शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 9 July 2016

भावना की जोत को जगा के देख लो

ॐ सांई राम




भावना की जोत को जगा के देख लो जगा के देख लो

आयेंगे साँई बुलाके देख लो - 2
सौ बार चाहे आज़माके देखलो
आएंगे साँई बुलाके देख लो

श्रद्धा से सर को झुकाके देखिये
सारे दुःख बाबा को सुनाके देखिये
एक बार - 2 आँसू बहाके देख लो बहाके देख लो
आएंगे साँई……………

करोगे सवाल तो जवाब मिलेगा
यहां पाप पुन्य का हिसाब मिलेगा
कर्मों का हिसाब लगाके देख लो लगाके देख लो
आएंगे साँई……………

साँई से अब नहीं दूर रहेंगे
हम भी आज बाबा को बुलाके रहेंगे
मन से साँई को पुकार देख लो पुकार देख लो
आएंगे साँई ………………

चरणों में ज़िन्दगी गुज़ार देखिये
बोझ सारा दिल का उतार फेंकिये
भार अपना बाबा को सौंप देख लो सौंप देख लो
आएंगे साँई बुलाके देख लो


Kindly Provide Food & clean drinking Water to Birds & Other Animals,
This is also a kind of SEWA.

Friday, 8 July 2016

श्री साई अष्टोत्तरशत नामावली

ॐ सांई राम



 श्री साई अष्टोत्तरशत नामावलि (Lord Saibaba Ashottarams)

 

ॐ श्री सच्चिदानंद सदगुरु साईनाथाय महाराज  की जय

 

1. ॐ श्री साई नाथाय नमः
2. ॐ श्री साई लक्ष्मीनारायनाय नमः
3. ॐ श्री साई कृष्णरामशिव मारुत्यादिरुपाय नमः
4. ॐ श्री साई शेषशायिने नमः
5. ॐ श्री साई गोदावरीतट शीलधीवासिने नमः
6. ॐ श्री साई भक्तहृदालयाय नमः
7. ॐ श्री साईं सर्वहन्नीललाय नमः
8. ॐ श्री साई भूतवासाय नमः
9. ॐ श्री साई भूतभविष्यदभाववार्जिताय नमः
10. ॐ श्री साई कालातीताय नमः
11. ॐ श्री साई कालाय नमः
12. ॐ श्री साई कालकालाय नमः
13. ॐ श्री साई कालदर्पदमनाय नमः
14. ॐ श्री साई मृत्युंजय नमः
15. ॐ श्री साई अमर्त्याय नमः
16. ॐ श्री साई मत्यभयप्रदाय नमः
17. ॐ श्री साई जीवाधाराय नमः
18. ॐ श्री साई सर्वाधाराय नमः
19. ॐ श्री साई भक्तावनसमर्थाय नमः
20. ॐ श्री साई भक्तावन प्रतिज्ञान नमः
21. ॐ श्री साई अन्नवस्त्रदाय नमः
22. ॐ श्री साई आरोग्यक्षेमदाय नमः
23. ॐ श्री साई धनमांगल्यप्रदाय नमः
24. ॐ श्री साई रिद्धिसिद्धिदाय नमः
25. ॐ श्री साई पुत्रमित्रकलबन्धुदाय नमः
26. ॐ श्री साई योगक्षेमवहाय नमः
27. ॐ श्री साई आपद् बान्धवाय नमः
28. ॐ श्री साई मार्गबन्धवे नमः
29. ॐ श्री साई भुक्तिमुक्ति स्वर्गापवर्गदाय नमः
30. ॐ श्री साई प्रियाय नमः
31. ॐ श्री साई प्रीति वर्धनाय नमः
32. ॐ श्री साई अंतर्यामिने नमः
33. ॐ श्री साई सच्चिदात्मने नमः
34. ॐ श्री साई नित्यानंदाय नमः
35. ॐ श्री साई परमसुखदाय नमः
36. ॐ श्री साई परमेश्वराय नमः
37. ॐ श्री साई परब्रह्मणे नमः
38. ॐ श्री साई परमात्मने नमः
39. ॐ श्री साई ज्ञानस्वरूपिणे नमः
40. ॐ श्री साई जगतपित्रे नमः
41. ॐ श्री साई भक्तानां मात्रुधात्रूपितामहाय नमः
42. ॐ श्री साई भक्ताभयप्रदाय नमः
43. ॐ श्री साई भक्तपराधीनाय नमः
44. ॐ श्री साई भक्तानुग्रहकातराय नमः
45. ॐ श्री साई शरणागतवत्सलाय नमः
46. ॐ श्री साई भक्तिशक्तिप्रदाय नमः
47. ॐ श्री साई ज्ञानवैराग्यदाय नमः
48. ॐ श्री साई प्रेमप्रदाय नमः
49. ॐ श्री साई संशय ह्रदय दौर्बल्य पापकर्म नमः
50. ॐ श्री साई ह्रदयग्रंथिभेदकाय नमः
51. ॐ श्री साई कर्मध्वंसिने नमः
52. ॐ श्री साई शुद्ध सत्वस्थिताय नमः
53. ॐ श्री साई गुणातीत गुणात्मने नमः
54. ॐ श्री साई अनंत कल्याणगुणाय नमः
55. ॐ श्री साई अमितपराक्रमाय नमः
56. ॐ श्री साई जयिने नमः
57. ॐ श्री साई दुर्धर्षाक्षोभ्याय नमः
58. ॐ श्री साई अपराजिताय नमः
59. ॐ श्री साई त्रिलोकेशु अविघातगतये नमः
60. ॐ श्री साईं अशक्यरहिताय नमः
61. ॐ श्री साईं सर्वशक्तिमुर्तये नमः
62. ॐ श्री साईं सुरूपसुन्दराय नमः
63. ॐ श्री साईं सुलोचनाय नमः
64. ॐ श्री साईं बहुरूपविश्वमुर्तये नमः
65. ॐ श्री साईं अरूपाव्यक्ताय नमः
66. ॐ श्री साईं अचिन्त्याय नमः
67. ॐ श्री साईं सूक्ष्माय नमः
68. ॐ श्री साईं सर्वन्तार्यामिने नमः
69. ॐ श्री साईं मनोवागतीताय नमः
70. ॐ श्री साईं प्रेममूर्तये नमः
71. ॐ श्री साईं सुलभदुर्लभाय नमः
72. ॐ श्री साईं असहायसहायाय नमः
73. ॐ श्री साईं अनाथनाथदीनबन्धवे नमः
74. ॐ श्री साईं सर्वभारभ्रुते नमः
75. ॐ श्री साईं अकर्मानेककर्मसुकर्मिने नमः
76. ॐ श्री साईं पुण्यश्रवणकीर्तनाय नमः
77. ॐ श्री साईं तीर्थाय नमः
78. ॐ श्री साईं वासुदेवाय नमः
79. ॐ श्री साईं सतांगतये नमः
80. ॐ श्री साईं सत्परायनाय नमः
81. ॐ श्री साईं लोकनाथाय नमः
82. ॐ श्री साईं पावनान्घाय नमः
83. ॐ श्री साईं अम्रुतांशवे नमः
84. ॐ श्री साईं भास्करप्रभाय नमः
85. ॐ श्री साईं ब्रह्मचर्य तपश्चर्यादि सुव्रताय नमः
86. ॐ श्री साईं सत्यधर्मंपरायनाय नमः
87. ॐ श्री साईं सिद्धेश्वराय नमः
88. ॐ श्री साईं सिद्धसंकल्पाय नमः
89. ॐ श्री साईं योगेश्वराय नमः
90. ॐ श्री साईं भगवते नमः
91. ॐ श्री साईं भक्तवत्सलाय नमः
92. ॐ श्री साईं सत्पुरुषाय नमः
93. ॐ श्री साईं पुरुषोत्तमाय नमः
94. ॐ श्री साईं सत्यतत्त्वबोधकाय नमः
95. ॐ श्री साईं कामदिषड्वैरिध्वंसिने नमः
96. ॐ श्री साईं अभेदानंदानुभवप्रदाय नमः
97. ॐ श्री साईं समसर्वमतसमताय नमः
98. ॐ श्री साईं दक्षिणामूर्तये नमः
99. ॐ श्री साईं वेन्कतेशरमनाय नमः
100. ॐ श्री साईं अदभुतानन्तचर्याय नमः
101. ॐ श्री साईं प्रपन्नार्तिहराय नमः
102. ॐ श्री साईं संसारसर्वदुःखक्षयकराय नमः
103. ॐ श्री साईं सर्ववित्सर्वतोमुखाय नमः
104. ॐ श्री साईं सर्वान्तर्बहि: स्थिताय नमः
105. ॐ श्री साईं सर्वमंगलकराय नमः
106. ॐ श्री साईं सर्वाभीष्टप्रदाय नमः
107. ॐ श्री साईं समरससनमार्गस्थापनाय नमः
108. ॐ श्री साईं समर्थ सदगुरु साईनाथाय नमः

 श्री सच्चिदानंद सदगुरु साईनाथ महाराज  की जय


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Thursday, 7 July 2016

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 43 & 44

ॐ सांई राम



आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप (रजि.) की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं , हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम  घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 43 & 44 - महासमाधि की ओर
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पूर्व तैयारी-समाधि मन्दिर, ईट का खंडन, 72 घण्टे की समाधि, जोग का सन्यास, बाबा के अमृततुल्य वचन ।


इन 43 और 44 अध्यायों में बाबा के निर्वाण का वर्णन किया गया है, इसलिये वे यहाँ संयुक्त रुप से लिखे जा रहे है ।


पूर्व तैयारी - समाधि मन्दिर
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हिन्दुओं में यह प्रथा प्रचलित है कि जब किसी मनुष्य का अन्तकाल निकट आ जाता है तो उसे धार्मिक ग्रन्थ आदि पढ़कर सुनाये जाते है । इसका मुख्य कारण केवल यही है कि जिससे उसका मन सांसारिक झंझटों से मुक्त होकर आध्यात्मिक विषयों में लग जाय और वह प्राणी कर्मवश अगले जन्म में जिस योनि को धारण करे, उसमें उसे सदगति प्राप्त हो । सर्वसाधारण को यह विदित ही है कि जब राजा परीक्षित को एक ब्रहृर्षि पुत्र ने शाप दिया और एक सप्ताह के पश्चात् ही उनका अन्तकाल निकट आया तो महात्मा शुकदेव ने उन्हें उस सप्ताह में श्री मदभागवत पुराण का पाठ सुनाया, जिससे उनको मोक्ष की प्राप्ति हुई । यह प्रथा अभी भी अपनाई जाती है । महानिर्वाण के समय गीता, भागवत और अन्य ग्रन्थों का पाठ किया जाता है । बाबा तो स्वयं अवतार थे, इसलिये उन्हें बाहृ साधनों की आवश्यकता नहीं थी, परन्तु केवल दूसरों के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करने के हेतु ही उन्होंने इस प्रथा की उपेक्षा नहीं की । जब उन्हें विदित हो गया कि मैं अब शीघ्र इस नश्वर देह को त्याग करुँगा, तब उन्होंने श्री. वझे को रामविजय प्रकरण सुनाने की आज्ञा दी । श्री. वझे ने एक सप्ताह प्रतिदिन पाठ सुनाया । तत्पश्चात ही बाबा ने उन्हें आठों प्रहर पाठ करने की आज्ञा दी । श्री. वझे ने उस अध्याय की द्घितीय आवृति तीन दिन में पूर्ण कर दी और इस प्रकार 11 दिन बीत गये । फिर तीन दिन और उन्होंने पाठ किया । अब श्री. वझे बिल्कुल थक गये । इसलिये उन्हें विश्राम करने की आज्ञा हुई । बाबा अब बिलकुल शान्त बैठ गये और आत्मस्थित होकर वे अन्तिम श्रण की प्रतीक्षा करने लगे । दो-तीन दिन पूर्व ही प्रातःकाल से बाबा ने भिक्षाटन करना स्थगित कर दिया और वे मसजिद में ही बैठे रहने लगे । वे अपने अन्तिम क्षण के लिये पूर्ण सचेत थे, इसलिये वे अपने भक्तों को धैर्य तो बँधाते रहते, पर उन्होंने किसी से भी अपने महानिर्वाण का निश्चित समय प्रगट न किया । इन दिनों काकासाहेब दीक्षित और श्रीमान् बूटी बाबा के साथ मसजिद में नित्य ही भोज करते थे । महानिर्वाण के दिन (15 अक्टूबर को) आरती समाप्त होने के पश्चात् बाबा ने उन लोगों को भी अपने निवासस्थान पर ही भोजन करके लौटने को कहा । फिर भी लक्ष्मीबाई शिंदे, भागोजी शिंदे, बयाजी, लक्ष्मण बाला शिम्पी और नानासाहेब निमोणकर वहीं रह गये । शामा नीचे मसजिद की सीढ़ियों पर बैठे थे । लक्ष्मीबाई शिन्दे को 9 रुपये देने के पश्चात् बाबा ने कहा कि मुझे मसजिद में अब अच्छा नहीं लगता है, इसलिये मुझे बूटी के पत्थर वाड़े में ले चलो, जहाँ मैं सुखपूर्वक रहूँगा । ये ही अन्तिम शब्द उनके श्रीमुख से निकले । इसी समय बाबा बयाजी के शरीर की ओर लटक गये और अन्तिम श्वास छोड़ दी । भागोजी ने देखा कि बाबा की श्वास रुक गई है, तब उन्होंने नानासाहेब निमोणकर को पुकार कर यह बात कही । नानासाहेब ने कुछ जल लाकर बाबा के श्रीमुख में डाला, जो बाहर लुढ़क आया । तभी उन्होंने जोर से आवाज लाई अरे । देवा । तब बाबा ऐसे दिखाई पड़े, जैसे उन्होंने धीरे से नेत्र खोलकर धीमे स्वर में ओह कहा हो । परन्तु अब स्पष्ट विदित हो गया कि उन्होंने सचमुच ही शरीर त्याग दिया है ।
बाबा समाधिस्थ हो गये – यह हृदयविदारक दुःसंवाद दावानल की भाँति तुरन्त ही चारों ओर फैल गया । शिरडी के सब नर-नारी और बालकगण मसजिद की ओर दौड़े । चारों ओर हाहाकार मच गया । सभी के हृदय पर वज्रपात हुआ । उनके हृदय विचलित होने लगे । कोई जोर-जोर से चिल्लाकर रुदन करने लगा । कोई सड़कों पर लोटने लगा और बहुत से बेसुध होकर वहीं गिर पड़े । प्रत्येक की आँखों से झर-जर आँसू गिर रहे थे । प्रलय काल के वातावरण में तांडव नृत्य का जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है, वही गति शिरडी के नर-नारियों के रुदन से उपस्थित हो गई । उनके इस महान् दुःख में कौन आकर उन्हें धैर्य बँधाता, जब कि उन्होंने साक्षात् सगुण परब्रहृ का सानिध्य खो दिया था । इस दुःख का वर्णन भला कर ही कौन सकता है ।
अब कुछ भक्तों को श्री साई बाबा के वचन याद आने लगे । किसी ने कहा कि महाराज (साई बाबा) ने अपने भक्तों से कहा था कि भविष्य में वे आठ वर्ष के बालक के रुप में पुनः प्रगट होंगे । ये एक सन्त के वचन है और इसलिये किसी को भी इन पर सन्देह नहीं करना चाहिये, क्योंकि कृष्णावतार में भी चक्रपाणि (भगवान विष्णु) ने ऐसी ही लीला की थी । श्रीकृष्ण माता देवकी के सामने आठ वर्ष की आयु वाले एक बालक के रुप में प्रगट हुये, जिनका दिव्य तेजोमय स्वरुप था और जिनके चारों हाथों में आयुध (शंख, चक्र, गटा और पदम) सुशोभित थे । अपने उस अवतार में भगवान श्रीकृष्ण ने भू-भार हलका किया था । साई बाबा का यह अवतार अपने बक्तों के उत्थान के लिये हुआ था । तब फिर संदेह की गुंजाइश ही कहाँ रह जाती है । सन्तों की कार्यप्रणाली अगम्य होती है । साई बाबा का अपने भक्तों के साथ यह संपर्क केवल एक ही पीढ़ी का नहीं, बल्कि यह उनका पिछले 72 जन्मों का संपर्क है । ऐसा प्रतीतत होता है कि इस प्रकार का प्रेम-सम्बन्ध विकसित करके महाराज (श्रीसाईबाबा) दौरे पर चले गये और भक्तों को दृढ़ विश्वास है कि वे शीघ्र ही पुनः वापस आ जायेंगें ।
अब समस्या उत्पन्न हुई कि बाबा के शरीर की अन्तिम क्रिया किस प्रकार की जाय । कुछ यवन लोग कहने लगे कि उनके शरीर को कब्रिस्तान में दफन कर उसके ऊपर एक मकबरा बना देना चाहिये । खुशालचन्द और अमीर शक्कर की भी यही धारणा थी, परन्तु ग्राम्य अधिकारी श्री. रामचन्द्र पाटील ने दृढ़ और निश्चयात्मक स्वर में कहा कि तुम्हारा निर्णय मुझे मान्य नहीं है । शरीर को वाड़े के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी नहीं रखा जायेगा । इस प्रकार लोगों में मतभेद उत्पन्न हो गया और वह वादविवाद 36 घण्टों तक चलता रहा ।
बुधवार के दिन प्रातःकाल बाबा ने लक्ष्मण मामा जोशी को स्वप्न दिया और उन्हें अपने हाथ से खींचते हुए कहा कि शीघ्र उठो, बापूसाहेब समझता है कि मैं मृत हो गया हूँ । इसलिये वह तो आयेगा नहीं । तुम पूजन और कांकड़ आरती करो । लक्ष्मण मामा ग्राम के ज्योतिषी, शामा के मामा तथा एक कर्मठ ब्राहृमण थे । वे नित्य प्रातःकाल बाबा का पूजन किया करते, तत्पश्चात् ही ग्राम देवियों और देवताओं का । उनकी बाबा पर दृढ़ निष्ठा थी, इसलिये इस दृष्टांत के पश्चात् वे पूजन की समस्त सामग्री लेकर वहाँ आये और ज्यों ही उन्होंने बाबा के मुख का आवरण हटाया तो उस निर्जीव अलौकिक महान् प्रदीप्त प्रतिभा के दर्शन कर वे स्तब्ध रह गये, मानो हिमांशु ने उन्हें अपने पाश में आबदृ करके जड़वत् बना दिया हो । स्वप्न की स्मृति ने उन्हें अपना कर्तव्य करने को प्रेरित कर दिया । फिर उन्होंने मौलवियों के विरोध की कुछ भी चिंता न कर विधिवत् पूजन और कांकड़ आरती की । दोपहर को बापूसाहेब जोन भी अन्य भक्तों के साथ आये और सदैव की भांति मध्याहृ की आरती की । बाबा के अन्तिम श्री-वचनों को आदरपूर्वक स्वीकार करके लोगों ने उनके शरीर को बूटी वाड़े में ही रखने का निश्चय किया और वहाँ का मध्य भाग खोदना आरम्भ कर दिया । मंगलवार की सन्ध्या को राहाता से सब-इन्स्पेक्टर और भिन्न-भिन्न स्थानो से अनेक लोग वहाँ आकर एकत्र हुए । सब लोगों ने उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया । दूसरे दिन प्रातःकाल बम्बई से अमीर भाई और कोपरगाँव से मामलेदार भी वहां आ पहुँचे । उन्होंने देखा कि लोग अभी भी एकमत नहीं है । तब उन्होंने मतदान करवाया और पाया कि अधिकांश लोगों का बहुमत वाड़े के पक्ष में ही है । फिर भी वे इस विषय में कलेक्टर की स्वीकृति अति आवश्यक समझते थे । तब काकासाहेब स्वयं अहमदनगर जाने को उघत् हो गये, परन्तु बाबा की प्रेरणा से विरक्षियों ने भी प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया और उन सबने मिलकर अपना मत भी वाड़े के ही पक्ष में दिया । अतः बुधवार की सन्ध्या को बाबा का पवित्र शरीर बड़ी धूमधाम और समारोह के साथ वाड़े मे लाया गया और विधिपूर्वक उस स्थान पर समाधि समाधि बना दी गई, जहाँ मुरलीधर की मूर्ति स्तापित होने को थी । सच तो यह है कि बाबा मुरलीधर बन गये और वाड़ा समाधि-मन्दिर तथा भक्तों का एक पवित्र देवस्थान, जहाँ अनेको भक्त आया जाया करते थे और अभी भी नित्य-प्रति वहाँ आकर सुख और शान्ति प्राप्त करते है । बालासाहेब भाटे और बाबा के अनन्य भक्त श्री. उपासनी ने बाबा की विधिवत् अन्तिम क्रिया की ।
जैसा प्रोफेसर नारके को देखने में आया, यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि बाबा का शरीर 36 घण्टे के उपरांत भी जड़ नहीं हुआ और उनके शरीर का प्रत्येक अवयव लचीला (Elastic) बना रहा, जिससे उनके शरीर पर से कफनी बिना चीरे हुए सरलता से निकाली जा सकी ।
ईंट का खण्डन
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बाबा के निर्वाण के कुछ समय पूर्व एक अपशकुन हुआ, जो इस घटना की पूर्वसूचना-स्वरुप था । मसजिद में एक पुरानी ईंट थी, जिस पर बाबा अपना हाथ टेककर रखते थे । रात्रि के समय बाबा उस पर सिर रखकर शयन करते थे । यह कार्यक्रम अने वर्षों तक चला । एक दिन बाबा की अनुपस्थिति में एक बालक ने मसजिद में झाड़ू लगाते समय वह ईंट अपने हाथ में उठाई । दुर्भाग्यवश वह ईंट उसके हाथ से गिर पड़ी और उसके दो टुकड़े हो गये । जब बाबा को इस बात की सूचना मिली तो उन्हें उसका बड़ा दुःख हुआ और वे कहने लगे कि यह ईंट नहीं फूटी है, मेरा भाग्य ही फूटकर छिन्न-भिन्न हो गया है । यह तो मेरी जीवनसंगिनी थी और इसको अपने पास रखकर मैं आत्म-चिंतन किया करता था । यह मुजे अपने प्राणों के समान प्रिय थी और उसने आज मेरा सात छोड़ दिया है । कुछ लोग यहाँ शंका कर सकते है कि बाबा को ईंट जैसी एक तुच्छ वस्तु के लिये इतना शोक क्यों करना चाहिये । इसका उत्तर हेमाडपंत इस प्रकार देते है कि सन्त जगत के उद्घार तथा दीन और अनाक्षितों के कल्याणार्थ ही अवतीर्ण होते है । जब वे नरदेह धारण करते है और जनसम्पर्कमें आते है तो वे इसी प्रकार आचरण किया करते है, अर्थात् बाहृ रुप से वे अन्य लोगों के समान ही हँसते, खेलते और रोते है, परन्तु आन्तरिक रुप से वे अपने अवतार-कार्य और उसके ध्येय के लिये सदैव सजग रहते है ।
72 घण्टे की समाधि
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इसके 32 वर्ष पूर्व भी बाबा ने अपनी जीवन-रेखा पार करने का एक प्रयास किया था । 1886 में मार्गशीर्ष को पूर्णिमा के दिन बाबा कोदमा से अधिक पीड़ा हुई और इस व्याधि से छुटकारा पाने के लिये उन्होंने अपने प्राण ब्रहृमांड में चढ़ाकर समाधि लगाने का विचार किया । अतएव उन्होंने भगत म्हालसापति से कहा कि तुम मेरे शरीर की तीन दिन तक रक्षा करना और यदि मैं वापस लौट आया तो ठीक ही है, नहीं तो उस स्थान (एक स्थान को इंगित करते हुए) पर मी समाधि बना देना और दो ध्वजायें चिन्ह स्वरुप फहरा देना । ऐसा कहकर बाबा रात में लगभग दस बजे पृथ्वी पर लेट गये । उनका श्वासोच्छवास बन्द हो गया और ऐसा दिखाई देने लगा कि जैसे उनके शरीर में प्राण ही न हो । सभी लोग, जिनमें ग्रामवासी भी थे, वहाँ एकत्रित हुए और शरीर परीक्षण के पश्चात शरीर को उनके द्घारा बताये हुए स्थान पर समाधिस्थ कर देने का निश्चय करने लगे । परन्तु भगत म्हालसापति ने उन्हें ऐसा करने से रोका और उनके शरीर को अपनी गोद में रखकर वे तीन दिन तक उसकी रक्षा करते रहे । तीन दिन व्यतीत होने पर रात को लगभग तीन बजे प्राण लौटने के चिन्ह दिखलाई पड़ने लगे । श्वसोच्छ्वास पुनः चालू हो गया और उनके अंग-प्रत्यंग हिलने लगे । उन्होंने नेत्र खोल दिये और करवट लेते हुए वे पुनः चेतना में आ गये ।
इस प्रसंग तथा अन्य प्रसंगों पर दृष्टिपात कर अब हम यह पाठकों पर छोड़ते है कि वे ही इसका निश्चय करें कि क्या बाबा अन्य लोगों की भाँति ही साढ़े तीन हाथ लम्बे एक देहधारी मानव थे, जिस देह को उन्होंने कुछ वर्षों तक धारण करने के पश्चात् छोड़ दिया, या वे स्वयं आत्मज्योतिस्वरुप थे । पंच महाभूतों से शरीर निर्मित होने के कारण उसका नाश और अन्त तो सुनिश्चित है, परन्तु जो सद्घस्तु (आत्मा) अन्तःकरण में है, वही यथार्थ में सत्य है । उसका न रुप है, न अंत है और न नाश । यही शुदृ चैतन्य घन या ब्रहृ – इन्द्रियों और मन पर शासन और नियंत्रण रखने वाला जो तत्व है, वही साई है, जो संसार के समस्त प्राणियों में विघमान है और जो सर्वव्यापी है । अपना अवतार-कार्य पूर्ण करने के लिये ही उन्होंने देह-धारण किया था और वह कार्य पूर्ण होने पर उन्होंने उसे त्याग कर पुनः अपना शाश्वत और अनंत स्वरुप धारण कर लिया । श्री दत्तात्रेय के पूर्ण अवतार-गाणगापुर के श्रीनृसिंह सरस्वती के समान श्री साई भी सदैव वर्तमान है । उनका निर्वाण तो एक औपचारिक बात है । वे जड़ और चेतन सभी पदार्थों में व्याप्त है तथा सर्व भूतों के अन्तःकरण के संचालक और नियंत्रणकर्ता है । इसका अभी भी अनुभव किया जा सकता है और अनेकों के अनुभव में आ भी चुका है, जो अनन्य भाव से उनके शरणागत हो चुके है और जो पूर्ण अंतःकरण से उनके उपासक है ।


यघपि बाबा का स्वरुप अब देखने को नहीं मिल सकता है, फिर भी यदि हम शिरडी को जाये तो हमें वहाँ उनका जीवित-सदृश चित्र मसजिद (द्घारकामाई) को शोभायमान करते हुए अब भी देखने में आयेगा । यह चित्र बाबा के एक प्रसिदृ भक्त-कलाकार श्री. शामराव जयकर ने बनाया था । एक कल्पनाशील और भक्त दर्शक को यह चित्र अभी भी बाबा के दर्शन के समान ही सन्तोष और सुख पहुँचाता है । बाबा अब देह में स्थित नहीं है, परन्तु वे सर्वभूतों में व्याप्त है और भक्तों का कल्याण पूर्ववत् ही करते रहे है, करते रहेंगे, जैसा कि वे सदेह रहकर किया करते थे । बाबा सन्तों के समान अमर है, चाहे वे नरदेह धारण कर ले, जो कि एक आवरण मात्र है, परन्तु वे तो स्वयं भगवान श्री हरि है, जो समय-समय पर भूतल पर अवतीर्ण होते है ।
बापूसाहेब जोग का सन्यास
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जोग के सन्यास की चर्चा कर हेमाडपंत यह अध्याय समाप्त करते है । श्री. सखाराम हरी उर्फ बापूसाहेब जोग पूने के प्रसिदृ वारकरी विष्णु बुवा जोग के काका थे । वे लोक कर्म विभाग (P.W.D.) में पर्यवेक्षक (Supervisor) थे । सेवानिवृति के पश्चात वे सपत्नीक शिरडी में आकर रहने लगे । उनके कोई सन्तान न थी । पति और पत्नी दोनों की ही साई चरणों में श्रद्घा थी । वे दोनों अपने दिन उनकी पूजा और सेवा करने में ही व्यतीत किया करते थे । मेघा की मृत्यु के पश्चात बापूसाहेब जोग ने बाबा की महासमाधि पर्यन्त मसजिद और चावड़ी में आरती की । उनको साठे बाड़ा में श्री ज्ञानेश्वरी और श्री एकनाथी भागवत का वाचन तथा उसका भावार्थ श्रोताओं को समझाने का कार्य भी दिया गया था । इस प्रकार अनेक वर्षों तक सेवा करने के पश्चात उन्होंने एक बार बाबा से प्रार्थना की कि – हे मेरे जीवन के एकमात्र आधार । आपके पूजनीय चरणों का दर्शन कर समस्त प्राणियों को परम शांति का अनुभव होता है । मैं इन श्री चरणों की अनेक वर्षों से निरंतर सेवा कर रहा हूँ, परन्तु क्या कारण है कि आपके चरणों की छाया के सन्निकट होते हुए भी मैं उनकी शीतलता से वंचित हूँ । मेरे इस जीवन में कौन-सा सुख है, यदि मेरा चंचल मन शान्त और स्थिर बनकर आपके श्रीचरणों में मग्न नहीं होता । क्या इतने वर्षों का मेरा सन्तसमागम व्यर्थ ही जायेगा । मेरे जीवन में वह शुभ घड़ी कब आयेगी, जब आपकी मुझ पर कृपा दृष्टि होगी ।
भक्त की प्रार्थना सुनकर बाबा को दया आ गई । उन्होंने उत्तर दिया कि थोड़े ही दिनों में अब तुम्हारे अशुभ कर्म समाप्त हो जायेंगे तथा पाप और पुण्य जलकर शीघ्र ही भस्म हो जायेंगे । मैं तुम्हें उस दिन ही भाग्यशाली समझूँगा, जिस दिन तुम ऐन्द्रिक-विषयों को तुच्छ जानकर समस्त पदार्थों से विरक्त होकर पूर्ण अनन्य भाव से ईश्वर भक्ति कर सन्यास धारण कर लोगे । कुछ समय पश्चात् बाबा के वचन सत्य सिदृ हुये । उनकी स्त्री का देहान्त हो जाने पर उनकी अन्य कोई आसक्ति शेष न रही । वे अब स्वतंत्र हो गये और उन्होंने अपनी मृत्यु के पूर्व सन्यास धारण कर अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर लिया ।
बाबा के अमृततुल्य वचन
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दयानिधि कृपालु श्री साई समर्थ ने मस्जिद (द्घारिकामाई) में अनेक बार निम्नलिखित सुधोपम वचन कहे थे :-
जो मुझे अत्यधिक प्रेम करता है, वह सदैव मेरा दर्शन पाता है । उसके लिये मेरे बिना सारा संसार ही सूना है । वह केवल मेरा ही लीलागान करता है । वह सतत मेरा ही ध्यान करता है और सदैव मेरा ही नाम जपता है । जो पूर्ण रुप से मेरी शरण में आ जाता है और सदा मेरा ही स्मरण करता है, अपने ऊपर उसका यह ऋण मैं उसे मुक्ति (आत्मोपलबव्धि) प्रदान करके चुका चुका दूँगा । जो मेरा ही चिन्तन करता है और मेरा प्रेम ही जिसकी भूख-प्यास है और जो पहले मुझे अर्पित किये बिना कुछ भी नहीं खाता, मैं उसके अधीन हूँ । जो इस प्रकार मेरी शरण में आता है, वह मुझसे मिलकर उसकी तरह एकाकार हो जाता है, जिस तरह नदियाँ समुद्र से मिलकर तदाकार हो जाती है । अतएव महत्ता और अहंकार का सर्वथा परित्याग करके तुम्हें मेरे प्रति, जो तुम्हारे हृदय में आसीन है, पूर्ण रुप से समर्पित हो जाना चाहिये ।
यह मैं कौन है ।
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श्री साईबाबा ने अनेक बार समझाया कि यह मैं कौन है । इस मैं को ढ़ूँढने के लिये अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है । तुम्हारे नाम और आकार से परे मैं तुम्हारे अन्तःकरण और समस्त प्राणियों में चैतन्यघन स्वरुप में विघमान हूँ और यहीं मैं का स्वरुप है । ऐसा समझकर तुम अपने तथा समस्त प्राणियों में मेरा ही दर्शन करो । यदि तुम इसका नित्य प्रति अभ्यास करोगे तो तुम्हें मेरी सर्वव्यापकता का अनुभव शीघ्र हो जायेगा और मेरे साथ अभिन्नता प्राप्त हो जायेगी ।
अतः हेमाडपन्त पाठकों को नमन कर उनसे प्रेम और आदरपूर्वक विनम्र प्रार्थना करते है कि उन्हें समस्त देवताओं, सन्तों और भक्तों का आदर करना चाहिये । बाबा सदैव कहा करते थे कि जो दूसरों को पीड़ा पहुँचाता है, वह मेरे हृदय को दुःख देता है तथा मुझे कष्ट पहुँचाता है । इसके विपरीत जो स्वयं कष्ट सहन करता है, वह मुझे अधिक प्रिय है । बाबा समस्त प्राणयों में विघमान है और उनकी हर प्रकार से रक्षा करते है । समस्त जीवों से प्रेम करो, यही उनकी आंतरिक इच्छा है । इस प्रकार का विशुद्घ अमृतमय स्त्रोत उनके श्री मुख से सदैव झरता रहता था । अतः जो प्रेमपूर्वक बाबा का लीलागान करेंगे या उन्हें भक्तिपूर्वक श्रवण करेंगे, उन्हें साई से अवश्य अभिन्नता प्राप्त होगी ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।
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Wednesday, 6 July 2016

रोज़ थोड़ा-थोड़ा साँई का भजन कर ले

ॐ सांई राम



नेक कोई एक तो करम कर ले, नेक कोई एक तो करम कर ले
रोज़ थोड़ा-थोड़ा साँई का भजन कर ले

माया के दिवाने थोड़ा पुन्य भी कमा ले तू
साँई नाम की गंगा में गोते आ लगा ले तू
मोहमाया त्यागने का प्रण कर ले
रोज़ थोड़ा-थोड़ा साँई का भजन कर ले

होके धनवान भी तू कितना ग़रीब है
दूर साँई चरणों से जग के करीब है
मेरी इस बात का मनन कर ले
रोज़ थोड़ा-थोड़ा साँई का भजन कर ले

त्याग के शरीर जब साँई धाम जाएगा
तेरा ये ख़ज़ाना तेरे काम नहीं आएगा
जमा साँई नाम के रतन कर ले
रोज़ थोड़ा-थोड़ा साँई क भजन कर ले

प्यार से पुकार साँई दौड़े चले आएंगे
देखना वो डेरा तेरे मन में लगाएंगे
शिरडी के जैसा अपना मन कर ले
रोज़ थोड़ा-थोड़ा साँई का भजन कर ले

नेक कोई एक तो करम कर ले
रोज़ थोड़ा-थोड़ा साँई का भजन कर ले



ॐ सांई राम

I LOVE YOU- बाबा जी को कहो,
I MISS YOU- बाबा जी की शिक्षाओं को कहो,
I BELIEVE YOU- श्री साँई सच्चरित्र को कहो,
I TRUST YOU- बाबा जी से की हुई प्रार्थनाओं को कहो,
I HATE YOU- खुद के अनंदर छुपी हुई बुराईयों को कहो,

यदि हम इन सबको अपनायेंगे तो बाबा जी के बहुत करीब पहुँच जायेंगे....

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Tuesday, 5 July 2016

अज मेरे घर साईं आया है

ॐ सांई राम






अज मेरे घर लगियां ने रौनकां
मै ताँ साईं दा दर्शन पाया है
आओ मिल के नाचिये गाईये
अज मेरे घर साईं आया है

फुल्लां नाल दरबार सजाया
चम चम करदा चोला पाया
मत्थे ते मुकुट सजाया है
अज मेरे घर साईं आया है

दूरों दूरों   संगतां आईयां
साईं चरणां  विच भेंट लियाईयाँ
साईं झोलियाँ भरण लई आया है
अज मेरे घर साईं आया है

जिस ने साईं अगे सीस झुकाया
अपने दिल दा हाल सुनाया
मेहरां दा मीह वरसाया है
अज मेरे घर साईं आया है

भजन माला प्रस्तुति बहन रविंदर जी के कर कमलों द्वारा

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Monday, 4 July 2016

जो है शिर्डी के कण कण में

ॐ सांई राम



भवदधि तारक दीन सहाई, साईं का सुमिरन है सुखदाई
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम



पारसमणि साईं के चरण हैं तन निरोग मन शुद्ध करण हैं
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

साईं दयालु जिन पर होते, उनके सभी पापों को धोते
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

जिनका कवच साईं बन जाते, संकट उनके निकट न आते
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

कोई कहे साईं शिव त्रिपुरारी, कोई कहे राम कोई गिरधारी
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

साईं में सारे देव समाये, जो जिसे ढूंढें वो उसे पाये
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

साईं के द्वार सा द्वार न कोई, ऐसा अपरम्पार न कोई
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

जो है शिर्डी के कण कण में, वोही बसे भक्तों के मन में
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

साईं कृपा जिन्हें मिल जाती, उनपे कोई भी आँच ना आती
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

दृष्टि दया की जिन पर होती, वो कंकर बन जाते मोती
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

जब वो अलौकिक कला दिखाते, पानी से भी दीप जलाते
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

अष्ट सिद्धियाँ साईं के वश में, चार पदारथ दिव्य दरश में
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

पतितों को साईं कुन्दन करते, माटी छूकर चन्दन करते
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

साईं जगपालक साईं जगवन्दन, काटते दुःख संताप के बन्धन
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

साईं महायोगी, साईं महाज्ञानी, पूर्णब्रह्म वांछित वरदानी
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम



अभयदान साईं देते जिनको, यम का भय नहीं व्यापे तिनको
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

मोक्षदायनी साईं की भक्ति, शक्तिहीन को देती शक्ति
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

साईं है अमृत की धारा, जो चाखे उसे जग लगे खारा
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

शिर्डी में है जो सुखराशि, ना वो मथुरा ना वो काशी
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम



जो नहीं मिलता यज्ञ हवन से, पुण्य वो मिले साईं दर्शन से
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

जो फल चारों धाम से मिलता, वो साईं के नाम से मिलता
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

दीनबन्धु साईं कहलाते, दीनों के दुःख कष्ट मिटाते
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

साईं की चौखट टेक के माथा, स्वर्ग के जैसा सुख मिल जाता
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

साईं में रब है रब में साईं, ध्यान से देखो सब में साईं
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम



दिव्य रसायन साईं विभूति, जो जो मलते उन्हें व्याधि न छूती
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

साईं की धुन में जो खो जाते, रंक से वो राजा बन जाते
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

साईं साथी रात और दिन के, साईं का नाम न लो गिन गिन के
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

साईं जैसा सन्त न कोई, साईं कथा का अन्त न कोई
जय साईं राम ॐ जय साईं श्याम, मंगलमूर्ति सकल सुख धाम

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Sunday, 3 July 2016

गुरु-स्मरण का महत्व

ॐ सांई राम





गुरु-स्मरण का महत्व 

गुरु की अलोक-रश्मि सबमे है ! उनका स्मरण करने से व्यक्ति उनके प्रभा-मंडल से जुड़ता है!

उनका स्मरण करते ही वह स्वयं उनकी भाव-तरंग से जुड़ जाता है! गुरु का भाव भक्त को आवेशित करता है और उस समय मन को सांसारिक संकल्प, जो की चित्त
को अस्थिर करते है, उनको नष्ट करता है, क्योंकि गुरु का प्रभा मण्डल बहुत शक्तिशाली होता है! बाबा ने कहा था कि :-
 

1   "जो कोई अनन्य भाव से मेरी शरण आता है, और जो श्रधा पूर्वक मेरा पूजन, निरंतर स्मरण और मेरा ही ध्यान करता है, उसको मैं मुक्ति प्रदान कर देता हूँ"
 
2    "जो नित्य प्रति मेरा नाम स्मरण और पूजन कर मेरी कथाओ और लीलाओं का प्रेमपूर्वक मनन करते है, ऐसे भक्तो में सांसारिक वासनाएं और अज्ञान-रुपी   
     पर्ववृतियाँ   कैसे ठहर सकती है"
3   "जब और जहाँ भी तुम मेरा स्मरण करोगे में हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा"

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Gautam Budh Nagar, Uttar Pradesh. INDIA.