शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 31 October 2020

श्री साईं लीलाएं - कुछ दिन रुको, आराम से चले जाना

ॐ सांई राम


परसों हमने पढ़ा था.. काका आप कल जायें

श्री साईं लीलाएं - कुछ दिन रुको, आराम से चले जाना

नासिक निवासी भाऊ साहब धुमाल पेशे से एक जाने-माने वकील थेएक कानूनी मुकदमे के सिलसिले में उन्हें निफाड़ जाना थाचूंकि शिरडी रास्ते में पड़ता था इसलिए बाबा के दर्शन करने के लिए शिरडी में ही उतर गएमस्जिद में जाकर दर्शन करने के बाद जब उन्होंने बाबा से जाने की आज्ञा मांगी तो बाबा ने उन्हें शिरडी में ही रुकने के लिए कहाउन्हें तो अदालत में जाना जरूरी थापर बाबा की आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस उनमें न थावह मजबूरी में रुक गयेवह रोजाना बाबा से आज्ञा मांगते जाते और बाबा उन्हें मना कर देते|इस तरह उन्हें शिरडी में रहते हुए एक सप्ताह हो गयाएक सप्ताह बाद एक दिन जब उन्होंने बाबा से आज्ञा मांगीतो इस बार ने उन्हें लौटने की अनुमति दे दी|इस तरह जब वह सप्ताह बाद निफाड़ पहुंचे तो पता चला कि मुकदमे की सुनवाई करने वाले जज को पेट का रोग हो गया था जिस कारण मुकदमे की सुनवाई को आगे टालना पड़ाउनके स्थान पर चार जजों ने महीनों तक मामले की सुनवाई कर निर्णय धुमाल के मुवक्किल ने सुना दियाजिससे वह बरी हो गयाअब धुमाल को मालूम हुआ कि बाबा ने क्यों उन्हें जाने की अनुमति नहीं दी थी|
कल चर्चा करेंगे..भक्तों के मन की बात जानने वाला बाबा    

ॐ सांई राम
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Friday, 30 October 2020

श्री साईं लीलाएं - काका आप कल जायें


 ॐ सांई राम


कल हमने पढ़ा था.. संकटमोचक साईं बाबा       

श्री साईं लीलाएं - काका आप कल जायें

शिरडी में जिस तरह रामजन्म उत्सव मनाया जातावैसे ही कृष्ण जन्मोत्सव भी मनाया जाता थापालना बांधकर कृष्ण जन्मदिन बड़ी धूमधाम सेहँसते गातेनाचते-भजन-कीर्तन करते हुए मनाया जाताआस-पास के गांवों से भी लोग इस उत्सव को देखने के लिए आते थे|एक बार मुम्बई से काका महाजनी शिरडी आयेसप्ताह भर शिरडी में रहकर बाबा के सत्संग का लाभ उठाकरफिर कृष्ण जन्मोत्सव में शामिल होकर उसके आनंद का लाभ लेनें के बाद मुम्बई लौटने का उनका विचार थापरन्तु बाबा तो अंतर्यामी थेवे सबके मन की बात पहले ही जान लेते थेइसलिये काका महाजनी जब बाबा के दर्शन करने आये तो दर्शन कर चुकने के बाद साईं बाबा ने उनसे पूछा - "काकाआपका वापस जाने का विचार कब का है ?" बाबा का सवाल सुनकर काका हैरानी में पड़ गयेउन्होंने तो आठ-दस दिन रहने का विचार बना रखा थासवाल सुनकर काका उलझन में पड़ गयेफिर भी उन्होंने जवाब दिया - "बाबाजब भी आपकी आज्ञा होगी|" बाबा ने कहा - "तुम कल ही चले जाओ|

"काका महाजनी ने बाबा की आज्ञा को सर-माथे पर मानकर दूसरे ही दिन मुम्बई के लिए प्रस्थान कर दियारास्ते भर भी वह यही सोचते रहे कि उनकी तो रहने की इच्छा थी पर बाबा ने उन्हें वापस क्यों भेज दिया मुम्बई पहुंचने के बाद जब वे अपने ऑफिस गये तो पता चला कि उनका सेठ उनसे मिलने के लिए बेचैन है और इसके लिए वह पत्र लिखकर शिरडी भी भेज चुका हैपूछने पर पता चला कि मुनीम की तबियत अचानक खराब हो गयी है इसलिए आपकी ऑफिस में उपस्थिति जरूरी थीबाद में वह पत्र जो उनसे सेठ ने उनके लिए शिरडी भेजा थाउनके मुंबई वाले पते पर वापस भेज दिया गयाअब काका महारानी अच्छी तरह से समझ गये कि उन्हें बाबा ने क्यों वापस भेजा था|

परसों चर्चा करेंगे... कुछ दिन रुको, आराम से चले जाना   

ॐ सांई राम
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Thursday, 29 October 2020

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 27

ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साँईं बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं, हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है | हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा| किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है|

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 27
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भागवत और विष्नुसहस्त्रनाम प्रदान कर अनुगृहीत करना, गीता रहस्य, खापर्डे ।
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इस अध्याय में बतलाया गया है कि श्री साईबाबा ने किस प्रकार धार्मिक ग्रन्थों को करस्पर्श से पवित्र कर अपने भक्तों को पारायण के लिये देकर अनुगगृहीत किया तथा और भी अन्य कई घटनाओं का उल्लेख किया गया है ।

प्रारम्भ
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जन-साधारण का ऐसा विश्वास है कि समुद्र में स्नान कर लेने से ही समस्त तीर्थों तथा पवित्र नदियों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त हो जाता है । ठीक इसी प्रकार सदगुरु के चरणों का आश्रय लेने मात्र से तीनों शक्तियों (ब्रहृ, विष्णु, और महेश) और परब्रहृ को नमन करने का श्रेय सहज ही प्राप्त हो जाता है । श्री सच्चिदानंद साई महाराज की जय हो । वे तो भक्तों के लिये कामकल्पतरु, दया के सागर और आत्मानुभूति देने वाले है । हे साई । तुम अपनी कथाओं के श्रवण में मेरी श्रद्घा जागृत कर दो । घनघोर वर्षा ऋतु में जिस प्रकार चातक पक्षी स्वाति नक्षत्र की केवल एक बूँद का पान कर प्रसन्न हो जाता है, उसी प्रकार अपनी कथाओं के सारसिन्धु से प्रगटित एक जल कण का सहस्त्रांश दे दो, जिससे पाठकों और श्रोताओं के हृदय तृप्त होकर प्रसन्नता से भरपूर हो जाये । शरीर से स्वेद प्रवाहित होने लगे, आँसुओं से नेत्र परिपूर्ण हो जाये, प्राण स्थिरता पाकर चित्त एकाग्र हो जाये और पल-पल पर रोमांच हो उठे, ऐसा सात्विक भाव सभी में जागृत कर दो । पारस्परिक बैमनस्य तता वर्ग-अपवर्ग का भेद-भाव नष्ट कर दो, जिससे वे तुम्हारी भक्ति में सिसके, बिलखें और कम्पित हो उठें । यदि ये सब भाव उत्पन्न होने लगे तो इसे गुरु-कृपा के लक्षण जानो । इन भावों को अन्तःकरण में उदित देखकर गुरु अत्यन्त प्रसन्न होकर तुम्हें आत्मानुभूति की ओर अग्रसर करेंगे । माया से मुक्त होने का एकमात्र सहज उपाय अनन्य भाव से केवल श्री साईबाबा की शरण जाना ही है । वेद –वेदान्त भी मायारुपी सागर से पार नहीं उतार सकते । यह कार्य तो केवल सदगुरु द्घारा ही संभव है । समस्त पप्राणियों और भूतों में ईश्वर-दर्णन करने के योग्य बनाने की क्षमता केवल उन्हीं में है ।

पवित्र ग्रन्थों का प्रदान
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गत अध्याय में बाबा की उपदेश-शैली की नवीनता ज्ञात हो चुकी है । इस अध्याय में उसके केवल एक उदाहरण का ही वर्णन करेंगे । भक्तों को जिस ग्रन्थविशेष का पारायण करना होता थे, उसे वे बाबा के कर कमलों में भेंट कर देते थे और यदि बाबा उसे अपने करकमलों से स्पर्श कर लौटा देते तो वे उसे स्वीकार कर लेते थे । उनकी ऐसी भावना हो जाती थी कि ऐसे ग्रन्थ का यदि नित्य पठन किया जायेगा तो बाबा सदैव उनके साथ ही होंगे । एक बार काका महाजनी श्री एकनाथी भागवत लेकर शिरडी आये । शामा ने यह ग्रन्थ अध्ययन के लिये उनसे ले लिया और उसे लिये हुए वे मसजिद में पहुँचे । तब बाबा ने ग्रन्थ शामा से ले लिया और उन्होंने उसे स्पर्श कर कुछ विशेष पृष्ठों को देखकर उसे सँभालकर रखने की आज्ञा देकर वापस लौटा दिया । शामा ने उन्हें बताया कि यह ग्रन्थ तो काकासाहेब का है और उन्हें इसे वापस लौटाना है । तब बाबा कहने लगे कि नही, नही, यह ग्रन्थ तो मैं तुम्हें दे रहा हूँ । तुम इसे सावधानी से अपने पास रखो । यह तुम्हें अत्यन्त उपयोगी सिदृ होगा । कुछ दिनों के पश्चात काका महाजनी पुनः श्रीएकनाथी भागवत की दूसरी प्रति लेकर आये और बाबा के करकमलों में भेंट कर दी, जिसे बाबा ने प्रसाद-स्वरुप लौटाकर उन्हें भी उसे सावधानी से सँभाल कर रखने की आज्ञा दी । साथ ही बाबा ने उन्हें आश्वासन दिया कि यह तुम्हें उत्तम स्थिति में पहुँचाने में सहायक सिदृ होगा । काका ने उन्हें प्रणाम कर उसे स्वीकार कर लिया ।


शामा और विष्नुसहस्त्रनाम
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शामा बाबा के अंतरंग भक्त थे । अस कारण बाबा उन्हें एक विचित्र ढंग से बिष्णुसहस्त्रनाम प्रसादरुप देने की कृपा करना चाहते थे । तभी एक रामदासी आकर कुछ दिन शिरडी में ठहरा । वह नित्य नियमानुसार प्रातःकाल उठता और हाथ मुँह धोने के पश्चात् स्नान कर भगवा वस्त्र धारण करता तथा शरीर पर भस्म लगाकर विष्णुसहस्त्रनाम का जाप किया करता था । वह अध्यात्मरामायम का भी श्रद्घापूर्वक नित्य पाठ किया करता था और बहुधा इन्हीं ग्रन्थों को ही पढ़ा करता था । कुछ दिनों के पश्चात् बाबा ने शामा को भी विष्णुसहस्त्रनाम से परिचित कराने का विचार कर रामदासी को अपने समीप बुलाकर उससे कहा कि मेरे उदर में अत्यन्त पीड़ा हो ररही है और जब तक मैं सोलामुखी का सेवन न करुँगा, तब तक मेरा कष्ट दूर न होगा । तब रामदासी ने अपना पाठ स्थगित कर दिया और वह औषधि लाने बाजार चला गया । उसी प्रकार बाबा अपने आसन से उठे और जहाँ वह पाठ किया करते थे, वहाँ जाकर उन्होंने विष्णुसहस्त्रनाम की वह पुस्तिका उठाई और पुनः अपने आसन पर विराजमान होकर शामा से कहने लगे कि यह पुस्तक अमूल्य और मनोवांछित फल देने वाली है । इसलिये मैं तुम्हें इसे प्रदान कर रहा हूँ, ताकि तुम इसका नित्य पठन करो । एक बार जब मैं अधिक रुग्ण था तो मेरा हृदय धड़कने लगा । मेरे प्राणपखेरु उड़ना ही चाहते थे कि उसी समय मैंनें इस सदग्रन्थ को अपने हृदय पर रख लिया । कैसा सुख पहुँचाया इसने । उस समय मुझे ऐसा ही भान हुआ, मानों अल्लाह ने स्वयं ही पृथ्वी पर आकर मेरी रक्षा की । इस कारण यह ग्रन्थ मैं तुम्हें दे रहा हूँ । इसे थोड़ा धीरे-धीरे, कम से कम एक श्लोक प्रतिदिन अवश्य पढ़ना, जिससे तुम्हारा बहुत भला होगा । तब शामा कहने लगे कि मुझे इस ग्रन्थ की आवश्यकता नहीं क्योंकि इस का स्वामी रामदासी एक पागल, हठी और अतिक्रोधी व्यक्ति है, जो व्यर्थ ही अभी आकर लड़ने को तैयार हो जायेगा । अल्पशिक्षित होने के नाते, मैं संस्कृत भाषा में लिखित इस ग्रन्थ को पढ़ने में भी असमर्थ हूँ शामा की धारणा थी कि बाबा मेरे और रामदासी के बीच मनमुटाव करवाना चाहते थे । इसलिये यह नाटक रचा है । बाबा का विचार उनके प्रति क्या था, यह उनकी समझ में न आया । बाबा येन केन प्रकारेण विष्णुसहस्त्रनाम उसके कंठ में उतार देना चाहते थे । वे तो अपने एक अल्पशिक्षित अंतरंग भक्त को सांसारिक दुःखों से मुक्त कर देना चाहते थे । ईश्वर-नाम के जप का महत्व तो सभी को विदित हीहै, जो हमें पापों से बचाकर कुवृत्तियों से हमारी रक्षा कर, जन्म तथा मृत्यु के बन्धन से छुड़ा देता है । यह आत्मशुद्घि के लिये एक उत्तम साधन है, जिसमें न किसी सामग्री की आवश्यकता हौ और न किसी नियम के बन्धन की । इससे सुगम और प्रभावकारी साधन अन्य कोई नहीं । बाबा की इच्छ तो शामा से यह साधना कराने की थी, परन्तु शामा ऐसा न चाहते थे, इसीलिये बाबा ने उनपर दबाव डाला । ऐसा बहुधा सुनने में आया है कि बहुत पहले श्री एकनाथ महाराज ने भी अपने एक पड़ोसी ब्राहमण से विष्णुसहस्त्रनाम का जप करने के लिये आग्रह कर उसकी रक्षा की थी । विष्णुसहस्त्रनाम का जप चित्तशुद्घि के लिये एक श्रेष्ठ तथा स्पष्ट मार्ग है । इसलिये बाबा ने शामा को अनुरोधपूर्वक इसके जप में प्रवृत्त किया । रामदासी बाजार से तुरन्त सोनामुखी लेकर लौट आया । अण्णा चिंचणीकर, जो वहीं उपस्थित थे, प्रयः पूरे नारद मुनि ही थे और उन्होंने उक्त घटना का सम्पूर्ण वृत्तांत रामदासी को बता दिया । मदासी क्रोधावेश में आकर शामा की ओर लपका और कहने लगे कि यह तुम्हारा ही कार्य है, जो तुमने बाबा के द्घारा मुझे उदर पीड़ा के बहाने औषधि लेने को भेजा । यदि तुमने पुस्तक न लौटाई तो मैं तुम्हारा सिर तोड़ दूँगा । शामा ने उसे शान्तुपूर्वक समझाया, परन्तु उनक कहना व्यर्थे ही हुआ । तब बाबा प्रेमपूर्वक बोले कि अरे रामदासी, यह क्या बात हैं । क्यों उपद्रव कर रहे हो । क्या शामा अपना बालक नहीं है । तुम उसे व्यर्थ ही क्यों गाली दे रहे हो । मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हारी प्रकृति ही उपद्रवी है । क्या तुम नम्र और मृदुल वाणी नहीं बोल सकते । तुम नित्य प्रति इन पवित्र ग्रन्थों का पाठ किया करते हो और फिर भी तुम्हारा चित्त अशुदृ ही है । जब तुम्हारी इच्छायें ही तुम्हारे वश में नहीं है तो तुम रामदासी कैसे । तुम्हें तो समस्त वस्तुओं से अनासक्त (वैराग्य) होना चाहिये । कैसी विचित्र बात है कि तुम्हें इस पुस्तक पर इतना अधिक मोह है । सच्चे रामदासी को तो ममता त्याग कर समदर्शी होना चाहिये । तुम तो अभी बालक शामा से केवल एक छोटी सी पुस्तक के लिये झगड़ा कर रहे थे । जाओ, अपने आसन पर बैठो । पैसों से पुस्तकें तो अनेक प्राप्त हो सकती है, परन्तु मनुष्य नहीं । उत्तम विचारक बनकर विवेकशील होओ । पुस्तक का मूल्य ही क्या है और उससे शामा को क्या प्रयोजन । मैंने स्वयं उठकर वह पुस्तक उसे दी थी, यह सोचकर कि तुम्हें तो यह पुस्तक पूणर्तः कंठस्थ है । शामा को इसके पठन से कुछ लाभ पहुँचे, इसलिये मैंने उसे दे दी । बाबा के ये शब्द कितने मृदु और मार्मिक तथा अमृततुल्य है । इनका प्रभाव रामदासी पर पड़ा । वह चुप हो गया और फिर शामा से बोला कि मैं इसके बदले में पंचरत्नी गीता की एक प्रति स्वीकार कर लूँगा । तब शामा भी प्रसन्न होकर कहने लगे कि एक ही क्यो, मैं तो तुम्हें उसके बदले में 10 प्रतियाँ देने को तैयार हूँ । इस प्रकार यह विवाद तो शान्त हो गया, परन्तु अब प्रश्न यह आया कि रामदासी नें पंचरत्नी गीता के लिये-एक ऐसी पुस्तक जिसका उसे कभी ध्यान भी न आया था, इतना आग्रह क्यों किया और जो मसजिद में हर दिन धार्मिक ग्रन्थों का पाठ करता हो, वह बाबा के समक्ष ही इतना उत्पात करने पर क्यों उतारु हो गया । हम नहीं जानते कि इस दोष का निराकरण कैसे करें और किसे दोषी ठहरावें । हम तो केवल इतना ही जान सके कि यदि इस प्रणाली काअनुसरण न किया गया होता तो विषय का महत्व और ईश्वर नाम की महिमा तथा शामा को विष्णुसहस्त्रनाम के पठन का शुभ अवसर ही प्राप्त न होता । इससे यही प्रतीत होता है कि बाबा के उपदेश की शैली और उसकी प्रकि्या अद्घितीय है । शामा ने धीरे-धीरे इस ग्रन्थ का इतना अध्ययन कर लिया और उन्हें इस विषय का इतना ज्ञान हो गया कि वह श्री मान् बूटीसाहेब के दामाद प्रोफेसर जी.जी. नारके, एम.ए. (इंजीनियरिंग कालेज, पूना) को भी उसका यथार्थ अर्थ समझाने में पूर्ण सफल हुए ।

गीता रहस्य
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ब्रहृविघा (अध्यात्म) का जो भक्त अध्ययन करते, उन्हें बाबा सदैव प्रोत्साहित करते थे । इसका एक उदाहरण है कि एक समय बापूसाहेब जोग का एक पारसल आया, जिसमें श्री. लोकमान्य तिलक कृत गीता-भाष्य की एक प्रति थी, जिसे काँख में दबाये हुये वे मसजिद में आये । जब वे चरण-वन्दना के लिये झुके तो वह पारसल बाबा के श्री-चरणों पर गिर पड़ा । तब बाबा उनसे पूछने लगे कि इसमें क्या है । श्री. जोग ने तत्काल ही पारसल से वह पुस्तक निकालकर बाबा के कर—कमलों में रख दी । बाबा ने थोड़ी देर उसके कुछ पृष्ठ देखकर जेब से एक रुपया निकाला और उसे पुस्तक पर रखकर जोग को लौटा दिया और कहने लगे कि इसका ध्यानपूर्वक अध्ययन करते रहो, इससे तुम्हारा कल्याण होगा ।


श्रीमान् और श्रीमती खापर्डे
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एक बार श्री. दादासाहेब खापर्डे सहकुटुम्ब शिरडी आये और कुछ मास वहीं ठहरे उनके ठहरने के नित्य कार्यक्रम का वर्णन श्रीसाईलीला पत्रिका के प्रथम भाग में प्रकाशित हुआ है । दादा कोई सामान्य व्यक्ति न थे । वे एक धनाढ्य और अमरावती (बरार) के सुप्रसिदृ वकील तथा केन्द्रीय धारा सभा (दिल्ली) के सदस्य थे । वे विद्घान और प्रवीण वक्ता भी थे । इतने गुणवान् होते हुए भी उन्हें बाबा के समक्ष मुँह खोलने का साहस न होता था । अधिकाँश भक्तगण तो बाबा से हर समय अपनी शंका का समाधान कर लिया करते थे । केवल तीन व्यक्ति खापर्डे, नूलकर और बूटी ही ऐसे थे, जो सदैव मौन धारण किये रहते तथा अति विनम्र और उत्तम प्रकृति के व्यक्ति थे । दादासाहेब, विघारण्य स्वामी द्घारा रचित पंचदशी नामक प्रसिदृ संस्कृत ग्रन्थ, जिसमें अद्घैतवेदान्त का दर्शन है, उसका विवरण दूसरों को तो समझाया करते थे, परन्तु जब वे बाबा के समीप मसजिद में आये तो वे एक शब्द का भी उच्चारण न कर सके । यथार्थे में कोई व्यक्ति, चाहे वह जितना वेदवेदान्तों में पारन्गत क्यों न हो, परन्तु ब्रहृपद को पहुँचे हुए व्यक्ति के समक्ष उसका शुष्क ज्ञान प्रकाश नहीं दे सकता । दादा चार मास तथा उनकी पत्नी सात मास वहाँ ठहरी । वे दोनों अपने शिरडी-प्रवास से अत्यन्त प्रसन्न थे । श्री मती खापर्डे श्रद्घालु तथा पूर्ण भक्त थी, इसलिये उनका साई चरणों में अत्यन्त प्रेम था । प्रतिदिन दोपहर को वे स्वयं नैवेघ लेकर मसजिद को जाती और जब बाबा उसे ग्रहम कर लेते, तभी वे लौटकर आपना भोजन किया करती थी । बाबा उनकी अटल श्रद्घा की झाँकी का दूसरों को भी दर्शन कराना चाहते थे । एक दिन दोपहर को वे साँजा, पूरी, भात, सार, खीर और अन्य भोज्य पदार्थ लेकर मसजिद में आई । और दिनों तो भोजन प्रायः घंटों तक बाबा की प्रतीक्षा में पड़ा रहता था, परन्तु उस दिन वे तुरंत ही उठे और भोजन के स्थान पर आकर आसन ग्रहण कर लिया और थाली पर से कपड़ा हटाकर उन्होंने रुचिपूर्वक भोजन करना आरम्भ कर दिया । तब शामा कहने लगे कि यह पक्षपात क्यों । दूसरो की थालियों पर तो आप दृष्टि तक नहीं डालते, उल्टे उन्हें फेंक देते है, परन्तु आतज इस भोजन को आप बड़ी उत्सुकता और रुचि से खा रहे है । आज इस बाई का भोजन आपको इतना स्वादिष्ट क्यों लगा । यह विषय तो हम लोगों के लिये एक समस्या बन गया है । तब बाबा ने इस प्रकार समझाया । सचमुच ही इस भोजन में एक विचित्रता है । पूर्व जन्म में यह बाई एक व्यापारी की मोटी गाय थी, जो बहुत अधिक दूध देती थी । पशुयोलि त्यागकर इसने एक माली के कुटुम्ब में जन्म लिया । उस जन्म के उपरान्त फिर यह एक क्षत्रिय वंश में उत्पन्न हई और इसका ब्याह एक व्यापारी से हो गया । दीर्घए काल के पश्चात् इनसे भेंट हुई है । इसलिये इनकी थाली में से प्रेमपूर्वक चार ग्रास तो खा लेने दो । ऐसा बतला कर बाबा ने भर पेट भोजन किया और फिर हात मुँह धोकर और तृप्ति की चार-पाँच डकारें लेकर वे अपने आसन पर पुनः आ बिराजे । फिर श्रीमती खापर्डे ने बाबा को नमन किया और उनके पाद-सेवन करने ली । बाबा उनसे वार्तालाप करने लगे और साथ-साथ उनके हाथ भी दबाने लगे । इस प्रकार परस्पर सेवा करते देख शामा मुस्कुराने लगा और बोला कि देखो तो, यह एक अदभुत दृश्य है कि भगवान और भक्त एक दूसरे की सेवा कर रहे है । उनकी सच्ची लगन देखकर बाबा अत्यन्त कोमल तथा मृदु शब्दों मे अपने श्रीमुख से कहने लगे कि अब सदैव राजाराम, राजाराम का जप किया करो और यदि तुमने इसका अभ्यास क्रमबदृ किया तो तुम्हे अपने जीवन के ध्येय की प्राप्ति अवश्य हो जायेगी । तुम्हें पूर्ण शान्ति प्राप्त होकर अत्यधिक लाभ होगा । आध्यात्मिक विषयों से अपरिचित व्यक्तियों के लिये यह घटना साधारण-सी प्रतीत होगी, परन्तु शास्त्रीय भाषा में यह शक्तिपात के नाम से विदित है, अर्थात् गुरु द्घारा शिष्य में शक्तिसंचार करना । कितने शक्तिशाली और प्रभावकारी बाबा के वे शब्द थे, जो एक क्षण में ही हृदय-कमल में प्रवेश कर गये और वहाँ अंकुरित हो उठे । यह घटना गुरु-शिष्य सम्बन्ध के आदर्श की घोतक है । गुरु-शिष्य दोनों एक दूसरे को अभिन्न् जानकर प्रेम और सेवा करनी चाहिये, क्योंकि उन दोनों में कोई भेद नहीं है । वे दोनों अभिन्न और एक ही है, जो कभी पृथक् नहीं हो सकते । शिष्य गुरुदेव के चरणों पर मस्तक रख रहा है, यह तो केवल बाहृ दृश्यमान है । आन्तरिक दृष्टि से दोनों अभिन्न और एक ही है तथा जो उनमें भेद समझता है, वह अभी अपरिपक्क और अपूर्ण ही है ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 28 October 2020

श्री साईं लीलाएं - संकटमोचक साईं बाबा

ॐ सांई राम



कल हमने पढ़ा था.. डॉक्टर द्वारा साईं बाबा की पूजा       


श्री साईं लीलाएं - संकटमोचक साईं बाबा

एक दिन संध्या के समय अचानक तूफान आयाआसमान काले बादलों से घिर गयाबिजली बड़े जोर-शोर से कड़क रही थीवायु भी पूरी प्रचंडता के साथ बह रही थी और तभी मूसलाधार बारिश भी शुरू हो गयीचारों तरफ पानी-ही-पानी हो गयाफसलें भीग गयींसुखी घास बह गयीपालतू जानवर इधर-उधर भागने लगेगांव वाले भी भयाक्रांत हो उठेसब लोग मस्जिद में इकट्ठे हो गये और उन्होंने बचाव के लिए बाबा से प्रार्थना की|साईं बाबा के दिल में लोगों के प्रति दया आ गईबाबा उठकर मस्जिद के बाहर आकर आसमान की ओर देखते हुए जोर-जोर से गरजने लगेबाबा की आवाज चारों तरफ गूंज उठीमस्जिद और मंदिर कांप उठे तथा लोगों ने कानों में अंगुलियां डाल लींवहां उपस्थित सभ ग्रामवासी बाबा का यह अनोखा स्वरूप देखते ही रह गये|

बस थोड़ी ही देर में वर्षा का जोर धीमा हो गयाहवा की गति भी थम-सी गयीबादलों का कड़कना रुक गया और वे छंट गये तथा आसमान में तारों के साथ चाँद चमकने लगापशु-पक्षी अपने-अपने घरौंदों की ओर वापस लौटने लगेसब लोग भी प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घर रवाना हुए|बाबा अपने भक्तों से एक माँ की तरह प्यार करते थेभक्त की पुकार सुनते ही बाबा न दौड़ हों - ऐसा कभी हुआ ही नहीं|इसी तरह एक बार दोपहर के समय मस्जिद में प्रज्जवलित रहने वाली धुनी एकाएक भड़क उठीउसकी लपटें इतनी बढ़ गयीं कि वे ऊपरी छत तक पहुंचने लगींलपटों की भयानकता को देखते हुए वहां उपस्थित भक्तों को ऐसा लगामानो यह आग मस्जिद को जलाकर राख कर देगीसब फिक्रमंद थे कि क्या करना चाहिए पानी डालकर अग्नि को शांत कर देना चाहिएपानी डालें तो डाले भी कैसे बाबा से पूछने की हिम्मत किसी में भी न हुईबाबा तो अंतर्यामी थेबड़ी खामोशी से सब देख रहे थेफिर कुछ देर बाद भक्तों की बढ़ती हुई बेचैनी को देखते बाबा ने हाथ में अपना सटका उठाया और धूनी के पास वाले खम्बे पर जोरदार प्रहार करते हुए बोले - "शांत हो जाओनीचे उतरो|" हर प्रहार के साथ अग्नि की लपटें धीमी होती चली गयीं और कुछ देर बाद वे सामान्य दिनों की तरह जलने लगीं तथा इस तरह लोगों के मन का डर भी मिट गया|

कल चर्चा करेंगे..काका आप कल जायें  

ॐ सांई राम
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Tuesday, 27 October 2020

श्री साईं लीलाएं - डॉक्टर द्वारा साईं बाबा की पूजा

ॐ सांई राम


कल हमने पढ़ा था.. बाबा का विचित्र शयन


श्री साईं लीलाएं - डॉक्टर द्वारा साईं बाबा की पूजा

तात्या साहब नूलकर अपने डॉक्टर मित्र के साथ साईं बाबा के दर्शन करने के लिए शिरडी आये थे| मस्जिद में पहुंचकर उन्होंने बाबा के दर्शन कर उन्हें प्रणाम किया और कुछ देर तक वहीं पर बैठे रहे| कुछ देर बाद बाबा ने उन्हें दादा भट्ट केलकर के पास भेज दिया| तब वह केलकर के घर गये| केलकर ने उनका उत्तम ढंग से स्वागत किया और उनके रहने की भी व्यवस्था की|

कुछ देर बाद जब केलकर बाबा का पूजन करने के लिए चलने लगे तो डॉक्टर भी उनके साथ हो लिये| मस्जिद पहुंचकर पहले केलकर ने बाबा का पूजन किया, फिर डॉक्टर ने बाबा का पूजन किया और पूजन करते हुए पूजा की थाली में से चंदन लेकर बाबा के मस्तक पर त्रिपुंड आकार का तिलक लगा दिया| पर, बाबा ने कुछ भी नहीं कहा| बाबा ने बड़े शांत भाव से तिलक लगवा लिया| वहां उपस्थित भक्तों के मन कांप उठे, कि अब बाबा गुस्से में आयेंगे| क्योंकि बाबा किसी को गंध (चंदन आदि) लगाने नहीं देते थे| यदि किसी को लगाना होता तो वह बाबा के चरणों में लगाता था| केवल म्हालसापति ही बाबा के गले पर चंदन लगाते थे| मस्तक पर तिलक लगाने का साहस आज तक किसी ने नहीं किया था| डॉक्टर इस बात को नहीं जानते थे| पर, सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि जब डॉक्टर ने बाबा के मस्तक पर त्रिपुंड आकार का तिलक लगाया तो बाबा कुछ भी नहीं बोले और न बाबा को गुस्सा ही आया, न बाबा ने मना ही किया|

उस समय तो केलकर जी चुप रहे, लेकिन जब शाम को बाबा के दर्शनार्थ मस्जिद आये तो उन्होंने बाबा से इसका कारण पूछा, तो बाबा बोले कि - "डॉक्टर पंडित ने मुझे जो तिलक लगाया था, वह मुझे श्री साईं बाबा समझकर नहीं लगाया, बल्कि अपने गुरु रघुनाथ महाराज घोपेश्वर कर (जो काका पुराणिक के नाम से प्रसिद्ध है) समझकर लगाया था| उस समय उन्हें मुझमें अपने गुरु के दर्शन हो रहे थे, जिन्हें वे चंदन का तिलक लगाया करते थे| उस समय उन्होंने मुझे अपने गुरु के रूप में तिलक लगाया था| उस समय उनके मन में वही श्रद्धा और प्रेमभाव था जो अपने गुरु के लिए था| उनके उस श्रद्धा और प्रेमभाव के आगे में विवश था| तब मैं भला उनको तिलक करने से कैसे रोक सकता था|"साईं बाबा अपने भक्तों की इच्छा या भावना के अनुसार ही पूजा करवाते थे| या फिर किसी को स्पष्ट मना भी कर देते थे| तब किसी में इतना साहस नहीं होता था कि वह बाबा से इसका कारण पूछ सके| क्योंकि बाबा अपने भक्त की भावना को पहले ही जान जाते थे|

कल चर्चा करेंगे..संकटमोचक साईं बाबा

ॐ सांई राम

ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं

बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Monday, 26 October 2020

श्री साईं लीलाएं- बाबा का विचित्र शयन

ॐ सांई राम


कल हमने पढ़ा था.. मेरा पेड़ा मुझे दो

श्री साईं लीलाएं- बाबा का विचित्र शयन

साईं बाबा पूर्ण सिद्ध थे| उन्हें दुनियादारी से कोई सरोकार न था| बाबा अपनी समाधि में सदैव लीन रहते थे| सब प्राणियों से समान भाव से प्यार करते थे| बाबा का रहन-सहन भी बड़ा विचित्र था| बाबा सदैव फकीर के वेष में रहा करते थे| उनके सोने का ढंग भी बड़ा ही विचित्र था| बाबा मस्जिद में ही रहा करते थे और वहीं पर सोते भी थे| बाबा के सोने की जगह पर, ऊपर एक लकड़ी की तख्ती टंगी हुई थी| वह आठ फट के लगभग लम्बी और हथेली जितनी चौड़ी थी| जो फटी-पुरानी कपड़ों की चिन्दियों के सहारे झूले की तरह टंगी हुई थी| चिंदिया हालांकि पतलों और कमजोर थीं| उनके द्वारा तख्ती को झूले की तरह लटकाकर उस पर बाबा का सोना लोगों के लिए बड़े ही आश्चर्य का विषय था| वे सोचते थे कि जब बाबा इस पर सोते होंगे तो यह बाबा का वजन कैसे उठा पाती होगी| पर, लोग बाबा की लीला से शायद परिचित नहीं थे|

जब साईं बाबा सोते थे तो वह दृश्य बड़ा ही लुभावना होता था| बाबा के सिर और पैरों की तरफ मिट्टी के दीये जलते रहते थे| देखने वाले यह नहीं जान पाते थे कि बाबा कब इस तख्ती पर चढ़ते और उतरते हैं ? साईं की लीला तो बस साईं ही जानें| जब बाबा के शयन को देखने के लिए लोगों की भीड़ लगने लगी तो एक दिन बाबा ने उस तख्ती को तोड़कर फेंक दिया और फिर सदैव टाट के टुकड़े पर ही शयन करने लगे| बाबा को आठों सिद्धियां और नवनिधियां हासिल थीं, पर बाबा ने अपने जीवन में कभी किसी चमत्कार का प्रदर्शन नहीं किया|

कल चर्चा करेंगे..डॉक्टर द्वारा साईं बाबा की पूजा

ॐ सांई राम
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Sunday, 25 October 2020

श्री साईं लीलाएं - मेरा पेड़ा मुझे दो

ॐ सांई राम


कल हमने पढ़ा था.. प्यार की रोटी से मन तृप्त हुआ


श्री साईं लीलाएं - मेरा पेड़ा मुझे दो

यह घटना दिसम्बर, 1915 की है| गोविन्द बालाराम मानकर जो बांद्रा में रहते थे| साईं बाबा की भक्ति के दीवाने थे| अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् मानकर ने उनकी अंत्येष्टि क्रिया शिरडी में करने का अपने मन में विचार किया| शिरडी जाने से पूर्व जब श्रीमती तर्खड से मिलने गये तो श्रीमती तर्खड के मन में विचार आया कि बाबा के लिए कुछ और भेंट भेजनी चाहिए| लेकिन क्या दें ? घर में ढूंढने पर उस समय केवल एक मावे का पेड़ा प्रसाद के रूप में बचा हुआ था| उन्होंने वह पेड़ा मानकर को देते हुए कहा कि आप यह पेड़ा बाबा को मेरी तरफ से भेंट दे देना| उन्हें पूर्ण विश्वास था कि बाबा पेड़ा अवश्य स्वीकार कर लेंगे| क्योंकि वह बाबा की भक्ति पूरी निष्ठा से करती थीं|

शिरडी पहुंचकर मानकर जब बाबा के दर्शनों के लिए मस्जिद गया, तो पेड़ा ले जाना भूल गया| लेकिन बाबा ने उसे कुछ नहीं कहा| मानकर जब पुन: शाम को बाबा के दर्शन करने के लिए गया, तो बाबा ने उससे पूछा - "तुम मेरे लिए कुछ लाए हो क्या ?" तब मानकर ने कहा, मैं तो कुछ भी नहीं लाया| जब बाबा ने दुबारा पूछा, तब भी मानकर ने वही उत्तर दिया|

इस बार बाबा ने उससे पूछा कि क्या माँ (श्रीमती तर्खड) में तुम्हें मेरे लिए मिठाई नहीं दी थी ? यह सुनते ही मानकर को श्रीमती तर्खड द्वारा बाबा के लिए दिया गया पेड़ा स्मरण हो आया| वह बाबा से क्षमा मांगकर, दौड़ते हुए अपने ठहरने वाली जगह पर गया और वहां से पेड़ा लाकर बाबा को अर्पण कर दिया| बाबा ने भी वह पेड़ा तुरंत खा लिया|

कल चर्चा करेंगे..बाबा का विचित्र शयन

ॐ सांई राम
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं।

ॐ सांई राम

आप सभी को श्री राम नवमी के शुभ अवसर पर हार्दिक शुभ कामनायें



या देवी सर्वभू‍तेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। 
न्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे। वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग-शून्य हो जाता है। माँ भगवती का परम सान्निध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। इस परम पद को पाने के बाद उसे अन्य किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती। माँ के चरणों का यह सान्निध्य प्राप्त करने के लिए भक्त को निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उनकी उपासना करने का नियम कहा गया है। ऐसा माना गया है कि माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है। विश्वास किया जाता है कि इनकी आराधना से भक्त को अणिमा , लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है कि यदि कोई इतना कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर माँ की कृपा का पात्र बन सकता ही है। माँ की आराधना के लिए इस श्लोक का प्रयोग होता है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करने का नियम है।

Kindly Provide Food & clean drinking Water to Birds & Other Animals,
This is also a kind of SEWA.

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For donation of Fund/ Food/ Clothes (New/ Used), for needy people specially leprosy patients' society and for the marriage of orphan girls, as they are totally depended on us.

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A/c - Title -Shirdi Ke Sai Baba Group

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Gautam Budh Nagar, Uttar Pradesh. INDIA.