शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

************************************

निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

************************************

Monday, 23 July 2018

श्री साईं लीलाएं - बाबा की आज्ञा का पालन अवश्य हो

ॐ सांई राम





कल हमने पढ़ा था.. बाबा को खुशहालचंद की चिंता   
श्री साईं लीलाएं

बाबा की आज्ञा का पालन अवश्य हो

रहाता शिरडी की दक्षिण दिशा और नीम गांव उत्तर दिशा में बसा हुआ था| इन दोनों गांवों के मध्य में बसा था शिरडी| पर साईं बाबा अपने पूरे जीवनकाल में इन दोनों गांव के बाहर कभी नहीं गए| न ही बाबा न रेलगाड़ी देखी थी और न ही उसमें कभी सफर ही किया था| फिर भी साईं बाबा को शिरडी से जाने वाली रेलगाड़ी के सही समय की जानकारी रहती थी|बाबा शिरडी आने वाले प्रत्येक भक्त को सही मार्ग बड़े प्यार से दिखाते, उसके संकट से उसे मुक्ति दिलाते| जो बाबा का कहना मानता वह हर समय सुरक्षित रहता और जा बाबा के कहने को नहीं मानता वह स्वयं ही संकटों में घिर जाता| शिरडी की एक विशेषता यह थी, कि जो भी शिरडी आता, वह बाबा की मर्जी से ही आता और लौटता भी बाबा की मर्जी से ही| यदि कोई बाबा से वापस जाने की आज्ञा मांगता तो बाबा बड़े सहज भाव से कहते - 'अरे ! ठहर जरा! दाल-रोटी खाकर जाना|' यदि बाबा की आज्ञा को न मानकर जल्दबाजी में ऐसे ही निकलता तो गाड़ी भी छूटती और खाना भी नसीब न होता तथा बाबा की आज्ञा की अवहेलना करने पर कोई दुर्घटना का शिकार हो जाता|एक बार की बात है तात्या कोते पाटिल बाजार जाने के लिए घर से चला और मस्जिद के पास तांगा रोककर बाबा के चरण स्पर्श किये और फिर बाबा से निवेदन किया कि - "बाबा मैं कोपर गांव के बाजार जा रहा हूं, आज्ञा दें|"बाबा ने कहा - "तात्या ! आज गांव मत छोड़ो, बाजार रहने दो|" लेकिन तात्या नहीं माना| फिर उसकी जिद्द को देखते हुए बाबा बोले - "अच्छा ! अगर जा ही रहा है तो अपने साथ शामा को भी ले जा|"पर तात्या कोते ने बाबा की बात सुनी-अनसुनी कर तांगे पर सवार होकर अकेला ही चल दिया| उस तांगे में एक तेज दौड़ने वाला घोड़ा भी था जो बड़ा चंचल था| शिरडी से तीन मील आगे सांवली विहार गांव के पास पहुंचते ही वह घोड़ा बड़ी तेजी के साथ उल्टी-सीधी दौड़ लगाने लगा| परिणाम यह हुआ कि घोड़े की कमर में मोच आ जाने से घोड़ा जमीन पर गिर पड़ा तथा तांगे का नुकसान भी बहुत हो गया| तात्या कोते को चोट तो नहीं लगी, पर साईं बाबा द्वारा आज्ञा ने देने की बात उसे अवश्य याद आ गयी|तात्या कोते ने एक बार पहले भी साईं बाबा की आज्ञा का उल्लंघन किया था| जब वह तांगे से कोल्हर गांव जा रहा था और घोड़ा बेकाबू होकर बबूल के पेड़ से जा टकराया था| तांगा टूट गया था| घटना जानलेवा थी पर बाबा की कृपा से ही वह बाल-बाल बच गया था| इसके बाद तात्या ने फिर कभी भी बाबा की बात नहीं टाली|

कुछ इस तरह का अनुभव साईं सच्चरित्र लिखने वाले गोविन्द रघुनाथ दामोलकर का रहा है| एक बार वह शिरडी अपने परिवार के साथ गये थे| वे वापस जाने के लिए जब साईं बाबा से आज्ञा मांगी तो बाबा ने कहा, खाना खाकर जाना, जल्दबाजी में बाबा की आज्ञा ने मानते हुए शिरडी छोड़ी| रेलगाड़ी पकड़ने के लिए उन्होंने रास्ते में बैलगाड़ी वाले से गाड़ी तेज चलाने को कहा| जिसका नतीजा यह हुआ कि बैलगाड़ी का पहिया टूटकर नाले में जा गिरा| बाबा के आशीर्वाद से किसी को कुछ नहीं हुआ, पर गाड़ी को ठीक-ठाक करके जाने तक रेलगाड़ी निकल चुकी थी| जिस कारण, उन्हें एक दिन कोपर गांव में रहकर दूसरे दिन गाड़ी से मुम्बई जाना पड़ा|



यूरोप के रहनेवाले एक अंग्रेज जो मुम्बई में रहा करते थे| वह अपने मन में कुछ इच्छा लेकर बाबा के दर्शन करने को आया था| उसे बाबा के भक्तों ने एक शानदार तम्बू में ठहरा दिया| उसके मन में यह इच्छा थी कि वह बाबा को सिर झुकाकर उनके कर-कमलों को चुम्बन करे| अपनी इस इच्छा को पूरी करने के लिए वह तीन बार मस्जिद की सीढ़ियों पर चढ़ना चाहा, पर हर बार बाबा ने उसे सीढ़ियों पर चढ़ने से मना कर दिया| उसे आँगन में रहकर ही दर्शन कर लेने को कहा गया| इससे वह निराश हो गया| उसने शीघ्र ही शिरडी से वापस जाने का मन बना लिया|लौटते समय जब वह बाबा के पास आज्ञा लेने आया तो बाबा ने कहा - "इतनी भी जल्दी क्या है, कल चले जाना|" लेकिन वह मानने को तैयार नहीं हुआ| वहां उपस्थित बाबा के भक्तों ने उसे बाबा की आज्ञा मान लेने को कहा, लेकिन वह नहीं माना| वह तांगे में बैठकर चल दिया| तांगा अभी सांवली विहार गांव तक ही पहुंचा था कि अचानक सामने से एक साइकिलसवार आ गया जिससे घोड़े बिदक गये और अत्यन्त तेजी से दौड़ने लगे| परिणामत: तांगा पलट गया और वह गिरकर घायल हो गये| वहां मौजूद लोगों की मदद से तांगेवाले ने उन्हें उठाकर कोपर गांव के अस्पताल में भर्ती कराया| जहां उन्हें कई दिनों तक रहना पड़ा|



मुम्बई निवासी रघुवीर भास्कर पुरंदरे एक बार अपने परिवार के साथ शिरडी गये थे| लौटते समय अपनी माँ की इच्छानुसार उन्होंने नासिक होकर जाने के लिए साईं बाबा की अनुमति मांगी, तो बाबा बोले, - "ठीक है, पर नासिक में दो दिन रुकना, फिर आगे जाना|" पुरंदरे जब शिरडी से नासिक आये तो उसी दिन उनके छोटे भाई को तेज बुखार हो गया| यह देखते परिवार के सब लोग मुम्बई जाने के लिए जिद्द करने लगे| तब बाबा ने उन्हें बाबा के वचन याद दिलाये और अपना फैसला सुना दिया, कि चाहे कुछ भी हो जाये, मैं दो दिन बाद ही यहां से जाऊंगा|" फिर उन्हें मजबूरी में वहां रहना पड़ा| दूसरे दिन बुखार किसी जादू की तरह अपने आप गायब हो गया और फिर तीसरे दिन सभी प्रसन्नता से मुम्बई लौट आये|



एक बार नाना साहब चाँदोरकर और दो अन्य साथी तथा एक कीर्तनकार मिलकर साईं बाबा के दर्शन करने के लिए शिरडी आये| बाबा के दर्शन कर लेने के बाद वापस लौटने के लिए कीर्तनकार जल्दी करने लगे| उनका कीर्तन अहमदनगर में पहले से निश्चित था| यह जानकर चाँदोरकर से लौटने के लिए बाबा से अनुमति मांगी तो बाबा ने उन्हें भोजन, प्रसाद खाकर जाने के लिए कहा, लेकिन वे कीर्तनकार नहीं माने और चाँदोरकर के साथ वाले एक सज्जन के साथ रेलवे स्टेशन की ओर चल पड़े| चाँदोरकर और एक सज्जन वहीं पर रुक गये| दोपहर को भोजन, प्रसाद खाकर जब वे बाबा से मिलने गये तो साईं बाबा बोले - "आराम से जाओ| अभी गाड़ी के लिए देर है|"जब दोनों स्टेशन पर पहुंचे तो गाड़ी देर से आने वाली थी और कीर्तनकार और उनके साथी गाड़ी के लिए बैठे थे| इनको देखकर वे बोले - "आपने बाबा का कहना मानकर अच्छा ही किया| हम बाबा की बात न मानकर अभागे निकले, तभी तो हमें यहां भूखा-प्यासा तड़पने बैठने की नौबत आयी|" फिर गाड़ी आने के बाद सब चले गये|


एक बार तात्या साहब नूलकर और भाऊ साहब दीक्षित अपने कुछ साथियों के साथ शिरडी साईं बाबा के दर्शन करने के लिये आये थे| जब वह वापस लौटने लगे तब उन्होंने साईं बाबा से अनुमति मांगी, तो साईं बाबा बोले - "कल चले जाओ और जाते-जाते कोपर गांव के भोजनालय में खाना भी खा लेना|" उन्होंने वैसा ही किया और कोपर गांव भोजनालय में संदेशा भी भिजवा दिया| लेकिन जब दूसरे दिन कोपर गांव पहुंचे तो खाना बनने में अभी कुछ समय लगना था| यह देखते ही गाड़ी पकड़ने के लिए वह बिना खाने खाये, वैसे ही स्टेशन चले गये, तो वहां पता चला कि अभी रेलगाड़ी दो घंटे देरी से आयेगी| फिर उन्होंने तांगा भेजकर भोजनालय से भोजन मंगाया और वहीं स्टेशन पर खाया| दस मिनट बाद रेलगाड़ी आयी और फिर सब लोग आगे रवाना हो गए|

कल चर्चा करेंगे... बांद्रा गया भूखा ही रहा 

ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Sunday, 22 July 2018

श्री साईं लीलाएं- बाबा को खुशहालचंद की चिंता

ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. तात्या और म्हालसापति को बाबा का सानिध्य      

श्री साईं लीलाएं
बाबा को खुशहालचंद की चिंता

शिरडी से कुछ दूरी पर रहाता गांव था| वहां खुशालचंद नाम का एक साहूकार रहता था| बाबा इससे भी तात्या जितना प्रेम किया करते थे| वह जाति से मारवाड़ी था| उसके चाचा चंद्रभान पर भी बाबा का बड़ा प्रेम था| उनसे मिलने के लिए बाबा कई बार उनके गांव खुद चले जाते थे|बाबा कभी-कभी अकेले और कभी अपने भक्तों के साथ बैलगाड़ी में तो कभी तांगे में बैठकर रहाता चले जाते| जैसे ही बाबा गांव की सीमा पर पहुंचते, रहाता ग्रामवासी उनका अभूतपूर्व स्वागत करते और बड़ी धूमधाम से उन्हें गांव के अंदर ले जाते| वहां से खुशालचंद बाबा को घर ले जाते, आसन पर बैठाकर उत्तम भोजन कराते| फिर काफी समय तक वह बाबा से वार्तालाप करते| इस वार्तालाप के दौरान वहां उपस्थित सभी भक्तों को बहुत आनन्द आता| बाद में बाबा सबकी अपना आशीर्वाद देकर शिरडी लौट आते थे|खुशालचंद भी अक्सर साईं बाबा से मिलने के लिए शिरडी आता था| एक समय जब वह बहुत दिनों तक शिरडी नहीं आया तो बाबा ने उसे बुलाने के लिए हरीसिंह दीक्षित को तांगे के साथ भेजा| जब दीक्षित ने उसे जानकारी दी कि बाबा ने उसे लाने के लिए तांगा देकर भेजा है तो यह सुनते ही उसकी आँखों में आँसू आ गये और वह तुरंत उसके साथ शिरडी आया|कल चर्चा करेंगे... बाबा की आज्ञा का पालन अवश्य हो         


ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Saturday, 21 July 2018

श्री साईं लीलाएं- तात्या और म्हालसापति को बाबा का सानिध्य

ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. बाइजाबाई द्वारा साईं सेवा     
श्री साईं लीलाएं
तात्या और म्हालसापति को बाबा का सानिध्य
तात्या कोते पाटिल और खडोबा मंदिर के पुजारी म्हालसापति दोनों ही साईं बाबा के परम भक्त थे और साईं बाबा भी दोनों से बहुत स्नेह किया करते थे| ये दोनों रात को बाबा के साथ मस्जिद में ही सोया करते थे| इस लोगों का सोने का ढंग भी बड़ा अजीब था| ये तीनों सिरों को पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशा की ओर करते थे और तीनों के पैर बीच में आपस में एक जगह मिले हुए होते थे| फिर इस तरह लेटे-लेटे तीनों देर रात तक बातचीत और चर्चा करते रहते थे| यदि इस बीच में किसी को नींद आने लगती तो दूसरा उसे जगा देता था| जब तात्या खर्रांटे लेने लगता तो बाबा उसे उठकर हिलाते| कभी-कभी म्हालसापति और बाबा मिलकर तात्या को अपनी तरफ खींचकर पैरों को धकेलकर पीठ थपथपा दिया करते थे| कभी उसके हाथ-पैर दबाते|यह सिलसिला चौदह साल तक चला - जब तात्या और म्हालसापति दोनों बाबा के साथ मस्जिद में सोया करते थे| लेकिन जब तात्या के पिता की मृत्यु हो गयी तब घर की जिम्मेदारी निभाने के लिए घर में रहना और सोना जरूरी हो गया|ऐसे सौभाग्यशाली थे तात्या और म्हालसापति जिन्हें बाबा के साथ शयन करने का अवसर मिला|

कल चर्चा करेंगे... बाबा को खुशहालचंद की चिंता        


ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Friday, 20 July 2018

श्री साईं लीलाएं - बाइजाबाई द्वारा साईं सेवा

ॐ सांई राम



परसों हमने पढ़ा था.. साईं बाबा द्वारा भिक्षा माँगना        

श्री साईं लीलाएं
बाइजाबाई द्वारा साईं सेवा
साईं बाबा पूर्ण सिद्धपुरुष थे और उनका कार्य-व्यवहार भी बिल्कुल सिद्धों जैसा ही था| उनके इस व्यवहार को देखकर शुरू-शुरू में शिरडी को लोग उन्हें पागल समझते थे और पागल फकीर कहते थे| बाद में बाबा इसी पागल सम्बोधन से प्रसिद्ध भी हो गए| जबकि साईं बाबा बाह्य दृष्टि से जैसे दिखाई देते थे, वास्तव में वे वैसे थे ही नहीं| बाबा उदार हृदय, और त्याग की साक्षात् मूर्ति थे| उनका हृदय महासागर की तरह बिल्कुल शांत था| लेकिन शिरडी में कुछ लोग ऐसे भी थे, जो बाबा को ईश्वर मानते थे| उनमे एक थी वाइजाबाई|


वाइजाबाई एक भद्र महिला वे तात्या कोते पाटिल की माता थीं| उन्होंने अपने पूरे जीवन में साईं बाबा की बहुत सेवा की थी| रोजाना दोपहर को वे एक टोकरी में रोटी और भाजी लेकर बाबा को ढूंढती-फिरतीं, कड़ी धूप में भी दो-चार मील घूमतीं, जहां पर भी उन्हें बाबा मिलते, उन्हें बड़े प्यार से अपने हाथों से खिलातीं| जब कभी बाबा अपनी ध्यानावस्था में मग्न बैठे रहते, तो वह घंटों बैठे उनके होश में आने का इंतजार करतीं| आंख खुलने पर उन्हें जबरन खिलातीं| साईं बाबा भी वाइजाबाई की इस सेवा को अपने अंतिम समय तक नहीं भुला पाए| वाइजाबाई और उसके पुत्र तात्या कोते की भी साईं बाबा के प्रति गहन निष्ठा और श्रद्धा थी| वाइजाबाई की सेवा का प्रतिफल बाद में उसके पुत्र तात्या कोते को भी दिया|


साईं बाबा वाइजाबाई और तात्या कोते से यही कहा करते थे कि फकीरी ही सच्ची अमीरी है| वह अनंत है| जिसे अमीरी कहते हैं वह तो एक दिन समाप्त हो जाने वाली है| वाइजाबाई की सेवा को साईं बाबा ने समझ लिया और फिर उन्होंने भटकना छोड़ दिया और मस्जिद में रहकर ही भोजन करने लगे| वाइजाबाई की मृत्यु के पश्चात् उसके बेटे ने भी यह सिलसिला जारी रखा| वह भी बाबा के लिए भोजन लाता|
कल चर्चा करेंगे... तात्या और म्हालसापति को बाबा का सानिध्य       


ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Thursday, 19 July 2018

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 3

ॐ सांई राम




आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं |
हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है |
हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा| किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है|

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 3
---------------------------------
श्री साईंबाबा की स्वीकृति, आज्ञा और प्रतीज्ञा, भक्तों को कार्य समर्पण, बाबा की लीलाएँ ज्योतिस्तंभ स्वरुप, मातृप्रेम–रोहिला की कथा, उनके मधुर अमृतोपदेश ।
--------------------------------


श्री साईंबाबा की स्वीकृति और वचन देना
----------------------------------------------


जैसा कि गत अध्याय में वर्णन किया जा चुका है, बाबा ने सच्चरित्र लिखने की अनुमति देते हुए कहा कि सच्चरित्र लेखन के लिये मेरी पूर्ण अनुमति है । तुम अपना मन स्थिर कर, मेरे वचनों में श्रदृा रखो और निर्भय होकर कर्त्तव्य पालन करते रहो । यदि मेरी लीलाएँ लिखी गई तो अविघा का नाश होगा तथा ध्यान व भक्तिपूर्वक श्रवण करने से, दैहिक बुदि नष्ट होकर भक्ति और प्रेम की तीव्र लहर प्रवाहित होगी और जो इन लीलाओं की अधिक गहराई तक खोज करेगा, उसे ज्ञानरुपी अमूल्य रत्न की प्राप्ति हो जायेगी । इन वचनों को सुनकर हेमाडपंत को अति हर्ष हुआ और वे निर्भय हो गये । उन्हें दृढ़ विश्वास हो गया कि अब कार्य अवश्य ही सफल होगा । बाबा ने शामा की ओर दृष्टिपात कर कहा – जो, प्रेमपूर्वक मेरा नामस्मरण करेगा, मैं उसकी समस्त इच्छायें पूर्ण कर दूँगा । उसकी भक्ति में उत्तरोत्तर वृदिृ होगी । जो मेरे चरित्र और कृत्यों का श्रदृापूर्वक गायन करेगा, उसकी मैं हर प्रकार से सदैव सहायता करुँगा । जो भक्तगण हृदय और प्राणों से मुझे चाहते है, उन्हें मेरी कथाऐं श्रवण कर स्वभावतः प्रसन्नता होगी । विश्वास रखो कि जो कोई मेरी लीलाओं का कीर्तन करेगा, उसे परमानन्द और चिरसन्तोष की उपलबि्ध हो जायेगी । यह मेरा वैशिष्टय है कि जो कोई अनन्य भाव से मेरी शरण आता है, जो श्रदृापूर्वक मेरा पूजन, निरन्तर स्मरण और मेरा ही ध्यान किया करता है, उसको मैं मुक्ति प्रदान कर देता हूँ ।
जो नित्यप्रति मेरा नामस्मरण और पूजन कर मेरी कथाओं और लीलाओं का प्रेमपूर्वक मनन करते है, ऐसे भक्तों में सांसारिक वासनाएँ और अज्ञानरुपी प्रवृत्तियाँ कैसे ठहर सकती है । मैं उन्हें मृत्यु के मुख से बचा लेता हूँ । मेरी कथाऐं श्रवण करने से मूक्ति हो जायेगी । अतः मेरी कथाओं श्रदृापूर्वक सुनो, मनन करो । सुख और सन्तोष-प्राप्ति का सरल मार्ग ही यही है । इससे श्रोताओं के चित्त को शांति प्राप्त होगी और जब ध्यान प्रगाढ़ और विश्वास दृढ़ हो जायगा, तब अखोड चैतन्यघन से अभिन्नता प्राप्त हो जाएगी । केवल साई साई के उच्चारणमात्र से ही उनके समस्त पाप नष्ट हो जाएगें ।



भिन्न भिन्न कार्यों की भक्तों को प्रेरणा
---------------------------------------------
भगवान अपने किसी भक्त को मन्दिर, मठ, किसी को नदी के तीर पर घाट बनवाने, किसी को तीर्थपर्यटन करने और किसी को भगवत् कीर्तन करने एवं भिन्न भिन्न कार्य करने की प्रेरणा देते है । परंतु उन्होंने मुझे साई सच्चरित्र-लेखन की प्रेरणा की । किसी भी विघा का पूर्ण ज्ञान न होने के कारण मैं इस कार्य के लिये सर्वथा अयोग्य था । गतः मुझे इस दुष्कर कार्य का दुस्साहस क्यों करना चाहिये । श्री साई महाराज की यथार्थ जीवनी का वर्णन करने की सामर्थय किसे है । उनकी कृपा मात्र से ही कार्य सम्पूर्ण होना सम्भव है । इसीलिये जब मैंने लेखन प्रारम्भ किया तो बाबा ने मेरा अहं नष्ट कर दिया और उन्हेंने स्वयं अपना चरित्र रचा । अतः इस चरित्र का श्रेय उन्हीं को है, मुझे नही ।
जन्मतः ब्राहमण होते हुए भी मैं दिव्य चक्षु-विहीन था, अतः साई सच्चरित्र लिखने में सर्वथा अयोग्य था । परन्तु श्री हरिकृपा से क्या सम्भव वहीं है । मूक भी वाचाल हो जाता है और पंगु भी गिरिवर चढ़ जाता है । अपनी इच्छानुसार कार्य पूर्ण करने की युक्ति वे ही जानें । हारमोनियम और बंसी को यह आभास कहाँ कि ध्वनि कैसे प्रसारित हो रही है । इसका ज्ञान तो वादक को ही है । चन्द्रकांतमणि की उत्पत्ति और ज्वार भाटे का रहम्य मणि अथवा उदधि नहीं, वरन् शशिकलाओं के घटने-बढने में ही निहित है ।


बाबा का चरित्रः - ज्योतिस्तंभ स्वरुप
---------------------------------------
समुद्र में अनेक स्थानों पर ज्योतिस्तंभ इसलिये बनाये जाते है, जिससे नाविक चटटानों और दुर्घटनाओं से बच जायें और जहाज का कोई हानि न पहुँचे । इस भवसागर में श्री साई बाबा का चरित्र ठीक उपयुक्त भाँति ही उपयोगी है । वह अमृत से भी अति मधुर और सांसारिक पथ को सुगम बनाने वाला है । जब वह कानों के दृारा हृदय में प्रवेश करता है, तब दैहिक बुदि नष्ट हो जाती है और हृदय में एकत्रित करने से, समस्त कुशंकाएँ अदृश्य हो जाती है । अहंकार का विनाश हो जाता है तथा बौदिृक आवरण लुप्त होकर ज्ञान प्रगट हो जाता है । बाब की विशुदृ कीर्ति का वर्णन निष्ठापूर्वक श्रवण करने से भक्तों के पाप नष्ट होंगे । अतः यह मोक्ष प्राप्ति का भी सरल साधन है । सत्यतुग में शम तथा दम, त्रेता में त्याग, दृापर में पूजन और कलियुग में भगवत्कीर्तन ही मोक्ष का साधन है । यह अन्तिम साधन, चारों वर्णों के लोगों को साध्य भी है । अन्य साधन, योग, त्याग, ध्यान-धारणा आदि आचरण करने में कठिन है, परंतु चरित्र तथा हरिकीर्तन का श्रवण और कीर्तन से इन्द्रियों की स्वाभाविक विषयासक्ति नष्ट हो जाती है और भक्त वासना-रहित होकर आत्म साक्षात्कार की ओर अग्रसर हो जाता है । इसी फल को प्रदान करने के हेतु उन्होंने सच्चरित्र का निर्माण कराया । भक्तगण अब सरलतापूर्वक चरित्र का अवलोकन करें और साथ ही उनके मनोहर स्वरुप का ध्यान कर, गुरु और भगवत्-भक्ति के अधिकारी बनें तथा निष्काम होकर आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त हों । साईं सच्चरित्र का सफलतापूर्वक सम्पूर्ण होना, यह साई-महिमा ही समझें, हमें तो केवल एक निमित्त मात्र ही बनाया गया है ।


मातृप्रेम
---------
गाय का अपने बछडे़ पर प्रेम सर्वविदित ही है । उसके स्तन सदैव दुग्ध से पूर्म रहते हैं और जब भुखा बछड़ा स्तन की ओर दौड़कर आता है तो दुग्ध की धारा स्वतः प्रवाहित होने लगती है । उसी प्रकार माता भी अपने बच्चे की आवश्यकता का पहले से ही ध्यान रखती है और ठीक समय पर स्तनपान कराती है । वह बालक का श्रृंगार उत्तम ढ़ंग से करती है, परंतु बालक को इसका कोई भान ही नहीं होता । बालक के सुन्दर श्रृंगाराररि को देखकर माता के हर्ष का पारावार नहीं रहता । माता का प्रेम विचित्र, असाधारण और निःस्वार्थ है, जिसकी कोई उपमा नही है । ठीक इसी प्रकार सद्गगुरु का प्रेम अपने शिष्य पर होता है । ऐसा ही प्रेम बाबा का मुझ पर था और उदाहरणार्थ वह निम्न प्रकार था ः-
सन् 1916 में मैने नौकरी से अवकाश ग्रहण कीया । जो पेन्शन मुझे मिलती थी, वह मेरे कुटुम्ब के निर्वाह के लिये अपर्याप्त थी । उसी वर्ष ती गुरुपूर्णिमा के विवस मैं अनाय भक्तों के साथ शिरडी गया । वहाँ अण्णा चिंचणीकर ने स्वतः ही मेरे लिये बाबा से इस प्रकार प्रार्थना की, इनके ऊपर कृपा करो । जो पेन्शन इन्हें मिलती है, वह निर्वाह-योग्य नही हैं । कुटुम्ब में वृदि हो रही है । कृपया और कोई नौकरी दिला दीजिये, ताकि इनकी चिन्ता दूर हो और ये सुखपूर्वक रहें । बाबा ने उत्तर दिया कि इन्हें नौकरी मिल जायेगी, परंतु अब इन्हें मेरी सेवा में ही आनन्द लेना चाहिए । इनकी इच्छाएँ सदैव पूर्ण होंगी, इन्हें अपना ध्यान मेरी ओर आकर्षित कर, अधार्मिक तथा दुष्ट जनों की संगति से दूर रहना चाहिये । इन्हें सबसे दया और नम्रता का बर्ताव और अंतःकरण से मेरी उपासना करनी चाहिये । यदि ये इस प्रकार आचरण कर सके तो नित्यान्नद के अधिकारी हो जायेंगे ।




रोहिला की कथा
-------------------
यह कथा श्री साई बाबा के समस्त प्राणियों पर समान प्रेम की सूचक है । एक समय रोहिला जाति का एक मनुष्य शिरडी आया । वह ऊँचा-पूरा, सुदृढ़ एवं सुगठित शरीर का था । बाबा के प्रेम से मुग्ध होकर वह शिरडी में ही रहने लगा । वह आठों प्रहर अपनी उच्च और कर्कश ध्वनि में कुरान शरीफ के कलमे पढ़ता और अल्लाहो अकबर के नारे लगाता था । शिरडी के अधिकांश लोग खेतों में दिन भर काम करने के पश्चात जब रात्रि में घर लौटते तो रोहिला की कर्कश पुकारें उनका स्वागत करती है । इस कारण उन्हें रात्रि में विश्राम न मिलता था, जिससे वे अधिक कष्ट असहनीय हो गया, तब उन्होंने बाबा के समीप जाकर रोहिला को मना कर इस उत्पात को रोकने की प्रार्थना की । बाबा ने उन लोगों की इस प्रार्थना पर ध्यान न दिया । इसके विपरीत गाँववालों को आड़े हाथों लेते हुये बोले कि वे अपने कार्य पर ही ध्यान दें और रोहिला की ओर ध्यान न दें । बाबा ने उनसे कहा कि रोहिला की पत्नी बुरे स्वभाव की है और वह रोहिला को तथा मुझे अधिक कष्ट पहुंचाती है, परंतु वह उसके कलमों के समक्ष उपस्थित होने का साहस करने में असमर्थ है और इसी कारण वह शांति और सुख में है । यथार्थ में रोहिला की कोई पत्नी न थी । बाबा के संकेत केवल कुविचारों की ओर था । अन्य विषयों की अपेक्षा बाबा प्रार्थना और ईश-आराधना को महत्तव देते थे । अतः उन्होंने रोहिला के पक्ष का समर्थन कर, ग्रामवासियों को शांतिपूर्वक थोड़े समय तक उत्पात सहन करने का परामर्श दिया ।


बाबा के मधुर अमृतोपदेश
------------------------------
एक दिन दोपहर की आरती के पश्चात भक्तगण अपने घरों को लौट रहे थे, तब बाबा ने निम्नलिखित अति सुन्दर उपदेश दिया –
तुम चाहे कही भी रहो, जो इच्छा हो, सो करो, परंतु यह सदैव स्मरण रखो कि जो कुछ तुम करते हो, वह सब मुझे ज्ञात है । मैं ही समस्त प्राणियों का प्रभु और घट-घट में व्याप्त हूँ । मेरे ही उदर में समस्त जड़ व चेतन प्राणी समाये हुए है । मैं ही समस्त ब्राहांड़ का नियंत्रणकर्ता व संचालक हूँ । मैं ही उत्पत्ति, व संहारकर्ता हूँ । मेरी भक्ति करने वालों को कोई हानि नहीं पहुँचा सकता । मेरे ध्यान की उपेक्षा करने वाला, माया के पाश में फँस जाता है । समस्त जन्तु, चींटियाँ तथा दृश्यमान, परिवर्तनमान और स्थायी विश्व मेरे ही स्वरुप है ।
इस सुन्दर तथा अमूल्य उपदेश को श्रवण कर मैंने तुरन्त यह दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब भविष्य में अपने गुरु के अतिरिक्त अन्य किसी मानव की सेवा न करुँगा । तुझे नौकरी मिल जायेगी – बाबा के इन वचनों का विचार मेरे मस्तिष्क में बारंबार चक्कर काटने लगा । मुझे विचार आने लगा, क्या सचमुच ऐसा घटित होगा । भविष्य की घटनाओं से स्पष्ट है कि बाबा के वचन सत्य निकले और मुझे अल्पकाल के लिये नौकरी मिल गई । इसके पश्चात् मैं स्वतंत्र होकर एकचित्त से जीवनपर्यन्त बाबा की ही सेवा करता रहा ।
इस अध्याय को समाप्त करने से पूर्व मेरी पाठकों से विनम्र प्राथर्ना है कि वे समस्त बाधाएँ – जैसे आलस्य, निद्रा, मन की चंचलता व इन्द्रिय-आसक्ति दूर कर और एकचित्त हो अपना ध्यान बाबा की लीलाओं की ओर वें और स्वाभाविक प्रेम निर्माण कर भक्ति-रहस्य को जाने तथा अन्य साधनाओं में व्यर्थ श्रमित न हो । उन्हें केवन एक ही सुगम उपाय का पालन करना चाहिये और वह है श्री साईलीलाओं का श्रवण । इससे उनका अज्ञान नष्ट होकर मोक्ष का दृार खुल जायेगा । जिसप्रकार अनेक स्थानों में भ्रमण करता हुआ भी लोभी पुरुष अपने गड़े हुये धन के लिये सतत चिन्तित रहता है, उसी प्रकार श्री साई को अपने हृदय में धारण करो । अगले अध्याय में श्री साई बाबा के शिरडी आगमन का वर्णन होगा ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

For Donation

For donation of Fund/ Food/ Clothes (New/ Used), for needy people specially leprosy patients' society and for the marriage of orphan girls, as they are totally depended on us.

For Donations, Our bank Details are as follows :

A/c - Title -Shirdi Ke Sai Baba Group

A/c. No - 200003513754 / IFSC - INDB0000036

IndusInd Bank Ltd, N - 10 / 11, Sec - 18, Noida - 201301,

Gautam Budh Nagar, Uttar Pradesh. INDIA.

बाबा के 11 वचन

ॐ साईं राम

1. जो शिरडी में आएगा, आपद दूर भगाएगा
2. चढ़े समाधी की सीढी पर, पैर तले दुःख की पीढ़ी कर
3. त्याग शरीर चला जाऊंगा, भक्त हेतु दौडा आऊंगा
4. मन में रखना द्रढ विश्वास, करे समाधी पूरी आस
5. मुझे सदा ही जीवत जानो, अनुभव करो सत्य पहचानो
6. मेरी शरण आ खाली जाए, हो कोई तो मुझे बताए
7. जैसा भाव रहे जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मनका
8. भार तुम्हारा मुझ पर होगा, वचन न मेरा झूठा होगा
9. आ सहायता लो भरपूर, जो माँगा वो नही है दूर
10. मुझ में लीन वचन मन काया, उसका ऋण न कभी चुकाया
11. धन्य-धन्य व भक्त अनन्य, मेरी शरण तज जिसे न अन्य

.....श्री सच्चिदानंद सदगुरू साईनाथ महाराज की जय.....

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः॒ स्वः॒
तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यम्
भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि।
धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥

Word Meaning of the Gayatri Mantra

ॐ Aum = Brahma ;
भूर् bhoor = the earth;
भुवः bhuwah = bhuvarloka, the air (vaayu-maNdal)
स्वः swaha = svarga, heaven;
तत् tat = that ;
सवितुर् savitur = Sun, God;
वरेण्यम् varenyam = adopt(able), follow;
भर्गो bhargo = energy (sin destroying power);
देवस्य devasya = of the deity;
धीमहि dheemahi = meditate or imbibe

these first nine words describe the glory of Goddheemahi = may imbibe ; pertains to meditation

धियो dhiyo = mind, the intellect;
यो yo = Who (God);
नः nah = our ;
प्रचोदयात prachodayat = inspire, awaken!"

dhiyo yo naha prachodayat" is a prayer to God


भू:, भुव: और स्व: के उस वरण करने योग्य (सूर्य) देवता,,, की (बुराईयों का नाश करने वाली) शक्तियों (देवता की) का ध्यान करें (करते हैं),,, वह (जो) हमारी बुद्धि को प्रेरित/जाग्रत करे (करेगा/करता है)।


Simply :

तीनों लोकों के उस वरण करने योग्य देवता की शक्तियों का ध्यान करते हैं, वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।


The God (Sun) of the Earth, Atmosphere and Space, who is to be followed, we meditate on his power, (may) He inspire(s) our intellect.