शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Friday, 25 November 2022

श्री साईं लीलाएं - छिपकली बहनों का मिलन

ॐ सांई राम


परसों हमने पढ़ा था.. चोलकर को शक्कर की चाय पिलाओ 

श्री साईं लीलाएं - छिपकली बहनों का मिलन

   

एक समय की बात है कि साईं बाबा मस्जिद में बैठे हुए अपने भक्तों से वार्तालाप कर रहे थे| उसी समय एक छिपकली ने आवाज की, जो सबने सुनी और छिपकली की आवाज का अर्थ अच्छे या बुरे सकुन से होता है| उत्सुकतावश उस समय वहां बैठे एक भक्त ने बाबा से पूछा - "बाबा यह छिपकली क्यों आवाज कर रही है? इसका क्या मतलब है? इसका बोलना शुभ है या अशुभ?"

बाबा ने कहा - 'अरे, आज इसकी बहन औरंगाबाद से आ रही है, उसी खुशी में यह बोल रही है|" उस भक्त से सोचा - 'यह तो छोटा-सा जीव है| इसकी कौन-सी बहन और भाई? कहां इसका घर-बार? शायद बाबा ने ऐसा मजाक में कह दिया होगा|' वह भक्त बाबा के कथन का रहस्य न समझ सका और चुपचाप बैठा रहा|

उसी समय औरंगाबाद से एक व्यक्ति घोड़े पर सवार होकर बाबा के दर्शन करने आया| बाबा उस समय नहाने गये हुए थे| इसलिए उसने सोचा कि जब तक बाबा आते हैं तब तक मैं बाजार से घोड़े के लिए चने खरीद कर ले आता हूं| ऐसा सोचकर उसने चने लाने का जो थैला कंधे पर रखा हुआ था, धूल झाड़ने के उद्देश्य से झटका तो उसमें से एक छिपकली निकली - और फिर देखते-देखते वह तेजी से दीवार पर चढ़ते हुए पहली वाली छिपकली के पास पहुंच गयी| फिर दोनों खुशी-खुशी लिपटकर दीवार पर इधर-उधर घूमती हुई नाचने लगीं| यह देखकर सब लोग आश्चर्यचकित रह गये| यह कहना बाबा की सर्वव्यापकता का सूचक था| वरना कहां शिरडी और कहां औरंगाबाद!


कल चर्चा करेंगे... साठे पर बाबा की कृपा     

ॐ सांई राम
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं

बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Thursday, 24 November 2022

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 35


ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं
हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है
हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा
किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...


श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 35 - परीक्षा में असफल
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काका महाजनी
काका महाजनी के मित्र और सेठ, निर्बीज मुनक्के, बान्द्रा निवासी एक गृहस्थ की नींद न आने की घटना, बालाजी पाटील नेवासकर, बाबा का सर्प के रुप में प्रगट होना ।
इस अध्याय में भी उदी का माहात्म्य ही वर्णित है । इसमें ऐसी दो घटनाओं का उल्लेख है कि परीक्षा करने पर देखा गया कि बाबा ने दक्षिणा अस्वीकार कर दी । पहले इन घटनाओं का वर्णन किया जायेगा ।
आध्यात्मिक विषयों में सामप्रदायिक प्रवृत्ति उन्नति के मार्ग में एक बड़ा रोड़ा है । निराकरावादियों से कहते सुना जाता है कि ईश्वर की सगुण उपासना केवल एक भ्रम ही है और संतगण भी अपने सदृश ही सामान्य पुरुष है । इस कारण उनकी चरण वन्दना कर उन्हें दक्षिणा क्यों देनी चाहिये । अन्य पन्थों के अनुयायियों का भी ऐसा ही मत है कि अपने सदगुरु के अतिरिक्त अनय सन्तों को नमन तथा उनकी भक्ति न करनी चाहिए । इसी प्रकार की अनेक आलोचनायें साईबाबा के सम्बन्ध में पहले सुनने में आया करती थी तथा अभई भी आ रही है । किसी का कथन था कि जब हम शरिडी को गये तो बाबा ने हमसे दक्षिणा माँगी । क्या इस भाँति दक्षिणा ऐठना एक सन्त के लिये शोभनीय था । जब वे इस प्रकार आचरण करते है तो फिर उनका साधु-धर्म कहाँ रहा । परन्तु ऐसी भी कई घटनाएँ अनुभव में आई है कि जिन लोगों ने शिरडी जाकर अविश्वास से बाब के दर्शन किये, उन्होंने ही सर्वप्रथम बाबा को प्रणाम कर प्रार्थना भी की । ऐसे ही कुछ उदाहरण नीचे दिये जाते है ।

काका महाजनी के मित्र
काका महाजनी के मित्र निराकारवादी तथा मूर्ति-पूजा के सर्वथा विरुदृ थे । कौतुहलवश वे काका महाजनी के साथ दो शर्तों पर शिरडी चलने को सहमत हो गये कि
1. बाबा को नमस्कार न करेंगे और
2. न कोई दक्षिणा ही उन्हें देंगे ।
जब काका ने स्वीकारात्मक उत्तर दे दिया, तब फिर शनिवार की रात्रि को उन दोनों ने बम्बई से प्रस्थान कर दिया और दूससरे ही दिन प्रातःकाल शिरडी पहुँच गये । जैसे ही उन्होंने मसजिद में पैर रखा, उसी समय बाबा ने उनके मित्र की ओर थोड़ी देर देखकर उनसे कहा कि अरे आइये, श्री मान् पधारिये । आपका स्वागत है । इन शब्दों का स्वर कुछ विचित्र-सा था और उनकी ध्वनि प्रायः उन मित्र के पिता के बिलकुल अनुरुप ही थी । तब उन्हें अपने कैलासवासी पिता की स्मृति हो आई और वे आनन्द विभोर हो गये । क्या मोहिनी थी उस स्वर में । आश्यर्ययुक्त स्वर में उनके मित्र के मुख से निकल पड़ा कि निस्संदेह यह स्वर मेरे पिताजी का ही है । तब वे शीघ्र ही ऊपर दौड़कर रगयेऔर अपनी सब प्रतिज्ञायें भूलकर उन्होंने बाबा के श्री-चरणों पर अपना मस्तक रख दिया । बाबा ने काकासाहेब से तो दोपहर में तथा विदाई के समय दो बार दक्षिणा माँगी, परन्तु इनके मित्र से एक शब्द भी न कहा । उनके मित्र ने फुसफुसाते हुए कहा कि भाई । देखो, बाबा ने तुमसे तो दो बार दक्षिणा माँगी, परन्तु मैं भी तो तुम्हारे साथ हूँ, फिर वे मेरी इस प्रकार उपेक्षा क्यों करते है । काका ने उत्तर दिया कि उत्तम तो यह होगा कि तुम स्वयं ही बाबा से यह पूछ लो । बाबा ने पूछा कि यह क्या कानाफूसी हो रही है । तब उनके मित्र ने कहा कि क्या मैं भी आपको दक्षिणा दूँ । बाबा ने कहा कि तुम्हारी अनिच्छा देखकर मैंने तुमसे दक्षिणा नहीं माँगी, परन्तु यदि तुम्हारी इच्छा ऐसी ही है तो तुम दक्षिणा दे सकते हो । तब उन्होंने सत्रह रुपये भेंट किये, जितने काका ने दिये थे । तब बाबा ने उन्हें उपदेश दिया कि अपने मध्य जो तेली की दीवाल (भेदभाव) है, उसे नष्ट कर रदो, जिससे हम परस्पर देखकर अपने मिलन का पथ सुगम बना सकें । बाबा ने उन्हें लौटने की अनुमति देते हुए कहा कि तुम्हारी यात्रा सफल रहेगी । यघपि आकाश में बादल छाये हुए थे और वायु वेग से चल रही थी तो भी दोनों सकुशल बम्बई पहुँच गये । घर पहुँचकर जब उन्होंने द्घार तथा खिड़कियाँ खोलीं तो वहाँ दो मृत चमगादड़ पड़े देखे । एक तीसरा उनके सामने ही फुर्र करके खिड़की में से उड़ गया । उन्हें विचार आया कि यदि मैंने खिड़की खुली छोड़ी होती तो इन जीवों के प्राण अवश्य बच गये होते, परन्तु फिर उन्हें विचार आया कि यह उनके भाग्यानुसार ही हुआ है और बाबा ने तीसरे की प्राण-रक्षा के हेतु हमें शीघ्र ही वहाँ से वापस भेज दिया है ।

काका महाजनी के सेठ
बम्बई में ठक्कर धरमसी जेठाभाई साँलिसिटर (कानूनी सलाहकार) की एक फर्म थी । काका इस फर्म के व्यवस्थापक थे । सेठ और व्यस्थापक के सम्बन्ध परस्पर अच्छे थे । श्री मान् ठक्कर को ज्ञात था कि काका बहुधा शिरडी जाया करते है और वहाँ कुछ दिन ठहरकर बाबा की अनुमति से ही वापस लौटते है । कौतूहलवश बाबा की परीक्षा करने के विचार से उन्होंने भी होलिकोत्सब के अवसर पर काका के साथ ही शिरडी जाने का निश्चय किया । काका का शिरडी से लौटना सदैव अनिश्चत सा ही रहता था, इसलिये अपने अपने साथ एक मित्र को लेकर वे तीनों रवाना हो गये । मार्ग में काका ने बाबा को अर्पित करने के हेतु दो सेर मुनक्का मोल ले लिये । ठीक समय पर शिरडी पहुंच कर वे उनके दर्नार्थ मसजिद में गये । बाबा साहेब तर्खड भी तब वहीं पर थे । श्री. ठक्कर ने उनसे आने का हेतु पूछा । तर्खड ने उत्तर दिया कि मैं तो दर्शनों के लिये ही आया हूँ । मुझे चमत्कारों से कोई प्रयोजन नहीं । यहाँ तो भक्तों की हार्दिक इच्छाओं की पूर्ति होती है । काका ने बाबा को नमस्कार कर उन्हें मुनक्के अर्पित किये । तब बाबा ने उन्हें वितरित करने की आज्ञा दे दी । श्री मान् ठक्कर को भी कुछ मुनक्के मिले । एक तो उन्हें मुनक्का रुचिकर न लगता था, दूसरे इस प्रकार अस्वच्छा खाने की डाँक्टर ने मनाही कर दी थी । इसलिये वे कुछ निश्चय न कर सके और अनिच्छा होते हुए भी उन्हें ग्रहण करना पड़ा और फिर दिखावे मात्र के लिये ही उन्होंने मुँह में डाल लिया । अब समझ में न आता था कि उनके बीजों का क्या करें । मसजिद की फर्श पर तो थूका नहीं जा सकता था, इसलिये उन्होंने वे बीज अपनी इच्छा के विरुदृ अपने खीसे में डाल लिये और सोचने लगे कि जब बाबा सन्त है तो यह बात उन्हें कैसे अविदित रह सकती है कि मुझे मुनक्कों से घृणा है । फिर क्या वे मुझे इसके लिये लाचार कर सकते है । जैसे ही यह विचार उनके मन में आया, बाबा ने उन्हें कुछ और मुनक्के दिये, पर उन्होंने खाया नहीं और अपने हाथ में ले लिया । तब बाबा ने उन्हें खा लेने को कहा । उन्होंने आज्ञा का पालन किया और चबाने पर देखा कि वे सब निर्बीज है । वे चमत्कार की इच्छा रखते थे, इसलिये उन्हें देखने को भी मिल गया । उन्होंने सोचा कि बाबा समस्त विचारों को तुरन्त जान लेते है और मेरी इच्छानुसार ही उन्होंने उन्हें बीजरहित बना दिया है । क्या अदभुत शक्ति है उनमें । फिर शंका-निवारणार्थ उन्होंने तर्खड से, जो समीप ही बैठे हुये थे और जिन्हें भी थोड़े मुनक्के मिले थे, पूछा कि किस किसम के मुनक्के तुम्हें मिले । उत्तर मिला अच्छे बीजों वाले । श्रीमान् ठक्कर को तब और भी आश्र्चर्य हुआ । अतब उन्होंने अपने अंकुरि तविश्वास को दृढ़ करने के लिये मन में निश्चय किया कि यदि बाबा वास्तव में संत है तो अब सर्वप्रथम मुनक्के काका को ही दिये जाने चाहिये । इस विचार को जानकर बाबा ने कहा कि अब पुनः वितरण काका से ही आरम्भ होना चाहिये । यह सब प्रमाण श्री. ठक्कर के लिये पर्याप्त ही थे ।
फिर शामा ने बाबा से परिचय कराय कि आप ही काका के सेठ है । बाबा कहने लगे किये उनके सेठ कैसे हो सकते है । इनके सेठ तो बड़े विचित्र है । काका इस उत्तर से सहमत हो गये । अपनी हठ छोड़कर ठक्कर ने बाबा को प्रणाम किया और वाड़े को लौट आये । मध्याह की आरती समाप्त होने के उपरान्त वे बाबा से प्रस्थान करने की अनुमति प्राप्त करने के लिये मसजिद में आये । शामा ने उनकी कुछ सिफारिश की, तब बाबा इस प्रकार बोले :-
एक सनकी मस्तिष्क वाला सभ्य पुरुष था, जो स्वस्थ और धनी भी था । शारीरिक तथा मानसिक व्यथाओं से मुक्त होने पर भी वह स्वतःही अनावश्यक चिंताओं में डूबा रहता और व्यर्थ ही यहाँ-वहाँ भटक कर अशान्त बना रहता था । कभी वह स्थिर और कभी चिन्तित रहता था । उसकी ऐसी स्थिति देखकर मुझे दया आ गई और मैने उससे कहा कि कृपया अब आप अपना विश्वास एक इच्छित स्थान पर स्थिर कर लें । इस प्रकार व्यर्थ भटकने से कोई लाभ नहीं ।
शीघ्र ही एक निर्दिष्ट स्थान चुन लो – इन शब्दों से ठक्कर की समझ में तुरन्त आ गया कि यह सर्वथा मेरी ही कहानी है । उनकी इच्छा थी कि काका भी हमारे साथ ही लौटें । बाबा ने उनका ऐसा विचार जानकर काका को सेठ के साथ ही लौटने की अनुमति दे दी । किसी को विश्वसा न था कि काका इतने शीघ्र शिरडी से प्रस्थान कर सकेंगे । इस प्रकार ठक्कर को बाबा की विचार जानने की कला का एक और प्रमाण मिल गया ।
तब बाबा ने काका से 15 रुपये दक्षिणा माँगी और कहने लगे कि यदि मैं किसी से एक रुपया दक्षिणा लेता हूँ तो उसे दसगुना लौटाया करता हूँ । मैं किसी की कोई वस्तु बिना मूल्य नहीं लेता और न तो प्रत्येक से माँगता हूँ । जिसकी ओर फकीर (मेरे गुरु) इंगित करते है, उससे ही मैं माँगता हूँ और जो गत जन्म का ऋणी होता है, उसकी ही दक्षिणा स्वीकार हो जाती है । दानी देता है और भविष्य में सुन्दर उपज का बीजारोपण करता है । धन का उपयोग धनोर्पाजन के ही निमित्त होना चाहिये । यदि धन व्यक्तिगत आवश्यकताओं में व्यय किया गया तो यह उसका दुरुपयोग है । यदि तुमने पूर्व जन्मों में दान नहीं दिया है तो इस जन्म में पाने की आशा कैसे कर सकेत हो । इसलिये यदि प्राप्ति की आशा रखते हो तो अभी दान करो । दक्षिणा देने से वैराग्य की वृद्घि होती है और वैराग्य प्राप्ति से भक्ति और ज्ञान बढ़ जाते है । एक दो और दस गुना लो ।
इन शब्दों को सुनकर श्री. ठक्कर ने भी अपना संकल्प भूलकर बाब को 15 रुपये भेंट किये । उन्होंने सोचा कि अच्छा ही हुआ, जो मैं शिरडी आ गया । यहाँ मेरे सब सन्देह नष्ट हो गये और मुझे बहुत कुछ शिक्षा प्राप्त हो गई ।
ऐसे विषयों में बाबा की कुशलता बड़ी अद्घितीय थी । यघपि वे सब कुछ करते थे, फिर भी वे इन सबसे अलिप्त रहते थे । नमस्कार करने या न करने वाले, दक्षिणा देने या न देने वाले, दोनों ही उनके लिये एक समान थे । उन्होंने कभी किसी का अनादर नहीं किया । यदि भक्त उनका पूजन करते तो इससे उन्हें कोई प्रसन्नता होती और यदि कोई उनकी उपेक्षा करता तो न कोई दुःख ही होता । वे सुख और दुःख की भावना से परे हो चुके थे ।

अनिद्रा
बान्द्रा के एक महाशय कायस्थ प्रभु बहुत दिनों से नींद न आने के कारण अस्वस्थ थे । जैसे ही वे सोने लगते, उनके स्वर्गवासी पिता स्वप्न में आकर उन्हें बुरी तरह गालियाँ देते दिखने लगते थे । इससे निद्रा भंग हो जाती और वे रात्रिभर अशांति महसूस करते थे । हर रात्रि को ऐसी ही होता था, जिससे वे किंकर्तव्य-विमूढ़ हो गये । एक दिन बाब के एक भक्त से उन्होंने इस विषय मे परामर्श किया । उसने कहा कि मैं तो संकटमोचन सर्व-पीड़ा-निवारिणी उदी को ही इसकी रामबाण औषधि मानता हूँ, रजो शीघ्र ही लाभदायक सिदृ होगी । उन्होंने एक उदी की पुड़िया देकर कहा कि इसे शयन के पूर्व माथे पर लगाकर अपने सिरहाने रखो । फिर तो उन्हें निर्विघ्र प्रगाढ़ निद्रा आने लगी । यह देखकर उन्हें महान् आश्चर्य और आनन्द हुआ । यह क्रम चालू रखकर वे अब साईबाबा का ध्यान करने लगे । बाजार से उनका एक चित्र लाकर उन्होंने अपने सिरहाने के पासा लगाकर उनका नित्य पूजन करना प्रारम्भ कर दिया । प्रत्येक गुरुवार को वे हार और नैवेघ अर्पण करने लगे । वे अब पूर्ण स्वस्थ हो गये और पहले के सारे कष्टों को भूल गये ।

बालाजी पाटील नेवासकर
ये बाबा के परम भक्त थे । ये उनकी निष्काम सेवा किया करते थे । दिन में जिन रास्तों से बाबा निकलते थे, उन्हें वे प्रातःकाल ही उठकर झाडू लगाकर पूर्ण स्वच्छ रखते थे । इनके पश्चात यह कार्य बाबा की एक परमभक्त महिला राधाकृष्ण माई ने किया और फिर अब्दुल ने । बालाजी जब अपनी फसल काटकर लाते तो वे सब अनाज उन्हें भेंट कर दिया करते थे । उसमें से जो कुछ बाबा उन्हें लौटा देते, उसी से वे अपने कुटुम्ब का भरणपोषण किया करते थे, यह क्रम अनेक वर्षों तक चला और उनकी मृत्यु के पश्चात भी उनके पुत्र ने इसे जारी रखा ।

उदी की शक्ति और महत्व
एक बार बालाजी के श्रादृ दिवस की वार्षकी (बरसी) के अवसर पर कुछ व्यक्ति आमंत्रित किये गये । जितने लोगों के लिये भोजन तैयार किया गया, उससे कहीं तिगुने लोग भोजन के समय एकत्रित हो गये । यह देख श्रीमती नेवासकर किंकर्तव्यविमूढ़ सी हो गई । उन्होंने सोचा कि यह भोजन सबके लिये पर्याप्त न होगा और कहीं कम पड़ गया तो कुटुम्ब की भारी अपकीर्ति होगी । तब उनकी सास ने उनसे सांत्वना-पूर्ण शब्दों में कहा कि चिन्ता न करो । यह भोजन-सामग्री हमारी नही, यह तो श्री साईबाबा की है । प्रत्येक बर्तन में उदी डालकर उन्हें वस्त्र से ढँक दो और बिना वस्त्र हटाये सबको परोस दो । वे ही हमारी लाज बचायेंगे । परामर्श के अनुसार ही किया गया । भोजनार्थियों के तृप्तिपूर्वक भोजन करने के पश्चात् भी भोजन सामग्री यथेष्ठ मात्रा मे शेष देखकर उन लोगों को महान् आश्चर्य और प्रसन्नता हुई । यथार्थ में देखा जाये तो जैसा जिसका भाव होता है, उसके अनुकूल ही अनुभव प्राप्त होता है । ऐसी ही घटना मुझे प्रथम श्रेणी के उपन्यायाधीश तथा बाबा के परम भक्त श्री बी.ए. चौगुले ने बतलाई । फरवरी, सन् 1943 में करजत (जिला अहमदनगर) में पूजा का उत्सव हो रहा था, तभी इस अवसर पर एक बृहत् भोज का आयोजन हुआ । भोजन के समय आमंत्रित लोगों से लगभग पाँच गुने अधिक भोजन के लिये आये, फिर भी भोजन सामग्री कम नहीं हुई । बाबा की कृपा से सबको भोजन मिला, यह देख सबको आश्चर्य हुआ ।

साईबाबा का सर्प के रुप में प्रगट होना
शिरडी के रघु पाटील एक बार नेवासे के बालाजी पाटील के पास गये, जहाँ सन्ध्या को उन्हें ज्ञात हुआ कि एक साँप फुफकारता हुआ गौशाला में घुस गया है । सभी पशु भयभीत होकर भागने लगे । घर के लोग भी घबरा गये, परन्तु बालाजी ने सोचा कि श्रीसाई ही इस रुप में यहाँ प्रगट हुए है । तब वे एक प्याले में दूध ले आये और निर्भय होकर उस सर्प के सम्मुख रखकर उनको इस प्रकार सम्बधित कर कहने लगे कि बाबा । आप फुफकार कर शोर क्यों कर रहे है । क्या आप मुझे भयभीत करना चाहते है । यह दूध का प्याला लीजिये और शांतिपूर्वक पी लीजिये । ऐसा कहकर वे बिना किसी भय के उसके समीप ही बैठ गये । अन्य कुटुम्बी जन तो बहुत घबड़ा गये और उनकी समझ में न आ रहा था कि अब वे क्या करें । थोड़ी देर में ही सर्प अदृश्य हो गया और किसी को भी पता न चला कि वह कहाँ गया । गोशाला में सर्वत्र देखने पर भी वहाँ उसका कोई चिन्हृ न दिखाई दिया ।
एक ऐसी ही घटना साई-साधु-सुधा (भाग 3 नं. 7-8, जनवरी 43, पृष्ठ 26) में प्रकाशित है कि बाबा कोयंबटूर (दक्षिण भारत) में 7 जनवरी, सन् 43 गुरुवार की सन्ध्या को साढ़े तीन बजे सर्प के रुप में प्रगट हुए, जहाँ उस सर्प ने भजन सुनकर दूध और फूल स्वीकार किये तथा हजारों लोगों की भीड़ को दर्शन देकर अपनी फोटो भी उतारने दिया । फोटो उतारते समय, बाबा का चित्र भी उसके समीप रखकर दोनों की ही फोटो उतारी गई । चित्र और अन्य ववरण के लिये पाठकों से प्रार्थना है कि वे उपयुक्त पत्रिका का अवश्य अवलोकन करें ।
।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 23 November 2022

श्री साईं लीलाएं...चोलकर को शक्कर की चाय पिलाओ

 ॐ सांई राम


कल हमने पढ़ा था..दासगणु की वेशभूषा

श्री साईं लीलाएं...चोलकर को शक्कर की चाय पिलाओ

अब तक साईं बाबा का प्रसिद्धि पूना और अहमदनगर तक फैल चुकी थी| दासगणु के मधुर कीर्तन के कारण बाबा का यश कोंकण तक व्याप्त हो चुका था| लोगों को उनका कीर्तन करना बहुत अच्छा लगता था और उनके कीर्तन का प्रभाव लोगों के हृदयों पर गहरे तक पड़ता था|


एक बार श्रोताओं के कहने पर महाराज ठाणे के कौपीनेश्वर मंदिर में कीर्तन करते हुए साईं बाबा का गुणगान कर रहे थे| श्रोताओं में एक चोलकर नाम का व्यक्ति भी उपस्थित था| वह ठाणे की दीवानी अदालत में अस्थायी कर्मचारी था|
उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी| चोलकर दासगणु महाराज का कीर्तन सुनकर बड़ा प्रभावित हुआ| उसने मन-ही-मन बाबा के श्री चरणों में प्रणाम किया और साईं प्रार्थना की कि - "हे साईं बाबा ! मेरी हालत से आप परिचित हैं|
परिवार का भरण-पोषण बड़ी मुश्किल से हो पाता है| यदि आपकी कृपा से मैं विभागीय परीक्षा में सफल हो गया तो आपके चरण-कमलों में उपस्थित होकर आपके नाम से मिश्री का प्रसाद बांटूंगा|"

चोलकर विभागीय परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया और वो स्थायी कर्मचारी हो गया| अपनी मनन्त याद होते हुए भी वह हालात की वजह से शिरडी न जा सका| एक तरफ गरीबी और दूसरी तरफ बड़ा परिवार| ऐसे में शिरडी जाने के लिए पैसा इकट्ठा करना बहुत मुश्किल कार्य था| लेकिन जब दिन पर दिन बीतने लगे तो वह बेचैनी बढ़ती जा रही थी| आखिर में उसने एक कठोर निर्णय किया| उसने शक्कर खाना छोड़ दी और चाय भी फीकी पीने लगा| अन्य खर्चे भी कम कर दिये|

इस तरह पैसा जोड़कर वह एक दिन शिरडी पहुंचा| शिरडी में पहुंचकर बाबा के श्री चरणों में प्रणाम करके अपनी मनन्त बताकर वहां उपस्थित सभी भक्तों में मिश्री का प्रसाद बांट दिया| फिर बाबा से बोला - "बाबा आपकी कृपा-आशीर्वाद से मेरी मनोकामना पूर्ण हो गयी और आज आपके दर्शन कर मैं धन्य हो गया|"

उस समय बापू साहब जोग भी वहां पर उपस्थित थे| उन्होंने चोलकर का आतिथ्य किया था| जब वे दोनों मस्जिद से जाने लगे तो बाबा ने बापू साहब जोग से कहा, अपने मेहमान को चाय में खूब शक्कर मिलाकर पिला| चोलकर ने जब बाबा के श्रीमुख से ये वचन सुने तो उसका दिल भर आया और आँखों से आँसू बहने लगे| वह भावविह्वल हो बाबा के चरणों में गिर पड़ा| बापू साहब हैरान थे कि बाबा के कहने का मतलब क्या हैं? बाबा के कहने का संकेत यह था कि उन्हें चोलकर द्वारा शक्कर छोड़ने के बारे में पता है|

परसों चर्चा करेंगे... छिपकली बहनों का मिलन


ॐ सांई राम
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं

बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Tuesday, 22 November 2022

श्री साईं लीलाएं - दासगणु की वेशभूषा

ॐ सांई राम


कल हमने पढ़ा था..रतनजी शापुरजी की दक्षिणा

श्री साईं लीलाएं - दासगणु की वेशभूषा

एक समय दासगणु महाराज हरिकथा कीर्तन के लिए शिरडी आये थे| उनका कीर्तन होना भक्तों को बहुत आनंद देता था| सफेद धोती, कमीज, ऊपरी जरी का गमछा और सिर पर शानदार पगड़ी पहने और ऊपर से मधुर आवाज दासगणु का यह अंदाज श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता था| उनका कीर्तन सुनने के लिए दूर-दूर से श्रोताओं की भारी भीड़ एकत्रित हुआ करती थी|

एक दिन दासगणु महाराज कीर्तन के लिए पूरी पोशाक पहन, सज-धजकर जाने से पहले साईं बाबा को प्रणाम करने मस्जिद पहुंचे तो बाबा ने उन्हें देखकर कहा - "अच्छा, दूल्हे राजा इतना बन-ठनकर कहां जा रहे हो?" तब दासगणु ने कहा - "बाबा ! मैं कीर्तन करने जा रहा हूं|"

बाबा ने पूछा - "हरि कीर्तन करनेवालों को यह सब चमक-दमक और दिखावे की क्या आवश्यकता है? चलो, इनको अभी मेरे सामने उतारो|" बाबा की आज्ञानुसार दासगणु महाराज ने भारी कपड़े उतार दिये और मात्र एक धोती पहनकर मंजीरे के साथ हरि कथा कीर्तन करना शुरू कर दिया| इसके बाद दासगणु महाराज ने कीर्तन के समय शरीर पर धोती के अलावा अन्य वस्त्र धारण नहीं किए| बाबा को कीर्तन के लिए कपड़ों से अधिक सादगी पंसद थी|
 

कल चर्चा करेंगे... चोलकर को शक्कर की चाय पिलाओ


ॐ सांई राम

ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं

बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Monday, 21 November 2022

श्री साईं लीलाएं - रतनजी शापुरजी की दक्षिणा

ॐ सांई राम



कल हमने पढ़ा था..ऊदी और आशीर्वाद का चमत्कार


श्री साईं लीलाएं - रतनजी शापुरजी की दक्षिणा

नांदेड में रहनेवाले रतनजी शापुरजी वाडिया एक फारसी सज्जन थे| उनका बहुत बड़ा व्यवसाय था| किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी| प्रकृति से वो बहुत धार्मिक थे| अपने दान-धर्म की वजह से वे बहुत प्रसिद्ध थे| ईश्वर की कृपा से उनके पास सब कुछ था| यदि उनके जीवन में किसी चीज की कमी थी तो वह एक संतान की| संतान के लिए तरसते थे| वह संतान पाने के लिए सदैव प्रभु से प्रार्थना करते थे| वे गरीबों और जरूरतमंदों की भोजन, वस्त्र आदि सब तरह से मदद भी किया करते थे| संतान-प्राप्ति की चिंता में वह दिन-रात व्यथित रहते| बिना बच्चों के सूना-सूना घर उनको मानो खाने को दौड़ता| वह अपने मन में सोचते कि क्या प्रभु मुझे संतान देने की कृपा करेंगे या मैं बिना संतान के ही रहूंगा| चिंतित रहने के कारण अब तो उन्हें भोजन करना भी अच्छा नहीं लगता था|

रतनजी की दासगणु के प्रति बहुत निष्ठा थी| इसलिए एक दिन उन्होंने दासगणु महाराज को अपने मन की बात कह डाली| दासगणु महाराज ने उन्हें शिरडी जाकर साईं बाबा की शरण में जाकर संतान-प्राप्ति के लिए प्रार्थना करने को कहा| साईं बाबा तुम पर अवश्य मेहरबान हो जायेंगे और तुम्हारी इच्छा भी अवश्य पूर्ण होगी| दासगणु महाराज की बात सुनकर रतनजी के मन में आशा की एक किरण जाग उठी, उन्होंने शिरडी जाने का निर्णय कर लिया|

कुछ दिनों बाद रतनजी शिरडी पहुंचे और मस्जिद पहुंचकर साईं बाबा के दर्शन कर, उनके श्री चरणों में फूल-फल आदि की भेंट रख उन्हें गले में हार पहनाया, फिर बाबा के श्री चरणों के पास बैठकर प्रार्थना कि - "बाबा ! जो भी दु:खी आपकी चौखट पर अपने दुःख लेकर आया, वह सुखों से अपनी झोली भरकर ही गया| आपकी प्रसिद्धि सुनकर मैं आपकी शरण में आया हूं| मुझे पूरा विश्वास है कि आप मुझे खाली हाथ नहीं लौटयेंगे|"

रतनजी की प्रार्थना सुनकर बाबा ने मुस्कराते हुए दक्षिणा में पांच रुपये मांगे| रतनजी तुरंत देने को तैयार थे| पर बाबा तुरंत बोले - "अरे, मैं तुमसे तीन रुपये चौदह आने पहले ही ले चुका हूं इसलिए अब बाकी के पैसे दे दो|"

साईं बाबा के यह वचन सुनकर रतनजी सोचने लगे कि वह तो जीवन में पहली बार शिरडी आये हैं, फिर बाबा को तीन रुपये चौदह आने कब और कैसे मिले, यह बात उनकी जरा भी समझ में नहीं आयी| फिर उन्होंने मौन रहते हुए बाबा को बाकी की दक्षिणा दे दी और हाथ जोड़कर बाबा से प्रार्थना की - "बाबा ! मैं अज्ञानी आपकी पूजा करने का ढंग नहीं जानता हूं| बड़े भाग्य से आपके श्री चरणों के दर्शन करने का अवसर मिला है| आप सबके मन की बात जानते हैं, मेरा दुःख भी आपसे छिपा नहीं है| आपसे उसे दूर करने की प्रार्थना है|"

रतनजी की प्रार्थना सुनकर बाबा को उस पर दया आ गई और बाबा बोले - "तू बिल्कुल चिंता मत कर| तेरे बुरे दिन अब बीत गये| अल्लाह तेरी मुराद अवश्य पूर्ण करेगा|" फिर बाबा ने उसके सिर पर अपना वरदहस्त रखकर ऊदी प्रसाद स्वरूप दी| फिर बाबा में रतनजी बाबा से आज्ञा लेकर नांदेड लौट आये| वहां पर आकर वे दासगणु महाराज से मिले और उन्हें शिरडी में अपने साथ घटी सारी बात विस्तार से बता दी| फिर बोले - "महाराज ! मैंने इससे पहले बाबा को कभी न देखा और न ही मिला, फिर बाबा ने तीन रुपये और चौदह आने मिलने की बात क्यों कही? मैं कुछ समझा नहीं| अब आप ही रहस्य को समझाइये|" वे भी बहुत दिनों तक विचार करते रहे कि बाबा ने कहा है तो इसमें कुछ-न-कुछ सच्चाई अवश्य है|

सोचते-सोचते उन्हें अचानक एक दिन याद आया कि कुछ दिनों पहले रतनजी ने एक औलिया मौला साहब को अपने घर आमंत्रित किया था| इसके लिए कुछ धन भी खर्च किया था| मौला साहब नांदेड के प्रसिद्ध संत थे जो अपनी रोजी-रोटी के लिए मेहनत किया करते थे| शिरडी जाने से कुछ दिन पहले रतनजी ने उन्हें अपने घर बुलाकर खाना खिलाकर उनका सम्मान किया था|

दासगणु महाराज ने रतनजी से उस आतिथ्य खर्च की सूचि मांगी| जब उन्होंने खर्च की गयी राशि का जोड़ किया तो वे यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि उस दिन उनके आतिथ्य पर जो खर्च हुआ था उसका योग तीन रुपये चौदह आने थे| इससे यह बात सिद्ध होती है कि साईं बाबा अंतर्यामी थे| वे शिरडी में ही रहते थे| लेकिन उन्हें सब जगह क्या हो रहा है, इसका पहले से ही पता रहता था| यह जानकर रतनजी बाबा के भक्त बन गये| फिर यथासमय रतनजी की पत्नी गर्भवती हुई और समय होने पर उन्हें साईं बाबा की कृपा से पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई तो उनकी खुशी का पारावार न रहा और वह साईं बाबा की जय-जयकार करने लगे|


कल चर्चा करेंगे... दासगणु की वेशभूषा


ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

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बाबा के 11 वचन

ॐ साईं राम

1. जो शिरडी में आएगा, आपद दूर भगाएगा
2. चढ़े समाधी की सीढी पर, पैर तले दुःख की पीढ़ी कर
3. त्याग शरीर चला जाऊंगा, भक्त हेतु दौडा आऊंगा
4. मन में रखना द्रढ विश्वास, करे समाधी पूरी आस
5. मुझे सदा ही जीवत जानो, अनुभव करो सत्य पहचानो
6. मेरी शरण आ खाली जाए, हो कोई तो मुझे बताए
7. जैसा भाव रहे जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मनका
8. भार तुम्हारा मुझ पर होगा, वचन न मेरा झूठा होगा
9. आ सहायता लो भरपूर, जो माँगा वो नही है दूर
10. मुझ में लीन वचन मन काया, उसका ऋण न कभी चुकाया
11. धन्य-धन्य व भक्त अनन्य, मेरी शरण तज जिसे न अन्य

.....श्री सच्चिदानंद सदगुरू साईनाथ महाराज की जय.....

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः॒ स्वः॒
तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यम्
भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि।
धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥

Word Meaning of the Gayatri Mantra

ॐ Aum = Brahma ;
भूर् bhoor = the earth;
भुवः bhuwah = bhuvarloka, the air (vaayu-maNdal)
स्वः swaha = svarga, heaven;
तत् tat = that ;
सवितुर् savitur = Sun, God;
वरेण्यम् varenyam = adopt(able), follow;
भर्गो bhargo = energy (sin destroying power);
देवस्य devasya = of the deity;
धीमहि dheemahi = meditate or imbibe

these first nine words describe the glory of Goddheemahi = may imbibe ; pertains to meditation

धियो dhiyo = mind, the intellect;
यो yo = Who (God);
नः nah = our ;
प्रचोदयात prachodayat = inspire, awaken!"

dhiyo yo naha prachodayat" is a prayer to God


भू:, भुव: और स्व: के उस वरण करने योग्य (सूर्य) देवता,,, की (बुराईयों का नाश करने वाली) शक्तियों (देवता की) का ध्यान करें (करते हैं),,, वह (जो) हमारी बुद्धि को प्रेरित/जाग्रत करे (करेगा/करता है)।


Simply :

तीनों लोकों के उस वरण करने योग्य देवता की शक्तियों का ध्यान करते हैं, वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।


The God (Sun) of the Earth, Atmosphere and Space, who is to be followed, we meditate on his power, (may) He inspire(s) our intellect.