शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 7 May 2016

साईंयां साईंयां ओ मेरे साईंयां

ॐ सांई राम




साईंयां  साईंयां  ओ  मेरे साईंयां,
तेरे  नाल  ही  मैं  प्रीतां लाइयाँ,


 जदों  दे  तेरे  दर्शन  होए,
होर  न  कुछ  मेनू  भावे,
न  लग्गे  भुक्ख  प्यास  मेनू ,
न  ही  मेनू  नींद  आवे,
तेरे  सोहणे मुखडे  नु  वेख,
दिल  नु  मेरे करार  आवे,
 साईंयां साईंयां  ओ  मेरे  साईंयां ,
तेरे  नाल  ही  मैं  प्रीतां  लाइयाँ,
 चरणां  नाल  लगा  लओ मेनू,
चरण  तुहाडे मेनू  स्वर्ग  तो  प्यारे,
चरणां  दे  विच  बाबा  जी,
मेनू  तां सुकून  आवे,
तुहाडे  चरणां  विचाघार  बाबा,
मिटदा  हर  जंजाल  है,
साईंयां  साईंयां  ओ  मेरे साईंयां,
तेरे  नाल  ही  मैं  प्रीतां लाइयाँ,
अहियो  विनती  मेरी  साईं,
चरण  न  तेरे  दूर  होवे,
प्रीत  तेरे  नाल  लाई  ऐ,
ऐ  कदी न  घट होवे,
तू   ते  मेरा  मालक  साईं  तेरे  तों,
है  मेरा  संसार  है,
बिन  तेरे  तो  साईंयां ,
जीवन  वी बेकार  है,
साईंयां  साईंयां  ओ  मेरे साईंयां,
तेरे  नाल  ही  मैं  प्रीतां लाइयाँ,

यह भजन साईं आँचल द्वारा बाबा के श्री चरणों में भेंट किया गया ।

-: आज का साईं सन्देश :-
साईं बाबा होय खुश,
फिर ऐसा समझाय ।
तेरी रक्षा वही करे,
मंजिल तक पहुंचाय ।।

राह प्रदर्शक साथ हो,
गुरु कृपा मिल जाय ।
शेर, भेड़िये, खन्दकें,
तुझको नहीं सताय ।।

Friday, 6 May 2016

मैनु रस्ता विखा दे साईयाँ

ॐ सांई राम


 मैनु रस्ता विखा  दे  साईयाँ,
कोल  अपने  बुला  लै साईयाँ,

दे  रस्ता  मैनु  कोई  तू,
न  भटकां मैं  होर  किते,
मेरी  विनती  सुन  लै  साईयाँ,
कोल  अपने  बुला  लै  साईयाँ,

हुन  न  हो  तू  मेरे तों  दूर,
मेरा  तां  तूं साईयाँ  हुज़ूर,
गलतियाँ  माफ़  कर  वी  दे  साईयाँ,
कोल  अपने  बुला  लै  साईयाँ,

मैं  बंदा  ताँ तेरा  ही  हाँ,
तेरे  तों  दूर  मैं  किवें  रवां,
बस  ऐना  दस दे  साईयाँ,
कोल  अपने  बुला  लै  साईयाँ,

मैनु रस्ता  विखा  दे  साईयाँ,
कोल  अपने  बुला  लै  साईयाँ,

 -: आज का साईं सन्देश :-
कई राह हैं मोक्ष की,
एक यहाँ से जाय ।।
बड़ा कठिन यह मार्ग है,
शेर बाघ मिल जाय ।।

काका साहब पूछते,
बाबा से इक राय ।
राह प्रदर्शक साथ हो,
कैसे उसको खाय ।।

Thursday, 5 May 2016

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 34

ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं
हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है

हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा

किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...



श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 34

उदी की महत्ता (2), डाँक्टर का भतीजा, डाँक्टर पिल्ले, शामा की भयाहू, ईरानी कन्या, हरदा के महानुभाव, बम्बई की महिला की प्रसव पीड़ा
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इस अध्याय में भी उदी की ही महत्ता क्रमबद्घ है तथा उन घएटनाओं का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें उसका उपयोग बहुत ही प्रभावकारी सिकदृ हुआ ।
डाँक्टर का भतीजा
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नासिक जिले के मालेगाँव में एक डाँक्टर रहते थे । उनका भतीजा एक असाध्य रोग Tubercuar bone abscess (एक तरह का तपेदिक) से पीड़ित था । उन्होंने तथा उनके सभी डाँक्टर मित्रों ने समस्त उपचार किये । यहाँ तक कि उसकी शल्य-चिकित्सा भी कराई, फिर भी बालक को कोई लाभ न पहुँचा । उसके कष्टों का पारावार न था । मित्र और सम्बन्धियों ने बालक के माता-पिता को दैविक उपचार करने का परामर्श देकर श्री साईबाबा की सरण में जाने को कहा, जो अपनी दृष्टि मात्र से असाध्य रोग साध्य करने के लिये प्रसिदृ है । अतः माता-पिता बालक को साथ लेकर शिरडी आये । उन्होंने बाबा को साष्टांग प्रणाम कर श्री-चरणों में बालक को डाल दिया और बड़ी नम्रता तथा आदरपूर्वक विनती की कि प्रभु, हम लोगों पर दया करो । आपका संकट-मोचन नाम सुनकर ही हम लोग यहाँ आये है । दया कर इस बालक की रक्षा कीजिये । प्रभु हमें तो ककेवल आपका ही भरोसा है । प्रार्थना सुनकर बाबा को दया आ गई और उन्होंने सान्त्वना देकर कहा कि जो इस मसजिद की सीढ़ी चढ़ता है, उसे जीवनपर्यन्त कोई दुःख नहीं होता । चिंता न करो, यतह उदी ले उस रोग ग्रसित स्थान पर लगाओ । ईश्वर पर विश्वास रखो, वह सप्ताह के अंत में ही पूर्ण स्वस्थ हो जायेगा । यह मसजिद नहीं, यह तो द्घारकावती है और जो इसकी सीढ़ी चढ़ेगा, उसे स्वा्थ्य और सुख की प्राप्ति होगी तथा उसके कष्टों का अंत हो जायेगा । बालक को बाबा के सामने बिठलाया गया । वे उस रोगग्रस्त स्थान पर अपना हाथफेरते हुये दयापूर्ण दृष्टि से बालक की ओर निहाने लगे । रोगी अब प्रसन्न रहने लगा और उदी के लेप से बालक थोड़े समय में ही स्वस्थ हो गया । माता-पिता अपने को बाबा का ऋणी और कृतज्ञ मानकर बालक को लेकर शिरडी से चले गये ।
यह लीला देखकर बालक के काका को, जो डाँक्टर थे, महान् आश्चर्य हुआ तथा उन्हें भी बाबा के दर्शनों की तीव्र उत्कंठा हुई । इसी समय जब वे कार्यवश बम्बई जा रहे थे, तभी मालेगाँव और मनमाड के निकट किसी ने बाबा के विरुदृ उनके कान भर दिये, इस कारण वे शिरडी जाने का विचार त्याग कर सीधे बम्बई चले गये । वे अपनी शेष छुट्टियाँ अलीबाग में व्यतीत करना चाहते थे, परन्तु बम्बी में उन्हें लगातार तीन रात्रियों तक एक ही ध्वनि सुनाई पड़ी कि क्या अब भी तुम मुझपर अविश्वास कर रहे हो । तब डाँक्टर ने अपना विचार परिवर्तित कर शिरड को प्रस्थान करने का निश्यय किया । बम्बई में उनके एक रोगी को सांसर्गिक ज्वर आ रहा था, जिसका तापक्रम कम होने का कोई चिन्ह दिखाई न देने के कारण उन्हें ऐसा लग रहा था कि कहीं शिरडी की यात्रा स्थगित न करनी पड़े । उन्होंने अपने मन ही मन एक परीक्षा करने का विचार किया कि यदि रोगी आज अच्छा हो जाये तो कल ही मैं शिरडी के लिये प्रस्थान कर दूँगा । आश्चर्य है कि जिस समय उन्होंने यह निश्चय किया, ठीक उसी समय से ज्वर में उतार होने लगा और ताप क्रमशः साधारण स्थिति पतर पहुँच गया । तब वे अपने निश्चयानुसार शिरडी पहुँचे और बाबा का दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया । बाबा ने उन्हें कुछ ऐसे अनुभव दिये कि वे सदा के लिये उनके भक्त हो गये । डाँक्टर वहाँ चार दिन ठहरे और उदी तथा आर्शीवाद प्राप्त कर घर वापस आ गये । एक पखवारे में ही पदोन्नति पाकर उनका स्थानान्तरण वीजापुर को हो गया । भतीजे की रोग-मुक्ता ने उन्हें बाबा के दर्शनों का सौभाग्य दिया तथा शिरडी की यात्रा ने उनकी श्री साई के चरणों में प्रगाढ़ प्रीति उत्पन्न कर दी ।
डाँक्टर पिल्ले
..............
डाँक्टर पिल्ले बाब के एक निष्ठ भक्त थे । इसी कारण वे उन पर अधिक स्नेह रखते थे और उन्हें सदा भाऊ कहकर पुकारते तथा हर समय उनसे वार्तालाप करके प्रत्येक विषय में परामर्श भी लिया करते थे । उनकी सदैव यही इच्छा रहती कि वे बाबा के समीप ही बने रहें । एक बार डाँक्टर पिल्ले को नासूर हो गया । वे काकासाहेब दीक्षित से बोले कि मुझे असहृ पीड़ा हो रही है और मैं अब इस जीवन से मृत्यु को अधिक क्षेयस्कर समझता हूँ । मुझे ज्ञात है कि इसका मुख्य कराण मेरे पूर्व जन्मों के कर्म ही है । जाकर बाबा से कहो कि वे मेरी यह पीड़ा अब दूर करें । मैं अपने पिछले जन्म के कर्मों को अगले दस जन्मों में भोगने को तैयार हूँ । तब काका दीक्षित ने बाबा के पास जाकर उनकी प्रार्थना सुनाई । साई तो दया के अवतार ही है । वे अपने भक्तों के कष्ट कैसे देख सकते थे । उनकी प्रार्थना सुनकर उन्हें भी दया आ गई और उन्होंने दीक्षित से कहा कि पिल्ले से जाकर कहो कि घबड़ाने की ऐसी कोई बात नहीं । कर्मों का फल दस जन्मों में क्यों भुगतना पड़ेगा । केवल दस रदिनों में ही गत जन्मों के कर्मफल समाप्त हो जायेंगे । मैं तो यहाँ तुम्हें धार्मिक और आध्यात्मिक कल्याण देने के लिये ही बैठा हूँ । प्राण त्यागने की इच्छा कदापि न करनी चाहिये । जाओ, किसी की पीठ पर लादकर उन्हें यहाँ ले आओ, मैं सदा के लिये उनका कष्टों से छुटाकारा कर दूँगा ।
तब उसी स्थिति में पिल्ले को वहाँ लाया गया । बाबाने अपने दाहिनी ओर उनके सिरहाने अपनी गादी देकर सुख से लिटाकर कहा कि इसकी मुख्य औषधि तो यह है कि पिछले जन्मों के कर्मफल को अवश्य ही भोग लेना चाहिये, ताकि उनसे सदैव के लिये छुटकारा हो जाये । हमारे कर्म ही सुखःदुख के कारण होते है, इसलिये जैसी भी परिस्थित आये, उसी में सन्तोष करना चाहिये । अल्ला ही सब को फल देने वाला है और वही सबका रक्षण करता है । ऐसा विचार कर सदैव उनका ही स्मरण करो । वे ही तुम्हारी चिन्ता दूर करेंगे । तन-मन-धन और वचन द्घारा उनकी अनन्य शरण में जाओ, फिर देखो कि वे क्या करते है । डाँक्टर पिल्ले ने कहा कि नानासाहेब ने मेरे पैर में एक पट्टी बाँधी है, परन्तु मुझे उससे कोई लाभ नहीं पहुँचा । नाना तो मूर्ख है बाबा ने कहा, वह पट्टी हटाओ, नहीं तो मर जाओगे । थोड़ी देर में ही एक कौआ आयेगा और वह अपनी चोंच इसमें मारेगा । तभी तुम शीघ्र अच्छे हो जाओगे ।
जब यह वार्तालाप हो ही रहा ता कि उसी समय अब्दुल, जो मसजिद में झाडू लगाने तथा दिया-बत्ती आदि स्वच्छ करने का कार्य करता था, वहाँ आया । जब वह दिया-बत्ती स्वच्छ कर रहा था तो अचानकर ही उसका पैर डाँक्टर पिल्ले के नासूर वाले पर पर पड़ा । पैर तो सूजा हुआ था ही और फिर अब्दुल के पैर से दबा तो उसमें से नासूर के सात कीड़े बाहर निकल पड़े । कष्ट असहनीय हो गया और डाँक्टर पिल्ले उच्च स्वर में चिल्ला पड़े । किन्तु कुछ काल के ही पश्चात् वे शांत हो कर गीत गाने लगे । तब बाबा ने कहा, देखा, भाऊ अब अच्छा हो गया है और गाना गा रहा है । गाने के बोल थे :-
करम कर मेरे हाल पर तू करीम ।
तेरा नाम रहमान है और रहीम ।
तू ही दोनों आलम का सुलतान है ।
जहाँ में नुमायाँ तेरी शान है ।
फना होने वाला है सब कारोबार ।
रहे नूर तेरा सदा आशकार ।
तू आशिक का हरदम मददगार है ।
फिर डाँक्टर पिल्ले ने पूछा कि वह कौआ कब आयेगा और चोंच मारेगा । बाबा ने कहा अरे, क्या तुमने कौए को नहीं देखा । अब वह नहीं आयेगा । अब्दुल, जिसने तुम्हारा पैर दबाया, वही कौआ था । उसने चोंच मारकर नासूर को हटा दिया । वह अब पुनः क्यों आयेगा । अब जाकर वाड़े में विश्राम करो । तुम शीघ्र ही स्वस्थ हो जाओगे । उदी लगाने और पानी के संग पीने से बिना किसी औषधि या चिकित्सा के वे दस दोनों में ही नीरोग हो गये, जैसा कि बाबा ने उनसे कहा था ।
शामा के छोटे भाई की पत्नी (भयाहू)
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सावली विहीर के समीप शामा के छोटे भाई बापाजी रहते थे । एक बार उनकी पत्नी को गिल्टियों बाला प्लेग हो गया । उसे ज्वर हो आया और उसकी जाँच में प्लेग की दो गिल्टियाँ निकल आई । बापाजी दौड़कर शामा के पास आये और सहायता के लिये चलने को कहा । शामा भयभीत हो उठे । उन्होंने सदैव की भाँति बाबा के पास जाकर उन्हें नमस्कार किया और सहायाता के लिये उनसे प्रार्थना की तथा भ्राता के घर प्रस्थान करने की अनुमति माँगी । बाबा ने कहा कि इतनी रात्रि व्यतीत हो चुकी है । अब इस समय तुम कहाँ जाओगे । केवल उदी ही भेज दो । ज्वर और गिल्टी की चिन्ता क्यों करते हो । भगवान् तो अपने पिता और स्वामी है । वह शीघ्र ही स्वस्थ हो जायेगी । अभी मत जाओ । प्रातःकाल जाना और शीघ्र ही लौट आना ।
शामा को तो उस मृत-संजीवनी उदी पर पूर्ण विश्वास था । उसे ले जाकर उसके भ्राता ने थोड़ी सी गिल्टी और माथे पर लगाई और कुछ जल में घोलकर रोगी को पिला दी । जैसे ही उसका सेवन किया गया, वैसे ही पसीन वेग से प्रवाहित होने लगा, ज्वर मन्द पड़ गया और रोगी प्रगाढ़ निद्रा में निमग्न हो गया । दूसरे दिन बापाजी ने अपनी पत्नी को स्वस्थ देखकर बड़ा आश्चर्य किया कि न तो ज्वर ही है और न गिल्टी का कोई चिन्ह ही । दूसरे दिन जब शामा बाबा की अनुज्ञा प्राप्त कर वहाँ पहुँचे तो अपने भाई की स्त्री को चाय बनाते देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ । अपने भाई से पूछताछ करने पर उन्हें पता चला कि बाबा की उदी ने एक रात्रि में ही रोग को समूल नष्ट कर दिया है । तब शामा को बाबा के शब्दों का मर्म समझ में आया कि प्रातःकाल जाओ और शीघ्र लौटकर आओ ।
चाय पीकर शामा लौट आया और बाबा को प्रणाम करने के पश्चात् कहने लगा कि देवा । यह तुम्हारा क्या नाटक है । पहले बवंडर उठा कर हमें अशांत कर देते हो, फिर हमारी शीघ्र सहायता कर सब ठीकठाक कर देते हो । बाबा ने उत्तर दिया कि, तुम्हें ज्ञात होगा कि कर्म पथ अति रहस्यपूर्ण है । यघपि मैं कुछ भी नहीं करता, फिर भी लोग मुझे ही कर्मों के लिये दोषी ठहराते है । मैं तो एक दर्शक मात्र ही हूँ । केवल ईश्वर ही एक सत्ताधारी और प्रेरणा देने वाले है । वे ही परम दयालु है । मैं न तो ईश्वर हूँ और न मालिक, केवल उनका एक आज्ञाकारी सेवक ही हूँ और सदैव उनका स्मरणकिया करता हूँ । जो निरभिमान होकर अपने को कृतज्ञ समझ कर उन पर पूर्ण विश्वास करेगा, उसके कष्ट दूर हो जायेंगे और उसे मुक्ति की प्राप्ति होगी ।
ईरानी कन्या
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अब एक ईरानी भद्र पुरुष का अनुभव पढ़ये । उनकी छोटी कन्या घंटे-घंटे पर मूर्चिछत हो जाया करती थी । जब दौरा पड़ता, तब उसमें बोलने की भी सक्ति शेष न रह जाती थी । उसके दाँत बैठ जाते थे । उसके हाथ-पैर ऐंठ जाते और वह बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़ती थी । जब नाना प्रकार के उपचारों से भी उसे कोई लाभ न हुआ, तब कुछ लोगों ने उस ईरानी से बाबा की उदी की बहुत प्रशंसा की और कहा कि वह वलेपार्ला (बम्बई) में काकासाहेब दीक्षित के पास से ही प्राप्त हो सकती है । तब ईरानी महाशय ने वहाँ से उदी लाकर जल में घोलकर अपनी बेटी को पिलाया । प्रारम्भ में जो दौरे एक घंटे के अन्तर से आया करते थे, बाद में वे सात घंटे के अन्तर से आये और कुछ दिनों के पश्चात् तो वह पूर्ण स्वस्थ हो गई ।
हरदा के महानुभाव
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हरदा के एक महानुभाव पथरी रोग से ग्रस्त थे । यह पथरी केवल शल्यचिकित्सा द्घारा ही निकाली जा सकती थी । लोगों ने भी उन्हें ऐसा करने का परामर्श दिया । वे बहुत ही वृदृ तथा दुर्बल थे और अपनी दुर्बलता देखकर उन्हें शल्यचिकित्सा कराने का साहस न हो रहा था । इस हालत में उनकी व्याधि का और इलाज ही क्या था । इसी समय नगर के इनामदार भी वहाँ आये हुए थे, जो बाबा के परम भक्त थे तथा उनके पास उदी भी थी । कुछ मित्रों के परामर्श देने पर उनके पुत्र ने उनसे कुछ उदी प्राप्त कर अपने वृदृ पिता को जल में मिलाकर पीने को दी । केवल पाँच मिनट मे ही उदी के पेट में जाते ही पथरी मल-मूत्रेन्द्रय के द्घार से बाहर निकल गई और वह वृदृ शीघ्र ही स्वस्थ हो गया ।
बम्बई की महिला की प्रसव-पीड़ा
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बम्बई की कायस्थ प्रभु जाति की एक महिला को प्रसव-काल में असहनीय वेदना हुआ करती थी । जब वह गर्भवती हो रजाती तो बहुत घबराती और किंकर्तव्यमूढ़ हो जाया करती थी । इसके उपचारार्थए उनके एक मित्र श्रीराम मारुति ने उसके पति को सुझाव दिया कि यदि इस पीड़ा से मुक्ति चाहते हो तो अपनी पत्नी को शिरडी ले जाओ । दुबारा जब उनकी स्त्री गर्भवती हुई तो वे दोनों पति-पत्नी शिरडी आये और वहाँ कुछ मास ठहरे । वे बाबा की नित्य सेवा करने लगे । उन्हें बाबा के सत्संग का भी बहुत कुछ लाभ हुआ । कुछ दिनों के पश्चात जब प्रसव-काल समीप आया, तब सदैव की भाँति गर्भाशय के द्घार में रुकावट के साथ अधिक वेदना होने लगी । उनकी समझ में नहीं आता था कि अब क्या करना चाहिये । थोड़ी ही देर में एक पड़ोसिन आई और उसने मन ही मन बाबा से सहायता की प्रार्थना कर जल में उदी मिल उसे पीने को दी । तब केवल पाँच मिनिट में ही बिना किसी कष्ट के प्रसव हो गया । बालक तो अपने भाग्यानुसार ही उत्पन्न हुआ, परन्तु उसकी माँ की पीड़ा और कष्ट सदा के लिये दूर हो गये । वे अपने को बाबा का बड़ा कृतज्ञ समझने लगे और जीवनपर्यन्त उनके आभारी बने रहे ।
।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

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Wednesday, 4 May 2016

खुल जाए स्वर्ग के दरबार

ॐ सांई राम



दूर खड़ा तू देख रहा
 सबके मन का भाव
 पल भर में तू कर दे
 पूरी मन की आस

 आस बन जाती
 दिल का एक अरमान
 दिन की शुरुवात होती
 लेकर तेरा नाम

 तेरा नाम जप कर
 दिल हो जाए मालामाल
 तेरी किरपा से
 खुल जाए स्वर्ग के दरबार

 हर दरबार की चादर में
 जड़े हुए है हीरे मोती
 जिसकी चमक से
 मिल जाती मन को मुक्ति

 मन की मुक्ति पाकर
 मिल जाए साईं का आशीष
 आत्मा तृप्त हो जावे
 मिल जावे दिल को आराम

 दिल का आराम पाकर
 धन्य हो जावे जीवन
 जिसकी करूणा कथा को पढ़कर
 दिल हो जावे बेकरार

 बेकरार दिल एक ही गाथा गावे
 जय साईंराम, जय-जय साईंराम
 -: आज का साईं सन्देश :-

पूछा जब इक भक्त ने,
बाबा अब कहँ जाय ।
बाबा जी ने कह दिया,
सीधे ऊपर जाय ।।

भक्त कहे फिर साईं से,
मार्ग समझ न आय ।
उसी भक्त को प्रेम से,
बाबा दें समझाय ।।


Tuesday, 3 May 2016

SHREE HANUMAN CHALISA with meanings

ॐ सांई राम



SHREE HANUMAN CHALISA

Shree Guru Charan Saroj Raj, Nij Man Mukar Sudhari,
Barnau Raghuvar Bimal Jasu, Jo dayaku Phal Chari

With the dust of Guru's Lotus feet, I clean the mirror of my mind
and then narrate the sacred glory of Sri Ram Chandra, The Supereme
among the Raghu dynasty. The giver of the four attainments of life.


Budhi heen Tanu Janike, Sumirow, Pavan Kumar,
Bal Buddhi Vidya Dehu Mohi, Harahu Kalesh Bikaar

Knowing myself to be ignorent, I urge you, O Hanuman, The son of
 
Pavan! O Lord! kindly Bestow on me strength, wisdom and knowledge,
removing all my miseries and blemishes.

Jai Hanuman Gyan Guna Sagar
Jai Kipis Tihun Lok Ujgaar

Victory of Thee, O Hanuman, Ocean of wisdom and virtue, victory to
 
the Lord of monkeys who is well known in all the three worlds.

Ramdoot Atulit Bal Dhamaa,
Anjani Putra Pavansut naamaa.

You, the Divine messager of Ram and repository of immeasurable
 
strength, are also known as Anjaniputra and known as the son of the
wind - Pavanputra.

Mahebeer Bikram Bajrangi,
Kumati Nivaar Sumati Ke Sangi.
 

Oh Hanumanji! You are valiant and brave, with a body like
 
lightening. You are the dispeller of darkness of evil thoughts and
companion of good sense and wisdom.

Kanchan Baran Biraaj Subesaa,
Kanan kundal kunchit kesa.
 

Shri Hanumanji's physique is golden coloured. His dress is pretty,
 
wearing 'Kundals' ear-rings and his hairs are long and curly.

Hath Bajra Aur Dhvaja Birjai,
Kandhe Moonj Janeu saage.

Shri Hanumanji is holding in one hand a lighting bolt and in the
 
other a banner with sacred thread across his shoulder.

Shankar Suvna Kesari Nandan,
Tej Pratap Maha Jag Vandan
.
 

Oh Hanumanji! You are the emanation of 'SHIVA' and you del
ight Shri
 
Keshri. Being ever effulgent, you and hold vast sway over the
universe. The entire world proptiates. You are adorable of all.

Vidyavaan Guni Ati Chatur,
Ram Kaj Karibe Ko Atur.
 

Oh! Shri Hanumanji! You are the repository learning, virtuous, very
 
wise and highly keen to do the work of Shri Ram,

Prabhu Charittra Sunibe Ko Rasiya,
Ram Lakhan Sita man basyia.

Sukshma roop Dhari Siyahi Dikhwana,
Bikat roop Dhari Lank Jarawa.
 

You appeared before Sita in a diminutive form and spoke to her,
 
while you assumed an awesome form and struck terror by setting Lanka on fire.

Bhim roop Dhari Asur Sanhare,
Ramchandra Ke kaaj Savare.
 

He, with his terrible form, killed demons in Lanka and performed all
 
acts of Shri Ram.

Laye Sajivan Lakhan Jiyaye,
Shri Raghubir harashi ur laye
.
 

When Hanumanji made Lakshman alive after bringing 'Sanjivni herb'
 
Shri Ram took him in his deep embrace, his heart full of joy.

Raghupati Kinhi Bahut Badaai,
Tum Mama Priya Bharat Sam Bahi.
 

Shri Ram lustily extolled Hanumanji's excellence and remarked, "you
 
are as dear to me as my own brother Bharat"

Sahastra Badan Tumharo Jas Gaave,
Asa kahi Shripati Kanth Laagave.
 

Shri Ram embraced Hanumanji saying: "Let the thousand - tongued
 
sheshnaag sing your glories"

Sankadik Brahmadi Muneesa,
Narad Sarad Sahit Aheesa
.
 

Sanak and the sages, saints. Lord Brahma, the great hermits Narad
 
and Goddess Saraswati along with Sheshnag the cosmic serpent, fail
to sing the glories of Hanumanji exactly.

Jam Kuber Digpal Jahan Te,
Kabi Kabid Kahin Sake Kahan Te.
 

What to talk of denizens of the earth like poets and scholars ones
 
etc even Gods like Yamraj, Kuber, and Digpal fail to narrate
Hanman's greatness in toto.

Tum Upkar Sugrivahi Keenha,
Ram Miali Rajpad Deenha.
 

Hanumanji! You rendered a great service for Sugriva, It were you who
 
united him with SHRI RAM and installed him on the Royal Throne.

Tumharo Mantro Bibhishan Maana,
Lankeshwar Bhaye Sab Jag Jaana.
 

By heeding your advice. Vibhushan became Lord of Lanka, which is
 
known all over the universe.

Juug Sahastra Jojan Par Bhaanu,
Leelyo Taahi Madhur Phal Jaanu.
 

Hanumanji gulped, the SUN at distance of sixteen thousand miles
 
considering it to be a sweet fruit.

Prabhu Mudrika Meli Mukha Maaheen,
Jaladhi Langhi Gaye Acharaj Naheen.
 

Carrying the Lord's ring in his mouth, he went across the ocean.
 
There is no wonder in that.

Durgam Kaaj Jagat Ke Jeete,
Sugam Anugrah Tumhre Te Te.

Oh Hanumanji! all the difficult tasks in the world are rendered
 
easiest by your grace.

Ram Duware Tum Rakhavare,
Hot Na Aagya Bin Paisare.
 
Sab Sukh Lahen Tumhari Sarna,
Tum Rakshak Kaahu Ko Darnaa.

By your grace one can enjoy all happiness and one need not have any
 
fear under your protection.

Aapan Tej Samharo Aapei,
Tanau Lok Hank Te Kanpei.
 

When you roar all the three worlds tremble and only you can control
 
your might.

Bhoot Pisaach Nikat Nahi Avei,
Mahabir Jab Naam Sunavei.
 

Great Brave on. Hanumanji's name keeps all the Ghosts, Demons &
 
evils spirits away from his devotees.

Nasei Rog Hare Sab Peera,
Japat Niranter Hanumant Beera.
 

On reciting Hanumanji's holy name regularly all the maladies perish
 
the entire pain disappears.

Sankat Te Hanuman Chhudavei,
Man Kram Bachan Dhyan Jo Lavei.
 

Those who rembember Hanumanji in thought, word and deed are well
 
guarded against their odds in life

Sub Par Ram Tapasvee Raaja,
Tinke Kaaj Sakal Tum Saaja.
 

Oh Hanumanji! You are the caretaker of even Lord Rama, who has been
 
hailed as the Supreme Lord and the Monarch of all those devoted in
penances.

Aur Manorath Jo Koi Lave,
Soi Amit Jivan Phal Pave.
 

Oh Hanumanji! You fulfill the desires of those who come to you and
 
bestow the eternal nectar the highest fruit of life.

Charo Juung Partap Tumhara,
Hai Parsiddha Jagat Ujiyara.
 

Oh Hanumanji! You magnificent glory is acclaimed far and wide all
 
through the four ages and your fame is radianlty noted all over the
cosmos.

Sadho Sant Ke Tum Rakhvale,
Asur Nikandan Ram Dulare.
 

Oh Hanumanji! You are the saviour and the guardian angel of saints
 
and sages and destroy all the Demons, you are the seraphic darling
of Shri Ram.

Ashta Siddhi Nau Nidhi Ke Data,
Asa Bar Din Janki Mata.
 

Hanumanji has been blessed with mother Janki to grant to any one any
 
YOGIC power of eight Sidhis and Nava Nidhis as per choice.

Ram Rasayan Tumhare Pasa,
Sadaa Raho Raghupati Ke Dasa.
 

Oh Hanumanji! You hold the essence of devotion to RAM, always
 
remaining His Servant.

Tumhare Bhajan Ramko Pavei.
Janam Janam Ke Dukh Bisravei.
 

Oh Hanumanji! through devotion to you, one comes to RAM and becames
 
free from suffering of several lives.

Anta Kaal Raghubar Pur Jai,
Jahan Janma Hari Bhakta Kahai
.
 

After death he enters the eternal abode of Sri Ram and remains a
 
devotee of him, whenever, taking new birth on earth.

Aur Devata Chitt Na Dharai,
Hanumant Sei Sarva Sukh Karai.
 

You need not hold any other demigod in mind. Hanumanji alone will
 
give all happiness.

Sankat Kate Mitey Sab Peera,
Jo Sumirei Hanumant Balbeera.

Oh Powerful Hanumanji! You end the sufferings and remove all the
 
pain from hose who remember you.

Jai Jai Jai Hanuman Gosai
Kripa Karahu Gurudev Ki Naiee.
 

Hail-Hail-Hail-Lord Hanumanji! I beseech you Honour to bless me in
 
the capacity of my supreme 'GURU' (teacher).

Jo Sat Baar Paath Kar Koi,
Chhutahi Bandi Maha Sukh Hoi.
 

One who recites this Hanuman Chalisa one hundred times daily for one
 
hundred days became free from the 111111111 of life and death and
enjoys the highest bliss at last.

Jo Yah Padhe Hanuman Chalisa,
Hoy Siddhi Sakhi Gaurisa.
 

As Lord Shankar witnesses, all those who recite Hanuman Chalisa
 
regularly are sure to be benedicted.

Tulsidas Sada Hari Chera,
Keeje Nath Hriday Mah Dera.
 

Tulsidas always the servant of Lord prays. "Oh my Lord! You enshrine
 
within my heart.!

Pavan Tanay Sankat Haran, Mangal Murti Roop.
Ram Lakhan Sita Sahit, Hriday Basahu Sur Bhoop.
 

O Shri Hanuman, The Son of Pavan, Saviour The Embodiment of
 
blessings, reside in my heart together with Shri Ram, Laxman and
Sita.


Duty is God, Work is Worship
Presented by Sh. Amit Gupta ji, Dwarka, NewDelhi

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-: आज का साईं सन्देश :-

बहुत गुणी दाभोलकर,
बातों से विद्वान ।
हेमांद्री से गुण भरे,
बाबा लें पहचान ।

शिर्डी आकर बस गये,
बाबा का वरदान ।
सदा प्रबंधक बन रहे,
श्री साईं संस्थान ।।
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Monday, 2 May 2016

सांई नाम से प्रीत लगा

ॐ सांई राम




 सांई नाम से प्रीत लगा बोलो सांई जय जय सांई
 
जन्म सफल होगा बन्दे,मन में सांई बसा ले

Sunday, 1 May 2016

मेरे मन दिल किसी का ना दुखा

ॐ सांई राम


 मेरे मन दिल किसी का ना दुखा,
भले ही ऱब को तू मना ना मना,

न जा मंदिर, न दीपक जला ,
पर किसी को यूं ही न सता ,
आंसू कही जो तेरे कारण बहे ,
न सोच कि तू बच जाएगा ,
ये आंसू नहीं दरिया है पाप के,
जिसमें तू गोते खाएगा ,
छटपटाएगा, चिल्लाएगा ,
पर कोई ना बचाएगा ,
तेरी करनी क्या रंग लाए ,
ये तो ऱब ही तुझे बताएगा

-: आज का साईं सन्देश :-
बहिखाते बढ़िया लिखें,
बहुत बड़े विद्वान् ।
महाकाव्य रचना करें,
साईं चरित बखान ।।
 
आत्म निवेदन होय कस,
शरणागति समझाय ।
ज्ञान,भक्ति,वैराग्य की,
महिमा दी बतलाय ।।

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