शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Thursday, 14 November 2019

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 25

ॐ साईं राम



बाल-दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं, हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है|

हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है|


श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 25

दामू अण्णा कासार-अहमदनगर के रुई और अनाज के सौदे, आम्र-लीला

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प्राक्कथन
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जो अकारण ही सभी पर दया करते है तथा समस्त प्राणियों के जीवन व आश्रयदाता है, जो परब्रहृ के पूर्ण अवतार है, ऐसे अहेतुक दयासिन्धु और महान् योगिराज के चरणों में साष्टांग प्रणाम कर अब हम यह अध्याय आरम्भ करते है । श्री साई की जय हो । वे सन्त चूड़ामणि, समस्त शुभ कार्यों के उदगम स्थान और हमारे आत्माराम तथा भक्तों के आश्रयदाता है । हम उन साईनाथ की चरण-वन्दना करते है, जिन्होंने अपने जीवन का अन्तिम ध्येय प्राप्त कर लिया है । श्री साईबाबा अनिर्वचनीय प्रेमस्वरुप है । हमें तो केवल उनके चरणकमलों में दृढ़ भक्ति ही रखनी चाहिये । जब भक्त का विश्वास दृढ़ और भक्ति परिपक्क हो जाती है तो उसका मनोरथ भी शीघ्र ही सफल हो जाता है । जब हेमाडपंत को साईचरित्र तथा साई लीलाओं के रचने की तीव्र उत्कंठा हुई तो बाबा ने तुरन्त ही वह पूर्ण कर दी । जब उन्हें स्मृति-पत्र (Notes) इत्यादि रखने की आज्ञा हुई तो हेमाडपंत में स्फूर्ति, बुद्घिमत्ता, शक्ति तथा कार्य करने की क्षमता स्वयं ही आ गई । वे कहते है कि मैं इस कार्य के सर्वदा अयोग्य होते हुए भी श्री साई के शुभार्शीवाद से इस कठिन कार्य को पूर्ण करने में समर्थ हो सका । फलस्वरुप यह ग्रन्थ श्री साई सच्चरित्र आप लोगों को उपलब्ध हो सका, जो एक निर्मल स्त्रोत या चन्द्रकान्तमणि के ही सदृश है, जिसमें से सदैव साई-लीलारुपी अमृत झरा करता है, ताकि पाठकगण जी भर कर उसका पान करें । जब भक्त पूर्ण अन्तःकरण से श्री साईबाबा की भक्ति करने लगता है तो बाबा उसके समस्त कष्टों और दुर्भाग्यों को दूर कर स्वयं उसकी रक्षा करने लगते है । अहमदनगर के श्री दामोदर साँवलाराम रासने कासार की निम्नलिखित कथा उपयुक्त कथन की पुष्टि करती है ।

दामू अण्णा
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पाठकों को स्मरण होगा कि इन महाशय का प्रसंग छठवें अध्याय में शिरडी के रामनवमी उत्सव के प्रसंग में आ चुका है । ये लगभग सन् 1895 में शिरडी पधारे थे, जब कि रामनवमी उत्सव का प्रारम्भ ही हुआ था और उसी समय से वे एक जरीदार बढ़िया ध्वज इस अवसर पर भेंट करते तथा वहाँ एकत्रित गरीब भिक्षुओं को भोजनादि कराया करते थे ।

दामू अण्णा के सौदे
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1. रुई का सौदा

दामू अण्णा को बम्बई से उनके एक मित्र ने लिखा कि वह उनके साथ साझेदारी में रुई का सौदा करना चाहते है, जिसमें लगभग दो लाख रुपयों का लाभ होने की आशा है । सन् 1936 में नरसिंह स्वामी को दिये गये एक वक्तव्य में दामू अण्णा ने बतलाया किरुई के सौदे का यह प्रस्तताव बम्बई के एक दलाल ने उनसे किया था, जो कि साझेदारी से हाथ खींचकर मुझ पर ही सारा भार छोड़ने वाला था । (भक्तों के अनुभव भाग 11, पृष्ठ 75 के अनुसार) । दलाला ने लिखा था कि धंधा अति उत्तम है और हानि की कोई आशंका नहीं । ऐसे स्वर्णम अवसर को हाथ से न खोना चाहिए । दामू अण्णा के मन में नाना प्रकार के संकल्प-विकल्प उठ रहे थे, परन्तु स्वयं कोई निर्णय करने का साहस वे न कर सके । उन्होंने इस विषय में कुछ विचार तो अवश्य कर लिया, परन्तु बाबा के भक्त होने के कारण पूर्ण विवरण सहित एक पत्र शामा को लिख भेजा, जिसमें बाबा से परामर्श प्राप्त करने की प्रार्थना की । यह पत्र शामा को दूसरे ही दिन मिल गया, जिसे दोपहर के समय मसजिद में जाकर उन्होंने बाबा के समक्ष रख दिया । शामा से बाबा ने पत्र के सम्बन्ध में पूछताछ की । उत्तर में शामा ने कहा कि अहमदनगर के दामू अण्णा कासार आप से कुछ आज्ञा प्राप्त करने की प्रार्थना कर रहे है । बाबा ने पूछा कि वह इस पत्र में क्या लिख रहा है और उसने क्या योजना बनाई है । मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह आकाश को छूना चाहता है । उसे जो कुछ भी भगवत्कृपा से प्राप्त है, वह उससे सन्तुष्ट नहीं है । अच्छा, पत्र पढ़कर तो सुनाओ । शामा ने कहा, जो कुछ आपने अभी कहा, वही तो पत्र में भी लिखा हुआ है । हे देवा । आप यहताँ शान्त और स्थिर बैठे रहकर भी भक्तों को उद्घिग्न कर देते है और जब वे अशान्त हो जाते है तो आप उन्हें आकर्षित कर, किसी को प्रत्यक्ष तो किसी को पत्रों द्घारा यहाँ खींच लेते है । जब आपको पत्र का आशय विदित ही है तो फिर मुझे पत्र पढ़ने का क्यों विवश कर रहे है । बाबा कहने लगे कि शामा । तुम तो पत्र पढ़ो । मै तो ऐसे ही अनापशनाप बकता हूँ । मुझ पर कौन विश्वास करता है । तब शामा ने पत्र पढ़ा और बाबा उसे ध्यानपूर्वक सुनकर चिंतित हो कहने लगे कि मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि सेठ (दामू अण्णा) पागल हो गया है । उसे लिख दो कि उसके घर किसी वस्तु का अभाव नहीं है । इसलिये उसे आधी रोटी में ही सन्तोष कर लाखों के चक्कर से दूर ही रहना चाहिये । शामा ने उत्तर लिखकर भेज दिया, जिसकी प्रतीक्षा उत्सुकतापूर्वक दामू अण्णा कर रहे थे । पत्र पढ़ते ही लाखों रुपयों के लाभ होने की उनकी आशा पर पानी फिर गया । उन्हें उस समय ऐसा विचार आया कि बाबा से परामर्श कर उन्होंने भूल की है । परन्तु शामा ने पत्र में संकेत कर दिया था कि देखने और सुनने में फर्क होता है । इसलिये श्रेयस्कर तो यही होगा कि स्वयं शिरडी आकर बाबा की आज्ञा प्राप्त करो । बाबा से स्वयं अनुमति लेना उचित समझकर वे शिरडी आये । बाबा के दर्शन कर उन्होंने चरण सेवा की । परन्तु बाबा के सम्मुख सौदे वाली बात करने का साहस वे न कर सके । उन्होंने संकल्प किया कि यदि उन्होंने कृपा कर दी तो इस सौदे में से कुछ लाभाँश उन्हें भी अर्पण कर दूँगा । यघपि यह विचार दामू अण्णा बड़ी गुप्त रीति से अपने मन में कर रहे थे तो भी त्रिकालदर्शी बाबा से क्या छिपा रह सकता था । बालक तो मिष्ठान मांगता है, परन्तु उसकी माँ उसे कड़वी ही औषधि देती है, क्योंकि मिठाई स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होती है और इस कारण वह बालक के कल्याणार्थ उसे समझा-बुझाकर कड़वी औषधि पिला दिया करती है । बाबा एक दयालु माँ के समान थे । वे अपने भक्तों का वर्तमान और भविष्य जानते थे । इसलिये उन्होंने दामू अण्णा के मन की बात जानकर कहा कि बापू । मैं अपने को इन सांसारिक झंझटों में फँसाना नहीं चाहता । बाबा की अस्वीकृति जानकर दामू अण्णा ने यह विचार त्याग दिया।

2. अनाज का सौदा

तब उन्होंने अनाज, गेहूँ, चावल आदि अन्य वस्तुओं का धन्धा आरम्भ करने का विचार किया । बाबा ने इस विचार को भी समझ कर उनसे कहा कि तुम रुपये का 5 सेर खरीदोगे और 7 सेर को बेचोगे । इसलिये उन्हें इस धन्धे का भी विचार त्यागना पड़ा । कुछ समय तक तो अनाजों का भाव चढ़ता ही गया और ऐसा प्रतीत होने लगा कि संभव है, बाबा की भविष्यवाणी असत्य निकले । परन्तु दो-एक मास के पश्चात् ही सब स्थानों में पर्याप्त वृष्टि हुई, जिसके फलस्वरुप भाव अचानक ही गिर गये और जिन लोगों ने अनाज संग्रह कर लिया था, उन्हें यथेष्ठ हानि उठानी पड़ी । पर दामू अण्णाइस विपत्ति से बच गये । यह कहना व्यर्थ न होगा कि रुई का सौदा, जो कि उस दलाल ने अन्य व्यापारी की साझेदारी में किया था, उसमें उसे अधिक हानि हुई । बाबा ने उन्हें बड़ी विपत्तियों से बचा लिया है, यह देखकर दामू अण्णा का साईचरणों में विश्वास दृढ़ हो गया और वे जीवनपर्यन्त बाबा के सच्चे भक्त बने रहे ।

आम्रलीला
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एक बार गोवा के एक मामलतदार ने, जिनका नाम राले था, लगभग 300 आमों का एक पार्सल शामा के नाम शिरडी भेजा । पार्सल खोलने पर प्रायः सभी आम अच्छे निकले । भक्तों में इनके वितरण का कार्य शामा को सौंपा गया । उनमें से बाबा ने चार आम दामू अण्णा के लिये पृथक् निकाल कर रख लिये । दामू अण्णा की तीन स्त्रियाँ थी । परन्तु अपने दिये हुये वक्तव्य में उन्होंने बतलाया था कि उनकी केवल दो ही स्त्रियाँ थी । वे सन्तानहीन थे, इस कारण उन्होंने अनेक ज्योतिषियों से इसका समाधान कराया और स्वयं भी ज्योतिष शास्त्र का थोड़ा सा अध्ययन कर ज्ञात कर लिया कि जन्म कुण्डली में एक पापग्रह के स्थित होने के कारण इस जीवन में उन्हें सन्तान का मुख देखने का कोई योग नहीं है । परन्तु बाबा के प्रति तो उनकी अटल श्रद्घा थी । पार्सल मिलने के दो घण्टे पश्चात् ही वे पूजनार्थ मसजिद में आये । उन्हें देख कर बाबा कहने लगे कि लोग आमों के लिये चक्कर काट रहे है, परन्तु ये तो दामू के है । जिसके है, उन्हीं को खाने और मरने दो । इन शब्दों को सुन दामू अण्णा के हृदय पर वज्राघात सा हुआ, परन्तु म्हालसापति (शिरडी के एक भक्त) ने उन्हें समझाया कि इस मृत्यु श्ब्द का अर्थ अहंकार के विनाश से है और बाबा के चरणों की कृपा से तो वह आशीर्वादस्वरुप है, तब वे आम खाने को तैयार हो गये । इस पर बाबा ने कहा कि वे तुम न खाओ, उन्हें अपनी छोटी स्त्री को खाने दो । इन आमों के प्रभाव से उसे चार पुत्र और चार पुत्रियाँ उत्पन्न होंगी । यह आज्ञा शिरोधार्य कर उन्होंने वे आम ले जाकर अपनी छोटी स्त्री को दिये । धन्य है श्री साईबाबा की लीला, जिन्होने भाग्य-विधान पलट कर उन्हें सन्तान-सुख दिया । बाबा की स्वेच्छा से दिये वचन सत्य हुये, ज्योतिषियों के नहीं । बाबा के जीवन काल में उनके शब्दों ने लोगों में अधिक विश्वास और महिमा स्थापित की, परन्तु महान् आश्चर्य है कि उनके समाधिस्थ होने कि उपरान्त भी उनका प्रभाव पूर्ववत् ही है । बाबा ने कहा कि मुझ पर पूर्ण विश्वास रखो । यधपि मैं देहत्याग भी कर दूँगा, परन्तु फिर भी मेरी अस्थियाँ आशा और विश्वास का संचार करती रहेंगी । केवल मैं ही नही, मेरी समाधि भी वार्तालाप करेगी, चलेगी, फिरेगी और उन्हें आशा का सन्देश पहुँचाती रहेगी, जो अनन्य भाव से मेरे शरणागत होंगे । निराश न होना कि मैं तुमसे विदा हो जाऊँगा । तुम सदैव मेरी अस्थियों को भक्तों के कल्याणार्थ ही चिंतित पाओगे । यदि मेरा निरन्तर स्मरण और मुझ पर दृढ़ विश्वास रखोगे तो तुम्हें अधिक लाभ होगा ।

प्रार्थना
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एक प्रार्थना कर हेमाडपंत यह अध्याय समाप्त करते है ।
हे साई सदगुरु । भक्तों के कल्पतरु । हमारी आपसे प्रार्थना है कि आपके अभय चरणों की हमें कभी विस्मृति न हो । आपके श्री चरण कभी भी हमारी दृष्टि से ओझल न हों । हम इस जन्म-मृत्यु के चक्र से संसार में अधिक दुखी है । अब दयाकर इस चक्र से हमारा शीघ्र उद्घार कर दो । हमारी इन्द्रियाँ, जो विषय-पदार्थों की ओर आकर्षित हो रही है, उनकी बाहृ प्रवृत्ति से रक्षा कर, उन्हें अंतर्मुखी बना कर हमें आत्म-दर्शन के योग्य बना दो । जब तक हमारी इन्द्रयों की बहिमुर्खी प्रवृत्ति और चंचल मन पर अंकुश नहीं है, तब तक आत्मसाक्षात्कार की हमें कोई आशा नहीं है । हमारे पुत्र और मीत्र, कोई भी अन्त में हमारे काम न आयेंगे । हे साई । हमारे तो एकमात्र तुम्हीं हो, जो हमें मोक्ष और आनन्द प्रदान करोगे । हे प्रभु । हमारी तर्कवितर्क तथा अन्य कुप्रवृत्तियों को नष्ट कर दो । हमारी जिहृ सदैव तुम्हारे नामस्मरण का स्वाद लेती रहे । हे साई । हमारे अच्छे बुरे सब प्रकार के विचारों को नष्ट कर दो । प्रभु । कुछ ऐसा कर दो कि जिससे हमें अपने शरीर और गृह में आसक्ति न रहे । हमारा अहंकार सर्वथा निर्मूल हो जाय और हमें एकमात्र तुम्हारे ही नाम की स्मृति बनी रहे तथा शेष सबका विस्मरण हो जाय । हमारे मन की अशान्ति को दूर कर, उसे स्थिर और शान्त करो । हे साई । यदि तुम हमारे हाथ अपने हाथ में ले लोगे तो अज्ञानरुपी रात्रि का आवरण शीघ्र दूर हो जायेगा और हम तुम्हारे ज्ञान-प्रकाश में सुखपूर्वक विचरण करने लगेंगे । यह जो तुम्हारा लीलामृत पान करने का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ तथा जिसने हमें अखण्ड निद्रा से जागृत कर दिया है, यह तुम्हारी ही कृपा और हमारे गत जन्मों के शुभ कर्मों का ही फल है ।

विशेष
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इस सम्बन्ध में श्री. दामू अण्णा के उपरोक्त कथन को उद्घत किया जाता है, जो ध्यान देने योग्य है – एक समय जब मैं अन्य लोगों सहित बाबा के श्रीचरणों के समीप बैठा था तो मेरे मन में दो प्रश्न उठे । उन्होंने उनका उत्तर इस प्रकार दिया ।
1. जो जनसमुदाय श्री साई के दर्शनार्थ शिरडी आता है, क्या उन सभी को लाभ पहुँचता है । इसका उन्होंने उत्तर दिया कि बौर लगे आम वृक्ष की ओर देखो । यदि सभी बौर फल बन जायें तो आमों की गणना भी न हो सकेगी । परन्तु क्या ऐसा होता है । बहुत-से बौर झर कर गिर जाते है । कुछ फले और बढ़े भी तो आँधी के झकोरों से गिरकर नष्ट हो जाते है और उनमें से कुछ थोड़े ही शेष रह जाते है ।
2. दूसरा प्रश्न मेरे स्वयं के विषय में था । यदि बाबा ने निर्वाण-लाभ कर लिया तो मैं बिलकुल ही निराश्रित हो जाऊँगा, तब मेरा क्या होगा । इसका बाबा ने उत्तर दिया कि जब और जहाँ भी तुम मेरा स्मरण करोगे, मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगा । इन वचनों को उन्होंने सन् 1918 के पूर्व भी निभाया है और सन् 1918 के पश्चात आज भी निभा रहे है । वे अभी भी मेरे ही साथ रहकर मेरा पथ-प्रदर्शन कर रहे है । यह घटना लगभग सन् 1910-11 की है । उसी समय मेरा भाई मुझसे पृथक हुआ और मेरी बहन की मृत्यु हो गई । मेरे घर में चोरी हुई और पुलिस जाँच-पड़ताल कर रही थी । इन्हीं सब घटनाओं ने मुझे पागल-सा बना दिया था । मेरी बहन का स्वर्गवास होने के कारम मेरे दुःख का रारावार न रहा और जब मैं बाबा की शरण गया तो उन्होंने अपने मधुर उपदेशों से मुझे सान्तवना देकर अप्पा कुलकर्णी के घर पूरणपोली खलाई तथा मेरे मस्तक पर चन्दन लगाया । जब मेरे घर चोरी हुई और मेरे ही एक तीसवर्षीय मित्र ने मेरी स्त्री के गहनों का सन्दूक, जिसमें मंगलसूत्र और नथ आदि थे, चुरा लिये, तब मैंने बाबा के चित्र के समक्ष रुदन किया और उसके दूसरे ही दिन वह व्यक्ति स्वयं गहनों का सन्दूक मुझे लौटाकर क्षमा-प्रार्थना करने लगा ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 13 November 2019

वो साईं नाथ है मेरा,

ॐ सांई राम


गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णु

गुरुर देवो महेश्वराः

गुरुर साक्षात् परब्रह्म

तस्मै श्री गुरुवे  नमः

जिसका  इस  जग  के  कण कण  में  ,

हर  प्राणी  में  है  बसेरा

वो  साईं  नाथ  है  मेरा  ,

 वो  साईं  नाथ  है  मेरा



जिसका  इस  जग  के  कण कण  में  ,

हर  प्राणी  में  है  बसेरा

वो  साईं  नाथ  है  मेरा  ,

वो  साईं  नाथ  है  मेरा



जिसमे  शिव,   ब्रह्मा और   विष्णु की

शक्ति का है बसेरा

वो  साईं  नाथ  है  मेरा  ,

वो  साईं  नाथ  है  मेरा





जय साईं  जी, जय साईं जी

जय साईं जी , जय साईं जी



 ये शिर्डी है जहाँ दीन दुखी

जपते साईं नाम की माला



साईं ॐ साईं ॐ

साईं ॐ साईं ॐ



यहाँ द्वारिका माई में बसते

मेरे साईं दीन दयाला

मेरे साईं दीन दयाला

यहाँ प्रेम की जोत जला कर साईं

करते दूर अँधेरा

वो साईं नाथ है मेरा

वो साईं नाथ  है मेरा





हर गुरुवार को करके  दर्शन

हम भी मुरादें पायें

उस कृपा की गंगा में जाकर

हम  पावन बन  जाएँ

हम  पावन बन  जाएँ

जिस  महासंत दत्तावतार ने

प्रेम का रंग बिखेरा

वो साईं नाथ है मेरा

वो साईं नाथ है मेरा



मेरे साईं नाथ ने  सब भक्तों के

दुःख अपने पर झेले

गर तू भी अपनी मुक्ति चाहे

साईं नाम तू  ले ले


जहाँ हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई

सब अपनी झोलियाँ भरते

सब अपनी झोलियाँ भरते

जहाँ सब धर्मों का संगम है

वहां साईं का है बसेरा

वो साईं नाथ है मेरा

वो साईं नाथ है मेरा



 जिसका  इस  जग  के  कण कण  में  ,

हर  प्राणी  में  है  बसेरा

वो  साईं  नाथ  है  मेरा  ,

 वो  साईं  नाथ  है  मेरा



 उसके दर पर तू भी आके

अपना शीश झुका ले

अपने हिरदय में श्रद्धा भर ले

साईं को तू मना ले

साईं को तू मना ले


जो भरता सबकी झोली खाली

करता दूर अँधेरा

वो साईं नाथ है मेरा

वो साईं नाथ है मेरा



जिसमे  शिव,   ब्रह्मा और   विष्णु की

शक्ति का है बसेरा

वो  साईं  नाथ  है  मेरा  ,

वो  साईं  नाथ  है  मेरा

साईं ॐ साईं ॐ साईं ॐ साईं ॐ

जिसके चरणों  को   मह्नादी  गोदावरी ने पूजा
वो  महा संत वो महा दयालु करते दूर अँधेरा
जिसका आसन था टाट का टुकड़ा
बदन पे पहनी कफनी

जिसका हथिआर था इक सटका
भिक्षा की झोली संगिनी
साईं का नाम तू जप ले बन्दे
दुःख दूर करेंगे तेरा
वो साईं  नाथ है मेरासाईं ॐ साईं ॐ साईं ॐ साईं ॐ
भजन रूप रेखिका बहन रविंदर जी

KALIYUGA

At the end ofthe Dwapar Yuga, at that time Kali Yuga, the source of all chaos tookbirth in the minds of the ignorant. When king Yudhishtir realized theadvent of the Kali Yuga that is chaos, greed, violence, debauchery andlies, he expressed a desire to go to the forest and do penance.Accordingly, he abdicated the throne and coronated his grandsonParikshit as the king.

When Kali Yuga met king Parikshit, he was shivering with fear and saidhumbly:" O king! Brahma created 4 eras that are Satya, Treta, Dwaparand Kali Yuga. Satya Yuga enjoyed his reign for 17,28,000 years andwent away. Treta Yuga enjoyed his reign for 12,96,000 years and DwaparYuga enjoyed his reign for 8,64,000 years and passed away. Now the timefor me has come to reign which is 4,32,000 years and you tell me to getout from your empire. You rule over the entire world. Where should I goafter all? O king! What is once proposed by the Gods cannot be erasedor eliminated."
Kali Yuga told Parikshit that:" You point your fingers on my flaws anddemerits but do not see my merits and positive aspects. I amembellished with sublime merits. That is the reason I request you.
During the Satya Yuga if any one inadvertently committed a wrong deedthe entire kingdom had to bear the punishment. During Treta, if any onecommitted a wrong deed, the people of that town had to bear thepunishment. During Dwapar Yuga, if anyone happened to commit a wrongdeed, the entire family had to bear the punishment, but in Kali Yuga,he shall only bear the punishment who has committed the wrong deed. Iam not concerned about anyone else."

Unlike the other eras where one had to inevitably bear the punishmentfor a wrong and bad thoughts, In my era, this shall cease to happen butone shall be bestowed with good fruits who thinks good."
Even after listening to this, King Parikshit did not relent, Kali Yugasaid that he was endowed with yet another sublime merits. He said:" Onecould fulfill all ones wishes and desires in the Satya Yuga only afterpracticing penance for 10,000 years. Similarly in the Treta Yuga andthe Dwapar Yuga, one had to collect a lot of money and perform Yagyasand had to engage in charity, penance, vows and worship for a 100 yearsrespectively to fulfil ones desires. Unlike the others, in this era, ifone even prays to God for sometime with total faith and devotions andsings the praises of the Lord, he shall fulfill all his desires withinno time. He shall be liberated from all his sins and shall consequentlyattain salvation."

Listening tothis King Parikshit was pleased. King Parikshit finally allowed KaliYuga to stay and allowed him four places where he could stay, liquorand wine, where a prostitute stays, where there is animal slaughter andwhere gambling would be allowed. Kali Yuga humbly pleaded that hisfamily was very big that is it comprises of members like lust, anger,greed, ego, jealousy, lies etc.
How shall all of them fit in these allotted places? On this kingParikshit said that they should all then dwell in gold. In this way,Kali Yuga resides in the 5 places allotted by king Parikshit. Thosepeople who yearn for higher ideals should not even go near these fivethings.

In the Kali Yuga, there is no average life expectancy of humans. Even achild in the womb can die inspite of his mother and father living..

Humans taking birth in this era will usually be radiant, bad tempered,greedy and untruthful. The personality will be plagued by flaws such asjealousy, ego, anger, pleasure, instinct, desires and greed. Thereshall be only one pillar of religion in the Kali Yuga..

All types of problems such as ailments, lethargy, anger, mentaldiseases and hunger, thirst tend to aggravate. Gradually even happinessand comforts of humans become decadent and morbid.
In Kali Yuga,Brahmins shall renounce self-study, contemplation and shall eat everything that is prohibited. They will no more be inclined towards penanceand on the contrary Shudras shall take interest in recitation of Vedicchants.

In this way when hypocrisy reaches the zenith, it initiates the finalannihilation. Many a king of the inferior category shall reign theearth who shall be sinners, unfaithful and wicked. No Brahmin in thisage shall earn his daily bread and butter honestly.

Kshatriyas and Vaishyas shall engage in all duties other than those,which are coveted. All shall become less valiant, they shall be shortlived, will lack energy and strength. Humans shall be short in heightand shall seldom speak the truth. All the directions will have snakesand animals.

Many a creatures, insects etc. shall take birth in Kali Yuga. Allthings that ought to have fragrance shall not be that fragrant, andfood shall relatively become tasteless. Women shall be short and havemany children. Women in this era shall be immoral and licentious bynature. Most people shall be traders of food while Brahmins shall sellthe Vedas. Many of the women shall engage in prostitution. In the KaliYuga, there will be very less milk in the udders of the cow. Seldomwill there be fruits and flowers on trees. There will be excessivenumber of crows in comparison to other birds. Brahmins will engage inkilling and shall take donation from kings inspite of lying. Brahminsas a whole shall be imposters and feign to be very pious and pure. Theywill harass the common people for alms etc.

Householders shall indulge in robbery because they will be unable topay up their taxes. They shall disguise in the form of sages, asceticsand earn their livelihood. Even people who are celibates shall give uptheir purity and engage in intoxication and shall have illicit sex.People will engage in all those material activities that ushersphysical energy only. All Ashrams shall be a haven of all imposters andthey shall be totally dependent on food from others. During this time,seldom shall it rain and even the yield, production of grain will notbe satisfactory. People will be aggressive by nature and consequentlyunholy and impure. The ones indulging in irreligious and blasphemousacts shall emerge powerful and prosperous. Those who are righteousshall be in penury.

Just by amassing a little amount of wealth one shall become proud andthey despite having wealth shall have an eye on others wealth andproperty. In Kali Yuga, girls, 8-10 years old shall become pregnantwhile boys of the age of 10-12 years shall have children. On thesixteenth year itself the hair will turn white. Youth shall becomealike old men and old men shall become energetic and youthful. Womenwill engage in sex with inferior men, servants and animals inspite ofhaving a good husband.
Religion, truth, thoughts, pity, age, energy, memory all shall getgradually emaciated and drained. People will love only their ownchildren and family and will not hesitate to deceive their own friends,benefactors. Judges of events shall favor the wealthy and theimpoverished shall be denied justice. One who constantly blabbers shallbe called a saint and one who is in a miserable state will be called animposter.

Any lake or reservoir situated far away will be referred as a holyshrine. People will take interest in religious actions so as to becomeprosperous and successful. He who subdues the others shall beself-proclaimed king. Subjects to protect their families shall seekrefuge in caves and caverns and will lead a miserable life.

People will be plagued with all types of extreme climatic conditions.Average life expectancy of a human being in Kali Yuga will beapproximately 20 to 30 years only.As the delusion will aggravate peoplewill become weak and devoid of radiance, medicines and food willplummet. and all the four stages (Varnashrams) will be represented byGrihastashram (householder’s duty). By the end of the Kali Yuga, TheGod shall reincarnate to protect religion and to destroy all evil.

Kindly Provide Food & clean drinking Water to Birds & Other Animals,
This is also a kind of SEWA.

Tuesday, 12 November 2019

साईं राम मै तो बैठा हूँ तेरे चरणों में, आके बस जाओ तुम मेरी पलकों मे

ॐ सांई राम




साईं राम मै तो बैठा हूँ तेरे चरणों में

आके बस जाओ तुम मेरी पलकों मे

साईं राम ......



मुझको गाड़ी न बंगला न यश चाहिए

साईं के नाम का मुझको रस चाहिए

सुख मिले साईं तेरे ही चरणों मे

साईं राम ......

साईं का भक्त हूँ साईं सुमिरन करूँ

साईं नाम का सदा ही मै चिंतन करूँ

सच्चा आनंद है इनके चरणों मे

साईं राम ......

साईं तुने मुझे सब कुछ है दिया

जिसके काबिल न था वो सभी सुख दिया

सारे सुख है मिले साईं चरणों में

साईं राम......
भजन प्रस्तुति बहन रविंदर जी के कर कमलो द्वारा

Monday, 11 November 2019

तुझमे साईं मुझमे साईं, सबसे साईं समाया

ॐ सांई राम


तुझमे साईं मुझमे साईं, सबसे साईं समाया

सबसे कर ले प्रेम जगत में, सब में साईं समाया रे....

तुझमे राम .....


न वह मंदिर न वह मस्जिद, न काबे कैलाश

मन मंदिर में देख रे बन्दे, साईं तो तेरे पास

क्या मानव, क्या कीट पतंगा, सबमे साईं समाया

सबसे करले प्रेम जगत में, सबसे साईं समाया

तुझमे साईं .......



जात-पात का भेद मिटा देऐ मूरख इंसान

धर्म प्रान्त के बंधन में, ना बंधते भगवान

व्यर्थ के भेद भाव में पड़करतूने जन्म गंवाया

सबसे कर ले प्रेम जगत मेंसबमे साईं समाया

तुझमे साईं .......



धन दौलत के लोभ में बन्दे समय को दिया निकाल

साईं नाम जपने को बन्दे कुछ तो समय निकाल

शान बान में फंसकर तूने निर्धन को ठुकराया

सबसे कर ले प्रेम जगत में, सबमे साईं समाया

तुझमे साईं .......

यह भजन बहन रविंदर जी के द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा है |
बाबा कृपा उन पैर सदा बनी रहे |
और हमें बाबा के गुणगान का अमृत रस-पान होता रहे |

Since Sai Baba fulfills our desires. He is so popular and praised among the devotees. First step to become Sai Baba's devotee is getting a desire fulfilled, or praying to Sai Baba or doing a vratta in the name of Holy Sai Baba and get out of a difficult and distracting situation.
Saibaba always used to say that , "I give people what they want so that I can give what I want to give them."
This statement has been repeated on this blog few times, and i remember a comment on a social sharing site that ' i wonder what he (Shri Sai Baba) wants to give?'
What Sai baba wants to give is a spiritual urge and interest inspiritual matters tat will lead the devotees to the spiritual progress, untill they melt and merge into the divine one. 'Be one with Me' Sai Baba used to say. Being one with Sai Baba is melting and merging in thedivine reality.
Many would term that as spiritual attainment or divine attainment. Thatis the language of our ego or our wrong self, which is always after attaining something. It wants to attain power, it wants to attain security, it wants to attain peace. It even wants to attain divinity,which is impossible.
How can a small self always getting disturbed with petty things, it can get disturb with a single statement from somebody attain the greatest,"Divinity".?
But that is the wa our self works. Being petty it asks and thinks petty(little).
One petty desire is fulfilled, it asks for another,and this continues until one realizes that, what is important is not the fulfillment of desires but ending of desire itself.
When the petty self gets attacked by fear due to some insecurity, itgoes to Sai Baba and most probably tells Sai Baba the solution of the problem. Baba if this thing happens, I will do this or that. And keep praying and remembering Sai Baba until that happens, get relived. The intensity of prayers and remembrance of Sai Baba or God or Divine reduces until another insecurity strikes and the petty self trembles from fear.
While asking and suggesting the solution to Sai Baba it forgets, thatthe solution is coming out of the petty self, and so has to be petty and temporary.
Why can't the mind say 'O Sai Baba I am in trouble, or my system is attacked by fear, please remove the fear, rather than giving Him the solution? Why can't it be humble enough in front of Sai Baba? That you have the solution and I can not show you the solution to the problem. Most of the time we put more weight on our solutions rather than asking for His solution. Result!
Sometimes when our solution does not happen,the self gets more stressed and goes to the point to even abuse the merciful Baba or saying that Sai Baba does not care (the saddest part). This result has nothing do with Sai Baba or the Divine, but for the love of the soution our petty self has created, which has to be petty,
The love of te petty self, which has the habit of going down due topetty reasons rules over the Divine. The result?
Would not it be better if we let the Divine will work on us and forget our self's will? Surrender to the Divine will, put more stress on Divine words fallen from Sai Baba's mouth like remembering God or Allah always. Reading holy scriptures and Sri Sai Sat Charitra. Considering the Divine love over everything, everything our petty mind can produce as a solution to the so called Happy living.
The real solution comes when the Divine Love and Divine energy fills the self or earase the self, removes the insecurity and wants. The self that was insecure, always looking for this and that, thinking it would satisfy the needs, is lost! and only Divinity persists.
So rather than giving a solution to Sai Baba, why not say Baba I am troubled with a problem, I surrender the problem to you, I surrender the petty self to you and you fill it with Your Divine love, Your divine protection, Your Divine devotion, and Your Divine Shakti (energy).

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This is also a kind of SEWA.

Sunday, 10 November 2019

तेरे दर से आस लगी बाबा मुझे खाली हाथ न मोड़ना

ॐ सांई राम



तेरे दर से आस लगी बाबा
मुझे खाली हाथ न मोड़ना

चाहे टूटे नाता इस जग से
मुझसे नाता न तोड़ना

मै तेरे दर का पुजारी हूँ

मेरे ब्रह्मा विष्णु तुम्ही साईं

तुम्ही तो गणेश का रूप हो

तुममे साडी सृष्टि समायी

सभी देवी देव तुम्ही साईं

मुझे दीखता कोई और ना

तेरे दर से आस लगी बाबा

मुझे खाली हाथ न मोड़ना

चाहे टूटे नाता इस जग से

मुझसे नाता न तोड़ना

तुझसे बस इतना मांगू में

मेरा अतिथि भूखा न जाये

तेरा रहमों करम हो बस इतना

कोई खाली हाथों न जाये

औलाद मेरी कभी दुखी न हो

मेरे घर में हो कोई थोड़ 
भजनों की यह माला बाबा जी के श्री चरणों में प्रस्तुत कर रही है बहन रविंदर जी


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