शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 30 October 2021

अंधेरी ज़िन्दगी में एक सवेरा दे दो, धरती आसमां के बीच बसेरा दे दो,

 ॐ सांई राम




अंधेरी ज़िन्दगी में एक सवेरा दे दो,
धरती आसमां के बीच बसेरा दे दो,
जीवन के तूफान में एक किनारा दे दो,
साईं नाथ अपने चरणों में आसरा दे दो,
अपनी रहमत का नज़ारा दे दो ||

शिरडी वाले सांई बाबा तू ही है एक हमारा,
जो भी तेरे दर पर आता मिलता उसे सहारा,
तुझसे लगन लगाके जोत जलाके,
भूल गया भूल गया मैं तो भूल गया,
ओ सांई बाबा सारी दुनिया भूल गया ||

सुबह शाम शिरडी वाले में फेरु तेरी माला,
तुझमें मन्दिर तुझमें मस्जिद तुझमें ही गुरुद्वारा,
तू है सारे जग का मालिक तू सारे जग का रखवाला,
तेरी भक्ति में सांई जी भूल गया भूल गया,
ओ सांई बाबा सारी दुनिया भूल गया ||

अंधियारे को दूर करे पानी से दीप जलाये,
तेरे दर पे जो आये उसे सच्ची राह दिखाये,
उसको सब कुछ भी मिल जाये जो तुझमें खो जाये,
शिरडी वाले सांई बाबा दुनिया भूल गया मैं,
ओ मैं तो भूल गया भूल गया,
ओ सांई बाबा सारी दुनिया भूल गया..... ||

Friday, 29 October 2021

घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ जिसमें सारी उमर कट जाय

ॐ सांई राम



घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय
जहां बनाऊँ कुटी मैं सांई
वहीं धाम तेरा बन जाए

तेरे चरण की धूल उठाऊँ
फिर दीवारो पे लेप लगाऊ
सांई जी दया करके
दरवाज़े पर श्रद्धा सबूरी लिखना

घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय
उस घर के अन्दर सांई
तेरा इक मन्दिर होवे

मन्दिर अन्दर मेरे सांई
तेरी सुन्दर मूरत होवे
मन भावों का हार बनाऊँ
तब इच्छा पूरी होवे

साँझ सवेरे उन भावों का
तुमको हार पहनाऊँ
घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय

भक्तिभाव से भरा हुआ
उस घर में परिवार होवे
श्यामा-तात्या हों संग में
और भगत म्हालसापति होवे
भक्तमंडली वहां विराजे
और लक्ष्मी बाई होवे
चारों पहर की होय आरती
नित-नित दर्शन होवे

घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय

गुरूवार के रोज़ वहां
सांई तेरा भंडारा होवे
हलुआ पूरी और खिचड़ी
भोग वहां लगता होवे
सांई के हाथों हांडी में
कुछ भोजन पकता होवे
सांई प्रेम से भोग लगावें
जूठन मोहे मिल जावे

घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय

चैत मास में नवमी के दिन
उर्स भरे मेला होवे
यशुदा नन्दन पालने झूलें
राम जन्म  सुन्दर होवे
सांई नाथ कि चले पालकी
मैं भी नाचूँ गाऊँ

घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय ||


Thursday, 28 October 2021

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 30

ॐ सांई राम



आप सभी को शिर्डी के साँईं बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं|

हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है
हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा|

किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...




श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 30
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शिरडी को खींचे गये भक्त
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1. वणी के काका वैघ
2. खुशालचंद
3. बम्बई के रामलाल पंजाबी ।
इस अध्याय में बतलाया गया है कि तीन अन्य भक्त किस प्रकार शिरडी की ओर खींचे गये ।

प्राक्कथन
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जो बिना किसी कारण भक्तों पर स्नेह करने वाले दया के सागर है तथा निर्गुण होकर भी भक्तों के प्रेमवश ही जिन्होंने स्वेच्छापूर्वक मानव शरीर धारण किया, जो ऐसे भक्त और समस्त कष्ट दूर हो जाते है, ऐसे श्री साईनाथ महाराज को हम क्यों न नमन करें । भक्तों को आत्मदर्शन कराना ही सन्तों का प्रधान कार्य है । श्री साई, जो सन्त शिरोमणि है, उनका तो मुख्य ध्येय ही यही है । जो उनके श्री-चरणों की शरण में जाते है , उनके समस्त पाप नष्ट होकर निश्चित ही दिन-प्रतिदिन उनकी प्रगति होती है । उनके श्री-चरणों का स्मरण कर पवित्र स्थानों से भक्तगण शिरडी आते और उनके समीप बैठकर श्लोक पढ़कर गायत्री-मंत्र का जप किया करते थे । परन्तु जो निर्बल तथा सर्व प्रकार से दीन-हीन है और जो यह भी नहीं जानते कि भक्ति किसे कहते है, उनका तो केवल इतना ही विश्वास है कि अन्य सब लोग उन्हें असहाय छोड़कर उपेक्षा भले ही कर दे, परन्तु अनाथों के नाथ और प्रभु श्री साई मेरा कभी परित्याग न करेंगे । जिन पर वे कृपा करे, उन्हें प्रचण्ड शक्ति, नित्यानित्य में विवेक तथा ज्ञान सहज ही प्राप्त हो जाता है । वे अपने भक्तों की इच्छायें पूर्णतः जानकर उन्हें पूर्ण किया करते है, इसीलिये भक्तों को मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जाया करती है और वे सदा कृतज्ञ बने रहते है । हम उन्हें साष्टांग प्रणाम कर प्रार्थना करते है कि वे हमारी त्रुटियों की ओर ध्यान न देकर हमें समस्त कष्टों से बचा लें । जो विपति-ग्रस्त प्राणी इस प्रकार श्री साई से प्रार्थना करता है, उनकी कृपा से उसे पूर्ण शान्ति तथा सुख-समृद्घि प्राप्त हती है । श्री हेमाडपंत कहते है कि हे मेरे प्यारे साई । तुम तो दया के सागर हो । यह तो तुम्हारी ही दया का फल है, जो आज यह साई सच्चरित्र भक्तों के समक्ष प्रस्तुत है, अन्यथा मुझमें इतनी योग्यता कहाँ थी, जो ऐसा कठिन कार्य करने का दुस्साहस भी कर सकता । जब पूर्ण उत्ततरदायित्व साई ने अपने ऊपर ही ले लिया तो हेमाडपंत को तिलमात्र भी भार प्रतीत न हुआ और न ही इसकी उन्हें चिन्ता ही हुई । श्री साई ने इस ग्रन्थ के रुप में उनकी सेवा स्वीकार कर ली । यह केवल उनके पूर्वजन्म के शुभ संस्कारों के कारण ही सम्भव हुआ, जजिसके लिये वे अपने को भाग्यशाली और कृतार्थ समझते है । नीचे लिखी कथा कपोलकल्पित नहीं, वरन् विशुदृ अमृततुल्य है । इसे जो हृदयंगम करेगा, उसे श्री साई की महानता और सर्वव्यापकता विदित हो जायेगी, परन्तु जो वादविवाद और आलोचना करना चाहते है, उन्हें इन कथाओं की ओर ध्यान देने की आवश्यकता भी नहीं है । यहाँ तर्क की नहीं, वरन् प्रगाढ़ प्रेम और भक्ति की अत्यन्त अपेक्षा है । विद्घान् भक्त तथा श्रद्घालु जन अथवा जो अपने को साई-पद-सेवक समझते है, उन्हें ही ये कथाएँ रुचिकर तथा शिक्षाप्रद प्रतीत होगी, अन्य लोगों के लिये तो वे निरी कपोल-कल्पनाएँ ही है । श्री साई के अंतरंग भक्तों को श्री साईलीलाएँ कल्पतरु के सदृश है । श्री साई-लीलारुपी अमृतपान करने से अज्ञानी जीवों को मोक्ष, गृहस्थाश्रमियों को सन्तोष तथा मुमुक्षुओं को एक उच्च साधन प्राप्त होता है । अब हम इस अध्याय की मूल कथा पर आते है ।

काका जी वैघ
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नासिक जिले के वणी ग्राम में काका जी वैघ नाम के एक व्यक्ति रहते थे । वे श्रीसप्तशृंगी देवी के मुख्य पुजारी थे । एक बार वे विपत्तियों में कुछ इस प्रकार ग्रसित हुए कि उनके चित्त की शांति भंग हो गई और वे बिलकुल निराश हो उअठे । एक दिन अति व्यथित होकर देवी के मंदिर में जाकर अन्तःकरण से वे प्रार्थना करने लगे कि हे देवि । हे दयामयी । मुझे कष्टों से शीघ्र मुक्त करो । उनकी प्रार्थना से देवी प्रसन्न हो गई और उसी रात्रि को उन्हें स्वप्न में बोली कि तू बाबा के पास जा, वहाँ तेरा मन सान्त और स्थिर हो जायेगा । बाबा का परिचय जानने को काका जी बड़े उत्सुक थे, परन्तु देवी से प्रश्न करने के पूर्व ही उनकी निद्रा भंग हो रगई । वे विचारने लगे कि ऐसे ये कौन से बाबा है, जिनकी ओर देवी ने मुझे संकेत किया है । कुछ देर विचार करने के पश्चात् वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सम्भव है कि वे त्र्यंबकेश्वर बाबा (शिव) ही हों । इसलिये वे पवित्र तीर्थ त्र्यंबक (नासिक) को गये और वहाँ रहकर दस दिन व्यतीत कियये । वे प्रातःकाल उठकर स्नानादि से निवृत्त हो, रुद्र मंत्र का जप कर, साथ ही साथ अभिषेक व अन्य धार्मिक कृत्य भी करने लगे । परन्तु उनका मन पूर्ववत् ही अशान्त बना रहा । तब फिर अपने घर लौटकर वे अति करुण स्वर में देवी की स्तुति करने लगे । उसी रात्रि में देवी ने पुनः स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि तू व्यर्थ ही त्र्यम्बकेश्वर क्यो गया । बाबा से तो मेरा अभिप्राय था शिरडी के श्री साई समर्थ से । अब काका जी के समक्ष मुख्य प्रश्न यह उपस्थित हो गया कि वे कैसे और कब शिरडी जाकर बाबा के श्री दर्शन का लाभ उठाये । यथार्थ में यदि कोई व्यक्ति, किसी सन्त के दर्शने को आतुर हो तो केवल सन्त ही नही, भगवान् भी उसकी इच्छा पूर्ण कर देते है । वस्तुतः यिद पूछा जाय तो सन्त और अनन्त एक ही है और उनमें कोई भिन्नता नही । यदि कोई कहे कि मैं स्वतः ही अमुक सन्त के दर्शन को जाऊँगा तो इसे निरे दम्भ के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है । सन्त की इचत्छा के विरुदृ उनके समीप कौन जाकर द्रर्शन ले सकता है । उनकी सत्त के बिना वृक्ष का एक पत्ता भी नहीं हिल सकता । जितनी तीव्र उत्कंठा संत दर्शन की होती, तदनुसार ही उसकी भक्ति और विश्वास में वृद्घि होती जायेगी और उतनी ही शीघ्रता से उनकी मनोकामना भी सफलतापूर्वक पू4ण होगी । जो निमंत्रण देता है, वह आदर आतिथ्य का प्रबन्ध भी करता है । काका जी के सम्बन्ध में सचमुच यही हुआ ।
शामा की मान्यता
...................
जब काका जी शिरडी यात्रा करने का विचार कर रहे थे, उसी समय उनके यहाँ एक अतिथि आया (जो शामा के अतिरिक्त और कोई न था) । शामा बाबा के अंतरंग भक्तों में से एक थे । वे ठीक इसी समय वणी में क्यों और कैसे आ पहुँचे, अब हम इस पर दृष्टि डालें । बाल्यावस्था में वे एक बार बहुत बीमार पड़ गये थे । उनकी माता ने अपनी कुलदेवी सप्तशृंगी से प्रार्थना की कि यदि मेरा पुत्र नीरोग हो जाये तो मैं उसे तुम्हारे चरणों पर लाकर डालूँगी । कुछ वर्षों के पश्चात् ही उनकी माता के स्तन में दाद हो गई । तब उन्होंने पुनः देवी से प्रार्थना की कि यदि मैं रोगमुक्त हो जाऊँ तो मैं तुम्हें चाँदी के दो स्तन चाढाऊँगी । पर ये दोनों वचन अधूरे ही रहे । परन्तु जब वे मृत्युशैया पर पड़ी ती तो उन्होंने अपने पुत्र शामा को समीप बुलाकर उन दोनों वचनों की स्मृति दिलाई तथा उन्हें पूर्ण करने का आश्वासन पाकर प्राण त्याग दिये । कुछ दिनों के पश्चात् वे अपनी यह प्रतिज्ञा भूल गये और इसे भूले पूरे तीस साल व्यतीत हो गये । तभी एक प्रसिदृ ज्योतिषी शिरडी आये और वहाँ लगभग एक मास ठहरे । श्री मान् बूटीसाहेब और अन्य लोगों को बतलाये उनके सभी भविष्य प्रायः सही निकले, जिनसे सब को पूर्ण सन्तोष था । शामा के लघुभ्राता बापाजी ने भी उनसे कुछ प्रश्न पूछे । तब ज्योतिषी ने उन्हें बताया कि तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राता ने अपनी माता को मृत्युशैया पर जो वचन दिये थे, उनके अब तक पूर्ण न किये जाने के कारण देवी असन्तुष्ट होकर उन्हें कष्ट पहुँचा रही है । ज्योतिषी की बात सुनकर शामा को उन अपूर्ण वचनों की स्मृति हो आई । अब और विलम्ब करना खतरनाक समझकर उन्होंने सुनार को बुलाकर चाँदी के दो स्तन शीघ्र तैयार कराये और उन्हें मसजिद मं ले जाकर बाबा के समक्ष रख दिया तथा प्रणाम कर उन्हें स्वीकार कर वचनमुक्त करने की प्रार्थना की । शामा ने कहा कि मेरे लिये तो सप्तशृंगी देवी आप ही है, परन्तु बाबा ने साग्रह कहा कि तुम इन्हें स्वयं ले जाकर देवी के चरणों में अर्पित करो । बाबा की आज्ञा व उदी लेकर उन्होंने वणी को प्रस्थान कर दिया । पुजारी का घर पूछते-पूछते वे काका जी के पास जा पहुँचे । काका जी इस समय बाबा के दर्शनों को बड़े उत्सुक थे और ठीक ऐसे ही मौके पर शामा भी वहाँ पहुँच गये । वह संयोग भी कैसा विचित्र था । काका जी ने आगन्तुक से उनका परिचय प्राप्त कर पूछा कि आप कहाँ से पधार रहे है । जब उन्होंने सुना कि वे शिरडी से आ रहे तो वे एकदम प्रेमोन्मत हो शामा से लिपट गये और फिर दोनों का श्री साई लीलाओं पर वार्तालाप आरम्भ हो गया । अपने वचन संबंधी कृत्यों को पूर्ण कर वे काकाजी के साथ शिरडी लौट आये । काकाजी मसजिद पहुँच कर बाबा के श्रीचरणों से जा लिपटे । उनके नेत्रों से प्रेमाश्रुओं की धारा बहने लगी और उनका चित्त स्थिर हो गया । देवी के दृष्टांतानुसार जैसे ही उन्होंनें बाबा के दर्शन किये, उनके मन की अशांति तुरन्त नष्ट तहो गई और वे परम शीतलता का अनुभव करने लगे । वे विचार करने लगे कि कैसी अदभुत शक्ति है कि बिना कोई सम्भाषण या प्रश्नोत्तर किये अथवा आशीष पाये, दर्शन मात्र से ही अपार प्रसन्नता हो रही है । सचमुच में दर्शन का महत्व तो इसे ही कहते है । उनके तृषित नेत्र श्री साई-चरणों पर अटक गये और वे अपनी जिहा से एक शब्द भी न बोल सके । बाबा की अन्य लीलाएँ सुनकर उन्हें अपार आनन्द हुआ और वे पूर्णतः बाबा के शरणागत हो गये । सब चिन्ताओं और कष्टों को भूलकर वे परम आनन्दित हुए । उन्होंने वहाँ सुखपूर्वक बारह दिन व्यतीत किये और फिर बाबा की आज्ञा, आशीर्वाद तथा उदी प्राप्त कर अपने घर लौट गये ।

खुशालचन्द (राहातानिवासी)
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ऐसा कहते है कि प्रातःबेला में जो स्वप्न आता है, वह बहुधा जागृतावस्था में सत्य ही निकलता है । ठीक है, ऐसा ही होता होगा । परन्तु बाबा के सम्बन्ध में समय का ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं था । ऐसा ही एक उदाहरण प्रस्तुत है – बाबा ने एक दिन तृतीय प्रहर काकासाहेब को ताँगा लेकर राहाता से खुशालचन्द को लाने के लिये भेजा, क्योंकि खुशालचन्द से उनकी कई दोनों से भेंट न हुई थी । राहाता पहुँच कर काकासाहेब ने यह सन्देश उन्हें सुना दिया । यह सन्देश सुनकर उन्हें महान् आश्चर्य हुआ और वे कहने लगे कि दोपहर को भोजन के उपरान्त थोड़ी देर को मुझे झपकी सी आ गई थी, तभी बाबा स्वप्न में आये और मुझे शीघ्र ही शिरडी आने को कहा । परन्तु घोडे का उचित प्रबन्ध न हो सकने के कारण मैंने अपने पुत्र को यह सूचना देने के लिये ही उनके पास भेजा था । जब वह गाँव की सीमा तक ही पहुँचा था, तभी आप सामने से ताँगे में आते दिखे । वे दोनों उस ताँगे में बैठकर शिरडी पहुँचे तथा बाबा से भेंटकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । बाबा की यह लीला देख खुशालचन्द गदगद हो गये ।

बम्बई के रामलाल पंजाबी
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बम्बई के एक पंजाबी ब्राहमण श्री. रामलाला को बाबा ने स्वप्न में एक महन्त के वेश में दर्शन देकर शिरडी आने को कहा । उन्हें नाम ग्राम का कुछ भी पता चल न रहा था । उनको श्री-दर्शन करने की तीव्र उत्कंठा तो थी, परन्तु पता-ठिकाना ज्ञात न होने के कारण वे बड़े असमंजस में पड़े हुये थे । जो आमंत्रण देता है, वही आने का प्रबन्ध भी करता है और अन्त में हुआ भी वैसा ही । उसी दिन सन्ध्या समय जब वे सड़क पर टहल रहे थे तो उन्होंने एक दुकान पर बाबा का चित्र टंगा देखा । स्वप्न में उन्हें जिस आकृति वाले महन्त के दर्शन हुए थे, वे इस चित्र के समक्ष ही थे । पूछताछ करने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि यह चित्र शिरडी के श्री साई समर्थ का है और तब उन्होंने शीघ्र ही शिरडी को प्रस्थान कर दिया तथा जीवनपर्यन्त शिरडी में ही निवास किया । इस प्रकार बाबा ने अपने भक्तों को अपने दर्शन के लिये शिरडी में बुलाया और उनकी लौकिक तथा पारलौकिक समस्त इच्छाँए पूर्ण की ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 27 October 2021

श्री साँई उदी मंत्र

ॐ सांई राम




संस्कृत

परमम् पवित्रं बाबा  विभूतिम
परमम् विचित्रं लीला विभूतिम
परमार्थ ईष्टार्थ मोक्ष प्रधानम
बाबा विभूतिम इदम अस्रयामी

English Translation

Sacred Holy and Supreme is Baba's VibhuthiPouring Forth in brilliant stream, this play of Vibhuthi.So auspicious is its might, it grants liberationBaba's Vibhuthi, its power protects me

When we recite this mantra, we say “I take refuge in the supremely sacred vibhuti of the Lord, the wonderful vibhuti which bestows liberation, the sacred state which I desire to attain.”
Since this mantra is so powerful, we should recite it with respect and with sincerity in order that we gain the full benefit from it.

Vibhuti is a reminder that ash is the end product of all matter. Vibhuti has also an aspect of immortality, which makes it a fit offering for worshipping God. Only the Vibhuti remains unchanged, since it is the final result of the annihilation of the five elements of creation. It is symbolic of the ultimate reality that remains when our ego is burnt away by the fire of illumination.

"The Vibhuti that you smear on your forehead is intended to convey the basic spiritual lesson that everything will be reduced to ashes, including the brow that wears it".


  

Tuesday, 26 October 2021

सुमिर साँईं नाम दिन-राती, साँईं नाम से विपदा जाती...

ॐ सांई राम




सुमिर साँईं नाम दिन-राती,
साँईं नाम से विपदा जाती...

सुध तन मन की भूल जाऊं, कभी होश में न आंऊ
तेरे धाम पहुचँ जाऊं, या किसी के काम आंऊ
शुभ काम पाठ पूजा, गुणगान करते करते
हो जाए बंद आँखे मेरी, 
तेरा ध्यान करते करते....


"मृत्युंजयाय रुद्राय
नीलाकंताया शम्भवे
अमृतेशाय सर्वाय
महादेवाय ते नमः "

Meaning: Lord Mahadeva (Shiva) has conquered death. He is the destructive force of the universe. He has a blue neck and he gives happiness to all. We pray to the kind-hearted lord, Shiv-Shambhu.

"गौरी वल्लभा कामारी
काला कूटा विशासना
माम उद्ध्हरे पादाम्भोजे
त्रिपुरा अग्न्यता कान्ताका "

Meaning: Lord Kaamaarey (another name for Lord Shiva) protects us from the evil. He is the consort of Gauri, the mother goddess. He drank the "Kaala Koota" poison (which was the outcome of the ocean churning). He is the destroyer of the three cities. We seek protection at the feet of Lord Shiva

ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं

Monday, 25 October 2021

तेरी महिमा सदा ही गाऊं...

 ॐ साईं राम



तेरी महिमा सदा ही गाऊं...
पल पल गाकर तुझे रिझाऊं...
हर पल देखूं तेरी सूरत...
मन में बसे सदा ही मूरत...
श्वास श्वास में तेरा नाम...
हर क्षण बैठूं तेरे धाम...


सांई नाम भक्ति, पुजारी सारी दुनिया,
दाता एक सांई, भिखारी सारी दुनिया ||

द्वार पे सांई के है, भक्तों का मेला,
सांई निराला मेरा, सांई अलबेला,
सांई तेरे रुप ने, संवारी सारी दुनिया,
दाता एक सांई, भिखारी सारी दुनिया ||

दुखी और निर्धन, द्वार तेरे आते,
मन चाहा फल वो पल में है पाते,
तुम दुनिया केतुम्हारी सारी दुनिया,
दाता एक सांई, भिखारी सारी दुनिया ||

तीन लोक तेरी, साईं आरती उतारे,
सांई नाम बोल अपना जीवन संवारे
शिरडी के नाथ ने, तारी सारी दुनिया,
दाता एक सांई, भिखारी सारी दुनिया||


॥अनंत कोटी ब्रम्हांड नायक राजाधिराज योगीराज परं ब्रम्हं श्री सच्चिदानंदा सदगुरु श्री साईनाथ महाराज की जय॥

Sunday, 24 October 2021

तेरे नाम के सहारे जीवन बिता रहा हूं जैसी भी निभ रही है वैसी निभा रहा हूं तुम सबके राज़दां हो हर दिल की जानते हो फ़िर भी ये हाले दिल मैं तुमको सुना रहा हूं मुझसे सहा न जाये अब ग़म ये ज़िन्दगी का नन्हीं सी जाँ पे कैसे सदमे उठा रहा हूं जब तक रहूं मैं ज़िन्दा इज़्ज़त की भीख़ देना ये आस लेके साँई तेरे दर पे आ रहा हूं दीदार की तलब से हाज़िर हुआ है बन्दा मुद्द्त से मेरे साँई तेरे दर पे आ रहा हूं तेरे नाम के सहारे जीवन बिता रहा हूं जैसी भी निभ रही है वैसी निभा रहा हूं

ॐ सांई राम



तेरे नाम के सहारे जीवन बिता रहा हूं
जैसी भी निभ रही है वैसी निभा रहा हूं


तुम सबके राज़दां हो हर दिल की जानते हो
फ़िर भी ये हाले दिल मैं तुमको सुना रहा हूं
मुझसे सहा न जाये अब ग़म ये ज़िन्दगी का
नन्हीं सी जाँ पे कैसे सदमे उठा रहा हूं


जब तक रहूं मैं ज़िन्दा इज़्ज़त की भीख़ देना
ये आस लेके साँई तेरे दर पे आ रहा हूं
दीदार की तलब से हाज़िर हुआ है बन्दा
मुद्द्त से मेरे साँई तेरे दर पे आ रहा हूं
तेरे नाम के सहारे जीवन बिता रहा हूं
जैसी भी निभ रही है वैसी निभा रहा हूं

For Donation

For donation of Fund/ Food/ Clothes (New/ Used), for needy people specially leprosy patients' society and for the marriage of orphan girls, as they are totally depended on us.

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