शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 6 December 2014

श्री गुरु हरिराय जी – साखियाँ - गुरु जी द्वारा भाई भगतू के पुत्र गौरे को बक्शना

श्री गुरु हरिराय जी – साखियाँ






गुरु जी द्वारा भाई भगतू के पुत्र गौरे को बक्शना


भाई भगतू का पुत्र गौरा जो की बठिंडे का राजा था गुरु हरि राय जी के आने की खबर सुनकर उनके पास पहुँचा उसने एक अच्छा घोड़ा और पांच सौ रुपये भेंट करकर गुरु जी को माथा टेका| गुरु जी ने गौरे से पूछा जिस लड़की से भाई भगतू ने अपनी मृत्यु से पहले वचन के द्वारा ही शादी की थी उसका क्या हाल है| गौरे ने कहा महाराज! हमारी धर्म माता खुश है| गौरे की यह बात सुनकर गुरु जी के चौरी बरदार भाई जस्से ने हँसी में कहा वह स्त्री तो अभी जवान है| अप उसका मेरे साथ विवाह कर दो| यह बात सुनकर गौरे को गुस्सा आया और उसने अपने आदमियों से जस्से को गोली मारकर मरवा दिया|

जब इस बात का पाता गुरु जी को लगा तो गुरु जी ने सबसे कहा कि कोई हमे गौरा की सिफारिश ना करे और ना ही वह हमे मुहँ दिखाए| जब गौरा को गुरु जी की नाराज़गी का पाता लगा तो उसने डर कर प्रण किया कि जब तक वह गुरु जी को खुश नहीं करेगा तब तक घर वापिस नहीं जाएगा

यह निश्चय करके गौर अपनी सेना सहित गुरु जी के पीछे लग गया और रात दिन भूल बक्शवाने के लिय मन में आराधना करने लगा| जब गुरु जी कीरतपुर वापिस चले गए तब गौरा भी कीरत पुर से बाहर आवास करके छे महीने बैठा रहा|

एक दिन गुरु जी अपने परिवार सहित कीरत पुर से सतलुज नदी से साथ साथ चाल रहे थे गुरु जी घोड़े पर सवार थे पीछे कुछ योद्धा भी थे| वहाँ गौरा भी अपने तीन सौ शूरवीरों के साथ चाल पड़ा|

उधर से लाहौर से एक नवाब कुछ सवार लेकर दिल्ली को जा रहा था| उसने डोले पर सामान जाता देखकर पूछा कि यह कौन जा रहा है| तो एक सिख ने बताया यह गुरु हरि राय जी के घर डोलियों पर सामान जा रहा है| मुस्लिम उमराव ने अपने साथियों से कहा कि सब कुछ लूट लो|

गुरु जी तो बहुत आगे आगे चल रहे थे| परन्तु गौरा पीछे पीछे आ रहा था| उसने जब देखा कि तुर्क सेना के आदमी गुरु जी का समान लूटने के लिए आगे आए हैं| तो उसने उनके साथ डट कर मुकाबला किया और सब को मार भगाया| गुरु जी का सामान सही सलामत पहुँच गया| इस बात का पता जब गुरु जी को लगा तो तो वह भूत प्रसन्न हुए|गुरु जी ने उसको माफ भी कर दिया| तब गुरु जी ने उसको आज्ञा दी कि बठिंडे जा कार अपना राज भोगो| गुरु घर तुम पर प्रसन्न है| ऐसी बात सुनकर और गुरु जी का आशीर्वाद लेकर लेकर गौरा बठिंडे को चल पड़ा|

Friday, 5 December 2014

श्री गुरु हरिराय जी – साखियाँ - सिक्खी का जहाज फूटना

श्री गुरु हरिराय जी – साखियाँ





सिक्खी का जहाज फूटना

एक दिन गुरु हरि राय जी कुछ सिखो को साथ लेकर बाबा गुरु दित्ता जी के समाने वाले स्थान के दर्शन करने के लिए पहाड़ी पर गए| वहाँ गुरु जी काफी देर खड़े रहे और देखते रहे| जब बहुत समय ऐसे ही बीत गया तो सिखो ने गुरु जी से पूछा महाराज! आप इधर क्या देख रहे हो| तब आपने कहा कि भाई! श्री गुरु नानक देव जी ने इस संसार के उद्धार के लिए जो जहाज तैयार किया था| वह भवर में पड़कर टुकड़े टुकड़े हो गया है| इस में जो सिख सवार थे कोई डूब गया, कोई बह गया और कोई किनारे लग रहा है| सबको आपा-धापी पड़ी है| हम इस जहाज की दयनीय दशा को देख रहे हैं|

जब सिक्खों ने इस बात को स्पष्ट करने की माँग की तो आपने बताया सिख सेवक धन के लालच में पड़ गए हैं| वह सिक्खी का मार्ग ही भूल गए हैं| कच्चे गुरुओं के पीछे लगकर पारउतारा किस प्रकार हो सकता है| इस तरह सिक्खी का जहाज टूट-फूट गया है|

गुरु जी की बात सुनकर सिक्खों ने फिर प्रार्थना की कि महाराज! यह जहाज कभी जुड़ेगा या नहीं| महाराज ने कहा कि जब हम दसवां जामा धारण करके दुष्टों और पाखंडियों का नाश करेगें और नया पंथ चलायेगें| यह जहाज फिर जुड जाएगा| इस पर वाहिगुरु की भक्ति करने वाले सिख चढ़ेंगे और उनका पार उतारा हो जाएगा|

Thursday, 4 December 2014

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 6

ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं |
हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है |
हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा| किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है|


श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 6
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रामनवमी उत्सव व मसजिद का जीर्णोदृार, गुरु के कर-स्पर्श की महिमा, रामनवमी—उत्सव, उर्स की प्राथमिक अवस्था ओर रुपान्तर एवम मसजिद का जीर्णोदृार
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Wednesday, 3 December 2014

श्री गुरु हरिराय जी - गुरु गद्दी मिलना

श्री गुरु हरिराय जी - गुरु गद्दी मिलना





श्री गुरु हरिराय जी गुरु गद्दी मिलना


गुरु हरिगोबिंद जी ने अपना अंतिम समय नजदीक पाकर श्री हरि राय जी को गद्दी देने का विचार किया|वे श्री हरि राय जी से कखने लगे कि तुम गुरु घर कि रीति के अनुसार पिछली रात जागकर शौच स्नान करके आत्मज्ञान को धारण करके भक्ति मार्ग को ग्रहण करना| शोक को त्याग देना व धैर्य रखना| सिखों को उपदेश देना और उनका जीवन सफल करना| बाबा जी के ऐसे वचन सुनकर श्री हरि राय जी कहने लगे महाराज! देश के तुर्क हमारे शत्रु है, उनके पास हकूमत है, उनके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? गृ जी कहने लगे कि तुम चिंता ना करो, जो तुम्हारे ऊपर चढ़कर आएगा, वह कोहरे के बादल कि तरह उड़ जायेगा| तुम्हे कोई भी हानि नहीं पहुँचायेगा| यह बात सुनकर श्री हरि राय जी ने गुरु जी के चरणों में माथा टेका और शांति प्राप्त की|

संगत और मसंदो आप ने संबोधित करके वचन किया कि आज से श्री हरि राय जी को हमारा ही स्वरूप जानना और मानना| जो इनके विरुद्ध चलेगा,उसका लोक व परलोक बिगड़ेगा| वह यहाँ वहाँ दुःख पायेगा|

बाबक रबाबी और मलिक जाती के परलोक सिधार जाने के कुछ समय बाद गुरु हरि गोबिंद जी ने अपने शरीर त्यागने का समय नजदीक अनुभव करके श्री हरि राये जी को गुरुगद्दी का विचार कर लिया| इस मकसद से आपने दूर - नजदीक सभी सिखों को करतारपुर पहुँचने के लिए पत्र लिखे|

श्री गुरु हरिगोबिंद जी ने होलियों कि पूर्णिमा के बाद दूसरे दिन ही गुरु जी ने सिखों को आज्ञा दी कि दीवान वाले स्थान पर ऊँचा चबूतरा तयार किया जाये| एक बड़े दीवान के लिए दरियाँ भी बिछा दो और साथ ही साथ चंदोये तान दो| इसके बाद सारी संगत को दीवान में बुलाकर बिठा दो| जब श्री गुरु हरिगोबिंद जी की आज्ञा अनुसार दीवान सज गया तो गुरु जी ने अपने तीनो साहिबजादों सूरज मल जी, अणी राये जी तेग बहादुर जी और अपने पोत्रे श्री हरि राये सहित आकर अपने सिंघासन के ऊपर आकर सुशोभित हो गये| रबाबियो ने कीर्तन करना शुरू कर दिया| कड़ाह प्रसाद कि देग भी तैयार हो गई|

कीर्तन कि समाप्ति के बाद गुरु जी ने आसन से उठकर श्री हरि राये जी को अपनी जगह पर बिठा दिया और पाँच पैसे और नारियल आगे रखकर माथा टेक दिया| जब इस बात का पता मरवाही माता को लगा तो आप गुरु जी से कहने लगी कि इसमें सूरजमल का क्या दोष है? आप ने गुरुत्व अपने पोत्र को क्यों दिया? श्री गुरु हरिगोबिंद जी कहने लगे चिंता ना करो, इन्हे भी सभ कुछ प्राप्त होगा| माता को तसल्ली ना हुई| गुरु जी ने सूरजमल को बुलाया और पूछा क्या आप गुरुगद्दी लेना चाहते है?

सूरजमल जी कहने लगे महाराज! हमे तो गुरु घर की सिक्खी चाहिए, बाकी और कुछ नहीं| मैं गुरु नहीं बनना चाहता| आगे से गुरु जी कहने लगे कि आप ने सिक्खी माँग कर सभ कुछ प्राप्त कर लिया| आपको शाबाश है| तुम्हारा वंश खूब बढेगा व गुरुगद्दी भी प्राप्प्त हो जायेगी| जब यह बात माता मरवाही जी को पता लगी तो वह प्रसन्न हो गई कि गुरु जी के वचन कभी खाली नहीं जायेंगे|

Tuesday, 2 December 2014

श्री गुरु हरिराय जी जीवन – परिचय

श्री गुरु हरिराय जी जीवन – परिचय





श्री गुरु हरिराय जी जीवन – परिचय


प्रकाश उत्सव (जन्म की तारीख): 1630
Parkash Ustav (Birth date): 1630 

पिता: बाबा गुरदित्ता जी
Father: Baba Gurditta Ji 

माँ: माता निहाल कौर जी
Mother: Mata Nihal Kaur Ji 

महल (पति या पत्नी): माता कृष्ण कौर
Mahal (spouse): Mata Krishen Kaur 

साहिबज़ादे (वंश): राम राय, हर्क्रिशन जी
Sahibzaday (offspring): Ram Rai, HarKrishan ji 

ज्योति ज्योत (स्वर्ग करने के उदगम): 6 अक्टूबर 1661
Joti Jyot (ascension to heaven): October 6, 1661


गुरु मंगल 

दोहरा-कथा गुरु हरि राय की सुनो श्रोता सावधान||
पावन पुन उपावनी गण पापन की हान||




श्री गुरु हरि राय जी श्री बाबा गुरदित्ता जी के घर माता निहाल कौर जी की कोख से माघ सुदी १३ संवत १६८१ विक्रमी को करतारपुर के स्थान पर अवतार धारण किया|

बाबा गुरुदित्ता जी ने जब १० संवत १६९५ को शरीर त्यागा तो १३वे वाले दिन दस्तारबंदी के समय हरि राये जी करतारपुर से नहीं आये तो गुरु जी ने सम्बन्धियों और भाई भाना आदि गुरुसिखो से सलाह करके बाबा जी के छोटे सुपुत्र श्री हरि राये को हर प्रकार से योग्य जानकर दस्तारबंदी करके गुरुदित्ता जी का अधिकारी नियत कर दिया|

श्री हरि राये जी अपने प्रण के पक्के थे|एक दिन गुरु हरिगोबिंद जी बाग की सैर करने आपको साथ ले गये|श्री हरि राये जी गुरु जी के पीछे-२ ही जा रहे थे कि उनके जमे के साथ अटककर कली का फूल जमीन पर गिर गया|गुरु जी ने जब ऐसा देखा तो श्री हरि राये को कहने लगे कि अगर लंबा जामा पहनना हो तो संभल कर चला करो|बेपरवाही अच्छी नहीं होती| यह बात सुनकर हरि राये जी ने गुरु जी से क्षमा माँगी ,साथ ही साथ प्रण भी किया के आगे से जामा ऊँचा उठा कर रखेंगे|और यह प्रण आप ने जीवन भर निभाया|

Monday, 1 December 2014

श्री गुरु हरिगोबिन्द जी – साखियाँ - श्री गुरु हरिगोबिन्द जी - ज्योति ज्योत समाना

श्री गुरु हरिगोबिन्द जी – साखियाँ





श्री गुरु हरिगोबिन्द जी - ज्योति ज्योत समाना 

बाबक रबाबी और मलिक जाती के परलोक सिधार जाने के कुछ समय बाद गुरु हरि गोबिंद जी ने अपने शरीर त्यागने का समय नजदीक अनुभव करके श्री हरि राये जी को गुरुगद्दी का विचार कर लिया|इस मकसद से आपने दूर - नजदीक सभी सिखों को करतारपुर पहुँचने के लिए पत्र लिखे|

गुरु हरिगोबिंद जी ने अपना अंतिम समय नजदीक पाकर श्री हरि राय जी को गद्दी देने का विचार किया| वे श्री हरि राय जी से कहने लगे कि तुम गुरु घर की रीति के अनुसार पिछली रात जागकर शौच स्नान करके आत्मज्ञान को धारण करके भक्ति मार्ग को ग्रहण करना| शोक को त्याग देना व धैर्य रखना| सिखों को उपदेश देना और उनका जीवन सफल करना| बाबा जी के ऐसे वचन सुनकर श्री हरि राय जी कहने लगे महाराज! देश के तुर्क हमारे शत्रु है, उनके पास हकूमत है, उनके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? गुरु जी कहने लगे कि तुम चिंता ना करो, जो तुम्हारे ऊपर चढ़कर आएगा, वह कोहरे के बादल कि तरह उड़ जायेगा| तुम्हे कोई भी हानि नहीं पहुँचायेगा| यह बात सुनकर श्री हरि राय जी ने गुरु जी के चरणों में माथा टेका और शांति प्राप्त की|

गुरु जी ने अपने अन्तिम समय के लिए एक कमरा तैयार कराया और उसका नाम पातालपुरी रखा| इसके पश्चात अपनी दोनों महिलाओं माता मरवाही और माता नानकी जी और तीनों पुत्रों श्री सूरज मल जी, श्री अणी राय जी और श्री तेग बहादर जी और पोत्र श्री हरि राय जी को मसंदो व सिक्ख सेवकों को अपने पास बिठाकर वचन किया कि अब हमारी स्वर्ग सिधारने की तैयारी है| यह कोई नई बात नहीं है| संसार का प्रवाह नदी की तरह चलता रहता है| यहाँ सब कुछ नाशवान और अस्थिर है| प्रभु का हुकम मानना और उसपर चलना चहिए| यही जरूरी है|


सिक्खों और परिवार को आज्ञा:
इसके पश्चात गुरु जी ने भाई भाने को आज्ञा की कि तुमने अपने पुत्र को श्री हरि राय जी की सेवा में रहने देना| जोध राय को कहा कि तुम अपने घर कांगड़ चले जाना और सतिनाम का स्मरण करके सुख भोगना और गुरु का लंगर जारी रखना|

बीबी वीरो को धैर्य दिया और कहा कि तेरी संतान बड़ा यश पायेगी| तुम्हें सारे सुखो की प्राप्ति होगी|

बिधीचंद के पुत्र लालचंद को कहा, तुमने अपने घर सुर सिंह चले जाना| और फिर जब गुरु घर को जरुरत होगी, तन मन के साथ हाजिर होकर सेवा करनी| 

इस तरह बाबा सुन्दर और परमानन्द को भी अपने घर गोइंदवाल भेज दिया| फिर माता नानकी की तरफ देखकर कहा कि तुम अपने पुत्र श्री तेग बहादर को लेकर अपने मायके बकाले चले जाओ|

श्री सूरज मल जी को कहा कि तुम पानी इच्छा के अनुसार श्री हरि राय जी के पास अथवा यहाँ तुम्हें सुख प्रतीत हो निवास कर लेना| तेरा वंश बहुत बड़ेगा| श्री अणी राय जी को आपने कुछ नहीं कहा क्योंकि उनका ध्यान ब्रह्म ज्ञान में टिका हुआ था| 


संगत के प्रति वचन:
संगत और मसंदो आप ने संबोधित करके वचन किया कि आज से श्री हरि राय जी को हमारा ही स्वरूप जानना और मानना| जो इनके विरुद्ध चलेगा,उसका लोक व परलोक बिगड़ेगा| वह यहाँ वहाँ दुःख पायेगा| वाणी पड़नी, सतिनाम का स्मरण करना और शोक किसी ने नहीं करना होगा| हम अपने निज धाम स्वर्ग को जा रहे हैं|

इस तरह सब को धैर्य और आदेश देकर गुरु जी ने पाताल पुरी नाम के कमरे में घी का दीया जलाकर कुश और नरम बिछौना करवाया और सारी संगत को धैर्य व सांत्वना देकर भाई जोध राय और भाई भाने को कहा तुम इस कमरे का सात दिन पहरा रखना और सातवें दिन इसका दरवाजा श्री हरि राय जी से खुलवाना|

पहले कोई निकट आकर विघ्न ना डाले| यह वचन करके आपजी ने कमरे के अंदर जाकर दरवाजा बन्द कर लिया और कुश के आसन पर समाधि लगाकर बैठ गए| संगत बाहर बैठकर अखंड कीर्तन करने लगी|

सातवें दिन सवा पहर दिन चढ़े श्री हरि राय जी ने अरदास करके दरवाजा खोला और गुरु जी के मृत शरीर को स्नान कराकर और नवीन वस्त्र पहना कर एक सुन्दर विमान में रखकर चन्दन व घी चिता के पास ले गए और चिता में रखकर संस्कार कर दिया| इसके पश्चात सबने सतलुज नदी में स्नान किया और डेरे आकर कड़ाह प्रसाद की देघ तैयार करके बाँटी| 
इस तरह श्री गुरु हरि गोबिंद जी चेत्र सुधि पंचमी संवत 1701 विक्रमी को ज्योति ज्योत समाए|

Sunday, 30 November 2014

श्री गुरु हरिगोबिन्द जी – साखियाँ - चंदू की करनी का फल

श्री गुरु हरिगोबिन्द जी – साखियाँ





चंदू की करनी का फल

एक दिन जहाँगीर ने गुरु जी के हाथ में कपूरों और मोतियों की एक माला देखकर कहा कि इसमें से एक मनका मुझे बक्शो| मैं इसे अपनी माला का मेरु बनाकर आपकी निशानी के तौर पर रखूँगा| गुरु जी ने जहाँगीर की पूरी बात सुनी और कहने लगे पातशाह! इससे भी सुन्दर और कीमती 1080 मनको की माला जो हमारे पिताजी के पास थी वह चंदू के पास है| उसने यह माला हमारे पिताजी से तब ली थी जब उसने पिताजी को हवेली में कैद करके रखा था| वह माला आप चंदू से मँगवा लो|

जहाँगीर ने अपने आदमी को चंदू के पास भेजा| जब चंदू दरबार में आ गया, तो बादशाह ने कहा कि आप हमें वह माला दे जो आपने गुरु अर्जन देव जी से लाहौर में ली थी| यह आज्ञा सुनकर चंदू ने कहा जहाँपनाह! मैंने कोई भी माला गुरु जी से नहीं ली| ना ही मेरे पास कोई माला है| फिर गुरु जी के कहने पर ही बादशाह ने उसके घर आदमी भेजे और तलाशी ली| माला चंदू के घर से ही प्राप्त हुई|

चंदू का झूठ पकड़ा गया| जहाँगीर को बहुत गुस्सा आया| उसने गुरु जी से कहा कि यह आपका अपराधी है जिसने आपके निर्दोष पिता को घोर कष्ट देकर शहीद किया है| इसको पकड़ो, आपके जो मन में आये इसको सजा दो|

बादशाह की आज्ञा सुनकर भाई जेठा जी आदि सिखों ने चंदू को पकड़ लिया| उसके हाथ पैर बांध दिए| बांध कर उसे डेरे मजनू टिले ले आये| इसके पश्चात बादशाह ने चंदू के पुत्र और स्त्री को भी पकड़ लिया| उनको पकड़कर गुरु जी के पास मजनू टिले भेज दिया| ताकि इनको भी गुरु जी मर्जी के अनुसार सजा दे सके| परन्तु गुरु जी ने कहा इनका कोई दोष नहीं है| इनको छोड़ दो| अतः वह दोनों माँ-बेटा गुरु जी की महिमा करते हुए घर को चले गए|

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