शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 15 February 2020

साईं बाबा अपनी लाली विच सानूँ रंग दे

ॐ सांई राम



साईं बाबा अपनी लाली विच सानूँ रंग दे

तेरे दीवाने हैं मंगते पुराने हैं
साडी वी झोली अज्ज भर दे, अपनी लाली विच सानूँ रंग दे

जित्थे तेरा ज़िकर है दाता ओह दुनियाँ विच तेरी थांह है
कल मिलेया है ऐ आलम तेरी बख्शिश तेरियां ऐ
कर्म कमाना है बिगड़ी बनाना है चर्चा सुनी है तेरे दर ते
अपनी लाली विच सानूँ रंग दे

बाबा तेरे दर ते आ के बैठे रहंदे मंगते सारे,
ऐहो अरजां करदे रहंदे दे कुछ सानूँ पालनहारे
तेरे सहारे ते, तेरे द्वारे ते करम गरीबाँ ते कर दे
अपनी लाली विच सानूँ रंग दे

बाबा तेरे दर ते आ के सर संगतां डा झुक जांदा ऐ
रौनक तेरी देख के दाता हिज़र दा पैंडा हिल जांदा ऐ
खुशियाँ जो आइयाँ ने, रहमत जो पाइयाँ ने
तेरे हाँ बन्दे सानूँ वर दे, अपनी लाली विच सानूँ रंग दे
ॐ सांई राम-: आज का साईं सन्देश :-

साईं का व्यक्तित्व हो,
साईं चरित महान |
अवलोकन हम सब करें,
पावन पावें ज्ञान ||

शान्ति और वैराग्य से,
वैष्णवी भक्ति पाय |
भवसागर भारी कठिन,
बाबा पार लगाय ||
 
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Friday, 14 February 2020

मोहे झलक दिखा दो साँई, याद बड़ी तड़पाये रे

ॐ सांई राम



तुम सागर ठहरे हम गागर ठहरे, हाये प्राण तुम्हीं को ध्यायें रे
मोहे झलक दिखा दो साँई, याद बड़ी तड़पाये रे

आकुल-व्याकुल नैन हैं, सूने हैं दिन रैन रे
साँई के दर का कोई, रस्ता तो बतलाये रे

श्रद्धा और सबूरी का देते तुम संदेश रे,
भक्ति के रस में प्रभु, तन मन घुलता जाये रे

शिर्डी वाले साँई की महिमा अपरम्पार रे
सूरज तुझसे पूछकर, चढ़ता ढलता जाये रे

पत्थर पूजन से नहीं मिलते तुम चितचोर रे
मौसम पर मौसम मेरा खाली बीता जाये रे

तुम सागर ठहरे हम गागर ठहरे, हाये प्राण तुम्हीं को ध्यायें रे
मोहे झलक दिखा दो साँई याद बड़ी तड़पाये रे


ॐ सांई राम
-: आज का साईं सन्देश :-

पंढरपुर में दामजी,
समरथ, गढ़ के साथ |
वाड़ी में नरसिंह हुए,
शिर्डी साईंनाथ ||

तीर्थ कई महाराष्ट्र में,
पावन सभी कहाय |
शिर्डी में साईं बसे,
तीरथराज कहाय ||
बाबा की कृपा हम सब पर बनी रहे |

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Thursday, 13 February 2020

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 38

ॐ साँई राम


आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं , हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 38

बाबा की हंड़ी, नानासाहेब द्अघारा देव-मूर्ति की उपेक्षा, नैवेघ वितरण, छाँछ का प्रसाद ।
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गत अध्याय में चावड़ी के समारोह का वर्णन किया गया है । अब इस अध्याया में बाबा की हंडी तथा कुछ अन्य विषयों का वर्णन होगा ।


प्रस्तावना
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हे सदगुरु साई । तुम धन्य हो । हम तुम्हें नमन करते है । तुमने विश्व को सुख पहुँचाय और भक्तों का कल्याण किया । तुम उदार हृदय हो । जो भक्तगण तुम्हारे अभय चरण-कमलों में अपने को समर्पित कर देते है, तुम उनकी सदैव रक्षा एवं उद्घार किया करते हो । भक्तों के कल्याण और परित्राण के निमित्त ही तुम अवतार लेते हो । ब्रहम के साँचे में शुद्घ आत्मारुपी द्रव्य ढाला गया और उसमें से ढलकर जो मूर्ति निकली, वही सन्तों के सन्त श्री साईबाबा है । साई स्वयं ही आत्माराम और चिरआनन्द धाम है । इस जीवन के समस्त कार्यों को नश्वर जानकर उन्होंने भक्तों को निष्काम और मुक्त किया ।


बाबा की हंड़ी
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मानव धर्म-शास्त्र में भिन्न-भिन्न युगों के लिये भिन्न-भिन्न साधनाओं का उन्नेख किया गया है । सतयुग में तप, त्रेता में ज्ञान, द्घापर में यज्ञ और कलियुग में दान का विशेष माहात्म्य है । सर्व प्रकार के दानों में अन्नदान श्रेष्ठ है । जब मध्याहृ के समय हमें भोजन प्राप्त नहीं होता, तब हम विचलित हो जाते है । ऐसी ही स्थिति अन्य प्राणियों की अनुभव कर जो किसी भिक्षुक या भूखे को भोजन देता है, वही श्रेष्ठ दानी है । तैत्तिरीयोपनिषद् में लिखा है कि अन्न ही ब्रहमा है और उसीसे सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है तथा उससे ही वे जीवित रहते है और मृत्यु के उपरांत उसी में लय भी हो जाते है । जब कोई अतिथि दोपहर के समय अपने घर आता है तो हमारा कर्तव्य हो जाता है कि हम उसका अभिन्नदन कर उसे भोजन करावे । अन्य दान जैसे-धन, भूमि और वस्त्र इत्यादि देने में तो पात्रता का विचार करना पड़ता है, परन्तु अन्न के लिये विशेष सोचविचार की आवश्यकता नहीं है । दोपहर के समय कोई भी अपने द्घार पर आवे, उसे शीघ्रभोजन कराना हमारा परम कर्त्व्य है । प्रथमतः लूले, लंगड़े, अन्धे या रुग्ण भिखारियों को, फिर उन्हें, जो हाथ पैर से स्वस्थ है और उनसभी के बाद अपने संबन्धियों को भोजन कराना चाहिये । अन्य सभी की अपेक्षा पंगुओं को भोजन कराने का मह्त्व अधिक है । अन्नदान के बिना अन्य सब प्रकार के दान वैसे ही अपूर्ण है, जैसे कि चन्द्रमा बिना तारे, पदक बिना हार, कलश बिना मन्दिर, कमलरहित तलाब, भक्तिरहित, भजन, सिन्दूररहित सुहागिन, मधुर स्वरविहीन गायन, नमक बिना पकवान । जिस प्रकार अन्य भोज्य पदार्थों में दाल उत्तम समझी जाती है, उसी प्रकार समस्त दानों में अन्नदान श्रेष्ठ है । अब देखें कि बाबा किस प्रकार भोजन तैयार कराकर उसका वितरण किया करते थे ।

हम पहले ही उल्लेख कर चुके है कि बाबा अल्पाहारी थे और वे थोड़ा बहुत जो कुछ भी खाते थे, वह उन्हें केवल दो गृहों से ही भिक्षा में उपलब्ध हो जाया करता था । परन्तु जब उनके मन में सभी भक्तों को भोजन कराने की इच्छा होती तो प्रारम्भ से लेकर अन्त तक संपूर्ण व्यवस्था वे स्वयं किया करते थे । वे किसी पर निर्भर नहीं रहते थे और न ही किसी को इस संबंध में कष्ट ही दिया करते थे । प्रथमतः वे स्वयं बाजार जाकर सब वस्तुएं – अनाज, आटा, नमक, मिर्ची, जीरा खोपरा और अन्य मसाले आदि वस्तुएँ नगद दाम देकर खरीद लाया करते थे । यहाँ तक कि पीसने का कार्य भी वे स्वयं ही किया करते थे । मसजिद के आँगन में ही एक भट्टी बनाकर उसमें अग्नि प्रज्वलित करके हंडी के ठीक नाप से पानी भर देते थे । हंडी दो प्रकार की थी – एक छोटी और दूसरी बड़ी । एक में सौ और दूसरी में पाँच सौ व्यक्तियों का भोजन तैयार हो सकता था । कभी वे मीठे चावल बनाते और कभी मांसमिश्रित चावल (पुलाव) बनाते थे । कभी-कभी दाल और मुटकुले भी बना लेते थे । पत्थर की सिल पर महीन मसाला पीस कर हंडी में डाल देते थे । भोजन रुचिकर बने, इसका वे भरसक प्रयत्न किया करते थे । ज्वार के आटे को पानी में उबाल कर उसमें छाँछ मिलाकर अंबिल (आमर्टी) बनाते और भोजन के साथ सब भक्तों को समान मात्रा में बाँट देते थे । भोजन ठीक बन रहा है या नहीं, यह जानने के लिये वे अपनी कफनी की बाँहें ऊपर चढ़ाकर निर्भय हो उतबलती हंडी में हाथ डाल देते और उसे चारों ओर घुमाया करते थे । ऐसा करने पर भी उनके हाथ पर न कोई जलन का चिन्ह और न चेहरे पर ही कोई व्यथा की रेखा प्रतीत हुआ करती थी । जब पूर्ण भोजन तैयार हो जाता, तब वे मसजिद सम बर्तन मँगाकर मौलवी से फातिहा पढ़ने को कहते थे, फिर वे म्हालसापति तथा तात्या पाटील के प्रसाद का भाग पृथक् रखकर शेष भोजन गरीब और अनाथ लोगों को खिलाकर उन्हें तृप्त करते थे । सचमुच वे लोग धन्य थे । कितने भाग्यशाली थे वे, जिन्हें बाबा के हाथ का बना और परोसा हुआ भोजन खाने को प्राप्त हुआ ।



यहाँ कोई यह शंका कर सकता है कि क्या वे शाकाहारी और मांसाहारी भोज्य पदार्थों का प्रसाद सभी को बाँटा करते थे । इसका उत्तर बिलकुल सीधा और सरल है । जो लोग मांसाहारी थे, उन्हें हण्डी में से दिया जाता था तथा शाकाहारियों को उसका स्पर्श तक न होने देते थे । न कभी उन्होंने किसी को मांसाहार का प्रोत्साहन ही दिया और न ही उनकी आंतरिक इच्छा थी कि किसी को इसके सेवन की आदत लग जाये । यह एक अति पुरातन अनुभूत नियम है कि जब गुरुदेव प्रसाद वितरण कर रहे हो, तभी यदि शिष्य उसके ग्रहण करने में शंकित हो जाय तो उसका अधःपतन हो जाता है । यह अनुभव करने के लिये कि शिष्य गण इस नियम का किस अंश तक पालन करते है, वे कभी-कभी परीक्षा भी ले लिया करते थे । उदाहरँणार्थ एक एकादशी के दिन उन्होंने दादा केलकर को कुछ रुपये देकर कुछ मांस खरीद लाने को कहा । दादा केलकर पूरे कर्मकांडी थे और प्रायः सभी नियमों का जीवन में पालन किया करते थे । उनकी यह दृढ़ भावना थी कि द्रव्य, अन्न और वस्त्र इत्यादि गुरु को भेंट करना पर्याप्त नहीं है । केवल उनकी आज्ञा ही शीघ्र कार्यान्वित करने से वे प्रसन्न हो जाते है । यही उनकी दक्षिणा है । दादा शीघ्र कपडे पहिन कर एक थैला लेकर बाजार जाने के लिये उघत हो गये । तब बाबा ने उन्हें लौटा लिया और कहा कि तुम न जाओ, अन्य किसी को भेज दो । दादा ने अपने नौकर पाण्डू को इस कार्य के निमित्त भेजा । उसको जाते देखकर बाबा ने उसे भी वापस बुलाने को कहकर यह कार्यक्रम स्थगित कर दिया ।

ऐसे ही एक अन्य अवसर पर उन्होंने दादा से कहा कि देखो तो नमकीन पुलाव कैसा पका है । दादा ने यों ही मुंह देखी कह दिया कि अच्छा है । तब वे कहने लगे कि तुमने न अपनी आँखों से ही देखा है और न जिहा से स्वाद लिया, फिर तुमने यह कैसे कह दिया कि उत्तम बना है । थोड़ा ढक्कन हटाकर तो देखो । बाबा ने दादा की बाँह पकड़ी और बलपूर्वक बर्तन में डालकर बोले – थोड़ासा इसमें से निकालो और अपना कट्टरपन छोड़कर चख कर देखो । जब माँ का सच्चा प्रेम बच्चे पर उमड़ आता है, तब माँ उसे चिमटी भरती है, परन्तु उसका चिल्लाना या रोना देखकर वह उसे अपने हृदय से लगाती है । इसी प्रकार बाबा ने सात्विक मातृप्रेम के वश हो दादा का इस प्रकार हाथ पकड़ा । यथार्थ में कोई भी सन्त या गुरु कभी भी अपने कर्मकांडी शिष्य को वर्जित भोज्य के लिये आग्रह करके अपनी अपकीर्ति कराना पसन्द न करेगा ।

इस प्रकार यह हंडी का कार्यक्रम सन् 1910 तक चला और फिर स्थगित हो गया । जैसा पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है, दासगणू ने अपने कीर्तन द्घारा समस्त बम्बई प्रांत में बाबा की अधिक कीर्ति फैलई । फलतः इस प्रान्त से लोगों के झुंड के झुंड शिरडी को आने लगे और थोड़े ही दिनों में शिरडी पवित्र तीर्थ-क्षेत्र बन गया । भक्तगण बाबा को नैवेघ अर्पित करने के लिये नाना प्रकारके स्वादिष्ट पदार्थ लाते थे, जो इतनी अधिक मात्रा में एकत्र हो जाता था कि फकीरों और भिखारियों को सन्तोषपूर्वक भोजन कराने पर भी बच जाता था । नैवेघ वितरण करने की विधि का वर्णन करने से पूर्व हम नानासाहेब चाँदोरकर की उस कथा का वर्णन करेंगे, जो स्थानीय देवी-देवताओं और मूर्तियों के प्रति बाबा की सम्मान-भावना की घोतक है ।

नानासाहेब द्घारा देव-मूर्ति की उपेक्षा
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कुछ व्यक्ति अपनी कल्पना के अनुसार बाबा को ब्राहमण तथा कुछ उन्हें यवन समझा करते थे, परन्तु वास्तव में उनकी कोई जाति न थी । उनकी और ईश्वर की केवल एक जाति थी । कोई भी निश्चयपूर्वक यह नहीं जानता कि वे किस कुल में जनमें और उनके मातापिता कौन थे । फिर उन्हें हिन्दू या यवन कैसे घोषित किया जा सकता है । यदि वे यवन होते तो मसजिद में सदैव धूनी और तुलसी वृन्दावन ही क्यों लागते और शंख, घण्टे तथा अन्य संगीत वाघ क्यों बजने देते । हिन्दुओं की विविध प्रकार की पूजाओं को क्यों स्वीकार करते । यदि सचमुच यवन होते तो उनके कान क्यों छिदे होते तथा वे हिन्दू मन्दिरों का स्वयं जीर्णोद्घार क्यों करवाते । उन्होंने हिन्दुओं की मूर्तियों तथा देवी-देवताओ की जरा सी उपेक्षा भी कभी सहन नहीं की ।

एक बार नानासाहेब चाँदोरक अपने साढू (साली के पति) श्री बिनीवले के साथ शिरडी आये । जब वे मसजिद में पहुँचे, बाबा वार्तालाप करते हुए अनायास ही क्रोधित होकर कहने लगे कि तुम दीर्घकाल से मेरे सान्ध्य में हो, फिर भी ऐसा आचरण क्यों करते हो । नानासाहेब प्रथमतः इन शब्दों का कुछ भी अर्थ न समझ सके । अतः उन्होंने अपना अपराध समझाने की प्रार्थना की । प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा कि तुम कब कोपरगाँव आये और फिर वहाँ से कैसे शिरडी आ पहुँचे । तब नानासाहेब को अपनी भूल तुरन्त ही ज्ञात हो गयी । उनका यह नियम था कि शिरडी आने से पूर्व वे कोपरगाँव में गोदावरी के तट पर स्थित श्री दत्त का पूजन किया करते थे । परन्तु रिश्तेदार के दत-उपासक होने पर भी इस बार विलम्ब होने के भय से उन्होंने उनको भी दत्त मंदिर में जाने से हतोत्साहित किया और वे दोनों सीधे शिरडी चले आये थे । अपना दोष स्वीकार कर उन्होंने कहा कि गोदावरी स्नान करते समय पैर में एक बड़ा काँटा चुभ जाने के कारण अधिक कष्ट हो गया था । बाबा ने काह कि यह तो बहुत छोटासा दंड था और उन्हें भविष्य में ऐसे आचरण के लिये सदैव सावधान रहने की चेतावनी दी ।
नैवेघ-वितरण
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अब हम नैवेघ-वितरण का वर्णन करेंगे । आरती समाप्त होने पर बाबा से आर्शीवाद तथा उदी प्राप्त कर जब भक्तगण अपने-अपने घर चले जाते, तब बाबा परदे के पीछे प्रवेश कर निम्बर के सहारे पीठ टेककर भोजन के लिये आसन ग्रहण करते थे । भक्तों की दो पंक्तियाँ उनके समीप बैठा करती थी । भक्तगण नाना प्रकार के नैवेघ, पीरी, माण्डे, पेड़ा बर्फी, बांसुदीउपमा (सांजा) अम्बे मोहर (भात) इत्यादि थाली में सजा-सजाकर लाते और जब तक वे नैवेघ स्वीकार न कर लेते, तब तक भक्तगण बाहर ही प्रतीक्षा किया करते थे । समस्त नैवेघ एकत्रित कर दिया जाता, तब वे स्वयं ही भगवान को नैवेघ अर्पण कर स्वयं ग्रहण करते थे । उसमें से कुछ भाग बाहर प्रतीक्षा करने वालों को देकर शेष भीतर बैठे हुए भक्त पा लिया करते थे । जब बाबासबके मध्य में आ विराजते, तब दोनों पंक्तियों में बैठे हुए भक्त तृप्त होकर भोजन किया करते थे । बाबा प्रायः शामा और निमोणकर से भक्तों को अच्छी तरह भोजन कराने और प्रत्येक की आवश्यकता का सावधानीपूर्वक ध्यान रखने को कहते थे । वे दोनों भी इस कार्य को बड़ी लगन और हर्ष से करते थे । इस प्रकार प्राप्त प्रत्येक ग्रास भक्तों को पोषक और सन्तोषदायक होता था । कितना मधुर, पवित्र, प्रेमरसपूर्ण भोजन था वह । सदा मांगलिक और पवित्र ।

छाँछ (मठ्ठा) का प्रसाद
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इस सत्संग में बैठकर एक दिन जब हेमाडपंत पूर्णतः भोजन कर चुके, तब बाबा ने उन्हें एक प्याला छाँछ पीने को दिया । उसके श्वेत रंग से वे प्रसन्न तो हुए, परन्तु उदर में जरा भी गुंजाइश न होने के कारण उन्होंने केवल एक घूँट ही पिया । उनका यह उपेक्षात्मक व्यवहार देखकर बाबा ने कहा कि सब पी जाओ । ऐसा सुअवसर अब कभी न पाओगे । तब उन्होंने पूरी छाँछ पी ली, किन्तु उन्हे बाबा के सांकेतिक वचनों का मर्म शीघ्र ही विदित हो गया, क्योंकि इस घटना के थोड़े दिनों के पश्चात् ही बाबा समाधिस्थ हो गये ।

पाठकों । अब हमें अवश्य ही हेमाडपंत के प्रति कृतज्ञ होना चाहिये, क्योंकि उन्होंने तो छाँछ का प्याला पिया, परन्तु वे हमारे लिये यथेष्ठ मात्रा में श्री साई-लीला रुपी अमृत दे गये । आओ, हम उस अमृत के प्याले पर प्याले पीकर संतुष्ट और सुखी हो जाये ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

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Wednesday, 12 February 2020

फिर कहाँ है मेरा साईं, मेरा बाबा

ॐ सांई राम



साईं

ये समझाया और समझा जा नहीं सकता है

पर इतनी बात तो पक्की है कि
मेरा साईं मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे , चर्च में नहीं है
मेरा साईं मूर्ति, पत्थर या कागज़ में नहीं है
मेरा साईं भगवा कपड़ों में नहीं है
मेरा साईं खुल्ली धोती या कोई बोदी में भी नहीं है
मेरा साईं नदियों, गुफाओं या पहाड़ों में भी नहीं है

फिर कहाँ है मेरा साईं, मेरा बाबा 


चलो मैं ही बताता हूँ...
 

मेरा साईं हर किसी के अन्दर है

मेरे साईं एक विशवास है

एक नियम है
एक एहसास है
एक सच है
जिस मन में साईं है ...वो मन ही मंदिर है
किसी में भी साईं जैसे गुणों का होना ही साईं का होना है
जैसे सूरज औरों के लिए जलता है
जैसे जल औरों को जीवन देता है
जैसे हवा औरों को सकून देती है
जैसे धरती माँ औरों को सब कुछ देती है
जैसे पेड़ अपने फल औरों को देते है
ठीक वैसे ही जो इन्सान सब औरों के लिए करता है
वो ही साईं जैसा है...
बाकी सब तो........................
 ..................
 
-: आज का साईं सन्देश :-
बड़भागी गोदावरी,
तट हैं सभी महान ।
अवतारे सन्तन कई,
जाने सकल जहान ।।
महाराष्ट्र, अहमदाबाद,
तालुक कोपरगाँव ।
शिर्डी में साईं बसें,
नीम वृक्ष की छाँव ।।
 
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Tuesday, 11 February 2020

ये रामायण है पुण्य कथा श्री राम की,

ॐ सांई राम


 हम कथा सुनाते राम सकल गुणधाम की ये रामायण है पुण्य कथा श्री राम की,

जम्बुद्वीपे, भरत खंडे. आर्यावर्ते, भारतवर्षे, इक नगरी है विख्यात अयोध्या नाम की,यही जन्म भूमि है परम पूज्य श्री राम की,हम कथा सुनाते राम सकल गुणधाम की,ये रामायण है पुण्य कथा श्री राम की, ये रामायण है पुण्य कथा श्री राम की,

रघुकुल के राजा धर्मात्मा, चक्रवर्ती दशरथ पुण्यात्मा,संतति हेतु यज्ञ करवाया,धर्म यज्ञ का शुभ फल पाया,नृप घर जन्मे चार कुमारा, रघुकुल दीप जगत आधारा,चारों भ्रातों के शुभ नामा, भरत, शत्रुघ्न, लक्ष्मण रामा,गुरु वशिष्ठ के गुरुकुल जाके, अल्प काल विद्या सब पाके,पूरण हुयी शिक्षा, रघुवर पूरण काम की,

मृदु स्वर, कोमल भावना, रोचक प्रस्तुति ढंग,इक इक कर वर्णन करें,लव कुश राम प्रसंग,विश्वामित्र महामुनि राई,तिनके संग चले दोऊ भाई,कैसे राम ताड़का मारी, कैसे नाथ अहिल्या तारी,

मुनिवर विश्वामित्र तब, संग ले लक्ष्मण राम,सिया स्वयंवर देखने, पहुंचे मिथिला धाम,जनकपुर उत्सव है भारी,जनकपुर उत्सव है भारी,अपने वर का चयन करेगी सीता सुकुमारी,जनकपुर उत्सव है भारी,जनक राज का कठिन प्रण, सुनो सुनो सब कोई,जो तोडे शिव धनुष को, सो सीता पति होय,को तोरी शिव धनुष कठोर, सबकी दृष्टि राम की ओर,राम विनय गुण के अवतार,गुरुवार की आज्ञा शिरधार,सहज भाव से शिव धनु तोड़ा,जनकसुता संग नाता जोड़ा,रघुवर जैसा और न कोई,सीता की समता नही होई, दोउ करें पराजित कांति कोटि रति काम की,

सब पर शब्द मोहिनी डारी, मन्त्र मुग्ध भये सब नर नारी,यूँ दिन रैन जात हैं बीते, लव कुश नें सबके मन जीते,वन गमन, सीता हरण, हनुमत मिलन, लंका दहन, रावण मरण, अयोध्या पुनरागमन.सविस्तार सब कथा सुनाई, राजा राम भये रघुराई,राम राज आयो सुख दाई, सुख समृद्धि श्री घर घर आई

काल चक्र नें घटना क्रम में ऐसा चक्र चलाया,राम सिया के जीवन में फिर घोर अँधेरा छाया,अवध में ऐसा, ऐसा इक दिन आया,निष्कलंक सीता पे प्रजा नें मिथ्या दोष लगायाचल दी सिया जब तोड़ कर सब स्नेह नाते मोह के,पाषण हृदयों में न अंगारे जगे विद्रोह के,ममतामयी माँओं के आँचल भी सिमट कर रह गये,गुरुदेव ज्ञान और नीति के सागर भी घट कर रह गए,न रघुकुल न रघुकुलनायक, कोई न सिय का हुआ सहायक,मानवता को खो बैठे जब, सभ्य नगर के वासी,तब सीता को हुआ सहायक, वन का इक सन्यासी,उन ऋषि परम उदार का वाल्मीकि शुभ नाम,सीता को आश्रय दिया ले आए निज धाम,रघुकुल में कुलदीप जलाये, राम के दो सुत सिय नें जाय, 
श्रोतागण, जो एक राजा की पुत्री है, एक राजा की पुत्रवधू है,और एक चक्रवर्ती राजा की पत्नी है, वही महारानी सीता वनवास के दुखों में अपने दिन कैसे काटती है. अपने कुल के गौरव और स्वाभिमान के रक्षा करते हुए, किसी से सहायता मांगे बिना कैसे अपना काम वो स्वयं करती है, स्वयं वन से लकड़ी काटती है, स्वयं अपना धान कूटती है, स्वयं अपनी चक्की पीसती है, और अपनी संतान को स्वावलंबी बनने की शिक्षा कैसे देती है अब उसकी एक करुण झांकी देखिये;

जनक दुलारी कुलवधू दशरथजी की,राजरानी होके दिन वन में बिताती है,रहते थे घेरे जिसे दास दासी आठों याम,दासी बनी अपनी उदासी को छिपती है,धरम प्रवीना सती, परम कुलीना,सब विधि दोष हीना जीना दुःख में सिखाती है,जगमाता हरिप्रिया लक्ष्मी स्वरूपा सिया,कूटती है धान, भोज स्वयं बनती है,कठिन कुल्हाडी लेके लकडियाँ काटती है,करम लिखे को पर काट नही पाती है,फूल भी उठाना भारी जिस सुकुमारी को था,दुःख भरे जीवन का बोझ वो उठाती है,अर्धांगिनी रघुवीर की वो धर धीर,भरती है नीर, नीर नैन में न लाती है,जिसकी प्रजा के अपवादों के कुचक्र में वो,पीसती है चाकी स्वाभिमान को बचाती है,पालती है बच्चों को वो कर्म योगिनी की भांति,स्वाभिमानी, स्वावलंम्भी ,सबल बनाती है,ऐसी सीता माता की परीक्षा लेते दुःख देते,निठुर नियति को दया भी नही आती है,उस दुखिया के राज दुलारे, हम ही सुत श्री राम तिहारे,सीता माँ की आँख के तारे, लव कुश हैं पितु नाम हमारे,हे पितु, भाग्य हमारे जागे, राम कथा कही राम के आगे.

!!!۞!!! ॥ॐ श्री राम ॥ !!!۞!!!!!!۞!!! ॥ॐ श्री हनुमते नमः ॥ !!!۞!!!
-: आज का साईं सन्देश :-

तारों को रौशन करें,
जो चन्दा चमकाय ।
शिर्डी में साईं प्रभो,
सूरज बन कर आय ।।

मथुरा में श्री कृष्णजी,
राम अयोध्या पाय ।
इसी तरह साईं प्रभो,
प्रगटे शिर्डी आय ।।
 

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Monday, 10 February 2020

ईश्वर से कुछ माँगना हो तो, संत कृपा ही मांगिये

ॐ सांई राम



 ईश्वर से कुछ माँगना हो तो,
संत कृपा ही मांगिये


ईश्वर से कुछ पूछना हो तो,
सद्गुरु का पता पूछिये

संत कृपा है पावन धारा,
सद्गुरु है श्री दया सागर
एक नज़र से कर दे जीवन,
सुन्दर पावन पुण्यवान

धन्य धन्य श्री सद्गुरु मेरे,
साईंनाथ श्री कृपा निधान
जन्म जन्म में अपने चरण में,
इस संतान को दे दो स्थान

ईश्वर से कुछ माँगना हो तो,
संत कृपा ही मांगिये
ईश्वर से कुछ पूछना हो तो,
सद्गुरु का पता पूछिये

  
-: आज का साईं सन्देश :-

मुक्ताजी गोरा हुए,
सावंता गोणाय ।
नरहरि से सन्तन हुए,
साजन संत कसाय ।।

सत्यमार्ग चलते हुए,
सन्त हुए कई बार ।
इन संतों के बाद में,
साईं ले अवतार ।।
 
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Sunday, 9 February 2020

दर्शन दे दो अब रुलाया न करो,

ॐ सांई राम



साईं  मुझे  इतना  सताया  न  करो,
दर्शन  दे दो  अब  रुलाया  न  करो,

व्याकुल  मनवा  तुझको  पुकारे,
झलक   दिखाके  छुप  जाया  न  करो,
दर्शन  दे दो  अब  रुलाया  न  करो,

एक  तुम्ही  हो  नाथ  हमारे,
फिर  मैं  जाऊँ  किसके  द्वारे,
दर्शन  पाऊँ  भाग  हमारे,
अब  तो  शरण  में  हूँ  बाबा  तुम्हारे,
मैं  हूँ  तुम्हारी  तुम  पराया  न  करो,
दर्शन  दे दो  अब  रुलाया  न  करो,

हर  पल  साईं  साथ  हमारे,
तेरा  नाम  लेती  रहूँ  सांझ  सकारे,
मेरा  ये  जीवन  तेरे  सहारे,
पावन  शिर्डी  में  अब  तो  बुला  ले,
अपनी  दया  तुम  छुपाया  न  करो,
दर्शन  दे दो  अब  रुलाया  न  करो,

मेरी  ये  अंखियाँ  तुझको  निहारे,
दर्शन  दे  दो  साईं  दासी  पुकारे,
दासी   खड़ी  है  तेरे  द्वारे,
अब  तो  आओ  साईं  नाथ  हमारे,
मन  को  मेरे  तरसाया  न  करो,
दर्शन  दे दो  अब  रुलाया  न  करो,

साईं  मुझे  इतना  सताया  न  करो,
दर्शन  दे दो  अब  रुलाया  न  करो,
व्याकुल  मनवा  तुझको  पुकारे,
झलक   दिखा के  छुप  जाया  न  करो,
दर्शन  दे दो  अब  रुलाया  न  करो,

विशेष आभार :-
साईं आँचल



-: आज का साईं सन्देश :-

ईश्वर के ही रूप हैं,
सन्तन सभी महान ।
प्रगट होय कारज करें,
अवतारी भगवान ।।

तुकाराम व नामदेव,
संत तिवरतीनाथ ।
ज्ञानदेव नरसी हुए,
रामदास, एकनाथ ।।  
  

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