शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Monday, 8 June 2020

गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो, मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ

ॐ सांई राम


गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
तेरे दर पे निछावर ये जीवन करूँ
साईं हर पल मै तेरा ही दर्शन करूँ
जो भी करता सदा है इबादत तेरी
जिंदगी की कोई राह खोती नहीं
तुने भक्तों को तारा हमेशा साईं
क्यों नज़र मुझपे रहमत की होती नहीं
तेरी नज़र-ए-इनायत हो साईं अगर
साईं हर पल मै तेरा ही ध्यान करूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
मैंने हर सांस मे साईं चाहा यही
तेरे चरणों की धूल मे मिल जाऊं मै
गर जुबां मेरी यूँ ही सलामत रहे
साईं जीवन मे तेरे ही गुण गाऊँ मै
तेरे नाम का सहारा लेकर जीउँ
तेरी चौखट पे ही आखिरी दम भरूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
साईं सुन लो ये छोटी सी ख्वाहिश मेरी
मुझे इन्सां बनाना हर इक मोड़ पर
हर बार तू ही पिता हो मेरा
कभी जाना ना साईं मुझे छोड़ कर
हर जनम मे मै साईं तेरा भक्त बनूँ
और हर बार तेरी ही सेवा करूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
तुमने अंधों को नैन दिए हैं प्रभु
तुमने निर्धन को साईं धन है दिया
उसकी काया को कंचन किया है प्रभु
जिसने हर पल मे तेरा ही नाम लिया
ऐसे देवादि देव का मैं दर्शन करूँ
साईं तुझको ही दिन रात नमन मैं करूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
माँ बायजा का भाग्य जगाया प्रभु
उनकी सेवा को तुमने स्वीकार किया
उनकी ममता मे भक्ति जगाकर प्रभु
उनकी श्रद्धा को अंगीकार किया
ऐसे संत को नित नित प्रणाम करूँ
अपने जीवन का साईं उद्धार करूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
तुमने शामा को जीवन का दान दिया
ज़हर सांप का तन से उतार दिया
तात्या को अपनी आयु देकर
क़र्ज़ ममता का तुमने अतार दिया
तेरे यश का मै किस विध बखान करूँ
तेरी ममता को हर पल प्रणाम करूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
अपने चरणों से गंगा प्रवाहित करके
तुमने विष्णु का रूप दिखाया प्रभु
दास गणु ने गंगा नहा कर के
अपने मन मै तुम्ही को बसाया प्रभु
ऐसे अमृत का नित नित मै पान करूँ
साईं तेरा ही हर पल मै ध्यान करूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
साईं मेघा को शिव जी के दरस दिए
उसकी सेवा को निस दिन स्वीकार किया
अपने हाथों से अंतिम विदाई देकर
भक्त का साईं तुमने उद्धार किया
ऐसे स्वामी की दिन रैन सेवा करूँ
साईं पल पल मै तेरा ही वंदन करूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
माँ लक्ष्मी को साईं नौ सिक्के दिए
नवदा भक्ति का ज्ञान उनको दिया
कशी राम के प्राणों की रक्षा जो की
साईं तुमने उसे भय मुक्त किया
ऐसे रक्षक के चरणों मै शीश धरूँ
अपने मन को मै साईं जी शुद्ध करूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
जिस नीम की छांव में परगट हुए
उस नीम को मीठा किया है प्रभु
अपने क़दमों से साईं प्रभु तुमने
शिर्डी धाम को पावन किया है प्रभु
शिर्डी धाम का जब जब मै दर्शन करूँ
चारों धाम का ही वहां दर्शन करूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
म्हालसापति जी की सेवा जो ली
उनका जन्म ही तुमने संवार दिया
उनकी नैया को अपना सहारा देकर
भव सागर से नैया को पार किया
ऐसे स्वामी की नित नित मै सेवा करूँ
ऐसे साईं को मन मे मैं धारण करूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
कोढ़ी को भी गले से लगाकर प्रभु
उसकी सेवा को तुमने स्वीकारकिया
उससे ज़ख्मों की सेवा लेकर प्रभु
अपने ही जन्म का यूँ उद्धार किया
ऐसे मालिक की निश दिन मै सेवा करूँ
ऐसे साईं की मूरत मै मन में धरूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
नन्ही सी जान को यूँ बचाया प्रभु
अपने हाथों को अग्नि में झोंक दिया
जब बढ़ती गयी धुनी में आग तो
अपना सटका बजा कर ही रोक दिया
ऐसे साईं पिता का मै वंदन करूँ
ऐसे साईं का शत शत नमन मै करूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
तेरी शिर्डी मे जो भी है आता प्रभु
उसकी आपद को दूर भगाता प्रभु
चढ़ गया जो समाधि की सीढ़ी प्रभु
उसके दुखों को हर लेता साईं प्रभु
ऐसे देवों के देव का सुमिरन करूँ
ऐसे साईं का हर पल मै ध्यान करूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
तुने देह को त्यागा है बेशक प्रभु
भक्त हेतु सदा दौड़ा आता है तू
मन में रखता है जो भी विश्वास प्रभु
करता है उसकी पूरी वो आस प्रभु
ऐसे साईं की रहमत को नमन करूँ
ऐसे साईं के चरणों में शीश धरूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
जो भी जाने है तुझको जीवित प्रभु
उन्हें सत्य का होता है अनुभव प्रभु
तेरी शरण में आता सवाली अगर
उसकी झोली सदा ही तू भरता प्रभु
ऐसे दानी का शत शत नमन मै करूँ
ऐसे साईं पे वारी ये जीवन करूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
जैसा भाव रहा जिस मन का प्रभु
वैसा रूप हुआ तेरे मन का प्रभु
तुने भार सभी का है ढोया प्रभु
तुने सत्य वचन कर दिखाया प्रभु
ऐसे साईं में लीन मै मन को करूँ
ऐसे साईं का नित नित मै पूजन करूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
जिसने मांगी मदद साईं तुझसे प्रभु
उसने पाया है साईं सहारा प्रभु
जो भी लीन हुआ मन वचन से प्रभु
उसकी नैया ने पाया किनारा प्रभु
साईं नाम की नाव में मै पाँव धरूँ
इस भव से मै नैया को पार करूँ
गर मुझे अपने चरणों की छाँव में रखो
मैं तो दिन रात तेरी ही सेवा करूँ
तुम तो आये कभी राम बन के साईं
कभी मुरली मनोहर का रूप धरा
मै भी आया हूँ साईं दर पे तेरे
कभी दर्शन मुझे भी तो दे दो ज़रा
तेरे दर्शन का साईं इंतज़ार करूँ
तेरे वचनों पे में ऐतबार करूँ
जब मश्जिद में साईं अँधेरा हुआ
तुमने पानी से दीपक जलाये साईं
उसने पाई सदा साईं रहमत तेरी
जिसने दीपक ह्रदय में जलाये साईं
ऐसे दीपक सदा में जलाया करूँ
साईं दर्शन में तेरा ही पाया करूँ
जब घेरा था महामारी ने शिर्डी को
तब तुम्ही ने बचाया था सबको साईं
तुमने हाथों से अपने जो पीसी गेहूं
वो ही भक्तों की रक्षक बनी थी साईं
ऐसा लीला को कैसे बयां में करूँ
लीला धारी को पल पल नमन मै करूँ
जिसने मांगी थी संतान तुझसे अगर
उसको आशीष देकर नवाज़ा साईं
तुने भेंट में लेकर बस इक नारियल
सारा जीवन ख़ुशी से सजाया साईं
ऐसे दानी का साईं में वंदन करूँ
विष्णु साईं को हर पल नमन मै करूँ
जब मिथ्या गुरु आये जोहर अली
और ठगने लगे शिर्डी वासियों को
उसके चंगुल से तुमने बचाए सभी
भोले भाले सभी शिर्डी वासियों को
ऐसे साईं को पल पल नमन मैं करूँ
साईं चरणों की नित नित मैं सेवा करूँ
भक्त नानावाली हुए जब बेचैन तो
खुजली से थे हुए परेशां वो साईं
उसकी कर ली हरण बेचैनी तुमने
अपनी गादी पे उसको बिठाकर साईं
ऐसे वेदों के वैद को नमन मै करूँ
ऐसे साईं को हर पल नमन मै करूँ
अपने भक्तों की खातिर तुमने साईं
सबके कष्टों को खुद पे सहन था किया
खुद पहनी थी तुमने कफनी साईं
जिसने माँगा उसे सभी कुछ था दिया
ऐसे दाता का हर पल नमन मै करूँ
ऐसे साईं का मै अभिनन्दन करूँ
दत्त दिगंबर हे साईं दयाल
तुम तो जगत के हो पालनहार
बस में साईं तुमरे है सब संसार
शरणागत के तुम तो हो प्राण आधार
उस कलयुग अवतारी का वंदन करूँ
ऐसे साईं का पल पल भजन मै करूँ
बंसी धारी तुम्ही तो हो मोहन साईं
जटाधारी तुम्ही भोले साईं तुम्ही
मन वचन से जो फ़र्ज़ निभाते हो तुम
ऐसे रघुकुल के हो राम साईं तुम्ही
ऐसे ब्रह्मा स्वरुप को नमन मैं करूँ
ऐसे साईं स्वरुप को नमन मैं करूँ
था दुखी क्षयरोग से बंदा साईं
भक्त भीमाजी के रोग को हर लिया
उदी को औषधि रूप देकर साईं
साईं तुमने नया उसको जीवन दिया
दुःख हरता का पल पल मैं वंदन करूँ
ऐसे साईं को चित्त में सदा मैं धरूँ
तुमने विठल का रूप दिखाकर साईं
काका जी के जीवन को धन्य किया
दामू अन्ना को पुत्र का धन देकर
उसके जीवन को था संतुष्ट किया
ऐसे साईं के चरणों में मस्तक धरूँ
ऐसे साईं को सब कुछ में अर्पण करूँ
चाँद भाई की घोड़ी दिलाकर साईं
उसको उलझन से तुमने निकाला साईं
पशु पक्षी से इतना तुम्हे प्रेम था
अपने हाथों से देते निवाला साईं
सभी जीवों के पलक का वंदन करूँ
साईं बारम्बार नमन मैं करूँ
कैसे गुणगान साईं मै तेरा करूँ
बुद्धि हीन हूँ साईं मै नादान हूँ
तुम तो दीन दयाल हो दाता साईं
मैं तो भूला भटका अनजान हूँ
अब करो मुझ पर भी कृपा तुम साईं
तेरे चरणों मै ही मैं तो बिनती करूँ
सुबह शाम जो भजता है तुमको साईं
उसका देते हो साथ सदा तुम साईं
दृढ भक्ति से गुणगान करता है जो
देते हैं उसको ही तो परम पद साईं
ऐसे मुक्ति के दाता का भजन करूँ
ऐसे साईं का निशदिन मैं नमन करूँ
तुम दयावान हो मेरे साईं सखा
मुझ पर भी दया तुम कर दो साईं
अपने चरणों में स्थान देकर मुझे
तोड़ दो मोह बंधन मेरे तुम साईं
सदा मुक्ति के मार्ग पे चलता रहूँ
तेरे चरणों की साईं मै सेवा करूँ
सुना है कृपावान हो तुम साईं
दीन हीनों पे करते कृपा हो साईं
मैं भी तो दीन हीन हूँ मेरे प्रभु
मुझपे नज़र -ए -इनायत हुई ना साईं
ऐसे कृपावान साईं को मै भजूँ
ऐसे साईं जी के मैं तो चरणन पडूँ
जिस पर भी हो साईं की रहम -ओ -नज़र
आसां होती है उसके जीवन की डगर
पाता है वो मुरादें तमाम उम्र
श्रद्धा सबुरी का पालन करे जो अगर
ऐसे दीन - ए -इलाही की हमद मै करूँ
श्रद्धा सबुरी का पालन सदा मै करूँ
अनंत कोटि हो ब्रह्माण्ड नायक साईं
तुम्ही राजाधिराज योगी राज साईं
तुम्ही परब्रह्म सच्चिदानंद साईं
तुम्ही सदगुरु श्री साईं नाथ साईं
ऐसे साईं की जय ही मै बोला करूँ
ऐसे साईं को जीवन मै अर्पण करूँ
तुमने रूप फकीरों का साईं धारा
कफनी थी सिर्फ एक तेरी साया साईं
शहंशाहों के थे शहंशाह तुम
फिर भी कंधे पे झोली लटकाई साईं
ऐसे रूप का साईं मै तो वंदन करूँ
ऐसे मोहन साईं मै दर्शन करूँ
हे जीवों को सुख देने वाले साईं
अपने चरणों मै मुझको भी तुम स्थान दो
इन चरणों के ध्यान मै लीन रहूँ
प्रभु मुझको भी ऐसा ही वरदान हो
आरती साईं तेरी मैं मन में करूँ
साईं चन्दन से श्रृंगार तेरा करूँ
हर गुरूवार को तेरे द्वारे आऊं
अपने मन से पापों को दूर करूँ
तेरे चरणों की छाया में हर पल रहूँ
इस जीवन को साईं सफल मै करूँ
जब बुलाओ तो शिर्डी मै जाया करूँ
धूल चरणों की मस्तक लगाया करूँ
तुमने लाखों को तारा है जग से प्रभु
मेरी नैया को भी पार कर दो साईं
मैं भी उम्मीद लेकर ये आया प्रभु
मेरे दमन को भी अब भर दो साईं
साईं मेरी है बस इक यही आरजू
तेरे दर पे जियूं तेरे दर पे मरुँ 

Sunday, 7 June 2020

तुझको पुकारू मै .... साईंयां

ॐ सांई राम


 तुझको पुकारू मै .... साईंयां
काहे ना आये ..........साईंयां

दीप जलायेनैन जगायेक्यों ना आये साईंयां तुझको पुकारू मै .... साईंयां
काहे ना आये ..........साईंयां


दीप जलायेनैन जगायेक्यों ना आये साईंयां तुझको पुकारू मै .... साईंयां
तुझको पुकारूँ में ..........साईंयां..........साईंयां ..........साईंयां
मुझसे भूल हुई क्या ऐसी
मुझसे क्यों दूर खड़ा |
एक नज़र मुझपर भी कर ले
चरणों में मै हूँ पड़ा |
जीव का रब से नाता क्या है,
साईं तू आ के बता |
तुझको पुकारूँ मैराह निहारूं मै,
दीप जलायेनैना जगायेक्यों ना आये साईंयां
तुझको पुकारूँ में ..........साईंयां..........साईंयां ..........साईंयां
दरस को तरसे नैना मेरे
एक झलक तो दिखा |
क्यों इतना मुझको तरसाए
मुझपे कृपा बरसा |
भटका हूँ अपनी राह से साईं
आ के तू राह दिखा |
हाल सुनाऊं मैआंसू दिखाऊँ मै,
दामन फैलायेआस लगायेसुन के तो आ जा साईंयां
तुझको पुकारूँ मैराह निहारूं मै,
दीप जलायेनैना जगायेक्यों ना आये साईंयां
तुझको पुकारूँ में ..........साईंयां..........साईंयां ..........साईंयां
 

Saturday, 6 June 2020

श्री साँई जी की जीवन गाथा​

ॐ श्री साँई राम जी


श्री साँई जी की जीवन गाथा

प्रथमेः वन्दन "गणपति",  दूजे "शारदा" माये |
मैं हूँ मूर्ख कलकामी, ज्ञान ना मुझमें समाये |1|

साँई जी की जीवन-गाथा, बाबा जी स्वयं लिखाये |
अथाह समुद्र साँई-गाथा, मोती कैसे हम चुन पाये |2|

चाहु आज्ञा बाबा जी से, साँई चरणन शीश नवाये |
सहाई रह कर अंग संग, मार्ग दर्शन बतलाये |3|

चाहना थी जब बाबा की, स्वंय स्वपन में आये |
इच्छा साँई की खातिर, जीवन गाथा लिख पाये |4|
बाल अवस्था उम्र सोलह, प्रगटे शिर्डी आये |
रूप फकीरी ढाल के, ढंग अनोखे अपनाये |5|

रत्न दिया एक श्रध्दा का, दूजा सबूरी बतलाये |
गर पाना हो साँई को, यही सही मार्ग अपनाये |6|

अजब निराला रंग रूप, सबके मन को भाये |
कुछ समय फिर दूर रहें, अज्ञातवास मनायें |7|

अज्ञातवास रहे कोपरगाँव, तपोभूमि कहलाये |
वन में बाबा घूम रहे, व्यक्ति उदास वह पाये |8|

चाँदपाटिल की घोड़ी खोयी, चाँद शोक मनाये |
बाबा जी की कृपा से, घोड़ी चाँद फिर पाये |9|
चिमटा मार के धरती पर, फकीरा अग्नि प्रघटाये |
उस अग्नि से चिलम जला, सत्य मार्ग बतलाये |10|

पाटिल की बारात संग, शिर्डी लौट कर आये |
चाँद को निशानी में, तोता अपना थमाये |11|

बाबा जी से पाटिल फिर, एक प्रश्न पूछते जाये |
हिन्दू है या मुसलमान, कृपा कर मुझे बताये |12|

यहाँ अली दिखे दिवाली में, राम रमजान मे आये |
हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई, बाबा को सब भाये |13|

खण्डोबा में म्हालसापति, आओ साँई बुलाये |
गुरुस्थान पेड़ नीम तले, बाबा जी रहे बताये |14|

जिसके नीचे प्रतिदिन बाबा, रहे बैठे ध्यान लगाये |
ध्यान मग्न देख शिर्डीवासी, अचरज में पड़ जाये |15|

म्हालसापति से कहे बाबा, गर गुरू की आज्ञा पाये |
पेड़ तले दिये चार जले, फकीरा सबसे कहता जाये |16|

नाम करू स्वीकार गर, नीम तले दीप जलते पाये |
गड्डा खुदा नीम पेड़ तले, जहाँ बाबा रहे बताये |17|

देख के जलते दिये चार, दाँतो तले उंगली दबाये |
तब से बाबा शिर्डी के,  श्री साँईं नाम कहाये |18|

मास्टर था इक शिर्डी मे, बच्चों को रोज पढ़ाये |
बाबा जी का भक्त था शामा, बाबा के मन भाये |19|

साँप ने काटा शामा को, पीड़ा बहुत सताये |
बाबा के मुख के वचन, विष पीड़ा हर जाये |20|

सबका मालिक एक है, यही मंत्र बतलाये |
खण्डर मस्जिद में बाबा, अध्भुत धूनी जलायें |21|

बाबा कृपा से अब मस्जिद, द्वारिकामाई कहलायें |
धूनी की उदी से सारे, कष्ट-पीड़ा मिट जाये |22|

उदी की महिमा बड़ी, रोगी के कष्ट मिटाये |
कैंसर दमा या कुष्ठ रोग, प्रसव पीड़ा भी हर जाये |23|

मात-पिता ज्ञात नहीं, बायजा माँ कहाये |
मित्र सखा कोई नहीं, तात्या भाई बताये |24|
बायजा माँ भी साँई की, सेवा करती जाये |
डाल टोकरी रोटी भाजी, जंगल ढूँढन जाये |25|

ध्यानमग्न बाबा जी के, चरणों में हाथ लगाये |
बाबा जी को नित्य वो, भोजन भी करवाये |26|

कुछ वर्षो के बाद बाबा, मस्जिद निवास बनाये |
जंगल ढूँढन कष्ट से, बायजा छूटकारा पाये |27|

कौड़ियों की सेवा करें, उनके कष्ट भगाये |
उनके दुखो को बाबा, स्वयं ही हरते जाये |28|

जात-पात और ऊँच-नीच, बाबा ना फर्क बताये |
पशु-पक्षी संग बैठ कर, बाबा जी भोजन खाये |29|

कोतवाल था गणपतराव, चाँदोलकर माँगे राये |
बाबा जी के नाम से, खतरे में हकुमत आये |30|

नर्तकी ले कर कोतवाल, साँई को परखन जाये |
बाबा लीला देख कर, अचरज में पड़ जाये |31|

एक चरण गंगा बहे, दुजे यमुना बहाये |
बाबा की आशीष पा, दास गणु कहलाये |32|

दास गणु को देख कर, चाँदोलकर गुस्साये |
साँई लीला जान कर, चरणन में शीष झुकाये |33|

मस्जिद में चाँदोलकर, साँई से अर्ज लगाये |
मैना बे-औलाद है, पुत्र रत्न वह पाये |34|

बेटी के प्रति पिता का, साँई मर्म जताये |
बाबा जी आशीष दे, जल्द पुत्र संग आये |35|

उसकी पीड़ा हरने को, बापूगीर भिजवाये |
रेल तक तो ठीक था, अब आगे कैसे जाये |36|

सफर सुगम करने को, बाबा जी रूप बनाये |
उदी पहुँचाने की खातिर, साँई तांगा लेकर जाये |37|

पुत्र रत्न प्राप्ति हुई, मैना खुशी मनाये |
चाँदोलकर भी बाबा के, भक्तों में जुड़ जाये |38|

एक बार की बात है, हैजा आतंक मचाये |
आस-पास के गाँव में, पांव पसारे जाये |39|

शिर्डीवासी बाबा जी से, रहम माँगने आये |
गेँहू पीसते देख कर, अचरज में पड़ जाये |40|

महिलाये मिल कर चार, आटे पर हक जमाये |
उनकी हरकत देखकर, बाबा जी क्रौध में आये |41|

चक्की पर गेँहू पीसें, अर्थ साँई समझाये |
उपरी भाग भक्ति का, निचला कर्म बताये |42|

चक्की की मुठिया को, बाबा ज्ञान बताये |
भवसागर रूपी चक्की से, बाबा हमें बचाये |43|

शिर्डीवासी आदेश से, आटा सीमा पर बिखराये |
लक्ष्मण रेखा रूपी आटा, हैजा दूर भगाये |44|

बायजा माँ रोगी हुई, स्वर्ग सिधारे जाये |
तात्या साँई से कहे, माँ कुछ कह नही पाये |45|

माँ के प्राणो की भिक्षा, तात्या माँगत जाये |
साँई बाबा तर्क करे, नीति के विरुध्द बताये |46|

लौटा दूँगा प्राण मैं, गर तू मुझको बतलाये |
दूनिया में कोई अमर है, घर एक मुझे बताये |47|

बाबा बैठे चिंता में, चिंता भक्तों की सताये |
चाँद पाटिल का तोता भी, वापिस लौट के आये |48|

बाबा को फिर स्मरण हुआ, चाँद की याद सताये |
बायजा माँ भी बिछड़ गई, अपने पास बुलाये |49|

साँई भक्तों से कहे, थोड़ा आराम वो पाये |
काम जरूरी है बहुत, वही करने को जाये |50|

महाल्सा से बाबा कहे, गर साँई लौट ना पाये |
यही था यही रहूँगा, मास्टर श्यामा से लिखवाये |51|

कुछ पल की लम्बी निद्रा, समाधी रूप धर जाये |
बहत्तर घंटे बीत गये, साँई भक्तन घबराये |52|

तब निद्रा से जागे साँई, सारा हाल सुनाये |
तांगे से उदी पहुँचा, "बायजा" "पाटिल" से मिल आये |53|

बच्चा एक लोहारन का, अग्नि में गिर जाये |
हाथ डाल कर धूनी में, बाबा जी उसे बचाये |54|

हाथ जला जब बाबा का, पीड़ा ना मुख पर आये |
भक्त थे फिर भागो जी, बाबा की सेवा पाये |55|

बालक था एक खापर्ड़े, रहा प्लेग उसे सताये |
गिल्टियाँ पड़ गई प्लेग की, छूने से ज्ञात हो जाये |56|

बादल बहु आकाश में, बाबा जी यह समझाये |
बादल छटते ही गगन, पुन: स्वच्छ हो जाये |57|

कहते हुए बाबा कमर तक, कफनी रहे उठाये |
गिल्टियाँ चार दिखा कर बोले, कष्ट साँई सह जाये |58|

अपने भक्तो की खातिर, साँई कष्ट रहे अपनाये |
भक्तो के कष्ट मेरे है, साँई जी कहते जाये |59|

भूखे पेट ना रह सके, जिसमें प्राण समायें |
भोजन ना हो पेट में, तो ध्यान वही रह जाये |60|

बाबा जी व्रत और उपवास, दोनो ही व्यर्थ बताये |
खाली पेट भोजन बिना, भजन भी रस ना पाये |61|

सीमित भोज परोसिये, कि भोजन व्यर्थ ना जाये |
आप भी भूखे ना रहे, अतिथी भी भोजन पाये |62|
कर्म हो पिछले जन्म के, या इस जन्म कमायें |
लेखा झोखा कर्मों का, हर प्राणी पूर्ण निभाये |63|

कष्ट लिखे जो भाग्य में, उसको सहता जाये |
प्राणी वो ही सफल है, जो पूर्ण जीवन बिताये |64|

अपना जीवन अपने हाथो, कभी ना स्वयं गवायें |
आत्महत्या महापाप है, साँई जी ये बतलाये |65|

कष्टों से हो के परेशान, गर जीवन तू गवाँये |
वही कष्ट फिर पुनर्जन्म, तेरे पीछे पीछे आये |66|

बाबा जी का नित्य ही, मन में स्मरण लाये |
इस मामूली परिश्रम से, आनन्दी फल पाये |67|

सात समुद्र पार के भी, भक्तों को खींचे जाये |
पाँव बंधे चिड़िया के जैसे, और खींची चली आये |68|

अम्मीर शक्कर बान्द्रा निवासी, बाबा की शरण में आये |
कष्ट था उनका असहनीय, गठिया का रोग सताये |69|

नौ माह बाबा आज्ञा से, चावड़ी में ही बस जाये |
मौका पा एक रात अम्मीर, सब छोड़ के भाग जाये |70|

कोपरगाँव की धर्मशाला में, रहे एक रात बिताये |
एक फकीर प्यासा बहुत, पानी रहे उसे पिलाये |71|

पानी पीते उस फकीर के, प्राण-पखेरू उड़ जाये |
भय का मारा अम्मीर शक्कर, लौट के शिर्डी आये |72|

गया था बाबा से बिन पुछे, अब बैठा पछताये |
फिर बाबा की कृपा पा, रोग से मुक्ति पाये |73|

बाबा जी भी चमत्कार, अजब अनोखे दिखाये |
दिये जलाये पानी से, कभी चिलम से दमा भगाये |74|

हो शिर्डी को जाना, या वापिस लौट के आये |
लौटे जब कभी शिर्डी से, साँई से आज्ञा पाये |75|

शिर्डी की पावन भूमी, कण-कण में साँई समाये |
बाबा की आज्ञा बिना, पत्ता भी हिल ना पाये |76|

बिन आज्ञा जो शिर्डी से, वापिस लौट के आये |
अवहेलना साँई आज्ञा की, दुष्परिणाम बन जाये |77|

बाबा की महिमा बड़ी, हर दिल में बस जाये |
बुलावे कभी भक्तो को, पहुँच स्वंय कभी जाये |78|

शामा जी काशी-प्रयाग, और गया को जाये |
तस्वीर रूप में बाबा को, पहले ही वहाँ पाये |79|

हो सफर कैसा भी, साँई जी सफल बनाये |
बाबा जी की भक्ति से, मंजिल अपनी पा जाये |80|

बाबा जी को पेड़ पौधे, हरियाली बहुत सुहाये |
अपने हाथों बीज-सींच कर, लेंडी बाग बनाये |81|

एक बार लेंडी बाग में, झुंड बकरों का आये |
दो बकरे उस झुंड मे, बाबा के मन को भाये |82|

प्रेम-पूर्वक हाथ फेर, शरीर उनका सहलाये |
अपने संग ले जाने को, रुपये बत्तीस चुकाये |83|

चंद लोग बाबा को देख, कौसने में लग जायें |
दो बकरों की कीमत तो, रुपये आठ ही आये |84|

साँई कहे ना कोई स्त्री, ना ही घर हम बनाये |
मेरा तो कोई नहीं, पैसे जोड़े फिर क्युँ जाये |85|

दाम चुका चार सेर दाल, बाजार से बाबा मँगायें |
खिला-पिला कर बकरो को, मालिक को रहे लौटाये |86|

देख अनोखा ये बर्ताव, बाबा से पूछे जाये |
ममता भरा प्रेम बकरों से, बाबा हमे बताये |87|

भाई थे ये पूर्व जन्म, इक-दूजे की जान लिवाये |
दूष्कर्मो के कारण ही, पुर्नजन्म बकरों का पाये |88|

त्रिलोकी स्वामी साँई, शिव सम रूप बनाये |
सटका थामें एक हाथ, टमरेल दूजे मे पाये |89|

चोला फकीरी टमरेल हाथ ले, भिक्षा माँगन जाये |
अल्लाह मालिक राम राम, सबको कहते जाये |89|

पाँच घरों से भिक्षा माँगें, लौट के मस्जिद आये |
अपने हाथों पका के भोजन, निर्धन को खिलाये |90|

कुछ घरों से भिक्षा पाये, कुछ से गाली खायें |
रूप फकीरी धारे बाबा, कुछ ने पत्थर बरसाये |91|

मैं मूर्ख हूँ कह चुका, साँई गाथा कैसे गाये |
साँई बाबा की लीला, कोई भी समझ ना पाये |92|

जो कुछ भी साँई बाबा, भिक्षा के रूप में लाये |
किसी को दस पन्द्रह या बीस, साँई जी बाँटते जाये |93|

बाबा की महिमा देखो, सब पर कृपा बरसाये |
बाबा की आशीष पा, भक्त बहुत हर्षाये |94|
बाबा जी को व्यक्ति वो, ना फूटी आँख सुहाये |
जो मदिरा सेवन करे, या उसका पान कराये |95|

प्रति तीजे दिन साँई जी, मस्जिद से दूरी पर जाये |
आँतें उदर से बाहर कर, धौने में लग जाये |96|

आँतों को कर साफ फिर, बरगद पर रहे सुखाये |
इस क्रिया के साक्षी कई, शिर्डी मे आज भी पाये |97|

एक रोज एक महाशय, जब द्वारिकामाई आये |
बाबा जी के अंगो को, पृथक पृथक वह पाये |98|

साँई का हो गया कत्ल, सोचा ये शोर मचाये |
पर सूचना देने वाला ही, पहले पकड़ा जाये |99|

ये सोच कर महाशय जी, बस चुप्पी साधे जाये |
अगले दिन मस्जिद गये, बाबा को स्वस्थ वह पाये |100|

बाबा को भक्तों के संग, देख के वह चकराये |
जो देखा आँखो से कल, कहीं स्वपन तो नही आये |101|

शिर्डी की सुन्दर गलियों में, बच्चों संग खेल रचाये |
खेले गोटी, आँख मिचोली, कुश्ती मन को भाये |102|

महाल्सा, तात्या संग बाबा, मस्जिद मे रात बिताये |
सिर पूर्व, पश्चिम और उत्तर, पैर से पैर मिलाये |103|

प्रेमपूर्वक चर्चा कर के, बातें करते जाये |
सो जाये गर एक भी, तो दूजा उसे जगाये |104|

चार हाथ लम्बा हथेली चौड़ा, डेंगले तख्ता लाये |
बाबा जी स्वीकार करे, निंद्रासन उसे बनाये |105|

उल्टे बाबा चिन्दियों संग, बाँस का झूला बनाये |
बाबा झूलत तख्ते पर, सुख निद्रा का पाये |106|

चिन्दियाँ थी कमजोर बहुत, तख्ते का भार ना पाये |
कैसे बाबा भार संग, तख्ता भी झूला जाये |107|

शिर्डीवासी दंग थे, रहस्य ऐसा दिखाये |
बाबा की लीला को देखन, भीड़ उमड़ी जाये |108|

लोगो की इस हरकत से, बाबा सकते में आये |
तख्त तोड़ फेंका बाहर, भूमी पर शयन बिछाये |109|

एक रात मस्जिद रहे, दूजी चावड़ी बिताये |
पर पीड़ा हरने की खातिर, बाबा धूनी रमाये |110|
राधा कृष्णा माई जी, बाबा की भक्त कहाये |
अपने हाथों सवाँर कर,  द्वारिकामाई सजाये |111|


बाबा जी को नित्य वो, भोजन भी करवाये |

प्रथम भोज बाबा जी को, फिर वो भोजन पाये |112|

ब्रह्मचर्य जीवन बाबा का, शाँत चित्त वह पाये |
पुरूषो को भ्राता कहे, स्त्री को माता बताये |113|

ब्रह्म ज्ञान की चाह में, सेठ मस्जिद में आये |
बाबा से विनती करे, ब्रह्म ज्ञान वह पाये |114|

बाबा जी पूछे प्रश्न, सेठ जी मुझे बतलाये |
जेब भरी थी पैसो से, फिर क्यों तुम झुठलाये |115|
बालक एक तुम्हारी जब, शरण मदद कल आये |
कुछ पैसो की खातिर, था रहा वो हाथ फैलाये |116|

इंकार किया मदद से तुमने, खाली जेब बतलाये |
ब्रह्म ज्ञान कैसे मिले, वश इंद्री कर ना पाये |117|

पाना हो गर ब्रह्म ज्ञान, पाँचो इंद्रियाँ वश लाये |
प्राणो संग बुध्दि और मन, अहंकार भी मिटाये |118|

भक्तो में मन चाह थी, चावड़ी उत्सव मनाये |
दिसम्बर दस उन्नीस सौ नौ, शुभ घड़ी वह आये |119|

एक तरफ तुलसी वृंदावन, रथ दूजी और सजाये |
बाबा जी के भक्तगण, रस भजनों का बरसाये |120|

मृदंग मंजीरों और ढोल संग, ताल से ताल मिलाये |
मस्जिद का पावन आँगन, जयकारो संग गूँजा जाये |121|

बाबा विराजित गादी पर, बगल में सटका दबाये |
चल दिये बाबा टोली संग, काँधे झोली लटकाये |122|



एक सुनहरी जरी दुशाला, तात्या बाबा को ओढ़ाये |

लकड़िया डाल के धूनी में, दीपक बाये हाथ बुझाये |123|

चल दिये बाबा चावड़ी को, भक्तन बहु हर्षाये |
ऐसा हो प्रतीत अब, दीपावली उत्सव मनाये |124|

बाबा जी की लीला का, अंत ना कोई पाये |
बच्चे पहुचे मस्जिद में, दीपावली मनाये |125|

बाबा भी हर्षित हुए, बच्चों संग मिल जाये |
दीपावली मनाने को, दीपक तेल मंगवाये |126|

बनियों ने दुत्तकार दिया, बाबा तेल ना पाये |
दीपावाली की शाम को, साँई पानी से दीप जलाये |127|

बाबा के इक भक्त थे, नाम मेघा कहाये |
बाबा के स्नान के लिये, उन्नीस कोस वो जाये |128|

घाघर सिर पे धर के, गोदावरी जल लाये |
अपने हाथों से मेघा, बाबा को स्नान कराये |129|

बाबा का आदेश था मेघा, केवल शीश भिगाये |
पलटी जब घाघर सिर पर, शरीर ना भीगने पाये |130|

साँई की सेवा पा कर, मेघा खुशी मनाये |
ले आज्ञा साँई से फिर, माथे पर तिलक लगाये |131|

क्रिया थी ये प्रतिदिन की, बस मेघा हक पाये |
बाबा जी के मुख से स्वंय, मेघा जी भक्त कहाये |132|

मेघा जी थे परम भक्त, बाबा के मन बस जाये |
त्याग शरीर मेघा गये, बाबा भी नीर बहाये |133|

मेघा था मेरा सच्चा भक्त, बाबा जी स्वंय बताये |
खर्चे अपने से बाबा, मृत्यु-भोज ब्राह्मण करवाये |134|
जो लिखा हो भाग्य में, वह तो स्वंय मिल जाये |
जो किस्मत मे नहीं लिखा, साँई जी वह दिलवाये |135|

एक बगीचा बाबा जी, मस्जिद के बगल बनाये |
अपने हाथों सींच कर, अति सुन्दर फूल लगाये |136|

बाबा जी के एक भक्त थे, बूटी सरकार कहाये |
श्री कृष्ण मन्दिर बने, उनको विचार ये आये |137|

यह सुन कर बाबा जी, सोचने कुछ लग जाये |
बाबा जी इस मुद्रा में, रहे मंद-मंद मुस्काये |138|

आने वाले कल की चिंता, बूटी क्युँ तुम्हे सताये |
कुछ तो अगले पल पे छोड़, समय ही तुझे बताये |139|

कौन विराजे इस मन्दिर में, स्वंय ज्ञात हो जाये |
मन्दिर कृष्ण का बने यहाँ, सब दर्शन करने आये |140|

मन्दिर निर्माण के मध्य में, साँई महासमाधी लगाये |
आज उसी मन्दिर में साँई, बैठे आसन स्वंय लगाये |141|

भक्तों की विपदा हरे, कष्टों को दूर भगाये |
वह पावन स्थान अब, समाधी मन्दिर कहलाये |142|

अक्टूबर की पन्द्रह तिथि, उन्नीस सौ अठराह आये |
मंगलवार की थी दोपहरी, समय ढाई बज जाये |143|

शिर्डीवासी सब मग्न थे, मिलकर त्यौहार मनाये |
बुध्द पूर्णिमा मोहर्रम, और विजयादशमी भी आये |144|

विजयादशमी के दिन सभी, उत्सव में डूबे जाये |
बाबा जी के पास लक्ष्मीबाई, बैठी भोजन लगाये |145|

एक निवाला ही बाबा की, शाँत भूख कर जाये |
आदेश दिया फिर गणु को, बाकी भक्तो मे बँट जाये |146|

बाबा जी के शरीर मे, एक कँपन सा उठ जाये |
देख दृश्य यह लक्ष्मी बाई, आँखो से नीर बहाये |147|

लक्ष्मी को चिंतित देख कर, साँई जी पास बुलाये |
साँई की हालत देख कर, आँखें तेरी क्युँ भर आये |148|

आया ही कब था मैं पगली, दूर जो तुम से जाये |
बाबा को भिक्षा देने वाली, आज साँई से भिक्षा पाये |149|

कफनी मे हाथ डाल कर, नौ सिक्के रहे थमाये |
"श्रवण" "कीर्तन" "नाम स्मरण", "सेवा" जो कर पाये |150|
"अर्चना" "वंदन "दास" फिर, "सखा" बन "निवेदन" आये |
नवधा भक्ति के नौ रूप ये, लक्ष्मी साँई जी से पाये |151|

पर्व तीनो थे एक ही दिन, कुछ खास घड़ी बतलाये |
बाबा यह कहने लगे, उचित दिन है अब आये |152|

अपनी ही अंतिमयात्रा की, बाबा योजना बनाये |
छोड़ पिंजरा रूपी शरीर, महासमाधी अपनाये |153|

पिंजरा खाली छोड़ कर, बाबा जी स्वर्ग को जाये |
बूटी को साँई जी कहे, मुझे वाड़े में ही सुलाये |154|

कृष्ण मन्दिर के स्थान पर, बाबा मुरलीधर बन जाये |
धन्य धन्य है बूटी वाड़ा, कण कण में साँई समाये |155|
बाबा जी की शिर्डी में, लाखों भक्त रोज आये |
बिन माँगे ही अपनी झोलियाँ, भर भर के ले जाये |156|

साँई की मस्जिद मे देखो, भक्त ऐसी अलख लगाये |
रामनवमी ईद और दीवाली, सब मिलजुल कर मनाये |157|

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई, सब शिर्डी में आये |
सबका मालिक एक है, सबमें साँई समाये |158|

कई कथायें ऐसी ही, किस कथा का गुण ना गाये |
सही सही बातें सभी, श्री साँई सच्चरित्र बताये |159|

नतमस्तक हूँ कृपावंत हूँ, साँई का स्वपन जो आये |
बाबा जी के आदेश से, साँई गाथा लिख पाये |160|

क्षमा याचना साँई चरणों में, त्रुटि मेरी बिसराये |
इस साँई गाथा को भक्तन, हृदय में अपने बसाये |161|

नित्य पठन जीवन गाथा का, जो भी ध्यान में लाये |
बाबा जी की हो कृपा, परम आनन्द वह पाये |162|

।। श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

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बाबा के 11 वचन

ॐ साईं राम

1. जो शिरडी में आएगा, आपद दूर भगाएगा
2. चढ़े समाधी की सीढी पर, पैर तले दुःख की पीढ़ी कर
3. त्याग शरीर चला जाऊंगा, भक्त हेतु दौडा आऊंगा
4. मन में रखना द्रढ विश्वास, करे समाधी पूरी आस
5. मुझे सदा ही जीवत जानो, अनुभव करो सत्य पहचानो
6. मेरी शरण आ खाली जाए, हो कोई तो मुझे बताए
7. जैसा भाव रहे जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मनका
8. भार तुम्हारा मुझ पर होगा, वचन न मेरा झूठा होगा
9. आ सहायता लो भरपूर, जो माँगा वो नही है दूर
10. मुझ में लीन वचन मन काया, उसका ऋण न कभी चुकाया
11. धन्य-धन्य व भक्त अनन्य, मेरी शरण तज जिसे न अन्य

.....श्री सच्चिदानंद सदगुरू साईनाथ महाराज की जय.....

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः॒ स्वः॒
तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यम्
भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि।
धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥

Word Meaning of the Gayatri Mantra

ॐ Aum = Brahma ;
भूर् bhoor = the earth;
भुवः bhuwah = bhuvarloka, the air (vaayu-maNdal)
स्वः swaha = svarga, heaven;
तत् tat = that ;
सवितुर् savitur = Sun, God;
वरेण्यम् varenyam = adopt(able), follow;
भर्गो bhargo = energy (sin destroying power);
देवस्य devasya = of the deity;
धीमहि dheemahi = meditate or imbibe

these first nine words describe the glory of Goddheemahi = may imbibe ; pertains to meditation

धियो dhiyo = mind, the intellect;
यो yo = Who (God);
नः nah = our ;
प्रचोदयात prachodayat = inspire, awaken!"

dhiyo yo naha prachodayat" is a prayer to God


भू:, भुव: और स्व: के उस वरण करने योग्य (सूर्य) देवता,,, की (बुराईयों का नाश करने वाली) शक्तियों (देवता की) का ध्यान करें (करते हैं),,, वह (जो) हमारी बुद्धि को प्रेरित/जाग्रत करे (करेगा/करता है)।


Simply :

तीनों लोकों के उस वरण करने योग्य देवता की शक्तियों का ध्यान करते हैं, वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।


The God (Sun) of the Earth, Atmosphere and Space, who is to be followed, we meditate on his power, (may) He inspire(s) our intellect.