई । जो सब जड़ और चेतन पदार्थों में ईश्वर के दर्शन करता हो, उसको विनयशीलता ही उपयुक्त थी । उन्होंने किसी की उपेक्षा या अनादर नहीं किया । वे सब प्राणियों में भगवद्दर्शन करते थे । उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि मैं अनल हक्क (सोडह्मम) हूँ । वे सदा यही कहते थे कि मैं तो यादे हक्क (दासोडहम्) हूँ । अल्ला मालिक सदा उनके होठोंपर था । हम अन्य संतों से परिचित नहीं है और नन हमें यही ज्ञात है कि वे किस प्रकार आचरण किया करते है अथवा उनकी दिनचर्या इत्यादि क्या है । ईश-कृपा से केवल हमें इतना ही ज्ञात है कि वे अज्ञान और बदृ जीवों के निमित्त स्वयं अवतीर्ण होते है । शुभ कर्मों के परिणामस्वरुप ही हममें सन्तों की कथायें और लीलाये श्रवण करने की इच्छा उत्पन्न होती है, अन्यथा नहीं । अब हम मुख्य कथा पर आते है ।

योग और प्याज
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एक समय कोई एक योगाभ्यासी नानासाहेब चाँदोरकर के साथ शिरडी आया । उसने पातंजलि योगसूत्र तथा योगशास्त्र के अन्य ग्रन्थों का विशेष अध्ययन किया था, परन्तु वह व्यावहारिक अनुभव से वंचित था । मन एकाग्र न हो सकने के कारण वह थोड़े समय के लिये भी समाधि न लगा सकता था । यदि साईबाबा की कृपा प्राप्त हो जाय तो उनसे अधिक समय तक समाधि अवस्था प्राप्त करने की विधि ज्ञात हो जायेगी, इस विचार से वह शिरडी आया और जब मसजिद में पहुँचा तो साईबाबा को प्याजसहित रोटी खाते देख उसे ऐसा विचार आया कि यह कच्च प्याजसहित सूखी रोटी खाने वाला व्यक्ति मेरी कठिनाइयों को किस प्रकार हल कर सकेगा । साईबाबा अन्तर्ज्ञान से उसका विचार जानकर तुरन्त नानासाहेब से बोले कि ओ नाना । जिसमें प्याज हजम करने की श्क्ति है, उसको ही उसे खाना चाहिए, अन्य को नहीं । इन शब्दों से अत्यन्त विस्मित होकर योगी ने साईचरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण कर दिया । शुदृ और निष्कपट भाव से अपनी कठिनाइयँ बाबा के समक्ष प्रस्तुत करके उनसे उनका हल प्राप्त किया और इस प्रकार संतुष्ट और सुखी होकर बाबा के दर्शन और उदी लेकर वह शिरडी से चला गया ।

शामा की सर्पदंश से मुक्ति
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कथा प्रारंभ करने से पूर्व हेमाडपंत लिखते है कि जीव की तुलना पालतू तोते से की जा सकती है, क्योंकि दोनों ही बदृ है । एक शरीर में तो दूसरा पिंजड़े में । दोनों ही अपनी बद्घावस्था को श्रेयस्कर समझते है । परन्तु यदि हरिकृपा से उन्हें कोई उत्तम गुरु मिल जाय और वह उनके ज्ञानचक्षु खोलकर उन्हें बंधन मुक्त कर दे तो उनके जीवन का स्तर उच्च हो जाता है, जिसकी तुलना में पूर्व संकीर्ण स्थिति सर्वथा तुच्छ ही थी ।
गत अध्यया में किस प्रकार श्री. मिरीकर पर आने वाले संकट की पूर्वसूचना देकर उन्हें उससे बचाया गया, इसका वर्णन किया जा चुका है । पाठकवृन्द अब उसी प्रकार की और एक कथा श्रवण करें ।
एक बार शामा को विषधर सर्प ने उसके हाथ की उँगली में डस लिया । समस्त शरीर में विष का प्रसार हो जाने के कारण वे अत्यन्त कष्ट का अनुभव करके क्रंदन करने लगे कि अब मेरा अन्तकाल समीप आ गया है । उनके इष्ट मित्र उन्हें भगवान विठोबा के पास ले जाना चाहते थे, जहाँ इस प्रकार की समस्त पीड़ाओं की योग्य चिकित्सा होती है, परन्तु शामा मसजिद की ओर ही दौड़-अपने विठोबा श्री साईबाबा के पास । जब बाबा ने उन्हें दूर से आते देखा तो वे झिड़कने और गाली देने लगे । वे क्रोधित होकर बोले – अरे ओ नादान कृतघ्न बम्मन । ऊपर मत चढ़ । सावधान, यदि ऐसा किया तो । और फिर गर्जना करते हुए बोले, हटो, दूर हट, नीचे उतर । श्री साईबाबा को इस प्रकार अत्यंत क्रोधित देख शामा उलझन में पड़ गयाऔर निराश होकर सोचने लगा कि केवल मसजिद ही तो मेरा घर है और साईबाबा मात्र किसकी शरण में जाऊँ । उसने अपने जीवन की आशा ही छोड़ दी और वहीं शान्तीपूर्वक बैठ गया । थोड़े समय के पश्चात जब बाबा पूर्वव्त शांत हुए तो शामा ऊपर आकर उनके समीप बैठ गया । तब बाबा बोले, डरो नहीं । तिल मात्र भी चिन्ता मत करो । दयालु फकीर तुम्हारी अवश्य रक्षा करेगा । घर जाकर शान्ति से बैठो और बाहर न निकलो । मुझपर विश्वास कर निर्भय होकर चिन्ता त्याग दो । उन्हें घर भिजवाने के पश्चात ही पुछे से बाबा ने तात्या पाटील और काकासाहेब दीक्षित के द्घारा यह कहला भेजा कि वह इच्छानुसार भोजन करे, घर में टहलते रहे, लेटें नही और न शयन करें । कहने की आवश्यकता नहीं कि आदेशों का अक्षरशः पालन किया गया और थोड़े समय में ही वे पूर्ण स्वस्थ हो गये । इस विषय में केवल यही बात स्मरण योग्य है कि बाबा के शब्द (पंच अक्षरीय मंत्र-हटो, दूर हट, नीचे उतर) शामा को लक्ष्य करके नहीं कहे गये थे, जैसा कि ऊपर से स्पष्ट प्रतीत होता है, वरन् उस साँप और उसके विष के लिये ही यह आज्ञा थी (अर्थात् शामा के शरीर में विष न फैलाने की आज्ञा थी) अन्य मंत्र शास्त्रों के विशेषज्ञों की तरह बाबा ने किसी मंत्र या मंत्रोक्त चावल या जल आदि का प्रयोग नहीं किया ।
इस कथा और इसी प्रकार की अन्य अथाओं को सुनकर साईबाबा के चरणों में यह दृढ़ विश्वास हो जायगा कि यदि मायायुक्त संसार को पार करना हो तो केवल श्री साईचरणों का हृदय में ध्यान करो ।

हैजा महामारी
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एक बार शिरडी विषूचिका के प्रकोप से दहल उठी और ग्रामवासी भयभीत हो गये । उनका पारस्परिक सम्पर्क अन्य गाँव के लोगों से प्रायः समाप्त सा हो गया । तब गाँव के पंचों ने एकत्रित होकर दो आदेश प्रसारित किये । प्रथम-लकड़ी की एक भी गाड़ी गाँव में न आने दी जाय । द्घितीय – कोई बकरे की बलि न दे । इन आदेशों का उल्लंघन करने वाले को मुखिया और पंचों द्घारा दंड दिया जायगा । बाबा तो जानते ही थे कि यह सब केवल अंधविश्वास ही है और इसी कारण उन्होंने इन हैजी के आदेशों की कोई चिंता न की । जब ये आदेशलागू थे, तभी एक लकड़ी की गाड़ी गाँव में आयी । सबको ज्ञात था कि गाँव में लगड़ी का अधिक अभाव है, फिर भीलोग उस गाड़वाले को भगाने लगे । यह समाचार कहीं बाबा के पास तक पहुँच गया । तब वे स्वयं वहाँ आये और गाड़ी वाले से गाड़ी मसजिद में ले चलने को कहा । बाबा के विरुदृ कोई चूँ—चपाट तक भीन कर सका । यथार्थ में उन्हें धूनी के लिए लकड़ियों की अत्यन्त आवश्यकता थी और इसीलिए उन्होंने वह गाड़ी मोल ले ली । एक महान अग्निहोत्री की तरह उन्होंने जीवन भर धूनी को चैतन्य रखा । बाबा की धूनी दिनरात प्रज्वलित रहती थी और इसलिए वे लकड़ियाँ एकत्रित कर रखते थे । बाबा का घर अर्थात् मसजिद सबके लिए सदैव खुली थी । उसमें किसी ताले चाभी की आवश्यकता न थी । गाँव के गरीब आदमी अपने उपयोग के लिए उसमें से लकडियाँ निकाल भी ले जाया करते थे, परन्तु बाबा ने इस पर कभी कोई आपत्ति न की । बाबा तो सम्पूर्ण विश्व को ईश्वर से ओतप्रोत देखते थे, इसलिये उनमें किसी के प्रति घृणा या शत्रुता की भावना न थी । पूर्ण विरक्त होते हुए भी उन्होंने एक साधारण गृहस्थ का-सा उदाहरण लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया ।


गुरुभक्ति की कठिन परीक्षा
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अब देखिये, दूसरे आदेश की भी बाबा ने क्या दुर्दशा की । वह आदेश लागू रहते समय कोई मसजिद में एक बकरा बलि देने को लाया । वह अत्यन्त दुर्बल, बूढ़ा और मरने ही वाला था । उस समय मालेगाँव के फकीर पीरमोहम्मद उर्फ बड़े बाबा भी उनके समीप ही खड़े थे । बाबा ने उन्हें बकरा काटकर बलि चढ़ाने को कहा । श्री साईतबाबा बड़े बाबा का अधिक आदर किया करते थे । इस कारण वे सदैव उनके दाहिनीओर ही बैठा करते थे । सबसे पहने वे ही चिलम पीते और फिर बाबा को देते, बाद में अन्य भक्तों को । जब दोपहर को भोजन परोस दिया जाता, तब बाबा बड़े बाबा को आदरपूर्वक बुलाकर अपने दाहिनी ओर बिठाते और तब सब भोजन करते । बाबा के पास जो दक्षिणा एकत्रित होती, उसमेंसे वे 50 रु. प्रतिदिन बड़े बाबा को दे दिया करते थे । जब वे लौटते तो बाबा भी उनके साथ सौ कदम जाया करते थे । उनका इतना आदर होते हुए भी जब बाबा ने उनसे बकरा काटने को कहा तो उन्होंने अस्वीकार कर स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि बलि चढ़ाना व्यर्थ ही है । तब बाबा ने शामा से बकरे की बलि के लिये कहा । वे राधाकृष्ण माई के घर जाकर एक चाकू ले आये और उसे बाबा के सामने रख दिया । राधाकृष्माई को जब कारण का पता चला तो उन्होंने चाकू वापस मँगवालिया । अब शामा दूसरा चाकू लाने के लिये गये, किन्तु बड़ी देर तक मसजिद में न लौटे । तब काकासाहेब दीक्षित की बारी आई । वह सोना सच्चा तो था, परन्तु उसको कसौटी पर कसना भी अत्यन्त आवश्यक था । बाबा ने उनसे चाकू लाकर बकरा काटने को कहा । वे साठेवाड़े से एक चाकू ले आये और बाबा की आज्ञा मिलते ही काटने को तैयार हो गये । उन्होंने पवित्र ब्राहमण-वंश में जन्म लिया था और अपने जीवन में वे बलिकृत्य जानते ही न थे । यघपि हिंसा करना निंदनीय है, फिर भी वे बकरा काटने के लिये उघत हो गये । सब लोगों को आश्चर्य था कि बड़े बाबा एक यवन होते हुए भी बकरा काटने को सहमत नहीं हैं और यह एक सनातन ब्राहमण बकरे की बलि देने की तैयारी कर रहा है । उन्होंने अपनी धोती ऊपर चढ़ा फेंटा कस लिया और चाकू लेकर हाथ ऊपर उठाकर बाबा की अन्तिम आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगे । बाबा बोले, अब विचार क्या कर रहे हो । ठीक है, मारो । जब उनका हाथ नीचे आने ही वाला था, तब बाबा बोले ठहरो, तुम कितने दुष्ट हो । ब्राहमण होकर तुम बके की बलि दे रहे हो । काकासाहेब चाकू नीचे रख कर बाबा से बोले आपकी आज्ञा ही हमारे लिये सब कुछ है, हमें अन्य आदेशों से क्या । हम तो केवल आपका ही सदैव स्मरण तथा ध्यान करते है और दिन रात आपकी आज्ञा का ही पालन किया करते है । हमें यह विचार करने की आवश्यकता नहीं कि बकरे को मारना उचित है या अनुचित । और न हम इसका कारण ही जानना चाहते है । हमारा कर्तव्य और धर्म तो निःसंकोच होकर गुरु की आज्ञा का पूर्णतः पालन करने में है । तब बाबा ने काकासाहेब से कहा कि मैं स्वयं ही बलि चढ़ाने का कार्य करुँगा । तब ऐसा निश्चित हुआ कि तकिये के पास जहाँ बहुत से फकीर बैठते है, वहाँ चलकर इसकी बलि देनी चाहिए । जब बकरा वहाँ ले जाया जा रहा था, तभी रास्ते में गिर कर वह मर गया ।
भक्तों के प्रकार का वर्णन कर श्री. हेमाडपंत यह अध्याय समाप्त करते है । भक्त तीन प्रकार के है

1. उत्तम

2. मध्यम और

3. साधारण

प्रथम श्रेणी के भक्त वे है, जो अपने गुरु की इच्छा पहले से ही जानकर अपना कर्तव्य मान कर सेवा करते है । द्घितीय श्रेणी के भक्त वे है, जो गुरु की आज्ञा मिलते ही उसका तुरन्त पालन करते है । तृतीय श्रेणी के भक्त वे है, जो गुरु की आज्ञा सदैव टालते हुए पग-पग पर त्रुटि किया करते है । भक्तगण यदि अपनी जागृत बुद्घि और धैर्य धारण कर दृढ़ विश्वास स्थिर करें तो निःसन्देह उनका आध्यात्मिक ध्येय उनसे अधिक दूर नहीं है । श्वासोच्ध्वास का नियंत्रण, हठ योग या अन्य कठिन साधनाओं की कोई आवश्यकता नहीं है । जब शिष्य में उपयुक्त गुणों का विकास हो जाता है और जब अग्रिम उपदेशों के लिये भूमिका तैयार हो जाती है, तभी गुरु स्वयं प्रगट होकर उसे पूर्णता की ओर ले जाते है । अगले अध्याय में बाबा के मनोरंजक हास्य-विनोद के सम्बन्ध में चर्चा करेंगे


।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 30 September 2020

श्री साईं लीलाएं - संकटहरण श्री साईं

ॐ सांई राम


कल हमने पढ़ा था.. ऊदी के चमत्कार से पुत्र-प्राप्ति

श्री साईं लीलाएं

संकटहरण श्री साईं
शाम का समय था
उस समय रावजी के दरवाजे पर धूमधाम थीसारा घर तोरन और बंदनवारों से खूब अच्छी तरह से सजा हुआ थाबारात का स्वागत करने के लिए उनके दरवाजे पर सगे-संबंधी और गांव के सभी प्रतिष्ठित व्यक्ति उपस्थित थेआज रावजी की बेटी का विवाह थाबारात आने ही वाली थी|

कुछ देर बाद ढोल-बाजों की आवाज सुनायी देने लगीजो बारात के आगमन की सूचक थी|

"
बारात आ गई|" भीड़ में शोर मचा|


थोड़ी देर बाद बारात रावजी के दरवाजे पर आ गयीरावजी ने सगे-सम्बंधियों और सहयोगियों के साथ बारात का गर्मजोशी से स्वागत कियाबारातियों का पानफूलइत्रमालाओं आदि से स्वागत-सत्कार किया गयाफिर बारातियों को भोजन कराया गयासभी ने रावजी के स्वागत और भोजन की प्रशंसा कीफेरे पड़ने का समय हो गया|



"वर को भांवरों के लिए भेजिये|" वर के पिता से रावजी ने निवेदन किया|

"वर भेज दूं ! पहलेदहेज दिखाओभाँवरें तो दहेज के बाद ही पड़ेंगी|" वर के पिता ने कहा|
रावजी बोले - " तो फिर चलियेपहले दहेज देख लीजिए|" रावजी के सगे-सम्बंधियों ने वर के पिता की बात को मान लियावर का पिता अपने सगे-सम्बंधियों के साथ रावजी के आँगन में आयाआँगन में एक ओर चारपाइयों पर दहेज में दी जाने वाली समस्त चीजें रखी हुई थीं|
वर के पिता ने एक-एक करके दहेज की सारी चीजें देखींफिर नाक-भौंह सिकोड़कर बोला - "बसयही है दहेजऐसा दहेज तो हमारे यहां नाईकहारों जैसी छोटी जाति वालों की लड़कों की शादी में आता है|रावजीआप दहेज दे रहे हैं या मेरे और अपने रिश्तेदारों तथा गांव वालों के बीच मेरी बेइज्जती कर रहे होमैं यह शादी कभी नहीं रोने दूंगा|"
रावजी के पैरों तले से धरती खिसक गयीउन्हें ऐसा लगा जैसे आकाश टूटकर उनके सिर पर आ गिरा होयदि लड़की की शादी नहीं हुई और बारात दरवाजे से लौट गयी तो वह समाज में किसी को भी मुंह न दिखा सकेंगेलड़की के लिए दूसरा दूल्हा मिलना असंभव हो जाएगाकोई भी इस बात को मानने के लिए तैयार न होगा कि दहेज का लालची दूल्हे का पिता दहेज के लालच में बारात वापस ले गयासब यही कहेंगे कि लड़की में ही कोई कमी थीतभी तो बारात आकर दरवाजे से लौट गयी|
रावजी ने वर के पिता के पैर पकड़ लिये और अपनी पगड़ी उतारकर उसके पैरों पर डालकर गिड़गिड़ाते हुए बोले - "मुझ पर दया कीजिए समधी जी ! यदि आप बारात वापस ले गए तो मैं जीते-जी मर जाऊंगामेरी बेटी की जिंदगी बरबाद हो जायेगीवह जीते-जी मर जायेगीमैं बहुत गरीब आदमी हूंजो कुछ भी दहेज अपनी हैसियत के मुताबिक जुटा सकता थावह मैंने जुटाया हैयदि कुछ कमी रह गयी है तो मैं उसे पूरा कर दूंगापरइसके लिए मुझे थोड़ा-सा समय दीजिए|"
वर के पिता ने गुस्से में भरकर कहा - "यदि दहेज देने की हैसियत नहीं थी तो अपनी बेटी की शादी किसी भिखमंगे के साथ कर देतेमेरा ही लड़का मिला था बेवकूफ बनाने कोअभी बिगड़ा ही क्या हैबेटी अभी अपने बाप के घर हैमिल ही जायेगा कोई न कोई भिखमंगा|"
उस अहंकारी और दहेज के लोभी ने रावजी की पगड़ी उछाल दी और बारातियों से बोला - "चलोमुझे नहीं करनी अपने बेटे की शादी ऐसी लड़की से जिसका बाप दहेज तक भी न जुटा सके|"
रावजी ने उसकी बड़ी मिन्नतें कींपर वह दुष्ट न माना और बारात वापस चली गयी|

बारात के वापस जाने से रावजी बड़ी बुरी तरह से टूट गयेवह दोनों हाथों से अपना सिर पकड़कर रह गयेउनकी सारी मेहनत पर पानी फिर गयाअपनी बेटी के भविष्य के बारे में सोच-सोचकर वह बुरी तरह से परेशान हो गयेवह गांव शिरडी से थोड़ी ही दूर था|
रावजी की आँखों से आँसू रुकने का नाम ही न ले रहे थेसारे गांव की सहानुभूति उनके साथ थीपर रावजी का मन बड़ा व्याकुल थाबारात वापस लौट जाने के कारण वह पूरी तरह से टूट गये थेवह खोये-खोये उदास-से रहने लगे थे|
बारात को वापस लौटे कई दिन बीत गए थे|
उन्होंने घर से निकलना बिल्कुल बंद कर दिया थावह सारे दिन घर में ही पड़े रहते और अपनी बेवसी पर आँसू बहाते रहते थेइस घटना का समाचार साईं बाबा तक नहीं पहुंचा थाउनका गांव शिरडी से थोड़ी ही दूरी पर थारोजाना ही उस गांव के लोग शिरडी आते-जाते थेबारात का बिना दुल्हन के वापस लौट जाना कोई मामूली बात न थीयह घटना सर्वत्र चर्चा का विषय बन गयी थी|
आखिर एक दिन यह बात साईं बाबा तक भी पहुंच ही गयी|

"रावजी इस अपमान से बहुत दु:खी हैंकहीं आत्महत्या न कर बैठें|" साईं बाबा को समाचार सुनाने के बाद रावजी का पड़ोसी चिंतित हो उठा|
एकाएक साईं बाबा के शांत चेहने पर तनाव पैदा हो गयाउनकी करुणामयी आँखें दहकते अंगारों में परिवर्तित हो गयीक्रोध की अधिकता से उनका शरीर कांपने लगाउनका यह शारीरिक परिवर्तन देखकर वहां उपस्थित शिष्य वह भक्तजन किसी अनिष्ट की आशंका से घबरा गएसाईं बाबा के शिष्य और भक्त उनका यह रूप पहली बार देख रहे थे|

अगले दिन रावजी के समधी के गांव का एक व्यक्ति रावजी के पास आयावह साईं बाबा का भक्त था|

"रावजीभगवान के घर देर तो हैपर अंधेर नहींतुम्हारे समधी ने जिस पैर से तुम्हारी पगड़ी को ठोकर मारकर उछाला थाउसके उसी पैर को लकवा मार गया हैउसके शरीर का दायां भाग लकवाग्रस्त हो गया है|"
यह सुनकर रावजी ने दु:खी स्वर में कहा -

"कितना कड़ा दंड मिला है उन्हेंमौका मिलते ही उन्हें एक-दो दिन में देखने जाऊंगा|"
रावजी को मिला यह समाचार एकदम ठीक थारावजी के समधी की हालात बहुत खराब थीउनके आधे शरीर को लकवा मार गया थावह मरणासन्न-सा हो गयाउसका जीना-न-जीना एक बराबर हो गयालाला का आधा दायां शरीर लकवे से बेकार हो गया थावह अपने बिस्तर पर पड़े आँसू बहाते रहतेउनके इलाज पर रुपया पानी की तरह बहाया जा रहा थापर रोग कम होने की जगह दिन-प्रतिदिन बिगड़ता ही जा रहा था|
उनके एक रिश्तेदार ने कहा - "लालाजी ! आप साईं बाबा के पास जाकर उनकी धूनी की भभूति क्यों नहीं मांग लेतेबैलगाड़ी में लेटे-लेटे चले जाइएबाबा की धूनी की भभूति से तो असाध्य रोग भी नष्ट हो जाते हैं|"
लाला इस बात को पहले भी कई व्यक्तियों से सुन चुके थे कि बाबा कि भभूति से हजारों रोगियों को नया जीवन मिल चुका हैभभूति लगाते ही रोग छूमंतर हो जाते हैं|
अगले दिन लाला के लड़के ने बैलगाड़ी जुतवाई और उसमें मोटे-मोटे गद्दे बिछाकर उन्हें आराम से लिटा दियालाला की बैलगाड़ी शिरडी में द्वारिकामाई मस्जिद के सामने आकर रुक गयी|
लड़के ने अपने साथ आये आदमियों की सहायता से लाला को बैलगाड़ी से नीचे उतारा और गोदी में उठाकर मस्जिद की ओर चल दिया|
साईं बाबा सामने ही चबूतरे पर बैठे हुए थेलाला को देखते ही वे एकदम से आगबबूला हो उठे और अत्यंत क्रोध से कांपते स्वर में बोले - "खबरदार लाला ! जो मस्जिद के अंदर पैर रखातेरे जैसे पापियों का यहां कोई काम नहीं हैतुरंत चला जावरना सर्वनाश कर दूंगा|"
दहशत के मारे लाला थर-थर कांपने लगाउनकी आँखों से आँसू बहने लगेबेटे ने उन्हें वापस लाकर बैलगाड़ी में लिटा दिया|

"पता नहीं साईं बाबा आपसे क्यों इस तरह से नाराज हैं पिताजी !"वकील और फिर कुछ सोचकर बोला - "पिताजी साईं बाबा ने आपको मस्जिद में आने से रोका हैमुझे तो नहीं रोकामैं चला जाता हूं|"

"ठीक हैतुम चले जाओ बेटा|" लाला ने दोनों हाथों से अपने आँसू पोंछते हुए कहालेकिन उसे आशा न थी|
लाला का बेटा मस्जिद के अंदर पहुंचासाईं बाबा के चरण स्पर्श करके एक और बैठ गया|
साईं बाबा बोले - "तुम्हारे बाप के रोग का कारण दुष्कर्मों का फल हैउसने अपने जीवन भर उचित-अनुचित तरीके और बेईमानी करके पैसा इकट्ठा किया हैवह पैसे के लिए कुछ भी कर सकता हैऐसे लोभीलालची और बेईमानों के लिए मेरे यहां कोई जगह नहीं है - और बेटेएक बात और याद रखोजो संतान चोरी और बेईमानी का अन्न खाती हैअपने पिता की चोरी और बेईमानी का विरोध नहीं करती हैउसे भी अपने पिता के बुरे-कर्मोंपापों दण्ड भोगना पड़ता है|"
लाला का बेटा चुपचाप सिर झुकाये अपने पिता के कर्मों के बारे में सुनता रहा|

"तुम मेरे पास आए होइसलिए मैं तुम्हें भभूति दिए देता हूंइसे अपने लोभी-लालची पिता को खिला देनायदि वह ठीक हो जाए तो उसे लेकर चले आना|"
बेटे ने साईं बाबा के चरण स्पर्श किए और फिर दर्शन करने का वायदा करके चला गया|

साईं बाबा की भभूति ने अपना चमत्कारी प्रभाव कर दिखायाचार-पांच दिन में लाला बिल्कुल ठीक हो गयाउसके लकवा पीड़ित अंग पहले की ही तरह काम करने लगे|

"साईं बाबा ने कहा था कि यदि आप ठीक हो जाएं तो आप उनके पास अवश्य जायें|" लाला ने बेटे ने अपने पिता ने कहा|

"मैं वहां जाकर क्या करूंगा बेटे ! अब तो बीमारी का नामो-निशान भी बाकी न रहाफिर बेकार में ही इतनी दूर क्यों जाऊं?"

"लेकिन साईं बाबा ने कहा था कि यदि आप उनके पास नहीं गये तो आपका रोग फिर बढ़ जाएगा और आपकी दशा और ज्यादा खराब हो जाएगी|" बेटे ने समझाते हुए कहा|
वह शिरडी जाना नहीं चाहता थाउसका मतलब निकल गया थाफिर भी बेटे के समझाते पर वह तैयार हो गयाबृहस्पतिवार का दिन थाशिरडी में प्रत्येक बृहस्पतिवार उत्सव के रूप में मनाया जाता थाजब लाला शिरडी पहुंच तो आस-पास सैंकड़ों आदमियों की भीड़ जमा थीभीड़ को देखकर लाला देखकर लाला परेशान हो गयाउस भीड़ में ज्यादातर दीन-दु:खी लोग थेउन लोगों के साथ जुलूम में शामिल होना लाला को अच्छा न लगा|वह अपनी बैलगाड़ी में ही बैठा रहाकेवल बेटे ने ही शोभायात्रा में हिस्सा लिया और पूरी श्रद्धा के साथ प्रसाद भी ग्रहण किया|
जब भीड़ कुछ छंट गयी तोउसने साईं बाबा के चरण स्पर्श किये|
बाबा ने उसके सिर पर स्नेह से हाथ फेरकर उसे आशीर्वाद दियाफिर एक चुटकी भभूति देकर बोले - "अपने पिता को तीन दिन दे देगाबचा-खुचा रोग भी नष्ट हो जाएगा|"
बेटे ने साईं बाबा के चरण स्पर्श किए और चला गया|
साईं बाबा की भभूति के प्रभाव से तीन दिन के अंदर ही लाला को ऐसा अनुभव होने लगाजैसे उसे नया जीवन प्राप्त हो गया होपिता की बीमारी के कारण बेटा उनका व्यापार देखने लगा थालाला के बेटे को व्यापार का कोई अनुभव न थाफिर भी बराबर लाभ हो रहा थालाला यह देखकर बहुत हैरान थेउन्हें यह सब कुछ एक चमत्कार जैसा लगा रहा था|
एक दिन लाला ने अपने बेटे से कहा - "एक बात समझ में नहीं आ रही बेटे ! तुम्हें व्यापर का कोई अनुभव नहीं थाडर लगता था कि तुम जैसे अनुभवहीन को व्यापार सौंपकर मैंने कोई गलती तो नहीं की हैलेकिन में देख रहा हूं कि तुम जो भी सौदा करते होउसमें बहुत लाभ होता है|"

"यह सब साईं बाबा के आशीर्वाद का ही फल है पिताजी ! उन्होंने मुझे आशीर्वाद दियासाईं बाबा तो साक्षात् भगवान के अवतार हैं|" बेटे ने कहा|

"तुम बिल्कुल ठीक कहते हो बेटा ! मुझे व्यापार करते हुए तीस वर्ष बीत चुके हैंमुझे आज तक व्यापार में कभी इतना ज्यादा लाभ नहीं हुआजितना आजकल हो रहा हैवास्तव में साईं बाबा भगवान के अवतार हैं|" अब लाला के मन में भी साईं बाबा के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो रही थी|

दूसरे दिन साईं बाबा की तस्वीरें लेकर एक फेरीवाला गली में आयालाला ने उसे बुलाकर पूछा - "ये कैसी तस्वीरें बेच रहे हो?"

"लालाजीमेरे पास तो केवल शिरडी के साईं बाबा की ही तस्वीरें हैंमैं उनके अलावा किसी और की तस्वीरें नहीं बेचता हूं|" तस्वीर बेचने वाले ने कहा|
कुछ देर तक तो लाला सोचते रहेउन्होंने सोचासाईं बाबा की भभूति से ही मेरा रोग दूर हुआ हैउन्हीं के आशीर्वाद से मेरा बेटा व्यापार में बहुत लाभ कमा रहा हैयदि एक तस्वीर ले लूंतो कोई नुकसान नहीं होगालाला ने एक तस्वीर पसंद करके ले ली|
कुछ देर पहले ही दुकान का मुनीम पिछले दिन की रोकड़ लाला को दे गया थावह अपने पलंग पर रुपये फैलाए उन्हें गिन रहे थेलाला ने उन ढेरियों की ओर संकेत करके कहा - "लो भईतुम्हारी तस्वीर के जो भी दाम होंइनमें से उठा लो|" पर तस्वीर बेचने वाले ने चांदी का केवल एक छोटा-सा सिक्का उठाया|

"बस इतने ही पैसे ! ये तो बहुत कम हैं और ले लो|" लाला ने बड़ी उदारता के साथ कहा|
तस्वीर बेचने वाले ने कहा - "नहीं सेठ ! बाबा कहते हैं कि लालच इंसान का सबसे बड़ा शत्रु हैमैं लालची नहीं हूंमैंने तो उचित दाम ले लिएयह लालच तो आप जैसे सेठ लोगों को ही शोभा देता है|"
उसकी बात सुनकर लाला को ऐसा लगा कि जैसे उस तस्वीर बेचने वाले ने उनके मुंह पर एक करारा थप्पड़ जड़ दिया होउन्होंने अपनी झेंप मिटाने के लिए कहा - "बहुत दूर से आ रहे होकम-से-कम पानी तो पी ही लो|"

"नहींमुझे प्यास नहीं है सेठजी !"
ठीक तभी लाला का बेटा वहां आ गयाउसने साईं बाबा की तस्वीर देखीउसे बहुत प्रसन्नता हुईउसने तस्वीर बेचने वाले की ओर देखकर कहा - "भाईहमारे घर में साईं बाबा की कोई तस्वीर नहीं थीमैं बहुत दिनों से उनकी तस्वीर खरीदने की सोच रहा थायहां किसी भी दुकानदार के पास बाबा की तस्वीर नहीं थी|"

"चलिएआज आपकी इच्छा पूरी हो गयी|" तस्वीर बेचने वाला हँसकर बोला|

"इस खुशी में आप जलपान कीजिए|" लाला ने बेटे ने प्रसन्नताभरे स्वर में कहा - "साईं बाबा की कृपा से ही मेरे पिताजी का रोग समाप्त हुआ हैव्यापार में भी दिन दूना-रात चौगुना लाभ हो रहा है|"

"यदि आपकी ऐसी इच्छा है तो मैं जलपान अवश्य करूंगा|" तस्वीर बेचने वाले ने कहा|
लाला अपने मन में सोचने लगा कि तस्वीर बेचने वाला भी बड़ा अजीब आदमी हैपहले लालच की बात कहकर मेरा अपमान कियाफिर जब मैंने पानी पीने के लिये कहातो पानी पीने से इंकार कर फिर से मेरा अपमान कियामेरे बेटे के कहने पर पानी तो क्या जलपान करने के लिए तुरंत तैयार हो गया|
तस्वीर वाले ने जलपान किया और अपनी गठरी उठाकर चला गया|

उधर कई दिन के बाद रावजी ने सोचा कि शिरडी जाकर साईं बाबा के दर्शन कर आएंउनके दर्शन से मन का दुःख कुछ कम हो जाएगायही सोचकर वह अगले दिन पौ फटके ही शिरडी के लिए चल दिया|
शिरडी पास ही थाराव आधे घंटे में ही शिरडी पहुंच गयाअपमान की पीड़ाचिंता से राव की हालात ऐसी हो गयी थीजैसे वह महीनों से बीमार हैउनका चेहरा पीला पड़ गया थामन की पीड़ा चेहरे पर स्पष्ट नजर आती थी|

"मैं तुम्हारा दुःख जानता हूं राव !" साईं बाबा ने अपने चरणों पर झुके हुए राव को उठाकर बड़े प्यार से उसके आँसू पोंछते हुए कहा - "तुम तो ज्ञानी पुरुष होयह क्यों भूल गए कि दुःख-सुखमान-अपमान का सामना मनुष्य को कब करना पड़ जाएयह कोई नहीं जानता|"
राव ने कोई उत्तर नहीं दियावह बड़बड़ायी आँखों से बस साईं बाबा की ओर देखता रहा|

"जो ज्ञानी होते हैं वे दुःख आने पर न तो आँसू बहाते हैं और न सुख आने पर खुशी से पागल होते हैं|" - साईं बाबा ने कहा - "यदि हम किसी को दुःख देंगेतो भगवान हमें अवश्य दुःख देगायदि हम किसी का अपमान करेंगे तो हमें भी अपमान सहन करना पड़ेगायही भगवान का नियम हैइसी नियम से ही यह संसार चल रहा है|"

"नहींमुझे भगवान के न्याय से कोई शिकायत नहीं है|" रावजी ने आँसू पोंछते हुए कहा|

"सुनो रावकभी-कभी ऐसा भी होता है कि हमें अपने पूर्वजन्म के किसी अपराध का दण्ड इस जन्म में भी भोगना पड़ता हैकभी-कभी पिछले जन्मों का पुण्य हमारे इस जन्म में भी काम आ जाता है और हम संकट में पड़ जाने से बच जाते हैंजो दुःख तुम्हें मिला हैवह शायद तुम्हें तुम्हारे पूर्वजन्म के किसी अपराध के कारण मिला हो|"

"हां ! ऐसा हो सकता है बाबा !"

"और रावयह भी तो हो सकता है कि इस अपमान के पीछे कोई अच्छी बात छिपी हुई होबिना सोचे-विचारे भाग्य को दोष देने से क्या लाभ !"

"मुझसे भूल हो गयी बाबा ! दुःख और अपमान की पीड़ा ने मेरा ज्ञान मुझसे छीन लिया थाआपने मुझे मेरा खोया हुआ ज्ञान लौटा दिया है|" राव ने प्रसन्नताभरे स्वर में कहा|

"तुम किसी बात की चिंता मत करो रावजी ! भगवान पर भरोसा रखोवह जो कुछ भी करते हैंहमारे भले के लिए ही करते हैंतुम अगले बृहस्पतिवार को बिटिया को लेकर मेरे पास आनाभगवान चाहेंगे तो तुम्हारा भला ही होगा|" साईं बाबा ने कहा|
रावजी ने साईं बाबा के चरण हुए और उनका आशीर्वाद लेकर वापस अपने गांव लौट गया|
राव जब अपने गांव की ओर लौट रहा थाउसे तो अपना मन फूल की भांति हल्का महसूस हो रहा थाउसके मन का सारा बोझ हल्का हो चुका था|उधर तस्वीर वाले के चले जाने के बाद लाला बहुत देर तक किसी सोच में डूबा रहाउसके चेहरे पर अनेक तरह के भाव आ-जा रहे थेउसके मन में विचारों की आँधी चल रही थीउसने अपना स्वभाव बदल दिया थाअब वह सुबह उठकर भगवान की पूजा करने लगा थाउसके पास जो कोई भी साधु-संन्यासीअतिथि आता तो वह उसका यथासंभव स्वागत-सत्कार करतावह जिस चीज की मांग करतावह उसे पूरी करताउसने साधारण कपड़े पहनना शुरू कर दिये थेअकारण क्रोध करना भी छोड़ दिया था|
लाला अक्सर अपने बेटे को समझता - "बेटाजिस व्यापार में ईमानदारी और सच्चाई होती हैउसी में सुख और शांति रहती हैझूठ और बेईमानी मनुष्य का चरित्र पतन कर देती हैउसे फल भी अवश्य ही भोगना पड़ता हैइसमें कोई संदेह नहीं है|"

"आप जैसा कहेंगेमैं वैसा ही करूंगा पिताजी !" - बेटे का जवाब था|

"हमें शिरडी चलना है|" - लालाजी ने एक दिन अपने बेटे को याद दिलाया|

"हांमुझे याद हैहम साईं बाबा के दर्शन करने अवश्य चलेंगे|"
अचानक लाला का चेहरा उदास और फीका पड़ गयावह बड़े दु:खभरे स्वर में बोलामानो जैसे पश्चात्ताप की अग्नि में जल रहा हो उसने कहा - "मैंने रावजी कि बेटी का तेरे साथ विवाह न करके बहुत बड़ा पाप किया हैरावजी बड़े ही नेक और सीधे-सादे आदमी हैंवह भी साईं बाबा के भक्त हैंबारात लौटाकर मैंने उनका बहुत बड़ा अपमान किया है|"

"जो कुछ बीत गयाअब उसके पीछे पश्चात्ताप करने से क्या लाभ पिताजी !" लड़के ने दु:खभरे स्वर में कहा - "अब आप यह सब भूल जाइए|"

"कैसे भूलूं बेटा ! मैं अब इस अपराध का प्रायश्चित करना चाहता हूं|"
लालाजी ने मन-ही-मन निश्चय कर लिया था कि राव की बेटी का विवाह अपने बेटे से करअपने पाप का प्रायश्चित अवश्य करेंगेवह सबसे अपने द्वारा किये गये व्यवहार के लिए भी क्षमा मांगने के बारे में सोच रहे थेदिन बीतते गये|
बृहस्पतिवार का दिन आ गया|
लाला अपने बेटे के साथ मस्जिद के आँगन में पहुंचेतो उनकी नजर राव पर पड़ीराव भी उनकी ओर देखने लगेअचानक लाला ने लपककर राव के पैर पकड़ लिये|

"अरेअरे आप यह क्या कर रहे हैं सेठजी ! मेरे पांव छूकर मुझे पाप का भागी मत बनाइए|" - राव लाला के इस व्यवहार पर हैरान रह गये थे|

"नहीं रावजीजब तक आप मुझे क्षमा नहीं करेंगेमैं आपके पैर नहीं छोड़ूंगा|" लाला ने रुंधे गले से कहा - "जब से मैंने आपका अपमान किया हैतब से मेरा मन रात-दिन पश्चात्ताप की अग्नि में जलता रहता हैजब तक आप मुझे क्षमा नहीं करेंगेमैं पैर नहीं छोड़ूंगा|"
तभी एक व्यक्ति बोला - "साईं बाबा आपको याद कर रहे हैं|"
वह दोनों साईं बाबा के पास गयेलाला ने साईं बाबा से अपने मन की बात कही|
लाला का हृदय परिवर्तन देखकर साईं बाबा प्रसन्न हो गयेफिर उन्होंने पूछा - "सेठजीआप का रोग तो दूर हो गया है न?"

"हां बाबा ! आपकी कृपा से मेरा रोग दूर हो गयालेकिन मुझे सेठजी मत कहिये|"

"तुम्हारे विचार सुनकर मुझे बड़ी खुशी हुईएक मामूली-सी बीमारी ने तुम्हारे विचार बदल दिएकिसी भी पाप का दंड यही हैअपने पाप को स्वीकार कर प्रायश्चित्त करनायह धन-दौलत तो बेकार की चीज हैआज है कल नहींइससे मोह करना बुद्धिमानी नहीं है|"
फिर तभी बाबा ने अपना हाथ हवा में लहरायावहां उपस्थित सभी लोगों ने देखाउनके हाथ में दो सुंदर व मूल्यवान हार आ गये थे|

"उठो सेठएक हार अपने बेटे को और दूसरा हार लक्ष्मी बेटी को दे दोये एक-दूसरे को पहना दें|" बाबा ने कहा|
लाला ने एक हार अपने बेटे को और दूसरा रावजी की बेटी का दे दियादोनों ने हार एक-दूसरे को पहनाये और फिर साईं बाबा के चरणों में झुक गये|

"तुम दोनों का कल्याण होजीवनभर सुखी रहो|" - साईं बाबा न आशीर्वाद दिया|
राव और लाला की आँखें छलक उठींउन्होंने एक-दूसरे की ओर देखाफिर दोनों ने एक-दूसरे को बांहों में भर लियासब लोग यह दृश्य देखकर खुशी से साईं बाबा की जय-जयकार करने लगे|


परसों चर्चा करेंगे..कुश्ती के बाद बाबा जी में बदलाव

===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

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