शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 11 April 2020

संतो का कार्य

ॐ सांई राम


संतो का कार्य

ईश्वरीय अवतार का ध्येय साधुजनों का परित्राण और दुष्टों को संहार करना है !

परन्तु संतो का कार्य तो सर्वथा अलग ही है ! संतो के लिए साधू और दुष्ट प्राय: एक ही समान है ! यथार्थ में उन्हें दुष्कर्म करने वालो क़ि प्रथम चिंता होती है और वे परिचित पथ पर लगा देते है ! वे भवसागर के कष्टों को सोखने के लिए के लिए अग्सत्य के सदृश है और अज्ञान तथा अंधकार का नाश करने के लिए सूर्ये के समान है ! संतो के हृदये में भगवन वासुदेव निवास करते है ! वे उनसे प्रथक नहीं है ! श्री साईं भी उसी कोटि में है, जो क़ि भक्तो के कल्याण के निमित ही अवतीर्ण हुए है !वे ज्ञान ज्योति स्वरुप थे ! भक्तों के लिए उन्होंने अपना दिव्य गुन्स्मूह पूर्णत: प्रयोग किया और सदेव उनकी सहायता के लिए तत्पर रहे ! उनकी इच्छा के बिना कोई भक्त उनके पास नहीं जा सकता था ! यदि उनके सुभ कर्म उदित नहीं हुए है तो उन्हें बाबा क़ि स्मृति भी कभी नहीं आई और न ही उनकी लीलाएं उनके कानो तक पहुच सकी ! तब फिर बाबा के दर्शनों का विचार भी उनके मन में कैसी आ सकता था, अनेक व्यक्तियों क़ि श्री साईं बाबा के दर्शन क़ि इच्छा होते हुए भी  उन्हें बाबा के महासम्धि लेने तक कोई योग प्राप्त न हो सका ! अत: ऐसे व्यक्ति जो दर्शनलाभ से वंचित रहे है, यदि वे श्रधापुर्वक साईं लीलाओं का श्रवण करेंगे तो उनकी साईं दर्शन क़ि इच्छा कुछ अंशो तक तृप्त हो जाएगी ! भाग्यवश यदि किसी को किसी प्रकार बाबा के दर्शन हो भी गए तो वह वहां अधिक देर तक  रुक न सका, इच्छा होते हुए भी केवल बाबा क़ि आज्ञा तक ही वहां रुकना संभव था और आज्ञा होते ही स्थान छोड़ देना आवश्यक हो जाता था ! अत: यह सब उनकी शुभ इच्छा पैर ही अवलंबित था !


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Friday, 10 April 2020

जिस रंग में राखे साइयाँ उसी रंग में रहना

ॐ सांई राम


जिस रंग में राखे साइयाँ उसी रंग में रहना
सुख में इसको भूल न जाना दुःख आये तो न घबराना
सुख दुःख सहते रहना उसी रंग में रहना

डूब रही हो तेरी नईया  आये न आये बन के खिवईया
न भर लेना नैना उसी रंग में रहना

अजब हैं उसके ताने-बाने समझ सके न चतुर सयाने
भोले बन के रहना उसी रंग में रहना 

लेखा जोखा सब का रखता एक दिवस सब को है परखता 
याद हमेशा रखना उसी रंग में रहना 

वो चाहे तो भीख मंगाये वो चाहे तो तख़्त बिठाये
मुख से कुछ न कहना उसी रंग में रहना
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Thursday, 9 April 2020

श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 47 - पुनर्जन्म

ॐ सांई राम जी 


आप सभी  को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं , हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम  घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...


श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 47 - पुनर्जन्म 

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वीरभद्रप्पा और चेनबसाप्पा (सर्प व मेंढ़क) की वार्ता ।

गत अध्याय में बाबा द्घारा बताई गई दो बकरों के पूर्व जन्मों की वार्ता थी । इस अध्याय मे कुछ और भी पूर्व जन्मों की स्मृतियों का वर्णन किया जाता है । प्रस्तुत कथा वीरभद्रप्पा और चेनवसाप्पा के सम्बन्ध में है।




प्रस्तावना

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हे त्रिगुणातीत ज्ञानावतार श्री साई । तुम्हारी मूर्ति कितनी भव्य और सुन्दर है । हे अन्तयार्मिन । तुम्हारे श्री मुख की आभा धन्य है । उसका क्षणमात्र भी अवलोकन करने से पूर्व जन्मों के समस्त दुःखों का नाश होकर सुख का द्घार खुल जाता है । परन्तु हे मेरे प्यारे श्री साई । यदि तुम अपने स्वभाववश ही कुछ कृपाकटाक्ष करो, तभी इसकी कुछ आशा हो सकती है । तुम्हारी दृष्टिमात्र से ही हमारे कर्म-बन्धन छिन्न-भिन्न हो जाते है और हमें आनन्द की प्राप्त हो जाती है । गंगा में स्नान करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते है, परन्तु गंगामाई भी संतों के आगमन की सदैव उत्सुकतापूर्वक राह देखा करती है कि वे कब पधारें और मुझे अपनी चण-रज से पावन करें । श्री साई तो संत-चूडामणि है । अब उनके द्घारा ही हृदय पवित्र बनाने वाली यह कथा सुनो ।



सर्प और मेंढ़क 

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श्री साई बाबा ने कहा – एक दिन प्रातःकाल 8 बजे जलपान के पश्चात मैं घूमने निकला । चलते-चलते मैं एक छोटी सी नदी के किनारे पहुँचा । मैं अधिक थक चुका था, इस काण वहाँ बैठकर कुछ विश्राम करने लगा । कुछ देर के पश्चात् ही मैंने हाथ-पैर धोये और स्नान किया । तब कहीं मेरी थकावट दूर हुई और मुझे कुछ प्रसन्नता का अनुभव होने लगा । उस स्थान से एक पगडंडी और बैलगाड़ी के जाने का मार्ग था, जिसके दोनों ओर सघन वृक्ष थे । मलय-पवन मंद-मंद वह रहा था । मैं चिलम भर ही रहा था कि इतने में ही मेरे कानों में एक मेंढ़क के बुरी तरह टर्राने की ध्वनि पड़ी । मैं चकमक सुलगा ही रहा था कि इतने में एक यात्री वहाँ आया और मेरे समीप ही बैठकर उसने मुझे प्रणाम किया और घर पर पधारकर भोजन तथा विश्राम करने का आग्रह करने लगा । उसने चिलम सुलगा कर मेरी ओर पीने कि लिये बढ़ाई । मेंढ़क के टर्राने की ध्वनि सुनकर वह उसका रहस्य जानने के लिये उत्सुक हो उठा । मैंने उसे बतलाया कि एक मेंढक कष्ट में है, जो अपने पूर्व जन्म के कर्मों का फल भोग रहा है । पूर्व जन्म के कर्मों का फल इस जन्म में भोगना पड़ता है, अतः अब उसका चिल्लाना व्यर्थ है । एक कश लेकर उसने चिलम मेरी ओर बढ़ाई । थोड़ा देखूँ तो, आखिर बात क्या है । ऐसा कहकर वह उधर जाने लगा । मैंने उसे बतलाया कि एक बड़े साँप ने एक मेंढ़क को मुँह में दबा लिया है, इस कारण वह चिल्ला रहा है । दोनों ही पूर्व जन्म में बड़े दुष्ट थे और अब इस शरीर में अपने कर्मों का फल भोग रहे है । आगन्तुक ने घटना-स्थल पर जाकर देखा कि सचमुच एक बड़े सर्प ने एक बड़े मेंढ़क को मुँह में दबा रखा है ।

उसने वापस आकर मुझे बताया कि लगभग घड़ी-दो घड़ी में ही साँप मेंढ़क को निगल जायेगा । मैंने कहा – नहीं, यह कभी नहीं हो सकता, मैं उसका संरक्षक पिता हूँ और इस समय यहाँ उपस्थित हूँ । फिर सर्प की क्या सामर्थ्य है कि मेंढ़क को निगल जाय । क्या मैं व्यर्थ ही यहाँ बैठा हूँ । देखो, मैं अभी उसकी किस प्रकार रक्षा करता हूँ । दुबारा चिलम पीने के पश्चात् हम लोग उस स्थान पर गये । आगन्तुक डरने लगा और उसने मुझे आगे बढ़ने से रोका कि कहीं सर्प आक्रमण न कर दे । मैं उसकी बात की उपेक्षा कर आगे बढ़ा और दोनों से कहने लगा कि अरे वीरभद्रप्पा । क्या तुम्हारे शत्रु को पर्याप्त फल नहीं मिल चुका है, जो उसे मेंढ़क की और तुम्हें सर्प की योनि प्राप्त हुई है । अरे अब तो अपना वैमनस्य छोड़ो । यही बड़ी लज्जाजनक बात है । अब तो इस ईर्ष्या को त्यागो और शांति से रहो । इन शब्दों को सुनकर सर्प ने मेंढ़क को छोड़ दिया और शीघ्र ही नदी में लुप्त हो गया । मेंढ़क भी कूदकर भागा और झाड़ियों में जा छिपा ।

उस यात्री को बड़ा अचम्भा हुआ । उसकी समझ में न आया कि बाबा के शब्दों को सुनकर साँप ने मेंढ़क को क्यों छोड़ दिया और वीरभद्रप्पा व चेनबसाप्पा कौन थे । उनके वैमनस्य का कारण क्या था । इस प्रकार के विचार उसके मन में उठने लगे । मैं उसके साथ उसी वृक्ष के नीचे लौट आया और धूम्रपान करने के पश्चात उसे इसका रहस्य सुनाने लगा :-



मेरे निवासस्थान से लगभग 4-5 मील की दूरी पर एक पवित्र स्थान था, जहाँ महादेव का एक मंदिर था । मंदिर अत्यन्त जीर्ण-शीर्ण स्थिति में था, सो वहाँ के निवासियों ने उसका जीर्णोद्घार करने के हेतु कुछ चन्दा इकट्ठा किया । पर्याप्त धन एकत्रित हो गया और वहाँ नित्य पूजन की व्यवस्था कर मंदिर के निर्माण की योजनायें तैयार की गई । एक धनाढ़य व्यक्ति को कोषाध्यक्ष नियुकत कर उसको समस्त कार्य की देख-भाल का भार सौंप दिया गया । उसको कार्य, व्यय आदि का यथोचित विवरण रखकर ईमानदारी से सब कार्य करना था । सेठ तो एक उच्च कोटि का कंजूस था । उसने मरम्मत में अत्यन्त अल्पराशि व्यय की, इस कारण मंदिर का जीर्णोद्घार भी उसी अनुपात में हुआ । उसने सब राशि व्यय कर दी तथा कुछ अंश स्वयं हड़प लिया और उसने अपनी गाँठ से एक पाई भी व्यय न की । उसकी वाणी अधिक रसीली थी, इसलिये उसने लोगों को किसी प्रकार समझा-बुझा लिया और कार्य पूर्ववत् ही अधूरा रह गया । लोग फिर संगठित होकर उसके पास जाकर कहने लगे – सेठ साहेब । कृपया कार्य शीघ्र पूर्ण कीजिये । आपके प्रत्यन के अभाव में यह कार्य पूर्ण होना कदापि संभव नहीं । अतः आप पुनः योजना बनाइये । हम और भी चन्दा आपको वसूल करके देंगे । लोगों ने पुनः चन्दा एकत्रित कर सेठ को दे दिया । उसने रुपये तो ले लिये, परन्तु पूर्ववत् ही शांत बैठा रहा । कुछ दिनों के पश्चात् उसकी स्त्री को भगवान् शंकर ने स्वप्न दिया कि उठो और मंदिर पर कलश चढ़ाओ । जो कुछ भी तुम इस कार्य में व्यय करोगी, मैं उसका सौ गुना अधिक तुम्हें दूँगा । उसने यह स्वप्न अपने पति को सुना दिया । सेठ बयभीत होकर सोचने लगा कि यह कार्य तो ज्यादा रुपये खर्च कराने वाला है, इसलिये उसने यह बात हँसकर टाल दी कि यह तो एक निरा स्वप्न ही है और उस पर भी कहीं विश्वास किया जा सकता है । यदि ऐसा होता तो महादेव मेरे समक्ष ही प्रगट होकर यह बात मुझसे न कह देते । मैं क्या तुमसे अधिक दूर था । यह स्वप्न शुभदायक नहीं । यह तो पति-पत्नी के सम्बन्ध बिगाड़ने वाला है । इसलिये तुम बिलकुल शांत रहो । भगवान् को ऐसे द्रव्य की आवश्यकता ही कहाँ, जो दानियों की इच्छा के विरुदृ एकत्र किया गया हो । वे तो सदैव प्रेम के भूखे है तथा प्रेम और भक्तिपूर्वक दिये गये एक तुच्छ ताँबे का सिक्का भी सहर्ष स्वीकार कर लेते है । महादेव ने पुनः सेठानी को स्वप्न में कह दिया कि तुम अपने पति की व्यर्थ की बातों और उनके पास संचित धन की ओर ध्यान न दो और न उनसे मंदिर बनवाने के लिये आग्रह ही करो । मैं तो तुम्हारे प्रेम और भक्ति का ही भूखा हूँ । जो कुछ भी तुम्हारी व्यय करने की इच्छा हो, सो अपने पास से करो । उसने अपने पति से विचार-विनिमय करके अपने पिता से प्राप्त आभूषणों को विक्रय करे का निश्चय किया । तब कृपण सेठ अशान्त हो उठा । इस बार उसने भगवान् को भी धोखा देने की ठान ली । उसने कौड़ी-मोल केवल एक हजार रुपयों में ही अपनी पत्नी के समस्त आभूषण स्वयं खरीद डाले और एक बंजर भूमि का भाग मंदिर के निमित्त लगा दिया, जिसे उसकी पत्नी ने भी चुपचाप स्वीकार कर लिया । सेठ ने जो भूमि दी, वह उसकी स्वयं की न थी, वरन् एक निर्धन स्त्री दुबकी की थी, जो इसके यहाँ दो सौ रुपयों में गहन रखी हुई थी । दीर्घकाल तक वह ऋण चुकाकर उसे वापस न ले सकी, इसलिये उस धूर्त कृपण ने अपनी स्त्री, दुबकी और भगवान को धोखा दे दिया । भूमि पथरीली होने के कारण उसमें उत्तम ऋतु में भी कोई पैदावार न होती थी । इस प्रकार यह लेन-देन समाप्त हुआ । भूमि उस मंदिर के पुजारी को दे दी गई, जो उसे पाकर बहुत प्रसन्न हुए ।


कुछ समय के पश्चात् एक विचित्र घटना घटित हुई । एक दिन बहुत जोरों से झंझावात आया और अति वृष्टि हुई । उस कृपण के घर पर बिजली गिरी और फलस्वरु पति-पत्नि दोनों की मृत्यु हो गई । दुबकी ने भी अंतिम श्वास छोड़ दी । अगले जन्म में वह कृपण मथुरा के एक ब्राहमण कुल में उत्पन्न हुआ और उसका नाम वीरभद्रप्पा रखा गया । उसकी धर्मपत्नी उस मंदिर के पुजारी के घर कन्या होकर उत्पन्न हुई और उसका नाम गौरी रखा गया । दुबकी पुरुष बनकर मंदिर के गुरव (सेवक) वंश में पैदा हुई और उसका नाम चेनबसाप्पा रखा गया । पुजारी मेरा मित्र था और बहुधा मेरे पास आता जाता, वार्तालाप करता और मेरे साथ चिलम पिया करता था । उसकी पुत्री गौरी भी मेरी भक्त थी । वह दिनोंदिन सयानी होती जा रही थी, जिससे उसका पिता भी उसके हाथ पीले करने की चिंता में रहता था । मैंने उससे कहा कि चिंता की कोई आवश्यकता नहीं, वर स्वयं तुम्हारे घर लड़की की खोज में आ जायेगा । कुछ दिनों के पश्चात् ही उसी की जाति का वीरभद्रप्पा नामक एक युवक भिक्षा माँगते-माँगते उसके घर पहुँचा । मेरी सम्मति से गौरी का विवाह उसके साथ सम्पन्न हो गया । पहले तो वह मेरा भक्त था, परन्तु अब वह कृतघ्न बन गया । इस नूतन जन्म में भी उसकी धन-तृष्णा नष्ट न हुई । उसने मुझसे कोई उघोग धंधा सुझाने को कहा, क्योंकि इस समय वह विवाहित जीवन व्यतीत कर रहा था । तभी एक विचित्र घटना हुई । अचानक ही प्रत्येक वस्तुओं के बाव ऊँचे चढ़ गये । गौरी के भाग्य से जमीन की माँग अधिक होने लगी और समस्त भूमि एक लाख रुपयों में आभूषणों के मूल्य से 100 गुना अधिक मूल्य में बिक गई । ऐसा निर्णय हुआ कि 50 हजार रुपये नगद और 2000 रुपये प्रतिवर्ष किश्त पर चुकता कर दिये जायेंगे । सबको यह लेनदेन स्वीकार था, परन्तु धन में हिससे के कारण उनमें परस्पर विवाद होने लगा । वे परामर्श लेने मेरे पास आये और मैंने कहा कि यह भूमि तो भगवान् की है, जो पुजारी को सौंपी गई थी । इसकी स्वामिनी गौरी ही है और एक पैसा भी उसकी इच्छा के विरुदृ खर्च करना उचित नहीं तथा उसके पति का इस पर कोई अधिकार नहीं है । मेरे निर्णय को सुनकर वीरभद्रप्पा मुझसे क्रोधित होकर कहने लगा कि तुम गौरी को फुसाकर उसका धन हड़पना चाहते हो । इन शब्दों को सुनकर मैं बगवत् नाम लेकर चुप बैठ गया । वीरभद्र ने अपनी स्त्री को पीटा भी  । गौरी ने दोपहर के समय आकर मुझसे कहा कि आप उन लोगों के कहने का बुरा न मानें । मैं तो आपकी लड़की हूँ । मुझ पर कृपादृष्टि ही रखें । वह इस प्रकार मेरी सरण मे आई तो मैंने उसे वचन दे दिया कि मैं सात समुद्र पार कर भी तुम्हारी रक्षा करुँगा । तब उस रात्रि को गौरी को एक दृष्टांत हुआ । महादेव ने आकर कहा कि यह सब सम्पत्ति तुम्हारी ही है और इसमें से किसी को कुछ न दो । चेनबसाप्पा की यह सलाह से कुछ राशि मंदिर के कार्य के लिये खर्च करो । यदि और किसी भी कार्य में तुम्हे खर्च करने की इच्छा हो तो मसजिद में जाकर बाबा (स्वयं मैं) के परामर्श से करो । गौरी ने अपना दृष्टांत मुझे सुनाया और मैंने इस विषय में उचित सलाह भी दी । मैंने उससे कहा कि मूलधन तो तुम स्वयं ले लो और ब्याज की आधी रकम चेनबसाप्पा को दे दो । वीरभद्र का इसमें कोई सम्बन्ध नहीं है । जब मैं यह बात कर ही रहा था, वीरभद्र और चेनबसाप्पा दोनों ही वहाँ झगड़ते हुए आये । मैंने दोनों को शांत करने का प्रयत्न किया और गौरी को हुआ महादेव का स्वप्न भी सुनाया । वीरभद्र क्रोध से उन्हत हो गया और चेनबसाप्पा को टुकड़े-टुकड़े कर मार डालने की धमकी देने लगा । चेनबसाप्पा बड़ा डरपोक था । वह मेरे पैर पकड़कर रक्षा की प्रार्थना करने लगा । तब मैंने शत्रु के पाश से उसका छुटकारा करा दिया । कुछ समय पश्चात् ही दोनों की मृत्यु हो गई । वीरभद्र सर्प बना और चेनबसाप्पा मेंढ़क । चेनबासप्पा की पुकार सुनकर और अपने पूर्व वचन की स्मृति करके यहाँ आया और इस तरह से उसकी रक्षा कर मैंने अपने वचन पूर्ण किये । संकट के समय भगवान् दौड़कर अपने भक्त के पास जाते है । उसने मुझे यहाँ भेजकर चेनबसाप्पा की रक्षा कराई । यह सब ईश्वरीय लीला ही है ।


शिक्षा

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इस कथा की यही शिक्षा है कि जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है, जब तक कि भोग पूर्ण नहीं होते । पिछला ऋण और अन्य लोगों के साथ लेन-देन का व्यवहार जब तक पूर्ण नहीं होता, तब तक छुटकारा भी संभव नहीं है । धनतृष्णा मनुष्य का पतन कर देती है और अन्त में इससे ही वह विनाश को प्राप्त होता है ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।



-: आज का साँईं सन्देश :-
सागर में दीपक जले,
नाविक राह दिखाय ।
साँईं बाबा चरित सुन,
भवसागर तर जाय ।।
साँईं बाबा का चरित,
अमरित पावन होय ।
भाव बन्धन से मुक्त कर,
मोक्ष प्रदाता होय ।।   
 

Wednesday, 8 April 2020

इक बूँद प्यार की तुम छलका दो साईं बाबा

ॐ सांई राम


थोडा सा रहम मुझ पर कर दो साईं बाबा
इक बूँद प्यार की तुम छलका दो साईं बाबा
मेरे अल्लाह साईं बाबा मेरे मौला साईं बाबा
मेरे  ईसा साईं बाबा मेरे नानक साईं बाबा



सुनते हैं दया तेरी हर भक्त पे होती है
थोड़ी सी दया मुझ पर बरसा दो साईं बाबा
थोडा सा रहम मुझ पर कर दो साईं बाबा
मेरे अल्लाह साईं बाबा मेरे मौला साईं बाबा

हर ग़म का सताया हुआ फ़रियाद कर रहा है
अब चाहे बना दे तू या मिटा दे साईं बाबा
थोडा सा रहम मुझ पर कर दो साईं बाबा
मेरे अल्लाह साईं बाबा मेरे मौला साईं बाबा

मेरी जिंदगी की शम्मा बुझती नज़र है आये
अब चाहे जला दे तू या बुझा दे साईं बाबा
थोडा सा रहम मुझ पर कर दो साईं बाबा
मेरे अल्लाह साईं बाबा मेरे मौला साईं बाबा

मेरे अल्लाह साईं बाबा मेरे मौला साईं बाबा
मेरे  ईसा साईं बाबा मेरे नानक साईं बाबा
मेरे अल्लाह साईं बाबा मेरे मौला साईं बाबा
मेरे  ईसा साईं बाबा मेरे नानक साईं बाबा
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Tuesday, 7 April 2020

साईं नाम की धुन में रह के साईं की राह पे चलना

ॐ सांई राम


साईं नाम की धुन में रह के
साईं की राह पे चलना
छोडो माया की नगरी को
कभी  कष्ट पड़े न सहना


मन को वश में तू कर ले और
बंधन   माया के तोड़ सभी
नाता साई से जोड़ के तू
भर ले अपनी खाली झोली
मोह माया से बचकर मनवा तू
अपने कर्मों को करना
छोडो माया की नगरी को
कभी  कष्ट पड़े न सहना

साईं नाम की धुन में रह के
साईं की राह पे चलना
छोडो माया की नगरी को
कभी  कष्ट पड़े न सहना


रख   संयम   मन तू मेरे   सदा
जब भी तुझे कष्ट सताते  हैं
तेरे कर्मों के फल हैं  जो
आकर तुझको यूँ सताते हैं
सत कर्मों को अब करना तू
हर जीव की सेवा करना
छोडो माया की नगरी को
कभी  कष्ट पड़े न सहना

साईं नाम की धुन में रह के
साईं की राह पे चलना
छोडो माया की नगरी को
कभी  कष्ट पड़े न सहना


रख श्रद्धा साबुरी मन में सदा
साईं जी यही सिखाते हैं
सबका मालिक है एक यही
मेरे साईं जी  बतलाते हैं
मन में साईं नाम को जपना और
साईं चरणों में रहना
छोडो माया की नगरी को
कभी  कष्ट पड़े न सहना

साईं नाम की धुन में रह के
साईं की राह पे चलना
छोडो माया की नगरी को
कभी  कष्ट पड़े न सहना

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Monday, 6 April 2020

ॐ सांई राम


सुना है शिर्डी में एक फकीर आया है
सुना है शिर्डी में एक फकीर आया है
जिसने तन पर चिथड़े पहने हैं
सर पर साफा बाँधा है,
और हाथों में एक इंट साथ लाया है,
सुना है शिर्डी में एक फकीर आया है
कोई कहता है, वो चाँद भाई के साथ आया है,
कोई कहता है, वो पहले भी आया था

और अब पुनः आया है,
कोई कहता है, वो यवन है
कोई कहता है, नहीं वो हिन्दू है
जो भी वो हो, वो शिर्डी गाँव में बहार लाया है
सुना है शिर्डी में एक फकीर आया है
कोई कह रहा था, उसके चेहरे पर नूर है
और आँखों में प्यार साथ लाया है,
उसके शरीर से सुगंध आती है
सुना है, जो उसे देखे, मोहित हो जाता है
उसे देखे तो मन व्याकुल हो जाता है
कुछ सुध-बुध नहीं रहती
और मन प्रसंचित और एकाग्र हो जाता है
सुना है शिर्डी में एक फकीर आया है
जो भूमि बंजर थी वहां अब खेत लहराते हैं
जिन कुओं में पानी नहीं था
वहां फकीर ने अपने हाथों से गुलाब फेंके
और देखते ही देखते कुओं से मीट्ठे पानी की फुहार उठी
वो हिन्दुओं को 'सबका मालिक एक' और
यवनों को 'इश्वर भला करेगा' कहता है
रातों को शिर्डी की गलियों में घूमता है
और दिन भर मस्जिद में बेठता है
कोई कुछ पूछे तो अपनी आँखों से बोलता है
शिर्डी के पशु-पक्षी, और लोग उसके दीवाने है
जहाँ वो जाए वो उसके पीछे-पीछे जाते है
और अब तो ये आलम है, वो मुस्कुराये तो वो मुस्कुराते हैं
की गलियां सूनी थी, वहां अब ढोल-नगाड़े बजते है
कोई कह रहा था, मस्जिद के अन्दर से
जोर-जोर से हसने की आवाजे आती हैं
बच्चे उसके साथ खेलते है
और बड़े उसे दो टूक निहारते रहते है
कोई कह रहा था,
अब वहां का वातावरण ही बदल गया है
हर कोई प्रेम से जीना चाहता है,
वहां आपस में प्यार है
सभी की आँखों में एक अजीब सा खुमार है
ऐसा लगता है, मानो
फूल पूर्णरूप से खिलना चाहते हैं
सुगंध चारों और बिखेरना चाहते है
आसमान भी धरती पर आना चाहता है
उस फकीर के कदमो को चूमना चाहता है
सूरज को भी फक्र है की वो शिर्डी में
किरने (रोशिनी) बिखेरता है
चन्द्रमा को देखो, तो लगता है
वो वादा करता है मैं उस फकीर को
अब यहाँ से जाने ना दूंगा
चारों और अपने प्रेम का 'Aura' बना दूंगा
और जो भी यहाँ आएगा, उसे निखार दूंगा
शिर्डी की मिटटी भी बोलती है
मुझे पता था ये फकीर जरूर आएगा
और मेरा उद्धार कर जायेगा
लगता है उसको भी पता था
उस जैसा कोई तो आएगा
जो षड्रिपूओं पर विजय प्राप्त कर
उस जैसा बन कर दिखा जायेगा
लोगो को जीना सिखा जायेगा
उनके मन में प्रेम को अंकुरित कर जायेगा
उनको बता जायेगा, वो शिर्डी में ही नहीं, कण-कण में हैं
चलो सखी, हम भी चले
उस प्रेम के अवतार को देख ले
सुना है शिर्डी में एक फकीर आया है..

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Sunday, 5 April 2020

एक तुम ही तो हो साईं, जिसे दिल का हाल सुनाऊं मैं,

ॐ सांई राम


किसे अपनी व्यथा बताऊँ मैं,
एक तुम ही तो हो साईं,
जिसे दिल का हाल सुनाऊं मैं,
जीवन मैं सब कुछ देखा

तुम जैसा फकीर ना देखा
जो सब कुछ लुटा कर कहता है
मेरे बच्चे कुछ और लाऊं मैं,
बाबा यह सब किसको बताऊँ मैं,
अपने मन की व्यथा किसे समझाऊं मैं,
लोग कहते हैं पगला हूँ दीवाना हूँ मैं,
बाबा की मस्ती का मस्ताना हूँ मैं,
बाबा की धुनी का परवाना हूँ मैं ||

!! सबका मालिक एक !!Kindly Provide Food & clean drinking Water for Birds & Other Animals,This is also a kind of SEWA.

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Gautam Budh Nagar, Uttar Pradesh. INDIA.