शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 10 January 2015

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी : गुरुगद्दी मिलना

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी : गुरुगद्दी मिलना









श्री गुरु तेग बहादर जी के समय जब औरंगजेब के हुकम के अनुसार कश्मीर के जरनैल अफगान खां ने कश्मीर के पंडितो और हिंदुओं को कहा कि आप मुसलमान हो जाओ| अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो क़त्ल कर दिया जायेगा| कश्मीरी पंडित भयभीत हो गए| उन्होंने अपना अन्न जल त्याग दिया और प्रार्थना करने लगे| कुछ दिन के बाद उन्हें आकाशवाणी के द्वारा अनुभव हुआ कि इस समय धर्म की रक्षा करने वाले श्री गुरु तेग बहादर जी हैं| आप पंजाब जाकर अपनी व्यथा बताओ| वह आपकी सहायता करने में समर्थ हैं| 

आकाशवाणी के अनुसार पंडित पूछते-पूछते श्री गुरु तेग बहादर जी के पास आनंदपुर आ गए और प्रार्थना की कि महाराज! हमारा धर्म खतरे में है हमे बचाएं| 

उनकी पूरी बात सुनकर गुरु जी सोच ही रहे थे कि श्री गोबिंद सिंह जी वहाँ आ गए| गुरु जी कहने लगे बेटा! इन पंडितो के धर्म की रक्षा के लिए कोई ऐसा महापुरुष चाहिए, जो इस समय अपना बलिदान दे सके| 

पिता गुरु का वह वचन सुनकर श्री गोबिंद जी ने कहा कि पिता जी! इस समय आप से बड़ा और कौन महापुरुष है, जो इनके धर्म कि रक्षा कर सकता है? आप ही इस योग्य हो| 

अपने नौ साल के पुत्र की यह बात सुनकर गुरु जी बहुत प्रसन्न हुए| आपने पंडितो को कहा कि जाओ अफगान खां से कह दो कि अगर हमारे आनंदपुर वासी गुरु जी मुसलमान हो जाएगें तो हम भी मुसलमान बन जाएगें|

यह बात सुनकर औरंगजेब ने गुरु जी को दिल्ली बुला लिया| गुरु जी ने सन्देश वाहक को कहा कि तुम चले जाओ हम अपने आप बादशाह के पास पहुँच जाएगें| गुरु जी ने घर बाहर का प्रबंध मामा कृपाल चंद को सौंप कर तथा हर बात अपने साहिबजादे को समझा दी और आप पांच सिखों को साथ लेकर दिल्ली की और चल दिए|

जब गुरु साहिब जी किसी भी तरह ना माने तो औरंगजेब ने गुरु जी को डराने के लिए भाई मति दास को आरे से चीर दिया और भाई दिआले जी को पानी की उबलती हुई देग में डालकर आलू की तरह उबाल दिया| दोनों सिखों ने अपने आप को हँस-हँस कर पेश किया| जपुजी साहिब का पाठ तथा वाहि गुरु का उच्चारण करते हुए सच खंड जा विराजे| बाकी तीन सिख गुरु जी के पास रह गए| 

गुरु जी ने अपना अन्तिम समय नजदीक जानकर बाकी तीन सिखों को वचन किया कि तुम अपने घरों को चले जाओ अब यहाँ रहने का कोई लाभ नहीं है| उन्होंने प्रार्थना की कि महाराज! हमारे हाथ पैरों को बेडियाँ लगी हुई हैं, दरवाजों पर ताले लगे हुए हैं हम यहाँ से किस तरह से निकले| गुरु जी ने वचन किया कि आप इस शब्द का "कटी बेडी पगहु ते गुरकीनी बन्द खलास" का पाठ करो| आपकी बेडियाँ टूट जाएगीं और दरवाजों के ताले खुल जाएगे और तुम्हें कोई नहीं देखेगा|
इसके पश्चात गुरु जी ने अपनी माता जी व परिवार को धैर्य देने वह प्रभु की आज्ञा को मानने के लिए शलोक लिखकर भेजे - 


गुन गोबिंद गाइिओ नही जनमु अकारथ कीन|| 
कहु नानक हरि भजु मना जिहि विधि जल कौ मीन||१||

यहाँ से आरम्भ करके अंत में लिखा -

राम नामु उरि मै गहियो जाकै सम नही कोइि|| 
जिह सिमरत संकट मिटै दरसु तुहारो होइि||५७|| 

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब पन्ना १४२६-१४२९)

इन शालोको के साथ ही गुरु जी ने पांच पैसे और नारियल एक सिख के हाथ आनंदपुर भेज के गुरु गद्दी अपने सुपुत्र श्री गोबिंद राय को दे दी|

परन्तु गुरुगद्दी पर बैठने की पूरी मर्यादा श्री गुरु तेग बहादर जी के अन्तिम संस्कार करने के बाद 12 मघहर संवत 1232 को की गई| इस समय बाबा बुड्डा जी से पांचवी पीढ़ी उनके बड़े पोत्र बाबा राम कुइर (बाबा गुरबक्श सिंह) जी ने आप जी को गुरुगद्दी का तिलक लगाकर गुरु की मर्यादा अर्पण की| इसके पश्चात संगत ने अपनी अपनी भेंट अर्पण करके आपको नमस्कार किया|

आपजी ने गुरुगद्दी पर बैठकर अपने बाबा श्री गुरु हरि गोबिंद जी की तरह मीरी-पीरी दोनों कामों को अपना लिया| अच्छे योद्धा, शस्त्र व घोड़े अपने पास इक्टठे करने शुरू कर दिए| बीबी वीरो के पांच पुत्र, बाबा सूरज मल जी के दो पौत्र तथा श्री गुरु हरिगोबिंद जी के प्र्रोहित का पुत्र दयानन्द आदि योद्धे सतिगुरु के पास आनंदपुर रहने लगे| सतिगुरु जी इन से मिलकर नित्य प्रति शस्त्र विद्या का और घोड़े की सवारी का अभ्यास करते रहते| इनके साथ ही आपजी गुरु घर की मर्यादा के अनुसार सिख सेवकों को सतिनाम के उपदेश द्वरा आनन्दित करते| 
बिचित्र नाटक में आप जी लिखते हैं - 

राज साज हम पर जब आयो || जथा शकत तब धरम चलायो || 
भांति भांति बन खेल शिकारा || मरे रीछरोझ झंखार || १ || 

(दशम-ग्रंथ: बिचित्र नाटक: ७ वां अध्याय)

Friday, 9 January 2015

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी : जीवन-परिचय

 






श्री गुरु गोबिंद सिंह जी :
जीवन-परिचय























Parkash Ustav (Birth date): December 22, 1666 at Patna Sahib, Bihar. 
प्रकाश उत्सव (जन्म की तारीख): पटना साहिब, बिहार में 22 दिसंबर 1666.

Father: Guru Teg Bahadar ji 
पिता: श्री गुरु तेग बहादर जी

Mother: Mata Gujri ji 
माँ: माता गुजरी जी

Mahal (spouse): Mata Sundri ji, Mata Jeto J, Mata Sahib Kaur Ji 
महल (पति या पत्नी): माता सुन्दरी जी, माता जेतो जम्मू, माता साहिब कौर जी

Sahibzaday (offspring): Baba Ajit Singh, Baba Jujhar Singh, Baba Zorawar Singh and Baba Fateh Singh 
साहिबज़ादे (वंश): बाबा अजीत सिंह, बाबा जूझर सिंह, बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह

Joti Jyot (ascension to heaven): October 7, 1708 at Nanded. 
ज्योति ज्योत (स्वर्ग करने के उदगम): नांदेड़ में 7 अक्टूबर 1708.



वह प्रगटिओ मरद अगंमड़ा वरियाम अकेला || 
वाहु वाहु गोबिंद सिंह आपे गुर चेला || १७ || 

(भाई गुरदास दूजा)

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म पोरव सुदी सप्तमी संवत 1723 विक्रमी को श्री गुरु तेग बहादर जी के घर माता गुजरी जी की पवित्र कोख से पटना शहर में हुआ| 
मुर पित पूरब कीयसि पयाना || भांति भांति के तीरथि नाना || 

जब ही जात त्रिबेणी भए || पुन दान निन करत बितए || 
तही प्रकास हमारा भयो || पटना सहर विखे भव लयो || 

(दशम-ग्रंथ: बिचित्र नाटक ७ वां अध्याय)


माता नानकी जी ने अपने पौत्र के जन्म की खबर देने के लिए एक विशेष आदमी को चिट्ठी देकर अपने सुपुत्र श्री गुरु तेग बहादर जी के पास धुबरी शहर भेजा| गुरु जी ने चिट्ठी पड़कर जब राजा राम सिंह को खुशी भरी खबर सुनाई तब राजा ने अपने फौजी बाजे बजवाए| तोपों की सलामी दी तथा गरीबों को दान दिया| चिट्ठी लेकर आने वाले सिख को गुरु जी ने बहुत धन दिया उसका लोक परलोक संवार दिया|

इसके पश्चात गुरु जी ने माता जी को चिट्ठी लिखी कि माता जी! इस समय हम कामरूप के पास धुबरी शहर ठहरे हुए हैं| राजा राम सिंह का काम संवार कर जल्दी वापस आप के पास पटने आ जाएगे| गुरु नानक साहिब आपके अंग-संग हैं| आपने चिंता नहीं करनी| साहिबजादे का नाम "गोबिंद राय" रखना| यह आशीष और धैर्य पूर्ण चिट्ठी पड़कर माताजी और परिवार के अन्य सदस्य बहुत खुश हुए|

जो कोई भी भिखारी और प्रेमी माता जी को बधाई देने घर आता माता जी उसको धन, वस्त्र और मिठाई आदि से प्रसन्न करके घर से भेजते| माता जी ने साहिबजादे के सोने व खेलने के लिए एक सुन्दर पंघूड़ा बनवाया जिसमे साहिबजादे को लेटाकर माता जी लोरियाँ देती व पंघूड़ा हिलाकर मन ही मन खुश होती| आपके हाथों के कड़े, पाँव के कड़े और कमर की तड़ागी के घुंघरू खनखनाते रहते| माता नानकी जी बालक गोबिंद राय को स्नान कराकर सुंदर गहने व कपड़े पहनाते|

पटने से आनंदपुर साहिब बुलाकर श्री गुरु तेग बहादर जी ने अपने सुपुत्र श्री गोबिंद राय जी को घुड़ सवारी, तीर कमान, बन्दूक चलानी आदि कई प्रकार की शिक्षा सिखलाई का प्रबंध किया| बच्चो के साथ बाहर खेलते समय मामा कृपाल जी को आपकी निगरानी के लिए नियत कर दिया| इस प्रकार श्री गुरु तेग बहादर जी के किए हुए प्रबंध के अनुसार आप शिक्षा लेते रहे|



दशमेश जी इस प्रथाए अपनी आत्म कथा बचित्र नाटक में लिखते हैं -


मद्र देस हम को ले आए || भांति भांति दाईयन दुलराऐ || 
कीनी अनिक भांति तन रछा || दीनी भांति भांति की सिछा || 

(दशम ग्रंथ बिचित्र नाटक, ७ वा अध्याय)

प्राग राज के निवास समय श्री गोबिंद राय जी के जन्म से पहले एक दिन माता नानकी जी ने स्वाभाविक श्री गुरु तेग बहादर जी को कहा कि बेटा! आप जी के पिता ने एक बार मुझे वचन दिया था कि तेरे घर तलवार का धनी बड़ा प्रतापी शूरवीर पोत्र इश्वर का अवतार होगा| मैं उनके वचनों को याद करके प्रतीक्षा कर रही हूँ कि आपके पुत्र का मुँह मैं कब देखूँगी| बेटा जी! मेरी यह मुराद पूरी करो, जिससे मुझे सुख कि प्राप्ति हो|

अपनी माता जी के यह मीठे वचन सुनकर गुरु जी ने वचन किया कि माता जी! आप जी का मनोरथ पूरा करना अकाल पुरख के हाथ मैं है| हमें भरोसा है कि आप के घर तेज प्रतापी ब्रह्मज्ञानी पोत्र देंगे|

गुरु जी के ऐसे आशावादी वचन सुनकर माता जी बहुत प्रसन्न हुए| माता जी के मनोरथ को पूरा करने के लिए गुरु जी नित्य प्रति प्रातकाल त्रिवेणी स्नान करके अंतर्ध्यान हो कर वृति जोड़ कर बैठ जाते व पुत्र प्राप्ति के लिए अकाल पुरुष कि आराधना करते|

गुरु जी कि नित्य आराधना और याचना अकाल पुरख के दरबार में स्वीकार हो गई| उसुने हेमकुंट के महा तपस्वी दुष्ट दमन को आप जी के घर माता गुजरी जी के गर्भ में जन्म लेने कि आज्ञा की| जिसे स्वीकार करके श्री दमन (दसमेश) जी ने अपनी माता गुजरी जी के गर्भ में आकर प्रवेश किया|


श्री दसमेश जी अपनी जीवन कथा बचितर नाटक में लिखते है -

|| चौपई || 

मुर पित पूरब कीयसि पयाना || भांति भांति के तीरथि नाना || 
जब ही जात त्रिबेणी भए || पुन्न दान दिन करत बितए || १ || 
तही प्रकास हमारा भयो || पटना सहर बिखे भव लयो || २ || 

(दशम ग्रन्थ: बिचित्र नाटक, ७वा अध्याय)

पहला विवाह
संवत 1734 की वैसाखी के समय जब देश विदेश से सतगुरु के दर्शन करने के लिए संगत आई और लाहौर की संगत में एक सुभीखी क्षत्री जिसका नाम हरजस था उन्होंने अपनी लड़की जीतो का रिश्ता श्री (गुरु) गोबिंद राय जी के साथ कर दिया| विवाह की मर्यादा को 23 आषाढ़ संवत 1734 को पूर्ण किया| आज कल यह स्थान "गुरु का लाहौर" नाम से प्रसिद्ध है|

साहिबजादे

चेत्र सुदी सप्तमी मंगलवार संवत 1747 को साहिबजादे श्री जुझार सिंह जी का जन्म हुआ|

माघ महीने के पिछले पक्ष में रविवार संवत् 1753 को साहिबजादे श्री जोरावर सिंह जी का जन्म हुआ|

बुधवार फाल्गुन महीने संवत् 1755 को साहिबजादे श्री फतह सिंह जी का जन्म हुआ|

दूसरा विवाह
संवत 1741 की वैसाखी के समय जब देश विदेश से सतगुरु के दर्शन करने के लिए संगत आई और लाहौर की संगत में एक कुमरा क्षत्री जिसका नाम दुनीचंद था उन्होंने अपनी लड़की सुन्दरी का विवाह सात बैसाख श्री (गुरु) गोबिंद राय जी के साथ कर दिया|

साहिबजादे

23 माघ संवत 1743 को साहिबजादे श्री अजीत सिंह जी का जन्म पाऊँटा साहिब में हुआ|

Thursday, 8 January 2015

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 11

ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं
हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है
हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा
किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है


श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 11

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सगुण ब्रहम श्री साईबाबा, डाँक्टर पंडित का पूजन, हाजी सिद्दीक फालके, तत्वों पर नियंत्रण ।
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इस अध्याय में अब हम श्री साईबाबा के सगुण ब्रहम स्वरुप, उनका पूजन तथा तत्वनियंत्रण का वर्णन करेंगे । 


Wednesday, 7 January 2015

श्री गुरु तेग बहादर जी की शहीदी

श्री गुरु तेग बहादर जी




श्री गुरु तेग बहादर जी की शहीदी


औरंगजेब एक कट्टर मुसलमान था| जो कि अपनी राजनीतिक व धार्मिक उन्नति चाहता था| इसके किए उसने हिंदुओं पर अधिक से अधिक अत्याचार किए| कई प्रकार के लालच व भय देकर हिंदुओं को जबरदस्ती मुसलमान बनाया| उसने अपने जरनैलो को भी आज्ञा दे दी हिंदुओं को किसी तरह भी मुसलमान बनाओ| जो इस बात के लिए इंकार करे उनका क़त्ल कर दिया जाए| 

औरंगजेब के हुकम के अनुसार कश्मीर के जरनैल अफगान खां ने कश्मीर के पंडितो और हिंदुओं को कहा कि आप मुसलमान हो जाओ| अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो क़त्ल कर दिया जायेगा| कश्मीरी पंडित भयभीत हो गए| उन्होंने अपना अन्न जल त्याग दिया और प्रार्थना करने लगे| कुछ दिन के बाद उन्हें आकाशवाणी के द्वारा अनुभव हुआ कि इस समय धर्म की रक्षा करने वाले श्री गुरु तेग बहादर जी (Shri Guru Tek Bahadar Ji) हैं| आप पंजाब जाकर अपनी व्यथा बताओ| वह आपकी सहायता करने में समर्थ हैं| 

आकाशवाणी के अनुसार पंडित पूछते-पूछते श्री गुरु तेग बहादर जी के पास आनंदपुर आ गए और प्रार्थना की कि महाराज! हमारा धर्म खतरे में है हमे बचाएं| 

उनकी पूरी बात सुनकर गुरु जी सोच ही रहे थे कि श्री गोबिंद सिंह जी (Shri Guru Gobind Singh Ji) वहाँ आ गए| गुरु जी कहने लगे बेटा! इन पंडितो के धर्म की रक्षा के लिए कोई ऐसा महापुरुष चाहिए, जो इस समय अपना बलिदान दे सके| 

पिता गुरु का वह वचन सुनकर श्री गोबिंद जी ने कहा कि पिता जी! इस समय आप से बड़ा और कौन महापुरुष है, जो इनके धर्म कि रक्षा कर सकता है? आप ही इस योग्य हो| 

अपने नौ साल के पुत्र की यह बात सुनकर गुरु जी बहुत प्रसन्न हुए| आपने पंडितो को कहा कि जाओ अफगान खां से कह दो कि अगर हमारे आनंदपुर वासी गुरु जी मुसलमान हो जाएगें तो हम भी मुसलमान बन जाएगें|

यह बात सुनकर औरंगजेब ने गुरु जी को दिल्ली बुला लिया| गुरु जी ने सन्देश वाहक को कहा कि तुम चले जाओ हम अपने आप बादशाह के पास पहुँच जाएगें| गुरु जी ने घर बाहर का प्रबंध मामा कृपाल चंद को सौंप कर तथा हर बात अपने साहिबजादे को समझा दी और आप पांच सिक्खों को साथ लेकर दिल्ली की और चल दिए| 

आगरे पहुँच कर गुरु जी ने एक गडड़ीए के द्वारा कौतक रच के अपने आप को बंदी बना लिया| औरंगजेब ने आपको बंदीखाने में बंद करके काजी को गुरु जी के पास भेजा और प्रार्थना की कि आप मुसलमान हो जाओ| गुरु जी ने वचन किया तुम सारे देश में एक धर्म करना चाहते हो परन्तु यदि परमात्मा चाहे तो दो धर्मो के तीन हो जायेगें| इस बात को सिद्ध करने के लिए गुरु जी ने एक मण मिर्च मंगाई और उन्हें जलाया| आगे से गुरु जी कहने लगे यदि राख में से एक मिर्च साबुत निकली तो परमात्मा को एक धर्म कबूल होगा यदि दो निकली तो दो धर्म और अगर तीन मिर्चे साबुत निकली तो समझ लेना कि परमात्मा को तीसरा धर्म कबूल होगा| 

इस तरह जब मिर्चो का ढेर जलाकर औरंगजेब ने राख को बिखेर कर देखा तो उसमे से तीन मिर्चे साबुत निकली| यह निर्णय देखकर बादशाह हैरान हो गया| 

इसके पश्चात जब गुरु जी किसी तरह भी मुसलमान होना ना माने तो उन्हें करामात दिखाने के लिए कहा गया| गुरु जी ने करामात को कहर का नाम दिया और करामात दिखने से मना कर दिया| औरंगजेब ने कहा ना आप इस्लाम धर्म कबूल करना चाहतें हैं और ना ही कोई करामात दिखाना चाहतें हैं तो फिर कत्ल के लिए तैयार हो जाइए| गुरु जी ने कहा हमें आप की दोनों बाते स्वीकार नहीं परन्तु तुम्हारी तीसरी बात कत्ल होना हमे स्वीकार है| 

इस समय गुरु जी के साथ पांच सेवादार सिख भी कैद थे-

· भाई मति दास

· भाई दिआला जी

· भाई गुरदित्ता जी

· भाई ऊदो जी

· भाई चीमा जी



जब गुरु साहिब जी किसी भी तरह ना माने तो औरंगजेब ने गुरु जी को डराने के लिए भाई मति दास को आरे से सिरवा दिया और भाई दिआले जी को पानी की उबलती हुई देग में डालकर आलू की तरह उबाल दिया| दोनों सिखों ने अपने आप को हँस-हँस कर पेश किया| जपुजी साहिब का पाठ तथा वाहि गुरु का उच्चारण करते हुए सच खंड जा विराजे| बाकी तीन सिख गुरु जी के पास रह गए| 

गुरु जी ने अपना अन्तिम समय नजदीक जानकर बाकी तीन सिखों को वचन किया कि तुम अपने घरों को चले जाओ अब यहाँ रहने का कोई लाभ नहीं है| उन्होंने प्रार्थना की कि महाराज! हमारे हाथ पैरों को बेडियाँ लगी हुई हैं, दरवाजों पर ताले लगे हुए हैं हम यहाँ से किस तरह से निकले| गुरु जी ने वचन किया कि आप इस शब्द का "कटी बेडी पगहु ते गुरकीनी बन्द खलास" का पाठ करो| आपकी बेडियाँ टूट जाएगीं और दरवाजों के ताले खुल जाएगे और तुम्हें कोई नहीं देखेगा|

गुरु जी का वचन मानकर दो सिख आज़ाद हो कर चले गए| बाद में भाई गुरु दित्ता ही गुरु जी से पास रह गए| गुरु जी ने अपनी मस्ती में यह शलोक पड़ा|

शलोक महला ९

संग सखा सब तजि गए कोऊ न निबहिओ साथ||
कहु नानक इिह बिपत मै टेक एक रघुनाथ||५५||




इसके पश्चात गुरु जी ने अपनी माता जी व परिवार को धैर्य देने वह प्रभु की आज्ञा को मानने के लिए शलोक लिखकर भेजे - 

गुन गोबिंद गाइिओ नही जनमु अकारथ कीन||
कहु नानक हरि भजु मना जिहि विधि जल कौ मीन||१||




यहाँ से आरम्भ करके अंत में लिखा -

राम नामु उरि मै गहियो जाकै सम नही कोइि||
जिह सिमरत संकट मिटै दरसु तुहारो होइि||५७||

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब पन्ना १४२६-१४२९)




इन शालोको के साथ ही गुरु जी ने पांच पैसे और नारियल एक सिख के हाथ आनंदपुर भेज के गुरु गद्दी अपने सुपुत्र श्री गोबिंद राय को दे दी|

अंत में जब 13 माघ (सुदी 5) संवत 1732 विक्रमी का अभाग्यशाली दिन वीरवर आ गया| आप जी को चाँदनी चौक कोतवाली के पास सूर्य अस्त के समय बादशाह के हुक्म से जल्लाद ने तलवार के एक वार से शहीद कर दिया| इस निर्दय सके का वर्णन गुरु गोबिंद सिंह जी ने इस तरह किया-

तेग बहादर के चलत भयो जगत को शोक||
है है है सब जग भयो जै जै जै सुर लोक||१६||

(दशम ग्रंथ: बिचित्र नाटक, ५ अध्याय)




इस अत्याचार के समय इतिहासकार लिखते हैं कि बहुत भयानक काली आंधी चली| जिसके अंधकार मैं आपजी का पवित्र शीश भाई जैता (जीऊन सिंह) अपने कपड़ो में लपेटकर जल्दी-जल्दी चलकर आनंदपुर ले आया| यहाँ आप जी के शीश को बड़े सत्कार, वैराग्य तथा शोक सहित अग्नि भेंट किया गया| इस स्थान गुरुद्वारा "शीश गंज" सुशोभित है|

इसके पश्चात इस आंधी के गुबार में ही आप जी का पवित्र धड़ एक लुबाणा सिख अपनी बैल गाड़ी के माल में ले गया और अपनी कुटीर में रख दिया| फिर उसने आग लगाकर धड़ को वहीं अग्नि भेंट कर दिया| इस स्थान पर "गुरुद्वारा रकाबगंज" सुशोभित है|

Tuesday, 6 January 2015

श्री गुरु तेग बहादर जी – साखियाँ - एक पीर का भ्रम निवृत करना

श्री गुरु तेग बहादर जी – साखियाँ





एक पीर का भ्रम निवृत करना

एक दिन एक पीर जी कि रोपड़ में रहता था अपने मुरीदो से कार भेंट लेता हुआ आनंदपुर आया| गुरु जी के दरबार की महिमा संगत का आना-जाना तथा लंगर चलता देख वह बड़ा प्रभावित हुआ| उसने एक सिख से पूछा यह किस गद्दी का गुरु है? सिख ने कहा यह गुरु नानक साहिब जी की गद्दी पर बैठे नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादर जी हैं| पीर ने कहा गुरु नानक जी तो बड़े बली महापुरुष हुए हैं| अगर यह इनकी गद्दी पर विराजमान हैं तो इनमे भी शक्ति होनी चाहिए| सिख ने कहा गुरु जी वैराग्य के पुंज और शक्ति के मालिक हैं|

पीर ने अगला प्रशन किया कि गुरु जी ग्रहस्थी हैं या फकीर? सिख ने उत्तर दिया की गुरु जी ग्रहस्थी हैं| गुरु नानक देव जी भी ग्रहस्थी थे| पीर ने फिर कहा वैराग्य गुरु पीर होकर फिर यह ग्रहस्थ का आडम्बर क्यों?

इसके पश्चात पीर ने गुरु जी के दर्शन करके जब यही सवाल पूछा तो गुरु जी ने कहा साईं लोगों! ग्रहस्थ सब धर्मों से ऊँचा है| यह सारे पीरो-फकीरों, ऋषि-मुनियों को पैदा करता है फिर सबकी गुजरान का आधार रहता है| जो पुरुष ग्रहस्थ धर्म में पूरे उतरते हैं उन्हें अन्तिम समय मुक्ति प्राप्त होती है|

ग्रहस्थ का धर्म है अतिथि की सवा करनी तथा अपनी नेक कमाई से पुण्य दान करना| ऐसा ग्रहस्थी परम सुख प्राप्त करता है|

गुरु जी से यह बात सुनकर पीर ने गुरु जी को माथा टेका और कहा कि अब मुझे इस बात का ज्ञान हो गया है की ग्रहस्थ धर्म पुरुष का मुख्य उदेश्य है इसको बुरा समझना एक बड़ी भूल है|

Monday, 5 January 2015

श्री गुरु तेग बहादर जी – साखियाँ - सिंघा द्वारा गुरु का वचन मानना

श्री गुरु तेग बहादर जी – साखियाँ




सिंघा द्वारा गुरु का वचन मानना

अलीशेर से गुरु जी जोगे गाँव आए| आप ने भोपाला गाँव में डेरा लगाया| वहाँ रात ठहर कार आप खीवा कलां जा ठहरे| इस गाँव का एक किसान रोज आपके दर्शन को आता| वह तीन घड़ी बैठा भी रहता| परन्तु एक दिन वह माथा टेक कर झटपट ही उठकर चला गया|गुरु जी ने उससे इसका कारण पूछा कि आज आप जल्दी क्यों जा रहे हो?

सिंघा ने कहा कि गुरु जी आज एक व्यक्ति के यहाँ सगाई है| वहाँ सबको गुड़ मिलना है| मुझे भी अपने हिस्से का गुड़ लेने जाना है| गुरु जी ने वचन किया कि आप यहाँ धैर्य सहित बैठे रहे| आपको घर बैठे ही दो बाँटने आ जाया करेंगे| गुरु जी का वचन सुनकर सिंघा वहीं बैठा रहा|

उधर जिसके घर सगाई थी, जब उसे इस बात का ज्ञान हुआ कि सिंघा गुरु जी के पास बैठा है तो गाँव के चौधरी ने कहा कि साधू संत के पास जाना ठीक है| आगे से तुम्हें उसे दो बाँटने वाले दिया करो| यदि वह खुद ना लेने आए तो उसके घर दे आया करो| उस दिन से सिंघा को दो बाँटने वाले मिलने लगे|

सिंघा के बिना इस गाँव का और कोई भी आदमी गुरु जी के दर्शन करने नहीं आया| सिंघा बहुत प्रसन्न था कि उसने गुरु जी के वचनों को मानकर कितना अच्छा किया|

Sunday, 4 January 2015

दहेज़ के खिलाफ हमारी आवाज़ ..... साडा हक... ऐथे रख !!

दहेज़ के खिलाफ हमारी आवाज़ ..... साडा हक... ऐथे रख !!

ॐ सांई राम

दहेज़ प्रथा के खिलाफ एक नारा

हम अपने मानव जीवन में स्त्री या पुरुष, बाल या प्रौढ़ किसी भी अवस्था में
क्यों ना हो ....

एक बात तो तय है की, या तो हम ईश्वरिये शक्ति को मानते है या नहीं मानते ...

उस ईश्वरिये शक्ति का कोई मज़हब नहीं, कोई जात नहीं, कोई आकार नहीं, वह तो अनंत
है एवं सभी का स्वामी है

परन्तु एक बात हम भूल जाते है की हम सब की रचना करने वाला केवल एक ही है और
यदि हमे बनाने वाले ने ही

हमारी रचना में किसी तरह का भेद नहीं किया तो फिर हम ही हमारे रचनाकर्ता के
साथ भेद भाव क्यों रखते है ...

किसी भी धर्म या जाती में खून का रंग तो लाल ही होता है |

आसमान भी किसी धर्म को देख कर अपना रंग तो नहीं बदलता |

वायु मज़हब का फर्क देख कर रुख नहीं बदलती |

वादियाँ अपनी सुन्दरता में फर्क नहीं आने देती |

पानी हिन्दू-मुसलमान को अपना स्वाद अलग-अलग ज्ञात नहीं करवाता |

और यही ईश्वरिये क़ानून सिर्फ हिन्दुस्तान में ही नहीं बल्कि सारे संसार में
लागू है |

सिर्फ फर्क इतना है की इश्वर के हाथ की कठपुतली बन कर चलने वाला ये मानव शरीर,

स्वयं को ईश्वरिये शक्ति से भी अधिक बलशाली मानता है,

जबकि वो इस बात से भली भाँती परिचित है की उसकी हैसियत मिटटी से अधिक नहीं है
बल्कि कई गुना कम ही है |

आज आप अपने इश्वर को साक्षी मान कर अपने आप से वायदा करें की आप भले ही दुनिया
के हजारो साल पुरानी,

इस समाज की एक दीवार तो आज गिरा कर ही रहेंगे,

और वह दुनिया की सबसे गन्दी और घिनौनी दीवार है दहेज़ की |

आज आप किसी की बेटी को यदि अपनी बहु के रूप में अपनाने के लिए दहेज़ की मांग
कर भी रहे है,

तो यह बात तय है की लगभग उसका दुगना आप को अपनी बेटी के दहेज़ के लिए भी संजो
कर रखना पड़ेगा|

यदि आज कोई अपनी बहु को दहेज़ के कारण जिंदा जला कर या ख़ुदकुशी के लिए मजबूर
भी कर रहा है तो यह बात जान लो,

की इश्वर हमारे सभी कर्मो का लेखा-झोखा रखता है और उसके न्याय में ज़रा भी रहम
की गुंजाइश नहीं होती....

आज हम आप से बस इतना ही चाहते है बस कुछ पालो के लिए अपने मज़हब को भूल कर,

इस दहेज़ रुपी बिमारी का अंत करने के लिए एक हो जाए..

एक युवा मोर्चे का हिस्सा बने, दहेज़ लेने वालों और देने वालो का नाम जग में
उजागर करे,

ठीक वैसे ही जैसा की आज कल लोग दुसरो की गाड़ियों की तसवीरें खीच कर फेसबुक पर,

दिल्ली ट्रेफिक पुलिस के पेज पर डालना अपना दायित्व समझते है |

क्या इस बिमारी से भी लड़ना आपका दायित्व नहीं है |

चलो आज देखें की कितने लोगो के जवाब हमारी इस आवाज़ के हक में आते है |

हम एक है, तो नेक क्यों नहीं |

दहेज़ के खिलाफ हमारी आवाज़ .....

साडा हक...

ऐथे रख !!

अपना जिगर का टुकड़ा देना दहेज़ देने से लाखो गुणा ऊँचा फैसला है ||

हमारा उद्देश्य किसी की निजी सोच को ठेस पहुचना बिलकुल नहीं है और यदि हमारी
सोच से किसी को कोई आपत्ति है तो ...

हम क्षमाप्रार्थी है..

पर आइना सच्चा चेहरा ही दिखाता है ...

Kindly Provide Food & clean drinking Water to Birds & Other Animals,

This is also a kind of SEWA.

श्री गुरु तेग बहादर जी – साखियाँ - खारा कूआँ मीठा करना

श्री गुरु तेग बहादर जी – साखियाँ





खारा कूआँ मीठा करना

श्री गुरु तेग बहादर जी जब गाँव मूलोवाल पहुँचे तो मईया व गोदे ने आपकी खूब सेवा की| गुरु जी को बहुत प्यास लगी| उन्होंने पीने के लिए पानी मंगवाया| परन्तु पानी बहुत खारा था| गुरु जी ने उनसे पूछा कि यहाँ कोई मीठे पानी का कूआँ नहीं है? तब मईया ने कहा कि महाराज! मीठे पानी का कूआँ गाँव से बहुत दूर है| यदि आप हुक्म करो तो वहाँ से मीठा पानी ले आऊँ|

गुरु जी ने वचन किया जाओ वाहि गुरु कहकर यहाँ से ही हमारे पीने के लिए जल ले आओ| येही मीठा हो जायेगा| गुरु जी का वचन मानकर गोंदा ने वैसा ही किया जैसा गुरु जी ने कहा था| गोंदा जब पानी लाया तो गुरु जी ने पी कर बताया कि यह जल बहुत ठंडा और मीठा है| आज से यह कूआँ गुरु का कहावेगा|

जब लोगों को यह ज्ञात हुआ कि गुरु जी के वचनों से खारे कूएँ का पानी मीठा हो गया है, तो संगत श्रद्धा से साथ भेंट लेकर आपके दर्शन को आई| इस गाँव में आपने दो दिन विश्राम किया| मईया के प्रेम और श्रद्धा से खुश होकर उसको गाँव का चौधरी बना दिया|

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