शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 6 June 2020

श्री साँई जी की जीवन गाथा​

ॐ श्री साँई राम जी


श्री साँई जी की जीवन गाथा

प्रथमेः वन्दन "गणपति",  दूजे "शारदा" माये |
मैं हूँ मूर्ख कलकामी, ज्ञान ना मुझमें समाये |1|

साँई जी की जीवन-गाथा, बाबा जी स्वयं लिखाये |
अथाह समुद्र साँई-गाथा, मोती कैसे हम चुन पाये |2|

चाहु आज्ञा बाबा जी से, साँई चरणन शीश नवाये |
सहाई रह कर अंग संग, मार्ग दर्शन बतलाये |3|

चाहना थी जब बाबा की, स्वंय स्वपन में आये |
इच्छा साँई की खातिर, जीवन गाथा लिख पाये |4|
बाल अवस्था उम्र सोलह, प्रगटे शिर्डी आये |
रूप फकीरी ढाल के, ढंग अनोखे अपनाये |5|

रत्न दिया एक श्रध्दा का, दूजा सबूरी बतलाये |
गर पाना हो साँई को, यही सही मार्ग अपनाये |6|

अजब निराला रंग रूप, सबके मन को भाये |
कुछ समय फिर दूर रहें, अज्ञातवास मनायें |7|

अज्ञातवास रहे कोपरगाँव, तपोभूमि कहलाये |
वन में बाबा घूम रहे, व्यक्ति उदास वह पाये |8|

चाँदपाटिल की घोड़ी खोयी, चाँद शोक मनाये |
बाबा जी की कृपा से, घोड़ी चाँद फिर पाये |9|
चिमटा मार के धरती पर, फकीरा अग्नि प्रघटाये |
उस अग्नि से चिलम जला, सत्य मार्ग बतलाये |10|

पाटिल की बारात संग, शिर्डी लौट कर आये |
चाँद को निशानी में, तोता अपना थमाये |11|

बाबा जी से पाटिल फिर, एक प्रश्न पूछते जाये |
हिन्दू है या मुसलमान, कृपा कर मुझे बताये |12|

यहाँ अली दिखे दिवाली में, राम रमजान मे आये |
हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई, बाबा को सब भाये |13|

खण्डोबा में म्हालसापति, आओ साँई बुलाये |
गुरुस्थान पेड़ नीम तले, बाबा जी रहे बताये |14|

जिसके नीचे प्रतिदिन बाबा, रहे बैठे ध्यान लगाये |
ध्यान मग्न देख शिर्डीवासी, अचरज में पड़ जाये |15|

म्हालसापति से कहे बाबा, गर गुरू की आज्ञा पाये |
पेड़ तले दिये चार जले, फकीरा सबसे कहता जाये |16|

नाम करू स्वीकार गर, नीम तले दीप जलते पाये |
गड्डा खुदा नीम पेड़ तले, जहाँ बाबा रहे बताये |17|

देख के जलते दिये चार, दाँतो तले उंगली दबाये |
तब से बाबा शिर्डी के,  श्री साँईं नाम कहाये |18|

मास्टर था इक शिर्डी मे, बच्चों को रोज पढ़ाये |
बाबा जी का भक्त था शामा, बाबा के मन भाये |19|

साँप ने काटा शामा को, पीड़ा बहुत सताये |
बाबा के मुख के वचन, विष पीड़ा हर जाये |20|

सबका मालिक एक है, यही मंत्र बतलाये |
खण्डर मस्जिद में बाबा, अध्भुत धूनी जलायें |21|

बाबा कृपा से अब मस्जिद, द्वारिकामाई कहलायें |
धूनी की उदी से सारे, कष्ट-पीड़ा मिट जाये |22|

उदी की महिमा बड़ी, रोगी के कष्ट मिटाये |
कैंसर दमा या कुष्ठ रोग, प्रसव पीड़ा भी हर जाये |23|

मात-पिता ज्ञात नहीं, बायजा माँ कहाये |
मित्र सखा कोई नहीं, तात्या भाई बताये |24|
बायजा माँ भी साँई की, सेवा करती जाये |
डाल टोकरी रोटी भाजी, जंगल ढूँढन जाये |25|

ध्यानमग्न बाबा जी के, चरणों में हाथ लगाये |
बाबा जी को नित्य वो, भोजन भी करवाये |26|

कुछ वर्षो के बाद बाबा, मस्जिद निवास बनाये |
जंगल ढूँढन कष्ट से, बायजा छूटकारा पाये |27|

कौड़ियों की सेवा करें, उनके कष्ट भगाये |
उनके दुखो को बाबा, स्वयं ही हरते जाये |28|

जात-पात और ऊँच-नीच, बाबा ना फर्क बताये |
पशु-पक्षी संग बैठ कर, बाबा जी भोजन खाये |29|

कोतवाल था गणपतराव, चाँदोलकर माँगे राये |
बाबा जी के नाम से, खतरे में हकुमत आये |30|

नर्तकी ले कर कोतवाल, साँई को परखन जाये |
बाबा लीला देख कर, अचरज में पड़ जाये |31|

एक चरण गंगा बहे, दुजे यमुना बहाये |
बाबा की आशीष पा, दास गणु कहलाये |32|

दास गणु को देख कर, चाँदोलकर गुस्साये |
साँई लीला जान कर, चरणन में शीष झुकाये |33|

मस्जिद में चाँदोलकर, साँई से अर्ज लगाये |
मैना बे-औलाद है, पुत्र रत्न वह पाये |34|

बेटी के प्रति पिता का, साँई मर्म जताये |
बाबा जी आशीष दे, जल्द पुत्र संग आये |35|

उसकी पीड़ा हरने को, बापूगीर भिजवाये |
रेल तक तो ठीक था, अब आगे कैसे जाये |36|

सफर सुगम करने को, बाबा जी रूप बनाये |
उदी पहुँचाने की खातिर, साँई तांगा लेकर जाये |37|

पुत्र रत्न प्राप्ति हुई, मैना खुशी मनाये |
चाँदोलकर भी बाबा के, भक्तों में जुड़ जाये |38|

एक बार की बात है, हैजा आतंक मचाये |
आस-पास के गाँव में, पांव पसारे जाये |39|

शिर्डीवासी बाबा जी से, रहम माँगने आये |
गेँहू पीसते देख कर, अचरज में पड़ जाये |40|

महिलाये मिल कर चार, आटे पर हक जमाये |
उनकी हरकत देखकर, बाबा जी क्रौध में आये |41|

चक्की पर गेँहू पीसें, अर्थ साँई समझाये |
उपरी भाग भक्ति का, निचला कर्म बताये |42|

चक्की की मुठिया को, बाबा ज्ञान बताये |
भवसागर रूपी चक्की से, बाबा हमें बचाये |43|

शिर्डीवासी आदेश से, आटा सीमा पर बिखराये |
लक्ष्मण रेखा रूपी आटा, हैजा दूर भगाये |44|

बायजा माँ रोगी हुई, स्वर्ग सिधारे जाये |
तात्या साँई से कहे, माँ कुछ कह नही पाये |45|

माँ के प्राणो की भिक्षा, तात्या माँगत जाये |
साँई बाबा तर्क करे, नीति के विरुध्द बताये |46|

लौटा दूँगा प्राण मैं, गर तू मुझको बतलाये |
दूनिया में कोई अमर है, घर एक मुझे बताये |47|

बाबा बैठे चिंता में, चिंता भक्तों की सताये |
चाँद पाटिल का तोता भी, वापिस लौट के आये |48|

बाबा को फिर स्मरण हुआ, चाँद की याद सताये |
बायजा माँ भी बिछड़ गई, अपने पास बुलाये |49|

साँई भक्तों से कहे, थोड़ा आराम वो पाये |
काम जरूरी है बहुत, वही करने को जाये |50|

महाल्सा से बाबा कहे, गर साँई लौट ना पाये |
यही था यही रहूँगा, मास्टर श्यामा से लिखवाये |51|

कुछ पल की लम्बी निद्रा, समाधी रूप धर जाये |
बहत्तर घंटे बीत गये, साँई भक्तन घबराये |52|

तब निद्रा से जागे साँई, सारा हाल सुनाये |
तांगे से उदी पहुँचा, "बायजा" "पाटिल" से मिल आये |53|

बच्चा एक लोहारन का, अग्नि में गिर जाये |
हाथ डाल कर धूनी में, बाबा जी उसे बचाये |54|

हाथ जला जब बाबा का, पीड़ा ना मुख पर आये |
भक्त थे फिर भागो जी, बाबा की सेवा पाये |55|

बालक था एक खापर्ड़े, रहा प्लेग उसे सताये |
गिल्टियाँ पड़ गई प्लेग की, छूने से ज्ञात हो जाये |56|

बादल बहु आकाश में, बाबा जी यह समझाये |
बादल छटते ही गगन, पुन: स्वच्छ हो जाये |57|

कहते हुए बाबा कमर तक, कफनी रहे उठाये |
गिल्टियाँ चार दिखा कर बोले, कष्ट साँई सह जाये |58|

अपने भक्तो की खातिर, साँई कष्ट रहे अपनाये |
भक्तो के कष्ट मेरे है, साँई जी कहते जाये |59|

भूखे पेट ना रह सके, जिसमें प्राण समायें |
भोजन ना हो पेट में, तो ध्यान वही रह जाये |60|

बाबा जी व्रत और उपवास, दोनो ही व्यर्थ बताये |
खाली पेट भोजन बिना, भजन भी रस ना पाये |61|

सीमित भोज परोसिये, कि भोजन व्यर्थ ना जाये |
आप भी भूखे ना रहे, अतिथी भी भोजन पाये |62|
कर्म हो पिछले जन्म के, या इस जन्म कमायें |
लेखा झोखा कर्मों का, हर प्राणी पूर्ण निभाये |63|

कष्ट लिखे जो भाग्य में, उसको सहता जाये |
प्राणी वो ही सफल है, जो पूर्ण जीवन बिताये |64|

अपना जीवन अपने हाथो, कभी ना स्वयं गवायें |
आत्महत्या महापाप है, साँई जी ये बतलाये |65|

कष्टों से हो के परेशान, गर जीवन तू गवाँये |
वही कष्ट फिर पुनर्जन्म, तेरे पीछे पीछे आये |66|

बाबा जी का नित्य ही, मन में स्मरण लाये |
इस मामूली परिश्रम से, आनन्दी फल पाये |67|

सात समुद्र पार के भी, भक्तों को खींचे जाये |
पाँव बंधे चिड़िया के जैसे, और खींची चली आये |68|

अम्मीर शक्कर बान्द्रा निवासी, बाबा की शरण में आये |
कष्ट था उनका असहनीय, गठिया का रोग सताये |69|

नौ माह बाबा आज्ञा से, चावड़ी में ही बस जाये |
मौका पा एक रात अम्मीर, सब छोड़ के भाग जाये |70|

कोपरगाँव की धर्मशाला में, रहे एक रात बिताये |
एक फकीर प्यासा बहुत, पानी रहे उसे पिलाये |71|

पानी पीते उस फकीर के, प्राण-पखेरू उड़ जाये |
भय का मारा अम्मीर शक्कर, लौट के शिर्डी आये |72|

गया था बाबा से बिन पुछे, अब बैठा पछताये |
फिर बाबा की कृपा पा, रोग से मुक्ति पाये |73|

बाबा जी भी चमत्कार, अजब अनोखे दिखाये |
दिये जलाये पानी से, कभी चिलम से दमा भगाये |74|

हो शिर्डी को जाना, या वापिस लौट के आये |
लौटे जब कभी शिर्डी से, साँई से आज्ञा पाये |75|

शिर्डी की पावन भूमी, कण-कण में साँई समाये |
बाबा की आज्ञा बिना, पत्ता भी हिल ना पाये |76|

बिन आज्ञा जो शिर्डी से, वापिस लौट के आये |
अवहेलना साँई आज्ञा की, दुष्परिणाम बन जाये |77|

बाबा की महिमा बड़ी, हर दिल में बस जाये |
बुलावे कभी भक्तो को, पहुँच स्वंय कभी जाये |78|

शामा जी काशी-प्रयाग, और गया को जाये |
तस्वीर रूप में बाबा को, पहले ही वहाँ पाये |79|

हो सफर कैसा भी, साँई जी सफल बनाये |
बाबा जी की भक्ति से, मंजिल अपनी पा जाये |80|

बाबा जी को पेड़ पौधे, हरियाली बहुत सुहाये |
अपने हाथों बीज-सींच कर, लेंडी बाग बनाये |81|

एक बार लेंडी बाग में, झुंड बकरों का आये |
दो बकरे उस झुंड मे, बाबा के मन को भाये |82|

प्रेम-पूर्वक हाथ फेर, शरीर उनका सहलाये |
अपने संग ले जाने को, रुपये बत्तीस चुकाये |83|

चंद लोग बाबा को देख, कौसने में लग जायें |
दो बकरों की कीमत तो, रुपये आठ ही आये |84|

साँई कहे ना कोई स्त्री, ना ही घर हम बनाये |
मेरा तो कोई नहीं, पैसे जोड़े फिर क्युँ जाये |85|

दाम चुका चार सेर दाल, बाजार से बाबा मँगायें |
खिला-पिला कर बकरो को, मालिक को रहे लौटाये |86|

देख अनोखा ये बर्ताव, बाबा से पूछे जाये |
ममता भरा प्रेम बकरों से, बाबा हमे बताये |87|

भाई थे ये पूर्व जन्म, इक-दूजे की जान लिवाये |
दूष्कर्मो के कारण ही, पुर्नजन्म बकरों का पाये |88|

त्रिलोकी स्वामी साँई, शिव सम रूप बनाये |
सटका थामें एक हाथ, टमरेल दूजे मे पाये |89|

चोला फकीरी टमरेल हाथ ले, भिक्षा माँगन जाये |
अल्लाह मालिक राम राम, सबको कहते जाये |89|

पाँच घरों से भिक्षा माँगें, लौट के मस्जिद आये |
अपने हाथों पका के भोजन, निर्धन को खिलाये |90|

कुछ घरों से भिक्षा पाये, कुछ से गाली खायें |
रूप फकीरी धारे बाबा, कुछ ने पत्थर बरसाये |91|

मैं मूर्ख हूँ कह चुका, साँई गाथा कैसे गाये |
साँई बाबा की लीला, कोई भी समझ ना पाये |92|

जो कुछ भी साँई बाबा, भिक्षा के रूप में लाये |
किसी को दस पन्द्रह या बीस, साँई जी बाँटते जाये |93|

बाबा की महिमा देखो, सब पर कृपा बरसाये |
बाबा की आशीष पा, भक्त बहुत हर्षाये |94|
बाबा जी को व्यक्ति वो, ना फूटी आँख सुहाये |
जो मदिरा सेवन करे, या उसका पान कराये |95|

प्रति तीजे दिन साँई जी, मस्जिद से दूरी पर जाये |
आँतें उदर से बाहर कर, धौने में लग जाये |96|

आँतों को कर साफ फिर, बरगद पर रहे सुखाये |
इस क्रिया के साक्षी कई, शिर्डी मे आज भी पाये |97|

एक रोज एक महाशय, जब द्वारिकामाई आये |
बाबा जी के अंगो को, पृथक पृथक वह पाये |98|

साँई का हो गया कत्ल, सोचा ये शोर मचाये |
पर सूचना देने वाला ही, पहले पकड़ा जाये |99|

ये सोच कर महाशय जी, बस चुप्पी साधे जाये |
अगले दिन मस्जिद गये, बाबा को स्वस्थ वह पाये |100|

बाबा को भक्तों के संग, देख के वह चकराये |
जो देखा आँखो से कल, कहीं स्वपन तो नही आये |101|

शिर्डी की सुन्दर गलियों में, बच्चों संग खेल रचाये |
खेले गोटी, आँख मिचोली, कुश्ती मन को भाये |102|

महाल्सा, तात्या संग बाबा, मस्जिद मे रात बिताये |
सिर पूर्व, पश्चिम और उत्तर, पैर से पैर मिलाये |103|

प्रेमपूर्वक चर्चा कर के, बातें करते जाये |
सो जाये गर एक भी, तो दूजा उसे जगाये |104|

चार हाथ लम्बा हथेली चौड़ा, डेंगले तख्ता लाये |
बाबा जी स्वीकार करे, निंद्रासन उसे बनाये |105|

उल्टे बाबा चिन्दियों संग, बाँस का झूला बनाये |
बाबा झूलत तख्ते पर, सुख निद्रा का पाये |106|

चिन्दियाँ थी कमजोर बहुत, तख्ते का भार ना पाये |
कैसे बाबा भार संग, तख्ता भी झूला जाये |107|

शिर्डीवासी दंग थे, रहस्य ऐसा दिखाये |
बाबा की लीला को देखन, भीड़ उमड़ी जाये |108|

लोगो की इस हरकत से, बाबा सकते में आये |
तख्त तोड़ फेंका बाहर, भूमी पर शयन बिछाये |109|

एक रात मस्जिद रहे, दूजी चावड़ी बिताये |
पर पीड़ा हरने की खातिर, बाबा धूनी रमाये |110|
राधा कृष्णा माई जी, बाबा की भक्त कहाये |
अपने हाथों सवाँर कर,  द्वारिकामाई सजाये |111|


बाबा जी को नित्य वो, भोजन भी करवाये |

प्रथम भोज बाबा जी को, फिर वो भोजन पाये |112|

ब्रह्मचर्य जीवन बाबा का, शाँत चित्त वह पाये |
पुरूषो को भ्राता कहे, स्त्री को माता बताये |113|

ब्रह्म ज्ञान की चाह में, सेठ मस्जिद में आये |
बाबा से विनती करे, ब्रह्म ज्ञान वह पाये |114|

बाबा जी पूछे प्रश्न, सेठ जी मुझे बतलाये |
जेब भरी थी पैसो से, फिर क्यों तुम झुठलाये |115|
बालक एक तुम्हारी जब, शरण मदद कल आये |
कुछ पैसो की खातिर, था रहा वो हाथ फैलाये |116|

इंकार किया मदद से तुमने, खाली जेब बतलाये |
ब्रह्म ज्ञान कैसे मिले, वश इंद्री कर ना पाये |117|

पाना हो गर ब्रह्म ज्ञान, पाँचो इंद्रियाँ वश लाये |
प्राणो संग बुध्दि और मन, अहंकार भी मिटाये |118|

भक्तो में मन चाह थी, चावड़ी उत्सव मनाये |
दिसम्बर दस उन्नीस सौ नौ, शुभ घड़ी वह आये |119|

एक तरफ तुलसी वृंदावन, रथ दूजी और सजाये |
बाबा जी के भक्तगण, रस भजनों का बरसाये |120|

मृदंग मंजीरों और ढोल संग, ताल से ताल मिलाये |
मस्जिद का पावन आँगन, जयकारो संग गूँजा जाये |121|

बाबा विराजित गादी पर, बगल में सटका दबाये |
चल दिये बाबा टोली संग, काँधे झोली लटकाये |122|



एक सुनहरी जरी दुशाला, तात्या बाबा को ओढ़ाये |

लकड़िया डाल के धूनी में, दीपक बाये हाथ बुझाये |123|

चल दिये बाबा चावड़ी को, भक्तन बहु हर्षाये |
ऐसा हो प्रतीत अब, दीपावली उत्सव मनाये |124|

बाबा जी की लीला का, अंत ना कोई पाये |
बच्चे पहुचे मस्जिद में, दीपावली मनाये |125|

बाबा भी हर्षित हुए, बच्चों संग मिल जाये |
दीपावली मनाने को, दीपक तेल मंगवाये |126|

बनियों ने दुत्तकार दिया, बाबा तेल ना पाये |
दीपावाली की शाम को, साँई पानी से दीप जलाये |127|

बाबा के इक भक्त थे, नाम मेघा कहाये |
बाबा के स्नान के लिये, उन्नीस कोस वो जाये |128|

घाघर सिर पे धर के, गोदावरी जल लाये |
अपने हाथों से मेघा, बाबा को स्नान कराये |129|

बाबा का आदेश था मेघा, केवल शीश भिगाये |
पलटी जब घाघर सिर पर, शरीर ना भीगने पाये |130|

साँई की सेवा पा कर, मेघा खुशी मनाये |
ले आज्ञा साँई से फिर, माथे पर तिलक लगाये |131|

क्रिया थी ये प्रतिदिन की, बस मेघा हक पाये |
बाबा जी के मुख से स्वंय, मेघा जी भक्त कहाये |132|

मेघा जी थे परम भक्त, बाबा के मन बस जाये |
त्याग शरीर मेघा गये, बाबा भी नीर बहाये |133|

मेघा था मेरा सच्चा भक्त, बाबा जी स्वंय बताये |
खर्चे अपने से बाबा, मृत्यु-भोज ब्राह्मण करवाये |134|
जो लिखा हो भाग्य में, वह तो स्वंय मिल जाये |
जो किस्मत मे नहीं लिखा, साँई जी वह दिलवाये |135|

एक बगीचा बाबा जी, मस्जिद के बगल बनाये |
अपने हाथों सींच कर, अति सुन्दर फूल लगाये |136|

बाबा जी के एक भक्त थे, बूटी सरकार कहाये |
श्री कृष्ण मन्दिर बने, उनको विचार ये आये |137|

यह सुन कर बाबा जी, सोचने कुछ लग जाये |
बाबा जी इस मुद्रा में, रहे मंद-मंद मुस्काये |138|

आने वाले कल की चिंता, बूटी क्युँ तुम्हे सताये |
कुछ तो अगले पल पे छोड़, समय ही तुझे बताये |139|

कौन विराजे इस मन्दिर में, स्वंय ज्ञात हो जाये |
मन्दिर कृष्ण का बने यहाँ, सब दर्शन करने आये |140|

मन्दिर निर्माण के मध्य में, साँई महासमाधी लगाये |
आज उसी मन्दिर में साँई, बैठे आसन स्वंय लगाये |141|

भक्तों की विपदा हरे, कष्टों को दूर भगाये |
वह पावन स्थान अब, समाधी मन्दिर कहलाये |142|

अक्टूबर की पन्द्रह तिथि, उन्नीस सौ अठराह आये |
मंगलवार की थी दोपहरी, समय ढाई बज जाये |143|

शिर्डीवासी सब मग्न थे, मिलकर त्यौहार मनाये |
बुध्द पूर्णिमा मोहर्रम, और विजयादशमी भी आये |144|

विजयादशमी के दिन सभी, उत्सव में डूबे जाये |
बाबा जी के पास लक्ष्मीबाई, बैठी भोजन लगाये |145|

एक निवाला ही बाबा की, शाँत भूख कर जाये |
आदेश दिया फिर गणु को, बाकी भक्तो मे बँट जाये |146|

बाबा जी के शरीर मे, एक कँपन सा उठ जाये |
देख दृश्य यह लक्ष्मी बाई, आँखो से नीर बहाये |147|

लक्ष्मी को चिंतित देख कर, साँई जी पास बुलाये |
साँई की हालत देख कर, आँखें तेरी क्युँ भर आये |148|

आया ही कब था मैं पगली, दूर जो तुम से जाये |
बाबा को भिक्षा देने वाली, आज साँई से भिक्षा पाये |149|

कफनी मे हाथ डाल कर, नौ सिक्के रहे थमाये |
"श्रवण" "कीर्तन" "नाम स्मरण", "सेवा" जो कर पाये |150|
"अर्चना" "वंदन "दास" फिर, "सखा" बन "निवेदन" आये |
नवधा भक्ति के नौ रूप ये, लक्ष्मी साँई जी से पाये |151|

पर्व तीनो थे एक ही दिन, कुछ खास घड़ी बतलाये |
बाबा यह कहने लगे, उचित दिन है अब आये |152|

अपनी ही अंतिमयात्रा की, बाबा योजना बनाये |
छोड़ पिंजरा रूपी शरीर, महासमाधी अपनाये |153|

पिंजरा खाली छोड़ कर, बाबा जी स्वर्ग को जाये |
बूटी को साँई जी कहे, मुझे वाड़े में ही सुलाये |154|

कृष्ण मन्दिर के स्थान पर, बाबा मुरलीधर बन जाये |
धन्य धन्य है बूटी वाड़ा, कण कण में साँई समाये |155|
बाबा जी की शिर्डी में, लाखों भक्त रोज आये |
बिन माँगे ही अपनी झोलियाँ, भर भर के ले जाये |156|

साँई की मस्जिद मे देखो, भक्त ऐसी अलख लगाये |
रामनवमी ईद और दीवाली, सब मिलजुल कर मनाये |157|

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई, सब शिर्डी में आये |
सबका मालिक एक है, सबमें साँई समाये |158|

कई कथायें ऐसी ही, किस कथा का गुण ना गाये |
सही सही बातें सभी, श्री साँई सच्चरित्र बताये |159|

नतमस्तक हूँ कृपावंत हूँ, साँई का स्वपन जो आये |
बाबा जी के आदेश से, साँई गाथा लिख पाये |160|

क्षमा याचना साँई चरणों में, त्रुटि मेरी बिसराये |
इस साँई गाथा को भक्तन, हृदय में अपने बसाये |161|

नित्य पठन जीवन गाथा का, जो भी ध्यान में लाये |
बाबा जी की हो कृपा, परम आनन्द वह पाये |162|

।। श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Friday, 5 June 2020

साईं मेरे, दरस मुझे भी अब दिखा दे

ॐ सांई राम



  
साईं राम मेरे, महबूब-ए-खुदा
तेरे दर पे आ के, सुकून मिल जाता है
इससे बढ़कर और इनायत क्या होगी
कि मांगने से पहले, दामन तू भर जाता है

साईं मेरे, दरस मुझे भी अब दिखा दे
साईं, चरणों में अब तो लगा ले
मिलता नहीं मेरे दिल को सुकून कहीं
झूठे जगत के मोह से बचा ले
साईं मेरे, दरस मुझे भी अब दिखा दे
साईं, चरणों में अब तो लगा ले

साईं मेरे भी बंधन तोड़ो
खाली हाथ मुझे न मोड़ो
मेरी तड़प मिटा दे साईं
मेरी लौ को जगा दे साईं
मुझसे नाता न तोड़ के जा रे
साईं मेरे, दरस मुझे भी अब दिखा दे
साईं, चरणों में अब तो लगा ले


Kindly Provide Food & clean drinking Water to Birds & Other Animals,
      This is also a kind of SEWA.

Thursday, 4 June 2020

श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 4

ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं |
हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है |
हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा| किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है|

श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 4

श्री साई बाबा का शिरडी में प्रथम आगमन

सन्तों का अवतार कार्य, पवित्र तीर्थ शिरडी, श्री साई बाबा का व्यक्तित्व, गौली बुवा का अनुभव, श्री विटठल का प्रगट होना, क्षीरसागर की कथा, दासगणु का प्रयाग – स्नान, श्री साई बाबा का शिरडी में प्रथम आगमन, तीन वाडे़ ।


सन्तों का अवतार कार्य 

भगवद्गगीता (चौथा अध्याय 7-8) में श्री कृष्ण कहते है कि जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृदि होता है, तब-तब मैं अवतार धारण करता हूँ । धर्म-स्थापन दुष्टों का विनाश तथा साधुजनों के परित्राण के लिये मैं युग-युग में जन्म लेता हूँ । साधु और संत भगवान के प्रतिनिधिस्वरुप है । वे उपयुक्त समय पर प्रगट होकर अपनी कार्यप्रणाली दृारा अपना अवतार-कार्य पूर्ण करते है । अर्थात् जब ब्राहमण, क्षत्रिय और वैश्य अपने कर्तव्यों में विमुख हो जाते है, जब शूद्र उच्च जातियों के अधिकार छीनने लगते है, जब धर्म के आचार्यों का अनादर तथा निंदा होने लगती है, जब धार्मिक उपदेशों की उपेक्षा होने लगती है, जब प्रत्येक व्यक्ति सोचने लगता है कि मुझसे श्रेष्ठ विदृान दूसरा नहीं है, जब लोग निषिदृ भोज्य पदार्थों और मदिरा आदि का सेवन करने लगते है, जब धर्म की आड़ में निंदित कार्य होने लगते है, जब भिन्न-भिन्न धर्मावलम्बी परस्पर लड़ने लगते है, जब ब्राहमण संध्यादि कर्म छोड़ देते है, कर्मठ पुरुषों को धार्मिक कृत्यों में अरुचि उत्पन्न हो जाती है, जब योगी ध्यानादि कर्म करना छोड़ देते हें और जब जनसाधारण की ऐसी धारणा हो जाती है कि केवल धन, संतान और स्त्री ही सर्वस्व है तथा इस प्रकार जब लोग सत्य-मार्ग से विचलित होकर अधःपतन की ओर अग्रसर होने लगते है, तब संत प्रगट होकर अपने उपदेशों एवं आचरण के दृारा धर्म की संस्थापन करते हैं । वे समुद्र की तरह हमारा उचित मार्गदर्शन करते तथा सत्य पथ पर चलने को प्रेरित करते है । इसी मार्ग पर अनेकों संत-निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेव, मुक्ताबाई, नामदेव, गोरा, गोणाई, एकनाथ, तुकाराम, नरहरि, नरसी भाई, सजन कसाई, सावंत माली और रामदास तथा कई अन्य संत सत्य-मार्ग का दिग्दर्शन कराने के हेतु भिन्न-भिन्न अवसरों पर प्रकट हुए और इन सब के पश्चात शिरडी में श्री साई बाबा का अवतार हुआ ।




पवित्र तीर्थ शिरडी

अहमदनगर जिले में गोदावरी नदी के तट बड़े ही भाग्यशाली है, जिन पर अनेक संतों ने जन्म धारण किया और अनेकों ने वहाँ आश्रय पाया । ऐसे संतों में श्री ज्ञानेश्रर महाराज प्रमुख थे । शिरडी, अहमदनगर जिले के कोपरगाँव तालुका में है । गोदावरी नदी पार करने के पश्चात मार्ग सीधा शिरडी को जाता है । आठ मील चलने पर जब आर नीमगाँव पहुँचेंगे तो वहाँ से शिरडी दृष्टिगोचर होने लगती है । कृष्णा नदी के तट पर अन्य तीर्थस्थान गाणगापूर, नरसिंहवाडी और औदुम्बर के समान ही शिरडी भी प्रसिदृ तीर्थ है । जिस प्रकार दामाजी ने मंगलवेढ़ा को (पंढरपुर के समीर), समर्थ रामदास ने सज्जनगढ़ को, दत्तावतार श्रीनरसिंह सरस्वती ने वाड़ी को पवित्र किया, उसी प्रकार श्री साईनाथ ने शिरडी में अवतीर्ण होकर उसे पावन बनाया ।

श्री साई बाबा का व्यक्तित्व

श्री साई बाबा के सानिध्य से शिरडी का महत्व विशेष बढ़ गया । अब हम उनके चरित्र का अवलोकन करेंगे । उन्होंने इस भवसागर पर विजय प्राप्त कर ली थी, जिसे पार करना महान् दुष्कर तथा कठिन है । शांति उनका आभूषण था तथा वे ज्ञान की साक्षात प्रतिमा थे । वैष्णव भक्त सदैव वहाँ आश्रय पाते थे । दानवीरों में वे राजा कर्ण के समान दानी थे । वे समस्त सारों के साररुप थे । ऐहिक पदार्थों से उन्हें अरुचि थी । सदा आत्मस्वरुप में निमग्न रहना ही उनके जीवन का मुख्य ध्येय था । अनित्य वस्तुओं का आकर्षण उन्हें छू भी नहीं गयी थी। उनका हृदय शीशे के सदृश उज्जवल था । उनके श्री-मुख से सदैव अमृत वर्षा होती थी । अमीर और गरीब उनके लियो दोंनो एक समान थे । मान-अपमान की उन्हें किंचितमात्र भी चिंता न थी । वे निर्भय होकर सम्भाषण करते, भाँति-भाँति के लोंगो से मिलजुलकर रहते, नर्त्तिकियों का अभिनय तथा नृत्य देखते औरगजन-कव्वालियाँ भी सुनते थे । इतना सब करते हुए भी उनकी समाधि किंचितमात्र भी भंग न होती थी । अल्लाह का नाम सदा उलके ओठों पर था । जब दुनिया जागती तो वे सोते और जब दुनिया सोती तो वे जागते थे । उनका अन्तःकरण प्रशान्त महासागर की तरह शांत था । न उनके आश्रम का कोई निश्चय कर सकता था और न उनकी कार्यप्रणाली का अन्त पा सकता था । कहने के लिये तो वे एक स्थान पर निवास करते थे, परंतु विश्व के समस्त व्यवहारों व व्यापारों का उन्हें भली-भाँति ज्ञान था । उनके दरबार का रंग ही निराला था । वे प्रतिदिन अनेक किवदंतियाँ कहते थे, परंतु उनकी अखंड शांति किंचितमात्र भी विचलित न होती थी । वे सदा मसजिद की दीवार के सहारे बैठे रहते थे तथा प्रातः, मध्याहृ और सायंकील लेंडी और चावडड़ी की ओर वायु-सोवन करने जाते तो भी सदा आत्मस्थ्ति ही रहते थे । स्वतः सिदृ होकर भी वे साधकों के समान आचरण करते थे । वे विनम्र, दयालु तथा अभिमानरहित थे । उन्होंने सबको सदा सुख पहुँचाया । ऐसे थे श्री साईबाबा, जिनके श्री-चरणों का स्पर्श कर शिरडी पावन बन गई । उसका महत्व असाधारण हो गया । जिस प्रकार ज्ञानेश्वर ने आलंदी और एकनाथ ने पैठण का उत्थान किया, वही गति श्री साईबाबा दृारा शिरडी को प्राप्त हुई । शिरडी के फूल, पत्ते, कंकड़ और पत्थर भी धन्य है, जिन्हें श्री साई चरणाम्बुजों का चुम्बन तथा उनकी चरण-रज मस्तक पर धारण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । भक्तगण को शिरडी एक दूसरा पंढरपुर, जगत्राथपुरी, दृारका, बनारस (काशी), महाकालेश्वरतथा गोकर्ण महाबलेश्वर बन गई । श्री साई का दर्शन करना ही भक्तों का वेदमंत्र था, जिसके परिणामस्वरुप आसक्ति घटती और आत्म दर्शन का पथ सुगम होता था । उनका श्री दर्शन ही योग-साधन था और उनसे वार्तालाप करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते थे । उनका पादसेवन करना ही त्रिवेणी (प्रयाग) स्नान के समान था तथा चरणामृत पान करने मात्र से ही समस्त इच्छाओं की तृप्ति होती थी । उनकी आज्ञा हमारे लिये वेद सदृश थी । प्रसाद तथा उदी ग्रहण करने से चित्त की शुदृि होता थी । वे ही हमारे राम और कृष्ण थे, जिन्होंने हमें मुक्ति प्रदान की, वे ही हमारे परब्रहमा थे । वे छन्दों से परे पहते तथा कभी निराश व हताश नहीं होते थे । वे सदा आत्म-स्थित, चैतन्यघन तथा आनन्द की मंगलमूर्ति थे । कहने को तो शिरडी उनका मुख्य केन्द्र था, परन्तु उनका कार्यक्षेत्र पंजाब, कलकत्ता, उत्तरी भारत, गुजरात, ढाका और कोकण तक विस्तृत था । श्री साईबाबा की कीर्ति दिन-प्रतिदिन चहुँ ओर फैलने लगी और जगह-जगह से उनके दर्शनार्थ आकर भक्त लाभ उठाने लगे । केवल दर्शन से ही मनुष्यों, चाहे वे शुदृ अथवा अशुदृ हृदय के हों, के चित्त को परम शांति मिल जाती थी । उन्हें उसी आनन्द का अनुभव होता था, जैसा कि पंढरपुर में श्री विटठल के दर्शन से होता है । यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है । दोखिये, एक भक्त ने यही अनुभव पाया है –

गौली बुवा

लगभग 95 वर्ष के वयोवृदृ भक्त, जिनका नाम गौली बुवा था, पंढरी के एक वारकरी थे । वे 8 मास पंढरपुर तथा 4 मास (आषाढ़ से कार्तिक तक) गंगातट पर निवास करते थे । सामान ढोने के लिये वे एक गधे को अपने पास रखते और एक शिष्य भी सदैव उनके साथ रहता था । वे प्रतिवर्ष वारी लेकर पंढरपुर जाते और लौटते सैय श्री बाबा के दर्शनार्थ शिरडी आते थे । बाबा पर उनका अगाध प्रेम था । वे बाब की ओर एक टक निहारते और कह उठते थे कि ये तो श्री पंढरीनाथ, श्री विटठल के अवतार है, जो अनाथ-नाथ, दीन दयालु और दीनों के नाथ है । गौली बुवा श्री विठोबा के परम भक्त थे । उन्होंने अनेक बार पंढरी की यात्रा की तथा प्रत्यक्ष अनुभव किया कि श्री साई बाबा सचमुच में ही पंढरीनाथ हैं ।

विटठल स्वयं प्रकट हुए

श्री साई बाबा की ईश्वर-चिंतन और भजन में विशेष अभिरुचि थी । वे सदैव अल्लाह मालिक पुकारते तथा भक्तों से कीर्तन-सप्ताह करवाते थे । इसे नामसप्ताह भी कहते है । एक बार उन्होंने दासगणू को कीर्तन-सप्ताह करने की आज्ञा दी । दासगणू ने बाबा से कहा कि आपकी आज्ञा मुझे शिरोधार्य है, परन्तु इस बात का आश्वासन मिलना चाहिये कि सप्ताह के अंत में विटठल भगवान् अवश्य प्रगट होंगे । बाबा ने अपना हृदय स्पर्श करते हुए कहा कि विटठल अवश्य प्रगट होंगे । परन्तु साथ ही भक्तों मे श्रदृा व तीव्र उत्सुकता का होना भी अनिवार्य है । ठाकुर नाथ की डंकपुरी, विटठल की पंढरी, पणछोड़ की दृारका यहीं तो है । किसी को दूर जाने की आवश्यकता नहीं है । क्या विटठल कहीं बाहर से आयेंगे । वे तो यहीं विराजमान हैं । जब भक्तों में प्रेम और भक्ति का स्त्रोत प्रवारित होगा तो विटठल स्वयं ही यहाँ प्रगट हो जायेंगे । सप्ताह समाप्त होने के बाद विटठल भगवान इस प्रकार प्रकट हुस । काकासाहेब दीक्षित सदाव की भाँति स्नान करने के पश्चात जब ध्यान करने को बैठे तो उन्हें विटठल के दर्शन हुए । दोपहर के समय जब वे बाबा के दर्शनार्थ मसजिद पहुँचे तो बाबा ने उनसे पूछा क्यों विटठल पाटील आये थे न । क्या तुम्हें उनके दर्शन हुए । वे बहुत चंचल हैं । उनको दृढ़ता से पकड़ लो । यदि थोडी भी असावधानी की तो वे बचकर निकल जायेंगे । यह प्रातःकाल की घटना थी और दोपहर के समय उन्हें पुनः दर्शन हुए । उसी दिन एक चित्र बेचने वाला विठोबा के 25-30 चित्र लेकर वहाँ बेचने को आया । यह चित्र ठीक वैसा ही था, जैसा कि काकासाहेब दीक्षित को ध्यान में दर्शन हुए थे । चित्र देखकर और बाबा के शब्दों का स्मरण कर काकासाहेब को बड़ा विस्मय और प्रसन्नता हुई । उन्होंने एक चित्र सहर्ष खरीद लिया और उसे अपने देवघर में प्रतिष्ठित कर दिया ।
ठाणा के अवकाशप्राप्त मामलतदार श्री. बी.व्ही.देव ने अपने अनुसंधान के दृारा यह प्रमाणित कर दिया है कि शिरडी पंढरपुर की परिधि में आती है । दक्षिण में पंढरपुर श्री कृष्ण का प्रसिदृ स्थान है, अतः शिरडी ही दृारका है । (साई लीला पत्रिका भाग 12, अंक 1,2,3 के अनुसार)
दृारका की एक और व्याख्या सुनने में आई है, जो कि कै.नारायण अय्यर दृारा लिखित भारतवर्ष का स्थायी इतिहास में स्कन्दपुराण (भाग 2, पृष्ठ 90) से उदृत की गई है । वह इस प्रकार है –
“चतुर्वर्णामपि वर्गाणां यत्र द्घराणि सर्वतः ।
अतो दृारवतीत्युक्ता विद़दि्भस्तत्ववादिभिः ।।“

जो स्थान चारों वर्णों के लोगों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिये सुलभ हो, दार्शनिक लोग उसे दृारका के नाम से पुकारते है । शिरडी में बाबा की मसजिद केवल चारों वर्णों के लिये ही नहीं, अपितु दलित, अस्पृश्य और भागोजी सिंदिया जैसे कोढ़ी आदि सब के लिये खुली थी । अत- शिरडी को दृारका कहना सर्वथा उचित है ।

भगवंतराव क्षीरसागर की कथा

श्री विटठल पूजन में बाबा को कितनी रुचि थी, यह भगवंतराव क्षीरसागर की कथा से सपष्ट है । भगवंतराव को पिता विठोबा के परम भक्त थे, जो प्रतिवर्ष पंढरपुर को वारी लेकर जाते थे । उनके घर में एक विठोबा की मूर्ति थी, जिसकी वे नित्यप्रति पूजा करते थे । उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके पुत्र भगवंतराव ने वारी, पूजन श्रादृ इत्यादि समस्त कर्म करना छोड़ दिया । जब भगवंतराव शिरडी आये तो बाबा उन्हें देखते ही कहने लगे कि इनके पिता मेरे परम मित्र थे । इसी कारण मैंने इन्हें यहाँ बुलाया हैं । इन्होंने कभी नैवेघ अर्पण नहीं किया तथा मुझे और विठोबा को भूखों मारा है । इसलिये मैंने इन्हें यहां आने को प्रेरित किया है । अब मैं इन्हें हठपूर्वक पूजा में लगा दूंगा ।

दासगणू का प्रयाग स्नान

गंगा और यमुनग नदी के संगम पर प्रयाग एक प्रसिदृ पवित्र तीर्थस्थान है । हिन्दुओं की ऐसी भावना है कि वहाँ स्नानादि करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते है । इसीकारण प्रत्येक पर्व पर सहस्त्रों भक्तगण वहाँ जाते है और स्नान का लाभ उठाते है । एक बार दासगणू ने भी वहाँ जाकर स्नान करने का निश्चय किया । इस विचार से वे बाबा से आज्ञा लेने उनके पास गये । बाबा ने कहा कि इतनी दूर व्यर्थ भटकने की क्या आवष्यकता है । अपना प्रयाग तो यहीं है । मुझ पर विश्वास करो । आश्चर्य । महान् आश्चर्य । जैसे ही दासगणू बाबा के चरणों पर नत हुए तो बाबा के श्री चरणों से गंगा-यमुना की धारा वेग से प्रवाहित होने लगी । यह चमत्कार देखकर दासगणू का प्रेम और भक्ति उमड़ पड़ी । आँखों से अश्रुओं की धारा बहने लगी । उन्हें कुछ अंतःस्फूर्ति हुई और उनके मुख से श्री साई बाबा की स्त्रोतस्विनी स्वतःप्रवाहित होने लगी ।

श्री साई बाबा की शिरडी में प्रथम आगमन


श्री साई बाबा के माता पिता, उनके जन्म और जन्म-स्थान का किसी को भी ज्ञान नहीं है । इस सम्बन्ध में बहुत छानबीन की गई । बाबा से तथा अन्य लोगों से भी इस विषय में पूछताछ की गई, परन्तु कोई संतोषप्रद उत्तर अथवा सूत्र हाथ न लग सका । यथार्थ में हम लोग इस विषय में सर्वथा अनभिज्ञ हैं । नामदेव और कबीरदास जी का जन्म अन्य लोगों की भाँति नहीं हुआ था । वे बाल-रुप में प्रकृति की गोद में पाये गये थे । नामदेव भीमरथी नदी के तीर पर गोनाई को और कबीर भागीरथी नदी के तीर पर तमाल को पड़े हुए मिले थे और ऐसा ही श्री साई बाबा के सम्बन्ध में भी था । वे शिरडी में नीम-वृक्ष के तले सोलह वर्ष कीकी तरुणावस्था में स्वयं भक्तों के कल्याणार्थ प्रकट हुए थे । उस समय भी वे पूर्ण ब्रहृज्ञानी प्रतीत होते थे । स्वपन में भी उनको किसी लौकिक पदार्थ की इच्छा नहीं थी । उन्होंने माया को ठुकरा दिया था और मुक्ति उनके चरणों में लोटता थी । शिरडी ग्राम की एक वृदृ स्त्री नाना चोपदार की माँ ने उनका इस प्रकार वर्णन किया है-एक तरुण, स्वस्थ, फुर्तीला तथा अति रुपवान् बालक सर्वप्रथम नीम वृक्ष के नीचे समाधि में लीन दिखाई पड़ा । सर्दी व गर्मी की उन्हें किंचितमात्र भी चिंता न थी । उन्हें इतनी अल्प आयु में इस प्रकार कठिन तपस्या करते देखकर लोगों को महान् आश्चर्य हुआ । दिन में वे किसी से भेंट नहीं करते थे और रात्रि में निर्भय होकर एकांत में घूमते थे । लोग आश्चर्यचकित होकर पूछते फिरते थे कि इस युवक का कहाँ से आगमन हुआ है । उनकी बनावट तथा आकृति इतनी सुन्दर थी कि एक बार देखने मात्र के ही लोग आकर्षित हो जाते थे । वे सदा नीम वृक्ष के नीचे बैठे रहते थे और किसी के दृार पर न जाते थे । यघपि वे देखने में युवक प्रतीत होते थे, परन्तु उनका आचरण महात्माओं के सदृश था । वे त्याग और वैराग्य की साक्षात प्रतिमा थे । एक बार एक आश्चर्यजनक घटना हुई । एक भक्त को भगवान खंडोबा का संचार हुआ । लोगों ने शंका-निवारार्थ उनसे प्रश्न किया कि हे देव कृपया बतलाइये कि ये किस भाग्यशाली पिता की संतान है और इनका कहाँ से आगमन हुआ है । भगवान खंडोबा ने एस कुदाली मँगवाई और एक निर्दिष्ट स्थान पर खोदने का संकेत किया । जब वह स्थान पूर्ण रुप से खोदा गया तो वहाँ एक पत्थर के नीचे ईंटें पाई गई । पत्थर को हटाते ही एक दृार दिखा, जहाँ चार दीप जल रहे थे । उन दरवाजों का मार्ग एक गुफा में जाता था, जहाँ गौमुखी आकार की इमारत, लकड़ी के तखते, मालाऐं आदि दिखाई पड़ी । भगवान खंडोबा कहने लगे कि इस युवक ने इस स्थान पर बारह साल तपस्या की है । तब लोग युवक से प्रश्न करने लगे । परंतु उसने यह कहकर बात टाल दी कि यह मेरे श्री गुरुदेव की पवित्र भूमि है तथा मेरा पूज्य स्थान है और लोगों से उस स्थान की भली-भांति रक्षा करने की प्रार्थना की । तब लोगों ने उस दरवाजे को पूर्ववत् बन्द कर दिया । जिस प्रकार अश्वत्थ औदुम्बर वृक्ष पवित्र माने जाते है, उसी प्रकार बाबा ने  भी इस नीम वृक्ष को उतना ही पवित्र माना और प्रेम किया । म्हालसापति तथा शिरडी के अन्य भक्त इस स्थान को बाबा के गुरु का समाधि-स्थान मानकर सदैव नमन किया करते थे ।

तीन वाडे़
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नीम वृक्ष के आसपास की भूमि श्री हरी विनायक साठे ने मोल ली और उस स्थान पर एक विशाल भवन का निर्माण किया, जिसका नाम साठे-वाड़ा रखा गया । बाहर से आने वाले यात्रियों के लिये वह वाड़ा ही एकमात्र विश्राम स्थान था, जहाँ सदैव भीड़ रहा करती थी । नीम वृक्ष के नीचे चारों ओर चबूतरा बाँधा गया । सीढ़ियों कके नीचे दक्षिण की ओर एक छोटा सा मन्दिर है, जहाँ भक्त लोग चबूतरे के ऊपर उत्तराभिमुख होकर बैठते है । ऐसा विश्वास किया जाता है कि जो भक्त गुरुवार तथा शुक्रवार की संध्या को वहाँ धूप, अगरबत्ती आदि सुगन्धित पदार्थ जलाते है, वे ईश-कृपा से सदैव सुखी होंगे । यह वाड़ा बहुत पुराना तथा जीर्ण-शीर्ण स्थिति में था तथा इसके जीर्णोंदृार की नितान्त आवश्यकता थी, जो संस्थान दृारा पूर्ण कर दी गई । कुछ समय के पश्चात एक दितीय वाड़े का निर्माण हुआ, जिसका नाम दीक्षित-वाड़ा रखा गया । काकासाहेब दीक्षित, कानूनी सलाहकार (Solicitor) जब इंग्लैंड में थे, तब वहाँ उन्हें किसी दुर्घटना से पैर में चोट आ गई थी । उन्होंने अनेक उपचार किये, परंतु पैर अच्छा न हो सका । नानासाहेब चाँदोरकर ने उन्हें बाबा की कृपा प्राप्त करने का परामर्श दिया । इसलिये उन्होंने सन् 1909 में बाबा के दर्शन किये । उन्होंने बाबा से पैर के बदले अपने मन की पंगुता दूर करने की प्रार्थना की । बाबा के दर्शनों से उन्हें इतना सुख प्राप्त हुआ कि उन्होंने स्थायी रुप से शिरडी में रहना स्वीकार कर लिया और इसी कारण उन्होंने अपने तथा भक्तों के हेतु एक वाड़े का निर्माण कराया । इस भवन का शिलान्यास दिनांक 9-12-1910 को किया गया । उसी दिन अन्य दो विशेष घटनाएँ घटित हुई –

1. श्री दादासाहेब खापर्डे को घर वापस लौटने की अनुमति प्राप्त हो गई और
2. चावड़ी में रात्रि को आरती आरम्भ हो गई । कुछ समय में वाड़ा सम्पूर्ण रुप से बन गया और
रामनवमी (1911) के शुभ अवसर पर उसका यथाविधि उद्घाटन कर दिया गया । इसके बाद एक और वाड़ा-मानो एक शाही भवन-नागपुर के प्रसिदृ श्रीमंत बूटी ने बनवाया । इस भवन के निर्माण में बहुत धनराशि लगाई गई । उनकी समस्त निधि सार्थक हो की, क्योंकि बाबा का शरीर अब वहीं विश्रान्ति पा रहा है और फिलहाल वह समाधि मंदिर के नाम से विख्यात है इस मंदिर के स्थान पर पहले एक बगीचा था, जिसमें बाबा स्वयं पौधौ को सींचते और उनकी देखभाल किया करते थे । जहाँ पहले एक छोटी सी कुटी भी नहीं थी, वहाँ तीन-तीन वाड़ों का निर्माण हो गया । इन सब में साठे-वाड़ा पूर्वकाल में बहुत ही उपयोगी था ।

बगीचे की कथा, वामन तात्या की सहायता से स्वयं बगीचे की देखभाल, शिरडी से श्री साई बाबा की अस्थायी अनुपस्थिति तथा चाँद पाटील की बारात में पुनः शिरडी में लौटना, देवीदास, जानकीदास और गंगागीर की संगति, मोहिद्दीन तम्बोली के साथ कुश्ती, मसजिद सें निवास, श्री डेंगने व अन्य भक्तों पर प्रेम तथा अन्य घटनाओं का अगतले अध्याय में वर्णन किया गया है ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 3 June 2020

भरना जो चाहे तू झोली ये ख़ाली, तू साईं के दर पे चला जा सवाली

ॐ सांई राम


"ना कर ग़म की तेरा दामन है ख़ाली"
भरना जो चाहे तू झोली ये ख़ाली
तू साईं के दर पे चला जा सवाली
है जिस दर पे मिलता सुखों का ख़जाना
है जिस दर पे झुकता सारा ज़माना
वहां इस जहाँ की हकीक़त मिलेगी
हर दिल में उसकी इबादत मिलेगी
वहां तेरी झोली रहेगी ना ख़ाली
वहां तेरा दामन रहेगा ना ख़ाली
हैं शिर्डी में बैठे मेरे साईं बाबा
वहीँ पे है काशी वहीँ पे है काबा
हर दिल में बसते हैं मेरे साईं
दीन-ए-इलाही हैं मेरे साईं
आंसू तेरा कोई जाये ना ख़ाली
है तुझको तमन्ना अगर ज़िन्दगी की
खा ले कसम फिर साईं बंदगी की
श्रद्धा सबुरी को इबादत बना ले
दुनिया से खुद को ऊपर उठा ले
ये दुनिया तुझे कुछ नहीं देने वाली


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Gautam Budh Nagar, Uttar Pradesh. INDIA.