शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Sunday, 31 March 2024

The Difference

The Difference

I got up early one morning
And rushed right into the day;
I had so much to accomplish
That I didn't have time to pray.
Problems just tumbled about me,
And heavier came each task;
"Why doesn't God help me?"
I wondered.
He answered, "You didn't ask."
I wanted to see joy and beauty,
But the day toiled on gray and bleak;
I wondered why God didn't show me.
He said, "But you didn't seek."
I tried to come into God's presence;
I used all my keys in the lock.
God gently and lovingly chided,
"My child, you didn't knok."
I woke up early this morning,
And paused before entering the day;
I had so much to accomplish
That I had to take time to pray

The Peace Prayer For World Peace

Adorable Presence!
Thou Who art within and without, above and below and all around, Thou Who art interpenetrating the very cells of our beings, Thou Who art the Eye of our eyes, the Ear of our ears, the Heart of our hearts, the Mind of our minds, the Breath of our breaths, the Life of our lives and the Soul of our souls, Bless us, Dear God, to be aware of Thy Presence, now and here. This is all that we ask of Thee.
May all of us be aware of Thy Presence in the East and the West, in the North and the South! May Peace and Goodwill abide among individuals as well as communities and nations! This is our earnest Prayer.

A Winner's Creed

If you think you are beaten, you are;
If you think you dare not, you don't
If you'd like to win, but think you can't,
It's almost a cinch you won't.
If you think you'll lose, you're lost,
For out in the world we find
Success begins with a person's faith;
It's all in the state of mind.
Life's battles don't always go
to the stronger or faster hand;
They go to the one who trusts in God
And always thinks "I can."

If wealth is lost,
nothing is lost;
If health is lost,
something is lost;
If character is lost,
everything is lost.

Saturday, 30 March 2024

True Nobility

True Nobility

Who does his task from day to day
And meets whatever comes his way,
Believing God has willed it so,
Has found real greatness here below.
Who guards his post, no matter where,
Believing God must need him there,
Although but lowly toil it be,
Has risen to nobility.
For great and low there's but one test
'Tis that each man shall do his best.
Who works with all the strength he can
Shall never die in debt to man.

The Oyster

There once was an Oyster whose story I tell,
Who found that some sand was inside his shell
Just one little grain, but it gave him great pain!
For oysters have feelings, though they all seem so plain.
Now did he berate the working so fate.
Which had led him to such a deplorable state?
Did he curse out the government - call for an election,
And cry that the sea "should have given protection?"
No! He said to himself as he lay on the shelf,
"Since I cannot remove it, I'll try to improve it."
The years rolled along, as the years always do,
And he came to his ultimate destiny - stew!
And the small grain of sand that had bothered him so,
Was a beautiful pearl, all richly aglow!
The tale has a moral, for isn't it grand.
What an oyster can do with a morsel of sand?
What couldn't I do if I'd only begin,
With all those things that "get under my skin!"

At Day's End

"Is anybody happier because you passed his way?
The day is almost over and its toiling is through;
Is there anyone to utter now a kindly word to you?
Does anyone remember that you spoke to him today?
Can you say tonight, in parting with the day that's slipping fast.
That you helped a single brother of the many that you passed?
Did you waste the day, or lose it?
Was it well or sorely spent?
Is a single heart rejoicing over what you did or said?
Does, the man whose hopes were fading now with courage look ahead?
Did you leave a trail of kindness, or a scar of discontent?
As you close your eyes in slumber, do you think that God will say, you have earned one more tomorrow by the work you did today?'

Friday, 29 March 2024

गजिन्द्र हाथी

गजिन्द्र हाथी

एक निमख मन माहि अराधिओ गजपति पारि उतारे ||


सतिगुरु अर्जुन देव जी महाराज बाणी में फरमाते हैं कि हाथी एक पल प्रभु का सिमरन किया तो उसकी जान बच गई| परमेश्वर के नाम की ऐसी महिमा है| पशु-पक्षी जो भी नाम सिमरन करता है उसका जीवन सफल हो जाता है| गजपति (हाथी) दुःख-पीड़ा से व्याकुल था| उसकी चिल्लाहट ने जब कुछ भी न संवारा तो उसने भक्ति और परमात्मा की तरफ ध्यान किया| उसी समय परमात्मा अपनी शक्ति के साथ उसकी सहायता हेतु आ गए| उस हाथी को तेंदुए ने पकड़ रखा था और उसे पानी से बाहर नहीं आने दे रहा था|

हे जिज्ञासु जनो! एकाग्रचित होकर कथा सुनो कि किस तरह हाथी के बंधन मुक्त हो गए| महाभारत के अनुसार कथा इस प्रकार है -

होता एवं ब्रह्मा दो भाई हुए हैं| वह दोनों परमात्मा का सिमरन किया करते थे और इकट्ठे ही रहते थे| एक दिन दोनों सलाह-मशविरा करके एक राजा के पास दक्षिणा लेने गए|

यह मालूम नहीं, क्यों?

किसी कारण या स्वाभाविक ही भाई होता को दक्षिणा ज्यादा मिली तथा ब्रह्मा को कम| ब्रह्मा ने सोचा कि मुझे कम दक्षिणा मिली है तो भाई को ज्यादा, बराबर-बराबर करनी चाहिए| उसने शीघ्र ही सारी दक्षिणा मिला कर एक समान कर दी| उसके दो हिस्से करके भाई को कहने लगा - 'उठा ले एक हिस्सा|'

होता-'नहीं! यह नहीं हो सकता, मैं तो उतना हिस्सा लूंगा जितना मुझे मिला है| दक्षिणा इकट्ठी क्यों की?'

ब्रह्मा-'ईर्ष्या क्यों करते हो?'

होता-ईर्ष्या एवं लालच आप करते हो, जब आप को दक्षिणा कम मिली तो आप ने एक जैसी कर दी| कितनी बुरी बात है, मेरा पूरा हिस्सा दो, लालची!

ब्रह्मा-'मैं लालची हूं तो तुम तेंदुए की तरह हो| जाओ, मैं तुम्हें श्राप देता हूं तुम गंडकी नदी में तेंदुए बन कर रहोगे लालची|'

होता भी कम नहीं था उसने भी भगवत भक्ति की थी और उसने भी आगे से श्राप दे दिया - 'यदि मैं तेंदुआ बनूंगा तो याद रखो तुम भी मस्त हाथी बनोगे तथा उसी नदी में जब पानी पीने आओगे तो तुम्हें पकड़कर गोते देकर मारूंगा, फिर याद करोगे, ऐसे लालच को| तुमने सर्वनाश करने की जिम्मेदारी उठाई है, नीच ज़माने के|

यह कहता हुआ होता अपना हिस्सा भी छोड़ गया तथा घर को आ गया| कुछ समय पश्चात दोनों भाई मर गए और अगला जन्म धारण किया| होता तेंदुआ बना तथा ब्रह्मा हाथी| दोनों गंडकी नदी के पास चले गए| वह नदी बहुत गहरी थी|

हे भक्त जनो! ध्यान दीजिए लालच कितनी बुरी भला है| भाई-भाई का आपस में झगड़ा करा दिया| इतना मूर्ख बनाया कि दोनों का कुल नाश हो गया| वास्तव में अहंकार और लालच बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है| लालच में बंधे हुए लोग दुखी होते हैं| ऐसे ही लालच की अपरंपार में बंधे हुए लोग दुखी होते हैं| ऐसे ही लालच की अपरंपार महिमा है| लालच कभी नहीं करना चाहिए|

ब्रह्मा एक बहुत बड़ा हाथी बना जैसे कि सब हाथियों का सरदार था, कोई हाथी उसके सामने नहीं ठहरता था| वह सब हाथिनों के झुण्ड साथ लेकर इधर-उधर घूमता रहता| वह जंगल का राजा था| ब्रह्मा को जो श्राप मिला था, उसे तो पूरा होना ही था| भगवान की माया अनुसार वह हाथी एक दिन उस गंडकी नदी के पास चला गया| पानी पीया| पानी बहुत ठण्डा था और सारे हाथी प्यासे थे| सबसे आगे वही हाथी था जो पूर्व जन्म में ब्रह्मा था| जब वह पानी पीने के लिए आगे बढ़ा तो आगे उसका भाई तेंदुए का रूप धारण करके बैठा था| उसने ब्रह्मा की टांगें पकड़ कर उसको गहरे पानी में खींचना शुरू कर दिया| वह आगे - आगे गया| जब हाथी डूबने लगा तो उसने चिल्लाना शुरू कर दिया| वह पानी के बीच बिना डूबे खड़ा हो गया| बस सिर और सूंड ही नंगी थी| ऐसा देख कर बाकी हाथी बहुत हैरान हुए, हाथिनें चिल्लाने लगीं, पर हाथी को बाहर निकालने की किसी में समर्था नहीं थी|

तेंदुए ने ब्रह्मा से बदला लेना था| इसलिए वह ज़ोर से उस हाथी को पकड़ कर बैठा रहा| हाथी बल वाला था, उसको भी ज्ञान हो गया कि पिछले जन्म का हिसाब बाकी है| वह अपने आप को बचाने का यत्न करने लगा| वह पानी में सिर न डूबने देता| तेंदुआ भी उस हाथी को डुबोने का यत्न करता|

तेंदुए तथा हाथी को लड़ते हुए कई हजार साल बीत गए| हाथी भूखा रहा, पानी में से वह क्या खाए| तेंदुए का भोजन तो पानी में ही था| हाथी बिना कुछ खाए-पीए कमज़ोर हो गया वह पानी में डूबने लगा तो उसी समय उसने अपनी सूंड ऊपर उठा कर आकाश की तरफ देख कर भगवान को याद किया| उसने प्रार्थना की-हे प्रभु! मैं हाथी की योनि में पड़ा हूं, दया करें कि मैं पानी में न डूबूं| यदि यहां मरा तो जरूर किसी बुरी योनि में जाऊंगा| मेरी प्रार्थना सुनो प्रभु!"

ब्रह्मा (हाथी) ने शुद्ध हृदय से पुकार की, उसी समय परमात्मा ने उसकी प्रार्थना सुनी और स्वयं नदी किनारे आए| सुदर्शन चक्र से तेंदुए की तारें काटी और हाथी को डूबने से बचाया| उसकी हाथी की योनि से मुक्त करवाया, फिर भक्त रूप में प्रगत किया| वह प्रभु का यश करने लगा| तेंदुए का जन्म भी बदल गया|

Thursday, 28 March 2024

भक्त सुदामा

भक्त सुदामा

प्रभु के भक्तों की अनेक कथाएं हैं, सुनते-सुनते आयु बीत जाती है पर कथाएं समाप्त नहीं होतीं| सुदामा श्री कृष्ण जी के बालसखा हुए हैं| उनके बाबत भाई गुरदास जी ने एक पउड़ी उच्चारण की है -

बिप सुदामा दालदी बाल सखाई मित्र सदाऐ |
लागू होई बाहमणी मिल जगदीस दलिद्र गवाऐ |
चलिया गिणदा गट्टीयां क्यों कर जाईये कौण मिलाऐ |
पहुता नगर दुआरका सिंघ दुआर खोलता जाए |
दूरहुं देख डंडउत कर छड सिंघासन हरि जी आऐ |
पहिले दे परदखना पैरीं पै के लै गल लाऐ |
चरणोदक लै पैर धोइ सिंघासन ऊपर बैठाऐ |
पुछे कुसल पिआर कर गुर सेवा की कथा सुनाऐ |
लै के तंदुल चबिओने विदा करै आगे पहुंचाऐ |
चार पदारथ सकुच पठाए |९|९०|

भाई गुरदास जी के कथन अनुसार सुदामा गोकुल नगरी का एक ब्राह्मण था| वह बड़ा निर्धन था| वह श्री कृष्ण जी के साथ एक ही पाठशाला में पढ़ा करता था| उस समय वह बच्चे थे| बचपन में कई बच्चों का आपस में बहुत प्यार हो जाता है, वे बच्चे चाहे गरीब हो या अमीर, अमीरी और गरीबी का फासला बचपन में कम होता है| सभी बच्चे या विद्यार्थी शुद्ध हृदय के साथ मित्र और भाई बने रहते हैं|

सुदामा और कृष्ण जी का आपस में अत्यन्त प्रेम था, वह सदा ही इकट्ठे रहते| जिस समय उनका गुरु उनको किसी कार्य के लिए भेजता तो वे इकट्ठे चले जाते, बेशक नगर में जाना हो या किसी जंगल में लकड़ी लेने| दोनों के प्रेम की बहुत चर्चा थी|

सुदामा जब पढ़ने के लिए जाता था तो उनकी माता उनके वस्त्र के पलड़े में थोड़े-से भुने हुए चने बांध दिया करती थी| सुदामा उनको खा लेता था, ऐसा ही होता रहा|

एक दिन गुरु जी ने श्री कृष्ण और सुदामा दोनों को जंगल की तरफ लकड़ियां लेने भेजा| जंगल में गए तो वर्ष शुरू हो गई| वे एक वृक्ष के नीचे बैठ गए| बैठे-बैठे सुदामा को याद आया कि उसके पास तो भुने हुए चने हैं, वह ही खा लिए जाए| वह श्री कृष्ण से छिपा कर चने खाने लगा| उसे इस तरह देख कर श्री कृष्ण जी ने पूछा-मित्र! क्या खा रहे हो?

सुदामा से उस समय झूठ बोला गया| उसने कहा-सर्दी के कारण दांत बज रहे हैं, खा तो कुछ नहीं रहा, मित्र!

उस समय सहज स्वभाव ही श्री कृष्ण जी के मुख से यह शब्द निकल गया -'सुदामा! तुम तो बड़े कंगाल हो, चनों के लिए अपने मित्र से झूठ बोल दिया|'

यह कहने की देर थी कि सुदामा के गले दरिद्र और कंगाली पड़ गई, कंगाल तो वह पहले ही था| मगर अब तो श्री कृष्ण ने वचन कर दिया था| यह वचन जानबूझ कर नहीं सहज स्वभाव ही श्री कृष्ण के मुख से निकल गया, पर सत्य हुआ| सुदामा और अधिक कंगाल हो गया|

पाठशाला का समय खत्म हो गया और सुदामा अपने घर चला गया| विवाह हुआ, बच्चे हुए तथा उसके पश्चात माता-पिता का देहांत हो गया| कंगाली दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी, कोई फर्क न पड़ा| दिन बीतने लगे| श्री कृष्ण जी राजा बन गए, उनकी महिमा बढ़ गई| वह भगवान रूप में पूजा जाने लगे तो सुदामा बड़ा खुश हो का अपनी पत्नी को बताया करता कि हम दोनों का परस्पर अटूट प्रेम होता था|

उसकी पत्नी कहने लगी -'यदि आपके ऐसे मित्र हैं और आप में इतना प्रेम था तो आप उनके पास जाओ और अपना हाल बताओ| हो सकता है कि कृपा तथा दया करके हमारी कंगाली दूर कर दें|'

अपनी पत्नी की यह बात सुन कर सुदामा ने कहा -'जाने के लिए तो सोचता हूं, पर जाऊं कैसे, श्री कृष्ण के पास जाने के लिए भी तो कुछ न कुछ चाहिए, आखिर हम बचपन के मित्र हैं|'

आखिर उसकी पत्नी ने बहुत ज़ोर दिया तो एक दिन सुदामा अपने मित्र श्री कृष्ण कि ओर चल पड़ा| उसकी पत्नी ने कुछ चावल, तरचौली उसको एक पोटली में बांध दिए| सुदामा मन में विचार करता कि मित्र को कैसे मिलेगा? क्या कहेगा? द्वारिका नगरी में पहुंच कर वह श्री कृष्ण जी का दरबार लगता था| प्रभु वहां इंसाफ और न्याय करते थे| सुदामा ने डरते और कांपते हुए द्वारपाल को कहा - 'मैंने राजा जी को मिलना है|'

द्वारपाल-'क्या नाम बताऊं जा कर?'

सुदामा-उनको कहना सुदामा ब्राह्मण आया है, आपके बचपन का मित्र| द्वारपाल यह संदेश ले कर अंदर चला गया| जब उसने श्री कृष्ण जी को संदेश दिया तो वह उसी पल सिंघासन से उठ कर नंगे पांव बाहर को भागे तथा बाहर आ कर सुदामा को गले लगा लिया| कुशलता पूछी तथा बड़े आदर और प्रेम से उसे अपने सिंघासन पर बिठाया और उसके पैर धोए| पास बिठा कर व्यंग्य के लहजे में कहा - लाओ मेरी भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है?

यह कह कर श्री कृष्ण ने सुदामा के वस्त्रों से बंधी हुई पोटली खोल ली और फक्के मार कर चबाने लगे| चबाते हुए वर देते गए तथा कहते रहे, "वाह! कितनी स्वादिष्ट है तरचौली! कितनी अच्छी है भाभी!"

सुदामा प्रसन्न हो गया| श्री कृष्ण ने मित्र को अपने पास रखा तथा खूब सेवा की गई| बड़े आदर से उसको भेजा| विदा होते समय न तो सुदामा ने श्री कृष्ण से अपनी निर्धनता बताते हुए कुछ मांगा तथा न ही मुरली मनोहर ने उसे कुछ दिया| सुदामा जिस तरह खाली हाथ दरबार की तरफ गया था, वैसे ही खाली हाथ वापिस घर को चल पड़ा| मार्ग में सोचता रहा कि घर जाकर अपनी पत्नी को क्या बताऊंगा? मित्र से क्या मांग कर लाया हूं|

सुदामा गोकुल पहुंचा| जब वह अपने मुहल्ले में पहुंचा तो उसे अपना घर ही न मिला| वह बड़ा हैरान हुआ| उसका कच्चा घर जो झौंपड़ी के बराबर घास फूस से बना गाय बांधने योग्य था, कहीं दिखाई न दिया| वह वहां खड़ा हो कर पूछना ही चाहता था कि इतने में उसका लड़का आ गया| उसने नए वस्त्र पहने हुए थे| 'पिता जी! आप बहुत समय लगा कर आए हो|.....द्वारिका से आए जिन आदमियों को आप ने भेजा था, वह यह महल बना गए हैं, सामान भी छोड़ गए हैं तथा बहुत सारे रुपये दे गए हैं| माता जी आपका ही इंतजार कर रहे हैं| आप आकर देखें कितना सुंदर महल बना है|'

अपने पुत्र से यह बात सुन कर तथा कच्चे घर की जगह सुन्दर महल देख कर वह समझ गया कि यह सब भगवान श्री कृष्ण की लीला है| श्री कृष्ण ने मुझे वहां अपने पास द्वारिका में रखा और मेरे पीछे से यहां पर यह लीला रचते रहे तथा मुझे बिल्कुल भी मालूम नहीं पड़ने दिया| महल इतना सुन्दर था कि, उस जैसा किसी दूसरे का शायद ही हो| शायद महल बनाने के लिए विश्वकर्मा जी स्वयं आए थे, तभी तो इतना सुन्दर महल बना| भगवान श्री कृष्ण की लीला देख कर सुदामा बहुत ही प्रसन्न था| उसके बिना कुछ बताए ही श्री कृष्ण जी सब कुछ समझ गए थे|

उस दिन के बाद सुदामा श्री कृष्ण की भक्ति में लग गया और भक्तों में गिने जाने लगा| 

Wednesday, 27 March 2024

राजा बली

राजा बली

सद्पुरुष कहते हैं, पुरुष को तपस्या करने से राज मिलता है, पर राज प्राप्ति के बाद उसको नरक भोगना पड़ता है, 'तपो राज तथा राजो नरक' इसका मूल भावार्थ यह है कि राज प्राप्ति के पश्चात मनुष्य अहंकारी हो जाता है| अहंकार के साथ कुछ लालच भी आता है| इसलिए फिर कुछ बात नहीं सूझती| उसके कर्म ऐसे हो जाते हैं कि प्रभु उसको फिर सत्य मार्ग पर लगाने के लिए कोई कौतुक रचता है| ऐसा युगों से होता आया है जैसे कि राजा बली की कथा है| भाई गुरदास जी ने भी लिखा है :-

बलि राजा घरि आपणे अंदरि बैठा जग करावै |
बावन रूपी आइआ चारि बेद मुखि पाठ सुणावै |
राजे अंदरि सदिया मंग सुआमी जो तुधु भावै |
अछल छलनि तुधु आइआ सुक्र प्रोहत कहि समझावै |
करों अढाई धरति मंगि पिछहुं दे त्रिहु लोअ न भावै |
दोइ करवा करि तिन लोअ बलि राजा लै मगर मिणावै |
बलि छलि आपु छलाईअनु होइ दिआलु मिलै गल लावै |
दिता राजु पताल दा होइ अधीन भगति जस गावै |
होइ दरवान महां सुखु पावै |३|


बली नाम का एक प्रतापी राजा था| उसके दादा प्रहलाद ने तपस्या की और अमर राज प्राप्त किया| बली का पिता विरोचन भी नेक पुरुष था| बली बड़ा दानी था, कोई भी उसके पास आता तो वह उसे खाली न जाने देता| स्वयं को राजा जनक या हरीशचन्द्र कहलाता| उसने अपने राज में यज्ञ किये तथा अत्यंत दान दिया, उसे अहंकार हो गया कि मेरे जैसा कौन दानी होगा? ब्राह्मणों को दान देकर संतुष्ट कर दिया है|

परमात्मा ने देखा कि एक अच्छे भले आदमी को अहंकार हो गया है, इसका अहंकार अवश्य चकनाचूर करना चाहिए| यह विचार करके भगवान विष्णु ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और राजा बली के दरबार में पहुंच गया| राजा ने आदर से कहा-हे स्वामी! आज्ञा दीजिए, मैं आपकी इस समय क्या सेवा करूं|

वामन (छोटा ब्राहमण रूप) भगवान बोले-हे राजन! मैं तो एक निर्धन ब्राह्मण हूं| मेरा कोई घर नहीं है| केवल एक इच्छा है कि आप कृपा करके मुझे सिर्फ ढ़ाई कदम धरती दे दें ताकि मैं वहां बैठ कर प्रभु का जाप कर लिया करूं आप से और क्या मांगना है| मुझे बस यही चाहिए, आपके द्वार पर बैठा रहूंगा|

यह सुन कर राजा बली हंसा तथा सम्बोधन करके कहने लगा-हे ब्राह्मण! तुम्हारा कद तो छोटा है, पर बली राजा को मजाक बहुत बड़ा करने आ गए हो| राज्य में खुले वन पड़े हैं, अनगिनत धरती पर लोगों ने आश्रम बनाए हैं, क्या तुम्हें किसी ने बैठने नहीं दिया| मेरे राज में मेरी धरती पर तो हर एक को छूट है, वह आश्रम बनाए धरती को जोते, मैं तो कुछ नहीं कहता| यदि मांगना था तो गाय, अनाज, वस्त्र, हीरे-मोती मांगते| यह क्या मांगा है? तुम ब्राह्मण हो यदि कोई और होता तो मरवा देता|

बावन चुप रहा, वह खड़ा मुस्कराता ही रहा| राजा बली बातें करता रहा|

राजा बली का मंत्री बहुत सूझवान था| वह समझ गया कि यह कोई खेल है| प्रभु स्वयं ही कोई परीक्षा लेने आए हैं| उसने राजा से कहा-राजन! यह वामन ब्राह्मण जिसने थोड़ी-सी ढाई कदम भूमि की मांग की है, वास्तव में कोई विष्णु अवतार लगता है|

'आपको छलने के लिए आया है| कोई अद्भुत खेल न करें| जरा सावधानी से रहना चाहिए| इसकी यह बात नहीं माननी चाहिए| क्षमा मांग लेना ठीक है|'

पर राजा बली को अहंकार ने घेरा हुआ था, उसने एक न सुनी तथा कहा "जाओ ढाई कदम भूमि जहां से लेनी है, अधिकार कर लो| फिर कभी मजाक करने न आना|"

राजा बली की यह बात सुन कर वामन अवतार दरबार से बाहर आया तथा अपना शरीर इतना बढ़ा लिया कि दो कदमों में उसने बली राजा की सारी धरती सहित ब्रह्मांड माप लिया तथा आधी पूरी करने के लिए उसके सिर पर पैर आ रखा| बली राजा को होश आया, पर समय निकल गया था| बली को बावन ने पैर से धकेल कर पाताल में भेज दिया तथा कहा, 'यहां राज करो| यह कह कर जब भगवान रूप बावन चला तो बली ने कहा, 'मैं तो यहां राज करूंगा पर आप ने भी तो वचन दिया है कि द्वार के आगे रहोगे| अब वचन से न फिरो और बैठो|' इस बात में भगवान भी छले गए| बापन रूप धारण कर बली के द्वार के आगे बैठ गया| बली पातालपुरी में भक्ति करने लगा|

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बाबा के 11 वचन

ॐ साईं राम

1. जो शिरडी में आएगा, आपद दूर भगाएगा
2. चढ़े समाधी की सीढी पर, पैर तले दुःख की पीढ़ी कर
3. त्याग शरीर चला जाऊंगा, भक्त हेतु दौडा आऊंगा
4. मन में रखना द्रढ विश्वास, करे समाधी पूरी आस
5. मुझे सदा ही जीवत जानो, अनुभव करो सत्य पहचानो
6. मेरी शरण आ खाली जाए, हो कोई तो मुझे बताए
7. जैसा भाव रहे जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मनका
8. भार तुम्हारा मुझ पर होगा, वचन न मेरा झूठा होगा
9. आ सहायता लो भरपूर, जो माँगा वो नही है दूर
10. मुझ में लीन वचन मन काया, उसका ऋण न कभी चुकाया
11. धन्य-धन्य व भक्त अनन्य, मेरी शरण तज जिसे न अन्य

.....श्री सच्चिदानंद सदगुरू साईनाथ महाराज की जय.....

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः॒ स्वः॒
तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यम्
भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि।
धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥

Word Meaning of the Gayatri Mantra

ॐ Aum = Brahma ;
भूर् bhoor = the earth;
भुवः bhuwah = bhuvarloka, the air (vaayu-maNdal)
स्वः swaha = svarga, heaven;
तत् tat = that ;
सवितुर् savitur = Sun, God;
वरेण्यम् varenyam = adopt(able), follow;
भर्गो bhargo = energy (sin destroying power);
देवस्य devasya = of the deity;
धीमहि dheemahi = meditate or imbibe

these first nine words describe the glory of Goddheemahi = may imbibe ; pertains to meditation

धियो dhiyo = mind, the intellect;
यो yo = Who (God);
नः nah = our ;
प्रचोदयात prachodayat = inspire, awaken!"

dhiyo yo naha prachodayat" is a prayer to God


भू:, भुव: और स्व: के उस वरण करने योग्य (सूर्य) देवता,,, की (बुराईयों का नाश करने वाली) शक्तियों (देवता की) का ध्यान करें (करते हैं),,, वह (जो) हमारी बुद्धि को प्रेरित/जाग्रत करे (करेगा/करता है)।


Simply :

तीनों लोकों के उस वरण करने योग्य देवता की शक्तियों का ध्यान करते हैं, वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।


The God (Sun) of the Earth, Atmosphere and Space, who is to be followed, we meditate on his power, (may) He inspire(s) our intellect.