ॐ साँई राम जी
भक्त मीरा बाई जी
राजस्थान की भूमि साहस व शौर्य के लिए प्रसिद्ध है| भारत में हुए साठ प्रतिशत युद्ध इसी राज्य की जमीन पर
हुए| युद्धों की इस भूमि पर प्रेम की मूर्ति भी अवतरित हुई जिसका नाम था मीरा!

परिचय:
मीरा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं| वह श्री कृष्ण जी की अनन्य भक्त थी| मीरा का जन्म 1498 में हुआ| इनके पिता मेड़ता के राजा थे| जब मीरा बाई बहुत छोटी थी तो उनकी माता ने श्री कृष्ण जी को यू ही उनका दूल्हा बता दिया| इस बात को मीरा जी सच मान गई| उन पर इस बात का इतना प्रभाव पड़ा कि वह श्री कृष्ण जी को ही अपना सब कुछ मान बैठी|
जवानी की अवस्था में पहुँचने पर भी उनके प्रेम में कमी नहीं आई| ओर युवतियों की तरह वह भी अपने पति को लेकर विभिन्न कल्पनाएँ करती| परन्तु उनकी कल्पनाएँ, उनके सपने श्री कृष्ण जी से आरम्भ होकर उन्ही पर ही समाप्त हो जाते|
समय बीतता गया| मीरा जी का प्यार कृष्ण के प्रति और बढता गया| 1516 ई० में मीरा का विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से कर दिया गया| वे मीरा के प्रति स्नेह का भाव रखते थे परन्तु मीरा का ह्रदय माखन चोर ने चुरा लिया था| वह अपने विवाह के बाद भी श्री कृष्ण की आराधना न छोड़ सकी| वह कृष्ण को ही अपना पति समझती और वैरागिनो की तरह उनके भजन गाती| मेवाड़ के राजवंश को यह कैसे स्वीकार हो सकता था कि उनकी रानी वैरागिनी की तरह जीवन व्यतीत करे| उन्हें मरने की साजिशे रची जाने लगी| मीरा की भक्ति, प्रेम निश्छल था इसलिए विष भी अमृत हो गया| उन्होंने अपना पूरा जीवन कृष्ण को ही समर्पित कर दिया| उनका कहना था -
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई|
जाके सिर मोर मुकट मेरो पति सोई||
तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई|
छाड़ि दई कुलकि कानि कहा करिहै कोई||
मीरा ने गुरु के विषय में कहा है कि बिना गुरु धारण किए भक्ति नहीं की जा सकती| भक्तिपूर्ण व्यक्ति ही प्रभु प्राप्ति का भेद बता सकता है वही सच्चा गुरु है| स्वयं मीरा के पद से पता चलता है कि उनके गुरु रविदास थे|
नहिं मैं पीहर सासरे, नहिं पियाजी री साथ|
मीरा ने गोबिन्द मिल्या जी, गुरु मिलिया रैदास||
उन्होंने धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध शूद्र गुरु रविदास की भक्ति की|साधु - संतो की संगत की|
मीरा की मृत्यु के बारे में अलग-अलग मत हैं|
लूनवा के भूरदान ने मीरा की मौत 1546 में बताई|
रानीमंगा के भाट ने मीरा की मौत 1548 में बताई|
डा० शेखावत अपने लेख और खोज के अधार पर मीरा की मौत 1547 में बताते हैं|
हरमेन गोएटस ने मीरा के द्वारका से गायब होने की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास किया परन्तु वह मौलिक नहीं| उनके अनुसार वह द्वारका के बाद उत्तर भारत में भ्रमण करती रही| उसने भक्ति व प्रेम का संदेश सब जगह पहुँचाया| चित्तौड़ के शासक कर्मकांड व राजसी वैभव में डूबकर उसे भूल चुके थे| किसी ने उसे ढूँढने का प्रयास नहीं किया|
अपने पांच वर्ष की अवस्था में मीरा ने गिरधर का वरण किया और उसी दिव्यमूर्ति में विलीन हो गई| धन्य है वह प्रेम की मूर्ति! जिसने दैविक प्रेम का ऐसा उदाहरण दिया कि बड़े-बड़े संत, भक्त की चमक भी धीमी पड़ गई|
साहितिक देन:
मीरा जी ने विभिन्न पदों व गीतों की रचना की| मीरा के पदों मे ऊँचे अध्यात्मिक अनुभव हैं| उनमे समाहित संदेश और अन्य संतो की शिक्षा मे समानता नजर आती हैं| उनके प्रप्त पद उनकी अध्यात्मिक उन्नति के अनुभवों का दर्पण हैं| मीरा ने अन्य संतो की तरह कई भाषाओं का प्रयोग किया है जैसे -
हिन्दी, गुजरती, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, अरबी, फारसी, मारवाड़ी, संस्कृत, मैथली और पंजाबी|
भावावेग, भावनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति, प्रेम की ओजस्वी प्रवाहधारा, प्रीतम वियोग की पीड़ा की मर्मभेदी प्रखता से अपने पदों को अलंकृत करने वाली प्रेम की साक्षात् मूर्ति मीरा के समान शायद ही कोई कवि हो|
ॐ साँई राम जी
संत तुलसीदास जी
भूमिका:
श्रीमद भागवत के बाद दूसरे स्थान पर भारतीय जन मानस को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला ग्रंथ रामचरितमानस ही रहा है| ये दोनों ग्रंथ ही सर्वाधिक लोकप्रिय रहे हैं|
राम भक्ति शाखा के शिरोमणि तुलसी दास जी रामचरितमानस ग्रंथ के रचियता कहे जाते हैं| जिसके तन और मन में राम हों वही ऐसे भक्ति रस से परिपूर्ण ग्रंथ रचना कर सकता है| तुलसीदास जी ऐसे ही व्यक्ति थे| गुरु ने बचपन में ही उनका नाम "रामबोला" रख दिया था|
परिचय:
तुलसीदास जी का जन्म संवत 1554 श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजपुर गाँव में हुआ| इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम तुलसी था| आप की शारीरिक देह पांच वर्ष के बालक जैसी थी| सामान्यता प्रत्येक बच्चा रोते हुए जन्म लेता है परन्तु इस विलक्षण बालक ने रोने की बजाए "राम" शब्द का उच्चारण किया था| कहा जाता है कि जन्म के समय इनके मुख में पूरे बत्तीस दांत थे|
इस विचित्र बालक की विलक्षणता को लेकर माता-पिता को अनिष्ट की आशंका हुई| उन्होंने तब अपने बालक को अपनी सेविका चुनिया को सोंप दिया| वह उसे अपने ससुराल ले गई| जब तुलसीदास जी साढे पांच वर्ष के हुए तो चुनिया इस संसार को छोड़ के चली गई| तब इस बालक पर अनंतानंद जी के शिष्य नरहरि आनन्द की दृष्टि पड़ी| वह तुलसीदास जी को अपने साथ अयोध्या ले गए| उन्होंने ही उनका नाम रामबोला रखा| तुलसीदास का विवाह रत्नावली जी से हुआ|
प्रभु भक्ति की प्रेरणा:
तुलसीदास जी अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे| वह अपनी पत्नी का विछोड़ा एक दिन के लिए भी सहन नहीं कर सकते थे| एक बार उनकी पत्नी उनको बताए बिना मायके आ गई| तुलसीदास जी उसी रात छिपकर ससुराल पहुँच गए| इससे उनकी पत्नी को बहुत शर्म महसूस हुई|
वह तुलसीदास जी से कहने लगी, "मेरा शरीर तो हाड-मास का पुतला है| जितना तुम इस शरीर से प्रेम करते हो यदि उससे आधा भी भगवान श्री राम जी से करोगे तो इस संसार के माया जाल से मुक्त हो जाओगे| तुम्हारा नाम अमर हो जाएगा|"
तुलसीदास के मन पर इस बात का गहरा प्रभाव पड़ा| वह उसी क्षण वहाँ से निकाल पड़े और अपना सब कुछ छोडकर भारत के तीर्थ स्थलों के दर्शन को चल दिए| कहते हैं कि हनुमान जी की कृपा से उन्हें भगवान राम जी के दर्शन हुए और उसके बाद उन्होंने अपना सारा जीवन राम जी की महिमा में लगा दिया|
साहित्यक देन:
तुलसीदास जी का काव्य लेखन केवल रामचरितमानस तक ही सीमित न रहा| इन्होने कवितावली, दोहावली, गीतावली व विनय पत्रिका जैसी रचनाएँ भी लिखी हैं| तुलसीदास जी ने बारह पुस्तकें लिखी जिसमे रामचरितमानस सबसे अधिक प्रसिद्ध है| इन्ही को बाल्मीकि का अवतार माना जाता है जिन्होंने संस्कृत में रामायण लिखी थी|
इनका लेखन अवधी व ब्रज भाषा दोनों में मिलता है| जन मानस को अधिक प्रभावित करने वाला ग्रंथ रामचरितमानस की रचना लोक भाषा में हुई| उस काल में प्रचलित दोहा, चौपाई, कविता व सवैया और पद लेखन की गीति शैली को भी अपनाया गया|
ॐ साँई राम जी
भक्त कबीर दास जी
भूमिका:
संत कबीर (Sant Kabir Ji) का स्थान भक्त कवियों में ध्रुव तारे के समान है| जिनके शब्द, साखी व रमैनी आज भी उतने ही प्रसिद्ध हैं जितने कि उनके समय में थे|

परिचय:
भक्त कबीर (Sant Kabir Ji) का जन्म संवत 1455 जेष्ठ शुक्ल 15 को बताया जाता है| यह भी कहा जाता है कि जगदगुरु रामानंद स्वामी (Ramanand Swami Ji) के आशीर्वाद से काशी में एक विधवा ब्रह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए| लाज के मारे वह नवजात शिशु को लहरतारा के तालाब के पास फेंक आई| नीरू नाम का एक जुलाहा उस बालक को अपने घर में ले आया| उसी ने बालक का पालन-पोषण किया| यही बालक कबीर (Sant Kabir Ji) कहलाया|
कुछ कबीरपंथियों का मानना है कि कबीर (Sant Kabir Ji) का जन्म काशी के लहरतारा तालाब में कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ| यह भी कहा जाता है कि कबीर (Sant Kabir Ji) की धर्म पत्नी का नाम लोई था| उनके पुत्र व पुत्री के नाम 'कमाल' व 'कमाली' था| संत कबीर (Sant Kabir Ji) पढ़े - लिखे नहीं थे| उन्होंने स्वयं कहा है -
मसि कागद छूवो नहीं,
कलम गहो नहिं हाथ|
परिवार के पालन पोषण के लिए कबीर (Sant Kabir Ji) को करघे पर खूब मेहनत करनी पड़ती थी| उनके घर साधु - संतो का जमघट लगा रहता था| ऐसा प्रसिद्ध है कि एक दिन एक पहर रात को कबीर जी (Sant Kabir Ji) पञ्चगंगा घाट की सीढ़ीयों पर जा लेटे| वहीं से रामानंद जी भी स्नान के लिए उतरा करते थे| रामानंद जी का पैर कबीर जी के ऊपर पड़ गया| रामानंद जी एक दम "राम-राम" बोल उठे कबीर (Sant Kabir Ji) ने इनके बोलो को ही गुरु की दीक्षा का मंत्र मान लिया| वे स्वामी रामानंद जी को अपना गुरु कहने लगे| उनके अनुसार -
हम काशी में प्रगट भये हैं, रामानन्द चेताये |
कुछ लोगो का यह भी कथन है कि कबीर जी (Sant Kabir Ji) जन्म से मुसलमान मान थे और समझदारी की उम्र पाने पर स्वामी रामानन्द के प्रभाव में आकर हिन्दू धर्म की बातें जानी| मुसलमान कबीरपंथियों की मान्यता है कि की कबीर (Sant Kabir Ji) ने मुसलमान फकीर शेख तकी से दीक्षा ली|
हकीकत चाहे कुछ भी हो, मान्यताये चाहे अलग-अलग हों, पर इस बात से सभी सहमत हैं कि कबीर जी (Sant Kabir Ji) ने हिन्दू - मुसलमान का भेद - भाव मिटाकर हिन्दू संतो और मुसलमान फकीरों का सतसंग किया| उन्हें जो भी तत्व प्राप्त हुआ उसे ग्रहण करके अपने पदों के रूप में दुनिया के सामने रखा| वह निराकार ब्रह्मा के उपासक थे| उनका मानना था कि ईश्वर घर-घर में व सबके मन में बसे हैं| ईश्वर की प्रार्थना हेतु मन्दिर - मसजिद में जाना आवश्यक नहीं|
साहितयक देन:
कबीर (Sant Kabir Ji) की बाणी का संग्रह "बीजक" नाम से प्रसिद्ध है| इसके तीन भाग हैं -
रमैनी
सबद
साखी
इनकी भाषा खिचड़ी है - पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, ब्रज भाषा आदि कई बोलियों का मिश्रण मिलता है| कबीर जी (Sant Kabir Ji) बाहरी आडम्बर के विरोधी थे| उन्होंने समान रूप से हिन्दू - मुस्लिम मान्यताओ में बाहरी दिखावे पर अपने दोहों के द्वारा जमकर चोट की है| इनके दोहों में अधिक ग्रामीण जीवन की झलक देखने को मिलती है| अपने दोहों के द्वारा इन्होंने समाज में फैली कुरीतियों पर जमकर प्रहार किया है|
कबीर जी (Sant Kabir Ji) अपने अन्तिम समय में काशी से मगहर नामक स्थान पर आ गए| यहीं 119 वर्ष की आयु में इन्होंने शरीर छोड़ा|
ॐ साँई राम जी
भक्त रहीम जी
भूमिका:
अब्दुल रहीम खानखाना का नाम हिन्दी साहित्य जगत में महत्वपूर्ण रहा है| इनका नाम साहित्य जगत में इतना प्रसिद्ध है कि इन्हें किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है|
परिचय:
अब्दुल रहीम खानखाना का जन्म 17 दिसम्बर 1556 को लाहौर में हुआ| इनके पिता का नाम बैरम खान तथा माता का नाम सुल्ताना बेगम था| उस समय बैरम खान की आयु 60 वर्ष हो चुकी थी जब रहीम का जन्म हुआ| बैरम खान की दूसरी पत्नी का नाम सईदा खां था| यह बाबर की बेटी गुलरुख बेगम की पुत्री थी| खानखाना की उपाधि अकबर ने इनके पिता बैरम खान को दी थी| वे अकबर के सरक्षक के रूप में कार्यरत थे|
वीरता, राज्य-संचालन, दानशीलता, दूरदर्शिता तथा काव्य रचना जैसे अदभुत गुण इन्हें अपने माता-पिता से विरासत में मिले थे| बचपन से ही रहीम साहित्य प्रेमी और बुद्धिमान बालक थे| उनकी दूसरी माँ सईदा बेगम भी अच्छी कवित्री थी|
सन 1562 में बैरम खान की मौत के बाद पूरा परिवार अकबर के समक्ष प्रस्तुत हुआ| अकबर ने रहीम की बुद्धिमता को परखते हुए उनकी शिक्षा-दीक्षा का पूर्ण प्रबंद कर दिया| वह रहीम से इतना प्रभावित हुआ कि शहजादो को प्रदान की जाने वाली उपाधि "मिर्जा खान" कहकर सम्बोधित करने लगा| अकबर उन्हें जो भी जटिल से जटिल कार्य सौपते वह उन्हें शीघता से कर देते|
मुल्ला मुहम्मद अमीन रहीम के शिक्षक थे| इन्होने रहीम को तुर्की, अरबी व फारसी भाषा का ज्ञान दिया| इन्होने ही रहीम को छंद रचना, कविता करना, गणित, तर्कशास्त्र तथा फारसी व्यकरण का ज्ञान कराया| बदाऊनी रहीम के संस्कृत के शिक्षक थे|
रहीम का पहला निकाह माहबानो से हुआ| माहबानो ने दो बेटियों और तीन बेटों को जन्म दिया| पहले बेटे का नाम इरीज, दूसरे का दाराब और तीसरे का नाम फरन था| यह नाम अकबर ने रखे| रहीम की बड़ी बेटी का नाम जाना बेगम जिसका निकाह शहजादा दनिभाव से हुआ व छोट्टी बेटी का निकाह मीर अमीनु दीन से हुआ|
रहीम का दूसरा निकाह सौदा जाति की एक लड़की से हुआ| जिससे एक बेटे रहमान दाद का जन्म हुआ|
रहीम का तीसरा निकाह एक दासी से हुआ| उससे भी एक बेटे मिर्जा अमरुल्ला का जन्म हुआ|
साहित्यक देन:
मुस्लिम धर्म के अनुयायी होते हुए भी रहीम ने अपनी काव्य रचना द्वारा हिन्दी साहित्य की जो सेवा की उसकी मिसाल विरले ही मिल सकेगी| रहीम जी की कई रचनाएँ प्रसिद्ध हैं जिन्हें उन्होंने दोहों के रूप में लिखा| इन दोहो में नीति परक का विशेष स्थान है|
रहीम के ग्रंथो में रहीम दोहावली या सतसई, बरवै, नायिका भेद, श्रृंगार, सोरठा, मदनाष्ठ्क, राग पंचाध्यायी, नगर शोभा, फुटकर बरवै, फुटकर छंद तथा पद, फुटकर कवितव, सवैये, संस्कृत काव्य सभी प्रसिद्ध हैं|
इन्होंने तुर्की भाषा में लिखी बाबर की आत्मकथा "तुजके बाबरी" का फारसी में अनुवाद किया| "मआसिरे रहीमी" और "आइने अकबरी" में इन्होंने "खानखाना" व रहीम नाम से कविता की है|
रहीम जी का व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था| यह मुसलमान होकर भी कृष्ण भक्त थे| इन्होंने खुद को "रहिमन" कहकर भी सम्बोधित किया है| इनके काव्य में नीति, भक्ति, प्रेम और श्रृंगार का सुन्दर समावेश मिलता है|
रहीम जी ने अपने अनुभवों को अति सरल व सहजता से जिस शैली में अभिव्यक्त किया है वह वास्तव में अदभुत है| उनकी कविताओं, छंदों, दोहों में पूर्वी अवधी, ब्रज भाषा तथा खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है| पर मुख्य रूप से ब्रज भाषा का ही प्रयोग हुआ है| भाषा को सरल, सरस व मधुर बनाने के लिए इन्होंने तदभव शब्दों का अधिक प्रयोग किया है|
ॐ साँई राम जी
भक्त बुल्ले शाह जी
भूमिका:
पंजाब की माटी की सौंधी गन्ध में गूंजता एक ऐसा नाम जो धरती से उठकर आकाश में छा गया| वे ही भारतीय सन्त परम्परा के महान कवि थे जो पंजाब की माटी में जन्मे, पले और उनकी ख्याति पूरे देश में फैली| ऐसे ही पंजाब के सबसे बड़े सूफी बुल्ले शाह जी हुए हैं|
परिचय:
बुल्ले शाह का मूल नाम अब्दुल्लाशाह था| आगे चलकर इनका नाम बुल्ला शाह या बुल्ले शाह हो गया| प्यार से इन्हें साईं बुल्ले शाह या बुल्ला कहते| इनके जीवन से सम्बन्धित विद्वानों में अलग-२ मतभेद है| इनका जन्म 1680 में उच गीलानियो में हुआ| इनके पिता शाह मुहम्मद थे जिन्हें अरबी, फारसी और कुरान शरीफ का अच्छा ज्ञान था| वह आजीविका की खोज में गीलानिया छोड़ कर परिवार सहित कसूर (पाकिस्तान) के दक्षिण पूर्व में चौदह मील दूर "पांडो के भट्टिया" गाँव में बस गए| उस समय बुल्ले शाह की आयु छे वर्ष की थी| बुल्ले शाह जीवन भर कसूर में ही रहे|
इनके पिता मस्जिद के मौलवी थे| वे सैयद जाति से सम्बन्ध रखते थे| पिता के नेक जीवन के कारण उन्हें दरवेश कहकर आदर दिया जाता था| पिता के ऐसे व्यक्तित्व का प्रभाव बुल्ले शाह पर भी पड़ा| इनकी उच्च शिक्षा कसूर में ही हुई| इनके उस्ताद हजरत गुलाम मुर्तजा सरीखे ख्यातनामा थे| अरबी, फारसी के विद्वान होने के साथ साथ आपने इस्लामी और सूफी धर्म ग्रंथो का भी गहरा अध्ययन किया|
परमात्मा की दर्शन की तड़प इन्हें फकीर हजरत शाह कादरी के द्वार पर खींच लाई| हजरत इनायत शाह का डेरा लाहौर में था| वे जाति से अराई थे| अराई लोग खेती-बाड़ी, बागबानी और साग-सब्जी की खेती करते थे| बुल्ले शाह के परिवार वाले इस बात से दुखी थे कि बुल्ले शाह ने निम्न जाति के इनायत शाह को अपना गुरु बनाया है| उन्होंने समझाने का बहुत यत्न किया परन्तु बुल्ले शाह जी अपने निर्णय से टस से मस न हुए| परिवार जनों के साथ हुई तकरार का जिक्र उन्होंने इन शब्दों में किया -
बुल्ले नूं समझावण आइयां
भैणा ते भरजाइयां
मन्न लै बुल्लिआ साडा कहणा
छड दे पल्ला, राइयां|
आल नबी औलाद अली नूं
तूं क्यों लीकां लाइयां?
भाव- तुम नबी के खानदान से हो और अली के वंशज हो| फिर क्यों अराई की खातिर लोकनिंदा का कारण बनते हो| परन्तु बुल्ले शाह जी जाति भेद-भाव को भुला चुके थे| उन्होंने उत्तर दिया -
जेहड़ा सानूं सैयद आखे
दोजख मिले सजाइयां |
जो कोई सानूं, राई आखे
भिश्ती पींगा पाइयां||
भाव - जो हमे सैयद कहेगा उसे दोजख की सजा मिलेगी और जो हमे अराई कहेगा वह स्वर्गो में झूला झूलेगा|
बुल्ले शाह व उनके गुरु के सम्बन्धों को लेकर बहुत सी बाते प्रचलित हैं| एक दिन इनायत जी के पास बगीचे में बुल्ले शाह जी पहुँचे| वे अपने कार्य में व्यस्त थे जिसके कारण उन्हें बुल्ले शाह जी के आने का पता न लगा| बुल्ले शाह ने अपने आध्यात्मिक अभ्यास की शक्ति से परमात्मा का नाम लेकर आमो की ओर देखा तो पेडो से आम गिरने लगे| गुरु जी ने पूछा, "क्या यह आम अपने तोड़े हैं?" बुल्ले शाह ने कहा न तो मैं पेड़ पर चढ़ा और न ही पत्थर फैंके| भला मैं कैसे आम तोड़ सकता हूँ|
बुल्ले शाह को गुरु जी ने ऊपर से नीचे तक देखा और कहा, "अरे तू चोर भी है और चतुर भी|" बुल्ला गुरु जी के चरणों में पड़ गया| बुल्ले ने अपना नाम बताया और कहा मैं रब को पाना चाहता हूँ| साईं जी ने कहा, "बुल्लिहआ रब दा की पौणा| एधरों पुटणा ते ओधर लाउणा|" इन सीधे - सादे शब्दों में गुरु ने रूहानियत का सार समझा दिया कि मन को संसार की तरफ से हटाकर परमात्मा की ओर मोड़ देने से रब मिल जाता है| बुल्ले शाह ने या प्रथम दीक्षा गांठ बांध ली| सतगुरु के दर्शन पाकर बुल्ले शाह बेखुद हो गया और मंसूर की भांति बेखुदी में बहने लगा| उसे कोई सुध - बुध नहीं रही|
कहते हैं कि एक बार बुल्ले शाह जी की इच्छा हुई कि मदीना शरीफ की जियारत को जाए| उन्होंने अपनी इच्छा गुरु जी को बताई| इनायत शाह जी ने वहाँ जाने का कारण पूछा| बुल्ले शाह ने कहा कि "वहाँ हजरत मुहम्मद का रोजा शरीफ है और स्वयं रसूल अल्ला ने फ़रमाया है कि जिसने मेरी कब्र की जियारत की, गोया उसने मुझे जीवित देख लिया|" गुरु जी ने कहा कि इसका जवाब मैं तीन दिन बाद दूँगा| बुल्ले शाह ने अपने मदीने की रवानगी स्थगित कर दी| तीसरे दिन बुल्ले शाह ने सपने में हजरत रसूल के दर्शन किए| रसूल अल्ला ने बुल्ले शाह से कहा, "तेरा मुरशद कहाँ है? उसे बुला लाओ|" रसूल ने इनायत शाह को अपनी दाई ओर बिठा लिया| बुल्ला नजरे झुकाकर खड़ा रहा| जब नजरे उठीं तो बुल्ले को लगा कि रसूल और मुरशद की सूरत बिल्कुल एक जैसी है| वह पहचान ही नहीं पाया कि दोनों में से रसूल कौन है और मुरशद कौन है|
बुल्ले शाह जी लिखते हैं -
हाजी लोक मक्के नूं जांदे
असां जाणा तख्त हजारे |
जित वल यार उसे वल काबा
भावें खोल किताबां चारे |
प्रेम मार्ग में छोटी सी भूल नाराजगी का कारण बन जाती है| बुल्ले शाह की छोटी सी भूल के कारण उनका मुरशद नाराज हो गया| मुरशद ने बुल्ले शाह की क्यारियों की तरफ से अपनी कृपा का पानी मोड लिया| प्रकाश अंधकार में और खुशी गमी में बदल गई| शिष्य के लिए यह भीषण संताप की घड़ी आ गई| जब मुरशद ने उन्हें डेरा छोड़ने को कह दिया| वह विरह की आग में तड़पने लगा| मुरशद ने जब देखा कि वियोग की अग्नि में बुल्ले शाह कुंदन बन गया है तो उन्होंने उसकी गलती माफ कर दी| इस प्रकार फिर से सूखी क्यारियों को पानी मिल गया| बुल्ले शाह की आत्मा सतगुरु की आत्मा के रंग में डूब गई, दोनों में कोई भेद न रहा|
इस अवस्था का वर्णन बुल्ले शाह ने इस तरह किया है -
रांझा - रांझा करदी नी मैं आपे रांझा होई |
रांझा मैं विच मैं रांझे विच होर ख्याल न कोई ||
बुल्ले शाह जी का देहांत 1757 ईस्वी में कसूर में हुआ| पंजाब में सूफी कवियों की लम्बी परम्परा है| परन्तु किसी अन्य सूफी कवि द्वरा अपने मुरशद के प्रति ऐसी श्रद्धा अभिव्यक्त नहीं की गई| इन्होंने अपने मुरशद को सजण, यार, साईं, आरिफ, रांझा, शौह आदि नामो से पुकारा है|
साहितिक देन:
बुल्ले शाह जी ने पंजाबी मुहावरे में अपने आप को अभिव्यक्त किया| जबकि अन्य हिन्दी और सधुक्कड़ी भाषा में अपना संदेश देते थे| पंजाबी सूफियों ने न केवल ठेठ पंजाबी भाषा की छवि को बनाए रखा बल्कि उन्होंने पंजाबियत व लोक संस्कृति को सुरक्षित रखा| बुल्ले शाह ने अपने विचारों व भावों को काफियों के रूप में व्यक्त किया है| काफी भक्तों के पदों से मिलता जुलता काव्य रूप है| काफिया भक्तों के भावों को गेय रूप में प्रस्तुत करती हैं इसलिए इनमे बहुत से रागों की बंदिश मिलती है| जन साधारण भी सूफी दरवेशों के तकियों पर जमा होते थे और मिल कर भक्ति में विभोर होकर काफियां गाते थे| काफियों की भाषा बहुत सादी व आम लोगों के समझने योग्य हैं| बुल्ले शाह लोक दिल पर इस तरह राज कर रहे थे कि उन्होंने बुल्ले शाह की रचनाओं को अपना ही समझ लिया| वह बुल्ले शाह की काफियों को इस तरह गाते थे जैसे वह स्वयं ही इसके रचयिता हों| इनकी काफियों में अरबी फारसी के शब्द और इस्लामी धर्म ग्रंथो के मुहावरे भी मिलते हैं| लेकिन कुल मिलाकर उसमे स्थानीय भाषा, मुहावरे और सदाचार का रंग ही प्रधान है|
For Donation
For donation of Fund/ Food/ Clothes (New/ Used), for needy people specially leprosy patients' society and for the marriage of orphan girls, as they are totally depended on us.
For Donations, Our bank Details are as follows :
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A/c. No - 200003513754 / IFSC - INDB0000036
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Gautam Budh Nagar, Uttar Pradesh. INDIA.
बाबा के 11 वचन
ॐ साईं राम
1. जो शिरडी में आएगा, आपद दूर भगाएगा
2. चढ़े समाधी की सीढी पर, पैर तले दुःख की पीढ़ी कर
3. त्याग शरीर चला जाऊंगा, भक्त हेतु दौडा आऊंगा
4. मन में रखना द्रढ विश्वास, करे समाधी पूरी आस
5. मुझे सदा ही जीवत जानो, अनुभव करो सत्य पहचानो
6. मेरी शरण आ खाली जाए, हो कोई तो मुझे बताए
7. जैसा भाव रहे जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मनका
8. भार तुम्हारा मुझ पर होगा, वचन न मेरा झूठा होगा
9. आ सहायता लो भरपूर, जो माँगा वो नही है दूर
10. मुझ में लीन वचन मन काया, उसका ऋण न कभी चुकाया
11. धन्य-धन्य व भक्त अनन्य, मेरी शरण तज जिसे न अन्य
.....श्री सच्चिदानंद सदगुरू साईनाथ महाराज की जय.....
गायत्री मंत्र
ॐ भूर्भुवः॒ स्वः॒
तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यम्
भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि।
धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥
Word Meaning of the Gayatri Mantra
ॐ Aum = Brahma ;
भूर् bhoor = the earth;
भुवः bhuwah = bhuvarloka, the air (vaayu-maNdal)
स्वः swaha = svarga, heaven;
तत् tat = that ;
सवितुर् savitur = Sun, God;
वरेण्यम् varenyam = adopt(able), follow;
भर्गो bhargo = energy (sin destroying power);
देवस्य devasya = of the deity;
धीमहि dheemahi = meditate or imbibe
these first nine words describe the glory of Goddheemahi = may imbibe ; pertains to meditation
धियो dhiyo = mind, the intellect;
यो yo = Who (God);
नः nah = our ;
प्रचोदयात prachodayat = inspire, awaken!"
dhiyo yo naha prachodayat" is a prayer to God
भू:, भुव: और स्व: के उस वरण करने योग्य (सूर्य) देवता,,, की (बुराईयों का नाश करने वाली) शक्तियों (देवता की) का ध्यान करें (करते हैं),,, वह (जो) हमारी बुद्धि को प्रेरित/जाग्रत करे (करेगा/करता है)।
Simply :
तीनों लोकों के उस वरण करने योग्य देवता की शक्तियों का ध्यान करते हैं, वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।
The God (Sun) of the Earth, Atmosphere and Space, who is to be followed, we meditate on his power, (may) He inspire(s) our intellect.