शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Wednesday, 5 September 2018

श्री साईं लीलाएं - हैजे की क्या औकात, जब साईं बाबा है साथ

ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. सर्प विष-निवारक था
श्री साईं लीलाएं


हैजे की क्या औकात, जब साईं बाबा है साथ

एक बार शिरडी में हैजे का प्रकोप हो गया| जिससे शिरडीवासियों में भय फैल गया| अन्य गांवों से उनका सम्पर्क समाप्त-सा हो गया| तब गांव के पंचों ने यह आदेश जारी किया कि गांव में कोई भी आदमी बकरे की बलि न देगा और दूसरा यह कि गांव में लकड़ी की एक भी गाड़ी वगैरा बाहर से न आये| जो कोई भी इन आदेशों का पालन नहीं करेगा, उसे जुर्माना भरना पड़ेगा| सारे गांव में यह घोषणा कर दी गई|

साईं बाबा तो अंतर्यामी थे| बाबा इस बात को जानते थे कि यह सब कोरा अंधविश्वास है| इसलिए बाबा के लिए कौन-सा कानून और कैसा जुर्माना? इस दौरान शिरडी में एक दिन लकड़ियों से भरी एक गाड़ी आयी, तो उसे गांववालों ने गांव के बाहर ही रोक दिया और उसे वापस भगाने लगे| जबकि सब लोग इस बात को जानते थे कि इस समय गांव में लकड़ियों की सख्त आवश्यकता है| जुर्माने के डर से वह उसे गांव में प्रवेश करने से रोक रहे थे| साईं बाबा को जब इस बात का पता चला तो वे स्वयं वहां आए और गाड़ीवान से गाड़ी मस्जिद की ओर ले जाने को कहा| बाबा को रोक पाने या उन्हें कुछ कह पाने का साहस किसी में न था| फिर गाड़ीवान गाड़ी लेकर मस्जिद पर पहुंच गया|

मस्जिद में रात-दिन धूनी प्रज्जवलित रहती थी और उसके लिए लकड़ियों की आवश्यकता थी| बाबा ने लकडियां खरीद लीं| मस्जिद बाबा का ऐसा घर था, जो सभी जाति-धर्मों के लोगों के लिए हर वक्त खुला रहता था| गांव के गरीब लोग अपनी आवश्यकतानुसार मस्जिद से लकडियां ले जाते थे| बाबा कभी भी किसी से कुछ नहीं कहते थे| वे पूर्ण विरक्त थे|

पंचों के दूसरे आदेश 'बकरे की बलि न दी जाए' की भी बाबा ने कोई परवाह नहीं की| एक दिन एक व्यक्ति दुबला-पतला, मरियल-सा बकरा लाया| मालेगांव के फकीर पीर मोहम्मद उर्फ बड़े बाबा भी उस समय वहां पर मौजूद थे| वो साईं बाबा का बहुत आदर किया करते थे| सदैव बाबा के दाहिनी ओर बैठते थे| बाबा ने उन्हें बकरे को काटकर बलि चढ़ाने को कहा|

इन बड़े बाबा का भी बहुत महत्व था| साईं बाबा के चिलम भरने पर चिलम भी सबसे पहले बड़े बाबा पीते और बाद में साईं बाबा को देते थे| बाद में अन्य भक्तों को चिलम मिलती थी| दोपहर में भोजन के समय भी साईं बाबा बड़े बाबा को आदरपूर्वक बुलाकर अपनी दायीं ओर बैठाते थे और तब सब लोग भोजन करते थे| इसकी वजह थी साईं बाबा और बड़े बाबा का आपसी प्यार| जब भी बड़े बाबा साईं बाबा से मिलने के लिये आते थे, बाबा उनकी मेहमाननवाजी में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ते थे| बाबा के पास जितनी भी दक्षिणा इकट्ठी होती थी, बाबा उसमें से 50 रुपये रोजाना बड़े बाबा को दिया करते थे और जब वे शिरडी से विदा लेते तो बाबा उन्हें कुछ दूर तक छोड़ने उनके साथ जाते थे|इतना सम्मान करने पर भी जब साईं बाबा ने उनसे बकरा काटने को कहा, तो उन्होंने कहा कि बलि देना निरर्थक है| बेवजह किसी जीव की जान क्यों ली जाए? तब साईं बाबा ने शामा से कहा - "अरे शामा ! तू छुरी लाकर इस बकरे को काट दे|" यह सुनते ही शामा राधाकृष्णा माई के घर से एक छुरी उठा लाया| छुरी लाकर बाबा के सामने रख दी| लेकिन जब राधाकृष्णा माई को यह पता चला कि आज मस्जिद में बकरे की बलि दी जा रही है तो वह अपना छुरा उठाकर ले गयी| फिर शामा दूसरा छुरा लाने के गया तो लौटा ही नहीं| बहुत देर तक इंतजार देखने के बाद शामा मस्जिद नहीं लौटा| तब साईं बाबा ने काका साहब दीक्षित से कहा - "काका ! तुम छुरा लाकर इस बकरे को काट दो| इसको दर्दभरी जिंदगी से मुक्त कर दो|" जबकि वास्तव में बाबा उनकी परीक्षा लेना चाहते थे| काका साहब जाति के ब्राह्मण थे और नियम-धर्म का पालन करने वाले अहिंसा के पुजारी थे| सब लोग यह बड़ी उत्सुकता के साथ देख रहे थे कि आगे क्या होने वाला है?

काका साहब साठेवाड़ा से एक छुरा ले आये और बाबा की आज्ञा से बकरा काटने को तैयार हो गये| लोग बड़े आश्चर्य से यह देख रहे थे कि काका साहब ब्राह्मण होकर बकरे की बलि देने को तैयार हैं| फिर काका साहब ने बकरे पास खड़े होकर साईं बाबा से पूछा - "बाबा ! इसे काट दूं क्या?" बाबा बोले - "देखता क्या है, कर दे इसका काम-तमाम|" काका ने अपने छुरेवाला दाहिना हाथ ऊपर उठाया और वार करने ही वाले थे कि दौड़कर साईं बाबा ने उनका हाथ पकड़ा और बोले - "काका ! क्या तू सचमुच इसे मारेगा? ब्राह्मण होकर भी तुम बकरे की बलि दे रहे हो? तुम कितने निर्दयी हो? इस निरीह जीव को मारते हुए तुम्हें जरा भी बुरा नहीं लगा?"

यह सुनते ही काका ने छुरे को जमीन पर फेंक दिया| फिर बाबा ने पूछा - "काका ! इतना धार्मिक होने पर भी तेरे मन में इतनी बेहरमी कैसे?" इस पर काका बोले - "बाबा ! मैं कोई धर्म, अहिंसा नहीं जानता| आपके आदेश का पालन करना यही मेरा धर्म है, यही मेरे लिए सर्वोपरी है| यदि आपके आदेश पर मैं अच्छे-बुरे का विचार करूंगा तो मैं अपने सेवक धर्म से गिर जाऊंगा| गुरु का आदेश ही मेरा धर्म है| उसके आगे मैं कुछ भी नहीं जानता| आपका प्रत्येक शब्द मेरे सिर-आँखों पर है| आपकी आज्ञा का पालन करते हुए मेरे प्राण भी चले जायें तो कोई चिन्ता नहीं| आप मेरे गुरु हैं और मुझे आप पर पूर्ण विश्वास है|"

इस पर बाबा ने कहा कि वे स्वयं बकरे की बलि देंगे| तब वे तकिए के पास, जहां पर अनेक फकीर बैठते थे, वहां बकरे को बलि के लिए ले जाने लगे, लेकिन रास्ते में गिरकर ही बकरे ने प्राण त्याग दिये|

बाबा ने गुरु-आज्ञा की महत्ता दिखाने के लिए ही यह सब लीला रची थी| बड़े बाबा जैसे मुसलमान भक्त भी जहां इस परीक्षा में खरे न उतर सके, वहीं एक शुद्ध शाकाहारी ब्राह्मण बिना किसी बात की परवाह किए परीक्षा में सफल रहा|

 

परसों चर्चा करेंगे... सब कुछ गुरु को अर्पण करता चल
ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Tuesday, 4 September 2018

श्री साईं लीलाएं - सर्प विष-निवारक था

ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. योगी का आत्मसमर्पण
श्री साईं लीलाएं 

सर्प विष-निवारक था

शामा साईं बाबा के परमभक्त थे| साईं बाबा अक्सर कहा करते थे कि शामा अैर मेरा जन्मों-जन्म का नाता है| एक बार की बात है कि शाम के समय शामा को हाथ की अंगुली में एक जहरीले सांप ने डस लिया| सांप का जहर धीरे-धीरे अपना असर दिखाने लगा, तो दर्द के मारे शामा चीखने-चिल्लाने लगा| अब मृत्यु दूर नहीं, इस विचार के मन में आते ही घबराहट बढ़ गयी|

शाम की हालत को देखकर उसके मित्र उसे विठोला मंदिर ले जाना चाहते थे| वह मंदिर शिरडी के पास में ही था और सांप के काटे हुए व्यक्ति को वहां ले जाया जाता था| जहां इस तरह की पीड़ाओं का निवारण हो जाता था| परन्तु शामा अपने विठोवा यानी साईं बाबा के पास जाने के लिए मस्जिद की ओर दौड़े| साईं बाबा ने जब शामा को दूर से आता देखा, तो एकदम गरजते हुए क्रोधावेश में बोले - "ओ बम्मन ! रुक जा वहीं-के-वहीं| खबरदार ! अगर ऊपर चढ़ के आया तो| चल निकल जा, नीचे उतर|"

साईं बाबा को क्रोधावेश में देख और बाबा के वचन सुनकर शामा हैरान रह गया| वह बाबा को अपने जीवन का आधार मानता था| इसलिए पूरी तरह निराश होकर वहीं पर बैठ गया| कुछ देर बाद जब बाबा का क्रोध शांत हुआ और वे सामान्य हो गए तो शामा बाबा के पास जाकर बैठ गया| उसकी आँखें भर आयीं| साईं बाबा उससे बोले - " शामा ! डर मत| फिक्र की कोई बात नहीं| सीधा घर चला जा और शांति से बैठ, परन्तु घर से बाहर मत जाना| मुझ पर विश्वास रखते हुए चिंता छोड़ दे| मस्जिद का फकीर बहुत दयालु है| वह तुझे मरने नहीं देगा|" शामा की जान में जान में आ गयी|

शामा को घर भेजने के बाद बाबा ने तात्या और काका को उसके घर भेजा| उनके द्वारा कहलवा दिया - जो मन करे, खाये-पीये, घर में टहलता रहे, लेटना और सोना बिल्कुल नहीं| यानी जागता रहे| बाबा का प्यार देखकर शामा बेफिक्र हो गया| उसने बाबा के आदेश का दृढ़ता से पालन किया और सुबह होते ही मानो उसे नया जन्म मिल गया और वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया|

यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि शाम के समय बाबा ने जो शब्द 'चल निकल जा, नीचे उतर|' वे शामा को नहीं बल्कि उनका इशारा तो सांप और उसके जहर की तरफ था| तभी वह जहर बेअसर हो गया था| ऐसे हजारों चमत्कार किये थे बाबा ने|


कल चर्चा करेंगे...
हैजे की क्या औकात, जब साईं बाबा है साथ
ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Monday, 3 September 2018

श्री साईं लीलाएं - योगी का आत्मसमर्पण - आप सभी को श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर हमारे ग्रुप की ओर से हार्दिक शुभकामनायें

ॐ सांई राम
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आप सभी को श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर हमारे ग्रुप की ओर से हार्दिक शुभकामनायें 







कल हमने पढ़ा था.. सबका रखवाला साईं     
श्री साईं लीलाएं
योगी का आत्मसमर्पण
एक बार चाँदोरकर के साथ एक सज्जन साईं बाबा से मिलने के लिए शिरडी आये थे| उन्होंने योग साधना के अतिरिक्त अनेक ग्रंथों का भी अध्ययन किया था, लेकिन उन्हें जरा भी व्यावहारिक ज्ञान नहीं था| पलमात्र भी वे समाधि लगाने में सफल नहीं हो पाते थे| उनके समाधि साधने में बाधा आती थी| उन्होंने विचार किया कि यदि साईं बाबा उन पर कृपा कर देंगे तो उनकी समाधि लगाने के समय आने वाली बाधा समाप्त हो जाएगी| अपने इसी उद्देश्य से वे चाँदोरकर के साथ शिरडी आये थे|चाँदोरकर के साथ जब वे साईं बाबा के दर्शन करने के लिए मस्जिद पहुंचे तो उस समय साईं बाबा जुआर की बासी रोटी और कच्ची प्याज खा रहे थे| यह देखकर वह सज्जन सोचने लगे कि जो व्यक्ति कच्ची प्याज के संग बासी रोटी खाता हो, वह मेरी समस्या को कैसे दूर कर सकेगा? साईं बाबा तो अंतर्यामी थे| किसके मन में क्या विचार पैदा हो रहे हैं, यह उनसे छिपा न था| बाबा उन सज्जन के मन की बात जानकर नाना चाँदोरकर से बोले - "नाना ! जो प्याज को हजम करने की ताकत रखता है, प्याज भी उसी को खाना चाहिए, दूसरे को नहीं|"वह सज्जन जो स्वयं को योगी समझते थे, बाबा के शब्दों को सुनकर अवाकू रह गये और उसी पल बाबा के श्रीचरणों में नतमस्तक हो गये| बाबा ने उसकी सारी समस्यायें जान लीं और उसे उनका समाधान भी बता दिया|बाद में वे सज्जन बाबा के दर्शन कर जब वापस लौटने लगे तो बाबा ने उन्हें आशीर्वाद और ऊदी प्रसाद के साथ विदा किया|

कल चर्चा करेंगे... सर्प विष-निवारक था        
ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Sunday, 2 September 2018

श्री साईं लीलाएं - सबका रखवाला साईं

ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. अम्मीर शक्कर की प्राण रक्षा     

श्री साईं लीलाएं

सबका रखवाला साईं
साईं बाबा लोगों को उपदेश भी देते और उनसे विभिन्न धर्मग्रंथों का अध्ययन भी करवाते| साईं बाबा के कहने पर काका साहब दीक्षित दिन में एकनामी भागवत और रात में भावार्थ रामायण पढ़ते थे| उसका यह नियम और समय कभी नहीं चूकता था|एक दिन काका साहब दीक्षित जब रामायण पाठ कर रहे थे तब हेमाडंपत भी वहां पर उपस्थित था| वहां उपस्थित सभी श्रोता पूरी तन्मयता के साथ प्रसंग का श्रवण कर रहे थे| हेमाडंपत भी प्रसंग सुनने में पूरी तरह से मग्न थे|लेकिन तब ही न जाने कहां से एक बिच्छू आकर हेमाडंपत पर आकर गिरा और उनके दायें कंधे पर बैठ गया| हेमाडंपत को इसका पता न चला| कुछ देर बाद जब बाबा की नजर अचानक हेमाडंपत के कंधे पर पड़ी तो उन्होंने देखा कि बिच्छू उनके कंधे पर मरने जैसी अवस्था में पड़ा था| लेकिन बाबा ने बड़ी शांति के साथ बिच्छू को धोती के दोनों किनारे मिलाकर उसमें लपेटा और दूर जाकर छोड़ आये| बाबा की प्रेरणा से ही वह बिच्छू से बचे और कथा भी बिना बाधा के चलती रही|इसी तरह एक बार शाम के समय काका साहब दीक्षित बाड़े के ऊपरी हिस्से में बैठे हुए थे| उसी समय एक सांप खिड़की की चौखट से छोटे-से छेद में से होकर अंदर आकर कुंडली मारकर बैठ गया| अंधेरे में तो वह दिखाई नहीं दिया, लेकिन लालटेन की रोशनी में वह स्पष्ट दिखाई पड़ा| वह बैठा हुआ फन हिला रहा था|तभी कुछ लोग लाठी लेकर वहां दौड़े| उसी हड़बड़ाहट में वह सांप वहां से जान बचाने के लिए उसी छेद में से निकलकर भाग गया| लोगों ने उसके भाग जाने पर चैन की सांस ली| जब सांप भाग गया तो वहां उपस्थित लोग आपस में वाद-विवाद करने लगे| एक भक्त मुक्ताराम का कहना था - "कि अच्छा हुआ जो एक जीव के प्राण जाने से बच गए|" लेकिन हेमाडंपत को गुस्सा आ गया और वे मुक्ताराम का प्रतिरोध करते हुए बोले - "ऐसे खतरनाक जीवों के बारे में दया दिखायेंगे तो यह दुनिया कैसे चलेगी? सांप को तो मार डालना ही अच्छा था|" इस बारे में दोनों में बहुत देर तक बहस होती रही| दोनों ही अपनी-अपनी बातों पर अड़े रहे| आखिर में जब रात काफी हो गयी तो, तब कहीं जाकर बहस रुकी| सब लोग सोने के लिये चले गये|अगले दिन प्रात: जब सब लोग बाबा के दर्शन करने के लिए मस्जिद में गये, तब बाबा ने पूछा - "कल रात दीक्षित के घर में क्या बहस हो रही थी?" तब हेमाडंपत ने बाबा को सारी बात बताते हुए पूछा कि सांप को मारा जाये या नहीं? तब बाबा अपना निर्णय सुनाते हुए बोले - "सभी जीवों में ईश्वर का वास है| वह जीव चाहे सांप हो या बिच्छू| ईश्वर ही सबके नियंता हैं| ईश्वर की इच्छा के बिना कोई भी किसी को हानि नहीं पहुंचा सकता| इसलिए सबसे प्यार करना चाहिए| सारा संसार ईश्वर के आधीन है और इस संसार में रहनेवाले किसी का भी अलग अस्तित्व नहीं है| इसलिए सब जीवों पर दया करनी चाहिए| जहां तक संभव हो हिंसा न करें| हिंसा से क्रूरता बढ़ती है| धैर्य रखना चाहिए| अहिंसा में शांति और संतोष होता है| इसलिए शत्रुता त्यागकर शांत मन से जीवन जीना चाहिए| ईश्वर की सबका रक्षक है|" बाबा के इस अनमोल उपदेश को हेमाडंपत कभी नहीं भूले| बाबा ने हेमाडंपत ही नहीं अपने सम्पर्क में आये हजारों लोगों का जीवन सुधारा| वे सन्मार्ग पर चलने लगे|

कल चर्चा करेंगे... योगी का आत्मसमर्पण        
ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Saturday, 1 September 2018

श्री साईं लीलाएं - अम्मीर शक्कर की प्राण रक्षा

ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. बापू साहब बूटी को अभय दान     

श्री साईं लीलाएं

अम्मीर शक्कर की प्राण रक्षा

बांद्रा में रहनेवाला अम्मीर शक्कर साईं बाबा का भक्त था| वह वहां पर दलाली किया करता था| एक बार उसे गठिया रोग हो गया| रोग के कारण उसे असहनीय कष्ट का सामना करना पड़ रहा था| आखिर में बीमारी से परेशान होकर अपना काम-धंधा छोड़कर शिरडी आ गया और साईं बाबा से अपनी बीमारी के बारे में बताकर, उनसे मुक्ति दिलाने के लिए प्रार्थना करने लगा| उसकी प्रार्थना सुनकर बाबा ने उसे चावड़ी में रहने के लिए कहा|

उस समय चावड़ी ऐसे रोगियों के रहने के लिए किसी भी तरह अनुकूल स्थान नहीं था, क्योंकि वह बहुत टूटी-फूटी और सीलनभरी थी| बरसात के मौसम में उसकी छत भी टपका करती थी, परन्तु बाबा की आज्ञा को कैसे टाला जा सकता था| अत: अम्मीर शक्कर वहां मन मारकर रहने लगा|

इतना ही नहीं, बाबा ने उसे मस्जिद में आने को मना कर रखा था, लेकिन बाबा का यह नियम था कि वह सुबह-शाम चावडी से होकर ही निकला करते थे| बाबा एक दिन के अंतराल पर जुलूस के साथ वहां पर आते और विश्राम भी करते थे| वहीं पर भक्त बाबा का पूजन, आरती करते| अम्मीर शक्कर को वहां बैठे-बैठे ही बाबा का दर्शन लाभ होता था| उसे वहां रहते हुए नौ महीने बीत गये|

अम्मीर शक्कर का वहां रहते हुए मन ऊब गया| उसे चावड़ी बंदीखाना लगने लगी| वैसे उसका गांव वहां से ज्यादा दूर नहीं था और वह वहां पर आराम से रह भी सकता था, लेकिन बाबा से अनुमति मांगी जाये तो शायद वे अनुमति न देंगे| इसलिए एक रात को वे चोरी-छिपे वहां से निकलकर कोपर गांव से जाकर एक धर्मशाला में ठहर गया| वहां पर उसने एक फकीर को देखा जो पानी के अभाव में तड़फ रहा था| उसने अम्मीर शक्कर से पानी मांगा| अम्मीर शक्कर ने उसे पानी लाकर दिया| पानी पीते ही फकीर ने दम तोड़ दिया| यह देखकर अम्मीर के होश उड़ गये| वह क्या करे और क्या न करे? उसने सोचा कि यदि इसके मरने की सूचना पुलिस को देता हूं तो पुलिस मुझे ही पकड़ेगी| फिर न जाने कौन-कौन-सी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा और पूरी छानबीन होने तक, उसे बेगुनाह होने तक पुलिस उसका पीछा नहीं छोड़ेगी| ऐसा सोचकर वह वहां से भाग निकला और सवेरा होने से पहले वे शिरडी जा पहुंचा| उस समय उसे बाबा की अनुमति के बिना शिरडी छोड़ने का अत्यन्त पछतावा हो रहा था| वह मन-ही-मन बाबा से प्रार्थना करने लगा और बाबा से माफी मांगते हुए चावड़ी लौटा, तो उसकी जान में जान आयी| इसके बाद वो चावड़ी में तब तक रहा, जब तक बाबा ने उसे वहां से जाने की अनुमति नहीं दी - और बाबा के आशीर्वाद से वह बीमारी से मुक्त हो गया|

अम्मीर शक्कर जिस चावड़ी में रहता था, साईं बाबा भी एक दिन छोड़कर रात में वहां सोते थे| चावड़ी में बाबा के साथ अम्मीर शक्कर भी सोता था| एक बार की बात है कि आधी रात के बाद बाबा ने जोर-जोर से अब्दुल को पुकार कर कहा - "अब्दुल ! जरा देख तो सही कोई दुष्ट मेरे बिस्तर पर चढ़ा आ रहा है|"

अब्दुल दौड़कर लालटेन ले आया और उसने बाबा का बिस्तर बहुत ध्यान से देखा, लेकिन उसे कुछ भी दिखाई न दिया| तब बाबा ने अब्दुल से जरा ध्यान से देखने को कहा और जमीन पर अपना सटका जोर-जोर से पटकने लगे|

इस हड़बड़ी से अम्मीर शक्कर की नींद टूट गयी| उसे यहां रहते हुए बहुत दिन हो चुके थे| उसे बाबा की बातों का कुछ-कुछ अंदाजा हो चुका था| भक्तों के संकटों को बाबा स्वयं का संकट कहते थे| फिर जब उसकी नजर अपने बिस्तर के पास में पड़ी तो देखा कि वहां पर कुछ हलचल हो रही है - और अब्दुल को लालटेन लाने को कहा, तो वहां पर सांप कुड़ली फैलाये बैठा, फन हिला रहा था, सबने देखा| फिर सबने मिलकर उस सांप को मार डाला| इस तरह बाबा ने समय से पहले ही सूचित करके अम्मीर शक्कर के प्राणों की रक्षा की|



कल चर्चा करेंगे... सबका रखवाला साईं
ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

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Gautam Budh Nagar, Uttar Pradesh. INDIA.

बाबा के 11 वचन

ॐ साईं राम

1. जो शिरडी में आएगा, आपद दूर भगाएगा
2. चढ़े समाधी की सीढी पर, पैर तले दुःख की पीढ़ी कर
3. त्याग शरीर चला जाऊंगा, भक्त हेतु दौडा आऊंगा
4. मन में रखना द्रढ विश्वास, करे समाधी पूरी आस
5. मुझे सदा ही जीवत जानो, अनुभव करो सत्य पहचानो
6. मेरी शरण आ खाली जाए, हो कोई तो मुझे बताए
7. जैसा भाव रहे जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मनका
8. भार तुम्हारा मुझ पर होगा, वचन न मेरा झूठा होगा
9. आ सहायता लो भरपूर, जो माँगा वो नही है दूर
10. मुझ में लीन वचन मन काया, उसका ऋण न कभी चुकाया
11. धन्य-धन्य व भक्त अनन्य, मेरी शरण तज जिसे न अन्य

.....श्री सच्चिदानंद सदगुरू साईनाथ महाराज की जय.....

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः॒ स्वः॒
तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यम्
भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि।
धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥

Word Meaning of the Gayatri Mantra

ॐ Aum = Brahma ;
भूर् bhoor = the earth;
भुवः bhuwah = bhuvarloka, the air (vaayu-maNdal)
स्वः swaha = svarga, heaven;
तत् tat = that ;
सवितुर् savitur = Sun, God;
वरेण्यम् varenyam = adopt(able), follow;
भर्गो bhargo = energy (sin destroying power);
देवस्य devasya = of the deity;
धीमहि dheemahi = meditate or imbibe

these first nine words describe the glory of Goddheemahi = may imbibe ; pertains to meditation

धियो dhiyo = mind, the intellect;
यो yo = Who (God);
नः nah = our ;
प्रचोदयात prachodayat = inspire, awaken!"

dhiyo yo naha prachodayat" is a prayer to God


भू:, भुव: और स्व: के उस वरण करने योग्य (सूर्य) देवता,,, की (बुराईयों का नाश करने वाली) शक्तियों (देवता की) का ध्यान करें (करते हैं),,, वह (जो) हमारी बुद्धि को प्रेरित/जाग्रत करे (करेगा/करता है)।


Simply :

तीनों लोकों के उस वरण करने योग्य देवता की शक्तियों का ध्यान करते हैं, वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।


The God (Sun) of the Earth, Atmosphere and Space, who is to be followed, we meditate on his power, (may) He inspire(s) our intellect.