शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 21 December 2019

बिन साईं के मैं ऐसी, जैसे अनाथ हो कोई

ॐ सांई राम



बिन साईं के मैं ऐसी, जैसे अनाथ हो कोई
बिन बाबा के मैं ऐसी, जैसे पत्थर हो राह का कोई

बिन बाबा के मैं ऐसी, जैसे बिन मांझी के नाव
बिन साईं के मैं ऐसी, जैसे हो न किसी के पाँव
बिन बाबा के मैं ऐसी, जैसे कटी हुई पतंग
बिन साईं के मैं ऐसी जैसे जीवन हो एक जंग
बाबाजी कर दो कुछ ऐसा चरणों में आपके में रहूँ
न रहूँ अनाथ, न पत्थर राह का बनूँ
मांझी आप बन जाओ बाबाजी, नाव में मैं बैठी रहूँ
पैर मेरे जाए सिर्फ आपके द्वार, पतंग हवा में उडती रहे
जीवन मेरा बीते आपके चरणों में, स्वर्ग से सुंदर बना रहे
बाबाजी कर दो कुछ ऐसा चरणों में आपके में रहूँ
 
बाबाजी मेरे मन में भक्ति की, सदा ज्योति जगाये रखना,
अपनी कृपा की धारा साईं जी, मुझपर बरसाए रखना ।
तेरी कृपा से ही बाबा, बना ये संसार है,
हम सबका साईं जी बस, तू ही पालनहार है ।

-: आज का साईं सन्देश :-

साथ पन्त शामा चले,
चरणन साईं जाय ।
लिखे जीवनी साईं की,
बाबा अनुमति पाय ।।

अहंकार जो त्याग के,
शिर्डी तीरथ जाय ।
इच्छा पूरण होय सब,
साईं करे सहाय ।।

Friday, 20 December 2019

आओ मेरे साईं जी आओ मेरे दाता जी

ॐ सांई राम


 ॐ साईं, श्री साईं, जय जय साईं... ॐ साईं राम!!!
आओ साईं, मेरे साईं, मेरे घर आओ
आओ साईं, मेरे साईं, मेरे घर आओ....



आओ मेरे साईं जी
आओ मेरे दाता जी
मेरी अँखियाँ दे विच आओ
अँखियाँ दे विच आओ
मेरे साईं मुड़ के हुन न जाओ
मेरे दाता मुड़ के न जाओ
मेरे दिल विच बस जाओ,
मेनू अपना दास बनाओ,
अपने चरना थल्ले लाओ,
अपनी गोदी विच बिठाओ


आओ मेरे साईं जी
आओ मेरे दाता जी
आओ साईं, मेरे साईं, मेरे घर आओ
आओ साईं, मेरे साईं, मेरे घर आओ
मेरी अँखियाँ दे विच आओ
अँखियाँ दे विच आओ
आओ साईं, मेरे साईं, मेरे घर आओ
आओ साईं, मेरे साईं, मेरे घर आओ
 

-: आज का साईं सन्देश :-

बाबा पावन चरण में,
अहंकार को छोड़ ।
जीवन के पथ हो सुगम,
साईं रिश्ता जोड़ ।। 
मिटे प्रभु से दूरियां,
योग सिद्धि पा जाय ।
साईं बाबा की कथा,
ध्यान लगा सुन जाय ।।

Thursday, 19 December 2019

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 30

ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साँईं बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं|

हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है
हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा|

किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...




श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 30
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शिरडी को खींचे गये भक्त
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1. वणी के काका वैघ
2. खुशालचंद
3. बम्बई के रामलाल पंजाबी ।
इस अध्याय में बतलाया गया है कि तीन अन्य भक्त किस प्रकार शिरडी की ओर खींचे गये ।

प्राक्कथन
...........
जो बिना किसी कारण भक्तों पर स्नेह करने वाले दया के सागर है तथा निर्गुण होकर भी भक्तों के प्रेमवश ही जिन्होंने स्वेच्छापूर्वक मानव शरीर धारण किया, जो ऐसे भक्त और समस्त कष्ट दूर हो जाते है, ऐसे श्री साईनाथ महाराज को हम क्यों न नमन करें । भक्तों को आत्मदर्शन कराना ही सन्तों का प्रधान कार्य है । श्री साई, जो सन्त शिरोमणि है, उनका तो मुख्य ध्येय ही यही है । जो उनके श्री-चरणों की शरण में जाते है , उनके समस्त पाप नष्ट होकर निश्चित ही दिन-प्रतिदिन उनकी प्रगति होती है । उनके श्री-चरणों का स्मरण कर पवित्र स्थानों से भक्तगण शिरडी आते और उनके समीप बैठकर श्लोक पढ़कर गायत्री-मंत्र का जप किया करते थे । परन्तु जो निर्बल तथा सर्व प्रकार से दीन-हीन है और जो यह भी नहीं जानते कि भक्ति किसे कहते है, उनका तो केवल इतना ही विश्वास है कि अन्य सब लोग उन्हें असहाय छोड़कर उपेक्षा भले ही कर दे, परन्तु अनाथों के नाथ और प्रभु श्री साई मेरा कभी परित्याग न करेंगे । जिन पर वे कृपा करे, उन्हें प्रचण्ड शक्ति, नित्यानित्य में विवेक तथा ज्ञान सहज ही प्राप्त हो जाता है । वे अपने भक्तों की इच्छायें पूर्णतः जानकर उन्हें पूर्ण किया करते है, इसीलिये भक्तों को मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जाया करती है और वे सदा कृतज्ञ बने रहते है । हम उन्हें साष्टांग प्रणाम कर प्रार्थना करते है कि वे हमारी त्रुटियों की ओर ध्यान न देकर हमें समस्त कष्टों से बचा लें । जो विपति-ग्रस्त प्राणी इस प्रकार श्री साई से प्रार्थना करता है, उनकी कृपा से उसे पूर्ण शान्ति तथा सुख-समृद्घि प्राप्त हती है । श्री हेमाडपंत कहते है कि हे मेरे प्यारे साई । तुम तो दया के सागर हो । यह तो तुम्हारी ही दया का फल है, जो आज यह साई सच्चरित्र भक्तों के समक्ष प्रस्तुत है, अन्यथा मुझमें इतनी योग्यता कहाँ थी, जो ऐसा कठिन कार्य करने का दुस्साहस भी कर सकता । जब पूर्ण उत्ततरदायित्व साई ने अपने ऊपर ही ले लिया तो हेमाडपंत को तिलमात्र भी भार प्रतीत न हुआ और न ही इसकी उन्हें चिन्ता ही हुई । श्री साई ने इस ग्रन्थ के रुप में उनकी सेवा स्वीकार कर ली । यह केवल उनके पूर्वजन्म के शुभ संस्कारों के कारण ही सम्भव हुआ, जजिसके लिये वे अपने को भाग्यशाली और कृतार्थ समझते है । नीचे लिखी कथा कपोलकल्पित नहीं, वरन् विशुदृ अमृततुल्य है । इसे जो हृदयंगम करेगा, उसे श्री साई की महानता और सर्वव्यापकता विदित हो जायेगी, परन्तु जो वादविवाद और आलोचना करना चाहते है, उन्हें इन कथाओं की ओर ध्यान देने की आवश्यकता भी नहीं है । यहाँ तर्क की नहीं, वरन् प्रगाढ़ प्रेम और भक्ति की अत्यन्त अपेक्षा है । विद्घान् भक्त तथा श्रद्घालु जन अथवा जो अपने को साई-पद-सेवक समझते है, उन्हें ही ये कथाएँ रुचिकर तथा शिक्षाप्रद प्रतीत होगी, अन्य लोगों के लिये तो वे निरी कपोल-कल्पनाएँ ही है । श्री साई के अंतरंग भक्तों को श्री साईलीलाएँ कल्पतरु के सदृश है । श्री साई-लीलारुपी अमृतपान करने से अज्ञानी जीवों को मोक्ष, गृहस्थाश्रमियों को सन्तोष तथा मुमुक्षुओं को एक उच्च साधन प्राप्त होता है । अब हम इस अध्याय की मूल कथा पर आते है ।

काका जी वैघ
...................
नासिक जिले के वणी ग्राम में काका जी वैघ नाम के एक व्यक्ति रहते थे । वे श्रीसप्तशृंगी देवी के मुख्य पुजारी थे । एक बार वे विपत्तियों में कुछ इस प्रकार ग्रसित हुए कि उनके चित्त की शांति भंग हो गई और वे बिलकुल निराश हो उअठे । एक दिन अति व्यथित होकर देवी के मंदिर में जाकर अन्तःकरण से वे प्रार्थना करने लगे कि हे देवि । हे दयामयी । मुझे कष्टों से शीघ्र मुक्त करो । उनकी प्रार्थना से देवी प्रसन्न हो गई और उसी रात्रि को उन्हें स्वप्न में बोली कि तू बाबा के पास जा, वहाँ तेरा मन सान्त और स्थिर हो जायेगा । बाबा का परिचय जानने को काका जी बड़े उत्सुक थे, परन्तु देवी से प्रश्न करने के पूर्व ही उनकी निद्रा भंग हो रगई । वे विचारने लगे कि ऐसे ये कौन से बाबा है, जिनकी ओर देवी ने मुझे संकेत किया है । कुछ देर विचार करने के पश्चात् वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सम्भव है कि वे त्र्यंबकेश्वर बाबा (शिव) ही हों । इसलिये वे पवित्र तीर्थ त्र्यंबक (नासिक) को गये और वहाँ रहकर दस दिन व्यतीत कियये । वे प्रातःकाल उठकर स्नानादि से निवृत्त हो, रुद्र मंत्र का जप कर, साथ ही साथ अभिषेक व अन्य धार्मिक कृत्य भी करने लगे । परन्तु उनका मन पूर्ववत् ही अशान्त बना रहा । तब फिर अपने घर लौटकर वे अति करुण स्वर में देवी की स्तुति करने लगे । उसी रात्रि में देवी ने पुनः स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि तू व्यर्थ ही त्र्यम्बकेश्वर क्यो गया । बाबा से तो मेरा अभिप्राय था शिरडी के श्री साई समर्थ से । अब काका जी के समक्ष मुख्य प्रश्न यह उपस्थित हो गया कि वे कैसे और कब शिरडी जाकर बाबा के श्री दर्शन का लाभ उठाये । यथार्थ में यदि कोई व्यक्ति, किसी सन्त के दर्शने को आतुर हो तो केवल सन्त ही नही, भगवान् भी उसकी इच्छा पूर्ण कर देते है । वस्तुतः यिद पूछा जाय तो सन्त और अनन्त एक ही है और उनमें कोई भिन्नता नही । यदि कोई कहे कि मैं स्वतः ही अमुक सन्त के दर्शन को जाऊँगा तो इसे निरे दम्भ के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है । सन्त की इचत्छा के विरुदृ उनके समीप कौन जाकर द्रर्शन ले सकता है । उनकी सत्त के बिना वृक्ष का एक पत्ता भी नहीं हिल सकता । जितनी तीव्र उत्कंठा संत दर्शन की होती, तदनुसार ही उसकी भक्ति और विश्वास में वृद्घि होती जायेगी और उतनी ही शीघ्रता से उनकी मनोकामना भी सफलतापूर्वक पू4ण होगी । जो निमंत्रण देता है, वह आदर आतिथ्य का प्रबन्ध भी करता है । काका जी के सम्बन्ध में सचमुच यही हुआ ।
शामा की मान्यता
...................
जब काका जी शिरडी यात्रा करने का विचार कर रहे थे, उसी समय उनके यहाँ एक अतिथि आया (जो शामा के अतिरिक्त और कोई न था) । शामा बाबा के अंतरंग भक्तों में से एक थे । वे ठीक इसी समय वणी में क्यों और कैसे आ पहुँचे, अब हम इस पर दृष्टि डालें । बाल्यावस्था में वे एक बार बहुत बीमार पड़ गये थे । उनकी माता ने अपनी कुलदेवी सप्तशृंगी से प्रार्थना की कि यदि मेरा पुत्र नीरोग हो जाये तो मैं उसे तुम्हारे चरणों पर लाकर डालूँगी । कुछ वर्षों के पश्चात् ही उनकी माता के स्तन में दाद हो गई । तब उन्होंने पुनः देवी से प्रार्थना की कि यदि मैं रोगमुक्त हो जाऊँ तो मैं तुम्हें चाँदी के दो स्तन चाढाऊँगी । पर ये दोनों वचन अधूरे ही रहे । परन्तु जब वे मृत्युशैया पर पड़ी ती तो उन्होंने अपने पुत्र शामा को समीप बुलाकर उन दोनों वचनों की स्मृति दिलाई तथा उन्हें पूर्ण करने का आश्वासन पाकर प्राण त्याग दिये । कुछ दिनों के पश्चात् वे अपनी यह प्रतिज्ञा भूल गये और इसे भूले पूरे तीस साल व्यतीत हो गये । तभी एक प्रसिदृ ज्योतिषी शिरडी आये और वहाँ लगभग एक मास ठहरे । श्री मान् बूटीसाहेब और अन्य लोगों को बतलाये उनके सभी भविष्य प्रायः सही निकले, जिनसे सब को पूर्ण सन्तोष था । शामा के लघुभ्राता बापाजी ने भी उनसे कुछ प्रश्न पूछे । तब ज्योतिषी ने उन्हें बताया कि तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राता ने अपनी माता को मृत्युशैया पर जो वचन दिये थे, उनके अब तक पूर्ण न किये जाने के कारण देवी असन्तुष्ट होकर उन्हें कष्ट पहुँचा रही है । ज्योतिषी की बात सुनकर शामा को उन अपूर्ण वचनों की स्मृति हो आई । अब और विलम्ब करना खतरनाक समझकर उन्होंने सुनार को बुलाकर चाँदी के दो स्तन शीघ्र तैयार कराये और उन्हें मसजिद मं ले जाकर बाबा के समक्ष रख दिया तथा प्रणाम कर उन्हें स्वीकार कर वचनमुक्त करने की प्रार्थना की । शामा ने कहा कि मेरे लिये तो सप्तशृंगी देवी आप ही है, परन्तु बाबा ने साग्रह कहा कि तुम इन्हें स्वयं ले जाकर देवी के चरणों में अर्पित करो । बाबा की आज्ञा व उदी लेकर उन्होंने वणी को प्रस्थान कर दिया । पुजारी का घर पूछते-पूछते वे काका जी के पास जा पहुँचे । काका जी इस समय बाबा के दर्शनों को बड़े उत्सुक थे और ठीक ऐसे ही मौके पर शामा भी वहाँ पहुँच गये । वह संयोग भी कैसा विचित्र था । काका जी ने आगन्तुक से उनका परिचय प्राप्त कर पूछा कि आप कहाँ से पधार रहे है । जब उन्होंने सुना कि वे शिरडी से आ रहे तो वे एकदम प्रेमोन्मत हो शामा से लिपट गये और फिर दोनों का श्री साई लीलाओं पर वार्तालाप आरम्भ हो गया । अपने वचन संबंधी कृत्यों को पूर्ण कर वे काकाजी के साथ शिरडी लौट आये । काकाजी मसजिद पहुँच कर बाबा के श्रीचरणों से जा लिपटे । उनके नेत्रों से प्रेमाश्रुओं की धारा बहने लगी और उनका चित्त स्थिर हो गया । देवी के दृष्टांतानुसार जैसे ही उन्होंनें बाबा के दर्शन किये, उनके मन की अशांति तुरन्त नष्ट तहो गई और वे परम शीतलता का अनुभव करने लगे । वे विचार करने लगे कि कैसी अदभुत शक्ति है कि बिना कोई सम्भाषण या प्रश्नोत्तर किये अथवा आशीष पाये, दर्शन मात्र से ही अपार प्रसन्नता हो रही है । सचमुच में दर्शन का महत्व तो इसे ही कहते है । उनके तृषित नेत्र श्री साई-चरणों पर अटक गये और वे अपनी जिहा से एक शब्द भी न बोल सके । बाबा की अन्य लीलाएँ सुनकर उन्हें अपार आनन्द हुआ और वे पूर्णतः बाबा के शरणागत हो गये । सब चिन्ताओं और कष्टों को भूलकर वे परम आनन्दित हुए । उन्होंने वहाँ सुखपूर्वक बारह दिन व्यतीत किये और फिर बाबा की आज्ञा, आशीर्वाद तथा उदी प्राप्त कर अपने घर लौट गये ।

खुशालचन्द (राहातानिवासी)
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ऐसा कहते है कि प्रातःबेला में जो स्वप्न आता है, वह बहुधा जागृतावस्था में सत्य ही निकलता है । ठीक है, ऐसा ही होता होगा । परन्तु बाबा के सम्बन्ध में समय का ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं था । ऐसा ही एक उदाहरण प्रस्तुत है – बाबा ने एक दिन तृतीय प्रहर काकासाहेब को ताँगा लेकर राहाता से खुशालचन्द को लाने के लिये भेजा, क्योंकि खुशालचन्द से उनकी कई दोनों से भेंट न हुई थी । राहाता पहुँच कर काकासाहेब ने यह सन्देश उन्हें सुना दिया । यह सन्देश सुनकर उन्हें महान् आश्चर्य हुआ और वे कहने लगे कि दोपहर को भोजन के उपरान्त थोड़ी देर को मुझे झपकी सी आ गई थी, तभी बाबा स्वप्न में आये और मुझे शीघ्र ही शिरडी आने को कहा । परन्तु घोडे का उचित प्रबन्ध न हो सकने के कारण मैंने अपने पुत्र को यह सूचना देने के लिये ही उनके पास भेजा था । जब वह गाँव की सीमा तक ही पहुँचा था, तभी आप सामने से ताँगे में आते दिखे । वे दोनों उस ताँगे में बैठकर शिरडी पहुँचे तथा बाबा से भेंटकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । बाबा की यह लीला देख खुशालचन्द गदगद हो गये ।

बम्बई के रामलाल पंजाबी
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बम्बई के एक पंजाबी ब्राहमण श्री. रामलाला को बाबा ने स्वप्न में एक महन्त के वेश में दर्शन देकर शिरडी आने को कहा । उन्हें नाम ग्राम का कुछ भी पता चल न रहा था । उनको श्री-दर्शन करने की तीव्र उत्कंठा तो थी, परन्तु पता-ठिकाना ज्ञात न होने के कारण वे बड़े असमंजस में पड़े हुये थे । जो आमंत्रण देता है, वही आने का प्रबन्ध भी करता है और अन्त में हुआ भी वैसा ही । उसी दिन सन्ध्या समय जब वे सड़क पर टहल रहे थे तो उन्होंने एक दुकान पर बाबा का चित्र टंगा देखा । स्वप्न में उन्हें जिस आकृति वाले महन्त के दर्शन हुए थे, वे इस चित्र के समक्ष ही थे । पूछताछ करने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि यह चित्र शिरडी के श्री साई समर्थ का है और तब उन्होंने शीघ्र ही शिरडी को प्रस्थान कर दिया तथा जीवनपर्यन्त शिरडी में ही निवास किया । इस प्रकार बाबा ने अपने भक्तों को अपने दर्शन के लिये शिरडी में बुलाया और उनकी लौकिक तथा पारलौकिक समस्त इच्छाँए पूर्ण की ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 18 December 2019

कृष्ण कन्हैया साईं, गोपाला है साईं

ॐ साईं राम



 कृष्ण  कन्हैया  साईं
गोपाला  है  साईं
मुरली  मनोहर  साईं
लीलाधर  है  साईं
है  गोविंदा  साईं
गोकुल  वासी  साईं
मुरलीधर  है  साईं
गिरधर  प्यारा  साईं .....
साईं  कृष्ण  साईं  केशव
साईं  है  घनश्याम  हमारे
अल्लाह  साईं  मौला  साईं 
नानक  साईं  भोला  साईं
साईं  साईं  साईं ......जय  जय  साईं 
सबकी  चिंता  हरने  वाले 
साईं  है  भगवान  हमारे

मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे,
बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे ।
जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे,
तेरा ही जिक्र या, तेरी ही जुस्तजू रहे ।
अल्लाह  अपने  बन्दों  पर  इतना  करम  करना,
सुख  हो  या  दुःख  सब  पर  रहें  नज़र  करना
उसके  दर  पे  "सुकून "  मिलता  है, उसके  "इबादत " से  नूर  मिलता  है 
जो  झुक  गया  " साईं " के  सजदे  में, उसे  कुछ  न  कुछ  ज़रूर  मिलता  है 

सब  मिल  बोलो  साईं  नाथ  महाराज  की  जय

 -: आज का साईं सन्देश :-

साईं बाबा का चरित,
सागर जैसा होय ।
 ज्ञान और भक्ति रतन,
वह पाय जो खोय ।।

 सीख भरे वेदांत के,
बाबा के उपदेश ।
 श्रवण करो अति ध्यान से,
 साईं के सन्देश ।।

 

Tuesday, 17 December 2019

माँ कैसी होती है

ॐ सांई राम


"माँ कैसी होती है"

एक माँ थी जिसका एक लड़का था, बाप मर चुका था, माँ घरो में बर्तन मांजती थी बेटे को अपना पेट काटकर एक अच्छे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाती थी,एक दिन स्कूल में किसी बच्चे ने उसके लड़के के आँख में पेंसिल मार दी ,लड़के की आँख चली गई ,डाक्टर ने कहा ये आँख नहीं बचेगी दूसरी लगेगी ,तो माँ ने अपने कलेजे के टुकड़े के लिए अपनी एक आँख दे दी ,अब वो देखने में भी अच्छी नहीं थी, बेटा उसको स्कूल आने को मना करता था क्योंकि वो देखने में अच्छी और पढ़ी लिखी नहीं थी ऊपर से एक आँख भी नहीं रही, उसे अपनी माँ पर शर्म आती थी, कभी लंच बॉक्स देने आती भी थी तो मुह छुपा कर और अपने को नौकरानी बताती थी ,अपने बच्चे की ख्वाइश पूरी करने को वो दिन रात काम करती लेकिन बेटे को कमी महसूस नहीं होने देती , बेटा जवान हुआ एक सरकारी अधिकारी बना उसने लव मैरिज की, उसने अपनी माँ को भी नहीं बुलाया ,और अलग घर ले बीबी के साथ रहने लगा माँ बूढी हो रही थी बीमार भी रहने लगी ,लेकिन लड़का अपनी पत्नी और हाई सोसाइटी में व्यस्त रहने लगा उसे माँ की याद भी नहीं आती थी, माँ बीमार रहती लेकिन दिन रात अपने पुत्र की सम्रद्धि और उन्नति के लिए भगवान् से दुआ मांगती रहती कुछ पडोसी माँ का ख्याल रखते ,एक बार वो बहुत बीमार पड़ी तो उसने अपने बेटे को देखने की इच्छा जाहिर की लोग लड़के को बुलाने गए तो,वो अपनी बीबी के साथ कहीं टूर पे घुमने जा रहा था वो नहीं आया उसने कुछ पैसे इलाज़ के लिए भेज दिए ,लेकिन माँ का इलाज़ तो उसका बेटा था जिसको मरने से पहले देखना चाहती थी उसे प्यार देना चाहती थी, वो फिर भी बेटे का इन्तेजार करती रही ,उसके कलेजे का टुकड़ा उसके आशाओं के टुकड़े कर रहा था ,वो आया लेकिन तब तक माँ मर चुकी थी उसके हाथ में एक फोटो था लड़के का वही बचपन की स्कूल ड्रेस बाला फोटो धुन्दला गन्दा सा जिसे हर वक्त सीने से लगाये रहती थी, आज भी सीने से लगाये थी ,लेकिन मरते दम तक वो अपने कलेजे के टुकड़े को कलेजे से न लगा सकी दिन बीते वक्त बदला लड़के का कार से एक्सिडेंट हुआ इस एक्सिडेंट में उसकी दोनों आँख चली गई चेहरे पर चोट लगने से कुरूप लगने लगा दोनों पैर बेकार हो गए चलने में लचार हो गया ,पत्नी अमीर घर की लड़की थी ,वो दिनों दिन पति से दूर होने लगी क्योंकि पति अब कुरूप और विकलांग था ,और एक दिन वो पति को छोड़ कर चली गई ,तब बेटे को माँ की याद आयी ,की कैसे उसने अपने बेटे के लिए अपनी एक आँख दे दी जीवन के आखरी समय तक वो उसकी फोटो को सीने से लगाये रही,और वो उसको अपनी पत्नी और हाई सोसाइटी के लिए माँ को याद भी नहीं करता था आज ईश्वर ने उसे बता दिया की माँ का प्यार असीम होता है, निस्वार्थ होता है, दुनिया में उससे ज्यादा प्यार करने बाला कोई नहीं ,वो लेटे लेटे यही सोंच रहा था और रो रहा था की ईश्वर ने शायद माँ के प्यार की क़द्र न करने की सजा दी-----------लेकिन शायद माँ स्वर्ग में भी उसकी इस हालत को देख तड़प उठी होगी "

"माँ जीवन का अनमोल और निस्वार्थ प्यार है किसी और के प्यार के लिए उसे मत ठुकराना"

Monday, 16 December 2019

साँई तेरे होने का एहसास होता हैं

ॐ साँई राम जी


हजार महफिले है लाख मेले है,
पर "तू" जहाँ नहीं हम अकेले ही अकेले है !!

एक कदम भी चलता हूँ तन्हा तो
साँई तेरे होने का एहसास होता हैं
और जब तुम साथ में चलते हो तो
मीलों लंबा सफर पल में पार होता हैं

सिर पर हाथ दया का रख दो मेरे साँई
तो एक पल में सौ जीवन जी जाता हूँ
खजाने भरे हुए हो तो भिखारी लगता हूँ
तेरी उदी से ही बादशाहत पा जाता हूँ

महफिल की रंगत कैसी होनी चाहिए
वो तेरे दरबार की शान ब्यान करती हैं
कशिश तुमको देख भर लेने की बाबा
रग रग में इक नया जोश सा भरती हैं

शहंशाह भी आ कर दर पर तेरे झुकते हैं
सूरज-चाँद-तारे भी तेरे इशारे पर चलते हैं
जाने क्यों बेताब रहते हैं हर पल मन में
आँखे बंद कर के भी तेरा दीदार करते हैं

Sunday, 15 December 2019

बाबा हमें शिर्डी बुलाया कीजिये।

ॐ साईं राम


हमारे सपनों में आया कीजिये,
हमें ऐसे न भुलाया कीजिये,
अपने चरणों में बिठाया कीजिये,
बाबा हमें शिर्डी बुलाया कीजिये ।
छोड़ दें जब मुझे मेरे अपने और पराये,
तब अपना पावन हाथ बढ़ाया कीजिये,
मुझे गले से लगाया कीजिये,
अपनी रहमत का एहसास दिलाया कीजिये,
बाबा हमे शिर्डी बुलाया कीजिये ।


मैं जीवन भर सोता रहा,
बस यूँ ही पल खोता रहा,
मेरी जिव्हा को अपना नाम रटाया कीजिये,
मेरी आँखों में हरदम समाया कीजिये,
बाबा हमें शिर्डी बुलाया कीजिये ।
इतने बड़े जहान में मैं इक अनजान मुसाफिर,
न कोई जाने न पहचाने कम से कम इक बार,
मेरा नाम पुकारा कीजिये मुझे आपने बुलाया,
ऐसा स्वपन दिखाया कीजिये,
बाबा हमें शिर्डी बुलाया कीजिये ।

हमारे सपनों में आया कीजिये,
हमें ऐसे न भुलाया कीजिये,
अपने चरणों में बिठाया कीजिये,
बाबा हमें शिर्डी बुलाया कीजिये ।


-: आज का साईं सन्देश :-

हाथ जोड़ विनती करें,
ईश्वर करो सहाय ।
बाबाजी की कृपा हो,
साईं चरित लिखाय ।।

पहले भी रचना हुई,
कई भक्त लिख जाय ।
ऐसे ही इक दास गणु,
भजनों में गा जाय ।।

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