शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 28 November 2020

श्री साईं लीलाएं - बापू साहब बूटी को अभय दान

 ॐ सांई राम



परसो हमने पढ़ा था.. बाबा का संकट के प्रति सचेत करना

श्री साईं लीलाएं - बापू साहब बूटी को अभय दान

एक बार बापू साहब बूटी शिरडी आये हुए थे| तब एक दिन उनसे बाबा साहब डेंगले जो ज्योतिष विद्या के जानकर भी थे, ने बापू साहब बूटी से कहा - "आज का दिन आपके लिए बहुत घातक है| आपके जीवन पर कोई संकट आ सकता है| सावधान रहिये|" इस बात को सुनकर बापू साहब उदास और बेचैन हो गये कि अब क्या होगा?

जब बापू साहब बाबा के दर्शन करने को मस्जिद गये, तो बाबा ने उनसे पूछा - "बापू, क्या हो गया? ये नाना क्या कहते हैं? क्या वे तुम्हारी मृत्यु की भविष्यवाणी कर रहे हैं? लेकिन डरना नहीं| इनसे दृढ़तापूर्वक कह दो कि वह तुम्हें कैसे मारेगा, यह मुझे देखना है?" बाबा के इन शब्दों को सुनकर बापू साहब को बड़ा हौसला मिला| जिसके साथ बाबा जैसा रखवाला है उसका कोई क्या बिगाड़ सकता है? यह सोचकर वह बेफिक्र हो गये|

शाम के समय जब बापू साहब शौच करने के लिए गये तो वहां उन्हें एक सांप दिखाई दिया| उनके नौकर ने भी सांप को देखा और मारने के लिए पत्थर उठा लिया| बापू साहब ने एक लम्बी लाठी मंगवाई| लाठी आने से पहले ही वह सांप दीवार पर चढ़ते हुए नीचे गिर गया और शीघ्र ही गायब हो गया| उस समय बापू साहब को बाबा के सुबह कहे वचन याद आये और उनकी आँखें कृतज्ञता से भर आयीं|


कल चर्चा करेंगे... अम्मीर शक्कर की प्राण-रक्षा

ॐ सांई राम
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं

बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Friday, 27 November 2020

श्री साईं लीलाएं - बाबा का संकट के प्रति सचेत करना

ॐ सांई राम


कल हमने पढ़ा था.. लोग दक्षिणा भी देते थे और गालियाँ भी


श्री साईं लीलाएं - बाबा का संकट के प्रति सचेत करना

साईं बाबा रहते तो शिरडी में ही थे, पर उनकी नजरें सदैव अपने भक्तों पर लगी रहती थीं| बाबा अपने भक्तों पर आने वाले संकटों के प्रति उन्हें आगाह भी करते और संकटों से उनकी रक्षा भी किया करते थे| अहमदनगर गांव के रहने वाले काका साहब मिरीकर, जिन्हें उस समय की सरकार ने 'सरदार' के खिताब से नवाजा था| उनके बेटे वाला साहब मिरीकर भी अपने पिता की ही तरह प्रसिद्ध थे| वे कोपर गांव के तहसीलदार थे| एक बार वे अपने ऑफिस के किसी कार्य से दिल्ली जा रहे थे, तब जाते समय वे शिरडी आये|

मस्जिद में पहुंचकर उन्होंने बाबा के दर्शन कर, चरणवंदना की और कुशलक्षेम पूछने के बाद, कुछ इधर-उधर की बातें कीं| बातों के बीच में बाबा ने उनसे पूछा - "मिरीकर, क्या तुम हमारी द्वारिकामाई को जानते हो?" बाला साहब इस प्रश्न से हैरान रह गये| तब साईं बाबा बोले - "क्या समझे नहीं? यह द्वारिकामाई अपनी मस्जिद ही है| यह माई अपनी गोद में आकर बैठनेवाले बच्चों क अभय देती हैं| उनके कष्टों और परेशानियों को दूर कर देती हैं| यह बड़ी ममतामयी और दयालु हैं| यह सरल हृदय भक्तों की माँ हैं| यदि किसी पर कोई संकट आ जाता है तो यह अवश्य ही उसकी रक्षा करती हैं| जो इनकी गोद में आकर बैठा, उसका कल्याण हो गया| जो विश्वास के साथ इनकी छांव में बैठा, मानो वह सुख के सिंहासन पर बैठा| इसलिये इसे द्वारिका या द्वारावती भी कहते हैं|"

जब बाला साहब जाने लगे तो बाबा ने उनके सिर पर अपना वरदहस्त रखकर उन्हें आशीर्वाद के साथ ऊदी प्रसाद भी दिया| जब वे उठे तो बाबा ने पूछा - "क्या तुम लम्बे बाबा को जानते हो?" तो मिरीकर ने मना कर दिया| फिर बाबा ने अपने बायें हाथ की मुट्ठी बनाकर दाहिने हाथ की हथेली पर कोहनी के बल खड़ी की और सांप की भांति हिलाते हुए बोले - "वह ऐसा भयानक होता है| लेकिन वह द्वारिकामाई के पुत्रों का बिगाड़ ही क्या सकता है| इसकी करनी कोई नहीं जानता| हमें सिर्फ इसकी लीला देखने का ही काम है| जब द्वारिकामाई स्वयं रक्षा करने - वाली है तो वह लम्बा बाबा हमारा क्या बिगाड़ेगा?" सब लोग बैठे बाबा की बात सुन रहे थे| उन्हें समझ नहीं आया कि बाबा के संकेत किसकी ओर हैं| पर बाबा से पूछने का साहस किसी में नहीं था|

फिर बाबा ने शामा को अपने पास बुलाकर उसे मिरीकर के साथ चितली गांव जाने को कहा| फिर वे दोनों तांगे से रवाना हो गये| वहां पहुंचकर उन्हें मालूम हुआ कि बड़े अफसर जिन्हें उनसे मिलना था अब तक नहीं आये थे| कुछ देर तक उनका इंतजार करने के बाद वे दोनों हनुमान मंदिर में जाकर ठहर गए| खाना खाने के बाद, रात का एक पहर बीत जाने पर वे बिस्तर पर बैठे, दीये के उजाले में बैठे इधर-उधर की बातों में लगे रहे| कुछ देर बाद बाला साहब ने एक अखबार उठाया और उसे पढ़ने लगे| वह अखबार पढ़ने में तल्लीन थे| न जाने कहां से एक सांप आया और उनके अंगोछे पर बैठ गया| उस समय सांप को किसी ने नहीं देखा|

जब वह रेंगने लगा तो उसके रेंगने की आवाज सुनकर चपरासी के होश-हवास उड़ गये| वह बुरी तरह घबराकर 'सांप-सांप' कहता हुआ चीखने लगा| उसकी आवाज सुनकर बाला साहब की हालात ऐसी हो गयी कि काटो तो खून नहीं| शामा भी बौखला गया| वे बाबा को याद करने लगा|

फिर वहां उपस्थित सभी लोग संभल गये| जिसके जो हाथ लगा उसने वही उठाकर सांप का काम तमाम कर दिया| सब लोग बला टलने से बेफिक्र हो गये| मिरीकर को बाबा ने निकलते समय 'लम्बा बाबा' यानी सांप की भविष्यवाणी शिरडी में ही कर दी थी| इसलिए साथ में संकट टालने हेतु शामा को भेजा था| इस घटना के बाद मिरीकर की साईं बाबा के प्रति निष्ठा और भी दृढ़ हो गयी|

परसो चर्चा करेंगे... बापू साहब बूटी को अभय दान

ॐ सांई राम
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं

बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Thursday, 26 November 2020

श्री साई सच्चरित्र अध्याय 31

 ॐ सांई राम



आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं, 
हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है, हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा |



किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...

श्री साई सच्चरित्र अध्याय 31

मुक्ति-दान
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1. सन्यासी विरजयानंद
2. बालाराम मानकर
3. नूलकर
4. मेघा और
5. बाबा के सम्मुख बाघ की मुक्त

इस अध्याय में हेमाडपंत बाबा के सामने कुछ भक्तों की मृत्यु तथा बाघ के प्राण-त्याग की कथा का वर्णन करते है ।


प्रारम्भ

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मृत्यु के समय जो अंतिम इच्छा या भावना होती है, वही भवितव्यता का निर्माण करती है । श्री कृष्ण ने गीता (अध्याय-8) में कहा है कि जो अपने जीवन के अंतिम क्षण में मुझे सम्रण करता है, वह मुझे ही प्राप्त होता है तथा उस समय वह रजो कुछ भी दृश्य देखता है, उसी को अन्त में पाता है । यह कोई भी निश्चयात्मक रुप से नहीं कह सकता कि उस क्षण हम केवल उत्तम विचार ही कर सकेंगे । जहाँ तक अनुभव में आया है, ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय अनेक कारणों से भयभीत होने की संभावना अधिक होती है । इसके अनेक कारण है । इसलिये मन को इच्छानुसार किसी उत्तम विचार के चिंतन में ही लगाने के लिए नित्याभ्यास अत्यन्त आवश्यक है । इस कारण सभी संतों ने हरिस्मरण और जप को ही श्रेष्ठ बताया है, ताकि मृत्यु के समय हम किसी घरेलू उलझन में न पड़ जायें । अतः ऐसे अवसर पर भक्तगण पूर्णतः सन्तों के शरणागत हो जाते है, ताकि संत, जो कि सर्वज्ञ है, उचित पथप्रदर्शन कर हमारी यथेष्ठ सहायता करें । इसी प्रकार के कुछ उदाहरण नीचे दिये जाते है ।

1. विजयानन्द
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एक मद्रसी सन्यासी विजयानंद मानसरोवर की यात्रा करने निकले । मार्ग में वे बाबा की कीर्ति सुनकर शिरडी आये, जहाँ उनकी भेंट हरिद्घार के सोमदेव जी स्वामी से हुई और इनसे उन्होंने मानसरोवर की यात्रा के सम्बन्ध में पूछताछ की । स्वामीजी ने उन्हें बताया कि गंगोत्री से मानसरोवर 500 मील उत्तर की ओर है तथा मार्ग में जो कष्ट होते है, उनका भी उल्लेख किया जैसे कि बर्फ की अधिकता, 50 कोस तक भाषा में भिन्नता तथा भूटानवासियों के संशयी स्वभाव, जो यात्रियों को अधिक कष्ट पहुँचाया करते है । यह सब सुनकर सन्यासी का चित्त उदास हो गयाऔर उसने यात्रा करने का विचार त्यागकर मसजिद में जाकर बाबा के श्री चरणों का स्पर्श किया । बाबा क्रोधित होकर कहने लगे – इस निकम्मे सन्यासी को निकालो यहाँ से । इसका संग करना व्यर्थ है । सन्यासी बाबा के स्वभाव से पूर्ण अपरिचित था । उसे बड़ी निराशा हुई, परन्तु वहाँ जो कुछ भी गतिविधियाँ चल रही थी, उन्हें वह बैठे-बैठे ही देखता रहा । प्रातःकाल का दरबार लोगों से ठसाठस भरा हुआ था और बाबा को यथाविधि अभिषेक कराया जा रहा था । कोई पाद-प्रक्षालन कर रहा था तो कोई चरणों को छूकर तथा कोई तीर्थस्पर्श से अपने नेत्र सफल कर रहा था । कुछ लोग उ्हें चन्दन का लेप लगा हे थे तो कोई उनके शरीर में इत्र ही मल रहा था । जातिपाँति का भेदभाव भुलाकर सब भक्त यह कार्य कर रहे थे । यघपि बाबा उस पर क्रोधित हो गये थे तो भी सन्यासी के हृदय में उनके प्रति बड़ा प्रेम उत्पन्न हो गया था । उसे यह स्थान छोड़ने की इच्छा ही न होती थी । दो दिन के पश्चात् ही मद्रास से पत्र आया कि उसकी माँ की स्थिति अत्यन्त चिंताजनक है, जिसे पढ़कर उसे बड़ी निराशा हुई और वह अपनी माँ के दर्शन की इच्छा करने लगा, परन्तु बाबा की आज्ञा के बिना वह शिरडी से जा ही कैसे सकता था । इसलिये वह हाथ में पत्र लेकर उनके समीप गया और उनसे घर लौटने की अनुमति माँगी । त्रिकालदर्शी बाबा को तो सबका भविष्य विदित ही था । उन्होंने कह कि जब तुम्हें अपनी माँ से इतना मोह था तो फिर सन्यास धारण करने का कष्ट ही क्यों उठाया । ममता या मोह भगवा वस्त्रधारियों को क्या शोभा देता है । जाओ, चुपचाप अपने स्थान पर रहकर कुछ दिन शांतिपूर्वक बिताओ । परन्तु सावधान । वाड़े में चोर अधिक है । इसलिए द्घार बंद कर सावधानी से रहना, नहीं तो चोर सब कुछ चुराकर ले जायेंगे । लक्ष्मी यानी संपत्ति चंचला है और यह शरीर भी नाशवान् है, ऐसा ही समझ कर इहलौकिक व पालौकिक समस्त पदार्थों का मोह त्याग कर अपना कर्त्व्य करो । जो इस प्रकार का आचरण कर श्रीहरि के शरणागत हो रजाता है, उसका सब कष्टों से शीघ्र छुटकार हो उसे परमानंद की प्राप्ति हो जाती है । जो परमात्मा का ध्यान व चिंतन प्रेंम और भक्तिपूर्वक करता है, परमात्मा भी उसकी अविलम्ब सहायता करते है । पूर्वजन्मों के शुभ संस्कारों के फलस्वरुप ही तुम यहाँ पहुँचे हो और अब जो कुछ मैं कहता हूँ, उसे ध्यानपूर्वक सुनो और अपने जीवन के अंतिम ध्येय पर विचार करो । इच्छारहित होकर कल से भागवत का तीन सप्ताह तक पठन-पाठन प्रारम्भ करो । तब भगवान् प्रसन्न होंगे और तुम्हारे सब दुःख दूर कर देंगे । माया का आवरण दूर होकर तुम्हें शांति प्राप्त होगी । बाबा ने उसका अंतकाल समीप देखकर उसे यह उपचार बता दिया और साथ ही रामविजय पढ़ने की भी आज्ञा दी, जिससे यमराज अधिक प्रसन्न् होते है । दूसरे दिन स्नानादि तथा अन्य शुद्घि के कृत्य कर उसने लेंडी बाग के एकांत स्थान में बैठकर भागवत का पाठ आरम्भ कर दिया । दूसरी बार का पठन समाप्त होने पर वह बहुत थक गया और वाड़े में आकर दो दिन ठहरा । तीसरे दिन बड़े बाबा की गोद में उसके प्राण पखेरु उड़े गये । बाबा ने दर्शनों के निमित्त एक दिन के लिये उसका शरीर सँभाल कर रखने के लिये कहा । तत्पश्चात् पुलिस आई और यथोचित्त जाँच-पडताल करने के उपरांत मृत शरीर को उठाने की आज्ञा दे दी । धार्मिक कृत्यों के साथ उसकी उपयुक्त स्थान पर समाधि बना दी गई । बाबा ने इस प्रकार सन्यासी की सहायता कर उसे सदगति प्रदान की ।

2. बालाराम मानकर
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बालाराम मानकर नामक एक गृहस्थबाबा के परम भक्त थे । जब उनकी पत्नी का देहांत हो गया तो वो बड़े निराश हो गये और सब घरबार अपने लड़के को सौंप वे शिरडी में आकर बाबा के पास रहने लगे । उनकी भक्ति देखकर बाबा उनके जीवन की गति परिवर्तित कर देना चाहते थे । इसीलिये उन्होंने उन्हें बारह रुपये देकर मच्छिंग्रगढ़ (जिला सातार) में जाकर रहने को कहा । मानकर की इच्छा उनका सानिध्य छोड़कर अन्यत्र कहीं जाने की न ती, परन्तु बाबा ने उन्हें समझाया कि तुम्हारे कलायाणार्थ ही मैं यह उत्तम उपाय तुम्हें बतलता रहा हूँ । इसीलिये वहाँ जाकर दिन में तीन बार प्रभु का ध्यान करो । बाबा के शब्दों में व्श्वास कर वह मच्छंद्रगढ़ चाल गया और वहाँ के मनोहर दृश्यों, शीतल जल तथा उत्तम पवन और समीपस्थ दृश्यों को देखकर उसके चित्त को बड़ी प्रसन्नता हुई । बाबा द्घारा बतलाई विधि से उसने प्रभु का ध्यान करना प्रारम्भ कर दिया और कुछ दिनों पश्चात् ही उसे दर्शन प्राप्त हो गया । बहुधा भक्तों को समाधि या तुरीयावस्था में ही दर्शन होते है, परन्तु मानकर जब तुरीयास्था से प्राकृतावस्था में आया, तभी उसे दर्शन हुए । दर्शन होने के पश्चात् मानकर ने बाबा से अपने को वहाँ भेजने का कारण पूछा । बाबा ने कहा कि शिरडी में तुम्हारे मन में नाना प्रकार के संकल्प-विकल्प उठने लगे थे । इसी कारण मैंने तुम्हें वहाँ भेजा कि तुम्हारे चंचल मन को शांति प्राप्त हो । तुम्हारी धारणा थी कि मैं शिरडी में ही विघमान हूँ और साढ़ेतीन हाथ के इस पंचतत्व के पुतले के अतिरिक्त कुछ नही हूँ, परन्तु अब तुम मुझे देखकर यह धारणा बना लो कि जो तुम्हारे सामने शिरडी में उपस्थित है और जिसके तुमने दर्शन किये, वह दोनों अभिन्न है या नहीं । मानकर वह स्थान छोडकर अपने निवास स्थान बाँद्रा को रवाना हो गया । वह पूना से दादर रेल द्घारा जाना चाहता था । परन्तु जब वह टिकट-घर पर पहुँचा तो वहाँ अधिक भीड़ होने के कारण वह टिकट खरीद न सका । इतने में ही एक देहाती, जिसके कंधे पर एक कम्बल पड़ा था तथा शरीर पर केवल एक लंगोटी के अतिरिक्त कुछ न था, वहाँ आया और मानकर से पूछने लगा कि आप कहाँ जा रहे है । मानकर ने उत्तर दिया कि मैं दादर जा रहा हूँ । तब वह कहने लगा कि मेरा यह दादर का टिकट आप ले लीजिय, क्योंकि मुझे यहाँ एक आवश्यक कार्य आ जाने के कारण मेरा जाना आज न हो सकेगा । मानकर को टिकट पाकर बड़ी प्रसन्नता हुई और अपनी जेब से वे पैसे निकालने लगे । इतने में ही टिकट देने वाला आदमी भीड़ में कहीं अदृस्य हो गया । मानकर ने भीड़ में पर्याप्त छानबीन की, परन्तु सब व्यर्थ ही हुआ । जब तक गाड़ी नहीं छूटी, मानकर उसके लौटने की ही प्रतीक्षा करता रहा, परन्तु वह अन्त तक न लौटा । इस प्रकार मानकर को इस विचित्र रुप में द्घितीय बार दर्शन हुए । कुछ दिन अपने घर ठहरकर मानकर फिर शिरडी लौट आया और श्रीचरणों में ही अपने दिन व्यतीत करने लगा । अब वह सदैव बाबा के वचनों और आज्ञा का पालन करने लगा । अन्ततः उस भाग्यशाली ने बाबा के समक्ष ही उनका आशीर्वाद प्राप्त कर अपने प्राण त्यागे ।

3. तात्यासाहेब नूलकर
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हेमाडपंत ने तात्यासाहेब नूलकर के सम्बन्ध में कोई विवरण नहीं लिखा है । केवल इतना ही लिखा है कि उनका देहांत शिरडी में हुआ था । साईलीला पत्रिका में संक्षिप्त विवरण प्रकाशित हुआ था, रजो नीचे उद्घृत है – सन 1909 में जिस समय तात्यासाहेब पंढरपुर में उपन्यायाधीश थे, उसी समय नानासाहेब चाँदोरकर भी वहाँ के मामलतदार थे । ये दोनो आपस में बहुधा मिला करते और प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया करते थे । तात्यासाहेब सन्तों में अविश्वास करते थे, जबकि नानासाहेब की सन्तों के प्रति विशेष श्रद्घा थी । नानासाहेब ने उन्हें साईबाबा की लीलाएँ सुनाई और एक बार शिरडी जाकर बाब का दर्शन-लाभ उठाने का आग्रह भी किया । वे दो शर्तों पर चलने को तैयार हुए –

1. उन्हें ब्राहमण रसोइया मिलना चाहिये ।

2. भेंट के लिये नागपुरसे उत्तम संतरे आना चाहिये ।

शीघ्र ही ये दोनों शर्ते पूर्ण हो गयी । नानासाहेब के पास एक ब्राहमण नौकरी के लिये आया, जिसे उन्होंने तात्यासाहेब के पास भिजवा दिया और एक संतरे का पार्सन भी आया, जिसपर भेजने वाले का कोई पता न लिखा था । उनकी दोनों शर्ते पूरी हो गई थी । इसीलिये अब उन्हें शिरडी जाना ही पड़ा । पहले तो बाबा उन पर क्रोधित हुए, परन्तु जब धीरे-धीरे तात्यासाहेब को विश्वास हो गया कि वे सचमुच ही ईश्वरावतार है तो वे बाबा से प्रभावित हो गये और फिर जीवनपर्यन्त वहीं रहे । जब उनका अन्तकाल समीप आया तो उन्हें पवित्र धार्मिक पाठ सुनाया गया और अंतिम क्षणों में उन्हें बाबा का पद तीर्थ भी दिया गया । उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर बाबा बोल उठे – अरे तात्या तो आगे चला गया । अब उसका पुनः जन्म नहीं होगा ।

4. मेघा
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28वे अध्याय में मेघा की कथा का वर्णन किया जा चुका है । जब मेघा का देहांत हुआ तो सब ग्रामबासी उनकी अर्थी के साथ चले और बाबा भी उनके साथ सम्मिलित हुए तथा उन्होंने उसके मृत शरीर पर फूल बरसाये । दाह-संस्कार होने के पश्चात् बाबा की आँखों से आँसू गिरने लगे । एक साधारण मनुष्य के समान उनका भी हृदय दुःख से विदीर्ण हो गया । उनके शरीर को फूलों से ढँककर एक निकट समबन्धी के सदृश रोते-पीटते वे मसजिद को लौटे । सदगति प्रदान करते हुए अनेक संत देखने में आये है, परन्तु बाबा की महानता अद्घितीय ही है । यहाँ तक कि बाघ सरीखा एक हिंसक पशु भी अपनी रक्षा के लिये बाबा की शरण में आया, जिसका वृतान्त नीचे लिखा है -

 5. बाघ की मुक्ति

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बाबा के समाधिस्थ होने के सात दिन पूर्व शिरडी में एक विचित्र घटना घटी । मसजिद के सामने एक बैलगाड़ी आकर रुकी, जिसपर एक बाघ जंजीरों से बँधा हुआ था । उसका भयानक मुख गाड़ी के पीछे की ओर था । वह किसी अज्ञात पीड़ा या दर्द से दुःखी था । उसके पालक तीन दरवेश थे, जो एक गाँव से दूसरे गाँव में जाकर उसके नित्य प्रदर्शन करते और इस प्रकार यथेएष्ठ द्रव्य संचय करते थे और यही उनके जीविकोवपार्जन का एक साधन था । उन्होंने उसकी चिकित्सा के सभी प्रयत्न किये, परन्तु सब कुछ व्यर्थ हुआ । कहीं से बाबा की कीर्ति भी उनके कानों में पड़ गई और वे बाघ को लेकर साई दरबार में आये । हाथों से जंजीरें पकड़कर उन्होंने बाघ को मसजिद के दरवाजे पर खड़ा कर दिया । वह स्वभावतः ही भयानक था, पर रुग्ण होने के कारण वह बेचैन था । लोग भय और आश्चर्य के साथ उसकी ओर देखने लगे । दरवेश अन्दर आये और बाबा को सब हाल बताकर उनकी आज्ञा लेकर वे बाघ को उनके सामने लाये । जैसे ही वह सीढ़ियों के समीप पहुँचा, वैसे ही बाबा के तेजःपुंज स्वरुप का दर्शन कर एक बार पीछे हट गया और अपनी गर्दन नीचे झुका दी । जब रदोनों की दृष्टि आपस में एक हुई तो बाघ सीढ़ी पर चढ़ गया और प्रेमपूर्ण दृष्टि से बाबा की ओर निहारने लगा । ुसने अपनी पूँछ हिलाकर तीन बार जमीन पर पटकी और फिर तत्क्षम ही अपने प्राण त्याग दिये । उसे मृत देखकर दरवेशी बड़े निराश और दुःखी हुए । तत्पश्चात जब उन्हें बोध हुआ तो उन्होंने सोचा कि प्राणी रोगग्रस्त थी ही और उसकी मृत्यु भी सन्निकट ही थी । चलो, उसके लिये अच्छा ही हुआ कि बाबा सरीखे महान् संत के चरणों में उसे सदगति प्राप्त हो गई । वह दरवेशियों का ऋणी था और जब वह ऋम चुक गया तो वह स्वतंत्र हो गया और जीवन के अन्त में उसे साई चरणों में सदगति प्राप्त हुई । जब कोई प्राणीससंतों के चरणों पर अपना मस्तक रखकर प्राण त्याग दे तो उसकी मुक्ति हो जाती है । पूर्व जन्मों के शुभ संस्कारों के अभाव में ऐसा सुखद अंत प्राप्त होना कैसे संभव है ।


।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 25 November 2020

श्री साईं लीलाएं - लोग दक्षिणा भी देते थे और गालियाँ भी

ॐ सांई राम


कल हमने पढ़ा था.. घोड़े की लीद का रहस्य    

श्री साईं लीलाएं - लोग दक्षिणा भी देते थे और गालियाँ भी

किसी के बारे में कोई भला-बुरा कहे या बुराई करे, यह बाबा को बिल्कुल पसंद नहीं था| बाबा सब जान जाते और अवसर पाकर बातों ही बातों में उसे उसके बारे में समझा भी देते| ऐसे ही एक घटना का यहां वर्णन किया जा रहा है -एक वार पंढरपुर के एक वकील बाबा के दर्शन करने के लिए मस्जिद आये थे| उन्होंने बाबा की चरणवंदना की और कुछ दक्षिणा अर्पण कर वहीं एक कोने में बैठे वार्तालाप सुनने लगे|

उस समय बाबा किसी दूसरे भक्त से वार्ता कर रहे थे| वार्ता करते-करते अचानक बाबा ने वकील की ओर देखते हुए कहा - "कुछ लोग कितने चालाक होते हैं| यहां आकर चरणवंदना करते हैं, दक्षिणा भी देते हैं और पीठ पीछे गालियां भी देते हैं| उनके इस तरह के व्यवहार के बारे में क्या कहा जाये?"

वहां बैठे वकील को बाबा के कहे गये ये शब्द मानो तीर की भांति चुभ गये| वे समझ गये कि बाबा का इशारा उनकी तरफ ही है और जिस घटना के बारे में था, वह भी उन्हें याद आ गयी| उन्हें अपने किये पर पछतावा होने लगा| वे चुपचाप सिर झुकाये बैठे रहे| बाद में बाड़े में लौटकर उन्होंने यह बात काका साहब दीक्षित को बतायी और बोले - "यह एक तरह से मेरे लिए चेतावनी ही थी कि मैं किसी को भला-बुरा न कहूं|" फिर उन्होंने काका साहब को पूरा वाकया बताते हुए कहा - "एक बार जब उप-न्यायाधीश नूलकर साहब अपने स्वास्थ्य लाभ के लिए शिरडी आकर ठहरे, तब उनके बारे में बाररूम में बातें चल रही थीं कि मैं बातों-बातों में कह उठा, कि साहब जिस रोग से पीड़ित हैं, वह बिना औषधि लिए क्या साईं बाबा ठीक कर देंगे? ऐसा करके वे ठीक कैसे होंगे? इतने बड़े अफसर के लिए क्या ऐसा करना शोभा देता है?" उस समय नूलकर व साईं बाबा का उपहास किया जा रहा था| यह बात साईं बाबा की नजरों से छुपी नहीं| आज उन्होंने मुझे मेरी भूल दिखाकर मानो उपदेश ही दिया कि मुझे न तो किसी की निंदा ही करनी चाहिए और न ही किसी के काम में बाधा ही डालनी चाहिए|

इसके बाद वकील साहब ने यह निश्चय किया कि वे आगे से कभी भी किसी के बारे में भला-बुरा नहीं कहेंगे और न निंदा करेंगे| बाबा का यह उपदेश वकील के लिए नहीं बल्कि सभी मनुष्यों के लिये था|

कल चर्चा करेंगे..बाबा का संकट के प्रति सचेत करना       

ॐ सांई राम
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं

बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Tuesday, 24 November 2020

श्री साईं लीलाएं - घोड़े की लीद का रहस्य

ॐ सांई राम


कल हमने पढ़ा था.. धर्मग्रंथ गुरु के बिना पढ़ना बेकार है

श्री साईं लीलाएं - घोड़े की लीद का रहस्य

अनंतराव पाटणकर पूना के रहनेवाले थे| उन्होंने वेद और उपनिषदों का अध्ययन कर लिया था| उनका तत्वज्ञान भी समझ लिया था| लेकिन इतना सब करने के बाद भी उनका मन शांत न था|

उनके मन में साईं बाबा के दर्शन करने की प्रबल इच्छा थी| बाद में उन्होंने शिरडी में जाकर साईं बाबा के दर्शन किये, तो उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई| बाबा की चरणवंदना करने के बाद वे बाबा से बोले - "बाबा ! मैंने वेद, पुराण, उपनिषद् आदि अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया है, सुना भी है लेकिन मेरे मन को शांति नहीं मिली| इसलिए मेरी सारी मेहनत करनी व्यर्थ हो रही है| यह मैं समझ भी गया हूं| इसीलिए मैं आपकी शरण में आया हूं, अब आप ही मुझे कोई रास्ता बताइये और मेरे मन को शांति मिले, ऐसा आप आशीर्वाद भी दीजिये|"

तब साईं बाबा ने उसे एक कथा सुनायी| जो इस प्रकार है - "एक बार एक सौदागर यहां आया था| उसकी घोड़ी ने उसके सामने ही लीद के नौ गोले डाल दिये| सौदागर बहुत जिज्ञासु प्रवृति था| उसने तुरंत दौड़कर अपनी धोती का एक छोर बिछाकर उसने लीद के वे नौ गोले रख लिए| इससे उसके मन को बड़ी शांति मिली|" इतना कहकर बाबा चुप हो गये|

पाटणकर ने इस पर बहुत सोच-विचार किया, परन्तु वह इस कथा का मर्म समझने में असफल ही रहे| उन्होंने दादा केलकर से इस कथा का अर्थ समझाने का निवेदन किया| इस पर दादा केलकर ने कहा, बाबा जो कुछ भी कहते हैं उसका अर्थ ठीक से मैं भी नहीं समझ पाता हूं| फिर भी बाबा ने जो कुछ कहा और जितना मैं समझ पाया हूं, वह मैं तुम्हें बताता हूं| वे बोले कि घोड़ी से अर्थ है - परमात्मा की कृपा| नौ गोलों का अर्थ है - नवद्या भक्ति| नवद्या भक्ति इस प्रकार से है - श्रवण, कीर्तन, नामस्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वंदन, सेवा, संयम व आत्म-निवेदन| यही भक्ति के नौ प्रकार हैं|

जब तक इनमें किस भी भक्ति के द्वारा स्वयं को परमात्मा से जोड़ा न जाए, तो वह कृपा नहीं करता| जब तक मन में ईश्वर के प्रति भक्ति और प्रेम-भाव नहीं रहेगा| तब तक जब, तप, व्रत, योग, वेद-पुराण आदि पढ़ना-पढ़ाना सब व्यर्थ है| देवता प्यार के भूखे होते हैं, बिना लगन से किया हुआ भजन देवता को आकर्षित नहीं कर सकता - और जो ईश्वर से प्रेम करता है, उसे फिर किसी साधन की आवश्यकता नहीं पड़ती| इन नौ साधनों में से किसी एक पर मन से किया गया प्रयास ही पर्याप्त है| ईश्वर उसी से संतुष्ट होता है| ईश्वरभक्ति ही सर्वोपरि है| सबके प्रति मन में प्रेमभाव रखोगे तो मन शांत होगा| स्वयं को सौदागर की उत्सुकतापूर्वक सत्य को खोजकर नवद्या भक्ति को पा जाओ| तभी मन स्थिर होकर मानसिक शांति मिलेगी| बाबा ने तुम्हें यही भक्ति का संदेश दिया है|" दादा से यह सब सुनकर पाटणकर खुश हो गये|

दूसरे दिन जब पाटणकर बाबा के दर्शन करने मस्जिद गये तो बाबा ने पूछा - "क्यों, क्या तुमने लीद के नौ गोले बांध लिये?" बाबा के इस प्रश्न का संकेत समझकर पाटणकर बोले - "बाबा ! आपकी कृपा के बिना यह कैसे संभव हो सकता है?" इस पर बाबा हँस पड़े और उसका कल्याण हो, इसके लिए बाबा ने आशीर्वाद दिया| पाटणकर ने बाबा के श्रीचरणों पर अपना सिर झुका दिया|


कल चर्चा करेंगे..लोग दक्षिणा भी देते थे और गालियाँ भी

ॐ सांई राम
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं

बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Monday, 23 November 2020

श्री साईं लीलाएं - धर्मग्रंथ गुरु के बिना पढ़ना है बेकार

 ॐ सांई राम


कल हमने पढ़ा था.. दासगणु को ईशोपनिषद का रहस्य नौकरानी द्वारा सिखाना  

श्री साईं लीलाएं - धर्मग्रंथ गुरु के बिना पढ़ना है बेकार

एक तहसीलदार (व्ही.एच.ठाकुर) रेवेन्यू विभाग में कार्यरत थे| बहुत पढ़े-लिखे होकर भी उन्हें सत्संग से बहुत लगन थी| इसलिए अपने विभाग के साथ जहां कहीं भी जाते, यदि वहां किसी संत महात्मा के बारे में सुनते तो उनके दर्शन अवश्य करते|

एक बार वे अपने ऑफिस के कार्य से जिला बेलगांव के पास बड़गांव गये| कार्य से निपटकर वे उसी गांव में कानडी संत अप्पा जी के दर्शन कर उनकी चरण-वंदना की| उस समय वे महात्मा निश्चलदास रचित 'विचार सागर' ग्रंथ का अर्थ अपने भक्तों के समक्ष कर रहे थे| यह वेदांत से संबंधित ग्रंथ है| कुछ देर बैठने के बाद जब उन्होंने जाने के लिए महात्मा जी से अनुमति मांगी तो उन महात्मा ने उन्हें अपना ग्रंथ देते हुए कहा - "तुम इस ग्रंथ का अध्ययन करो|

तुम्हारी सब मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी| इतना ही नहीं, भविष्य में जब तुम उत्तर दिशा की ओर जाओगे, तो तुम्हारी एक महापुरुष से भेंट होगी| वे तुम्हें परमार्थ की राह दिखायेंगे|" ठाकुर साहब ने स्वयं को सौभाग्यशाली समझकर वह ग्रंथ बड़े प्रेम से माथे से लगाकर स्वीकार किया और बड़े आदर के साथ महात्मा जी से आशीर्वाद प्राप्त कर विदा हुए|

कुछ समय बाद ठाकुर का तबादला कल्याण तहसील में उच्च पद पर हो गया, जो मुम्बई के नजदीक है| वहां पर उनकी भेंट साईं बाबा के भक्त नाना साहब चाँदोरकर से हुई| चाँदोरकर से साईं बाबा की लीलाएं सुनकर उनके मन में साईं बाबा के दर्शनों की तीव्र इच्छा हुई| उन्होंने चाँदोरकर से अपनी इच्छा प्रकट कर दी| अगले ही दिन चाँदोरकर शिरडी जाने वाले थे| उन्होंने ठाकुर से भी शिरडी चलने को कहा| इस पर ठाकुर ने अपनी मजबूरी बताते हुए कहा - "नाना साहब ! यह अवसर तो अच्छा है, लेकिन क्या करूं? ठाणे की एक अदालत में पेशी है और मेरा उस मुकदमे के सिलसिले में उपस्थित होना जरूरी है| इसलिए चाहते हुए भी न चल सकूंगा|" चाँदोरकर ने कहा - "आप मेरे साथ चलिये तो सही| बाबा के दर्शन को जाने पर उस दावे की क्या बात है, बाबा सब संभाल लेंगे| ऐसा विश्वास रखो, और चलो मेरे साथ|" लेकिन ठाकुर की समझ में यह बात नहीं आयी| वे बोले - "अदालत के कानून तो आप जानते ही हैं| यदि तारीख निकल गयी तो आगे बहुत चक्कर लगाने पड़ेंगे|" और वे अपने निर्णय पर अड़े रहे|

फिर चाँदोरकर अकेले ही चले गये| इधर जब ठाकुर ठाणे की अदालत पहुंचे तो पता चला कि आगे की तारीख मिल गयी है| तब उन्हें इस बात का बड़ा पछतावा हुआ, कि नाना कि बात मान लेता तो अच्छा होता| फिर वे यह सोच शिरडी पहुंचे कि साईं बाबा के दर्शन भी कर लेंगे और नाना साहब भी मिल जायेंगे| जब वे शिरडी गये तो पता चला कि नाना साहब तो वापस लौट चुके थे| इसलिए उनसे भेंट न हो पायी| फिर वे मस्जिद में बाबा के दर्शन करने के लिए गये| बाबा के दर्शन और चरणवंदना कर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी|

बाबा बोले - "उस कानडी अप्पा का दिया हुआ 'विचारसागर' ग्रंथ पढ़ चुके हो क्या? उसका मार्ग तो भैंसे की पीठ पर चढ़कर घाट पार करना है| लेकिन यहां का मार्ग बहुत संकरीला है| उस पर चलना आसान नहीं है| इस पर चलने के लिए तुम्हें कठोर श्रम करना पड़ेगा| यहां कष्ट-ही-कष्ट हैं|" साईं बाबा के ऐसे वचन सुनकर ठाकुर को बहुत प्रसन्नता हुई| उनके वचन का मतलब वे समझ चुके थे| उन्हें साईं बाबा के वचन सुनकर बड़गांव के कानडी महात्मा जी के वचन स्मरण हो आये| उन्होंने जिस महापुरुष के बारे में कहा था वे साईं बाबा ही हैं|यह बात उन्होंने अपने मन में धारण कर ली| फिर ठाकुर ने बाबा के चरणों में सिर झुकाकर विनती की - "बाबा ! आप मुझ अनाथ पर कृपा करके मुझे अपना लो|"

फिर बाबा उसे समझाते हुए बोले - "अप्पा ने जो कहा था, वह सब सत्य है| जब तुम उसके अनुसार आचरण करके साधना करोगे, तभी मनोकामनायें पूरी होंगी| सद्गुरु के बिना किताब का ज्ञान व्यर्थ है| फिर गुरु-मार्गदर्शन से ग्रंथ पढ़ना, सुनना और उस पर अमल करना| ये सब बातें फल देती हैं|" इस उपदेश के बाद ठाकुर बाबा के परम भक्त बन गये|


कल चर्चा करेंगे..घोड़े की लीद का रहस्य       

ॐ सांई राम
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं

बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Sunday, 22 November 2020

श्री साईं लीलाएं - दासगणु को ईशोपनिषद का रहस्य नौकरानी द्वारा सिखाना

 ॐ सांई राम


कल हमने पढ़ा था.. किसी से बुरा मत बोलो 

श्री साईं लीलाएं - दासगणु को ईशोपनिषद का रहस्य नौकरानी द्वारा सिखाना

एक बार दासगणु जी महाराज ने ईशोपनिषद् पर 'ईश्वास्य-भावार्थ-बोधिनी टीका' लिखनी शुरू की| इस ग्रंथ पर टीका लिखना वास्तव में बहुत ही कठिन कार्य है| दासगणु ने ओवी छंदों में इसकी टीका तो की, पर सारतत्व उनकी समझ में नहीं आया| टीका लिखने के बाद भी उन्हें आत्मसंतुष्टि नहीं हुई| अपनी शंका के समाधान के लिए उन्होंने अनेक विद्वानों से परामर्श किया, परन्तु उसका कोई समाधान नहीं हो सका|

जब दासगणु को किसी भी तरह से संतुष्टि न हुई हो उन्होंने अपने मन में विचार किया कि इस समस्या का समाधान वही कर सकता है, जिसने आत्म-साक्षात्कार कर लिया हो, क्योंकि उपनिषद् एक ऐसा शास्त्र है जिसका रहस्य जानने से जन्म-मरण से मुक्ति मिल जाती है| इसलिए उन्होंने शिरडी जाने का निर्णय का लिया| फिर अवसर पाते ही वह शिरडी जा पहुंचे - और साईं बाबा के दर्शन करके चरणवंदना की| फिर उपनिषद् पर टीका लिखने पर आयी समस्या और अपनी शंका के लिए बाबा से प्रार्थना की - "बाबा आप यदि मेरी समस्या का समाधान कर दें तो मेरे सारे परिश्रम पूर्णता होंगे| आप तो सब कुछ जानने वाले हैं| अप आप ही कुछ करें|"

सब कुछ सुनने के बाद साईं बाबा ने उन्हें अपना आशीर्वाद देते हुए आश्वासन दिया - "इसमें फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है| इसमें कठिनाई ही क्या है, जब तुम वापस लौटोगे तो बिलपार्ले में रहने वाले काका साहब दीक्षित की नौकरानी तुम्हारी समस्या का समाधान कर देगी|"

बाबा के श्रीमुख से ऐसे वचन सुनकर दासगणु हैरान रह गये| उन्होंने अपने मन में सोचा, 'कहीं बाबा मजाक तो नहीं कर रहे| क्या एक साधारण अनपढ़ नौकरानी, उपनिषद् का रहस्य सुलझा देगी? जो मैं न जान सका, जहां विद्वानों की बुद्धि हार गयी, वह यह कैसे करेगी?' लेकिन बाबा की बात तो ब्रह्म वाक्य होते हैं| अत: वे कभी असत्य नहीं हो सकते| उन्हें बाबा का पूर्ण विश्वास था|

बाबा के वचनों पर पूर्ण श्रद्धा रखकर दासगणु शिरडी से मुम्बई के विलेपार्ले में काका साहब दीक्षित के घर पहुंचे| अगले दिन जब वे सुबह के समय उठे तो उन्हें किसी बालिका द्वारा गीत गाने की आवाज सुनाई दी| गीत का भाव यह था कि वह लाल साड़ी कितनी सुंदर थी, उसका जरी वाला आंचल कितना सुंदर था, उसके किनारे कितने सुंदर थे| दासगणु को यह गीत बड़ा अच्छा लगा और वे धीरे-धीरे गीत के बोल पर झूमने लगे| मन को अद्भुत आनंद प्राप्त हुआ| जब उन्होंने बाहर आकर देखा तो वह गीत काका साहब दीक्षित की नाम्या नाम की नौकर की बहन बर्तन मांजते हुए गा रही थी| वह मात्र आठ वर्ष की थी और अपने तन को एक फटी-पुरानी साड़ी से ढके हुए थी| दरिद्रता की ऐसी अवस्था में भी वह कितनी खुश थी| उसको खुश देखकर दासगणु का मन दया से भर गया| अगले दिन दासगणु ने भोरेश्वर विश्वनाथ प्रधान से एक अच्छी-सी साड़ी मंगवाकर उस लड़की को दे दी| जब उस बालिका को साड़ी दी तो वह इतनी खुश हुई जितनी खुशी भूखे को भोजन मिलने पर होती है| दूसरे दिन उसने वह नई साड़ी पहनी और नाचने-कूदने लगी, गाती रही|

फिर अगले दिन उसने नई साड़ी को संभालकर रख दिया और पहले की तरह फटी-पुरानी उसी साड़ी को पहनकर काम पर आयी| लेकिन नई साड़ी पाने से जो खुशी कल उसके चेहरे पर झलक रही थी, वह आज भी विद्यमान थी| उसे देखकर दासगणु की दया आश्चर्य में बदल गयी|

दासगणु विचारने लगे कि गरीबी के कारण उसे फटे-पुराने वस्त्र पहनने पड़ते थे| लेकिन अब तो उसके पास नयी साड़ी थी, फिर भी उसने नई साड़ी को संभालकर रख दिया था और फटे-पुराने कपड़े पहनकर भी उसके आनंद में कोई कमी नहीं आई थी| उसके चेहरे पर दुःख या निराशा का भाव जरा-सा भी नहीं था| उसे दोनों स्थितियों में खुश देखकर दासगणु समझ गये कि सुख और दुःख केवल अपनी मनोस्थिति पर निर्भर हैं| फिर ईशावास्य का रहस्य उनकी समझ में आ गया और वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि परमात्मा ने जो कुछ दिया है, उसी में संतुष्ट रहना चाहिए और जो भी जैसी भी स्थिति है, उसी परमात्मा का कृपा-प्रसाद है| वह स्थिति निश्चित ही सुखद रहेगी| फिर वे विचार करने लगे, बालिका की निर्धन अवस्था, उसके फटे-पुराने कपड़े, नई साड़ी देने वाला और उसकी स्वीकृति देने वाला आदि ये सब उस परमात्मास द्वारा निर्देशित था|

दासगणु को उस नौकरानी द्वारा प्रत्यक्ष में यह शिक्षा मिली कि जो कुछ स्वयं के पास है, उसी में संतुष्ट रहना चाहिए, उसी में कल्याण है| साईं बाबा उसको स्वयं इसका अर्थ बता सकते थे| चाहे वे कितने शब्दों का उपयोग करते तो भी तत्वज्ञान उनकी समझ में नहीं आता, जितना एक अनुभव से आ गया| इसलिए उन्होंने दासगणु को काका साहब की नौकरानी के पास भेजा था| परमात्मा कण-कण में मौजूद है| यह सारा संसार उस परमात्मा के द्वारा ही संचालित हो रहा है और वही सबके अंतर्मन में समाकर यह खेल खेलता है| बाबा और उस नौकरानी में कोई अंतर नहीं है - यही समझाने के लिए दासगणु को बाबा ने वहां भेजा था|


कल चर्चा करेंगे..धर्मग्रंथ गुरु बिना पढ़ना बेकार       

ॐ सांई राम
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं

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