शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 25 June 2016

श्री दुर्गा चालीसा

ॐ सांई राम



श्री दुर्गा चालीसा 

नमो नमो दुर्गे सुख करनी । नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥


निराकार है ज्योति तुम्हारी । तिहूं लोक फैली उजियारी ॥
 

शशि ललाट मुख महा विशाला । नेत्र लाल भृकुटी विकराला ॥
 

रुप मातु को अधिक सुहावे । दरश करत जन अति सुख पावे ॥
 

तुम संसार शक्ति लय कीना । पालन हेतु अन्न धन दीना ॥
 

अन्नपूर्णा हु‌ई जग पाला । तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥
 

प्रलयकाल सब नाशन हारी । तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥
 

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें । ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥
 

रुप सरस्वती को तुम धारा । दे सुबुद्घि ऋषि मुनिन उबारा ॥
 

धरा रुप नरसिंह को अम्बा । प्रगट भ‌ई फाड़कर खम्बा ॥
 

रक्षा कर प्रहलाद बचायो । हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ॥
 

लक्ष्मी रुप धरो जग माही । श्री नारायण अंग समाही ॥
 

क्षीरसिन्धु में करत विलासा । दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥
 

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी । महिमा अमित न जात बखानी ॥
 

मातंगी धूमावति माता । भुवनेश्वरि बगला सुखदाता ॥
 

श्री भैरव तारा जग तारिणि । छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥
 

केहरि वाहन सोह भवानी । लांगुर वीर चलत अगवानी ॥
 

कर में खप्पर खड्ग विराजे । जाको देख काल डर भाजे ॥
 

सोहे अस्त्र और तिरशूला । जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥
 

नगर कोटि में तुम्ही विराजत । तिहूं लोक में डंका बाजत ॥
 

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे । रक्तबीज शंखन संहारे ॥
 

महिषासुर नृप अति अभिमानी । जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥
 

रुप कराल कालिका धारा । सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥
 

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब । भ‌ई सहाय मातु तुम तब तब 
 
 
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Friday, 24 June 2016

माँ तेरी बातों का मुझे एहसास आज भी है

ॐ सांई राम





माँ तेरी बातों का मुझे एहसास आज भी है
तेरे  होठों  से  निकला  एक-एक शब्द याद आज भी है

चाहे चली गयी हो इस दुनिया के लिए

पर माँ मेरे शरीर में तेरी रूह का वास आज भी है...

तेरे  क़दमों  में  मर मिटने की प्यास आज भी है

तेरी राह निहारने के लिए मुझमे सांस आज भी है

जब तक हूँ जिन्दा तब तक याद करता रहूँगा माँ

किसी जनम में तो मिलोगी मुझसे ये विश्वास आज भी है


लड़ जाऊँगा दुनिया से तेरा नाम लेकर ये आस आज भी है

भूल नहीं सकता तुझको तेरी यादें मेरे पास आज भी है

जरूरत ही नहीं मुझे किसी भगवान की

क्योंकि रहता मेरे साथ तेरा आशीर्वाद आज भी है


बाबा साईं मेरी माँ का ख्याल रखना.......

जय साईं माँ


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Thursday, 23 June 2016

श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 41


ॐ साँई राम



आप सभी को शिर्डी के साँईं बाबा ग्रुप की और से साँईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं , हम प्रत्येक साँईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साँईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साँईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साँईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साँईं चरणों में क्षमा याचना करते है...


श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 41 - चित्र की कथा, चिंदियों की चोरी और ज्ञानेश्वरी के पठन की कथा ।


गत अध्याय में वर्णित घटना के नौ वर्ष पश्चात् अली मुहम्मद हेमाडपंत से मिले और वह पिछली कथा निम्निखित रुप में सुनाई ।

एक दिन बम्बई में घूमते-फिरते मैंने एक दुकानदार से बाबा का चित्र खरीदा । उसे फ्रेम कराया और अपने घर (मध्य बम्बई की बस्ती में) लाकर दीवाल पर लगा दिया । मुझे बाबा से स्वाभाविक प्रेम था । इसलिये मैं प्रतिदिन उनका श्री दर्शन किया करता था । जब मैंने आपको (हेमाडपंत को) वह चित्र भेंट किया, उसके तीन माह पूर्व मेरे पैर में सूजन आने के कारण शल्यचिकित्सा भी हुई थी । मैं अपने साले नूर मुहम्मद के यहाँ पड़ा हुआ था । खुद मेरे घर पर तीन माह से ताला लगा था और उस समय वहाँ पर कोई न था । केवल प्रसिदृ बाबा अब्दुल रहमान, मौलाना साहेब, मुहम्मद हुसेन, साई बाबा ताजुद्दीन बाबा और अन्य सन्त चित्रों के रुप में वही विराजमान थे, परन्तु कालचक्र ने उन्हें भी वहाँ न छोड़ा । मैं वहाँ (बम्बई) बीमार पड़ा हुआ था तो फिर मेरे घर में उन लोगों (फोटो) को कष्ट क्यों हो । ऐसा समझ में आता है कि वे भी आवागमन (जन्म और मृत्यु) के चक्कर से मुक्त नहीं है । अन्य चित्रों की गति तो उनके ओभाग्यनुसार ही हुई, परन्तु केवल श्री साईबाबा का ही चित्र कैसे बच निकला, इसका रहस्योदघाटन अभी तक कोई नहीं कर सका है । इससे श्री साईबाबा की सर्वव्यापकता और उनकी असीम शक्ति का पता चलता है ।


कुछ वर्ष पूर्व मुझे मुहम्मद हुसेन थारिया टोपण से सन्त बाबा अब्दुल रहमान का चित्र प्राप्त हुआ था, जिसे मैंने अपने साले नूर मुहम्मद पीरभाई को दे दिया, जो गत आठ वर्षों से उसकी मेज पर पड़ा हुआ था । एक दिन उसकी दृष्टि इस चित्र पर पड़ी, तब उसने उसे फोटोग्राफर के पास ले जाकर उसकी बड़ी फोटो बनवाई और उसकी कापियाँ अपने कई रिश्तेदारों और मित्रों में वितरित की । उनमें से एक प्रति मुझे भी मिली थी, जिसे मैंने अपने गर की दीवाल पर लगा रखा था । नूर मुहम्मद सन्त अब्दुल रहमान के शिष्य थे । जब सन्त अब्दुल रहमान साहेब का आम दरबार लगा हुआ था, तभी नूर मुहम्मद उन्हें वह फोटो भेंट करने के हेतु उनके समक्ष उपस्थित हुए । फोटो को देखते ही वे अति क्रोधित हो नूर मुहम्मद को मारने दौड़े तथा उन्हें बाहर निकाल दिया । तब उन्हें बड़ा दुःख और निराशा हुई । फिर उन्हें विचार आया कि मैंने इतना रुपया व्यर्थ ही खर्च किया, जिसका परिणाम अपने गुरु के क्रोध और अप्रसन्नता का कारण बना । उनके गुरु मूर्ति पूजा के विरोधी थे, इसलिये वे हाथ में फोटो लेकर अपोलो बन्दर पहुँचे और एक नाव किराये पर लेकर बीच समुद्र में वह फोटो विसर्जित कर आये । नूर मुहम्मद ने अपने सब मित्रों और सम्बन्धियों से भी प्रार्थना कर सब फोटो वापस बुला लिये (कुल छः फोटो थे) और एक मछुए के हाथ से बांद्रा के निकट समुद्र में विसर्जित करा दिये ।

इस समय मैं अपने साले के घर पर ही था । तब नूर मुहम्मद ने मुझसे कहा कि यदि तुम सन्तों के सब चित्रों को समुद्र में विसर्जित करा दोगे तो तुम शीघ्र स्वस्थ हो जाओगे । यह सुनकर मैंने मैनेजर मैहता को अपने घर भेजा और उसके द्घारा घर में लग हुए सब चित्रों को समुद्र में फिकवा दिया । दो माह पश्चात जब मैं अपने घर वापस लौटा तो बाबा का चित्र पूर्ववत् लगा देखकर मुझे महान् आश्चर्य हुआ । मं समज न सका कि मेहता ने अन्य सब चित्र तो निकालकर विसर्जित कर दिये, पर केवल यही चित्र कैसे बच गया । तब मैंने तुरन्त ही उसे निकाल लिया और सोचने लगा कि कहीं मेरे साले की दृष्टि इस चित्र पर पड़ गई तो वह इसकी भी इति श्री कर देगा । जब मैं ऐसा विचार कर ही रहा था कि इस चित्र को कौन अच्छी तरह सँभाल कर रख सकेगा, तब स्वयं श्री साईबाबा ने सुझाया कि मौलाना इस्मू मुजावर के पास जाकर उनसे परामर्श करो और उनकी इच्छानुसार ही कार्य करो । मैंने मौलाना साहेब से भेंट की और सब बाते उन्हें बतलाई । कुछ देर विचार करने के पस्चात् वे इस निर्णय पर पहुँचे कि इस चित्र को आपको (हेमाडपंत) ही भेंट करना उचित है, क्योकि केवल आप ही इसे उत्तम प्रकार से सँभालने के लिये सर्वथा सत्पात्र है । तब हम दोनों आप के घर आये और उपयुक्त समय पर ही यतह चित्र आपको भेंट कर दिया । इस कथा से विदित होता है कि बाबा त्रिकालज्ञानी थे और कितनी कुशलता से समस्या हल कर भक्तों की इच्छायें पूर्ण किया करते थे । निम्नलिखित कथा इस बात का प्रतीक है कि आध्यात्मिक जिज्ञासुओं पर बाबा किस प्रकार स्नेह रखते तथा किस प्रकार उनके कष्ट निवारण कर उन्हें सुख पहुँचाते थे ।

चिन्दियों की चोरी और ज्ञानेश्वरी का पठन
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श्री. बी. व्ही. देव, जो उस समय डहाणू के मामलेदार थे, को दीर्घकाल से अन्य धार्मिक ग्रन्थों के साथ-साथ ज्ञानेश्वरी के पठन की तीव्र इच्छा थी । (ज्ञानेश्वरी भगवदगीता पर श्री ज्ञानेश्वर महाराज द्घारा रचित मराठी टीका है ।) वे भगवदगीता के एक अध्याय का नित्य पाठ करते तथा थोड़े बहुत अन्य ग्रन्थों का भी अध्ययन करते थे । परन्तु जब भी वे ज्ञानेश्वरी का पाठ प्रारम्भ करते तो उनके समक्ष अनेक बाधाएँ उपस्थित हो जाती, जिससे वे पाठ करने से सर्वथा वंचित रह जाया करते थे । तीन मास की छुट्टी लेकर वे शिरडी पधारे और तत्पश्चात वे अपने घर पौड में विश्राम करने के लिये भी गये । अन्य ग्रन्थ तो वे पढ़ा ही करते थे, परन्तु जब ज्ञानेश्वरी का पाठ प्रारम्भ करते तो नाना प्रकार के कलुषित विचार उन्हें इस प्रकार घेर लेते कि लाचार होकर उसका पठन स्थगित करना पड़ता था । बहुत प्रयत्न करने पर भी जब उनको केवल दो चार ओवियाँ पढ़ना भी दुष्कर हो गया, तब उन्होंने यह निश्चय किया कि जब दयानिधि श्री साई ही कृपा करके इस ग्रन्थ के पठन की आज्ञा देंगे, तभी उसकी श्रीगणेश करुँगा । सन् 1914 के फरवरी मास में वे सहकुटुम्ब शिरडी पधारे । तभी श्री. जोग ने उनसे पूछा कि क्या आप ज्ञानेश्वरी का नित्य पठन करते है । श्री. देव ने उत्तर दिया कि मेरी इच्छा तो बहुत है, परन्तु मैं ऐसा करने में सफलता नहीं पा रहा हूँ । अब तो जब बाबा की आज्ञा होगी, तभी प्रारम्भ करुँगा । श्री, जोग ने सलाह दी कि ग्रन्थ की एक प्रति खरीद कर बाबा को भेंट करो और जब वे अपने करकमलों से स्पर्श कर उसे वापस लौटा दे, तब उसका पठन प्रारम्भ कर देना । श्री. देव ने कहा कि मैं इस प्रणाली को श्रेयस्कर नहीं समझता, क्योंकि बाबा तो अन्तर्यामी है और मेरे हृदय की इच्छा उनसे कैसे गुप्त रह सकती है । क्या वे स्पष्ट शब्दों में आज्ञा देकर मेरी मनोकामना पूर्ण न करेंगें ।

श्री. देव ने जाकर बाबा के दर्शन किये और एक रुपया दक्षिणा भेंट की । तब बाबा ने उनसे बीस रुपये दक्षिणा और माँगी, जो उन्होंने सहर्ष दे दिया । रात्रि के समय श्री. देव ने बालकराम से भेंट की और उनसे पूछा आपने किस प्रकार बाबा की भक्ति तथा कृपा प्राप्त की है । बालकराम ने कहा मैं दूसरे दिन आरती समाप्त होने के पश्चात् आपको पूर्ण वृतान्त सुनाऊँगा । दूसरे दिन जब श्री. देवसाहब दर्शनार्थ मसजिद में आये तो बाबा ने फिर बीस रुपये दक्षिणा माँगी, जो उन्होंने सहर्ष भेंट कर दी । मसजिद में भीड़ अधिक होने के कारण वे एक ओर एकांत में जाकर बैठ गये । बाबा ने उन्हें बुलाकर अपने समीप बैठा लिया । आरती समाप्त होने के पश्चात जब सब लोग अपने घर लौट गये, तब श्री. देव ने बालकराम से भेंट कर उनसे उनका पूर्व इतिहास जानने की जिज्ञासा प्रगट की तथा बाबा द्घारा प्राप्त उपदेश और ध्यानादि के संबंध में पूछताछ की । बालकराम इन सब बातों का उत्तर देने ही वाले थे कि इतने में चन्द्रू कोढ़ी ने आकर कहा कि श्री. देव को बाबा ने याद किया है । जब देव बाबा के पास पहुँचे तो उन्होंने प्रश्न किया कि वे किससे और क्या बातचीत कर रहे थे । श्री. देव ने उत्तर दिया कि वे बालकराम से उनकी कीर्ति का गुणगान श्रवण कर रहे थे । तब बाबा ने उनसे पुनः 25 रुपये दक्षिणा माँगी, जो उन्होंने सहर्ष दे दी । फिर बाबा उन्हें भीतर ले गये और अपना आसन ग्रहण करने के पश्चात् उन पर दोषारोपण करते हुए कहा कि मेरी अनुमति के बिना तुमने मेरी चिन्दियों की चोरी की है । श्री. देव ने उत्तर दिया भगवन । जहाँ तक मुझे स्मरण है, मैंने ऐसा कोई कार्य नहीं किया है । परन्तु बाबा कहाँ मानने वाले थे । उन्होंने अच्छी तरह ढँढ़ने को कहा । उन्होंने खोज की, परन्तु कहीं कुछ भी न पाया । तब बाबा ने क्रोधित होकर कहा कि तुम्हारे अतिरिक्त यहाँ और कोई नहीं हैं । तुम्ही चोर हो । तुम्हारे बाल तो सफेद हो गये है और इतने वृदृ होकर भी तुम यहां चोरी करने को आये हो । इसके पश्चात् बाबा आपे से बाहर हो गये और उनकी आँखें क्रोध से लाल हो गई । वे बुरी तरह से गालियाँ देने और डाँटने लगे । देव शान्तिपूर्वक सब कुछ सुनते रहे । वे मार पड़ने की भीआशंका कर रहे थे कि एक घण्टे के पश्चात् ही बाबा ने उनसे वाड़े में लौटने को कहा । वाड़े को लौटकर उन्होंने जो कुछ हुआ था, उसका पूर्ण विवरण जोग और बालकराम को सुनाया । दोपहर के पश्चात बाबा ने सबके साथ देव को भी बुलाया और कहने लगे कि शायद मेरे शब्दों ने इस वृदृ को पीड़ा पहुँचाई होगी । इन्होंने चोरी की है और इसे ये स्वीकार नहीं करते है । उन्होंने देव से पुनः बारह रुपये दक्षिणा माँगी, जो उन्होंने एकत्र करके सहर्ष भेंट करते हुए उन्हें नमस्कार किया । तब बाबा देव से कहने लगे कि तुम आजकल क्या कर रहे हो । देव ने उत्तर दिया कि कुछ भी नहीं । तब बाबा ने कहा प्रतिदिन पोथी (ज्ञानेश्वरी) का पाठ किया करो । जाओ, वाडें में बैठकर क्रमशः नित्य पाठ करो और जो कुछ भी तुम पढ़ो, उसका अर्थ दूसरों को प्रेम और भक्तिपूर्वक समझाओ । मैं तो तुम्हें सुनहरा शेला (दुपट्टा) भेंट देना चाहता हूँ, फिर तुम दूसरों के समीप चिन्दियों की आशा से क्यों जाते हो । क्या तुम्हें यह शोभा देता है ।



पोथी पढ़ने की आज्ञा प्राप्त करके देव अति प्रसन्न हुए । उन्होंने सोचा कि मुझे इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो गई है और अब मैं आनन्दपूर्वक पोथी (ज्ञानेश्वरी) पढ़ सकूँगा । उन्होंने पुनः साष्टांग नमस्कार किया और कहा कि हे प्रभु । मैं आपकी शरण हूँ । आपका अबोध शिशु हूँ । मुझे पाठ में सहायता कीजिये । अब उन्हें चिन्दियों का अर्थ स्पष्टतया विदित हो गया था । उन्होंने बालकराम से जो कुछ पूछा था, वह चिन्दी स्वरुप था । इन विषयों में बाबा को इस प्रकार का कार्य रुचिकर नहीं था । क्योंकि वे स्वंय प्रत्येक शंका का समाधान करने को सदैव तैयार रहते थे । दूसरों से निरर्थक पूछताछ करना वे अच्छा नहीं समझते थे, इसलिये उन्होंने डाँटा और क्रोधित हुए । देव ने इन शब्दों को बाबा का शुभ आर्शीवाद समझा तथा वे सन्तुष्ट होकर घर लौट गये ।
यह कथा यहीं समाप्त नहीं होती । अनुमति देने के पश्चात् भी बाबा शान्त नहीं बैठे तथा एक वर्ष के पश्चात ही वे श्री. देव के समीप गये और उनसे प्रगति के विषय में पूछताछ की । 2 अप्रैल, सन् 1914 गुरुवार को सुबह बाबा ने स्वप्न में देव से पूछा कि क्या तुम्हें पोथी समझ में आई । जब देव ने स्वीकारात्मक उत्तर न दिया तो बाबा बोले कि अब तुम कब समझोगे । देव की आँखों से टप-टप करके अश्रुपात होने लगा और वे रोते हुए बोले कि मैं निश्चयपूर्वक कह रहा हूँ कि हे भगवान् । जब तक आपकी कृपा रुपी मेघवृष्टि नहीं होती, तब तक उसका अर्थ समझना मेरे लिये सम्भव नहीं है और यह पठन तो भारस्वरुप ही है । तब वे बोले कि मेरे सामने मुझे पढ़कर सुनाओ । तुम पढ़ने में अधिक शीघ्रता किया करते हो । फिर पूछने पर उन्होंने अध्यात्म विषयक अंश पढ़ने को कहा । देव पोथी लाने गयेऔर जब उन्होंने नेत्र खोले तो उनकी निद्रा भंग हो गई थी । अब पाठक स्वयं ही इस बात का अनुमान कर लें कि देव को इस स्वप्न के पश्चात् कितना आनंद प्राप्त हुआ होगा ।

(श्री. देव अभी (सन् 1944) जीवित है और मुझे गत 4-5 वर्षों के पूर्व उनसे भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था ।

जहाँ तक मुझे पता चला है, वह यही है कि वे अभी भी ज्ञानेश्वरी का पाठ किया करते है । उनका ज्ञान अगाध और पूर्ण है । यह उनके साई लीला के लेख से स्पष्ट प्रतीत होता है) । (ता. 19.10.1944)

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

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Wednesday, 22 June 2016

साईं नाथ दया करना इतनी

ॐ सांई राम




साईं नाथ दया करना इतनी,
नित नाम तुम्हारा उच्चार करूँ!

बिठाके तुम्हे मन मंदिर में,
दिव्य रूप तुम्हारा निहारा करूँ!
भर के भृग पांतो में प्रेम का जल,
पद पंकज नाथ पखारा करूँ!
मृदु मंजुल भावो की माला बना,
तेरी पूजा के साज संवारा करूँ!

साईं नाथ दया करना इतनी,
नित नाम तुम्हारा उच्चार करूँ!

बनूँ प्रेम पुजारी मैं तुम्हारा प्रभु,
तुम्हारी आरती भव्य उत्तारा करूँ!
तेरे नाम की माला हे साईं,
मन के मनको पे फिराया करूँ!

साईं नाथ दया करना इतनी,
नित नाम तुम्हारा उच्चार करूँ!

तुम आओ न आओ यहाँ साईं,
दिन रात में तुम्हे बुलाया करूँ!
जिस पथ पर पाँव धरे तुमने,
पलके उस पथ पे बिछाया करूँ!

साईं नाथ दया करना इतनी,
नित नाम तुम्हारा उच्चार करूँ!


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Tuesday, 21 June 2016

कर्मों का फल तो बंदे तुझे भोगना पड़ेगा ।

कर्म हो पिछले जन्म के, या इस जन्म कमायें |
लेखा झोखा कर्मों का, हर प्राणी पूर्ण निभाये |

कष्ट लिखे जो भाग्य में, उसको सहता जाये |
प्राणी वो ही सफल है, जो पूर्ण जीवन बिताये |

अपना जीवन अपने हाथो, कभी ना स्वयं गवायें |
आत्महत्या महापाप है, साँई जी ये बतलाये |

कष्टों से हो के परेशान, गर जीवन तू गवाँये |
वही कष्ट फिर पुनर्जन्म, तेरे पीछे पीछे आये |

बाबा जी का नित्य ही, मन में स्मरण लाये |
इस मामूली परिश्रम से, आनन्दी फल पाये |

सात समुद्र पार के भी, भक्तों को खींचे जाये |
पाँव बंधे चिड़िया के जैसे, और खींची चली आये |

प्रति तीजे दिन साँई जी, मस्जिद से दूरी पर जाये |
आँतें उदर से बाहर कर, धौने में लग जाये |

आँतों को कर साफ फिर, बरगद पर रहे सुखाये |
इस क्रिया के साक्षी कई, शिर्डी मे आज भी पाये |

एक रोज एक महाशय, जब द्वारिकामाई आये |
बाबा जी के अंगो को, पृथक पृथक वह पाये |

साँई का हो गया कत्ल, सोचा ये शोर मचाये |
पर सूचना देने वाला ही, पहले पकड़ा जाये |

ये सोच कर महाशय जी, बस चुप्पी साधे जाये |
अगले दिन मस्जिद गये, बाबा को स्वस्थ वह पाये |

बाबा को भक्तों के संग, देख के वह चकराये |
जो देखा आँखो से कल, कहीं स्वपन तो नही आये |

मिलने आना बाबा जी

ॐ सांई राम





जो  प्यार  तुम  हमसे  करते  हो  तो  मिलने  आना  बाबा  जी, 
बस  ध्यान  रहे  इस  बात  का  साईं  भूल  न  जाना  बाबा  जीमैं  देखना  चाहूँ  उसी  तरह  जो  रूप  मेरे  मन  में  है  बसाकन्धे  पर  झोली  लटकी  हो  और  सर  पे  साईं  पटका  कसाएक  हाथ  में  साथ  हो  साईं  एक  हाथ  में  कांसा  बाबा  जीदाड़ी हो  प्यारी  चेहरे  पर  मूछों  की  बात  निराली  होकरुणा  हो  साईं  आँखों  में  हर  दुआ  की  बात  निराली  होतुम  बोलो  तो  अमृत  बरसे  पर  लगे  हमें  की  दिवाली  होतुम  सबकी  झोली  भर  देना  जिसकी  भी  झोली  खाली  होबस  ध्यान  रहे इस  बात  का  साईं  भूल  न  जाना  बाबा  जीजय  साईं  नाथ

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Monday, 20 June 2016

आप सब भी हिस्सेदार बनिए हमारी कामयाबी के ।

https://m.facebook.com/shirdikesaibaba

हमारा फेसबुक पेज लाइक किजिये और हिस्सेदार बनिए हम सब की कामयाबी के,  हम चंद कदम दूर है, 25000 लाइक्स  से।

जीने को तो सब जीते है

ॐ सांई राम




 

कितनी भी ये दुनिया हसीं हो, सांई के दर की बात निराली,
जीने को तो सब जीते है,
पर... सांई के संग की बात निराली है...
...प्रीत लगी तोहे नाम की,
मोहे मिलो तो आ कर सांई...
मेरे अंग संग आप सहाई
मेरे साईं साईं साईं
तुझे पा कर खुशियाँ पायी
मेरे साईं साईं साईं
मेरे घर विच रौनक छाई
मेरे साईं साईं साईं
मेरे अंग संग आप सहाई
मेरे साईं साईं साईं
तुने बिगड़ी मेरी बनाई 

मेरे अंग संग आप सहाई

मेरे साईं साईं साईं

तू ही मेरा पिता

मेरे साईं साईं साईं
तू ही मेरी माई

मेरे साईं साईं साईं

तू ही मेरा सखा



मेरे साईं साईं साईं
तू ही है मेरा भाई
मेरे साईं साईं साईं
मेरे अंग संग आप सहाई
मेरे साईं साईं साईं
तुझे पा कर खुशियाँ पायी
मेरे साईं साईं साईं
मेरे घर विच रौनक छाई
मेरे साईं साईं साई


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Sunday, 19 June 2016

युग बदले रंग बदले नहीं बदले मेरे साईं

ॐ सांई राम




युग  बदले  रंग  बदले  नहीं  बदले  मेरे  साईं
और  किसी  का  प्यार  न  माँगा  जब  प्रीत  साईं  से  लगाई

साईं  मेरे  तन  मन  में  हैं  साईं  ही   मेरी  आत्मा
किस्मत  मेरी  का  क्या  कहना  जो  मिला  ये  परमात्मा 

साईं  भक्ति  साईं  सुमिरन  यही  है  जीवन  की  कमाई
साईं  साईं  जपूँ  हरदम   साईं  भजन  ही  गाऊं

साईं  अपनी  दया  करे  तो  में  शिर्डी  जल्दी  जाऊं 
मुझे  मत  कहो  में  अकेली  हूँ   मेरे  साथ  है  साईं 

जिसके  साथ  है  साईं  उसके  साथ  सारी  खुदाई
युग  बदले  रंग  बदले  नहीं  बदले  मेरे  साईं

दुनियाँ  की  दौलत  का  क्या  करना  जब  साईं  है  पास  मेरे 
किसी  और  की  चिंता  में  मन  क्यूँ  भटके  जब  साईं  है  एहसास  मेरे 

ये  सारी  दुनियाँ  बस  एक  साईं  नाम  में  हे  समाई 
युग  बदले  रंग  बदले  नहीं  बदले  मेरे  साई

ॐ सांई राम
-: आज का साईं सन्देश :-
शिर्डी में सब ही बसें,
निर्धन और धनवान |
साईं के दरबार में,
सब पावें सम्मान ||

जीव,जंतु,जन धन्य हैं,
शिर्डी जन्म लिवाय |
साईं चरनन धूरि जब,
मस्तक पर लग जाय ||
 
बाबा की कृपा हम सब पर बनी रहे |


  
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Gautam Budh Nagar, Uttar Pradesh. INDIA.