शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Monday, 10 June 2013

श्री गुरु अंगद देव जी जीवन - परिचय

श्री गुरु अंगद देव जी जीवन - परिचय
 


प्रकाश उत्सव (जन्म की तारीख): 31 मार्च 1504, हरिके (जिला फिरोजपुर, पंजाब) 
Parkash Ustav (Birth date):March 31, 1504; at Harike (Distt. Ferozepur, Punjab)

पिता : भाई फेरू मल जी 
Father: Bhai Pheru Mal ji

माता जी : माता दया कौर 
Mother: Mata Daya Kaur

महल (पति या पत्नी): माता खिवी जी, (मत्तै दी सराय, जिला फिरोजपुर.) 
Mahal (spouse):Mata Khivi ji, (Mattei di Sarai; Distt. ferozepur)

साहिबज़ादे (वंश): बीबी अमरो, बीबी अनोखी, बाबा दासू और बाबा दातु
Sahibzaday (offspring):Bibi Amro, Bibi anokhi, Baba Dasu and Baba Datu

ज्योति ज्योत (स्वर्ग करने के उदगम): गोइंदवाल में 29 मार्च 1552 (पंजाब)
Jyoti Jyot (ascension to heaven):March 29, 1552 at Goindwal (Punjab)

श्री गुरु अंगद देव जी  फेरु मल जी तरेहण क्षत्रि के घर माता दया कौर जी की पवित्र कोख से मत्ते की सराए परगना मुक्तसर में वैशाख सुदी इकादशी सोमवार संवत १५६१ को अवतरित हुए| आपके बचपन का नाम लहिणा जी था| गुरु नानक देव जी को अपने सेवा भाव से प्रसन्न करके आप गुरु अंगद देव जी के नाम से पहचाने जाने लगे| आप जी की शादी खडूर निवासी श्री देवी चंद क्षत्रि की सपुत्री खीवी जी के साथ १६ मघर संवत १५७६ में हुई| खीवी जी की कोख से दो साहिबजादे दासू जी व दातू जी और दो सुपुत्रियाँ अमरो जी व अनोखी जी ने जन्म लिया|

भाई जोधा सिंह खडूर निवासी से लहिणा जी को गुरु दर्शन की प्रेरणा मिली| जब आप संगत के साथ करतारपुर के पास से गुजरने लगे तब आप दर्शन करने के लिए गुरु जी के डेरे में आ गए| गुरु जी के पूछने पर आप ने बताया, "मैं खडूर संगत के साथ मिलकर वैष्णोदेवी के दर्शन करने जा रहा हूँ| आपकी महिमा सुनकर दर्शन करने की इच्छा पैदा हुई| किरपा करके आप मुझे उपदेश दो जिससे मेरा जीवन सफल हो जाये|" गुरु जी ने कहा, "भाई लहिणा तुझे प्रभु ने वरदान दिया है, तुमने लेना है और हमने देना है| अकाल पुरख की भक्ति किया करो| यह देवी देवते सब उसके ही बनाये हुए हैं|"

लहिणा जी ने अपने साथियों से कहा आप देवी के दर्शन कर आओ, मुझे मोक्ष देने वाले पूर्ण पुरुष मिल गए हैं| आप कुछ समय गुरु जी की वहीं सेवा करते रहे और नाम दान का उपदेश लेकर वापिस खडूर अपनी दुकान पर आगये परन्तु आपका धयान सदा करतारपुर गुरु जी के चरणों में ही रहता| कुछ दिनों के बाद आप अपनी दुकान से नमक की गठरी हाथ में उठाये करतारपुर आ गए| उस समय गुरु जी धान में से नदीन निकलवा रहे थे| गुरु जी ने नदीन की गठरी को गाये भैंसों के लिए घर ले जाने के लिए कहा| लहिणा जी ने शीघ्रता से भीगी गठड़ी को सिर पर उठा लिया और घर ले आये| गुरु जी के घर आने पर माता सुलखणी जी गुरु जी को कहने लगी जिस सिख को आपने पानी से भीगी गठड़ी के साथ भेजा था उसके सारे कपड़े कीचड़ से भीग गए हैं| आपने उससे यह गठड़ी नहीं उठवानी थी|

गुरु जी ने हँस कर कहा, "यह कीचड़ नहीं जिससे उसके कपड़े भीगे हैं, बल्कि केसर है| यह गठड़ी को और कोई नहीं उठा सकता था| अतः उसने उठा ली है|" श्री लहिणा जी गुरु जी की सेवा में हमेशा हाजिर रहते व अपना धयान गुरु जी के चरणों में ही लगाये रखते|

Sunday, 9 June 2013

श्री गुरु नानक देव जी - ज्योति ज्योत समाना

श्री गुरु नानक देव जी - ज्योति ज्योत समाना

 

गुरु गद्दी की सारी बातचीत भाई बुड्डा जी आदि निकटवर्ती सिखो को समझाकर गुरु नानक देव जी (श्री गुरु नानक देव जी) ने बैकुंठ जाने की तैयारी कर ली| ऐसा सुनकर दूर दूर से सिख आपके अन्तिम दर्शन करने ले लिए आ गए| गुरु जी अपनी धर्मशाला में बैठे थे और कीर्तन हो रहा था| इस समय माता सुलखनी जी भी दीन मन होकर गुरु जी के पास आ बैठी| गुरु जी ने दोनों साहिबजादों को भी बुलाया| पर वे थोड़ा समय बैठकर वहाँ से चल दिए|

असूज सुदी दसवी संवत् 1539 को संगत के सामने गुरु जी चादर तानकर लेट गए और संगत को धैर्य देते हुए कहने लगे-आप सभी सत्यनाम का जाप करो| जाप कर रही संगत ने जब कुछ समय बाद देखा तब गुरु जी अपना शरीर छोडकर बैकुंठ में जा चुके थे| आपका अन्तिम संस्कार करने के लिए हिन्दू कहे कि हमारा गुरु है हमने संस्कार करना है| मुस्लमान कहे कि हमारा पीर है हमने दफ़न करना है| इस प्रकार झगडा करते जब दोनों धर्मों के लोगों ने चादर उठाकर देखा तो आपका शरीर अलोप था| केवल चादर ही वहाँ रह गई| इस चादर को लेकर आधा हिन्दुओं ने संस्कार कर दिया और आधा मुसलमानों ने कबर में दफ़न कर दिया|


कुल आयु व गुरु गद्दी का समय
(Shri Guru Nanak Dev Ji Total Age and Ascension to Heaven)
 


गुरु नानक देव जी शरीर त्याग कर के संसार में 70 साल 5 महीने 7 दिन पातशाही करके असूज सुदी 10 संवत् 1539 करतारपुर में ज्योति ज्योत समाए|

कल से हम श्री गुरू अंगद देव जी महाराज जी की जीवनी प्रस्तुत करने हेतू आप सभी से प्रर्थना एवम श्री साँई नाथ महाराज जी से अनुमति चाहते है...

Saturday, 8 June 2013

श्री गुरु नानक देव जी – साखियाँ - गाय, भैंसे चारनी व खेत हरा करना

श्री गुरु नानक देव जी – साखियाँ



गाय, भैंसे चारनी व खेत हरा करना

गुरु जी (श्री गुरू नानक देव जी) को चुपचाप व बिना किसे काम के घर में लेटे रहते देख महिता जी ने उन्हें किसे काम धंधे में लगाने कि सोची| पिता का कहना मान कर अगले ही दिन गुरु जी गाये भेसों को चराने ले गए| तीन चार दिन तो सब ठीक चलता रहा, सुबह पशुओं को बाहर ले जाते व सांयकाल वापिस घर ले आते|

एक दिन गुरु जी पशुओं को चरते छोड़ आप अंतर ध्यान हो गए, अपनी ही मौज में बैठे रहे| पास में ही जिमींदार का हरा भरा खेत था| पशुओं ने वहां पहुँच कर बहुत नुकसान किया| कुछ मुँह से चर लिया तथा कुछ पैरों के नीचे दबा दिया| इतने में खेत का मालिक भी आ गया वह पशुओं को घेर कर राये बुलार के पास ले गया|

जिमींदार ने राये बुलार के आगे पुकार कि आपके पटवारी के लड़के ने मेरा खेत उजाड दिया है, मेरा हरजाना दिलवाया जाये| तब गुरु जी (श्री गुरू नानक देव जी) ने सहज भाव से कहा राये जी! अपना आदमी भेज कर देख लो, इसकी कोई खेती नहीं उजड़ी, अगर उजड़ी भी होगी तो हम हरजाना भर देंगे| राये बुलार ने आदमी भेज कर पता लगाया कि खेती तो ज्यों कि त्यों खड़ी है| जिमींदार व अन्य लोग गुरु जी का यह कौतक देखकर दंग रह गए व गुरु जी कि शलाघा करने लगे|


Friday, 7 June 2013

श्री गुरु नानक देव जी – साखियाँ - साँप का छाया देना

श्री गुरु नानक देव जी – साखियाँ



साँप का छाया देना


गुरु जी (श्री गुरू नानक देव जी) अब रोजाना ही पशुओं को जंगल जूह में ले जाते| एक दिन वैसाख के महीने में
दुपहर के समय पशुओं को छाओं के नीचे बिठा कर गुरु जी लेट गए| सूरज के ढलने के साथ वृक्ष कि छाया भी ढलने लगी| आप के मुख पर सूरज कि धूप देखकर एक सफ़ेद साँप अपने फन के साथ छाया करके बैठ गया| उस समय राये बुलार अपने साथियोँ के संग शिकार खेल कर वापिस अपने घर को जा रहा था|

राये बुलार ऐसे कौतक को देखकर दंग रह गया और गुरु जी को नमस्कार करते हुए मन ही मन गुरु जी (श्री गुरू नानक देव जी) की महिमा गाता हुआ अपने घर की ओर रवाना हो गया|

Thursday, 6 June 2013

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 26

ॐ सांई राम

बाबा जी की कृपा आप सब पर बनी रहे...

आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं, हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है | हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चरित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है |

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 26
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भक्त पन्त, हरिश्चन्द्र पितले और गोपाल आंबडेकर की कथाएँ
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For donation of Fund/ Food/ Clothes (New/ Used), for needy people specially leprosy patients' society and for the marriage of orphan girls, as they are totally depended on us.

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बाबा के 11 वचन

ॐ साईं राम

1. जो शिरडी में आएगा, आपद दूर भगाएगा
2. चढ़े समाधी की सीढी पर, पैर तले दुःख की पीढ़ी कर
3. त्याग शरीर चला जाऊंगा, भक्त हेतु दौडा आऊंगा
4. मन में रखना द्रढ विश्वास, करे समाधी पूरी आस
5. मुझे सदा ही जीवत जानो, अनुभव करो सत्य पहचानो
6. मेरी शरण आ खाली जाए, हो कोई तो मुझे बताए
7. जैसा भाव रहे जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मनका
8. भार तुम्हारा मुझ पर होगा, वचन न मेरा झूठा होगा
9. आ सहायता लो भरपूर, जो माँगा वो नही है दूर
10. मुझ में लीन वचन मन काया, उसका ऋण न कभी चुकाया
11. धन्य-धन्य व भक्त अनन्य, मेरी शरण तज जिसे न अन्य

.....श्री सच्चिदानंद सदगुरू साईनाथ महाराज की जय.....

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः॒ स्वः॒
तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यम्
भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि।
धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥

Word Meaning of the Gayatri Mantra

ॐ Aum = Brahma ;
भूर् bhoor = the earth;
भुवः bhuwah = bhuvarloka, the air (vaayu-maNdal)
स्वः swaha = svarga, heaven;
तत् tat = that ;
सवितुर् savitur = Sun, God;
वरेण्यम् varenyam = adopt(able), follow;
भर्गो bhargo = energy (sin destroying power);
देवस्य devasya = of the deity;
धीमहि dheemahi = meditate or imbibe

these first nine words describe the glory of Goddheemahi = may imbibe ; pertains to meditation

धियो dhiyo = mind, the intellect;
यो yo = Who (God);
नः nah = our ;
प्रचोदयात prachodayat = inspire, awaken!"

dhiyo yo naha prachodayat" is a prayer to God


भू:, भुव: और स्व: के उस वरण करने योग्य (सूर्य) देवता,,, की (बुराईयों का नाश करने वाली) शक्तियों (देवता की) का ध्यान करें (करते हैं),,, वह (जो) हमारी बुद्धि को प्रेरित/जाग्रत करे (करेगा/करता है)।


Simply :

तीनों लोकों के उस वरण करने योग्य देवता की शक्तियों का ध्यान करते हैं, वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।


The God (Sun) of the Earth, Atmosphere and Space, who is to be followed, we meditate on his power, (may) He inspire(s) our intellect.