शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Sunday, 21 May 2023

भाई साईयां जी

 ॐ श्री साँई राम जी



भाई साईयां जी

गुरमुख मारग आखीऐ गुरमति हितकारी |
हुकमि रजाई चलना गुर सबद विचारी |
भाणा भावै खसम का निहचउ निरंकारी |
इशक मुशक महकार है होइ परउपकारी |
सिदक सबूरी साबते मसती हुशिआरी |
गुरमुख आपु गवाइआ जिणि हउमै मारी |


भाई गुरदास जी महाज्ञानी थे| आप अपनी रचना द्वारा गुरमुखों या सच्चे सिक्खों के बारे में बताते हैं कि सच्चा सिक्ख या गुरमुख वह है, जो गुरमति गुर की शिक्षा से प्यार करता है| गुरु के शब्द का विचार करता हुआ करतार के हुक्म में चलता है| विश्वास के साथ प्रभु का नाम सिमरन करता तथा उनकी रजा मानता है, वह उसी तरह परोपकारी होता है जैसे कपूर, सुगंधि, कस्तूरी आदि होती है| दूसरे को महक आती है| वह गुरमुख अपने गुणों, परोपकारों तथा सेवा से दुनिया को सुख देता है, किसी को दुःख नहीं देता| सहनशील होता है, सबसे विशेष बात यह है कि वह अपने आप अहंकार को खत्म करके गुरु या लोगों का ही हो जाता है|

गुरु घर में ऐसे अनेक गुरसिक्ख हुए हैं, जिन्होंने अहंकार को मारा तथा अपना आप न जताते हुए सेवा तथा परोपकार करने के साथ-साथ नाम का सिमरन भी करते रहे|

ऐसे विनम्र सिक्खों में एक भाई साईयां जी हुए हैं| आप नाम का सिमरन करते तथा अपना आप जाहिर न करते| रात-दिन भक्ति करते रहते| आ
प ने गांव से बाहर बरगद के नीचे त्रिण की झोंपड़ी बना ली| खाना-पीना भूल गया| नगरवासी अपने आप कुछ न कुछ दे जाते| इस तरह कहें कि उन्होंने रिजक की डोर भी वाहिगुरु के आसरे छोड़ दी| मोह, माया, अहंकार, लालच सब को त्याग दिया था| उसको भजन करते हुए काफी समय बीत गया|

एक समय आया देश में वर्षा न हुई| आषाढ़ सारा बीत गया| श्रावण का पहला सप्ताह आ गया पर पानी की एक बूंद न गिरी, टोए, तालाब सब सूख गए| पशु तथा पक्षी भी प्यासे मरने लगे| धरती जल गई, गर्म रोशनी मनुष्यों को तड़पाने लगी| हर एक जीव ने अपने इष्ट के आगे अरदास की, यज्ञ लगाए गए| कुंआरी लड़कियों को वृक्षों पर बिठाया गया, पर आकाश पर बादलों के दर्शन न हुए| इन्द्र देवता को दया न आई|

उस इलाके के लोग बड़े व्याकुल हुए क्योंकि वहां कुआं नहीं था| छप्पड़ों तथा तालाबों का पानी पीने के लिए था, पर पानी सूख गया| आठ-आठ कोस से पीने के लिए पानी लाने लगे| भाई साईयां के नगर वासी तथा इर्द-गिर्द के नगरों वाले इकट्ठे हो कर भाई साईयां के पास गए| सब ने मिल कर हाथ जोड़ कर गले में दामन डाल कर भाई साईयां के आगे प्रार्थना की|

'हे भगवान के भक्त! हम गरीबों, पापियों तथा निमाणे लोगों, बेजुबान पशुओं के जीवन के लिए भगवान के आगे प्रार्थना करो, वर्षा हो| कोई अन्न नहीं बोया, पशु-पक्षी तथा मनुष्य प्यासे मर रहे हैं| इतना दुःख होते हुए भी उस भगवान को हमारा कोई ख्याल नहीं| क्या पता हमने कितने पाप किए हैं| हमारे पापों का फल है कि वर्षा नहीं हो रही दया करें! कृपा करें! मासूम बच्चों पर रहम किया जाए|

भाई साईयां ने मनुष्य हृदय का रुदन सुना, उसके नैनों में भी आंसू टपक आए| उसका मन इतना भरा कि वह बोल न सका| उसने आंखें बंद की, आधा घंटा अन्तर्ध्यान हो कर अपने गुरुदेव (श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब जी) के चरण कंवलों में लिव जोड़ी| कोई आधे घंटे के पश्चात आंखें खोल कर कहने लगे-'भक्तों! यह पता नहीं किस के पापों का फल है जो भगवान क्रोधित है| अपने-अपने घर जाओ, परमात्मा के आगे प्रार्थना करो| यह कह कर भाई साईयां अपनी झोंपड़ी में से उठा तथा उठ कर बाहर को चला गया| लोग देखते रह गए| वह चलता गया तथा लोगों की नज़रों से ओझल हो गया| लोग खुशी-खुशी घरों को लौट आए कि अब जब वर्षा होगी, भाई साईयां अपने गुरु के पास पहुंचेगा| हम गरीबों के बदले अरदास की जाएगी| लोग घर पहुंचे तो उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर से आंधी उठी| धीरे-धीरे वह आंधी लोगों के सिर के ऊपर आ गई, उसकी हवा बहुत ठण्डी थी|

आंधी के पीछे महां काली घटा छिपी थी, आंधी आगे चली गई तथा मूसलाधार वर्षा होने लगी| एक दिन तथा एक रात वर्षा होती रही तथा चारों ओर जलथल हो गया| छप्पड़, तालाब भर गए, खेतों के किनारों के ऊपर से पानी गुजर गया| पशु-पक्षी, कीड़े-मकौड़े तथा मनुष्य आनंदित हो कर नृत्य करने लगे| उजड़ा तथा मरा हुआ देश सजीव हो गया, जिन लोगों ने भाई साईयां जी के आगे प्रार्थना की थी या प्रार्थना करने वालों के साथ गए थे, वे सभी भाई साईयां के गुण गाने लगे, कोई कहे-भाई साईयां पूरा भगवान हो गया है| किसी ने कहा, उसका गुरु बड़ा है, सब गुरुओं की रहमतें हैं| हम कंगालों की खातिर उसने गुरु के आगे जाकर प्रार्थना की| गुरु जी ने अकाल पुरख को कहा, बस अकाल पुरुष ने दया करके इन्द्र देवता को हुक्म दिया| इन्द्र देवता दिल खोल कर बरसे| बात क्या, साईयां जी तथा उनके सतिगुरों की उपमा चारों तरफ होने लगी|'

जब वर्षा रुक गई| नगरवासी इकट्ठे हो कर भाई साईयां जी की तरफ चले| भाई जी को भेंट करने के लिए वस्त्र, चावल, गुड़ तथा नगद रुपए थालियों में रखकर हाथों में उठा लिए| जूह के बरगद के पेड़ के नीचे टपकती हुई छत्त वाली झोंपड़ी में साईयां बैठा वाहिगुरु का सिमरन कर रहा था, संगतों को आता देख कर पहले ही उठ कर दस कदम आगे हुआ| उसने दोनों हाथ ऊपर उठा कर चीख मारी, 'ठहर जाओ! क्यों आ रहे हो, क्या बात है?'

'आप गुरुदेव हो, हम आप का धन्यवाद करने आएं हैं| उजड़ा हुआ देश खुशहाल हो गया| हमने दर्शन करने हैं, चरण धूल लेनी है, लंगर चलाने है| आप के लिए पक्की कुटिया बनवानी है| आप ही हमारे परमेश्वर हो|'

इस तरह उत्तर देते हुए लोग श्रद्धा से आगे बढ़ आए| जबरदस्ती साईयां जी के चरणों पर माथा टेकने लग पड़े जो सामग्री साथ लाए थे उसके ढेर लग गए| जब सबने माथा टेक लिया तो भाई साईयां जी ऊंची-ऊंची रोने लग पड़ा, आए हुए लोग देखकर हैरान हो गए| मौत जैसा सन्नाटा छा गया| भाई साहिब रोते हुए कहने लगे, 'मेरे सिर पर भार चढ़ाया है, मैं महां पापी हूं, मेरे यहां बैठने के कारण ही वर्षा नहीं होती थी| मुझ पापी के सिर पर और पाप चढ़ाया है मुझे माथा टेक कर, मुझे गुरुदेव कहा है मैं जरूर नरकों का भागी बनूंगा मुझे क्षमा कीजिए, मैंने त्रिण की झोंपड़ी में ही रहना है| मेरा दूसरा कोई ठिकाना नहीं, यह वर्षा सतिगुरों की कृपा है| धन्य छठे पातशाह मीरी-पीरी के स्वामी सच्चे पातशाह! मैं आप से बलिहारी जाऊं, वारी जाऊं, दुःख भंजन कृपालु सतिगुरु! जिन्होंने जलती हुई मानवता को शांत किया है| मैं कहता हूं यह सारी सामग्री, सारा कपड़ा, सारे रुपए इकट्ठे करके मेरे सतिगुरु के पास अमृतसर ले जाओ| मुझे अपने पाप माफ करवाने दें!' मैंने जीवन भर त्रिण की झोंपड़ी में रहना है| मैं पहले ही पापी हूं, मेरे बुरे कर्मों के कारण वर्षा नहीं हुई| अब मुझे गुरु कह कर और नरकों का भागी न बनाओ, जाओ बुजुर्गों जाओ!

समझदार लोग भाई साईयां जी की नम्रता पर बहुत खुश हुए तथा उनकी स्तुति करने लगे, दूसरों को समझा कर पीछे मोड़ दिया| सारी सामग्री बांध कर श्री अमृतसर भेज दी, सभी जो पहले देवी-देवताओं के पुजारी थे, वे श्री गुरु नानक देव जी के पंथ में शामिल हुए| श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी को नगर में बुला कर सब ने सिक्खी धारण की, गुरु जी ने भाई साईयां को कृतार्थ किया| उसका लोक-परलोक भी संवार दिया| धन्य है सतिगुरु जी तथा धन्य है नेक कमाई करने वाले सिक्ख|

Saturday, 20 May 2023

माई सरखाना जी

ॐ श्री साँई राम जी 


माई सरखाना जी 

मान सरोवर हंसला खाई मानक मोती |
कोइल अंब परीत है मिठ बोल सरोती |
चंदन वास वणासपति हुइ पास खलोती |
लोहा पारस भेटिए हुइ कंचन जोती |
नदीआं नाले गंग मिल होन छोत अछोती |
पीर मुरीदां पिरहड़ी इह खेप सिओती |६|

आज की दुनिया में प्यार तथा श्रद्धा की बेअंत साखियां हैं| गुरु घर में तो अनगिनत सिक्ख हुए हैं, जिन्होंने गुरु चरणों से ऐसी प्रीति की है, जिस की मिसाल अन्य धर्मों में कम ही मिलती है| ऐसी प्रीति की व्याख्या करते हुए भाई गुरदास जि फरमाते हैं कि सिक्ख गुरु से ऐसी प्रीति करते हैं जैसे मान सरोवर के हंस मोतियों के साथ करते हैं, भाव मोती खाते है| कोयल का प्यार आमों के साथ है तथा उनके वैराग में मीठे गीत गाती रहती है| चंदन की सुगन्धि से सारी वनस्पति झूम उठती है| लोहा पारस के साथ मिल कर सोना हो जाता है| नदियां तथा नाले गंगा से मिल कर पवित्र हो जाते हैं| अंत में भाई साहिब कहते हैं, सिक्खों का प्यार ही उनकी पवित्र रास पूंजी है|

जब इतिहास को देखे तो माई सरखाना का नाम आदर से लिया जाता है| आप गुरु घर में बड़ा आदर प्राप्त कर चुकी थीं| उसके प्यार की कथा बड़ी श्रद्धा दर्शाने वाली है| वह प्यारी दीवानी श्रद्धालु तथा अमर आत्मा हुई| जिसका यश आज भी गाया जाता है|

किसी गुरु-सिक्ख से माई ने गुरु घर की शोभा सुनी| उस समय बुढ़ापा निकट था तथा जवानी ढल चुकी थी| बच्चों का विवाह हो गया था| जिम्मेवारियां सिर से उतर गई थीं| उसे अब जन्म-मरण के चक्र का ज्ञान हो गया था| पर यह पता नहीं था कि चौरासी का चक्र कैसे खत्म होता था|

गुरसिक्ख ने माई सरखाना को गुरसिक्खी का ज्ञान करवाते हुए यह शब्द पढ़ा-


मन मंदरु तनु वेस कलंदरु घट ही तीरथि नावा ||
एकु सबदु मेरै प्रानि थसतु है बाहुड़ि जनमि न आवा ||१||

यह शब्द जो हृदय में बसता है, वह शब्द सतिगुरु जी से प्राप्त होता है| सतिगुरु त्रिकालदर्शी थे| सतिगुरु नानक देव जी की गुरुगद्दी पर छठे पातशाह हैं मीरी-पीरी के मालिक! उनको याद कर उनके चरणों में सुरत लगा कर मन में श्रद्धा धारण करो|


अच्छा! मैं श्रद्धा करूंगी| मुझे बताओ सेवा के लिए भेंट क्या रखूंगी, जब दर्शन करूं| माई सरखाना ने पूछा था|

गुरसिक्ख-सतिगुरु जी प्रीत पर श्रद्धा चाहते हैं| कार भेंट जो भी हो| पहुंच से ऊपर कुछ नहीं मांगते| एक टके से भी प्रसन्न होते हैं| उनके दरबार में सेवक हाथी, घोड़े, दुशाले, रेशमी वस्त्र, सोना, चांदी बेअंत भेंट चढ़ाते हैं| नौ निधियां तथा बारह सिद्धियां हैं| सतिगुरु जी अवश्य आपका जन्म-मरन काटेंगे, वह कृपा के सागर हैं :-

|हरिगोविंद गुरु अरजनहुं गुरु गोबिंद नाउं सदवाया |
गुर मूरति गुर शबद है साध संगति विच प्रगटी आया |
पैरीं पाइ सभ जगत तराया |२५


इस तरह गुरु घर की शोभा सुन कर माई सरखाना गुरु घर की श्रद्धालु बन गई| उसने ध्यान कर लिया तथा गुरसिक्ख द्वारा सुने मूल मंत्र का जाप करने लगी| उसके मन में प्रेम जाग पड़ा| मन के साथ हाथ भी सेवा के लिए उत्साहित हुए| अपनी फसलों में से मोटे-मोटे गुल्लों वाली कपास चुनी| कपास चुन कर पेली तथा फिर रुई पिंजाई, रुई पिंजाई गई तो सतिगुरु जी का ध्यान धर कर कातती रही| रुई कात कर जुलाहे से श्रद्धा के साथ कपड़ा तैयार करवाया| बुढ़ापे में लम्बी आयु के तजुर्बे के साथ बारीक तथा सूत का कपड़ा रेशमी कपड़े जैसा था| उसने अपने हाथ से चादरा तैयार किया तथा मन में श्रद्धा धारण की, 'सतिगुरु जी के दर्शन हो|'

पर गुरसिक्खों से सुनती रही कि गुरु जी के दरबार में राजा, महाराजा तथा वजीर आते हैं| फिर वैराग के साथ मन में सोचती मैं तो एक गुरसिक्ख हूं, जिसके पास एक चादरा है वह भी खादी का| कैसे सतिगुरु जी स्वीकार करेंगे? इस तरह मन में वैराग आया तथा मन में उतार चढ़ाव रहा|

मीरी-पीरी के मालिक सतिगुरु हरिगोबिंद साहिब जी मालवे की धरती को पूजनीय बनाने तथा सिक्ख सेवकों का उद्धार करने गए थे| डरोली भाई दीवान लगा था, सिक्ख संगतें आतीं तथा दर्शन करके वापिस जातीं| घरों तथा नगरों में जा कर गुरु यश को सुगन्धि की तरह फैलातीं|


माई सरखाना को भी खबर मिल गई कि सतिगुरु जी निकट आ गए हैं| वह भी सतिगुरु जी के दर्शन के लिए तैयार हो गई| देशी चीनी में घी मिलाया| मक्खन के परांठे बनाए तथा चादरे को जोड़ कर सिर पर रखकर चल पड़ी| चार-पांच कोस का रास्ता तय करके गुरु दरबार के निकट पहुंची तो माई के पैर रुक गए| वह मन ही मन विचार करने लगी, मैं निर्धन हूं, मेरा खादी का चादरा, चीनी, घी तथा परांठे क्या कीमत रखते हैं? जहां राजाओं, महाराजाओं के कीमती दुशाले आए होंगे|.....छत्तीस प्रकार का भोजन खाने वाले दाता यह भारी परांठे क्या पता खाए कि न खाएं यह तो.....


वह दीवार के साथ जुड़ कर खड़ी हो गई| आंखें बंद कर लीं तथा अंतर-आत्मा में सतिगुरु जी को याद करने लगी| वह दुनिया को भूल गई, अटल ध्यान लग गया, सुरति जुड़ गई|

उधर सच्चे पातशाह सतिगुरु हरिगोबिंद साहिब जी महाराज, मीरी पीरी के मालिक, भवसागर से पार करने की समर्था रखने वाले दाता, दयावान, अन्तर्यामी जान गए| माता सरखाना ध्यान लगा कर खड़ी है| उसके आगे भ्रम की दीवार है| वह दीवार पीछे नहीं हट सकती, जितनी देर कृपा न हो|

अन्तर्यामी दाता ने हुक्म दिया - 'घोड़ा लाओ!' यह हुक्म दे कर पलंग से उठ गए| जूता पहना तथा शीघ्र ही दीवान में से बाहर हुए| सिक्ख संगत चोजी प्रीतम के चोज को देख कर हैरान हुई, जो उनका भेद जानते थे, वह समझ गए कि किसी जीव को पार उतारने के लिए महाराज चले हैं तथा जो नए थे वे हैरान ही थे| उनकी हैरानी को दूर करने वाला कोई नहीं था|

उधर माई सरखाना की आंखें बंद थीं तथा वह प्रार्थनाएं किए जा रही थीं| उसकी आत्मा कहती जा रही थी - 'हे सच्चे पातशाह! मैं निर्धन हूं| कैसे दरबार में आऊं, डर लगता है| अपनी कृपा करो, मैं दर्शन के लिए दूर खड़ी हूं| कोई रास्ता नहीं, डर आगे चलने नहीं देता, दाता जी कृपा करो! दया करो!'

इस तरह आंखें बंद करके सतिगुरु जी को याद किए जा रही थी| उधर सतिगुरु जी घोड़े पर सवार हुए, घोड़े को दौड़ाया तथा उसी जगह पहुंचे जहां माई सरखाना दीवार से सहारा लगा कर खड़ी थी| सतिगुरु जी ने आवाज दी -

'माता जी देखो! आंखें खोल कर देखो! सतिगुरु जी के यह शब्द सुन कर माई ने आंखें खोलीं, देखा दाता घोड़े पर सवार खड़े थे| माई शीघ्र ही आगे हुई, चरणों पर शीश झुका कर प्रणाम किया| खुशी में इतनी मग्न हो गई कि उसकी जुबान न खुली, वह कुछ बोल न सकी| बहती आंखों से सतिगुरु की तरफ देखती दर्शन करती गई|'

सच्चे पातशाह ने कहा-'अच्छा माता जी! रोटी दें हम खाएं, हमें बहुत भूख लगी है|.... परांठे.....| आपका हम इन्तजार करते रहे आप तो रास्ते में ही खड़े रहे|'

माई ने झोली में से घी, चीनी वाला डिब्बा तथा परांठे निकाल कर सतिगुरु को पकड़ा दिए| सतिगुरु ने प्रसन्न होकर भोजन किया| भोजन करने के बाद सतिगुरु जी ने चादरे की मांग की| माई ने चादरा गुरु जी को भेंट कर दिया| माई ने जी भर कर दर्शन कर लिये एवं मन की श्रद्धा पूरी हो गई| माई कृतार्थ हो गई| उसका जन्म मरन का चक्र खत्म हो गया| दाता ने अपनी कृपा से माई सरखाना को अमर कर दिया|

सतिगुरु जी माई सरखाना का उद्धार कर ही रहे थे कि पीछे सिक्ख आ गए| हजूरी सिक्ख को सतिगुरु जी ने हुक्म दिया - 'माता जी को दरबार में ले आओ| यह हुक्म करके आप दरबार की तरफ चले गए| माई सरखाना दो दिन दरबार में रह कर दर्शन करती रही| उसका कल्याण हो गया| उस माई के नाम पर आज उसका गांव सरखाना मालवे में प्रसिद्ध है|

Friday, 19 May 2023

भाई सुजान जी

ॐ साँई राम जी



भाई सुजान जी

मंनै पावहि मोखु दुआरु || मंनै परवारै साधारु ||
मंनै तरै तारे गुरु सिख || मंनै नानक भवहि न भिख ||
ऐसा नामु निरंजनु होइ || जे को मंनि जाणै मनि कोई ||१५||
गुर का बचनु जीअ कै साथ || गुर का बचनु अनाथ को नाथ ||


उपरोक्त महां वाक का भावार्थ यह है कि जो परमात्मा के नाम का सुमिरन करते, उसको मानते, अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हैं वह सदा मोक्ष प्राप्त करते हैं| जो स्वयं भक्ति भाव पर चलते हैं, वह दूसरों को भी पार उतार देते हैं| साथ ही दाता का फरमान है कि गुरु जी का वचन, जिन्दगी भर न भूले, हृदय में बसाया जाए| गुरु जी का वचन, यह तो सब का आसरा है| उसके आसरे ही जीवन व्यतीत करते हैं भाव यह कि गुरु घर में हुक्म मानना, नाम का सुमिरन तथा सेवा ही महत्व रखती है| यही सिक्खी जीवन सर्वश्रेष्ठ है|

सेवा और नाम सिमरन करने वाले सिक्खों में एक सिक्ख वैद्य सुजान जी भी आते हैं| श्री कलगीधर जी की आप पर दया दृष्टि हुई थी| जन्म मरन के चक्र कट गए थे|

वैद्य सुजान जी लाहौर के रहने वाले थे| फारसी पढ़ने के साथ वैद्य हकीम भी बने थे तथा फारसी की कविता करते थे| वह हिकमत करते तो उनका मन अशांत रहता| मन की शांति ढूंढने के लिए एक कवि मित्र के साथ श्री आनंदपुर जा पहुंचे| उस समय श्री आनंदपुर में सतिगुरु जी के पास 52 कवि थे| आप कवियों का बहुत सम्मान करते थे| उनकी महिमा सारे उत्तर भारत में थी|

भाई सुजान जी आए| दो दिन तो श्री आनंदपुर शहर की महिमा देखते रहे| जब सतिगुरु जी के दरबार में पहुंचे व दर्शन किए तो सतिगुरु जी ने अद्भुत ही खेल रचा|

जब दर्शन करने गए भाई सुजान ने सतिगुरु जी के चरणों पर माथा टेककर नमस्कार की तो उस समय सतिगुरु जी ने एक अनोखा वचन किया|

हे सुजान! तुम तो वैद्य हो| दीन-दुखियों की सेवा करो| चले जाओ, दूर चले जाओ तथा सेवा करो| उसी में तुम्हें शांति प्राप्त होगी, पार हो जाओगे| दौड़ जाओ|'

'महाराज! कहां जाऊं?' भाई सुजान ने पूछा|

'दौड़ जाओ! तुम्हारी आत्मा जानती है कि कहां जाना है अपने आप ले जाएगी| बस आनंदपुर से चले जाओ!'

फिर नहीं पूछा, चरणों पर नमस्कार की, सारी भूख मिट गई, पानी पीने की तृष्णा नहीं रही| जूते पहनना भूल गया, नंगे पांव भाग उठा, कीरतपुर पार करने के पश्चात, सरसा पार कर गया, वह भागने से न रुका, एक सैनिक की तरह भागता गया| सूर्य अस्त होने वाला था, चरवाहे पशुओं को लेकर जा रहे थे| वह भागता जा रहा था, उसकी मंजिल कब खत्म होगी? यह उसको पता नहीं था| हां, सूर्य अस्त होने के साथ ही एक नगर आया| वहां दीवारों के पास जा कर उसको ठोकर लगी| जिससे वह मुंह के बल गिर पड़ा, गिरते हुए उसके मुंह से निकला-वाहिगुरु तथा मूर्छित हो गया|

नगर की स्त्रियों ने देखा भागता आता हुआ राही गिर कर मूर्छित हो गया है| उन्होंने शोर मचा कर गाँव के आदमियों को बुला लिया| मर्दों ने भाई सुजान चंद को उठाया| चारपाई पर लिटा कर उसकी सेवा की, नंगे पांव में छाले थे, रक्त बह रहा था, पैरों को गर्म पानी से धोया, उसे होश में लाया गया| जब होश आई तो पास मर्द-स्त्रियों को देख कर उसके मुंह से सहज ही निकल गया 'धन्य कलगी वाले पिता|'

'आपने कहां जाना है?' गांव के मुखिया ने पूछा

'कहीं नहीं, जहां जाना था वहां पहुंच गया हूं| मेरा मन कहता है मैंने यहीं रहना है| मैं वैद्य हूं रोगियों-दुखियों की सेवा तन-मन से करूंगा| बताओ जिन को रोग है, मैंने कोई शुल्क नहीं लेना, मैंने यहां रहना है भोजन पान तथा सेवा करनी है| सुजान चंद जी ने उत्तर दिया था|

सुनने वाले खुश हुए कि परमात्मा ने उन पर अपार कृपा की| वह गरीब लोग थे, गरीबी के कारण उनके पास कोई नहीं आता था| उनके धन्य भाग्य जो हकीम आ गया, एक माई आगे बढ़ी| उसने कहा- मेरा बुखार नहीं उतरता इसलिए मुझे कोई दवा दीजिए|

'अभी उतर जाएगा! यह....चीज़ खा लो| चीज़ खाते समय मुंह से बोलना, धन्य कलगीधर पातशाह!' वह माई घर गई उस ने वैद्य जी की बताई चीज़ को खाया व मुंह से कहा, 'धन्य गुरु कलगीधर पातशाह सचमुच उसका बुखार उतर गया, वह अरोग हो गई| वैद्य की उपमा सारे गांव में फैल गई| एक त्रिण की झोंपड़ी में उस ने चटाई बिछा ली, बाहर से जड़ी बूटियां ले आया और रोगियों की सेवा करने लगा| चटाई पर रात को सो जाता तथा वाहिगुरु का सिमरन करता| आए गए रोगी की सेवा करता| इस तरह कई साल बीत गए| पत्नी, बच्चे तथा माता-पिता याद न आए| अमीरी लिबास तथा खाना भूल गया, वह एक संन्यासी की तरह विनम्र होकर लोगों की सेवा करने लगा| शाही मार्ग पर गांव था, जब रोगियों से फुर्सत मिलती तो राहगीरों को पानी पिलाने लग जाता| हर पानी पीने वाले को कहता - कहो धन्य गुरु कलगीधर पातशाह! यात्री ज्यादातर श्री आनंदपुर जाते-आते थे| जो जाते वह श्री आनंदपुर जी जाकर बताते कि मार्ग में एक सेवक है, वह बहुत सेवा करता है| हरेक जीव से कहलाता है, 'धन्य गुरु कलगीधर पातशाह|' यह सुनकर गुरु जी मुस्करा देते|

एक दिन ऐसा आ पहुंचा| जिस दिन भाई सुजान की सेवा सफल होनी थी| उसके छोटे-बड़े ताप-संताप और पाप का खण्डन होना था| खबर आई कि सच्चे सतिगुरु जी आखेट के लिए इधर आ रहे हैं| यह खबर भाई सुजान को भी मिल गई| हृदय खुशी से गद्गद् हो गया, दर्शन करने की लालसा तेज हो गई, व्याकुल हो गया पर डर भी था कहीं दर्शन करने से न रह जाए| भाग्य जवाब न दे जाए| आखिर वह समय आ पहुंचा, गुरु जी गांव के निकट पहुंच गए| नगरवासी भाग कर स्वागत के लिए आगे जाने लगे, पर उस समय एक माई ने आकर आवाज़ दी-'पुत्र! जल्दी चलो, मेरी पुत्रवधू के पेट में दर्द हो रहा है| उसकी जान बचाओ| उसे उदर-स्फीति हो गई है| गरीब पर दया करो, चलो सतिगुरु तुम्हारा भला करे जल्दी चलो|'

भाई सुजान के आगे मुश्किल खड़ी हो गई, एक तरफ रोगी चिल्ला रहा है| दूसरी तरफ कलगीधर पिता जी आ रहे हैं| गुरु जी के दर्शन करने अवश्य हैं, पर रोगी को भी छोड़ा नहीं जा सकता| यदि माई की पुत्रवधू मर गई तो हत्या का भागी भाई सुजान होगा| उसकी आत्मा ने आवाज़ दी|

भाई सुजान! क्यों दुविधा में पड़े हो? रोगी की सेवा करो, तुम्हें सेवा करने के लिए दाता ने हुक्म किया है| उस प्रीतम का हुक्म है, गुरु परमेश्वर के दर्शन लोक सेवा में है|

उसी समय भाई सुजान दवाईयों का थैला उठा कर माई के घर को चल दिया| लोग उत्तर दिशा की तरफ दौड़े जा रहे थे, भाई सुजान दक्षिण दिशा की तरफ जा रहा था| लोगों को गुरु जी के दर्शन करने की इच्छा थी तथा भाई सुजान को रोगी की हालत देखने की जल्दी थी| लोग गुरु जी के पास पहुंचे तथा भाई सुजान माई के घर पहुंच गया| उसने जा कर माई की पुत्रवधू को देखा, वह सचमुच ही कुछ पल की मेहमान थी| उसने उसे दवाईयां घोल कर पिलाई| वैदिक असूलों के अनुसार देखरेख की हिदायतें दीं, पर पूरा एक घण्टा लग गया| माई की रोगी पुत्रवधू खतरे से बाहर हो गई| उसकी उदर-स्फीति अब धीमी हो गई| पेट का दर्द नरम हो गया| भाई सुजान जी दवाईयां दे कर वापिस मुड़े| जल्दी-जल्दी आए तो क्या देखते हैं कि उनकी झोंपड़ी के आगे लोगों की बहुत भीड़ है| घुड़सवार खड़े हैं, सारा गांव इकट्ठा हुआ है| भाई सुजान भीड़ को चीर कर आगे चले गए| झोंपड़ी के अन्दर जा कर क्या देखते हैं कि नीले पर सवार सच्चे पातशाह गरीब की चटाई पर बैठे हुए छत्त की तरफ देख रहे हैं| जाते ही भाई सुजान सतिगुरु जी के चरण कंवलों पर गिर पड़ा| आंखों में खुशी के आंसू आ गए, चरण पकड़ कर विनती की 'करामाती प्रीतम! दाता कृपा की जो गरीब की झोंपड़ी में पहुंच कर गरीब को दर्शन दिए, मेरे धन्य भाग्य|'

'भाई सुजान निहाल!' सच्चे सतिगुरु जी ने वचन किया| सचमुच तुमने गुरु नानक देव जी की सिक्खी को समझा है| गरीबों की सेवा की हैक यही सच्ची सिक्खी है| उठो! अब श्री आनंदपुर को चलो, हम तुम्हें लेने के लिए आए है|'

गुरु के वचनों को मानना सिक्ख का परम धर्म है| उसी समय उठ कर भाई सुजान गुरु जी के साथ चल पड़ा तथा श्री आनंदपुर पहुंचा| गुरु जी ने आप को अमृत पान करवा कर सिंघ सजा दिया| नाम 'सुजान सिंघ' रखा| लाहौर से परिवार भी बुला लिया| परिवार को भी अमृत पान करवाया गया| सारा परिवार भाई सुजान सिंघ को मिल कर बहुत खुश हुआ| भाई सुजान सिंघ की धर्म पत्नी जिसने कई साल पति की जुदाई सहन की तथा पति के हुक्म में सती के समान रही, उसके हृदय को कौन जान सकता है|

Thursday, 18 May 2023

जटू तपस्वी

 ​ॐ साँई राम जी




जटू तपस्वी

प्रेम पिआला साध संग शबद सुरति अनहद लिव लाई|
धिआनी चंद चकोर गति अंम्रित द्रिशटि ‌‌‌‌स्रिसटि वरसाइ ||
घनहर चात्रिक मोर जयों अनहद धुनि सुनि पाइल पाई |
चरण कमल मकरंद रस सुख संपट हुइ भवर समाई |
सुख सागर विच मीन होइ गुरमुख चाल न खोज खुजाई |
अपिउ पीअन निझर झरन अजरजरण न अलख लखाई |
वीह इकीह उलंघि कै गुरसिखी गुरमुख फल खाई |
वाहिगुरु वडी वडिआई |८| 


आध्यात्मिक दुनिया में परमात्मा के दर्शन प्राप्त करने के लिए अनेक मार्ग अपनी-अपनी समझ के अनुसार अनेक महां पुरुषों तथा अवतारों ने बताए हैं| जिन को ज्ञान ध्यान, जप ताप आदि नाम दिए जाते हैं| पुण्य, सेवा सिमरन भी है| भारत में ज्ञान पर बहुत जोर रहा है| ज्ञान के बाद ध्यान आया, मूर्ति पूजा के रूप में तथा जप आया मंत्रों के रूप में ग्यारह हजार करोड़ बार किसी मंत्र का जाप कर लेना तथा कहना बस अन्य कुछ करने की जरूरत नहीं समझें कि रिद्धियां-सिद्धियां या करामातें आ गईं| जप का फल प्राप्त करने के बाद अहंकार हो जाता है| उस अहंकार का उपयोग जादू, टोने, मंत्र, लोगों को अपने वश करने में होता रहा| जप के साथ ही योगी लोगों का शरीर जो पंचभूतक का बना है पुरुष का सुन्दर घर| योगी समझते रहे शरीर में जो शक्ति है, उसको निर्मल किया जाए तो मन स्वयं ही काम, क्रोध, मोह की तरफ नहीं भागेगा| भाव कि शारीरिक शक्तियों को कमजोर करते थे|

भारत के योगियों तथा साधुओं की कई सम्प्रदाएं हैं जो तपस्या कर भरोसा रखती थीं| पंजाब में अनेक तपस्वी हुए हैं| उन तपस्वियों में एक जटू तपस्वी था| उसके तप की बहुत चर्चा थी| पर उसकी तपस्या ने उसे न भगवान के निकट किया था तथा न मन को शांति मिली थी|
उस तपस्वी की साखी इस तरह है कि वह करतारपुर (ब्यास) में रहता था तथा तपस्या किया करता था| उसके तप करने का यह ढंग था कि वह अपने चारों तरफ पांच धूनियां जला लेता तथा स्वयं मध्य में बैठा रहता| सर्दी होती या गर्मी वह धूना जला कर तपस्या करता रहता| उसकी तपस्या की बड़ी चर्चा थी|

करतारपुर नगर को पांचवे पातशाह ने आबाद किया था| गुरु की नगरी का नाम प्राप्त हो गया| जब जटू तपस्या करता था, तब सतिगुरु हरिगोबिंद साहिब जी महाराज करतारपुर में विराजमान थे तथा वहां धार्मिक कार्यों के साथ सैनिक कार्य भी होते थे| नित्य शिकार खेले जाते तथा शत्रुओं से मुकाबला करने का प्रशिक्षण दिया जाता| देश की सेवा का भी मनोरथ था|

जटू तपस्वी को प्रभु ज्ञान बता कर उसको शारीरिक कष्ट से मुक्त करने के लिए सतिगुरु जी ने ध्यान किया| तपस्वी की दशा बड़ी दयनीय थी| वह व्याकुल रहता तथा अहंकार और लालच में आ गया था| उसकी मनोवृति ठीक नहीं रहती थी| ऐसी दशा में फंसा होने पर कभी-कभी गुरु घर की निंदा कर देता| उसके मन को फिर भी चैन न आता, क्योंकि शरीर दुखी रहता| पर सतिगुरु जी ऐसे दुखियों के दुःख दूर करते थे| सतिगुरु जी शिकार को जाते हुए तपस्वी के पास पहुंचे, उस समय तपस्वी धूना जला कर तप कर रहा था| उसका ध्यान कहीं ओर था, बैठा कुछ सोच रहा था|

सतिगुरु जी घोड़े पर सवार ही रहे, जटू तपस्वी की तरफ सतिगुरु जी ने कृपा दृष्टि से उसकी आंखों में आंखें डाल कर देखा| कोई चार-पांच मिनट तक देखकर गुरु साहिब जी ने उसके तप तथा भ्रम की शक्ति को खींच लिया तथा वह वचन करके कि-तपस्वी! खीझा न करो| कहो 'सति करतार|' साहिब जी घोड़े को एड़ी लगाकर आगे निकल गए|

सतिगुरु जी के जाने के बाद जटू तपस्वी के दिल-दिमाग में खलल पैदा हो गया| वह स्वयं ही जबरदस्ती कहता गया-तपस्वी खीझा न करो| तपस्वी खीझा न करो| कहो सति करतार, सति करतार|'

यह भी चमत्कार हुआ कि उनकी पांचों धुनियां ठण्डी हो गई| उस की हिम्मत न रही कि वह उठ कर फूंकें भी मार सके, उसने किसी को आवाज़ न दी| आसन में उठ गया, उसने कहा 'सति करतार|'

'सति करतार' कहता हुआ नाचता रहा| उसकी ऐसी दशा हो गई, नाम की ऐसी अंगमी शक्ति आई कि वह सिमरन करने लग गया| वह पागलों के जैसे घूमने लगा तथा बच्चे और साधारण लोग जिन्हें आत्मिक दुनिया का ज्ञान नहीं था, वह व्यंग्य करने लगे| 'तपस्वी खीझा न करो! तपस्वी खीझा न करो|' पर वह क्रोध न करता, बल्कि कहता-कहो भाई! सति करतार|' इस तरह कोई उसे पागल समझने लग पड़ा| उसको गुरु दर्शनों की लिव लग गई| वह दर्शन के लिए तड़पने लगा| उतनी देर में सतिगुरु जी भाग्यवश श्री अमृतसर जी को चले गए|
पीछे से तपस्वी की बैचेनी और बढ़ गई तथा वह 'सति करतार' का सिमरन करता हुआ बिल्कुल पागल हो गया| उसके इर्द-गिर्द के कपड़े फट गए तथा कभी ढंका हुआ और कभी नग्न फिरने लगा| उसकी दशा बिगड़ती गई|

उसको यह ज्ञान हो गया कि सतिगुरु जी श्री अमृतसर को चले गए हैं तो वह ब्यास से पार हो कर पीछे गया तथा अमृतसर पहुंचा|

वह शहर में तथा श्री हरिमंदिर साहिब जी के इर्द-गिर्द घूमता रहा| पर उसे सतिगुरु जी के दरबार में दाखिल होने की आज्ञा न मिली|

'ले आओ|' सतिगुरु जी ने एक दिन हुक्म दिया कि यह गुरमुख है| तपस्वी पहले खीझा रहता था, अब तपता है, नाम अभ्यासी हो गया है|

भाई जटू को सतिगुरु जी के दरबार में हाजिर किया गया| सतिगुरु जी के चरणों में गिर पड़ा तथा बिलख-बिलखकर विनती करने लगा - हे दाता! जैसे पहले कृपा की है अब भी दया करो! सुधबुध रहे, सिमरन करूं|'

सतिगुरु जी ने कृपा करके गुरु-मंत्र प्रदान किया, उसके मन को शांत किया तथा अंतर-आत्मा को ज्ञान कराया| उसको वस्त्र पहनाए तथा गुरु घर में सेवा पर लगाया| उनकी लिव लगी तथा सच्चा प्यार पैदा हो गया| धूनियों का ताप जो अहंकार पैदा करता था, वह समाप्त हो गया|

सतिगुरु नानक देव जी ने सिमरन तथा सिक्खी मार्ग को प्रगट करके कलयुगी जीवों को कल्याण के साधन सिर्फ नाम सिमरन, सच्चा प्यार तथा सेवा ही बताया| वैसे ही भाई गुरदास जी फरमाते हैं कि गुरु घर में प्यार का प्याला मिलता है वह भी अनहद की धुनी बजती है| वह प्यार चांद चकोर जैसा होता है| ध्यान लगा रहता है| सिक्ख को सच्चे प्यार की कृपा होती है, गुरमुखों को ऐसा सुख मिलता है, सतिगुरु की प्रशंसा है|

इसलिए हे जिज्ञासु जनो! नाम का सिमरन करो! धर्म की कमाई तथा सेवा करो| झूठे आडम्बर करके शरीर को कष्ट देने की जरूरत नहीं| सच्ची तपस्या तो नाम सिमरन है|

Wednesday, 17 May 2023

छज्जू झीवर

ॐ श्री साँई राम जी



छज्जू झीवर

श्री हरिकृष्ण धिआईऐ जिस डिठै सभि दुखि जाइ ||

सतिगुरु हरिकृष्ण साहिब जी दिल्ली को जा रहे थे| आप को बालक रूप में गुरुगद्दी पर विराजमान देखकर कई अज्ञानी तथा अहंकारी पंडित मजाक करते थे| उनके विचार से गुरु साहिब के पास कोई आत्मिक शक्ति नहीं थी| ऐसे पुरुष जब निकट हो कर चमत्कार देखते हैं तो सिर नीचे कर लेते हैं| पर हर एक गुरु साहिब में सतिगुरु नानक देव जी अकाल पुरुष से प्राप्त की शक्ति थी, जो चाहें कर सकते थे|

एक नगर में पड़ाव किया| जीव दर्शन करके आनंदित होते तथा जन्म मरन कटते और दुःख दूर करते थे| सतिगुरु जी की उपमा सुन कर अनेक लोग आए थे तथा दीवान सज गया तथा| उसी समय एक पंडित आया| उसका नाम लाल जी था| उसने दर्शन किए| 

अहंकार से भरा मन में विचार आया-'मैं चार वेदों, गीता तथा उपनिषदों का कथा वाचक हूं मेरी बराबरी कौन कर सकता है| यदि गुरु हो तो गीता के अर्थ करें| ऐसी मन की बात उसने व्यक्त कर दी| इस समय जो उसके पास थे उनको शंका हुई|

ज्योति स्वरूप कृपा के दाता, अंतर्यामी सतिगुरु जी पंडित लाल के मन की बात जान गए| उन्होंने ऊंचे स्वर में वचन किया -'पंडित जी! आप के मन में जो शंका है निवृत कर लो सतिगुरु नानक देव जी सर्वज्ञाता हैं|

पंडित लाल कुछ शर्मिन्दा हुआ, फिर भी उस को विद्या तथा आयु का अभिमान था| उठ कर आगे हुआ तथा कहने लगा -

'गीता के अर्थ सुनाओ|'

'यदि हमने अर्थ बताए तो आप सोचेंगे शायद अर्थ याद किए हैं, इसलिए कोई आदमी बाहर से ले आओ| आप ने सतिगुरु महाराज के घर पर भी संदेह किया है, इसलिए उसको दूर करो|' सतिगुरु जी ने पंडित को फ़रमाया|

पंडित लाल बहुत अहंकार में आ गया|

वह दीवान में से उठ कर बाहर गया तथा एक अनपढ़ छज्जू झीवर को पकड़ कर ले आया| सतिगुरु जी ने छज्जू को अपने पास बिठाया तथा उसके सिर पर छड़ी रखी तथा वचन किया -

'हे पंडित! जिस को ले आए हो, ठीक है, कर्मों की गति न्यारी है यह तो पूर्व जन्म में पंडित था| चार वेद तथा गीता की कथा किया करता था| पर इस समय दाने भुनता है तथा आप लोग अज्ञानी मुर्ख समझ रहे हो| इसका ज्ञान किसी को नहीं|

यह सुन कर पंडित लाल बहुत हक्का-बक्का हुआ तथा इधर छज्जू की भी पूर्व जन्म की चेतना जाग पड़ी| उसके सामने गीता आई| गीता के सारे श्लोक आए तथा श्लोकों के भाव अर्थ! उसने हाथ जोड़ कर सतिगुरु जी के पास विनती की-'महाराज! आपकी अपार कृपा दृष्टि हुई है, जो आप ने पूर्व जन्म का ज्ञान करा दिया है| मुझे अहंकार हो गया था, इसलिए मैं जितना विद्वान तथा ज्ञानी था उतना ही फिर मुर्ख, अनपढ़ तथा अज्ञानी हुआ| यह जन्म मेरे अहंकार का दण्ड है| परमात्मा की लीला है कि संयोग बना दिया तथा आपके चरणों में हाजिर हो गया हूं| जैसे हुक्म करोगे वैसा ही होगा| आप तो त्रिलोकी के मालिक हो, ज्ञानी हो, ब्रह्म ज्ञान का पता है| कृपा करो तथा यह पुतली नाचती रहेगी|

पंडित लाल ने छज्जू से यह कुछ सुना तो उसके पैरों के नीचे की मिट्टी निकल गई, उसको प्रत्यक्ष दिखाई दिया, छज्जू पंडित की तरह तिलकधारी बैठा था तथा उसके गले में जनेऊ था| उसने आंखें मली तो हैरान हुआ पर उसकी अहंकारी आत्मा इस भेद को न जान सकी तथा उसी समय कहने लगा - 'यह भी देख लेता हूं कैसा तुम्हारा ज्ञान है|'

हे पंडित लाल जी! आप श्लोक पढ़ो तथा पंडित छज्जू जी कथा करेंगे| व्याख्या भी हर श्लोक की होगी|

सतिगुरु जी ने पंडित लाल को कहा तथा उस ने एक श्लोक पड़ा जिसे वह बहुत कठिन पाठ तथा अर्थ भाव वाला श्लोक समझता था| 

'पंडित लाल जी!' छज्जू बोला-आपने श्लोक अशुद्ध पढ़ा है, वास्तविक पाठ इस तरह है-

छज्जू संस्कृत का श्लोक मौखिक पढ़ने लग पड़ा तथा श्लोक का पाठ करने के बाद उसने अर्थ करने शुरू किए| भगवान श्री कृष्ण जी उच्चारण करते हैं - 'मैं परमात्मा माया रूप भी हूं तथा निरंजन भी, जीव आत्मा अमर है| इसके बाद व्याख्या की| व्याख्या को सुन कर पंडित लाल को पसीना आ गया| वह बड़ा लज्जित हुआ कि उसने सतिगुरु नानक देव जी की गुरुता पर शक क्यों किया? जैसे सतिगुरु नानक देव जी महान थे, उसी तरह पिछले गुरु महाराज|'

पंडित लाल के अहंकार का सिर झुक गया, उसको इस तरह प्रतीत हुआ जैसे उसकी विद्या सारी छज्जू के पास चली गई थी| वह तो शुद्ध पाठ भी करने के योग्य नहीं रह गया था| उठ कर सतिगुरु जी के चरणों पर नतमस्तक हो गया| आंखों से आंसू आ गए| दिल में पश्चाताप तथा वैराग| वह विनती करने लगा -

'हे दातार! आप तो प्रत्यक्ष अवतार हो| मुझे क्षमा कीजिए| मेरी विद्या मुझे लौटा दें| मैं मुर्ख न बन जाऊं| छज्जू पंडित है कि नहीं पर आप तो अवश्य पंडितों के भी पंडित हो महां विद्वान|'

सतिगुरु महाराज जी दया के घर में आए| बख्शनहार दाता ने पंडित लाल की भूल क्षमा की| उसका अहंकार खत्म करके उसको सुखी जीवन का सही मार्ग बताया| वह गुरु घर में रह कर सेवा करने लगा तथा कहा, 'मैं आप के चरणों में ही रहूंगा|'

सतिगुरु महाराज जी ने उसकी यह विनती स्वीकार कर ली तथा उसको हुक्म किया, गुरु चरणों से ध्यान जोड़ कर प्रभु नाम का सिमरन किया करो| आप का कल्याण होगा| अनपढ़ जीवों को अक्षर ज्ञान करवाया करो| गांव में धर्मशाला कायम करो| नाम ज्ञान तथा हरि कीर्तन की मण्डली तैयार करके भजन बंदगी में लगो| गुणों का लोगों को लाभ पहुंचा|

पण्डित लाल ने सब वचन आदर सहित स्वीकार किये| छज्जू का भी जन्म मरन कट गया और भजन करने लगा|

सतिगुरु महाराज की विशाल तथा अपार महिमा के बारे भाई गुरदास जी फरमाते हैं -


धंन गुरु गुरसिख धंन आदि पुरख आदेस कराया |
सतिगुर दरशन धंन है धंन द्रिशटि गुर धिआन धराया |
धंन धंन सतिगुर शबद धंन सुरति गुर गिआन सुनाया |
चरनकवल गुर धंन धंन मसतक गुर चरणी लाया |
धंन धंन गुर उपदेश है धंन रिदा गुरमंत्र वसाया|
धंन धंन गुर चरनांम्रितो धंन मुहत जित अपिओ पीआया |
गुरमुख सुख फल अजर जराया ||१९||

भाई साहिब जी फरमाते हैं कि सतिगुरु जी भी धन्य हैं, उनकी महिमा ब्यान नहीं की जा सकती तथा सतिगुरु जी के सिक्ख भी, जिन्होंने अनेक कुर्बानियां दीं| सेवा करते तथा हुक्म मानते हुए कोई कमी बाकी न छोड़ी| सतिगुरु जी ने सिक्खों को अकाल पुरुष के आगे डण्डवत कराई अथवा नाम सिमरन में लगाया| सतिगुरु जी के दर्शन भी धन्य उपमा योग्य है क्योंकि दर्शन करने से जन्म मरन के बंधन कट जाते हैं, मन एक तरफ लग जाता है| धन्य हैं सतिगुरु जी के चरण कंवल, जिन पर जब शीश झुकाते हैं तो जंगाल लगे हुए पाप भी दूर हो जाते हैं| सतिगुरु जी का बक्शा हुआ चरणामृत (पाहुल) आजकल खंण्डे का अमृत ऐसा नशा होता है कि जीवन भर नहीं उतरता तथा सदा -

नाम खुमारी नानका चढ़ी रहै दिन रात |

जैसी बात होती है| सतिगुरु महाराज ने गुरमुखों को ऐसा बना दिया कि वह विनम्र हो गए| अहं खत्म हो गया|

ऐसी ही कृपा सतिगुरु हरिकृष्ण जी ने आठवीं देह रूप में पंडित लाल तथा भाई छज्जू पर की|

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बाबा के 11 वचन

ॐ साईं राम

1. जो शिरडी में आएगा, आपद दूर भगाएगा
2. चढ़े समाधी की सीढी पर, पैर तले दुःख की पीढ़ी कर
3. त्याग शरीर चला जाऊंगा, भक्त हेतु दौडा आऊंगा
4. मन में रखना द्रढ विश्वास, करे समाधी पूरी आस
5. मुझे सदा ही जीवत जानो, अनुभव करो सत्य पहचानो
6. मेरी शरण आ खाली जाए, हो कोई तो मुझे बताए
7. जैसा भाव रहे जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मनका
8. भार तुम्हारा मुझ पर होगा, वचन न मेरा झूठा होगा
9. आ सहायता लो भरपूर, जो माँगा वो नही है दूर
10. मुझ में लीन वचन मन काया, उसका ऋण न कभी चुकाया
11. धन्य-धन्य व भक्त अनन्य, मेरी शरण तज जिसे न अन्य

.....श्री सच्चिदानंद सदगुरू साईनाथ महाराज की जय.....

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः॒ स्वः॒
तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यम्
भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि।
धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥

Word Meaning of the Gayatri Mantra

ॐ Aum = Brahma ;
भूर् bhoor = the earth;
भुवः bhuwah = bhuvarloka, the air (vaayu-maNdal)
स्वः swaha = svarga, heaven;
तत् tat = that ;
सवितुर् savitur = Sun, God;
वरेण्यम् varenyam = adopt(able), follow;
भर्गो bhargo = energy (sin destroying power);
देवस्य devasya = of the deity;
धीमहि dheemahi = meditate or imbibe

these first nine words describe the glory of Goddheemahi = may imbibe ; pertains to meditation

धियो dhiyo = mind, the intellect;
यो yo = Who (God);
नः nah = our ;
प्रचोदयात prachodayat = inspire, awaken!"

dhiyo yo naha prachodayat" is a prayer to God


भू:, भुव: और स्व: के उस वरण करने योग्य (सूर्य) देवता,,, की (बुराईयों का नाश करने वाली) शक्तियों (देवता की) का ध्यान करें (करते हैं),,, वह (जो) हमारी बुद्धि को प्रेरित/जाग्रत करे (करेगा/करता है)।


Simply :

तीनों लोकों के उस वरण करने योग्य देवता की शक्तियों का ध्यान करते हैं, वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।


The God (Sun) of the Earth, Atmosphere and Space, who is to be followed, we meditate on his power, (may) He inspire(s) our intellect.