शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 6 April 2019

आप सभी को नवरात्रों की हार्दिक बधाई - प्रथम माँ शैलपुत्री

ॐ सांई राम
आप सभी को नवरात्रों की  हार्दिक बधाई 


प्रथम माँ शैलपुत्री

दुर्गा पूजा के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा-वंदना इस मंत्र द्वारा की जाती है.

मां दुर्गा की पहली स्वरूपा और शैलराज हिमालय की पुत्री शैलपुत्री के पूजा के साथ ही दुर्गा पूजा आरम्भ हो जाता है. नवरात्र पूजन के प्रथम दिन कलश स्थापना के साथ इनकी ही पूजा और उपासना की जाती है. माता शैलपुत्री का वाहन वृषभ है, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प रहता है. नवरात्र के इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को 'मूलाधार' चक्र में स्थित करते हैं और यहीं से उनकी योग साधना प्रारंभ होता है. पौराणिक कथानुसार मां शैलपुत्री अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष के घर कन्या रूप में उत्पन्न हुई थी. उस समय माता का नाम सती था और इनका विवाह भगवान् शंकर से हुआ था. एक बार प्रजापति दक्ष ने यज्ञ आरम्भ किया और सभी देवताओं को आमंत्रित किया परन्तु भगवान शिव को आमंत्रण नहीं दिया. अपने मां और बहनों से मिलने को आतुर मां सती बिना निमंत्रण के ही जब पिता के घर पहुंची तो उन्हें वहां अपने और भोलेनाथ के प्रति तिरस्कार से भरा भाव मिला. मां सती इस अपमान को सहन नहीं कर सकी और वहीं योगाग्नि द्वारा खुद को जलाकर भस्म कर दिया और अगले जन्म में शैलराज हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया. शैलराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण मां दुर्गा के इस प्रथम स्वरुप को माँ शैलपुत्री कहा जाता है.

Kindly Provide Food & clean drinking Water to Birds & Other Animals, This is also a kind of SEWA.

सबका मालिक एक!!

ॐ साँई राम जी


हमारे सदगुरू श्री साँई नाथ महाराज जी हमे आज भी याद है वो हसीन लम्हे, जब हम आपके दरबार में, आप से मिलने आया करते थे, किसी की भी रोक टोक नहीं हुआ करती थी, जी  भर के निहारते थे, कोई समय सीमा तय भी नहीं थी आपसे मिलने की।
आज भी बहुत ही सुखद अनुभव होता हैं, आपके हमक्ष खड़े हो कर अपनी किस्मत पर नाज़ भी होता है, और आपका हमें अपने दरबार में हाजिर होने देने का गरूर भी।
बाबा जी आज सेकेंड की सुई की रफ्तार से भी तेज आपके भक्तों की संख्या में इजाफा हो रहा है, इस कारण से एक बात पक्की है कि अब तो जिस ओर भी नज़र घुमा कर देखो बस आपके दर्शन पा सकते हैं।
पर आज शिर्डी में आप से मुलाकात की समय सीमा तय कर दी गई हैं, अब तो जी भर के निहारने भी नहीं देते हैं आपके दरबार में तैनात सिपाही।
दर्शन तो आपके बाबा जी हम मन की आँखों से भी भली भाँति कर लेते हैं पर इस रूह को तो सूकून ही आपके श्री चरणों में दंडवत नतमस्तक हो कर मिलता है ।
बाबा जी आज आपसे प्रार्थना है कि आप किसी पंजाबी पूत्तर, तमिल अन्ना, बंगाली बाबू या सिर्फ मराठी माणूस के हो कर मत रह जाना।
हमने तो एक ही पाठ पढ़ा है सबक का और वो पाठ हैं, "सबका मालिक एक"।
और इस पाठ को पढ़ाया भी आपने ही है। अब बाबा जी मैं और क्या बोलू दिल की बात जान लेते हो, यहां तो हमने फिर पुनर्विचार हेतु अर्जी ही लिख डाली है ।
।।बाबा जी कृपा बनाए रखना।।

Friday, 5 April 2019

सब का मालिक एक है||

ॐ सांई राम



श्रद्धा और सबुरी तुने मंत्र बताये
तेरे दर से कोई खाली न जाये||
धर्म सभी के नेक है,
रास्ते सभी के अनेक है,
पर सब की मंजिल एक है
अज दिन चढ्या, साईं रंग वरगा |
फूल सा है खिला, आज दिन
सब का मालिक एक है||
 
साईं मुझे हर पल साथ तेरा चाहिए,
सिर पर हमेंशा हाथ तेरा चाहिए ||
मेरे हर करम पर निगाह अपनी रखना,
मुझे साईं अपनी पनाह में तुम रखना ||

साईं नाम को हृदय में धर ले,
राह मुक्ति की निशिचित कर ले ||
वो त्रिकालदर्शी सब जाने,
जाने न कोई भी बन्दा
और न ही संसार ||


बस,
तू अपना कर्म करता चला जा,
साईं नाम का श्रवण करता चला जा ||

नमो साईं नाथम,
नमो साईं नाथम,
नमो साईं नाथम,

Thursday, 4 April 2019

श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 42 - महासमाधि की ओर

ॐ साँई राम


आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से साँईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं , हम प्रत्येक साँईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साँईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साँईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम  घर घर तक श्री साँईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साँईं चरणों में क्षमा याचना करते है...



श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 42 - महासमाधि की ओर

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भविष्य की आगाही – रामचन्द्र दादा पाटील और तात्या कोते पाटील की मृत्यु टालना – लक्ष्मीबाई शिन्दे को दान – अन्तिम क्षण ।

बाबा ने किस प्रकार समाधि ली, इसका वर्णन इस अध्याय में किया गया है ।

प्रस्तावना
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गत अध्यायों की कथाओं से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि गुरुकृपा की केवल एक किरण ही भवसागर के भय से सदा के लिये मुक्त कर देती है तथा मोक्ष का पथ सुगम करके दुःख को सुख में परिवर्तित कर देती है । यदि सदगुरु के मोहविनाशक पूजनीय चरणों का सदैव स्मरण करते रहोगे तो तुम्हारे समस्त कष्टों और भवसागर के दुःखों का अन्त होकर जन्म-मृत्यु के चक्र से छुटकारा हो जायेगा । इसीलिये जो अपने कल्याणार्थ चिन्तित हो, उन्हें साई समर्थ के अलौकिक मधुर लीलामृत का पान करना चाहिये । ऐसा करने से उनकी मति शुद्घ हो जायेगी । प्रारम्भ में डाँक्टर पंडित का पूजन तथा किस प्रकार उन्होंने बाबा को त्रिपुंड लगाया, इसका उल्लेख मूल ग्रन्थ में किया गया है । इस प्रसंग का वर्णन 11 वें अध्याय में किया जा चुका है, इसलिये यहाँ उसका दुहराना उचित नहीं है ।



भविष्य की आगाही
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पाठको । आपने अभी तक केवल बाबा के जीवन-काल की ही कथायें सुनी है । अब आप ध्यानपूर्वक बाबा के निर्वाणकाल का वर्णन सुनिये । 28 सितम्बर, सन् 1918 को बाबा को साधारण-सा ज्वर आया । यह ज्वर 2-3 दिन ततक रहा । इसके उपरान्त ही बाबा ने भोजन करना बिलकुल त्याग दिया । इससे उनका शरीर दिन-प्रतिदिन क्षीण एवं दुर्बल होने लगा । 17 दिनों के पश्चात् अर्थात् 18 अक्टूबर, सन् 1918 को 2 बजकर 30 मिनट पर उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया । (यह समय प्रो. जी. जी. नारके के तारीख 5-11-1918 के पत्र के अनुसार है, जो उन्होंने दादासाहेब खापर्डे को लिखा था और उस वर्ष की साईलीलापत्रिका के 7-8 पृष्ठ (प्रथम वर्ष) में प्रकाशित हुआ था) । इसके दो वर्ष पूर्व ही बाबा ने अपने निर्वाण के दिन का संकेत कर दिया था, परन्तु उस समय कोई भी समझ नहीं सका । घटना इस प्रकार है । विजया दशमी के दिन जब लोग सन्ध्या के समय सीमोल्लंघनसे लौट रहे थे तो बाबा सहसा ही क्रोधित हो गये । सिर पर का कपड़ा, कफनी और लँगोटी निकालकर उन्होंने उसके टुकड़े-टुकड़े करके जलती हुई धूनी में फेंक दिये । बाबा के द्घारा आहुति प्राप्त कर धूनी द्घिगुणित प्रज्वलित होकर चमकने लगी और उससे भी कहीं अदिक बाबा के मुख-मंडल की कांति चमक रही थी । वे पूर्ण दिगम्बर खड़े थे और उनकी आँखें अंगारे के समान चमक रही थी । उन्होंने आवेश में आकर उच्च स्वर में कहा कि लोगो । यहाँ आओ, मुझे देखकर पूर्ण निश्चय कर लो कि मैं हिन्दू हूँ या मुसलमान । सभी भय से काँप रहे थे । किसी को भी उनके समीप जाने का साहस न हो रहा था । कुछ समय बीतने के पश्चात् उनके भक्त भागोजी शिन्दे, जो महारोग से पीड़ित थे, साहस कर बाबा के समीप गये और किसी प्रकार उन्होंने उन्हें लँगोटी बाँध दी और उनसे कहा कि बाबा । यह क्या बात है । देव आज दशहरा (सीमोल्लंघन) का त्योहार है । तब उन्होंने जमीन पर सटका पटकते हुए कहा कि यह मेरा सीमोल्लंघन है । लगभग 11 बजे तक भी उनका क्रोध शान्त न हुआ और भक्तों को चावड़ी जुलूस निकलने में सन्देह होने लगा । एक घण्टे के पश्चात् वे अपनी सहज स्थिति में आ गये और सदी की भांति पोशाक पहनकर चावड़ी जुलूस में सम्मिलित हो गये, जिसका वर्णन पूर्व में ही किया जा चुका है । इस घटना द्घारा बाबा ने इंगित किया कि जीवन-रेखा पार करने के लिये दशहरा ही उचित समय है । परन्तु उस समय किसी को भी उसका असली अर्थ समझ में न आया । बाबा ने और भी अन्य संकेत किये, जो इस प्रकार है :-


रामचन्द्र दादा पाटील की मृत्यु टालना
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कुछ समय के पश्चात् रामचन्द्र पाटील बहुत बीमार हो गये । उन्हें बहुत कष्ट हो रहा था । सब प्रकार के उपचार किये गये, परन्तु कोई लाभ न हुआ और जीवन से हताश होकर वे मृत्यु के अंतिम क्षणों की प्रतीक्षा करने लगे । तब एक दिन मध्याहृ रात्रि के समय बाबा अनायास ही उनके सिरहाने प्रगट हुए । पाटील उनके चरणों से लिपट कर कहने लगे कि मैंने अपने जीवन की समस्त आशाये छोड़ दी है । अब कृपा कर मुझे इतना तो निश्चित बतलाइये कि मेरे प्राण अब कब निकलेंगे । दया-सिन्धु बाबा ने कहा कि घबराओ नहीं । तुम्हारी हुँण्डी वापस ले ली गई है और तुम शीघ्र ही स्वस्थ हो जाओगे । मुझे तो केवल तात्या का भय है कि सन् 1918 में विजया दशमी के दिन उसका देहान्त हो जायेगा । किन्तु यह भेद किसी से प्रगट न करना और न ही किसी को बतलाना । अन्यथा वह अधिक बयभीत हो जायेगा । रामचन्द्र अब पूर्ण स्वस्थ हो गये, परन्तु वे तात्या के जीवन के लिये निराश हुए । उन्हें ज्ञात था कि बाबा के शब्द कभी असत्य नहीं निकल सकते और दो वर्ष के पश्चात ही तात्या इस संसर से विदा हो जायेगा । उन्होंने यह भेद बाला शिंपी के अतिरिक्त किसी से भी प्रगट न किया । केवल दो ही व्यक्ति – रामचन्द्र दादा और बाला शिंपी तात्या के जीवन के लिये चिन्ताग्रस्त और दुःखी थे ।

रामचन्द्र ने शैया त्याग दी और वे चलने-फिरने लगे । समय तेजी से व्यतीत होने लगा । शके 1840 का भाद्रपद समाप्त होकर आश्विन मास प्रारम्भ होने ही वाला था कि बाबा के वचन पूर्णतः सत्य निकले । तात्या बीमार पड़ गये और उन्होंने चारपाई पकड़ ली । उनकी स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि अब वे बाबा के दर्शनों को भी जाने में असमर्थ हो गये । इधर बाबा भी ज्वर से पीड़ित थे । तात्या का पूर्ण विश्वास बाबा पर था और बाबा का भगवान श्री हरि पर, जो उनके संरक्षक थे । तात्या की स्थिति अब और अधिक चिन्ताजनक हो गई । वह हिलडुल भी न सकता था और सदैव बाबा का ही स्मरण किया करता था । इधर बाबा की भी स्थिति उत्तरोत्तर गंभीर होने लगी । बाबा द्घार बतलाया हुआ विजया-दसमी का दिन भी निकट आ गया । तब रामचन्द्र दादा और बाला शिंपीबहुत घबरा गये । उनके शरीर काँप रहे थे, पसीने की धारायें प्रवाहित हो रही थी, कि अब तात्या का अन्तिम साथ है । जैसे ही विजया-दशमी का दिन आया, तात्या की नाड़ी की गति मन्द होने लगी और उसकी मृत्यु सन्निकट दिखलाई देने लगी । उसी समय एक विचित्र घटना घटी । तात्या की मृत्यु टल गई और उसके प्राण बच गये, परन्तु उसके स्थान पर बाबा स्वयं प्रस्थान कर गये और ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे कि परस्पर हस्तान्तरण हो गया हो । सभी लोग कहने लगे कि बाबा ने तात्या के लिये प्राण त्यागे । ऐसा उन्होंने क्यों किया, यह वे ही जाने, क्योंकि यह बात हमारी बुद्घि के बाहर की है । ऐसी भी प्रतीत होता है कि बाबा ने अपने अन्तिम काल का संकेत तात्या का नाम लेकर ही किया था ।

दूसरे दिन 16 अक्टूबर को प्रातःकाल बाबा ने दासगणू को पंढरपुर में स्वप्न दिया कि मसजिद अर्रा करके गिर पड़ी है । शिरडी के प्रायः सभी तेली तम्बोली मुझे कष्ट देते थे । इसलिये मैंने अपना स्थान छोड़ दिया है । मैं तुम्हें यह सूचना देने आया हूँ कि कृपया शीघ्र वहाँ जाकर मेरे शरीर पर हर तरह के फूल इकट्ठा कर चढ़ाओ । दासगणू को शिरडी से भी एक पत्र प्राप्त हुआ और वे अपने शिष्यों को साथ लेकर शिरडी आये तथा उन्होंने बाबा की समाधि के समक्ष अखंड कीर्तन और हरिनाम प्रारम्भ कर दिया । उन्होंने स्वयं फूलो की माला गूँथी और ईश्वर का नाम लेकर समाधि पर चढ़ाई । बाबा के नाम पर एक वृहद भोज का भी आयोजन किया गया ।



लक्ष्मीबाई को दान
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विजयादशमी का दिन हिन्दुओं को बहुत शुऊ है और सीमोल्लंघन के लिये बाबा द्घार इस दिन का चुना जाना सर्वथा उचित ही है । इसके कुछ दिन पूर्व से ही उन्हें अत्यन्त पीड़ा हो रही थी, परन्तु आन्तरिक रुप में वे पूर्ण सजग थे । अन्तिम क्षण के पूर्व वे बिना किसी की सहायता लिये उठकर सीधे बैठ गये और स्वस्थ दिखाई पड़ने लगे । लोगों ने सोचा कि संकट टल गया और अब भय की कोई बात नहीं है तथा अब वे शीघ्र ही नीरोग हो जायेंगे । परन्तु वे तो जानते थे कि अब मैं शीघ्र ही विदा लेने वाला हूँ और इसलिये उन्होंने लक्ष्मीबाई शिन्दे को कुछ दान देने की इच्छा प्रगट की ।

समस्त प्राणियों में बाबा का निवास
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लक्ष्मीबाई एक उच्च कुलीन महिला थी । वे मसजिद में बाबा की दिन-रात सेवा किया करती थी । केवल भगत म्हालसापति तात्या और लक्ष्मीबाई के अतिरिक्त रात को मसजिद की सीढ़ियों पर कोई नहीं चढ़ सकता था । एक बार सन्ध्या समय जब बाबा तात्या के साथ मसजिद में बैठे हुए थे, तभी लक्ष्मीबाई ने आकर उन्हे नमस्कार किया । तब बाबा कहने लगे कि अरी लक्ष्मी, मैं अत्यन्त भूखा हूँ । वे यह कहकर लौट पड़ी कि बाबा, थोड़ी देर ठहरो, मैं अभी आपके लिये रोटी लेकर आती हूँ । उन्होंने रोटी और साग लाकर बाबा के सामने रख दिया, जो उन्होंने एक भूखे कुत्ते को दे दिया । तब लक्ष्मीबाई कहने लगी कि बाबा यह क्या । मैं तो शीघ्र गई और अपने हाथ से आपके लिये रोटी बना लाई । आपने एक ग्रास भी ग्रहम किये बिना उसे कुत्ते के सामने डाल दिया । तब आपने व्यर्थ ही मुझे यह कष्ट क्यों दिया । बाबा न उत्तर दिया कि व्यर्थ दुःख न करो । कुत्ते की भूख शान्त करना मुझे तृप्त करने के बराबर ही है । कुत्ते की भी तो आत्मा है । प्राणी चाहे भले ही भिन्न आकृति-प्रकृति के हो, उनमें कोई बोल सकते है और कोई मूक है, परन्तु भूख सबकी एक सदृश ही है । इसे तुम सत्य जानो कि जो भूखों को भोजन कराता है, वह यथार्थ में मुझे ही भोजन कराता है । यह एक अकाट्य सत्य है । इस साधारम- सी घटना के द्घारा बाबा ने एक महान् आध्यात्मिक सत्य की शिक्षा प्रदान की कि बिना किसी की भावनाओं को कष्ट पहुँचाये किस प्रकार उसे नित्य व्यवहार में लाया जा सकता है । इसके पश्चात् ही लक्ष्मीबाई उन्हें नित्य ही प्रेम और भक्तिपूर्वक दूध, रोटी व अन्य भोजन देने लगी, जिसे वे स्वीकार कर बड़े चाव से खाते थे । वे उसमें से कुछ खाकर शेष लक्ष्मीबाई के द्घारा ही राधाकृष्ण माई के पास भेज दिया करते थे । इस उच्छिष्ट अन्न को वे प्रसाद स्वरुप समझ कर प्रेमपूर्वक पाती थी । इस रोटी की कथा को असंबन्ध नहीं समझा चाहिये । इससे सिदृ होता है कि सभी प्राणियों में बाबा का निवास है, जो सर्वव्यापी, जन्म-मृत्यु से परे और अमर है । बाबा ने लक्ष्मीबाई की सेवाओं को सदैव स्मरण रखा । बाबा उनको भुला भी कैसे सकते थे । देह-त्याग के बिल्कुल पूर्व बाबा ने अपनी जेब में हाथ डाला और पहले उन्होंने लक्ष्मी को पाँच रुपये और बाद में चार रुपये, इस प्रकार कुल नौ रुपये दिये । यह नौ की संख्या इस पुस्तक के अध्याय 21 में वर्णित नव विधा भक्ति की घोतक है अथवा यह सीमोल्लंघन के समय दी जाने वाली दक्षिणा भी हो सकती है । लक्ष्मीबाई एक सुसंपन्न महिला थी । अतएव उन्हें रुपयों की कोई आवश्यकता नहीं थी । इस कारण संभव है कि बाबा ने उनका ध्यान प्रमुख रुप से श्री मदभागवत के स्कन्ध 11, अध्याय 10 के श्लोंक सं. 6 की ओर आकर्षित किया हो, जिसमे उत्कृष्ट कोटि के भक्त के नौ लक्षणों का वर्णन है, जिनमें से पहले 5 और बाद मे 4 लक्षणों का क्रमशः प्रथम और द्घितीय चरणों में उल्लेख हुआ है । बाबा ने भी उसी क्रम का पालन किया (पहले 5 और बाद में 4, कुल 9) केवल 9 रुपये ही नहीं बल्कि नौ के कई गुने रुपये लक्ष्मीबाई के हाथों में आये-गये होंगे, किन्तु बाबा के द्घारा प्रद्त्त यह नौ (रुपये) का उपहार वह महिला सदैव स्मरण रखेगी ।



अंतिम क्षण
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बाबा सदैव सजग और चैतन्य रहते थे और उन्होंने अन्तिम समय भी पूर्ण सावधानी से काम लिया । अपने भक्तों के प्रति बाबा का हृदय प्रेम, ममता यामोह से ग्रस्त न हो जाय, इस कारण उन्होंने अन्तिम समय सबको वहाँ से चले जाने का आदेश दिया । चिन्तमग्न काकासाहेब दीक्षित, बापूसाहेब बूटी और अन्य महानुभाव, जो मसजिद में बाबा की सेवा में उपस्थित थे, उनको भी बाबा ने वाड़े में जाकर भोजन करके लौट आने को कहा । ऐसी स्थिति में वे बाबा को अकेला छोड़ना तो नहीं चाहते थे, परन्तु उनकी आज्ञा का उल्लंघन भी तो नहीं कर सकते थे । इसलिये इच्छा ना होते हुए भी उदास और दुःखी हृदरय से उन्हें वाड़े को जाना पड़ा । उन्हें विदित था कि बाबा की स्थिति अत्यन्त चिन्ताजनक है और इस प्रकार उन्हें अकेले छोड़ना उचित नहीं है वे भोजन करने के लिये बैठे तो, परन्तु उनके मन कहीं और (बाबा के साथ) थे । अभी भोजन समाप्त भी न हो पाया था कि बाबा के नश्वर शरीर त्यागने का समाचार उनके पास पहुँचा और वे अधपेट ही अपनी अपनी थाली छोड़कर मसजिद की ओर भागे और जाकर देखा कि बाबा सदा के लिये बयाजी आपा कोते की गोद में विश्राम कर रहे है । न वे नीचे लुढ़के और न शैया पर ही लेटे, अपने ही आसन पर शान्तिपूर्वक बैठे हुए और अपने ही हाथों से दान देते हुए उन्होंने यह मानव-शरीर त्याग दिया । सन्त स्वयं ही देह धारण करते है तथा कोई निश्चित ध्येय लेकर इस संसार में प्रगट होते है ओर जब देह पूर्ण हो जाता है तो वे जिस सरलता और आकस्मिकता के साथ प्रगट होते है, उसी प्रकार लुप्त भी हो जाया करते है ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

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Wednesday, 3 April 2019

श्री साईं बाबा अष्टोत्तारशत - नामावली (अर्थ सहित)

ॐ श्री साँई राम जी


1. ॐ श्री साईंनाथाय नमः
अर्थ :  ॐ श्री साईंनाथ को नमस्कार

2. 
ॐ श्री साईं लक्ष्मी नारायणाय नमः
अर्थ :  ॐ जो लक्ष्मी नारायण के स्वरुप हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

3. 
ॐ श्री साईं कृष्णमशिवमारूतयादिरूपाय नमः
अर्थ :  ॐ जो श्री कृष्णरामशिवमारुति आदि देवताओं के स्वरुप हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

4. 
ॐ श्री साईं शेषशायिने नमः
अर्थ :  ॐ जो शेषनाग पर शयन करने वाले भगवान विष्णु के अवतार हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार


5. ॐ श्री साईं गोदावीरतटीशीलाधीवासिने नमः
अर्थ :  ॐ जो गोदावरी नदी के तट पर बसी "शीलधी" (शिरडी) में निवास करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

6. 
ॐ श्री साईं भक्तह्रदालयाय नमः
अर्थ :  ॐ जो भक्तों के मन में विराजमान हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

7. 
ॐ श्री साईं सर्वह्रन्निलयाय नमः
अर्थ :  ॐ जो सभी प्रणियों के मन में निवास करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

8. 
ॐ श्री साईं भूतावासाय नमः
अर्थ :  ॐ जो समस्त प्राणियों में बसते हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

9. 
ॐ श्री साईं भूतभविष्यदुभवाज्रिताया नमः
अर्थ :  ॐ जो भूत तथा भविष्य की चिंताओं से मुक्त करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

10. 
ॐ श्री साईं कालातीताय नमः
अर्थ :  ॐ जो काल की सीमायों से परे हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

11. 
ॐ श्री साईं कालायः नमः
अर्थ :  ॐ जो काल अर्थात समय के स्वामी हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

12. 
ॐ श्री साईं कालकालाय नमः
अर्थ :  ॐ जो काल की सीमाओं से परे हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

13. 
ॐ श्री साईं कालदर्पदमनाय नमः
अर्थ :  ॐ जो काल (मृत्युदेव) के अहंकार का नाश करते हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

14. 
ॐ श्री साईं मृत्युंजयाय नमः
अर्थ :  ॐ जो मृत्यु को जीतने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

15. 
ॐ श्री साईं अमत्य्राय नमः
अर्थ :  ॐ जो अमरत्व को पाये हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

16. 
ॐ श्री साईं मर्त्याभयप्रदाय नमः
अर्थ :  ॐ जो मृत्यु के भय से रक्षा करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

17. 
ॐ श्री साईं जिवाधाराय नमः
अर्थ :  ॐ जो समस्त जीवों के आधार हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

18. 
ॐ श्री साईं सर्वाधाराय नमः
अर्थ :  ॐ जो समस्त ब्रह्माड़ के आधार हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

19. 
ॐ श्री साईं भक्तावनसमर्थाय नमः
अर्थ :  ॐ जो भक्तों की रक्षा करने में समर्थ हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

20. 
ॐ श्री साईं भक्तावनप्रतिज्ञाय नमः
अर्थ :  ॐ जो भक्तों की रक्षा करने हेतु प्रतिज्ञाबद्ध हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

21. 
ॐ श्री साईं अन्नवसत्रदाय नमः
अर्थ :  ॐ जो अन्न और वस्त्र के दाता हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

22. 
ॐ श्री साईं आरोग्यक्षेमदाय नमः
अर्थ :  ॐ जो आरोग्य और कल्याण प्रदान करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

23. 
ॐ श्री साईं धनमांगल्यप्रदाय नमः
अर्थ :  ॐ जो धन तथा मांगल्य प्रदान करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

24. 
ॐ श्री साईं ऋद्धिसिद्धिदाय नमः
अर्थ :  ॐ जो ऋद्धिसिद्धि को देने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

25. 
ॐ श्री साईं पुत्रमित्रकलत्रबन्धुदाय नमः
अर्थ :  ॐ जो पुत्रमित्रपति अथवा पत्नी और सम्बन्धी देने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

26. 
ॐ श्री साईं योगक्षेमवहाय नमः
अर्थ :  ॐ जो भक्तों को सभी तरह का सुख प्रदान करने तथा कल्याण की जिम्मेदारी उठाने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

27. 
ॐ श्री साईं आपदबान्धवाय नमः
अर्थ :  ॐ जो संकट के समय बन्धु के समान रक्षा करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

28. 
ॐ श्री साईं मार्गबन्धवे नमः
अर्थ :  ॐ जो जीवन मार्ग के साथी हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

29. 
ॐ श्री साईं भक्तिमुक्तिस्वर्गापवर्गदाय नमः
अर्थ :  ॐ जो सांसारिक वैभवमोक्ष और नैसर्गिक आनन्द व अन्तिम उत्सर्ग को प्रदान करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

30. 
ॐ श्री साईं प्रियाय नमः
अर्थ :  ॐ जो भक्तों के प्रिय हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

31. 
ॐ श्री साईं प्रीतिवर्द्धनाय नमः
अर्थ :  ॐ जो प्रीति को बढाने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

32. 
ॐ श्री साईं अन्तय्रामिणे नमः
अर्थ :  ॐ जो अन्तर्यामीअर्थात मन की समस्त भावनाओं से परे हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

33. 
ॐ श्री साईं सच्चिदानात्मने नमः
अर्थ :  ॐ जो सत्य और विशुद्ध आत्मा के प्रतीक हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

34. 
ॐ श्री साईं नित्यानंदाय नमः
अर्थ :  ॐ जो नित्य आनन्द हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

35. 
ॐ श्री साईं परमसुखदाय नमः
अर्थ :  ॐ जो परम सुख को देने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

36. 
ॐ श्री साईं परमेश्वराय नमः
अर्थ :  ॐ जो परमेश्वर हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

37. 
ॐ श्री साईं परब्रह्मणे नमः
अर्थ :  ॐ जो साक्षात् परब्रह्म स्वरुप हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

38. 
ॐ श्री साईं परमात्मने नमः
अर्थ :  ॐ जो परमात्मा स्वरुप हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

39. 
ॐ श्री साईं ज्ञानस्वरूपिणे नमः
अर्थ :  ॐ जो साक्षात् ज्ञान के स्वरुप हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

40. 
ॐ श्री साईं जगतः पित्रे नमः
अर्थ :  ॐ जो जगत पिता हैं अर्थात संसार के रचयिता हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

41. 
ॐ श्री साईं भक्तानां मतधातपितामहाय नमः
अर्थ :  ॐ जो भक्तों के मातापालनकर्ता और पितामह हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

42. 
ॐ श्री साईं भक्ताभय प्रदाय नमः
अर्थ :  ॐ जो भक्तों को अभय दान देने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

43. 
ॐ श्री साईं भक्तपराधिनाय नमः
अर्थ :  ॐ जो भक्तों के अधीन होकर उनके ही कल्याण में लगे हुए हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

44. 
ॐ श्री साईं भक्तानुग्रहकातराय नमः
अर्थ :  ॐ जो भक्तों पर अपनी कृपा या अनुग्रह बनाए रखने के लिए अति दयावान हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

45. 
ॐ श्री साईं शरणागतवत्सलाय नमः
अर्थ :  ॐ जो अपनी शरण में आये भक्त पर वात्सल्य रखने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

46. 
ॐ श्री साईं भक्तिशक्तिप्रदाय नमः
अर्थ :  ॐ जो भक्ति और शक्ति देने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

47. 
ॐ श्री साईं ज्ञानवैराग्यपदाय नमः
अर्थ :  ॐ जो ज्ञान और वैराग्य प्रदान करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

48. 
ॐ श्री साईं प्रेमप्रदाय नमः
अर्थ :  ॐ जो प्रेम देने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

49. 
ॐ श्री साईं संशयह्रदयदोर्बल्यपापकर्म नमः
अर्थ :  ॐ जो समस्त संदेहोंमन की दुर्बलतापाप-कर्म तथा वासना का नाश करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

50. 
ॐ श्री साईं ह्रदयग्रन्थिवेदकाय नमः
अर्थ :  ॐ जो मन और विचारों में पड़ी हुई समस्त ग्रंथियों को खोल देने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

51. 
ॐ श्री साईं कर्मध्वंसिने नमः
अर्थ :  ॐ जो पाप-कर्मों से होने वाले प्रभाव को नष्ट करते हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

52. 
ॐ श्री साईं सुद्धसत्त्वस्थिताय नमः
अर्थ :  ॐ जो शुद्ध मन सात्त्विक भावों पर संस्थापित हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

53. 
ॐ श्री साईं गुणातीतगुणात्मने नमः
अर्थ :  ॐ जो गुणों से परे हैं और समस्त सद् गुणों से परिपूर्ण हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

54. 
ॐ श्री साईं अनन्त कल्याणगुणाय नमः
अर्थ :  ॐ जो अनन्त कल्याणकारी हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

55. 
ॐ श्री साईं अमितपराक्रमाय नमः
अर्थ :  ॐ जो असीमित पराक्रम और वीरता के स्वामी हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

56. 
ॐ श्री साईं जयिने नमः
अर्थ :  ॐ जो स्वयं जय हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

57. 
ॐ श्री साईं दुर्घषोक्षोभ्याम नमः
अर्थ :  ॐ जो अत्यंत कठिन को भी सरल करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

58. 
ॐ श्री साईं अपराजितय नमः
अर्थ :  ॐ जो सदा अजेय हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

59. 
ॐ श्री साईं त्रिलोकेषु अनिघातगतये नमः
अर्थ :  ॐ जो तीनों लोकां के स्वामीजिनके कल्याणकारी सद् कर्मो में कोई भी विध्न नहीं हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

60. 
ॐ श्री साईं अशक्यरहिताय नमः
अर्थ :  ॐ जिनकी शक्ति से कोई भी बाहर नहीं हैं ऐसे सद् गुरु श्री साईंनाथ को नमस्कार

61. 
ॐ श्री साईं सर्वशक्तिमूर्तये नमः
अर्थ :  ॐ जो सर्वशक्ति परमात्मा के स्वरुप हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

62. 
ॐ श्री साईं सुसरूपसुन्दराय नमः
अर्थ :  ॐ जो अत्यन्त मनोहारी स्वरुप वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

63. 
ॐ श्री साईं सुलोचनाय नमः
अर्थ :  ॐ जो अत्यन्त सुन्दर नेत्र वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

64. 
ॐ श्री साईं बहुरूपविश्वमूर्तये नमः
अर्थ :  ॐ जो बहुरूपीविश्वरुपीसर्वरुपी हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

65. 
ॐ श्री साईं अरूपाव्यक्ताय नमः
अर्थ :  ॐ जो निराकार हैं जिनके स्वरुप को व्यक्त नहीं किया जा सकताऐसे श्री साईंनाथ को नमस्कार

66. 
ॐ श्री साईं अचिन्ताय नमः
अर्थ :  ॐ जो अकल्पनीयअगम्य और गहन स्वरूप वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

67. 
ॐ श्री साईं सूक्ष्माय नमः
अर्थ :  ॐ जो अत्यन्त सूक्ष्म रूप धारण करने वाले हैं उन सर्वव्यापी प्रभु श्री साईंनाथ को नमस्कार

68. 
ॐ श्री साईं सर्वान्तय्रामिणे नमः
अर्थ :  ॐ जो समस्त जीवों की अन्तरात्मा या हरद में वास करते हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

69. 
ॐ श्री साईं मनोवागतिताय नमः
अर्थ :  ॐ जो भक्तों के मन और वाणी से परे हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

70. 
ॐ श्री साईं प्रेममूर्तये नमः
अर्थ :  ॐ जो साक्षात् प्यार और करुणा के अवतार हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

71. 
ॐ श्री साईं सुलभदुर्लभाय नमः
अर्थ :  ॐ जो भक्त हेतु अत्यन्त सुलभकिन्तु दुष्ट आत्मा हेतु अति दुर्लभ हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

72. 
ॐ श्री साईं असहायसहायाय नमः
अर्थ :  ॐ जो असहायों के सहायक हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

73. 
ॐ श्री साईं अनाथनाथदीनबन्धवे नमः
अर्थ :  ॐ जो अनाथों के नाथ हैं तथा गरीबों के बंधु हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

74. 
ॐ श्री साईं सर्वभारभ्रते नमः
अर्थ :  ॐ जो भक्तों के समस्त दुखों के भार स्वयं पर लेने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

75. 
ॐ श्री साईं अकर्मानेककर्मसुकर्मिणे नमः
अर्थ :  ॐ जो स्वयं अकर्मा होकर अपने सुकर्मों को करने वाले भी हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

76. 
ॐ श्री साईं पुण्यश्रवणकीर्तनाय नमः
अर्थ :  ॐ जिनका सतत् नाम स्मरण और कीर्तन सुनने से पुण्य की प्राप्ति हैं ऐसे श्री साईंनाथ को नमस्कार

77. 
ॐ श्री साईं तीर्थाय नमः
अर्थ :  ॐ जो समस्त तीर्थों के साक्षात् स्वरुप हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

78. 
ॐ श्री साईं वासुदेवाय नमः
अर्थ :  ॐ जो श्री वासुदेव के स्वरूप हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

79. 
ॐ श्री साईं सता गतये नमः
अर्थ :  ॐ जो सज्जनों के गंतव्य हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

80. 
ॐ श्री साईं सत्परायणाय नमः
अर्थ :  ॐ जो सत्य के पूर्णतया समर्पित हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

81. 
ॐ श्री साईं लोकनाथाय नमः
अर्थ :  ॐ जो समस्त लोकों के प्रभु हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

82. 
ॐ श्री साईं पावनानधाय नमः
अर्थ :  ॐ जो पावन पवित्र रूपधारी और दोष रहित हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

83. 
ॐ श्री साईं अमृतांशवे नमः
अर्थ :  ॐ जो अमृत के एक अंश हैं उन अमृतमय श्री साईंनाथ को नमस्कार

84. 
ॐ श्री साईं भास्करप्रभाय नमः
अर्थ :  ॐ जो दैदीप्यमान सूर्य के समान आभा वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

85. 
ॐ श्री साईं ब्रहमचर्यतपश्चर्यादिसुव्रताय नमः
अर्थ :  ॐ जो ब्रहाचर्यतपश्चर्य और अन्य सुब्रतों में स्थित हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

86. 
ॐ श्री साईं सत्यधर्मपराणाय नमः
अर्थ :  ॐ जो सत्य और धर्म का पालन करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

87. 
ॐ श्री साईं सिद्धेश्वराय नमः
अर्थ :  ॐ जो सभी सिद्धियों के स्वामी हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

88. 
ॐ श्री साईं सिद्धसंकल्पाय नमः
अर्थ :  ॐ जिनका संकल्प सदैव सिद्ध होता हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

89. 
ॐ श्री साईं योगेश्वराय नमः
अर्थ :  ॐ जो योग के इश्वर हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

90. 
ॐ श्री साईं भगवते नमः
अर्थ :  ॐ जो समस्त दैविये गुणों के स्वामी हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

91. 
ॐ श्री साईं भक्तवत्सलाय नमः
अर्थ :  ॐ जो भक्तों पर वात्सल्य का रस बरसाने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

92. 
ॐ श्री साईं सत्यपुरुषाय नमः
अर्थ :  ॐ जो धर्मपरायणसतपुरुष हैं उन ऐसे श्री साईंनाथ को नमस्कार

93. 
ॐ श्री साईं पुरुषोत्तमाय नमः
अर्थ :  ॐ जो पुरषोत्तम अर्थात श्रीराम के अवतार हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

94. 
ॐ श्री साईं सत्यतत्वबोधकाय नमः
अर्थ :  ॐ जो सत्य के तत्व का बोध कराने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

95. 
ॐ श्री साईं कामादिषडूवैरिध्वासिने नमः
अर्थ :  ॐ जो समस्त सांसारिक इच्छाओं और छः विकारों (कामक्रोधमोहोमदमत्सर) का नाश करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

96. 
ॐ श्री साईं अभेदानन्दानुभवरप्रदाय नमः
अर्थ :  ॐ जो भक्तों लो स्वयं में एकाकार कर उससे उत्पन्न आनन्द का अनुभव प्रदान करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

97. 
ॐ श्री साईं समसर्वमतसंमताय नमः
अर्थ :  ॐ जो सभी धर्म समान हैंऐसी धारणा रखने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

98. 
ॐ श्री साईं दक्षिणामूर्तये नमः
अर्थ :  ॐ जो शिव रुपी हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

99. 
ॐ श्री साईं वेंकटेशरमणाय नमः
अर्थ :  ॐ जो भगवान विष्णु से प्रेम वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

100. 
ॐ श्री साईं अदभुतांतचर्याय नमः
अर्थ :  ॐ जो अदभुत और अनन्त लीलाओं को करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

101. 
ॐ श्री साईं प्रपन्नार्तीहराय नमः
अर्थ :  ॐ जो शरण में आये भक्तों के संकट का हरण करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

102. 
ॐ श्री साईं संसारसर्वदुखक्षरूपय नमः
अर्थ :  ॐ जो संसार के समस्त दुखों का नाश करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

103. 
ॐ श्री साईं सर्वत्सिव्रतोपुखाय नमः
अर्थ :  ॐ जो त्रिकालदर्शी और सर्वव्यापी हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

104. 
ॐ श्री साईं सर्वांतर्बहिः स्थिताय नमः
अर्थ :  ॐ जो समस्त जीव और पदार्थों के अंदर और बाहर प्रतेक स्थान में स्थित हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

105. 
ॐ श्री साईं सर्वमंगलकराय नमः
अर्थ :  ॐ जो समस्त जग का कल्याण करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

106. 
ॐ श्री साईं सर्वाभीष्टप्रदाय नमः
अर्थ :  ॐ जो समस्त प्राणियों की कल्याणकारी इच्छायों को पूरा करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

107. 
ॐ श्री साईं रामरसतन्मर्गस्थानपनाय नमः
अर्थ :  ॐ जो विभिन्न धर्मों के अनुयायियों को एकता और समानता के सूत्र में पिरोकर सन्मार्ग की स्थापना करने वाले हैं उन श्री साईंनाथ को नमस्कार

108. 
ॐ श्री साईं समर्थसद् गुरुसाईंनाथाय नमः
अर्थ :  ॐ जो आत्मिक ज्ञान प्रदान करने वालेपूर्ण सद् गुरु श्री साईंनाथ को नमस्कार

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