शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Thursday, 23 August 2018

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 8

ॐ सांई राम



आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं |

हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है |

हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा| किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है|



श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 8
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मानव जन्म का महत्व, श्री साईबाबा की भिक्षा-वृत्ति, बायजाबई की सेवा-शुश्रूशा, श्री साईबाबा का शयनकक्ष, खुशालचन्त पर प्रेम ।
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जैसा कि गत अध्याय में कहा गया है, अब श्री हेमाडपन्त मानव जन्म की महत्ता को विस्तृत रुप में समझातेहैं । श्री साईबाबा किस प्रकार भिक्षा उपार्जन करते थे, बायजाबाई उनकी किस प्रकार सेवा-शुश्रूशा करती थी, वे मसजिद में तात्या कोते और म्हालसापति के साथ किस प्रकार शयन करते तथा खुशानचन्द पर उनका कैसा स्नेह था, इसका आगे वर्णन किया जायेगा ।

मानव जन्म का महत्व
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इस विचित्र संसार में ईश्वर ने लाखों प्राणियों (हिन्दू शास्त्र के अनुसार 84 लाख योनियों) को उत्पन्न किया है (जिनमें देव, दानव, गन्धर्व, जीवजन्तु और मनुष्य आदि सम्मिलित है), जो स्वर्ग, नरक, पृथ्वी, समुदआ तथा आकाश में निवास करते और भिन्न-भिन्न धर्मों का पालन करते हैं । इन प्राणियों में जिनका पुण्य प्रबल है, वे स्वर्ग में निवास करते और अपने सत्कृत्यों का फल भोगते हैं । पुण्य के क्षीण होते ही वे फिर निम्न स्तर में आ जाते हैं और वे प्राणी, जिन्होंने पाप या दुष्कर्म किये हैं, नरक को जाते और अपने कुकर्मों का फल भोगते हैं । जब उनके पाप और पुण्यों का समन्वय हो जाता है, तब उन्हें मानव-जन्म और मोक्ष प्राप्त करने का अवसर प्राप्त होता है । जब पाप और पुण्य दोनों नष्ट हो जाते है, तब वे मुक्त हो जाते हैं । अपने कर्म तथा प्रारब्ध के अनुसार ही आत्माएँ जन्म लेतीं या काया-प्रवेश करती हैं ।


मनुष्य शरीर अनमोल
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यह सत्य है कि समस्त प्राणियों में चार बातें एक समान है – आहार, निद्रा, भय और मैथुन । मानव प्राणी को ज्ञान एक विशेष देन हैं, जिसकी सहायता से ही वह ईश्वर-दर्शन कर सकता है, जो अन्य किसी योलि में सम्भव नहीं । यही कारण है कि देवता भी मानव योनि से ईष्रर्य़ा करते हैं तथा पृथ्वी पर मानव-जन्म धारण करने के हेतु सदैव लालायित रहते है, जिससे उन्हें अंत में मुक्ति प्राप्त हो ।
किसी-किसी का ऐसा भी मत है कि मानव-शरीर अति दोषयुक्त है । यह कृमि, मज्जा और कफ से परिपूर्ण, क्षण-भंगुर, रोग-ग्रस्त तथा नश्वर है । इसमें कोई संदेह नहीं कि यह कथन अंशतः सत्य है । परन्तु इतना दोषपूर्ण होते हुए भी मानव शरीर का मूल्य अधिक है, क्योंकि ज्ञान की प्राप्ति केवल इसी योनि में संभव है । मानव-शरीर प्राप्त होने पर ही तो ज्ञात होता है कि यह शरीर नश्वर और विश्व परिवर्तनशीन है और इस प्रकार धारणा कर इन्द्रिय-जन्य विषयों को तिलांजलि देकर तथा सत्-असत् क् विवेक कर ईश्वर-साक्षात्कार किया जा सकता है । इसलिये यदि हम शरीर को तुच्छ और अपवित्र समझ कर उसकी उपेक्षा करे तो हम ईश्वर दर्शन के अवसर से वंचित रह जायेंगे । यदि हम उसे मूल्यवान समझ कर उसका मोह करेंगे तो हम इन्द्रिय-सुखों की ओर प्रवृत्त हो जायेंगे और तब हमारा पतन भी सुनिशि्चत ही हैं ।
इसलिये उचित मार्ग, जिसका अवलम्बन करना चाहिये, यह है कि न तो देह की उपेक्षा ही करो और न ही उसमें आसक्ति रखो । केवल इतना ही ध्यान रहे कि किसी घुड़सवार का अपनी यात्रा में अपने घोड़े पर तब तक ही मोह रहता है, जब तक वह अपने निर्दिष् स्थान पर पहुँच कर लौट न आये ।
इसलिये ईश्वर दर्शन या आत्मसाक्षात्कार के निमित्त शरीर को सदा ही लगाये रखना चाहिये, जो जीवन का मुख्य ध्येय है । ऐसा कहा जाता है कि अनेक प्राणियों की उत्पत्ति करने के पश्चात् भी ईश्वर को संतोष नहीं हुआ, कारण यह है कि कोई भी प्राणी उसकी अलौकिक रचना और सृष्टि को समझने में समर्थ न हो सका और इसी कारण उसने एक विशेष प्राणी अर्थात् मानव जाति की उत्पत्ति की और उसे ज्ञान की विशेष सुविधा प्रदान की । जब ईश्वर ने देखा कि मानव उसकी लीला, अद्भभुत रचनाओं तथा ज्ञान को समझने के योग्य है, तब उन्हें अति हर्ष एवं सन्तोष हुआ । (भागवत स्कंध 11-9-28 के अनुसार) । इसलिये मानव जन्म प्राप्त होना बड़े सौभाग्य का सूचक है । उच्च ब्राहमण कुल में जन्म लेना तो परम सौभाग्य का लक्षण है, परन्तु श्री साई-चरणाम्बुजों में प्रीति और उनकी शरणागति प्राप्त होना इन सभी में अति श्रेष्ठ हैं ।

मानव का प्रत्यन
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इस संसार में मानव-जन्म अति दुर्लभ है । हर मनुष्य की मृत्यु ते निश्चित ही है और वह किसी भी क्षण उसका आलिंगन कर सकती है । ऐसी ही धारणा कर हमें अपने ध्येय की प्राप्ति में सददैव तत्पर रहना चाहिये । जिस प्रकार खोये हुये राजकुमार की खोज में राजा प्रत्येक सम्भव उपाय प्रयोग में लाता है, इसी प्रकार किंचित् मात्र भी विलंब न कर हमें अपने अभीष्ट की सिदि के हेतु शीघ्रता करनी ही सर्वथा उचित है । अतः पूर्ण लगगन और उत्सुकतापूर्वक अपने ध्येय, आलस्य और निद्रा को त्याग कर हमें ईश्वर का सर्वदा ध्यान रखना चाहिये । यदि हम ऐसा न कर सकें तो हमें पशुओं के स्तर पर ही अपने को समझना पड़ेगा ।

कैसे प्रवृत्त होना ।
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अधिक सफलतापूर्वक और सुलभ साक्षात्कार को प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है-किसी योग्य संत या सदगुरु के चरणों की शीतल छाया में आश्रय लेना, जिसे कि ईश्वर-साक्षात्कार हो चुका हो । जो लाभ धार्मिक व्याख्यानों के श्रवण करने और धार्मिक ग्रन्थों के अध्ययन करने से प्राप्त नहीं हो सकता, वह इन उच्च आत्मज्ञानियों की संगति से सहज ही में प्राप्त हो जाता है । जो प्रकाश हमें सूर्य से प्राप्त होता है, वैसा विश्व के समस्त तारे भी मिल जायें तो भी नहीं दे सकते । इसी प्रकार जिस आध्यात्मिक ज्ञान की उपलब्धि हमें सदगुरु की कृपा से हो सकती है, वह ग्रन्थों और उपदेशों से किसी प्रकार संभव नहीं है । उनकी प्रत्येक गतिविधि, मृदु-भाषण, गुहा उपदेश, क्षमाशीलता, स्थरता, वैराग्य, दान और परोपकारिता, मानव शरीर का नियंत्रण, अहंकार-शून्यता आदि गुण, जिस प्रकार भी वे इस पवित्र मंगल-विभूति दृारा व्यवहार में आते है, सत्संग दृारा भक्त लोगों को उसके प्रत्यक्ष दर्शन होते है । इससे मस्तिष्क की जागृति होती तथा उतत्रोत्तर आध्यात्मिक उन्नति होती रहती है । श्री साईबाबा इसी प्रकार के एक संत या सदगुरु थे । यघपि वे बाहृरुप से एक फकीर का अभिनय करते थे, परन्तु वे सदैव आत्मलीन रहते थे । वे समस्त प्राणियों से प्रेम करते और उनमें भगवत्-दर्शन का अनुभव करते थे । सुखों का उनको कोई आकर्षण न था और न वे आपत्तियों से विचलित होते थे । उनके लिये अमीर और फकीर दोनों ही एक समान थे । जिनकी उपार्जन किया करते थे । यह कार्य वे इस प्रकार करते थे –



श्री साईबाबा की भिक्षा-वृत्ति
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शिरडीवासियों के भाग्य की कौन कल्पना कर सकता है कि जिनके दृार पर परब्रहा भिक्षुक के रुप में खड़े रहकर पुकार करते थे, औ साई । एक रोटी का टुकड़ा मिले और उसे प्राप्त करने के लिये अपना हाथ फैलाते थे । एक हाथ में वे सदा टमरेल लिये रहते तथा दूसरे में एक झोली । कुछ गृहों में तो वे प्रतिदिन ही जाते और किसी-किसी के दृार पर केवल फेरी ही लगाते थे । वे साग, दूध या छाँछ आदि पदार्थ तो टिनपाट में लेते तथा भात व रोटी आदि अन्य सूखी वस्तुएँ झोली में डाल लेते थे । बाबा की जिहृा को कोई स्वाद-रुचि न थी, क्योंकि उन्होंने उसे अपने वश में कर लिया था । इसलिये वे भिन्न-भिन्न वस्तुओं के स्वाद की चिन्ता क्यों करते । जो कुछ भी भिक्षा में उन्हें मिल जाता, उसे ही वे मिश्रित कर सन्तोषपूर्वक ग्रहण करते थे ।
अमुक पदार्थ स्वादिष्ट है या नही, बाबा ने इस ओर कभी ध्यान ही न दिया, मानो उनकी जिहृा में स्वाद बोध ही न हो । वे केवल मध्याहृ तक ही भिक्षा-उपार्जन करते थे । यह कार्य बहुत अनियमित था । किसी दिन तो वो छोटी सी फेरी ही लगाते तथा किसी दिन बारह बजे तक । वे एकत्रित भोजन एक कुण्डी में डाल देते, जहाँ कुत्ते, बिल्लियाँ, कौवे आदि स्वतंत्रतापूर्वक भोजन करते थे । बाबा ने उन्हें कभी नहीं भगाया । एक स्त्री भी, जो मसजिद में झाडू लगाया करती थी, रोटी के दस-बारह टुकड़े उठाकर अपने घर ले जाती थी, परन्तु किसी ने कभी उसे नहीं रोका । जिन्होंने स्वप्न में भी बिल्लियों और कुत्तों को कभी दुतकार कर नहीं भगाया, वे भला निस्सहाय गरीबों को रोटी के कुछ टुकड़ो को उठाने से क्यों रोकते । ऐसे महान् पुरुष का जीवन धन्य हैं । शिरडीवासी तो पहले पहल उन्हें केवल एक पागल ही समझते थे और वे शिरडी में इसी नाम से विख्यात भी हो गये थे । जो भिक्षा के कुछ टुकडो पर निर्वाह करता हो, भला उसका कोई आदर कैसे करता । परंतु ये तो उदार हृदय, त्याती और धर्मात्मा थे । यघपि वे बाहर से चंचल और अशान्त प्रतीत होते थे, परन्तु अन्तःकरण से दृढ़ और गंभीर थे । उनका मार्ग गहन तथा गूढ़ था । फिर भी ग्राम में कुछ ऐसे श्रदृावान् और सौभाग्यशाली व्यक्ति थे, जिन्होंने उन्हें पहिचान कर एक महान् पुरुष माना । ऐसी ही एक घटना नीचे दी जाती हैं ।



बायजाबई की सेवा
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तात्या कोते की माता, जिनका नाम बायजाबाई था, दोपहर के समय एक टोकरी में रोटी और भाजी लेकर जंगल को जाया करती थीं । वे जंगल में कोसों दूर जाती और बाबा को ढूँढ़कर उनके चरण पकड़ती थीं । बाबा तो शान्त और ध्यानमग्न बैठे रहते थे । वे एक पत्तल बिछाकर उस पर सब प्रकार के व्यंजनादि जैसे-रोटी, साग आदि परोसती और बाबा से भोजन कर लेने के लिये आग्रह करती । उनकी सेवा तथा श्रदृा की रीति बड़ी ही विलक्षण थी – प्रतिदिन दोपहर को जंगल में बाबा को ढूँढ़ना और भोजन के लिये आग्रह करना । उनकी सेवा और उपासना की स्मृति बाबा को अपने अन्तिंम क्षणों तक बनी रही । उनकी सेवा का ध्यान कर बाबा ने उनके पुत्र को बहुत लाभ पहुँचाया । माँ और बेटे दोनों की ही फकीर पर दृढ़ निष्ठा थी । उन्होंने बाबा को सदैव ईश्वर के समान ही पूजा । बाबा उनसे कभी-कभी कहा करते थे कि फकीरी ही सच्ची अमीरी है । उसका कोई अन्त नहीं । जिसे अमीरी के नाम से पुकारा जाता है, वह शीघ्र ही लुप्त हो जाने वाली है । कुछ वर्षों के अनन्तर बाबा ने जंगल में विचरना त्याग दिया । वे गाँव में ही रहने और मसजिद में ही भोजन करने लगे । इस कारण बायजाबाई को भी उन्हें जंगल में ढूँढ़ने के कष्ट से छुटकारा मिल गया।

तीनों का शयन-कक्ष
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वे सन्त पुरुष धन्य है, जिनके हृदय मेंभगवान वासुदेव सदैव वास करते है । वे भक्त भी भाग्यशाली है, जिन्हें उनका सालिध्य प्राप्त होता है । ऐसे ही दो भाग्यशाली भक्त थे ।
1. तात्या कोते पाटील और
2. भगत म्हालसापति ।

दोनों ने बाबा के सानिध्य का सदैव पूर्ण लाभ उठाया । बाबा दोनों पर एक ससमान प्रेम रखते थे । ये तीनों महानुभाव मसजिद में अपने सिर पूर्व, पश्चिम तथा उत्तर की ओर करते और केन्द्र में एक दूसरे के पैर से पैर मिलाकर शयन किया करते थे । बिस्तर में लेटे-लेटे ही वे आधी रात तक प्रेमपूर्वक वार्तालाप और इधर-उधर की चर्चायें किया करते थे । यदि किसी को भी निद्रा आने लगती तो दूसरा उसे जगा देता था । यदि तात्या खुर्रार्टे लेने लगते तो बाबा शीघ्र ही उठकर उसे हिलाते और सिर पकड़ कर जोर से दबाते थे । यदि कहीं वह म्हालसापति हुए तो उन्हें भी अपनी ओर खींचते और पैंरों पर धक्का देकर पीठ थपथपाते थे । इस प्रकार तात्या ने 14 वर्षों तक अपने माता-पिता को गृह ही पर छोड़कर बाबा के प्रेमवश मसजिद में निवास किया । कैसे सुहाने दिन थे वे । उनकी क्या कभी विस्मृति हो सकती है । उस प्रेम के क्या कहना । बाबा की कृपा का मूल्य कैसे आँका जा सकता था । पिता की मृत्यु होने के पश्चात तात्या पर घरबार की जिम्मेदारी आ पड़ी, इसलिये वे अपने घर जाकर रहने लगे ।

राहाता निवासी खुशालचन्द
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शिरडी के गणपत तात्या कोते को बाबा बहुत ही चाहते थे । वे राहाता के मारवाड़ी सेठ श्री. चन्द्रभान को भी बहुत प्यार करते थे । सेठजी का देहान्त होने के उपरांत बाबा उसके भतीजे खुशालचन्द को भी अधिक प्रेम करते थे । वे उनके कल्याण की दिनरात फिक्र किया करते थे । कभी बैलगाड़ी में तो कभी ताँगें में वे अपने अंतरंग मित्रों के साथ राहाता को जाया करते थे । ग्रामवासी बाबा के गाँव के फाटक पर आते ही उनका अपूर्व स्वागत करते और उन्हें प्रणाम कर बड़ी धूमधाम से गाँव में ले जाते ते । खुशालचन्द बाबा को अपने घर ले जाते और कोमल आसन पर बिठाकर उत्तम सुस्वादु भोजन कराते और आनन्द तथा प्रसन्न चित्त से कुछ काल तक वार्तालाप किया करते थे । फिर बाबा सबको आनंदित कर और आर्शीवाद देकर शिरडी वारिस लौट आते थे ।
एक ओर राहाता (दक्षिण में) तथा दूसरी ओर नीमगाँव (उत्तर में) था । इन दोनों ग्रामों के मध्य में शिरडी स्थित हैं । बाबा अपने जीवनकाल में कभी भी इन सीमाओं के पार नहीं गये । उन्होंने कभी रेलगाड़ी नहीं देखी और न कभी उसमें प्रवास ही किया, परन्तु फिर भी उन्हें सब गाड़ियों के आवागमन का समय ठीक-ठीक ज्ञात रहता था । जो भक्तगण बाबा से लौटने की आनुमति माँगते और जो आदेशानुकूल चलते, वे कुशलतापूर्वक घर पहुँच जाते थे । परन्तु इसके विपरीत जो अवज्ञा करते, उन्हें दुर्भाग्य व दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता था । इस विषय से सम्बन्धित घटनाओं और अन्य विषयों का अगले अध्याय में विस्तारपूर्वक वर्णन किया जायेगा ।

विशेष
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इस अध्याय के नीचे दी हुई टिप्पणी बाबा के खुशालचन्द पर प्रेम के संबंध में है । किस प्रकार उन्होंने काकासाहेब दीक्षित को राहाता जाकर खुशालचन्द को लिवा लाने को कहा और उसी दोपहर को खुशालचन्द से स्वप्न में शिरडी आने को कहा, इसका उल्लेख यहाँ नहीं किया गया है, क्योंकि इसका वर्णन इस सच्चरित्र के 30वें अध्याय में किया जायेगा ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 22 August 2018

श्री साईं लीलाएं - दाभोलकर के मन की बात

ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. सब के प्रति प्रेम भाव रखो 

श्री साईं लीलाएं
दाभोलकर के मन की बात

बाबा केवल यही चाहते थे कि सबका भला हो| बाबा अपने पास आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सत्य-मार्ग पर चलने के लिए कहते| अच्छाई करने के लिए सबको प्रेरित करते| जो भी व्यक्ति अच्छाई की राह पर चलता, बाबा उसका हौसला और बढ़ाते|

एक बार हेमाडपंत साईं बाबा के दर्शन करने शिरडी गये थे| वहां पर उनके मन में यह विचार आया कि उस परम पावन स्थान पर गुरुवार (बृहस्पतिवार) के दिन राम-नाम का अखण्ड स्मरण और कीर्तन करें| दूसरे ही दिन गुरुवार था|अपने निश्चय को याद करके बुधवार की रात वे राम-नाम लेते-लेते सो गये| गुरुवार को सुबह उठते ही उन्होंने राम-नाम लेना शुरू कर दिया| नित्य काम से निवृत होकर मस्जिद में साईं बाबा के दर्शन करने गए| जब वे बूटीवाड़े के पास से गुजर रहे थे तो मस्जिद के आंगन में औरंगाबादकरनाम के भक्त, संत एकनाथ महाराज का रामभक्ति बताने वाला अमंगा गा रहे थे| उसका अर्थ इस तरह था - "मैंने गुरु-कृपा का काजल पाया है और सब उसे लगाने से राम के सिवाय कुछ भी दिखाई नहीं देता है| मेरे अंदर और बाहर भी राम हैं| मेरे सपनों में भी राम हैं| इतना ही नहीं, मैं जागते हुए और सोते हुए राम को ही देखता हूं, मैं हर जगह राम को ही देखता हूं| सभी कामनाएं पूरी करने वाला राम कण-कण में भरा है और वह जनार्दन के एकनाथ का अनुभव है|"

यह गीत सुनते ही हेमाडपंत सोचने लगे - "बाबा का खेल समझ से बाहर है| मेरे मन की बात जानकर ही उन्होंने औरंगाबादकर से वह अमंगा गवाया होगा| नहीं तो हजारों गीत जानते हुए भी उन्होंने यही अमंगा क्यों गाया? बाबा सब कुछ करते हैं और हम केवल कठपुतलियाँ हैं - और यही सच है| मैंने जो कहा, जो सोचा है वह साईं माँ को पसंद है|' -यह सोचने हुए उन्हें और भी उम्मीद मिली और यह सब मंत्र बाबा से ही मिला| ऐसा सोच के वह पूरा दिन उन्होंने राम-नाम के साथ बिताया|


परसों चर्चा करेंगे... किसी से बुरा मत बोलो   

ॐ सांई राम

==ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ==


बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Tuesday, 21 August 2018

श्री साईं लीलाएं - सब के प्रति प्रेम-भाव रखो

ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. माँ! मेरे गुरु ने तो मुझे केवल प्यार करना ही सिखाया है

श्री साईं लीलाएं


सब के प्रति प्रेम-भाव रखो
 
ठीक उसी समय मस्जिद में घंटी बजने लगी| बाबा के भक्त रोजाना दोपहर को बाबा की पूजा और आरती करते थे| यह घंटी दोपहर की पूजा-आरती की सूचक थी| शामा और हेमाडपंत तेजी से मस्जिद की ओर चल पड़े| बापू साहब जोग पूजन शुरू कर चुके थे| सभी आरती गा रहे थे| शामा हेमाडपंत का हाथ पकड़कर बाबा के दायीं ओर बैठ गये, जबकि हेमाडपंत सामने बैठ गये|

तब बाबा ने हेमाडपंत से कहा - "शामा ने तुझे जो दक्षिणा दी है, वह मुझे दे|" तब हेमाडपंत से कहा - "बाबा ! शामा तो यहीं पर है - और दक्षिणा के लिये उसने पंद्रह नमस्कार दिये हैं|" तब साईं बाबा हँस पड़े और बोले - "ठीक है, अब मुझे बता तुम दोनों के बीच क्या बातें हुई हैं?" इस पर हेमाडपंत ने शुरू ने अंत तक हुई सारी बातें विस्तार से बता दीं| उसने बताया वार्ता बड़ी सुखदायी रही| विशेषकर उस वृद्ध महिला की कथा अद्भुत थी| इस कथा के माध्यम से आपने मुझ पर कृपा की है| तब बाबा ने पूछा - "यह कहानी कितनी मीठी है?" शामा ने कहा - "बाबा, इस कहानी को सुनकर मेरे मन की चंचलता दूर हो गयी| अब मुझे रास्ता समझ आने लगा (यानि सत्य मार्ग का पता चल गया)| अब मैं एकदम शांत हूं|"

बाबा ने कहा, मेरी प्रणाली अनोखी है| यदि इस कहानी को स्मरण रखोगे तो बड़ी सार्थक सिद्ध होगी| फिर बाबा खुशी से हँस पड़े और बोले - "अब मेरा कहा मानकर सुने ले ! चैतन्य-स्वरूप परमात्मा सब जगह मौजूद है| इसलिए प्रत्येक प्राणी के अन्दर जो चेतना है उसी का ध्यान करना चाहिए, फिर वह मिल जाता है| जो मनुष्य यह नहीं कर सकता उस मेरे स्वरूप का दिन-रात ध्यान करना चाहिये| ऐसा करने से मन स्थिर होकर परमात्मा से एकरस हो जाएगा| ध्येय व ध्यान का भेद समाप्त हो जायेगा| गुरु और शिष्य का सम्बंध कछुवी माँ और उसके बच्चों के जैसा है| जिस तरह कछुवी नदी तट पर रहकर, दूसरे तट पर रहनेवाले अपने बच्चों का फिर प्रेम-दृष्टि से पालन-पोषण करती है| वह न तो अपने बच्चों का हृदय से लगाकर रखती है और न ही उन्हें अपना दूध ही पिलाती है| बच्चे भी अपनी माँ को याद करते रहते हैं| कछुवी की प्रेम-दृष्टि ही उनके लिए आहार है|

इतने में ही आरती सम्पन्न हो गई और भक्त ऊंचे स्वर में 'साईं बाबा की जय-जयकार करने लगे' - और बापू साहब जोग ने सबको प्रसाद में मिश्री बांटी| बाबा को भी मिश्री प्रसाद दिया| बाबा ने अपने हाथ का मिश्री प्रसाद हेमाडपंत को देते हुए कहा - "यदि तुम इस कहानी को सदैव याद रखोगे तो तुम्हारी स्थिति मिश्री जैसी मधुर हो जायेगी और तुम्हारी सभी कामनाएं पूर्ण होंगी और तुम्हारा कल्याण हो जायेगा|"

हेमाडपंत ने बाबा के चरणों में सिर झुकाया और आँखों में आँसू भरकर बोले - "बाबा, आपका आशीर्वाद ही मेरे लिए बहुत है| आप ही मुझे सम्भालिये|"

* लेन-देन के बिना कोई भी किसी से नहीं मिल सकता| इसलिए मनुष्य तो क्या, किसी भी जीव के प्रति नफरत का भाव मत रखो| सभी से आदर-भाव से मिलो| अभद्रता का व्यवहार मत करो| भूखे को रोटी, प्यासे को पानी, वस्त्रहीन को कपड़ा, राहगीर को बैठने के लिए जगह दो| यदि तुम्हारी ऐसा करने की सामर्थ्य नहीं है तो कम से कम उससे बुरा मत बोलो| यदि कोई तुम्हें बुरा बोले तो उस पर क्रोध मत करो| ऐसा करने वाले को सुख मिलता है| संसार चाहे इधर से उधर हो जाये तुम अपने आदर्श पर स्थिर रहो, जो कुछ हो रहा है, उसे देखते रहो| तुम द्वैतभाव को त्याग दो| द्वैतभाव से गुरु-शिष्य में पृथकत्व आ जाता है| सबका अल्लाह मालिक है, वही सबका रखवाला है| वही सबको मार्ग दिखाता है और वही सबकी इच्छाएं पूरी करता है| पूर्वजन्म का सम्बंध होने से ही तेरी और मेरी भेंट हुई है| फिर आपस में प्यार बांटकर खुश रहो| यहां कोई स्थिर रहनेवाला नहीं है| जब तक सांसे चलती हैं तब तक ही जीवन है और अपने जीतेजी जिसने परमात्मा को पा लिया, वह ही धन्य है|

इस उपदेश को सुनकर हेमाडपंत को अति आनंद हुआ और वे बाबा की चरणवंदना कर अपने घर लौटे|


कल चर्चा करेंगे... दाभोलकर के मन की बात

ॐ सांई राम

==ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ==


बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Monday, 20 August 2018

श्री साईं लीलाएं - माँ! मेरे गुरु ने तो मुझे केवल प्यार करना ही सिखाया है

ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. साठे पर बाबा की कृपा 

श्री साईं लीलाएं

माँ! मेरे गुरु ने तो मुझे केवल प्यार करना ही सिखाया है
  
साठे मुम्बई के प्रसिद्ध व्यापरी थे| एक बार उन्हें अपने व्यापार में बहुत हानि उठानी पड़ी, जिससे वे बहुत उदास-निराश हो गये| उनके मन में घर-बार छोड़कर एकांतवास करने के विचार पैदा होने लगे| साठे की ऐसी स्थिति देखकर उनके एक मित्र ने उनसे कहा - "साठे ! तुम शिरडी चले जाओ और वहां पर कुछ दिन साईं बाबा की संगत में रहो| सत्संग में रहकर व्यक्ति निश्चित हो जाता है और साईं बाबा तो वैसी भी साक्षात् ईशावतार हैं| आज तक बाबा के दरबार से कोई भी निराश होकर नहीं लौटा है| इसलिए लोग बड़ी दूर-दूर से उनके दर्शन करने के लिये शिरडी जाते हैं| यदि मेरी बात मानो तो तुम भी एक बार शिरडी जाकर देख लो| यदि बाबा चाहेंगे तो तुम्हारी भी झोली भर देंगे|"

मित्र की बातों का साठे पर एकदम सीधा प्रभाव पड़ा| वे शिरडी गये| शिरडी पहुंचकर जब उन्होंने साईं बाबा के दर्शन किये तो मन को बहुत शांति मिली| उन्हें एक नया हौसला मिला| वे सोचने लगे कि पिछले जन्म के शुभ कर्मों के कारण ही उन्हें साईं बाबा का सान्निध्य प्राप्त हुआ है साठे ने शिरडी में रहकर 'गुरुचरित्र' ग्रंथ का पारायण शुरू कर दिया| पारायण की आखिरी रात में उन्हें स्वप्न दिखाई पड़ा कि बाबा स्वयं गुरुचरित्र ग्रंथ हाथ में लिए हुए उस पर प्रवचन कर रहे हैं और वह सामने बैठकर सुन रहे हैं| नींद खुलने पर उन्हें प्रसन्नता हुई और स्वप्न को याद कर उनका गला भर आया|


सुबह होने पर साठे काका साहब दीक्षित से मिले और अपना रात्रि का स्वप्न बताकर उसके बारे में पूछा| तब काका असमर्थता जताते हुए, उनके साथ जाकर बाबा से मिले| पूछने पर बाबा ने बताया - "साठे, गुरुचरित्र पढ़ने से मन शुद्ध होता है| विचार पवित्र बनते हैं| अब तुम मेरी आज्ञा से एक सप्ताह का पारायण और करो तो तुम्हारा कल्याण होगा| ईश्वर प्रसन्न होकर तुम्हें भवबंधन से मुक्ति देंगे|" साठे की समस्या का समाधान हो गया और बाबा की अनुमति लेकर वे अपने ठहरने के स्थान पर लौट आये|जिस समय साईं बाबा काका साहब को साठे के बारे में 'गुरुचरित्र' का पारायण करने के बारे में बता रहे थे| उस समय मस्जिद में बाबा के भक्त गोविन्द रघुनाथ दामोलकर (हेमाडपंत) तथा अष्ठा साहब बाबा की चरण सेवा कर रहे थे| यह सुनकर उनके मन में विचार आया कि 'मैं तो पिछले चालीस वर्षों से गुरुचरित्र का पारायण करता आया हूं, और सात वर्षों से बाबा की सेवा में हूं, परन्तु जो साठे को बाबा से सात दिन में मिल गया, वह मुझे क्यों नहीं मिला? मुझे बाबा का उपदेश कब होगा?'


हेमाडपंत के मन में उठ रहे विचारों के बारे में बाबा जान चुके थे| बाबा ने उनसे कहा - "तुम शामा के पास जाकर मेरे लिये पंद्रह रुपये दक्षिणा मांग के ले आओ| लेकिन वहां थोड़ी देर बैठकर वार्तालाप करना और बाद में आना|" हेमाडपंत तुरंत उठे और शामा के पास गये| शामा उस समय स्नान क्रिया से निवृत होकर कपड़े पहन रहे थे| उन्होंने हेमाडपंत से कहा कि आप सीधे मस्जिद से आ रहे हैं? आप बैठकर थोड़ा-सा आराम कर लें, तब तक मैं पूजा कर लूं| ऐसा कहकर शामा अंदर कमरे में पूजा करने चले गए|हेमाडपंत की नजर अचानक खिड़की में रखी 'एकनाथी भगवान' ग्रंथ पर पड़ी| सहजभाव से खोलकर देखा तो जो अध्ययन आज सुबह उन्होंने साईं बाबा के दर्शन करने के लिए जल्दी में अधूरा छोड़ा था, वही था| हेमाडपंत बाबा की लीला को देखकर हैरान रह गये| फिर उन्होंने सोचा कि सुबह पढ़ना अधूरा छोड़कर मैं गया था, यह गलती सुधारने के लिए ही बाबा ने मुझे यहां भेजा होगा| फिर वहां पर बैठे-बैठे उन्होंने वह अध्याय पूर्ण किया|जब शामा बाहर आये तो हेमाडपंत ने बाबा का संदेश सुनाया| शामा ने कहा, मेरे पास पंद्रह रुपये नहीं हैं| रुपयों के बदले आप दक्षिणा के रूप में मेरे पंद्रह नमस्कार ले जाइए| हेमाडपंत ने स्वीकार कर लिया| उन्होंने हेमाडपंत को पान का बीड़ा दिया और बोले, आओ कुछ देर बैठकर बाबा की लीलाओं पर चर्चा कर लें|फिर दोनों में वार्तालाप होने लगा| शामा बोले, बाबा की लीलाएं बहुत गूढ़ हैं, जिन्हें कोई समझ नहीं सकता| बाबा लीलाओं से निर्लेप हुए हास्य-विनोद करते रहते हैं| इस अज्ञानी बाबा की लीलाओं को क्या जानें? अब देखो तो बाबा ने आप जैसे विद्वान को मुझ अनपढ़ के पास दक्षिणा लेने भेज दिया| बाबा की क्रियाविधि को कोई नहीं समझ सकता| मैं तो बाबा के बारे में केवल इतना ही कह सकता हूं कि जैसी बाबा में भक्त की निष्ठा होती है, उसी अनुसार बाबा उसकी मदद करते हैं| कभी-कभी तो बाबा किसी-किसी भक्त की कड़ी परीक्षा लेने के बाद ही उसे उपदेश देते हैं| उपदेश शब्द सुनते ही हेमाडपंत को गुरुचरित्र पारायण वाली बात का स्मरण हो आया| वह सोचने लगे कि कहीं बाबा ने उनके मन की चंचलता को दूर करने के लिए लो उन्हें यहां नहीं भेजा है| फिर वे शामा से बाबा की लीलाओं को एकग्रता से सुनने लगे -
शामा सुनाने लगे - "एक समय संगमनेर से खाशावा देशमुख की माँ श्रीमती राधाबाई, साईं बाबा के दर्शन के लिए शिरडी आयी थीं| वह बहुत वृद्धा थीं| बाबा का दर्शन कर लेने पर वह सफर की सारी तकलीफें भूल गयीं| बाबा के प्रति उनकी बहुत निष्ठा थी| उनके मन में बाबा से उपदेश लेने की तीव्र इच्छा थी| उन्होंने अपने मन में यह निश्चय किया कि जब तक बाबा गुरोपदेश नहीं करते, तब तक वह शिरडी और छोड़ेंगी और आमरण-अनशन करने का निर्णय किया| वे अपनी जिद्द की पक्की थीं| उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया| तीन दिन बीत गये| भक्तगण चिंतित हो गये| पर वे माननेवाली नहीं थीं|


उनकी ऐसी स्थिति देखकर मैं भयभीत हो गया| मैंने मस्जिद में जाकर बाबा से प्रार्थना की - "हे देवा ! देशमुख की माँ आपकी भक्त हैं| आपका गुरु उपदेश पाने के लिए उन्होंने खाना-पीना तक छोड़ दिया है| यदि आपने उसे उपदेश नहीं दिया और दुर्भाग्य से उन्हें कुछ हो गया तो लोग आपकी ही दोषी ठहरायेंगे| आप पर बेवजह इल्जाम लगायेंगे| आप कृपा करके इस स्थिति को टाल दीजिये|"शामा की बात सुनकर पहले तो बाबा मुस्कराए| उन्हें उस बूढ़ी माँ पर दया आ गयी| बाबा ने उन्हें अपने पास बुलाकर कहा - "माँ ! तुम जानबूझकर क्यों अपनी जान से खेल रही हो| शरीर को कष्ट देकर क्यों मृत्यु का आलिंगन करना चाहती हो| मांग के जो कुछ मिलता है, उसी से गुजारा करनेवाला फकीर हूं| तुम मेरी माँ हो और मैं तुम्हारा बेटा| तुम मुझ पर रहम करो| जो कुछ मैं तुमसे कहता हूं, उस पर ध्यान दोगी तो तुम भी सुखी हो जाओगी| मैं तुमसे अपनी कथा कहता हूं| उसे सुनोगी तो तुम्हें भी अपार शांति मिलेगी, सुनो -
मेरे श्री गुरु बहुत बड़े सिद्धपुरुष थे| मैं कई वर्षों तक उनकी सेवा करके थक गया, तब भी उन्होंने मेरे कान में कोई मंत्र नहीं फूंका| मैं भी अपनी बात का पक्का था, चाहे कुछ भी हो जाए, यदि मंत्र सीखूंगा तो इन्हीं से, यह मेरी जिद्द थी| पर उनकी तो रीति ही निराली थी| पहले उन्होंने मेरे सर के बाल कटवाये और फिर मुझसे दो पैसे मांगे| मैं समझ गया और मेंने उन्हें दो पैसे दे दिए| वास्तव में वे दो पैसे श्रद्धा और सबूरी (दृढ़ निष्ठा और धैर्य) थे| मैंने उसी पल उन्हें वे दोनों चीजें अर्पण कर दीं| वे बड़े प्रसन्न हुए| उन्होंने मुझ पर कृपा कर दी| फिर मैंने बारह वर्ष तक गुरु की चरणवंदना की| उन्होंने ही मेरा भरण-पोषण किया| उनका मुझ पर बड़ा प्रेम था| उन जैसा कोई विरला गुरु ही मिलेगा| मैंने अपने गुरु के साथ बहुत कष्ट उठाये| उनके साथ बहुत घूमा| उन्होंने भी मेरे लिये बहुत कष्ट उठाये| मेरी इच्छी से परवरिश की| हम आपस में बहुत प्यार करते थे|गुरु के बिना मुझे एक पल भी कहीं चैन नहीं मिलता था| मैं भूख-प्यास भूलकर हर पल गुरु का ही ध्यान करता था, वही मेरे लिए सब कुछ थे| मुझे सदैव गुरुसेवा की ही चिंता लगी रहती थी| मेरा मन उनके श्रीचरणों में ही लगा रहता था| मेरे मन का गुरुचरणों में लगना एक पैसे की दक्षिणा हुई| दूसरा पैसा धैर्य था| दीर्घकाल तक मैं धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करता हुआ गुरु की सेवा करता रहा, कि यही धैर्य एक दिन तुम्हें भी भवसागर से तार देगा| धैर्य धारण करने से मनुष्य के पाप और मोह नष्ट होकर संकट दूर हो जाते हैं और भय नष्ट हो जाता है| धैर्य धारण करने से तुम्हें भी लक्ष्य की प्राप्ति होगी| धैर्य उत्तम गुणों की खान, उत्तम विचारों की जननी है| निष्ठा और धैर्य दोनों सगी बहनें हैं|


मेरे गुरु ने मुझसे कभी कुछ नहीं मांगा और बार-बार मेरी रक्षा की| हर मुश्किल से मुझे निकाला और कभी मुझे अकेला नहीं छोड़ा| वैसे तो मैं सदैव गुरुचरणों में ही रहता था| यदि कभी कहीं चला भी जाता जब भी उनकी कृपादृष्टि मुझ पर लगातार रहती थी| जिस प्रकार एक कछुवी माँ अपने बच्चे का पालन-पोषण प्रेम-दृष्टि से करती है, वैसे ही मेरे गुरु का प्यार था| माँ ! मेरे गुरु ने मुझे कोई मंत्र नहीं सिखाया| फिर मैं तुम्हारे कान में कोई मंत्र कैसे फूंक दूं? इसलिए व्यर्थ में उपदेश पाने का प्रयास न करो| अपनी जिद्द छोड़ दो और अपनी जान से मत खेलो| तुम मुझे ही अपने कर्मों और विचारों का लक्ष्य बना लो| सिर्फ मेरा ही ध्यान करो तो तुम्हारा पारमार्थ सफल होगा| तुम मेरी और अनन्य भाव से देखो तो मैं भी तुम्हारी ओर अनन्य भाव से देखूंगा| इस मस्जिद में बैठकर मैं कभी असत्य नहीं बोलूंगा, कि शास्त्र या साधना की जरूरत नहीं है| केवल गुरु में विश्वास करना ही पर्याप्त है| केवल यही विश्वास रखो कि गुरु ही कर्त्ता है, वही मनुष्य धन्य है जो गुरु की महानता को जानता है| जो गुरु को ही सब कुछ समझता है, वही धन्य है| क्योंकि फिर जानने के लिए कुछ भी बाकी नहीं रहता|"


बाबा के इन वचनों को सुनकर राधाबाई के मन को बड़ी शांति मिली| आँखें भर आयीं| फिर बाबा के चरण स्पर्श करके उसने अपना अनशन त्याग दिया|


कल चर्चा करेंगे... सब के प्रति प्रेम-भाव रखो

ॐ सांई राम
==ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ==
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

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बाबा के 11 वचन

ॐ साईं राम

1. जो शिरडी में आएगा, आपद दूर भगाएगा
2. चढ़े समाधी की सीढी पर, पैर तले दुःख की पीढ़ी कर
3. त्याग शरीर चला जाऊंगा, भक्त हेतु दौडा आऊंगा
4. मन में रखना द्रढ विश्वास, करे समाधी पूरी आस
5. मुझे सदा ही जीवत जानो, अनुभव करो सत्य पहचानो
6. मेरी शरण आ खाली जाए, हो कोई तो मुझे बताए
7. जैसा भाव रहे जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मनका
8. भार तुम्हारा मुझ पर होगा, वचन न मेरा झूठा होगा
9. आ सहायता लो भरपूर, जो माँगा वो नही है दूर
10. मुझ में लीन वचन मन काया, उसका ऋण न कभी चुकाया
11. धन्य-धन्य व भक्त अनन्य, मेरी शरण तज जिसे न अन्य

.....श्री सच्चिदानंद सदगुरू साईनाथ महाराज की जय.....

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः॒ स्वः॒
तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यम्
भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि।
धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥

Word Meaning of the Gayatri Mantra

ॐ Aum = Brahma ;
भूर् bhoor = the earth;
भुवः bhuwah = bhuvarloka, the air (vaayu-maNdal)
स्वः swaha = svarga, heaven;
तत् tat = that ;
सवितुर् savitur = Sun, God;
वरेण्यम् varenyam = adopt(able), follow;
भर्गो bhargo = energy (sin destroying power);
देवस्य devasya = of the deity;
धीमहि dheemahi = meditate or imbibe

these first nine words describe the glory of Goddheemahi = may imbibe ; pertains to meditation

धियो dhiyo = mind, the intellect;
यो yo = Who (God);
नः nah = our ;
प्रचोदयात prachodayat = inspire, awaken!"

dhiyo yo naha prachodayat" is a prayer to God


भू:, भुव: और स्व: के उस वरण करने योग्य (सूर्य) देवता,,, की (बुराईयों का नाश करने वाली) शक्तियों (देवता की) का ध्यान करें (करते हैं),,, वह (जो) हमारी बुद्धि को प्रेरित/जाग्रत करे (करेगा/करता है)।


Simply :

तीनों लोकों के उस वरण करने योग्य देवता की शक्तियों का ध्यान करते हैं, वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।


The God (Sun) of the Earth, Atmosphere and Space, who is to be followed, we meditate on his power, (may) He inspire(s) our intellect.