शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 13 September 2014

श्री साईं लीलाएं - कर्म भोग न छूटे भाई

ॐ सांई राम



कल हमने पढ़ा था.. लाओ, अब बाकी के तीन रुपये दे दो

श्री साईं लीलाएं


शिर्डी से श्री साँई बाबा जी की श्री कमल चरण पादुका एंवम सटके की यह तस्वीर बाबा जी के म्यूज़ियम से ली गयी है

कर्म भोग न छूटे भाई

पूना के रहनेवाले गोपाल नारायण अंबेडकर बाबा के अनन्य भक्त थे| वे सरकारी कर्मचारी थे| शुरू में वे जिला ठाणे में नौकरी पर थे, बाद में तरक्की हो जाने पर उनका तबादला ज्वाहर गांव में हो गया| लगभग 10 वर्ष नौकरी करने के बाद उन्हें किसी कारणवश त्यागपत्र देना पड़ा| फिर उन्होंने दूसरी नौकरी के लिए अनथक प्रयास किये, परंतु सफलता नहीं मिली| नौकरी न मिलने के कारण माली हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती चली गयी और घर-बार चलाना उनके लिए मुसीबत बन गया| ऐसी स्थिति सात वर्ष तक चली, परन्तु ऐसी स्थिति होने के बावजूद भी प्रत्येक वर्ष शिरडी जाते और बाबा को अपनी फरियाद सुनाकर वापस आ जाते| आगे चलकर उनकी हालत इतनी बदत्तर हो गयी कि अब उनके सामने आत्महत्या करने के अलावा और कोई रास्ता न बचा था| तब वे शिरडी जाकर आत्महत्या करने का निर्णय कर परिवार सहित शिरडी आये और दो महीने तक दीक्षित के घर में रहे|

एक रात के समय दीक्षित बाड़े के सामने बैलगाड़ी पर बैठे-बैठे उन्होंने कुएं में कूदकर आत्महत्या करने का विचार किया, लेकिन बाबा ने उन्हें आत्महत्या करने से रोकने का निश्चय कर लिया था| यह देखकर कि अब कोई देखने वाला नहीं है, यह सोचकर वे कुएं के पास आये| वहां पास ही सगुण सरायवाले का घर था और उसने वहीं से पुकारा और पूछा - "गोपालराव, क्या आपने अक्कलकोट महाराज स्वामी की जीवनी पढ़ी है क्या?" गोपालराव ने कहा - "नहीं| पर जरा दिखाओ तो सही|" सगुण ने वह किताब उन्हें थमा दी| किताब के पन्ने उलटते-पलटते वे एक जगह पर रुके और वहां से पढ़ने लगे| वह एक ऐसी घटना थी कि श्री स्वामी महाराज का एक भक्त अपनी बीमारी से तंग आ चुका था| बीमारी से मुक्ति पाने के लिए उसने स्वामी जी की जी-जान से सेवा भी की, पर कोई फायदा न होते देख उसने आत्महत्या करने की सोची| रात के अंधेरे का लाभ उठाकर वह एक कुएं में कूद गया| उसी श्रण स्वामी जी वहां प्रकट हुए और उसे कुएं में से बाहर निकाल लिया| फिर उसे समझाते हुए बोले - "ऐसा करने से क्या होने वाला है? तुम्हें अपने पूर्व जन्म के शुभ-अशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना चाहिए| यदि इन भोगों को नहीं भोगोगे तो फिर से किसी निकृष्ट योनि में जन्म लेना पड़ेगा - और कर्म-भोग तुम्हें ही भोगने पड़ेंगे| इसलिए जो भी अपना कर्मफल है, उसे यहीं इसी जन्म में भोगकर तुम सदैव के लिए मुक्त हो जाओ|" इन वचनों को सुनकर भक्त को अपनी गलती का अहसास हो गया| फिर उसने विचार किया कि जब स्वामी जी जैसे मेरे रखवाले हों तो मैं कर्मफल से क्यों डरूं?

यह कहानी पढ़कर गोपालराव के विचार भी बदल गये और उसने आत्महत्या करने का विचार त्याग दिया| उसे इस बात का अनुभव हो गया कि साईं बाबा ने मुझे सगुण के द्वारा आज बचाया है| यदि सगुण न बुलाता तो आज मैं गलत रास्ते पर चल दिया होता और मेरा परिवार अनाथ हो जाता| फिर उसने मन-ही-मन बाबा की चरणवंदना की और लौट गया| बाबा के आशीर्वाद से उसका भाग्य चमक गया| आगे चलकर उसे बाबा की कृपा से ज्योतिष विद्या की प्राप्ति हुई और उस विद्या के बल पर उसने धनोपार्जन कर अपना कर्ज उतार दिया और शेष जीवन सुख-शांति से बिताया|

 
कल चर्चा करेंगे... काका, नाथ भागवत पढ़ो, यही एक दिन तुम्हारे काम आयेगा
ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Friday, 12 September 2014

श्री साईं लीलाएं - लाओ, अब बाकी के तीन रुपये दे दो

ॐ सांई राम



कल हमने पढ़ा था.. गुरु-गुरु में अंतर न करें
श्री साईं लीलाएं

लाओअब बाकी के तीन रुपये दे दो

मुम्बई के एक सज्जन थे जिनका नाम थे हरिश्चंद्र पिल्ले| उनके एकमात्र पुत्र को कई वर्ष से मिरगी के दौरे पड़ा करते थे| सभी तरह का इलाज करवाया, पर कोई लाभ न हुआ| आखिर में उन्होंने यह सोचा कि किसी महापुरुष के आशीर्वाद से शायद इसका रोग दूर हो जाये|

सन् 1910 में दासगणु महाराज के कीर्तन मुम्बई में अनेक जगहों पर हुए और बाबा का नाम भी सारे मुम्बई में प्रसिद्ध हो गया था| पिल्ले ने भी एक दिन दासगणु का संकीर्तन सुना| वे जानते थे कि यदि बाबा ने इस पर अपना वरदहस्त रख दिया तो इसका रोग क्षणमात्र में ही नष्ट हो, यह स्वस्थ हो जायेगा|

फिर एक दिन वह अपने परिवार सहित शिरडी में पहुंचे| वहां मस्जिद में जाकर उन्होंने परिवार सहित बाबा की चरणवंदना की| बाबा की मंगल मूरत देख पिल्ले की आँखें भर आयीं और उन्होंने अपना रोगी पुत्र बाबा के चरणों में लिटा दिया| जैसे ही बाबा ने रोगी पुत्र पर दृष्टिपात किया, अचानक उसमें एकदम बदलाव-सा आया| उसकी आँखें फिर गईं और वह बेहोश हो गया| मुंह से झाग निकलने लगे, शरीर पसीने से बुरी तरह भीग गया| ऐसा लगने लगा कि शायद अब जीवित न बचेगा|

अपने पुत्र की ऐसी हालत देखकर वे घबरा गये, क्योंकि अब से पहले वह इतनी ज्यादा देर तक बेहोश कभी नहीं रहा था| उनकी पत्नी की आँखों से अश्रुधारा बहने लगी| वे तो अपने पुत्र को इलाज के लिए लाये थे, लेकिन दिखता कुछ और ही है|

साईं बाबा उनका दर्द समझते थे| इसलिए बाबा उनसे बोले - "व्यक्ति को कभी भी अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए| एक पल में कुछ नहीं होता| इसे उठाकर अपने निवास स्थान पर उठाकर ले जाओ| जल्दी ही होश आ जायेगा| चिंता मत करना|"

दोनों बच्चे को उठाकर बाड़े में ले आये| वहां आने पर कुछ ही देर में उसे होश आ गया| यह देख वह बहुत प्रसन्न हुए| उनकी चिंता दूर हो गयी| शाम को पति-पत्नी दोनों बच्चे को लेकर बाबा के दर्शन करने मस्जिद में आये और बाबा की चरणवंदना की| तब बाबा ने मुस्कराते हुए कहा - "अब तो तुम्हें विश्वास हो गया? जो विश्वास रहते हुए धैर्य से रहता है, ईश्वर उसकी रक्षा अवश्य करता है|"

पिल्ले खानदानी रईस व्यक्ति थे| अपना पुत्र ठीक हो जाने की खुशी में उन्होंने वहां उपस्थित सभी लोगों को मिठाई बांटी| बाबा को उत्तम फल, फूल, वस्त्र, दक्षिणा आदि श्रीचरणों में भेंट की| अब पति-पत्नी दोनों की निष्ठा बाबा के प्रति और भी गहरी हो गयी और वे पूरी श्रद्धा और भक्ति-भाव से बाबा की सेवा करने लगे|

कुछ दिनों तक शिरडी में रहने के बाद जब मस्जिद में जाकर पिल्ले ने बाबा से मुम्बई जाने की अनुमति मांगी, तब बाबा ने उन्हें ऊदी और आशीर्वाद देते हुए पिल्ले से कहा - "बापू ! दो रुपये मैं तुम्हें पहले दे चुका हूं| अब तीन रुपये और देता हूं| इन्हें घर पर पूजा-स्थान पर रखकर, इनका नित्य पूजन करना| इसी से तुम्हारा कल्याण होगा|"

पिल्ले ने प्रसाद रूप में रुपये लेकर बाबा को साष्टांग प्रणाम किया| वे इस बात को नहीं समझ पाये कि वह तो अपने जीवन में पहली बार शिरडी आये हैं फिर बाबा ने उन्हें दो रुपये कब दिये? परन्तु वे बाबा से न पूछ सके और वापस लौटते समय इसके बारे में ही सोच-विचार करते रहे| जब कुछ समझ में नहीं आया तो वे चुपचाप बैठ गये| घर लौटने पर उन्होंने अपनी बूढ़ी माँ को शिरडी का सारा हाल कह सुनाया| पहले तो उनकी माँ भी दो रुपये वाली बात न समझ पायी, फिर सोच-विचार करने पर उन्हें एक घटना याद आ गयी| वे अपने पुत्र से बोलीं - "बेटा, जैसे तुम अपने पुत्र को लेकर साईं बाबा के पास शिरडी गये थे, उसी तरह तेरे बचपन में तुम्हारे पिता मुझे लेकर अक्कलकोट महाराज के दर्शन के लिए गये थे| तुम्हारे पिता उनके परमभक्त थे| महाराज सिद्धपुरुष त्रिकालज्ञ थे| महाराज ने तुम्हारे पिताजी की सेवा स्वीकार करके उन्हें दो रुपये दिये थे और उन रुपयों का पूजन करने को कहा था| तुम्हारे पिता उन रुपयों का जीवनभर पूजन करते रहे थे, लेकिन उनके देहान्त के बाद पूजन यथाविधि नहीं हो पाया और वे रुपये न जाने कहां खो गये| हम तो उन रुपयों को भूल ही गये थे|

खैर, अब पिछली बातों को जाने दो| यह तुम्हारा सौभाग्य है कि साईं बाबा के रूप में तुम्हें अक्कलकोट महाराज ने अपने कर्त्तव्य को याद करा दिया| अब तुम इन रुपयों का पूजन कर उनकी वास्तविकता को समझो और संतों का आशीर्वाद पाने पर अपने को गर्वित मानो| अब तुम साईं बाबा का दामन कभी न छोड़ना, इसी में तुम्हारी भलाई है|"

माता के मुख से सारी बात सुनकर वे दो रुपयों का रहस्य भी जान गये और बाबा की त्रिकालज्ञता का ज्ञान भी हो गया और वे बाबा के परम भक्त बन गये|
 

कल चर्चा करेंगे... कर्म भोग न छूटे भाई
ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Thursday, 11 September 2014

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 45 - संदेह निवारण

ॐ सांई राम



आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं , हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम  घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 45 - संदेह निवारण
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काकासाहेब दीक्षित का सन्देह और आनन्दराव का स्वप्न, बाबा के विश्राम के लिये लकड़ी का तख्ता ।

प्रस्तावना
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गत तीन अध्यायों में बाबा के निर्वाण का वर्णन किया गया है । इसमें कोई सन्देह नहीं कि अब बाबा का साकार स्वरुप लुप्त हो गया है, परन्तु उनका निराकार स्वरुप तो सदैव ही विघमान रहेगा । अभी तक केवल उन्हीं घटनाओं और लीलाओं का उल्लेख किया गया है, जो बाबा के जीवमकाल में घटित हुई थी । उनके समाधिस्थ होने के पश्चात् भी अनेक लीलाएँ हो चुकी है और अभी भी देखने में आ रही है, जिनसे यह सिदृ होता है कि बाबा अभी भी विघमान है और पूर्व की ही भाँति अपने भक्तों को सहायता पहुँचाया करते है । बाबा के जीवन-काल में जिन व्यक्तियों को उनका सानिध्य या सत्संग प्राप्त हुआ, यथार्थ में उनके भाग्य की सराहना कौन कर सकता है । यदि किसी को फिर भी ऐंद्रिक और सांसारिक सुखों से वैराग्य प्राप्त नहीं हो सका तो इस दुर्भाग्य के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है । जो उस समय आचरण में लाया जाना चाहिये था और अभी भी लाया जाना चाहिये, वह है अनन्य भाव से बाबा की भक्ति । समस्त चेतनाओं, इन्द्रिय-प्रवृतियों और मन को एकाग्र कर बाबा के पूजन और सेवा की ओर लगाना चाहिये । कृत्रिम पूजन से क्या लाभ । यदि पूजन या ध्यानादि करने की ही अभिलाषा है तो वह शुदृ मन और अन्तःकरण से होनी चाहिये ।

जिस प्रकार पतिव्रता स्त्री का विशुदृ प्रेम अपने पति पर होता है, इस प्रेम की उपमा कभी-कभी लोग शिष्य और गुरु के प्रेम से भी दिया करते है । परन्तु फिर भी शिष्य और गुरु-प्रेम के समक्ष पतिव्रता का प्रेम फीका है और उसकी कोई समानता नहीं की जा सकती । माता, पिता, भाई या अन्य सम्बन्धी जीवन का ध्येय (आत्मसाक्षात्कार) प्राप्त करने में कोई सहायता नहीं पहुँचा सकते । इसके लिये हमें स्वयं अपना मार्ग अन्वेषण कर आत्मानुभूति के पथ पर अग्रसर होना पड़ता है । सत्य और असत्य में विवेक, इहलौकिक तथा पारलौकिक सुखों का त्याग, इन्द्रियनिग्रह और केवल मोक्ष की धारणा रखते हुए अग्रसर होना पड़ता है । दूसरों पर निर्भर रहने के बदले हमें आत्मविश्वास बढ़ाना उचित है । जब हम इस प्रकार विवेक-बुद्घि से कार्य करने का अभ्यास करेंगे तो हमें अनुभव होगा कि यह संसार नाशवान् और मिथ्या है । इस प्रकार की धारणा से सांसारिक पदार्थों में हमारी आसक्ति उत्तरोत्तर घटती जायेगी और अन्त में हमें उनसे वैराग्य उत्पन्न हो जायेगा । तब कहीं आगे चलकर यह रहस्य प्रकट होगा कि ब्रहृ हमारे गुरु के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं, वरन् यथार्थ में वे ही सदवस्तु (परमात्मा) है और यह रहस्योदघाटन होता है कि यह दृश्यमान जगत् उनका ही प्रतिबिम्ब है । अतः इस प्रकार हम सभी प्राणियों में उनके ही रुप का दर्शन कर उनका पूजन करना प्रारम्भ कर देते है और यही समत्वभाव दृश्यमान जगत् से विरक्ति प्राप्त करानेवाला भजन या मूलमंत्र है । इस प्रकार जब हम ब्रहृ या गुरु की अनन्यभाव से भक्ति करेंगे तो हमें उनसे अभिन्नता की प्राप्ति होगी और आत्मानुभूति की प्राप्ति सहज हो जायेगी । संक्षेप में यह कि सदैव गुरु का कीर्तन और उनका ध्यान करना ही हमें सर्वभूतों में भगवत् दर्शन करने की योग्यता प्रदान करता है और इसी से परमानंद की प्राप्ति होती है । निम्नलिखित कथा इस तथ्य का प्रमाण है ।


काकासाहेब दीक्षित का सन्देह और आनन्दराव का स्वप्न
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यह तो सर्वविदित ही है कि बाबा ने काकासाहेब दीक्षित को श्री एकनाथ महाराज के दो ग्रन्थ

1.श्री मदभागवत और

2.भावार्थ रामायण

का नित्य पठन करने की आज्ञा दी थी । काकासाहेब इन ग्रन्थों का नियमपूर्वक पठन बाबा के समय से करते आये है और बाबा के सम्धिस्थ होने के उपरान्त अभी भी वे उसी प्रकार अध्ययन कर रहे । एक समय चौपाटी (बम्बई) में काकासाहेब प्रातःकाल एकनाथी भागवत का पाठ कर रहे थे । माधवराव देशपांडे (शामा) और काका महाजनी भी उस समय वहाँ उपस्थित थे तथा ये दोनों ध्यानपूर्वक पाठ श्रवण कर रहे थे । उस समय 11वें स्कन्ध के द्घितीय अध्याय का वाचन चल रहा था, जिसमें नवनाथ अर्थात् ऋषभ वंश के सिद्घ यानी कवि, हरि, अंतरिक्ष, प्रबुदृ, पिप्पलायन, आविहोर्त्र, द्रुमिल, चमस और करभाजन का वर्णन है, जिन्होंने भागवत धर्म की महिमा राजा जनक को समझायी थी । राजा जनक ने इन नव-नाथों से बहुत महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछे और इन सभी ने उनकी शंकाओं का बड़ा सन्तोषजनक समाधान किया था, अर्थात् कवि ने भागवत धर्म, हरि ने भक्ति की विशेषताएँ, अतंरिक्ष ने माया क्या है, प्रबुदृ ने माया से मुक्त होने की विधि, पिप्लायन ने परब्रहृ के स्वरुप, आविहोर्त्र ने कर्म के स्वरुप, द्रुमिल ने परमात्मा के अवतार और उनके कार्य, चमस ने नास्तिक की मृत्यु के पश्चात् की गति एवं करभाजन ने कलिकाल में भक्ति की पद्घतियों का यथाविधि वर्णन किया । इन सबका अर्थ यही था कि कलियुग में मोक्ष प्राप्त करने का एकमात्र साधन केवल हरिकीर्तन या गुरु-चरणों का चिंतन ही है । पठन समाप्त होने पर काकसाहेब बहुत निराशापूर्ण स्वर में माधवराव और अन्य लोगों से कहने लगे कि नवनाथों की भक्ति पदृति का क्या कहना है, परन्तु उसे आचरण में लाना कितना दुष्कर है । नाथ तो सिदृ थे, परन्तु हमारे समान मूर्खों में इस प्रकार की भक्ति का उत्पन्न होना क्या कभी संभव हो सकता है । अनेक जन्म धारण करने पर भी वैसी भक्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती तो फिर हमें मोक्ष कैसे प्राप्त हो सकेगा । ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे लिये तो कोई आशा ही नहीं है । माधवराव को यह निराशावादी धारणा अच्छी न लगी । व कहने लगे कि हमारा अहोभाग्य है, जिसके फलस्वरुप ही हमें साई सदृश अमूल्य हीरा हाथ लग गया है, तब फिर इस प्रकार का राग अलापना बड़ी निन्दनीय बात है । यदि तुम्हें बाबा पर अटल विश्वास है तो फिर इस प्रकार चिंतित होने की आवश्यकता ही क्या है । माना कि नवनाथों की भक्ति अपेक्षाकृत अधिक दृढ़ा और प्रबल होगी, परन्तु क्या हम लोग भी प्रेम और स्नेहपूर्वक भक्ति नहीं कर रहे है । क्या बाबा ने अधिकारपूर्ण वाणी में नहीं कहा है कि श्रीहरि या गुरु के नाम जप से मोक्ष की प्राप्ति होती है । तब फिर भय और चिन्ता को स्थान ही कहाँ रह जाता है । परन्तु फिर भी माधवराव के वचनों से काकासाहेब का समाधान न हुआ । वे फिर भी दिन भर व्यग्र और चिन्तित ही बने रहे । यह विचार उनके मस्तिष्क में बार-बार चक्कर काट रहा था कि किस विधि से नवनाथों के समान भक्ति की प्राप्ति सम्भव हो सकेगी ।

एक महाशय, जिनका नाम आनन्दराव पाखाडे था, माधवराव को ढूँढते-ढूँढते वहाँ आ पहुँचे । उस समय भागवत का पठन हो रहा था । श्री. पाखाडे भी माधवराव के समीप ही जाकर बैठ गये और उनसे धीरे-धीरे कुछ वार्ता भी करने लगे । वे अपना स्वप्न माधवराव को सुना रहे थे । इनकी कानाफूसी के कारण पाठ में विघ्न उपस्थित होने लगा । अतएव काकासाहेब ने पाठ स्थगित कर माधवराव से पूछा कि क्यों, क्या बात हो रही है । माधवराव ने कहा कि कल तुमने जो सन्देह प्रगट किया था, यह चर्चा भी उसी का समाधान है । कल बाबा ने श्री. पाखाडे को जो स्वप्न दिया है, उसे इनसे ही सुनो । इसमें बताया गया है कि विशेष भक्ति की कोई आवश्यकता नही, केवल गुरु को नमन या उनका पूजन करना ही पर्याप्त है । सभी को स्वप्न सुनने की तीव्र उत्कंठा थी और सबसे अधिक काकासाहेब को । सभी के कहने पर श्री. पाखाडे अपना स्वप्न सुनाने लगे, जो इस प्रकार है – मैंने देखा कि मैं एक अथाह सागर में खड़ा हुआ हूँ । पानी मेरी कमर तक है और अचानक ही जब मैंने ऊपर देखा तो साईबाबा के श्री-दर्शन हुए । वे एक रत्नजटित सिंहासन पर विराजमान थे और उनके श्री-चरण जल के भीतर थे । यह सुन्र दृश्य और बाबा का मनोहर स्वरुप देक मेरा चित्त बड़ा प्रसन्न हुआ । इस स्वप्न को भला कौन स्वप्न कह सकेगा । मैंने देखा कि माधवराव भी बाबा के समीप ही खड़े है और उन्होंने मुझसे भावुकतापूर्ण शब्दों में कहा कि आनन्दराव । बाबा के श्री-चरणों पर गिरो । मैंने उत्तर दिया कि मैं भी तो यही करना चाहता हूँ । परन्तु उनके श्री-चरण तो जल के भीतर है । अब बताओ कि मैं कैसे अपना शीश उनके चरणों पर रखूँ । मैं तो निस्सहाय हूँ । इन शब्दों को सुनकर शामा ने बाबा से कहा कि अरे देवा । जल में से कृपाकर अपने चरण बाहर निकालिये न । बाबा ने तुरन्त चरण बाहर निकाले और मैं उनसे तुरन्त लिपट गया । बाबा ने मुझे यह कहते हुये आशीर्वाद दिया कि अब तुम आनंदपूर्वक जाओ । घबराने या चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं । अब तुम्हारा कल्याण होगा । उन्होंने मुझसे यह भी कहा कि एक जरी के किनारों की धोती मेरे शामा को दे देना, उससे तुम्हें बहुत लाभ होगा । बाबा की आज्ञा को पूर्ण करने के लिये ही श्री. पाखाडे धोती लाये और काकासाहेब से प्रार्थना की कि कृपा करके इसे माधवराव को दे दीजिये, परन्तु माधवराव ने उसे लेना स्वीकार नहीं किया ।

उन्होंने कहा कि जब तक बाबा से मुझे कोई आदेश या अनुमति प्राप्त नहीं होती, तब तक मैं ऐसा करने में असमर्थ हूँ । कुछ तर्क-वतर्क के पश्चात काका ने दैवी आदेशसूचक पर्चियाँ निकालकर इस बात का निर्णय करने का विचार किया । काकासाहेब का यह नियम था कि जब उन्हें कोई सन्देह हो जाता तो वे कागज की दो पर्चियों पर स्वीकार-अश्वीकार लिखकर उसमेंसे एक पर्ची निकालते थे और जो कुछ उत्तर प्राप्त होता था, उसके अनुसार ही कार्य किया करते थे । इसका भी निपटारा करने के लिये उन्होंने उपयुक्त विधि के अनुसार ही दो पर्चियाँ लिखकर बाबा के चित्र के समक्ष रखकर एक अबोध बालक को उसमें से एक पर्ची उठाने को कहा । बालक द्घारा उठाई गई पर्ची जब खोलकर देखी गई तो वह स्वीकारसूचक पर्ची ही निकली और तब माधवराव को धोती स्वीकार करनी पड़ी । इस प्रकार आनन्दराव और माधवराव सन्तुष्ट हो गये और काकासाहेब का भी सन्देह दूर हो गया ।

इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अन्य सन्तों के वचनों का उचित आदर करना चाहिये, परन्तु साथ ही साथ यह भी परम आवश्यक है कि हमें अपनी माँ अर्थात् गुरु पर पूर्ण विश्वास रखस उनके आदेशों का अक्षरशः पालन करना चाहिये, क्योंकि अन्य लोगों की अपेक्षा हमारे कल्याण की उन्हें अधिक चिन्ता है ।

बाबा के निम्नलिखित वचनों को हृदयपटल पर अंकित कर लो – इस विश्व में असंख्य सन्त है, परन्तु अपना पिता (गुरु) ही सच्चा पिता (सच्चा गुरु) है । दूसरे चाहे कितने ही मधुर वचन क्यों न कहते हो, परन्तु अपना गुरु-उपदेश कभी नहीं भूलना चाहिये । संक्षेप में सार यही है कि शुगृ हृदय से अपने गुरु से प्रेम कर, उनकी शरण जाओ और उन्हें श्रद्घापूर्वक साष्टांग नमस्कार करो । तभी तुम देखोगे कि तुम्हारे सम्मुख भवसागर का अस्तित्व वैसा ही है, जैसा सूर्य के समक्ष अँधेरे का ।



बाबा की शयन शैया-लकड़ी का तख्ता
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बाबा अपने जीवन के पूर्वार्द्घ में एक लकड़ी के तख्ते पर शयन किया करते थे । वह तख्ता चार हाथ लम्बा और एक बीता चौड़ा था, जिसके चारों कोनों पर चार मिट्टी के जलते दीपक रखे जाया करते थे । पश्चात् बाबा ने उसके टुकड़े टुकडे कर डाले थे । (जिसका वर्णन गत अध्याय 10 में हो चुका है ) । एक समय बाबा उस पटिये की महत्ता का वर्णन काकासाहेब को सुना रहे थे, जिसको सुनकर काकासाहेब ने बाबा से कहा कि यदि अभी भी आपको उससे विशेष स्नेह है तो मैं मसजिद में एक दूसरी पटिया लटकाये देता हूँ । आप सूखपूर्वक उस पर शयन किया करें । तब बाबा कहने लगे कि अब म्हालसापति को नीचे छोड़कर मैं ऊपर नहीं सोना चाहता । काकासाहेब ने कहा कि यदि आज्ञा दें तो मैं एक और तख्ता म्हालसापति के लिये भी टाँग दूँ ।
बाबा बोले कि वे इस पर कैसे सो सकते है । क्या यह कोई सहज कार्य है जो उसके गुण से सम्पन्न हो, वही ऐसा कार्य कर सकता है । जो खुले नेत्र रखकर निद्रा ले सके, वही इसके योग्य है । जब मैं शयन करता हूँ तो बहुधा म्हालसापति को अपने बाजू में बिठाकर उनसे कहता हूँ कि मेरे हृदय पर अपना हाथ रखकर देखते रहो कि कहीं मेरा भगवज्जप बन्द न हो जाय और मुझे थोड़ा- सा भी निद्रित देखो तो तुरन्त जागृत कर दो, परन्तु उससे तो भला यह भी नहीं हो सकता । वह तो स्वंय ही झपकी लेने लगता है और निद्रामग्न होकर अपना सिर डुलाने लगता है और जब मुझे भगत का हाथ पत्थर-सा भारी प्रतीत होने लगता है तो मैं जोर से पुकार कर उठता हूँ कि ओ भगत । तब कहीं वह घबड़ा कर नेत्र खोलता है । जो पृथ्वी पर अच्छी तरह बैठ और सो नहीं सकता तथा जिसका आसन सिदृ नहीं है और जो निद्रा का दास है, वह क्या तख्ते पर सो सकेगा । अन्य अनेक अवसरों पर वे भक्तों के स्नेहवश ऐसा कहा करते थे कि अपना अपने साथ और उसका उसके साथ ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।
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===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===

बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Wednesday, 10 September 2014

श्री साईं लीलाएं - गुरु-गुरु में अंतर न करें

ॐ सांई राम



कल हमने पढ़ा था.. आमों का कमाल

श्री साईं लीलाएं



गुरु-गुरु में अंतर न करें

किसी अन्य गुरु के शिष्य पंत नाम के एक सज्जन कहीं जाने के लिए रेलगाड़ी में बैठे थे| वे शिरडी नहीं आना चाहते थे, पर विधाता के लिखे को कौन टाल सकता है ! जो मनुष्य सोचता है, वह पूरा कभी नहीं होता| होता वही है जो परमात्मा चाहता है| जिस डिब्बे में वह बैठे थे| अगले स्टेशन पर उसी डिब्बे में कुछ और लोग भी आ गये| इनमें से कुछ उनके मित्र और सम्बंधी भी थे| वे सभी लोग शिरडी जा रहे थे| संत से मिलकर सबको बड़ी प्रसन्नता हुई| सब लोगों ने पंत से शिरडी चलने को कहा| पंत स्वयं दूसरे गुरु के शिष्य थे| वे सोचने लगे, मैं अपने गुरु के होते हुए दूसरे गुरु के दर्शन करने क्यों जाऊं? उन्होंने उन्हें बहुत टालना चाहा लेकिन सबके बार-बार आग्रह करने पर आखिर वे तैयार हो गए|

शिरडी पहुंचने पर सब लोग सुबह ग्यारह बजे बाबा के दर्शन करने के लिए मस्जिद गये| साईं बाबा को देखकर पंत का मन आनंदित हो उठा, परन्तु तभी पंत बेहोश होकर गिर पड़े| उन्हें बेहोश देख उनके मित्रादि व अन्य उपस्थित भक्त घबरा गये| तब साईं बाबा ने उनके मुंह पर पानी के छींटे मारे, तो वह तुरंत होश में आकर उठ बैठे| बाबा तो जान चुके थे कि यह किसी अन्य गुरु के शिष्य हैं| तब बाबा बोले - "देखो पंत, व्यक्ति को हर हालत में अपने गुरु पर निष्ठा कायम रखनी चाहिए| सदैव उस पर स्थिर रहे, लेकिन सब संतों में अंतर न करो| सभी एक ही डाल के पंछी हैं| सब में एक ही ईश्वर रहता है|"

बाबा के ऐसे वचन सुनकर पंत को अपने गुरु का स्मरण हो आया| गुरु और बाबा का शरीर अलग होने पर ही दोनों में एक ही परमात्मा रहता है, यह जान गये और जीवन भर बाबा की कृपा को नहीं भूले|



कल चर्चा करेंगे... लाओ, अब बाकी के तीन रुपये दे दो



ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Tuesday, 9 September 2014

श्री साईं लीलाएं - आमों का कमाल

ॐ सांई राम



कल हमने पढ़ा था.. लालच बुरी बला


श्री साईं लीलाएं





आमों का कमाल
एक दिन गोना के तहसीलदार श्री राले ने तीन सौ आमों की एक पेटी बाबा के चरणों में शामा के पते पर शिरडी भेजी| शामा वह पेटी बाबा के पास ले गया और बाबा के सामने खोली| सभी आब अच्छे थे| बाबा के उन आमों में से चार आप अलग निकालकर इस ताकीद के साथ रख दिये कि दामू अण्णा के लिये हैं - और बाकी आम भक्तों के बांटने के लिए शामा को दे दिए|

लगभग दो घंटे बाद जब दामू अण्णा बाबा का पूजन करने के लिए मस्जिद आये तो बाबा ने उन्हें प्रसाद रूप में चार आम यह कहकर दिए कि इन्हें अपनी पत्नी को दे देना| दामू अण्णा संतान न होने के कारण बहुत निराश रहते थे| उन्होंने तीन शादियां की थीं, परंतु संतान की इच्छा फिर भी पूरी नहीं हो सकी| उन्होंने इसके लिए बहुत उपाय भी किये थे| लेकिन साईं बाबा के प्रति उनके मन में गहरी श्रद्धा थी| वे पुरे भक्तिभाव से बाबा की सेवा किया करते थे|

जब वे मस्जिद से आम लेकर जाने लगे तो उन्होंने बाबा से पूछा - "बाबा ! ये आम बड़ी को दूं या छोटी को?" बाबा ने जवाब दिया - "अपनी सबसे छोटी पत्नी को देना| उसे चार लड़के और चार लड़कियां कुल मिलाकर आठ बच्चे होंगे|" दामू अण्णा ने बाबा की आज्ञा अनुसार वे आम अपनी सबसे छोटी पत्नी को खाने को दिए और बाबा के आशीर्वाद से उन्हें आठ बच्चे हुए|



कल चर्चा करेंगे... गुरु-गुरु में अंतर न करें


ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Monday, 8 September 2014

श्री साईं लीलाएं - लालच बुरी बला

ॐ सांई राम



कल हमने पढ़ा था.. बाबा के सेवक को कुछ न कहना, बाबा गुस्सा होंगे

श्री साईं लीलाएं

लालच बुरी बला

अहमदनगर के रहनेवाले दामू अण्णा जो बाबा के भक्त थे| इनका वर्णन रामनवमी के उत्सव के प्रसंग में आ चुका है| उनके साथ घटी एक और घटना का वर्णन किया जा रहा है, कि साईं बाबा ने उन पर जाने वाला संकट कैसे टाल दिया?

एक बार दामू अण्णा के मुम्बई में रहनेवाले मित्र का पत्र आया| उसने उसमें लिखा था कि इस वर्ष रूई का सौदा करनेवाला है और जब बाजार में भाव चढ़ जायेंगे तब उसे बेच देगा| इस सौदे में वह उसे साझीदार बनाना चाहता था| उसने आशा व्यक्त की थी कि इस सौदे में लगभग दो लाख रुपये का लाभ होने की उम्मीद है| यदि वह आधे का साझीदार बन जायेगा तो उसे एक लाख रुपये मिल जायेंगे| यह मौका चूकना नहीं चाहिए, इसलिए इसका लाभ उठाया जाए|पत्र को पढ़ने के बाद दामू अण्णा के मन में हलचल पैदा हो गयी| पैसा कमाने का सुनहरी मौका सामने खड़ा था| यदि लाभ हुआ तो बैठे-बिठाये एक लाख मिल जायेंगे, यदि बदकिस्मती से भाव गिर गये तो... ! ऐसे विचार मन में निरंतर आ-जा रहे थे| वे कोई निर्णय नहीं कर पा रहे थे| वे साईं बाबा के परमभक्त थे| अंतत: उन्होंने इस बारे में बाबा से पूछने का निर्णय किया| उन्होंने एक पत्र में सारा विवरण लिखकर शामा को भेजा और प्रार्थना की कि बाबा को सारी बात बताकर जो भी बाबा की आज्ञा हो, उन्हें पत्र द्वारा सूचित कर दे|

अगले दिन ही पत्र शामा को मिल गया| शामा ने वह पत्र लेकर मस्जिद में बाबा के चरणों में रख दिया| बाबा ने जब शामा से पत्र के बारे में पूछा तो शामा ने बाबा को बताया - "देवा ! अहमदनगर के दामू अण्णा ने भेजी है और आपसे आज्ञा मांगी है|" बाबा सब कुछ जानते थे| फिर भी अनजान बनते हुए उन्होंने शामा से पूछा - "इस पत्र में क्या लिखा है? उसने क्या योजना बनाई है? इसका भगवान ने जो दिया है उसमें संतोष नहीं है| आसमान को छूना चाहता है| अच्छा, जरा पढ़कर तो सुना, देखूं क्या लिखा है?"

शामा ने पत्र को पढ़कर कहा कि इसमें तो वही सब कुछ लिखा है जो अपने बताया है| इस पर बाबा ने कहा - "शामा, इस सेठ की अक्ल मारी गयी है| इसे किसी चीज का अभाव नहीं है| फिर भी पैसों का लालच क्यों? वह आधी रोटी में ही संतोष करे, लाखों के चक्कर में न पड़े|"

इधर दामू अण्णा बाबा की आज्ञा का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे| शामा ने बाबा की आज्ञानुसार पत्र का उत्तर लिखकर भेज दिया| पत्र मिलने के बाद वह निराश हो गये| उनके लखपति बनने की राह में रोड़ा अटक गया| यदि बाबा की आज्ञा मिल जाती तो मैं लखपति बन जाता| फिर उसने सोचा कि पत्र भेजकर उसने गलती की है| मुझे स्वयं जाकर बाबा से पूछना चाहिए था| पत्र के द्वारा बताने और सामने कहने में अंतर तो है ही| मैं स्वयं जाकर बात करता हूं| यदि बाबा ने आज्ञा दे दी तो फिर क्या कहने !

अगले ही दिन दामू अण्णा बाबा की आज्ञा प्राप्त करने के लिए शिरडी पहुंच गये| बाबा के दर्शन करके वह उनकी सेवा करते रहे, परंतु सौदे वाली बात करने के बारे में बाबा से पूछने का साहस नहीं जुटा पाए| फिर उन्होंने मन में बाबा की आज्ञा पाने के लिए विनती की कि यदि बाबा ने कृपा कर दी तो, इस सौदे में जो लाभ होगा, उसमें से कुछ अंश बाबा को भेंट कर देंगे| बाबा तो अंतर्यामी थे| वे दामू अण्णा के मन की बात जान गए| बाबा ने उससे कहा - "मुझे तेरे मुनाफे में से एक पाई भी नहीं चाहिए, यह समझ ले|"

बाबा की अस्वीकृति का संकेत सुनकर, उन्होंने बड़े बेमन से अपने मुम्बईवाले मित्र को साझेदार न बनने की बात लिखते हुए पत्र भेज दिया| पत्र पढ़ने के बाद दोस्त ने सोचा, भाग्य ने उसके साथ खिलवाड़ किया है| मैं दूसरा साझीदार ढूंढ लूंगा|

इधर दामू अण्णा हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे| कुछ समय बाद बाजार ने ऐसी पलटी खाई कि उनका मुम्बई वाला दोस्त पूरी तरह से डूब गया| मुनाफा तो दूर बल्कि वह कर्ज के भारी बोझ से दब गया| पता चलने पर दामू अण्णा को बहुत दुःख हुआ और फिर वह मन-ही-मन बाबा के चरणों में प्रणाम करने लगा कि बाबा की कृपा से वह इस मुसीबत से बच गया|


कल चर्चा करेंगे... आमों का कमाल

ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Sunday, 7 September 2014

श्री साईं लीलाएं - बाबा के सेवक को कुछ न कहना, बाबा गुस्सा होंगे

ॐ सांई राम

  
 


कल हमने पढ़ा था.. माँ का चुम्बन लेने में क्या दोष है?     

श्री साईं लीलाएं

बाबा के सेवक को कुछ न कहना, बाबा गुस्सा होंगे 

बाबा का स्वभाव था कि वे अपने भक्तों को उनकी इच्छा के अनुसार अपनी सेवा करने दिया करते थे| यदि कोई और उनके सेवक को कुछ उल्टा-सीधा कह देता तो बाबा एकदम गुस्सा हो जाते थे और उस पर अपने गुस्से का इजहार किया करते थे|

एक दिन मौसीबाई जिनका इससे पहले वर्णन आ चुका है, बाबा का पेट जोर लगाते हुए ऐसे मल रही थीं, मानो आटा गूंथ रही हों| उन्हें ऐसा करते औरों को अच्छा नहीं लगता था| जबकि साईं बाबा उसका सेवा से खुश रहते थे| उन्हें एक दिन इसी तरह सेवा करते देख एक अन्य भक्त ने मौसीबाई से कहा - "ओ बाई ! बाबा पर थोड़ा-सा रहम करो| बाबा का पेट धीरे-धीरे दबाओ| इस तरह जोर-जोर से उल्टा-सीधा दबाओगी तो आंतें व नाड़ियां टूट जायेंगी और दर्द भी होने लगेगा|"

इतना सुनते ही बाबा एक झटके से उठ बैठे और अपना सटका जोर-जोर से जमीन पर पटकने लगे| क्रोध के कारण उनकी आँखें और चेहरा अंगारे की भांति लाल हो गये| यह देखकर सब लोग डर गये|

फिर बाबा ने उसी सटके का एक सिरा पकड़कर नाभि में लगाया और दूसरा सिरा जमीन पर रख उसे अपने पेट से जोर-जोर से दबाने लगे| सटका दो-तीन फुट लम्बा था| यह दृश्य देखकर सब लोग और भी ज्यादा डर गये कि यदि यह सटका पेट में घुस गया तो? अब क्या किया जाये, किसी की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था| बाबा सटके के और ज्यादा पास होते जा रहे थे| यह देख सब लोग किंकर्त्तव्यविमूढ़ थे और भय-मिश्रित आश्चर्य से बाबा की इस लीला को देख रहे थे|

जिस व्यक्ति ने मौसीबाई को सलाह दी थी, उसे अपने किये पर बहुत पछतावा हो रहा था, कि कैसे मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई कि मैं बोल पड़ा| वह मन-ही-मन बाबा से माफी मांगने लगा| बाकी सभी भक्तजन बाबा से हाथ जोड़कर शांत होने की प्रार्थना कर रहे थे| फिर कुछ देर बाद बाबा का क्रोध शांत हो गया और वे आसन पर बैठ गये| उस समय भक्तों को बड़ा आराम महसूस हुआ| इस घटना के बाद सभी ने अपने मन में यह बात ठान ली कि वे बाबा के भक्त के किसी भी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेंगे| भक्त जिस ढंग से चाहेंगे, वैसे ही बाबा की सेवा करने देंगे| क्योंकि बाबा भी अपने कार्य में किसी का हस्तक्षेप नहीं होने देना चाहते थे|


कल चर्चा करेंगे..लालच बुरी बला        

ॐ सांई राम
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