शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 14 July 2018

श्री साईं लीलाएं- मस्जिद का पुनः निर्माण और बाबा का गुस्सा

ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. रामनवमी के दिन शिरडी का मेला       

श्री साईं लीलाएं

मस्जिद का पुनः निर्माण और बाबा का गुस्सा

गोपालराव गुंड की एक इच्छा तो पूर्ण हो गई थीउसी तरह उनकी एक और इच्छा भी थी कि मस्जिद का पुनर्निर्माण का कार्य भी कराना चाहिएअपने इस विचार को साकार रूप देने के लिए उन्होंने पत्थर इकट्टा करके उन्हें वर्गाकार बनवाया थालेकिन इस कार्य का श्रेय उन्हें प्राप्त नहीं हुआशायद बाबा की इच्छा न थीमस्जिद के पुनर्निर्माण का श्रेय नाना साहब चाँदोरकर को मिला और आंगन के कार्य का श्रेय काका साहब दीक्षित को मिलाबाबा की शायद यही इच्छा थी कि यह कार्य इन कार्यों को अनुमति नहीं दी थी|
बाबा से अनुमति प्राप्त करने के पश्चात् देखते-ही-देखते एक ही रात में मस्जिद का पूरा आंगन बनकर तैयार हो गयाफिर भी साईं बाबा अपने उसी टाट के टुकड़े के आसन पर ही बैठते थेबाद में टाट के टुकड़े को वहां से हटाकर उसकी जगह पर एक छोटी-सी गद्दी बिच्छा दी गयी| 1911 में बाबा के भक्तों ने भरपूर मेहनत करके सभामंडप को भी बना दिया थाक्योंकि मस्जिद का आंगन छोटा था और भक्तों की संख्या अधिक होने पर असुविधा होती थीकाका साहब दीक्षित आंगन को विस्तार देकर छप्पर बनवाने की इच्छा रखते थेइसलिए उन्होंने आवश्यकतानुसार धन खर्च करके लोहे की बल्लियां आदि खरीद लींउस समय बाबा एक रात मस्जिद चावड़ी में बिताते और सुबह को मस्जिद में लौट आते थेयह बात सबको पता थीभक्तों ने घोर परिश्रम करके लोहे के खम्बों को गाड़ापर अगले दिन सुबह को चावड़ी से लौटते साईं बाबा ने उन खम्बों को उखाड़कर फेंक दिया और क्रोधित हो गए|गुस्से में बाबा एक हाथ से लोहे के खम्बे उखाड़ने लगे और दूसरे हाथ से तात्या के सिर पर से कपड़ा उतारकर उसमें आग लगाकर गड्ढे में फेंक दियाबाद में उन्होंने अपनी जेब से एक रुपये का सिक्का निकालकर उसे भी गड्ढे में डाल दियाउस समय बाबा के क्रोध के मारे नेत्र अंगारे की तरह लाल सुर्ख हो रहे थेबाबा का ऐसा विकराल रूप देखकर कोई भी उनके सामने आंख उठाकर देखने का साहस ने जुटा सकासभी उपस्थित लोग बड़े भयभीत होकर मन ही मन में बहुत घबरा रहे थे कि अब क्या होने वाला है बाबा के इस रूप को देखकर कोई भी कुछ पूछने अथवा बाबा को मनाने की हिम्मत न जुटा सका|आखिर में बाबा का एक भक्त भागोजी शिंदे जो कुष्ठ रोग से ग्रस्त थेबाबा को मनाने के लिए साहस करके आगे बढ़े तो बाबा ने उसकी जमकर पिटाई कीमाधवराव देशपांड़े (शामा) उन्हें समझाने गये तो उसके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआक्रोधावेश में बाबा ईंट के टुकड़े उठाकर फेंकने लगेजो भी बाबा को मनाने के लिए आगे बढ़ा उसी की दुर्गति हुई|कुछ देर बाद साईं बाबा का क्रोध स्वयं ही शांत हो गयातब बाबा ने वहां खड़े भक्तों में से एक दुकानदार को बुलाया और एक जरी वाला रूमाल खरीदकर उसे खुद अपने हाथों से तात्या के सिर पर बांधाबाबा का ऐसा विचित्र व्यवहार देखकर उपस्थित भक्तों को बड़ा अचम्भा हुआउन्हें बाबा के एकाएक गुस्सा होने और तात्या को पीट डालने तथा फिर क्रोध के शांत हो जाने पर तात्या का प्यार दर्शाना कुछ भी समझ में नहीं आयाउसके बाद बाबा की कृपा से सभागृह के निर्माण का कार्य शीघ्र ही पूरा हो गया|कई बार ऐसा देखने आया था कि बाबा कभी-कभी बिना किसी कारण के एकाएक क्रोधित हो जाते थेतो पल भर में ही शांत भी हो जाया करते थे|
कल चर्चा करेंगे..बाबा द्वारा अद्भुत नेत्र चिकित्सा   


ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Friday, 13 July 2018

श्री साईं लीलाएं- रामनवमी के दिन शिरडी का मेला

ॐ सांई राम



परसों हमने पढ़ा था.. श्री साईं विट्ठल का दर्शन देना      

श्री साईं लीलाएं

रामनवमी के दिन शिरडी का मेला
     

साईं बाबा के एक भक्त कोपर गांव में रहते थेउनका नाम गोपालराव गुंड थाउन्होंने संतान न होने के कारण तीन-तीन विवाह कियेफिर भी उन्हें संतान सुख प्राप्त न हुआअपनी साईं भक्ति के परिणामस्वरूप उन्हें साईं बाबा के आशीर्वाद से एक पुत्र संतान की प्राप्ति हुईपुत्र संतान पाकर उनकी खुशी का कोई ठिकाना न रहा|


गोपालराव गुंड को सन् 1897 में पुत्र की प्राप्ति हुई थीपुत्र-प्राप्ति की खुशी में उनके मन में यह विचार आया कि शिरडी में उन्हें कोई मेला या उर्स अवश्य लगवाना चाहिएअपने इस विचार के बारे में उन्होंने शिरडी में रहने वाले साईं भक्त तात्या पाटिलदादा कोते पाटिलमाधवराज आदि से मिलकर उन्हें अपने विचारों से अगवत करायाउन सभी को यह विचार बड़ा पसंद आयाफिर उन्हें इस बारे में साईं बाबा की अनुमति और आश्वासन भी मिल गयालेकिन मेला लगाने के लिए सरकारी अनुमति प्राप्त करना भी आवश्यक थाफिर इसके लिए एक पत्र कलेक्टर को भेजा गयापरन्तु गांव के पटवारी ने उस पर अपनी आपत्ति जता दीइसलिए अनुमति नहीं मिल सकी|

इसके बारे में साईं बाबा की अनुमति पहले ही प्राप्त हो चुकी थीअत: इसके बारे में एक बार फिर से कोशिश की गयीइस बार सरकारी अनुमति बिना किसी परेशानी के मिल गयीइस तरह से साईं बाबा की आज्ञा से रामनवमी वाले दिन उर्स भरने का निर्णय हुआरामनवमी के दिन उर्स भरना हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक थायह अद्देश्य पूर्ण रूप से सफल रहाइस अवसर पर कच्ची दुकानें बनाई गईं और कुश्तियां भी आयोजित की गईंरामनवमी वाले दिन साईं बाबा का पूजनभजनगायनवाद्य यंत्रों की मधुर ध्वनि के साथ ध्वजों को लहराते हुए संचालन किया गयाउस दिन शिरडी में सभी दिशाओं से तीर्थयात्रा इस उत्सव को मनाने के लिए शिरडी में आये|

गोपालराव गुंड के एक मित्र घमूअण्णा कासार जो अहमदनगर में रहा करते थेवे भी नि:संतान थेउन्हें भी साईं बाबा के आशीर्वाद से पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई थीइसलिए गोपालराव ने उनसे भी उर्स के लिए एक ध्वज देने को कहाएक अन्य ध्वज जागीरदार नाना साहब निमोलकर ने दियादोनों ध्वजों को बड़े धूमधाम के साथ पूरे गांव से निकालने के बाद मस्जिद तक पहुंचा दिया गयाफिर उन्हें मस्जिद के दोनों कोनों पर फहरा दिया गयातब से लेकर यह परम्परा आज तक उसी तरह से चली आ रही हैसन् 1911 से इस मेले में राम-जन्म का उत्सव भी मनाया जाने लगा है|



कल चर्चा करेंगे..मस्जिद का पुनः निर्माण और बाबा का गुस्सा   


ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Thursday, 12 July 2018

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 2

ॐ सांई राम



आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं |

हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है |

हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा| किसी भी प्रकार की  त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है|

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 2

ग्रन्थ लेखन का ध्येय, कार्यारम्भ में असमर्थता और साहस, गरमागरम बहस, अर्थपूर्ण उपाधि हेमाडपन्त, गुरु की आवश्यकता । 
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गत अध्याय में ग्रन्थकार ने अपने मौलिक ग्रन्थ श्री साई सच्चरित्र (मराठी भाषा) में उन कारणों पर प्रकाश डाला था, जिननके दृारा उन्हें ग्रन्थरतना के कार्य को आरन्भ करने की प्रेरणा मिली । अब वे ग्रन्थ पठन के योग्य अधिकारियों तथा अन्य विषयों का इस अध्याय में विवेचन करते हैं ।



ग्रन्थ लेखन का हेतु
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किस प्रकार विषूचिका (हैजा) के रोग के प्रकोप को आटा पिसवाकर तथा उसको ग्राम के बाहर फेमककर रोका तथा उसका उन्मूलन किया, बाबा की इस लीला का प्रथम अध्याय में वर्णन किया जा चुका है । मैंने और भी लीलाएँ सुनी, जिनसे मेरे हृदत को अति आनंद हुआ और यही आनंद का स्त्रोत काव्य (कविता) रुप में प्रकट हुआ । मैंने यह भी सोचा कि इन महान् आश्चर्ययुक्त लीलाओं का वर्णन बाबा के भक्तों के लिये मनोरंजक इवं शिक्षाप्रद सिदृ होगा तथा उनके पाप समूल नष्ट हो जायेंगे । इसलिये मैंने बाबा की पवित्र गाथा और मधुर उपदेशों का लेखन प्रारम्भ कर दिया । श्री साईं की जीवनी न तो उलझनपूर्ण और न संकीर्ण ही है, वरन् सत्य और आध्यात्मिक मार्ग का वास्तविक दिग्दर्शन कराती है ।

कार्य आरम्भ करने में असमर्थता और साहस
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श्री हेमाडपन्त को यह विचार आया कि मैं इस कार्य के लिये उपयुक्त पात्र नहीं हूँ । मैं तो अपने परम मित्र की जीनी से भी भली भाँति परिचित नहीं हूँ और न ही अपनी प्रकृति से । तब फिर मुझ सरीखा मूढ़मति भला एक महान् संतपुरुष की जीवनी लिखने का दुस्साहस कैसे कर सकता है । अवतारों की प्रकृति के वर्णन में वेद भी अपनी असमर्थता प्रगट करते हैं । किसी सन्त का चरित्र समझने के लिये स्वयं को पहले सन्त होना नितांत आवश्यक है । फिर मैं तो उनका गुणगान करने के सर्वथा अयोगमय ही हूँ । संत की जीवनी लिखना एक महान् कठिन कार्य है, जिसकी तुलना में सातों समुद्र की गहराई नापना और आकाश को वस्त्र से ढकना भी सहज है । यह मुझे भली भरणति ज्ञात था कि इस कार्य का आरम्भ करनेके लिये महान् साहस की आवश्यकता है और कहीं ऐसा न हो कि चार लोगों के समक्ष हास्य का पात्र बनना पड़े, इसीलिये श्री साईं बाबा की कृपा प्राप्त करने के लिये मैं ईश्वर से प्रार्थना करने लगा ।
महाराष्ट्र के संतश्रेष्ठ श्री ज्ञानेश्वर महाराज के कथन है कि संतचरित्र के रचयिता से परमात्मा अति प्रसन्न होता है । तुलसीदास जी ने भी कहा है कि-साधुचरित शुभ सरिस कपासू । निरस विषद गुणमय फल जासू ।। जो सहि दुःख पर छिद्र दुरावा । वंदनीय जेहि जग जस पावा ।। भक्तों को भी संतों की सेवा करने की इच्छा बनी रहती है । संतों की कार्य पूर्ण करा लेने की प्रणाली भी विचित्र ही है । यथार्थ प्रेरणा तो संत ही किया करते हैं, भक्त तो निमित्त मात्र, या कहिये कि कार्य पूर्ति के लिये एक यंत्र मात्र है । उदाहरणार्थ शक सं. 1700 में कवि महीपति को संत थरित्र लेखन की प्रेरणा हुई । संतों ने अंतःप्रेरणा की और कार्य पूर्ण हो गया । इसी प्रकार शक सं. 1800 में श्री दासगणू की सेवा स्वीकार हुई । महीपति ने चार काव्य रचे – भक्तविजय, संतविजय, भक्तलीलामृत और संतलीलामृत और दासगणू ने केवल दो – भक्तलीलामृत और संतकथामृत – जिसमें आधुनिक संतों के चरित्रों कावर्णन है । भक्तलीलामृत के अध्याय 31, 32, और 33 तथा संत कथामृत के 57 वें अध्याय में श्री साई बाबा की मधुर जीवनी तथा अमूल्य उपदेशों का वर्णन सुन्दर एवं रोचक ढ़ंग से किया गया है । पाठकों से इनके पठन का अनुरोध है । इसी प्रकार श्री साई बाबा की अद्भभुत लीलाओं का वर्णन एक बहुत सुन्दर छोटी सी पुस्तिका - श्री साई बाबा भजनमाला में किया गया है । इसकी रचना बान्द्रा की श्रीमती सावित्रीबाई रघुनाथ तेंडुलकर ने की है ।
श्री दासगणू महाराज ने भी श्री साई बाबा पर कई मधुर कविताओं की रचना की है । एक और भक्त अमीदास भवानी मेहता ने भी बाबा की कुथ कथाओ को गुजराती में प्रकाशित किया है । साई प्रभा नामक पत्रिका में भी कुछ लीलाएँ शिरडी के दक्षिणा भिक्षा संस्थान दृारा प्रकाशित की गई है । अब प्रश्न यह उठता हैं कि जब श्री साईनाथ महाराज के जीवन पर प्रकाश डालने वाला इतना साहित्य उपलब्ध है, फिर ौर एक ग्रन्थ साई सच्चरित्र रचने की आवश्यकता ही कहाँ पैदा होती है । इसका उत्तर केवल यही है कि श्री साई बाबा की जीवनी सागर के सदृश अगाध, विस्तृत और अथाह है । यति ुसमें गहरे गोता लगाया जाय तो ज्ञान एवं भक्ति रुपी अमूल्य रत्नों की सहज ही प्राप्ति हो सकती है, जिनसे मुमुक्षुओं को बहुत लाभ होगा । श्री साई बाबा की जीवनी, उनके दृष्टान्त एवं उपदेश महान् आश्चर्य से परिपूर्ण है । दुःख और दुर्भाग्यग्रस्त मानवों को इनसे शान्ति और सुख प्राप्त होगा तथा लोक व परलोक मे निःश्रेयस् की प्राप्ति होगी । यदि श्री साई बाबा के उपदेशो का, जो वैदिक शिक्षा के समान ही मनोरंजक और शिक्षाप्रद है, ध्यानपूर्वक श्रवण एवं मनन किया जाये तो भक्तों को अपने मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जायेगी , अर्थात् ब्रहम से अभिन्नता, अष्टांग योग की सिदिृ और समाधि आनन्द आदि की प्राप्ति सरलता से हो जायगी । यह सोचकर ही मैंने चरित्र की कथाओं को संकलित करना प्रारम्भ कर दिया । साथ ही यह विचार भी आया कि मेरे लिये सबसे उत्तम साधना भी केवल यही है । जो भोले-भाले प्राणी श्री साई बाबा के दर्शनों सो अपने नेत्र सफल करने के सौभाग्य से वंचित रहे है, उन्हें यह चरित्र अति आनन्ददायक प्रतीत होगा । अतः मैंने श्री साई बाबा के उपदेश और दृषटान्तों की खोज प्रारम्भ कर दी, जो कि उनकी असीम सहज प्राप्त आत्मानिभूतियों का निचोड़ था । मुझे बाबा ने प्रेरणा दी और मैंने भी अपना अहंकार उनके श्री चरणों पर न्योछावर कर दिया । मैने सोचा कि अब मेरा पथ अति सुगम हो गया है और बाबा मुझे इहलोक और परलोक में सुखी बना देंगे ।
मैं स्वंय बाब की आज्ञा प्राप्त करने का साहस नहीं कर सकता था । अतः मैंने श्री माधवराव उपनाम शामा से, जो कि बाब के अंतरंग भक्तों में से थे, इस हेतु प्रार्थना की । उन्होंने इस कार्य के निमित्त श्री साई बाबा से विनम्र शब्दों में इस प्रकार प्रार्थना की कि ये अण्णासाहेब आपकी जीवनी लिखने के लिये अति उत्सुक है । परन्तु आप कृपया ऐसा न कहना कि मैं तो एक फकीर हूँ तथा मेरी जीवनी लिखने की आवश्यकता ही क्या है । आपकी केवल कृपा और अनुमति से ही ये लिख सकेंगें, अथवा आपके श्री चरणों का पुण्यप्रताप ही इस कार्य को सफल बना देगा । आपकी अनुमति तथा आशीर्वाद के अभाव में कोई भी करर्य यशस्वी नहीं हो सकता । यह प्रार्थना सुनकर बाबा को दया आ गई । उन्होंने आश्वासन और उदी देकर अपना वरद-हस्त मेरे मस्तक पर रखा और कहने लगे कि इन्हें जीवनी और दृष्टान्तों को एकत्रित कर लिपिबदृ करने दो, मैं इनकी सहायता करुगाँ । मैं स्वयं ही अपनी जीवनी लिखकर भक्तों की इच्छा पूर्ण करुगाँ । परंतु इनको अपना अहं त्यागकर मेरी शरण में आना चाहिये । जो अपने जीलन में इस प्रकार आचरण करता है, उसकी मैं अत्यधिक सहायता करता हूँ । मेरी जीवन-कथाओं की बात तो हज है, मैं तो इन्हें घर बैठे अनेक प्रकार से सहायता पहुँचाता हूँ । जब इनका अहं पूर्णताः नष्ट हो जायेगा और खोजनेपर लेशमात्र भी न मिलेगा, तब मैं इनके अन्तःकरण में प्रगट होकर स्वयं ही अपनी जीवनी लिखूँगा । मेरे चरित्र और उपदेशों के श्रवण मात्र से ही भक्तों के हृदय में श्रदृा जागृत होकर सरलतापूर्वक आत्मानुभूति एवं परमानंद की प्राप्ति हो जायेगी । ग्रन्थ में अपने मत का प्रतिपादन और दूसरो का खमडन तथा अन्य किसी विषय के पक्ष या विपक्ष में व्यर्थ के वादविवाद की कुचेष्टा नहीं होनी चाहिये ।

अर्थपूर्ण उपाधि हेमाडपंत
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वादविवाद शब्द से हमको स्मरण हो आया कि मैंने पाठको को वचन दिया है कि हेमाडपंत उपाधि किस प्रकार प्राप्त हुई, इसका वर्णन करुँगा । अब मैं उसका वर्णन करता हूँ ।
श्री काकासाहेब दीक्षित व नानासाहेब चांदोरकर मेरे अति घनिष्ठ मित्रों में से थे । उन्होंने मुझसे शिरडी जाकर श्री साई बाबा के दर्शनें का लाभ उठाने का अनुरोध किया । मैंनें उन्हे वचन दिया, परन्तु कुछ बाधा आ जाने के कारण मेरी ळिरडी-यात्रा स्थगित हो गई । मेरे एक घनिष्ठ मित्र का पुत्र लोनावला में रोगग्रस्त हो गया था । उन्होंने सभी सम्भव आधिभौतिक और आध्यात्मिक उपचार किये, परन्तु सभी प्रत्यन निष्फल हुए और ज्वर किसी प्रकार भी कम न हुआ । अन्त में उन्होंने अपने गुरुदेव को उसके सिरहाने ज्वर बिठलाया, परंतु परिणैस पूर्ववत् ही हुआ । यह घटना देखकर मुझे विचार आया कि जब गुरु एक बालक के प्राणों की भी रक्षा करने में असमर्थ है, तब उनकी उपयोगिता ही क्या है । और जब उनमें कोई सामर्थय ही नही, तब फिर शिरडी जाने से क्या प्रयोजन । ऐसा सोचकर मैंने अपनी यात्रा स्थगित कर दी । परंतु जो होनहार है, वह तो होकर ही पहेगा और वह इस प्रकार हुआ । प्रामताधिकारी नानासाहेब चांदोरकर बसई को दौरेपर जा रहे थे । वे ठाणा से दादर पहुँचे तथा बसई जाने वाली गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे । उसी समय बांद्रा लोकल आ पहुँची, जिसमें बैठकर वे बांद्रा पहुँचे तथा शिरडीयात्रा स्थगित करने के लिये मुझे आड़े हाथों लिया । नानासाहेब का तर्क मुझे उचित तथा सुखदायी प्रतीत हुआ और इसके फलस्वरुप मैंने उसी रात्रि शिरडी जाने का निश्चय किया और सामान बाँधकर शिरडी को प्रस्थान कर दिया । मैंनें सीधे दादर जाकर वहाँ से मनमाड की गाड़ी पकड़ने का कार्यक्रम बनाया । इस निश्चय के अनुसार मैंने दादर जाने वाली गाड़ी के डिब्बे में प्रवेश किया । गाड़ी छूटने ही वाली थी कि इतने में एक यवन मेरे डिब्बे में आया और मेरा सामान देखकर मुझसे मेरा गन्तव्य स्थान पूछने लगा । मैंनें अपना कार्यक्रम उसे बतला दिया । उसने मुझसे कहा कि मनमाड की गाड़ी दादर पर खड़ी नहीं होता, इसलिये सीधे बोरीबन्दर से होकर जाओ । यदि यह एक साधारण सी घटना घटित न हुई होती तो मैं अपने कार्यक्रम के अनुसार दूसरे दिन शिरडी न पहुँच सकने के कारण अनेक प्रकार की शंका-कुशंकाओ से घिर जाता । परंतु ऐसा घटना न था । भाग्य ने साथ दिया और दूसरे दिन 9-10 बजे के पूर्वही मैं शिरडी पहुँच गया । यह सन् 1910 की बात है, जब प्रवासी भक्तों के ठहरने के लिये साठेवाड़ा ही एकमात्र स्थान था । ताँगे से उतरने पर मैं साईबाबा के दर्शनों के लिये बड़ा लालायित था । उसी समय भक्तप्रवर श्री तात्यासाहेब नूलकर मसजिद से लौटे ही थे । उन्होंने बतलाया कि इस समय श्री साईबाबा मसजिद की मोंडपर ही हैं । अभी केवल उनका प्रारम्भिक दर्शन ही कर लो और फिर स्नानादि से निवृत होने के पश्चात, सुविधा से भेंट करने जाना । यह सुनते ही मैं दौड़कर गया और बाबा की चरणवन्दना की । मेरी प्रसन्नता का पारावार न रहा । मुझे क्या नहीं मिल गया था । मेरा शरीर उल्लसित सा हो गया । क्षुधा और तृषा की सुधि जाती रही । जिस क्षण से उनके भवविनरशक चरणों का स्पर्श प्रार्त हुआ, मेरे जीवन के दर्शनार्थ पर्ेरणग, प्रोत्साहन और सहायता पहुँचाई, उनके प्रति मेरा हृदय बारम्बार कृतज्ञता अनुभव करने लगा । मैं उनका सदैव के लिये ऋणी हो गया । उनका यह उपकार मैं कभी भूल न सकूँगा । यथार्थ में वे ही मेरे कुटुम्बी हैं और उनके ऋण से मैं कभी भी मुक्त न हो सकूँगा । मैं सदा उनका स्मरण कर उन्हें मानसिक प्रणाम किया करता हूँ । जैसा कि मेरे अनुभव में आया कि साई के दर्शन में ही यह विशेषता है कि वितार परिवर्तन तथा पिछले कर्मों का प्रभाव शीघ्र मंद पड़ने लगता है और शनैः शनैः अनासक्ति और सांसारिक भोगों से वैराग्य बढ़ता जाता है । केवल गत जन्मों के अनेक शुभ संस्कार एकत्रित होनेपर ही ऐसा दर्शन प्राप्त होना सुलभ हो सकता है । पाठको, मैं आपसे शपथपूर्वक कहता हूँ कि यदि आप श्री साईबाबा को एक दृष्टि भरकर देख लेंगे तो आपको सम्पूर्ण विश्व ही साईमय दिखलाई पड़ेगा ।



गरमागरम बहस
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शिरडी पहुंतने के प्रथम दिन ही बालासाहेब तथा मेरे बीच गुरु की आवश्यकता पर वादविवाद छिड़ गया । मेरा मत था कि स्वतंत्रता त्यागकर पराधीन क्यों होना चाहिये तथा जब कर्म करना ही पड़ता है, तब गुरु की आवश्यकता ही कहां रही । प्रत्येक को पूर्ण प्रयत्न कर स्वयं को आगे बढ़ाना चाहिये । गुरु शिष्य के लिये करता ही क्या है । वह तो सुख से निद्रा का आनंद लेता है । इस प्रकार मैंने स्वतंत्रता का पक्ष लिया और बालासाहेब ने प्रारब्ध का । उन्होंने कहा कि जो विधि-लिखित है, वह घटित होकर रहेगा, इसमें उच्च कोटि के महापुरुष भी असफल हो गये हैं । कहावत है – मेरे मन कछु और है, धाता के कछु और । फिर परामर्शयुक्त शब्दों मे बोले भाई साहब, यह निरी विदृता छोड़ दो । यह अहंकार तुम्हारी कुछ भी सहायता न कर सकेगा । इस प्रकार दोनों पक्षों के खंडन-मंडन में लगभग एक घंटा व्यतीत हो गया और सदैव की भाँति कोई निष्कर्ष न निकल सका । इसीलिये तंग और विवष होकर विवाद स्थगित करनग पड़ा । इसका परिणाम यह हुआ कि मेरी मानसिक शांति भंग हो गई तथा मुझे अनुभव हुआ कि जब तक घोर दैहिक बुदृि और अहंकार न हो, तब तक विवाद संभव नहींं । वस्तुतः यह अहंकार ही विवाद की जड़ है ।
जब अन्य लोगों के साथ मैं मसजिद गया, तब बाबा ने काकासाहेब को संबोधित कर प्रश्न किया कि साठेबाड़ा में क्या चल रहा हैं । किस विषय में विवाद था । फिर मेरी ओर दृष्टिपात कर बोले कि इन हेमाडपंत ले क्या कहा । ये शब्द सुनकर मुझे अधिक अचम्भा हुआ । साठेबाड़ा और मसजिद में पर्याप्त अन्तर था । सर्वज्ञ या अंतर्यामि हुए बिना बाबा को विवाद का ज्ञान कैसे हो सकता था ।
मैं सोचने लगा कि बाबा हेमाडपंत के नाम से मुझे क्यों सम्बोधित करते हैं । यह शब्द तो हेमाद्रिपंत का अपभ्रंश है । हेमाद्रिपंत देवगिरि के यादव राजवंशी महाराजा महादेव और रामदेव के विख्यात मंत्री थे । वे उच्च कोटि के विदृान्, उत्तम प्रकृति और चतुवर्ग चिंतामणि (जिसमें आध्यात्मिक विषयों का विवेचन है ।) और राजप्रशस्ति जैसे उत्तम काव्यों के रचयिता थे । उन्होंने ही हिसाब-किताब रखने की नवीन प्रणाली को जन्म दिया था और कहाँ मैं इसके विपरीत एक अज्ञानी, मूर्ख और मंदमति हूँ । अतः मेरी समझ में यह न आ सका कि मुझे इस विशेष उपाधि से विभूषित करने का क्या तात्पर्य हैं । गहन विचार करने पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि कही मेरे अहंकार को चूर्ण करने के लिये ही तो बाबा ने इस अस्त्र का प्रयोग नहीं किया  है, ताकि मैं भविष्य में सदैव के लिए निरभिमानी एवं विनम्र हो जाऊँ, अथवा कहीं यह मेरे वाक्रचातुर्य के उपलक्ष में मेरी प्रशंसा तो नहीं है ।
भविष्य पर दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि बाबा के दृारा हेमाडपंत की उपाधि से विभूषित करना कितना अर्थपूर्ण और भविष्यगोचर था । सर्वविदित है कि कालान्तर में दाभोलकर ने श्री साईंबाबा संस्थान का प्रबन्ध कितने सुचारु एवं विदृतापूर्ण ढ़ग से किया था । हिसाब-किताब आदि कितने उत्तम प्रकार से रखे तथा साथ ही साथ महाकाव्य साई सच्चरित्र की रचना भी की । इस ग्रन्थ में महत्त्वपूर्ण और आध्यात्मिक विषयों जैसे ज्ञान, भक्ति वैराग्य, शरणागति व आत्मनिवेदन आदि का समावेश है ।

गुरु की आवश्यकता
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इस विषय में बाबा ने क्या उद्गगार प्रकट किये, इस पर हेमाडपंत दृारा लिखित कोई लेख या स्मृतिपत्र प्राप्त नहीं है । परंतु काकासाहेब दीक्षित ने इस विषय पर उनके लेख प्रकाशित किये हैं ।
बाबा से भेंट करने के दूसरे दिन हेमाडपंत और काकासाहेब ने मसजिद में जाकर गृह लौटने की अनुमति माँगी । बाबा ने स्वीकृति दे दी ।



किसी ने प्रश्न किया – बाबा, कहाँ जायें ।

उत्तर मिला – ऊपर जाओ ।

प्रश्न – मार्ग कैसा है ।

बाबा – अनेक पंथ है । यहाँ से भी एक मार्ग है । परंतु यह मार्ग दुर्गम है तथा सिंह और भेड़िये भी मिलते है । 
काकासाहेब – यदि पथ प्रदर्शक भी साथ हो तो ।

बाबा – तब कोई कष्ट न होगा । मार्ग-प्रदर्शक तुम्हारी सिंह और भेड़िये और खन्दकों से रक्षा कर तुम्हें सीधे निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचा देगा । परंतु उसके अभाव में जंगल में मार्ग भूलने या गड्रढे में गिर जाने की सम्भावना है । दाभोलकर भी उपर्युक्त प्रसंग के अवसर पर वहाँ उपस्थित थे । उन्होंने सोचा कि जो कुछ बाबा कह रहे है, वह गुरु की आवश्यकता क्यों है । इस प्रश्न का उत्तर है (साईलीला भाग 1, संख्या 5 व पृष्ठ 47 के अनुसार) । उन्होंने सदा के लिये मन में यह गाँठ बाँध ली कि अब कभी इस विषय पर वादविवाद नहीं करेंगे कि स्वतंत्र या परतंत्र व्यकति आध्यात्मिक विषयों के लिये कैसा सिदृ होगा । प्रत्युत इसके विपरीत यथार्थ में परमार्थ-लाभ केवल गुरु के उरदेश में किया गया है, जिसमें लिखा है कि राम और कृष्ण महान् अवतारी होते हुए भी आत्मानुभूति के लिये राम को अपने गुरु वसिष्ठ और कृष्ण को अपने गुरु सांदीपनि की शरण में जाना पड़ा था । इस मार्ग में उन्नति प्राप्त करने के लिये केवल श्रदृा और धैर्य-ये ही दो गुण सहायक हैं ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 11 July 2018

श्री साईं लीलाएं- विट्ठल का दर्शन देना

ॐ सांई राम





कल हमने पढ़ा था.. गौली बुवा की कथा     

श्री साईं लीलाएं

विट्ठल का दर्शन देना    

साईं बाबा भगवद् भजन व ईश्वर चिंतन में विशेष रूप से रुचि रखते थेबाबा सदैव अपने आत्मस्वरूप में मग्न रहा करते थेबाबा के होठों पर 'अल्लाह मालिकका उच्चारण सदैव रहता थाबाबा द्वारिकामाई मस्जिद में 'कीर्तन सप्ताहका भी आयोजन किया करते थेइसी 'कीर्तन सप्ताहको 'नाम-सप्ताहभी कहा जाता था|



एक समय की बात है साईं बाबा ने अपने प्रिय भक्त दासगणु को 'कीर्तन सप्ताहकरने के लिए कहातब दासगणु ने साईं बाबा से कहा कि - "हे देवा ! आपकी आज्ञा मेरे लिए शिरोधार्य हैपरन्तु आप मुझे विश्वास दें कि इस कीर्तन सप्ताह में विठ्ठल अवश्य ही प्रकट होंगे|" दासगणु की बात सुनकर साईं बाबा ने अपने हृदय पर अपना सीधा हाथ रखाउनका ऐसा करना इस बात का संकेत था कि वह दासगणु को भरोसा दे रहे होंफिर साईं बाबा बोले कि विठ्ठल अवश्य ही प्रकट होंगेलेकिन इसके लिए भक्तों में श्रद्धाविश्वास और तीव्र उत्सुकता का होना भी बहुत जरूरी हैबाबा बोले कि विठ्ठल की पंढरीरणछोड़ की द्वारका और ठाकुरनाथ की डंकपुरी तो शिरडी ही हैफिर किसी को भी दूर जाने की क्या आवश्यकता हैक्या विठ्ठल कहीं बाहर से आयेंगे वे तो शिरडी में ही विराजते हैंजब भक्तों में भक्ति और प्रेम का प्रवाह सुचारू रूप से होगा तो विठ्ठल स्वयं ही प्रकट होकर उनकी इच्छा अवश्य पूर्ण करेंगे|

फिर ऐसा ही हुआ भीजब कीर्तन सप्ताह का समापन हुआ तो विठ्ठल स्वयं ही प्रकट हो गएइस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण काका साहब दीक्षित थेजिन्होंने प्रतिदिन की तरह स्नानादि किया से निवृत्त होने के बाद ध्यान किया तो उन्हें विठ्ठल के साक्षात् दर्शन हुएफिर जब उस दिन दोपहर को काका साहब साईं बाबा के दर्शन करने के लिए मस्जिद गए तो बाबा ने उनसे पूछा - "क्यों विठ्ठल पाटिल आये थे क्या तुमने उसके दर्शन किएवे बहुत चंचल हैंउन्हें अच्छी तरह पकड़ लोजरा-सी भी असावधानी बरतोगे तो वे बेचकर निकल पायेंगे - ऐसा कहकर साईं बाबा मुस्कराने लगेजैसा कि साईं बाबा का स्वभाव था|

काका साहब दीक्षित को उस दिन सुबह विठ्ठल के दर्शन हुए ही थेदोपहर में भी उन्हें फिर से एक बार उनके दर्शन हुएउस दिन एक आश्चर्यजनक घटना यह हुई कि एक चित्र बेचने वाला विठोला (विठ्ठल) के चित्र वहां पर बेचने आयावे चित्र ठीक वैसे ही थेजैसे ध्यान करते समय काका साहब को विठ्ठल के दर्शन हुए थेचित्र को देखकर और बाबा की बात को याद करते ही उन्हें बहुत हैरानी और प्रसन्नता हुईफिर काका साहब ने चित्र बेचने वाले से खुशी-खुशी एक चित्र खरीद लिया और उसे अपने पूजाघर में स्थापित कर दिया|



परसों चर्चा करेंगे... रामनवमी के दिन शिरडी का मेला

ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Tuesday, 10 July 2018

श्री साईं लीलाएं- गौली बुवा की कथा

ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. बाबा जी का अमृतोपदेश    

श्री साईं लीलाएं
गौली बुवा की कथा   
95 वर्षीय वृद्ध गौली बुवा विठोवा के परमभक्त थेवे पंढरी के बारकरी में थेगौली बुवा पूरे वर्षभर में महीने वे पंढरपुर रहते थे और महीने यानी आषाढ़ से कार्तिक मास तक गंगा के किनारे रहा करते थेगौली बुवा का यह नियम था कि वे प्रत्येक वर्ष सवारी लेकर पंढरपुर जाया करते थे और वहां से वापस लौटते समय साईं बाबा के दर्शन करने के लिए शिरडी भी अवश्य जाया करते थेसवारी के नाम पर उनके पास एक गधा था जिस पर वे अपना सामान रखा करते थे और एक शिष्य भी उनकी सेवा करने के लिये सदैव उनके साथ रहा करता था|

साईं बाबा के प्रति गौली बुवा के मन में गहन श्रद्धा और विश्वास थाएक बार शिरडी में जब बाबा के दर्शन करने आये तो बाबा को एकटक देखते हुए अचानक ही कहने लगेये तो पंढरीनाथ हैंये विठ्ठल के अवतार हैंवही विठ्ठल जो अनाथों के नाथदीनदयालु और दिनों के स्वामी हैं|गौली बुवा ने पंढरी यात्रा के बाद कई बार साईं बाबा में पंढरीनाथ के दर्शन किये थेइसके अलावा गौली बुवा के अतिरिक्त भी अन्य भक्तों ने साईं बाबा में अपने-अपने ईष्टदेव के दर्शन किये थेइससे यही सिद्ध होता है कि साईं बाबा दत्तात्रेय के अवतार हैं|


कल चर्चा करेंगे..विट्ठल का दर्शन देना

==ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ==
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें । 

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