शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Thursday, 31 December 2015

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 14

ॐ सांई राम



आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं, हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है | हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा | किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 14
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नांदेड के रतनजी वाडिया, संत मौला साहेब, दक्षिणा मीमांसा ।
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श्री साईबाबा के वचनों और कृपा द्घारा किस प्रकार असाध्य रोग भी निर्मूल हो गये, इसका वर्णन पिछले अध्याय में किया जा चुका है । अब बाबा ने किस प्रकार रतन जी वाडिया को अनुगृहीत किया तथा किस प्रकार उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई, इसका वर्णन इस अध्याय में होगा । इस संत की जीवनी सर्व प्रकार से प्राकृतिक और मधुर हैं । उनके अन्य कार्य भी जैसे भोजन, चलना-फिरना तथा स्वाभाविक अमृतोपदेश बड़े ही मधुर हैं । वे आनन्द के अवतार है । इस परमानंद का उन्होंने अपने भक्तों को भी रसास्वादन कराय और इसीलिये उन्हें उनकी चिरस्मृति बनी रही । भिन्न-भिन्न प्रकार के कर्म और कर्तव्यों की अनेक कथाएँ भक्तों को उनके द्घारा प्राप्त हुई, जिससे वे सत्व मार्ग का अवलम्बन करें और वे सदैव जागरुक रहकर अपने जीवन का परम लक्ष्, आत्मानुभूति (या ईश्वरदर्शन) अवश्य प्राप्त करें । पिछले जन्मों के शुभ कर्मों के फलस्वरुप ही यह देह प्राप्त हुई है और उसकी सार्थकता तभी है, जब उसकी सहायता से हम इस जीवन में भक्ति और मोश्र प्राप्त कर सकें। हमें अपने अन्त और जीवन के लक्ष्य के हेतु सदैव सावधान तथा तत्पर रहना चाहिए । यदि तुम नित्य श्री साई की लीलाओं का श्रवण करोगे तो तुम्हें उनाक सदैव दर्शन होता रहेगा । दिनरात उनका हृदय में स्मपण करते रहो । इस प्रकार आचरण करने से मन की चंचलता शीघ्र नष्ट हो जायेगी । यदि इसका निरंतर अभ्यास किया गया तो तुम्हें चैतन्य-घन से अभिन्नता प्राप्त हो जायेगी ।







नांदेड के रतनजी
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अब हम इस अध्याया की मूल कथा का वर्णन करते है । नांदेड़ (निजाम रियासत) में रतनजी शापुरजी वाडिया नामक एक प्रसिदृ व्यापारी रहते थे । उन्होंने व्यापार में यथेष्ठ धनराशि संग्रह कर ली थी । उनके पासा अतुलनीय सम्पत्ति, खेत और चरोहर तथा कई प्रकार के पशु, घोडे़, गधे, खच्चर आदि और गाडि़याँ भी थी । वे अत्यन्त भाग्यशाली थे । यघपि बाहृ दृष्टि से वे अधिक सुखी और सन्तुष्ट प्रतीत होते थे, परन्तु भावार्थ में वे वैसे न थे । विधाता की रचना कुछ ऐसी विचित्र है कि इस संसार में पूर्ण सुखी कोई नहीं और धनाढ्य रतनजी भी इसके अपवाद न थे । वे परोपकारी तथा दानशील थे । वे दीनों को भोजन और वस्त्र वितरण करते तथा सभी लोगों की अनेक प्रकार से सहायता किया करते थे । उन्हें लोग अत्यन्त सुखी समझते थे । किन्तु दीर्घ काल तक संतान न होने के कारण उनके हृदय में संताप अधिक था । जिस प्रकार प्रेम तथा भक्तिरहित कीर्तन, वाघरहित संगीत, यज्ञोपवीतरहित ब्राहृमण, व्यावहारिक ज्ञानरहित कलाकार, पश्चातापरहित तीर्थयात्रा और कंठमाला (मंगलसूत्र) रहित अलंकार, उत्तम प्रतीत नहीं होते, उसी प्रकार संतानरहित गृहस्थ का घर भी सूना ही रहता है । रतनजी सदैव इसी चिन्ता में निमग्न रहते थे । वे मन ही मन कहते, क्या ईश्वर की मुझ पर कभी दया न होगी । क्या मुझे कभी पुत्र की पुत्र की प्राप्ति न होगी । इसके लिये वे सदैव उदास रहते थे । उन्हें भोजन से भी अरुचि हो गई । पुत्र की प्राप्ति कब होगी, यही चिन्ताउनहें सदैव घेरे रहती थी । उनकी दासगणू महाराज पर दृढ़ निष्ठा थी । उन्होंने अपना हृदय उनके सम्मुख खोल दिया, तब उन्होंने श्रीसाई सार्थ की शरण जाने और उनसे संता-प्राप्ति के लिये प्रार्थना करने का परामर्श दिया । रतनजी को भी यह विचार रुचिकर प्रतीत हुआ और उन्होंने शिरडी जाने का निश्चय किया । कुछ दिनों के उपरांत वे शिरडी आये और बाबा के दर्शन कर उनके चरणों पर गिरे । उन्होंने एक सुन्दर हार बाबा को पहना कर बहुत से फल-फूल भेंट किये । तत्पश्चात् आदर सहित बाबा के पास बैठकर इस प्रकार प्रार्थना करने लगे, अनेक आपत्तिग्रस्त लोग आप के पास आते है और आप उनके कष्ट तुरंत दूर कर देते है । यही कीर्ति सुनकर मैं भी बड़ी आशा से आपके श्रीचरणों में आया हूँ । मुझे बड़ा भरोसा हो गया है, कृपया मुझे निराश न कीजिये । श्रीसाईबाबा ने उनसे पाँच रुपये दक्षिणा माँगी, जो वे देना ही चाहते थे । परन्तु बाबा ने पुनः कहा, मुझे तुमसे तीन रुपये चौदह आने पहने ही प्राप्त हो चुके है । इसलिये केवल शेष रुपये ही दो । यह सुनकर रतनजी असमंजस में पड़ गये । बाबा के कथन का अभिप्राय उनकी समझ में न आया । वे सोचने लगे कि यह शिरडी आने का मेरा प्रथम ही अवसर है और यह बड़े आश्चर्य की बात है कि इन्हें तीन रुपये चौदह आने पहले ही प्राप्त हो चुके है । वे यह पहेली हल न कर सकें । वे बाबा के चरणों के पास ही बैठे रहे तथा उन्हें शेष दक्षिणा अर्पित कर दी । उन्होंने अपने आगमन का हेतु बतलाया और पुत्र-प्राप्ति की प्रार्थना की । बाबा को दया आ गई । वे बोले, चिन्ता त्याग दे, अब तुम्हारे दुर्दिन समाप्त हो गये है । इसके बाद बाबा ने उदी देकर अपना वरद हस्त उनके मस्तक पर रखकर कहा, अल्ल्ह तुम्हारी इच्छा पूरी करेगा । बाबा की अनुमति प्राप्त कर रतनजी नांदेड़ लौट आये और शिरडी में जो कुछ हुआ, उसे दासगणू को सुनाया । रतनजी ने कहा, सब कार्य ठीक ही रहा । बाबा के शुभ दर्शन हुए, उनका आशीर्वाद और प्रसाद भी प्राप्त हुआ, परन्तु वहाँ की एक बात समझ में नहीं आई । वहाँ पर बाबा ने कहा था कि मुझे तीन रुपये चौदह आने पहले ही प्राप्त हो चुके हैं । कृपया समझाइये कि इसका क्या अर्थ है इससे पूर्व मैं शिरडी कभी भी नहीं गया । फिर बाबा को वे रुपये कैसे प्राप्त हो गये, जिसका उन्होंने उल्लेख किया । दासगणू के लिये भी यह एक पहेली ही थी । बहुत दिनों तक वे इस पर विचार करते रहे । कई दिनों के पश्चात उन्हें स्मरण हुआ कि कुछ दिन पहले रतनजी ने एक यवन संत मौला साहेब को अपने घर आतिथ्य के लिये निमंत्रित किया था तथा इसके निमित्त उन्होंने कुछ धन व्यय किया था । मौला साहेब नांदेड़ के एक प्रसिदृ सन्त थे, जो कुली का काम किया करते थे । जब रतनजी ने शिरडी जाने का निश्चय किया था, उसके कुछ दिन पूर्व ही मौला साहेब अनायास ही रतनजी के घर आये । रतनजी उनसे अच्छी तरह परिचित थे तथा उनसे प्रेम भी अधिक किया करते थे । इसलिये उनके सत्कार में उन्होने एक छोटे से जलपान की व्यवस्थ की थी । दासगणू ने रतनजी से आतिथ्य के खर्च की सूची माँगी और यह जालकर सवबको आश्चर्य हुआ कि खर्चा ठीक तीन रुपये चौदह आने ही हुआ था, न इससे कम था और न अधिक । सबको बाबा की त्रिकालज्ञता विदित हो गई । यघपि वे शिरडी में विराजमान थे, परन्तु शिरडी के बाहर क्या हो रहा है, इसका उन्हें पूरा-पूरा ज्ञान था । यथार्थ में बाबा भूत, भविष्यत् और वर्तमान के पूर्ण ज्ञाता और प्रत्येक आत्मा तथा हृदय के साथ संबंध थे । अन्यथा मौला साहेब के स्वागतार्थ खर्च की गई रकम बाबा को कैसे विदित हो सकती थी । रतनजी इस उत्तर से सन्तुष्ट हो गये और उनकी साईचरणों में प्रगाढ़ प्रीति हो गई । उपयुक्त समय के पश्चात उनके यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ, जिससे उनके हर्ष का पारावार न रहा । कहते है कि उनके यहाँ बारह संताने हुई, जिनमें से केवल चर शेष रहीं ।

इस अध्याय के नीचे लिखा है कि बाबा ने रावबहादुर हरी विनायक साठे को उनकी पहली पत्नी की मृत्यु के पश्चात् दूसरा ब्याह करने पर पुत्ररत्न की प्राप्ति बतलाई । रावबहादुर साठे ने द्घितीय विवाह किया । प्रथम दो कन्यायें हुई, जिससे वे बड़े निराश हुए, परन्तु तृतीय बार पुत्र प्राप्त हुआ । इस तरह बाबा के वचन सत्य निकले और वे सन्तुष्ट हो गये ।



दक्षिणा मीमांसा
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दक्षिणा के सम्बन्ध में कुछ अन्य बातों का निरुपण कर हम यह अध्याय समाप्त करेंगें । यह तो विदित ही है कि जो लोग बाबा के दर्शन को आते थे, उनसे बाबा दक्षिणा लिया करते थे । यहाँ किसी को भी शंका उत्पन्न हो सकती है कि जब बाबा फकीर और पूर्ण विरक्त थे तो क्या उनका इस प्रकार दक्षिणा ग्रहण करना और कांचन को महत्व देना उचित था । अब इस प्रश्न पर हम विस्तृत रुप से विचार करेंगें ।
बहुत काल तक बाबा भक्तों से कुछ भी स्वीकार नहीं करते थे । वे जली हुई दियासलाइयाँ एकत्रित कर अपनी जेब में भर लेते थे । चाहे भक्त हो या और कोई, वे कभी किसी से कुछ भी नहीं माँगते थे । यदि किसी ने उनके सामने एक पैसा रख दिया तो वे उसे स्वीकार करके उससे तम्बाखू अथवा तेल आदि खरीद लिया करते थे । वे प्रायः बीडी या चिलम पिया करते थे । कुछ लोगों ले सोचा कि बिना कुछ भेंट किये सन्तों के दर्शन उचित नही है । इसलिये वे बाबा के सामने पैसे रखने लगे । यदि एक पैसा होता तो वे उसे जेब में रख लेते और यदि दो पैसे हुए तो तुरन्त उसमें से एक पैसा वापस कर देते थे । जब बाबा की कीर्ति दूर-दूर तक फैली और लोगों के झुण्ड के झुणड बाबा के दर्शनार्थ आने लगे, तब बाबा ने उनसे दक्षिणा लेना आरम्भ कर दिया । श्रुति कहती है कि स्वर्ण मुद्रा के अभाव में भगवतपूजन भी अपूर्ण है । अतः जब ईश्वर-पूजन में मुद्रा आवश्यक है तो सन्तपूजन में क्यों न हो । इसलिये शास्त्रों में कहा है कि ईश्वर, राजा, सन्त या गुरु के दर्शन, अपनी सामर्थ्यानुसार बिना कुछ अर्पण किये, कभी न करना चाहिये । उन्हों क्या भेंट दी जाये । अधिकतर मुद्रा या धन । इस सम्बन्ध में उपनिषदों में वर्णत नियमों का अवलोकन करें । बृहदारण्यक उपनिषद् में बताया गया है कि दक्ष प्रजापति ने देवता, मनुष्य और राक्षसों के सामने एक अक्षर द का उच्चारण किया । देवताओं ने इसका अर्थ लगाया कि उन्हें दम अर्थात् आत्म-नियंत्रण का अभ्यास करना चाहिये । मनुष्यों ने समझा कि उन्हें दान का अभ्यास करना चाहिये तथा राक्षसों ने सोचा कि हमें दया का अभ्यास करना चाहिण । मनुष्यों को दान की सलाह दी गई । तैतिरीय उपनिषद में दान व अन्य सत्व गुणों को अभ्यास में लाने की बात कही गयी है । दान के संबंध में लिखा है – विश्वासपू्रर्वक दान करो, उसेक बिना दान व्यर्थ है । उदार हृदय तथा विनम्र बनकर, आदर और सहानुभूतिपूर्वक दान करो । भक्तों को कांचन-त्याग का पाठ पढ़ाने तथा उनकी आसक्ति दूर करने और चित्त शुदृ कराने के लिए ही बाबा सबसे दक्षिणा लिया करते थे । परन्तु उनकी एक विशेषता भी थी । बाबा कहा करते थे कि जो कुछ भी मैं स्वीकार करता हूँ, मुझे उसके शत गुणों से अधिक वापस करना पडता है । इसके अने प्रमाण हैं ।

एक घटना
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श्री गणपतराव बोडस, प्रसिदृ कलाकार, अपनी आत्म-कथा में लिखतते है कि बाबा के बार-बार आग्रह करने पर उन्होने अपने रुपयों की थैली उनके सामने उँडेल दी । श्री बोडस लिखते है कि इसका परिणाम यह हुआ कि जीवन में फिर उन्हें धन का कभी अभाव न हुआ तथा प्रचुर मात्रा में लाभ ही होता रहा है । इसका एक भिन्न अर्थ भी है । अनेकों बार बाबा ने किसी प्रकार की दक्षिणा स्वीकार भी नहीं की । इसके दो उदाहरण है । बाबा ने प्रो.सी.के. नारके से 15 रुपये दक्षिणा माँगी । वे प्रत्युत्तर में बोले कि मेरे पास तो एक पाई नहीं है । तब बाबा ने कहा कि मैं जानता हूँ, तुम्हारे पास कोई द्रव्य नहीं है, परन्तु तुम योगवासिष्ठ का अध्ययन तो करते हो, उसमें से ही दक्षिणा दो । यहाँ दक्षिणा का अर्थ है – पुस्तक से शक्षा ग्रहण कर हृदयगम करना, जो कि बाबा का निवासस्थान हैं ।
एक दूसरी घटना में उन्होंने एक महिला श्री मती आर.ए. तर्खड से 6 रुपये दक्षिणा माँगी । महिला बहुत दुःखी हुई, क्योंकि उनके पास देने को कुछ भी न था । उनके पति ने उन्हें समझाया कि बाबा का अर्थ तो षडि्पुओं से है, जिन्हे बाबा को समर्पित कर देना चाहिए । बाबा इस अर्थ से सहमत हो गये । यह ध्यान देने योग्य है कि बाबा के पास दक्षिणा के रुप में बहुत-सा द्रव्य एकत्रित हो जाता था । सब द्रव्य वे उसी दिन व्यय कर देते और दूसरे दिन फर सदैव की भाँति निर्धन बन जाते थे । जब उन्होंने महासमाधि ली तो 10 वर्ष तक हजारों रुपया दक्षिणा मिलने पर भी उनके पास स्वल्प राशि ही शेष थी ।
संक्षेप में दक्षिणा लेने का मुख्य ध्येय तो भक्तों को केवल शुद्घीकरण का पाठ ही सिखाना था ।



दक्षिणा का मर्म -----------------
ठाणे के श्री. बी. व्ही. देव, (सेवा-नीवृत्त प्रान्त मामलतदार, जो बाबा के परमा भक्त थे) ने इस विषय पर एक लेख (साई लीला पत्रिका, भाग 7 पृष्ठ 626) अन्य विषयों सहित प्रकाशित किया है, जो निम्न प्रकार है – बाबा प्रत्येक से दक्षिणा नहीं लेते थे । यदि बाबा के बिना माँगे किसी ने दक्षिणा भेंट की तो वे कभी तो स्वीकार कर लेते थे । कभी अस्वीकार भी कर देते थे । वे केवल भक्तों से ही कुछ माँगा करते थे । उन्होने उन लोगों से कभी कुछ न माँगा, जो सोचते थे कि बाबा के माँगने पर ही दक्षिणा देंगे । यदि किसी ने उनकी इच्छा के विरुदृ दक्षिणा दे दी तो वे वहाँ से उसे उठाने को कह देते थे । वे यथायोग्य राशि भक्तों की इच्छा, भक्ति और सुविधा के अनुसार ही उनसे माँगा करते था । स्त्री और बालकों से भी वे दक्षिणा ले लेते थे । उन्होंने सभी धनाढयों या निर्धनों से कभी दक्षिणा नहीं माँगी । बाबा के माँगने पर भी जिन्होंने दक्षिणा न दी उनसे वे कभी क्रोधित नहीं हुए । यदि किसी मित्र द्घारा उन्हें दक्षिणा भिजवाई गई होती और उसका स्मरण न रहता तो बाबा किसी न किसी प्रकार उसे स्मरण कराकर वह दक्षिणा ले लेते थे । कुछ अवसरों पर वे दक्षिणा की राशि में से कुछ अंश लौटा भी देते और देने वालों को सँभाल कर रखने या पूजन में रखने के लिये कह देते थे । इससे दाता या भक्त को बहुत लाभ पहुँचता था । यदि किसी ने अपनी इच्छित राशि से अधिक भेंट की तो वे वह अधिक राशि लौटा देते थे । किसी-किसी से तो वे उसकी इच्छित राशि से भी अधिक माँग बैठते थे और यदि उसके पास नहीं होती तो दूसरे से उधार लेने या दूसरों से माँगने को भी कहते थे । किसी-किसी से तो दिन में 3-4 बार दक्षिणा माँगा करते थे । दक्षिणा में एकत्रित राशि में से बाबा अपने लिये बहुत थोड़ा खर्च किया करते थे । जैसे- जिलम पीने की तंबाखू और धूनी के लिए लकडियाँ मोल लेने के लिये आदि । शेष अन्य व्यक्तियों को विभिन्न राशियों में भिक्षास्वरुप दे देते थे । शिरडी संस्थान की समस्त सामग्रियाँ राधाकृष्णमाई की प्रेरणा से ही धनी भक्तों ने एकत्र की थी । अधिक मूल्यवाले पदार्थ लाने वालों से बाबा अति क्रोधित हो जाते और अपशब्द कहने लगते । उन्होंने श्री नानासाहेब चाँदोरकर से कहा कि मेरी सम्पत्ति केवल एक कौपीन और टमरेल हैं । लोग बिना कारण ही मूल्यवान पदार्थ लाकर मुझे दुःखित करते है । कामिनी और कांचन मार्ग में दो मुखय बाधायें हौ और बाबा ने इसके लिए दो पाठशालाये खोली थी । यथा – दक्षिणा ग्रहण करना और राधाकृष्णमाई के यहाँ भेजना – इस बात की परीक्षा करने के लिये कि क्या उनके भक्तों ने इन आसक्तियों से छुटकारा पा लिया है या नहीं । इसीलिये जब कोई आता तो वे उनसे शाला में (राधाकृष्णमाई के घर) जाने को कहते । यदि वे इन परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो गये अर्थात् यह सिदृ हुआ कि वे कामिनी और कांचन की आसक्ति से विरक्त है तो बाबा की कृपा और आशीर्वाद से उनकी आध्यात्मिक उन्नति निश्चय ही हो जाती थी । श्री देव ने गीता और उपनिषद् से घटनाएँ उदृत की है और कहते है कि किसी तीर्थस्थान में किसी पूज्य सन्त को दिया हुआ दान दाता को बहुत कल्याँकारी होता है । शिरडी और शिरडी के प्रमुख देवता साईबाबा से पवित्र और है ही क्या ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।



Kindly Provide Food & clean drinking Water to Birds & Other Animals,

This is also a kind of SEWA.

Wednesday, 30 December 2015

साँई तुम भगवान हो....

ॐ साँई राम




अल्लाह, ईशा, राम तुम ही हो,
नानक की पहचान तुम ही हो,
जिसने भी जिस नाम से पुकारा तुमको
साँईं तुम ने दिया उसको सहारा ||


हर दिल की दौलत तुम साँई,
सब के दिल में तुम हो रहते,
भक्तों की रक्षा करते हो,
खुद सारी पीङा हो सहते...
दया की चादर तन पे डाले,
साँई तुम भगवान हो,
दीन दुखी के मालिक तुम हो,
धरती पर वरदान हो,
दर्श दिखा के अब सुख दे दो,
तुम जीवन हो प्राण हो....

|| ॐ श्री साँई नाथाय नमः ||

Tuesday, 29 December 2015

एक विनती साँई जी से

कुछ ऐसी रंगत साँई मेरे सजदो में भर दे
खैरियत मांगू किसी के लिए तो तू पूरी कर दे
कुछ इनायत मेरे हाथों में भी यूँ कर दे
कि छुऐ किसी के ज़ख्म तो इलाज कर दे
कुछ करम इन नज़रों पर भी कर दो मेरे साँई
पड़े किसी पराई नार पर तो वो बहन या मेरे माई कर दे
थोड़ा सा बस रहम दिल इस दिल को भी कर दे
ना करूं क्रोध किसी निर्दोष पर कमजोर समझ कर
कुछ भी ना कर सको तो बस इतना कर दो
बस अपने इस दास का नाम इंसानो में कर दो

साँई इस दास को मछली और खुद को पानी कर दो
जुड़ी रहे ये जिंदगी साँई नाम से ऐसी कुछ कहानी कर दो
साँई नाम का सिंदूर भरू अपनी मांग मे पूरा जीवन
पतिव्रता बना रहूँ तेरे नाम का मैं आजीवन
नारी नहीं हूँ पर नारी का सम्मान जानता है यह दास
जगत जननी है, बेटी है, हर रंग में है वो ही सिर्फ खास

सबूरी मन धर मै शबरी बन बैठा हूँ
आंसुओं से धौ कर बेर रख बैठा हूँ
नज़रे भी अब तो पत्थर कर बैठा हूँ
बस साँई मिलन की आस लिए बैठा हूँ

Sri Shirdi Sai Baba Sansthan, Bagh Amberpet, Hyderabad.



Sri Shirdi Sai Baba Sansthan, Bagh Amberpet, Hyderabad was the third temple we visited on 03rd Aug 2010. As told earlier,

We started our day with a Visit to

Shirdi Sai Mandir, Chaderghat, Hyderabad

Shirdi Sai Mandir, Bagh Lingampally, Hyderabad

Kindly see the Complete set of 28 Snaps of this temple before reading the Description of this Temple.

Sri Shirdi Sai Baba Sansthan, Bagh Amberpet, Hyderabad.


After our visit at Shirdi Sai Baba Temple, Bagh Lingampally we headed towards Shivam road & we reached this temple at Bagh Amberpet. This temple is near to the famous Satya Sai Ashram on Shivam Road. The other Famous temples around this area are Ahobilam Narasimha Temple, Ayyappan Temple, Guruvayur Sri Krishna Temple, Shiva Temple.

On reaching this temple, we could see a wash area near to entrance to wash the feet & then enter the temple. This was not visible in the first two temples that we visited today.

This temple is a two storeyed building with the Baba's Samadhi Mandir in the ground floor & Meditation Hall in the First floor. From the Entrance this temple is looking like some Sansthan with Tight Security. A Security guard with Metal Detector was standing to welcome us. upon seeing him, i felt as if i'm standing in the airport security check. He was pleasent & kind hearted. He did his duty with out troubling much. As i was taking a Camera, I needed to take Special Permission from the Manager of the Temple to photo graph & to be honest, it took some time to convience them about the purpose of visit, taking of snaps etc.

Once we were cleared, we were allowed inside the temple premises with our travel kit which contained a Digital Camera.

At the entrance of the temple, apart from the security personal with the metal detector, there is a booth with a metal detector & some other fance gadgets. we need to go through it also.

On reaching the Temple hall, Sai Samadhi Mandir is towards the right hand side at a Distance. Towards the front there is Dwarakamai.

Dwarakamai has been well designed with dhuni on one side & Sai Baba sitting on the other side in an Air Conditioned Room Glass Room. We can see a Jute bag Containing Wheat, a Wooden Almarah filled with Dresses for Sai Baba. A Silver Bowl containing water. Silver Paduka is also visible in front of Sai Baba at Dwarakamai. Sai Satcharita Book has been kept in front of Sai Baba's Statue inside the Dwarakamai.

A Orange Colour Flag representing Hindus & a Green Colour Flag representing Muslims has been hung in the Dwarakamai.

Just opposite to Dwarakamai there is a very small marble statue of Abhaya Anjaneya. As Hanumanji is widedly worshipped in this part, His statue is also placed inside the Hall.

A Little further, there is a Statue of Dattatreya, Chavadi of Shirdi Sai Baba, A Palki for Baba to go on Utsav.

The Marble statue of Sai Baba in the Samadhi Mandir is very matured & is ever smiling at his devotees. I was able to get the blessing of him by touching his feet. As i got the second opportunity today to touch him again, i utilised this opportunity given by him & massaged his feet, legs, ankles.

Then I bow on his feet & took his blessing. Touched his Hands & asked him to be with me as always & take care of Me & every one around in this World.

Baba is sitting on a wonderful Silver throne with a Silver Crown. Blue velvet cusion on the throne is looking really good & baba is able to sit & give darshan to his devotees peacefully. Though it is a Samadhi Mandir, Samadhi is not visible in front of Sai Baba's Statue.

A Chavadi Procession Potrait of Shirdi Sai Baba has been well designed with China Clay on one of the Walls in the Temple Premises. This Work on Chavadi Procession has been down Next to the Manager's table in the temple.

This temple is totally peaceful & follows all the rituals followed by Shirdi Sai Sansthan, Shirdi.

The temple opens at 6am for the Kakad Aarti followed by Mangal Snan. After noon's Madhyan Aarti commences at 12:00 Noon. evening there is a Dhoop aarti at 6:00pm followed by Shej Aarti at 8:30pm.

On the first floor there is a Meditation hall to meditate on Sai Baba. A Big Statue of Ganeshji is on the corridor & welcomes all those who go towards the Meditation hall.

The Sansthan feeds the Poor & at 7:30am every morning they feed the poor & needy. They have also put a Notice, requesting the Sai Devotees to do the Needful in this regard.

In total the Mental experience in this temple was very soothing. Baba was ever smiling & giving darshan to all this devotees. I got blessed by him & even got the Sheera Prasad from the purohit.

After visiting this temple, we headed to Sai Baba Mandir at Ramnagar Gundu, Vidyanagar. More on this temple in the coming Article.

Shirdi Sai Baba Sitting on a Silver Throne




Dwarakamai

Sai Baba Sitting in Dwarakamai
This Room has been Air Conditoned


Chavadi Procession Potrait Done on Wall

Main Entrance to Sai Baba Mandir

Road Map to Sai Baba Sansthan, Bagh Amberpet from Shivam Road
Sri Shirdi Sai Baba Sansthan, Bagh Amberpet, Hyderabad.
Temple Address

Sri Shirdi Saibaba Sansthan
Bhag Amberpet, Shivam Road,
Saibaba Nagar Colony, Hyderabad- 500 013.
Andhra Pradesh, India.

Phone
040-27424824
040-55696983

Location
Shivam road, Near O.U. University
5 Km from Secunderabad
Railway station.- 6 K m from CBSC.

Bus Route
From
Amerpet - Bus No: 113 C/Y.
Koti- Bus No: 3A, 3s.
Uppal - Bus No: 113c.
Secundrabad Railway Station-Bus No: 107 Y, 107 T, 107 J.

Who is Shirdi Sai Baba?

ॐ सांई राम


Who is Shirdi Sai Baba?

Sai Baba, a Yogi, a great Indian Guru of modern times regarded by his devotees as a Saint.  Hindu devotees see him as a Sadguru, an incarnation of Shiva or Dattathreya, while Muslim devotees see him as an enlightened Peer or Qutub.  Baba's illustrious life as evidenced by well documented stories and miracles puts him in a unique place in the recent spiritual history of India.  The first temple for Baba was built in Bhivpuri, Karjat.  It is not uncommon to see at least one Shirdi Baba Mandir in every mid to large size city in present day India.  In the United States and other countries, Baba Mandhir can be found in many major cities.  Also you will find devotees in many parts of the globe and from different faiths, including Christians and Zoroastrians. 
The most important source of Baba's life comes from Shri Sai Satcharita, written in 1916 in Marathi, by Govindrao Raghunath Dabholkar, who Baba nicknamed Hemadpant.  Another biographer, Ganesh Shrikrishna Khaparde described daily life of Baba.  According to sources, very little is known about Baba's time and place of birth, family and early childhood.  What is known is Baba grew to be a Fakir(meaning a member of Muslim holy sect, who lives by begging) among Fakirs, with his attire resembling that of a Fakir.  Approximately at age 16, Baba came to the village of Shirdi (Ahmednagar district) of Maharashtra and spent most of his life in that area. In Shirdi, you will see Baba's grave (Samadhi) in the temple and also a mosque that he regularly visited.  Around 1910, Baba's fame began to spread beyond the region, with people flocking from as far as Kolkatta. Baba took Samadhi (a state before nirvana in which there is no longer consciousness of self or of any object) on October 15, 1918.

What is unique about Baba?
Baba's uniqueness was in his practice of Advaitha Vedantha and Bhakthi Yoga, Jnana Yoga, and Karma Yoga and he shunned religious orthodoxy.  His teachings included both Hinduism and Islam.  For example, Baba named the mosque that he lived Dwarakamayi, and he often said "Sab ka Malik Ek," (One God governs All), and "Allah Malik"(God is King).  Baba practiced an ascetic life and asked his followers to practice an ordinary family life.  Important features in his teachings were: Shraddha (faith) and Saburi (patience) and performing one's duties without attachment to materialistic things and being content irrespective of situations. Baba emphasized a moral code: love, forgiveness, charity, contentment, inner peace, and devotion to God and Guru.  In the mosque, Baba maintained a sacred fire that he referred to as "dhuni," from which came the custom of giving sacred ash "udhi" to visitors. 
Baba gave utmost importance to charity and act of sharing, and he said, "If any men or creature come to you, do not discourteously drive them away, receive them well and treat them with respect.  Sri Hari will be certainly pleased if you give water to the thirsty, bread to the hungry, clothes to the naked, and your verandah to strangers to sit and rest.

Baba's 11 Assurances to Devotees

  1.  No harm shall befall him who sets his foot on the soil of Shirdi.
  2.  He who comes to My Samadhi, his sorrow and suffering shall cease.
  3. Though I be no more in flesh and blood, I shall ever protect My devotees.
  4. Trust in Me and your prayer shall be answered.
  5. Know that My Spirit is immortal. Know this for yourself.
  6. Show unto Me he who sought refuge and been turned away.
  7. In whatever faith men worship Me, even so do I render to them.
  8. Not in vain is My Promise that I shall ever lighten your burden.
  9. Knock, and the door shall open. Ask and ye shall be granted.
  10. To him who surrenders unto Me totally I shall be ever indebted.
  11. Blessed is he who has become one with Me.

Monday, 28 December 2015

आपका दास हूँ ऐसे न टालिए...........

ॐ सांई राम



सदगुरू साईं नाथ महाराज की जय
कष्टों की काली छाया दुखदायी है, जीवन में घोर उदासी लायी है l
संकट को टालो साईं दुहाई है, तेरे सिवा न कोई सहाई है l
मेरे मन तेरी मूरत समाई है, हर पल हर शन महिमा गायी है l
घर मेरे कष्टों की आंधी आई है,आपने क्यूँ मेरी सुध भुलाई है l
तुम भोले नाथ हो दया निधान हो,तुम हनुमान हो तुम बलवान हो l
तुम्ही राम और श्याम हो,सारे जग त में तुम सबसे महान हो l
तुम्ही महाकाली तुम्ही माँ शारदे,करता हूँ प्रार्थना भव से तार दे l
तुम्ही मोहमद हो गरीब नवाज़ हो,नानक की बानी में ईसा के साथ हो l
तुम्ही दिगम्बर तुम्ही कबीर हो,हो बुध तुम्ही और महावीर हो l
सारे जगत का तुम्ही आधार हो,निराकार भी और साकार हो l
करता हूँ वंदना प्रेम विशवास से,सुनो साईं अल्लाह के वास्ते l
अधरों पे मेरे नहीं मुस्कान है,घर मेरा बनने लगा शमशान है l
रहम नज़र करो उज्ढ़े वीरान पे,जिंदगी संवरेगी एक वरदान से l
पापों की धुप से तन लगा हारने,आपका यह दास लगा पुकारने l
आपने सदा ही लाज बचाई है,देर न हो जाये मन शंकाई है l
धीरे-धीरे धीरज ही खोता है,मन में बसा विशवास ही रोता है l
मेरी कल्पना साकार कर दो,सूनी जिंदगी में रंग भर दो l
ढोते-ढोते पापों का भार जिंदगी से,मैं गया हार जिंदगी से l
नाथ अवगुण अब तो बिसारो,कष्टों की लहर से आके उबारो l
करता हूँ पाप मैं पापों की खान हूँ,ज्ञानी तुम ज्ञानेश्वर मैं अज्ञान हूँ l
करता हूँ पग-पग पर पापों की भूल मैं,तार दो जीवन ये चरणों की धूल से l
तुमने ऊजरा हुआ घर बसाया,पानी से दीपक भी तुमने जलाया l
तुमने ही शिरडी को धाम बनाया,छोटे से गाँव में स्वर्ग सजाया l
कष्ट पाप श्राप उतारो,प्रेम दया दृष्टि से निहारो l
आपका दास हूँ ऐसे न टालिए,गिरने लगा हूँ साईं संभालिये l
साईजी बालक मैं अनाथ हूँ,तेरे भरोसे रहता दिन रात हूँ l
जैसा भी हूँ , हूँ तो आपका,कीजे निवारण मेरे संताप का l
तू है सवेरा और मैं रात हूँ,मेल नहीं कोई फिर भी साथ हूँ l
साईं मुझसे मुख न मोड़ो,बीच मझधार अकेला न छोड़ो l
आपके चरणों में बसे प्राण है,तेरे वचन मेरे गुरु समान है l
आपकी राहों पे चलता दास है,ख़ुशी नहीं कोई जीवन उदास है l
आंसू की धारा में डूबता किनारा,जिंदगी में दर्द , नहीं गुज़ारा l
लगाया चमन तो फूल खिलायो,फूल खिले है तो खुशबू भी लायो l
कर दो इशारा तो बात बन जाये,जो किस्मत में नहीं वो मिल जाये l
बीता ज़माना यह गाके फ़साना,सरहदे ज़िन्दगी मौत तराना l
देर तो हो गयी है अंधेर ना हो,फ़िक्र मिले लकिन फरेब ना हो l
देके टालो या दामन बचा लो,हिलने लगी रहनुमाई संभालो l
तेरे दम पे अल्लाह की शान है,सूफी संतो का ये बयान है l
गरीबों की झोली में भर दो खजाना,ज़माने के वली करो ना बहाना l
दर के भिखारी है मोहताज है हम,शंहंशाये आलम करो कुछ करम l
तेरे खजाने में अल्लाह की रहमत,तुम सदगुरू साईं हो समरथ l
आये हो धरती पे देने सहारा,करने लगे क्यूँ हमसे किनारा l
जब तक ये ब्रह्मांड रहेगा,साईं तेरा नाम रहेगा l
चाँद सितारे तुम्हे पुकारेंगे,जन्मोजनम हम रास्ता निहारेंगे l
आत्मा बदलेगी चोले हज़ार,हम मिलते रहेंगे बारम्बार l
आपके कदमो में बैठे रहेंगे,दुखड़े दिल के कहते रहेंगे l
आपकी मर्जी है दो या ना दो,हम तो कहेंगे दामन ही भर दो l
तुम हो दाता हम है भिखारी,सुनते नहीं क्यूँ अर्ज़ हमारी l
अच्छा चलो एक बात बता दो,क्या नहीं तुम्हारे पास बता दो l
जो नहीं देना है इनकार कर दो, ख़तम ये आपस की तकरार कर दो l
लौट के खाली चला जायूँगा,फिर भी गुण तेरे गायूँगा l
जब तक काया है तब तक माया है,इसी में दुखो का मूल समाया है l
सब कुछ जान के अनजान हूँ मैं,अल्लाह की तू शान तेरी शान हूँ मैं l
तेरा करम सदा सब पे रहेगा,ये चक्र युग-युग चलता रहेगा l
जो प्राणी गायेगा साईं तेरा नाम,उसको मुक्ति मिले पहुंचे परम धाम l
ये मंत्र जो प्राणी नित दिन गायेंगे,राहू , केतु , शनि निकट ना आयेंगे l
टाल जायेंगे संकट सारे,घर में वास करें सुख सारे l
जो श्रधा से करेगा पठन,उस पर देव सभी हो प्रस्सन l
रोग समूल नष्ट हो जायेंगे,कष्ट निवारण मंत्र जो गायेंगे l
चिंता हरेगा निवारण जाप,पल में दूर हो सब पाप l
जो ये पुस्तक नित दिन बांचे,श्री लक्ष्मीजी घर उसके सदा विराजे l
ज्ञान , बुधि प्राणी वो पायेगा,कष्ट निवारण मंत्र जो धयायेगा l
ये मंत्र भक्तों कमाल करेगा,आई जो अनहोनी तो टाल देगा l
भूत-प्रेत भी रहेंगे दूर ,इस मंत्र में साईं शक्ति भरपूर l
जपते रहे जो मंत्र अगर,जादू-टोना भी हो बेअसर l
इस मंत्र में सब गुण समाये,ना हो भरोसा तो आजमाए l
ये मंत्र साईं वचन ही जानो,सवयं अमल कर सत्य पहचानो l
संशय ना लाना विशवास जगाना,ये मंत्र सुखों का है खज़ाना l
इस पुस्तक में साईं का वास,जय साईं श्री साईं जय जय साईं


Sunday, 27 December 2015

इतनी कृपा करदे ओ "साईं" ......

ॐ सांई राम




साईं की याद में मैंने,
एक दीप जला रखा है.
अपनी साँसों के तेल से,
रोशन किया रखा है.
मैं तो हूँ मेजबान,
उनके रहमो करम का
उन्हें तो अपने दिल का,
मेहमान बना रखा है.



इतनी कृपा करदे ओ "साईं"
तेरे चरणों में जीवन बिताए
हम रहे इस जगत में कही भी
तेरी चोखट को ना भूल पाए
इतने कमजोर है हम ऐ "मैया"
जोर कुछ भी चले ना हमारा
ऐसी हालत में इतना तो सोचो
हमको कैसे मिलेगा किनारा
करदे ऐसा जतन ओ "साईं"
तेरी किरपा का वरदान पाए
प्रेम बंधन में यु हमको बांधो
डोर बंधन की टूटे कभी ना
अपनी पायल का घुंघरू बना लो
दास चरणों से छूटे कभी ना
अपने चरणों से ऐसे लगालो

तेरे चरणों का गुणगान गाये
इतनी कृपा करदे ओ "साईं"
तेरे चरणों में जीवन बिताए
हम रहे इस जगत में कही भी
तेरी चोखट को ना भूल पाए !


जो जन करे रक्त दान
पावे सुख शांति और मान
साईं सवारे उसका जीवन
जिसके रक्त से बच जावे जान

Saturday, 26 December 2015

"सबका मालिक एक है"

ॐ सांई राम



 रंग अलग है रूप
अलग है ,भाव सब में एक है
घाट अलग है ,लहरे अलग है,
जल तो सब में एक है ||
काले गोरे पीले तन में,
खून का रंग तो एक है ,
प्रेम की भाषा अलग अलग है,
प्रेम तो सब में एक है ||
पेड,पोधे अलग अलग है,
तत्व तो सब में एक है
मताए सबकी अलग अलग है,
ममता तो सब एक है ||
गाव, शहर, देश सबके अलग अलग है,
पर घरती तो एक है ,
गाय अलग अलग रंगों की है,
दूध का रंग तो एक है ||
खाना सबका अलग अलग है,
पर भूख सबकी एक है,
वेशभूषा सबकी अलग अलग है,
जीवन सबका एक है ||
सोच सबकी अलग अलग है,
पर ज्ञान सबमे एक है ,
सब करते साईं का शुकराना,
अलग अलग तरीके से,
जिसने हमें ये समझाया की
"सबका मालिक एक है"
!! शुभ प्रभात !!

Friday, 25 December 2015

क्रिस्मस के शुभ अवसर की हार्दिक शुभ कामनाएं |

ॐ सांई राम



आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से क्रिस्मस के शुभ अवसर की हार्दिक शुभ कामनाएं |

Thursday, 24 December 2015

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 13

ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं |

हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है|


श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 13
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अन्य कई लीलाएँ - रोग निवारण
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1. भीमाजी पाटील
2. बाला दर्जी
3. बापूसाहेब बूटी

4. आलंदीस्वामी
5. काका महाजनी

6. हरदा के दत्तोपंत ।

माया की अभेघ शक्ति
बाबा के शब्द सदैव संक्षिप्त, अर्थपूर्ण, गूढ़ और विदृतापूर्ण तथा समतोल रहते थे । वे सदा निश्चिंत और निर्भय रहते थे । उनका कथन था कि मैं फकीर हूँ, न तो मेरे स्त्री ही है और न घर-द्घार ही । सब चिंताओं को त्याग कर, मैं एक ही स्थान पर रहता हूँ । फिर भी माया मुझे कष्ट पहुँचाया करती हैं । मैं स्वयं को तो भूल चुका हूँ, परन्तु माया को कदापि नहीं भूल सकता, क्योंकि वह मुझे अपने चक्र में फँसा लेती है । श्रीहरि की यह माया ब्रहादि को भी नहीं छोड़ती, फर मुझ सरीखे फकीर का तो कहना ही क्या हैं । परन्तु जो हरि की शरण लेंगे, वे उनकी कृपा से मायाजाल से मुक्त हो जायेंगे । इस प्रकार बाबा ने माया की शक्ति का परिचय दिया । भगवान श्रीकृष्ण भागवत में उदृव से कहते कि सन्त मेरे ही जीवित स्वरुप हैं और बाबा का भी कहना यही था कि वे भाग्यशाली, जिलके समस्त पाप नष्ट हो गये हो, वे ही मेरी उपासना की ओर अग्रसर होते है, यदि तुम केवल साई साई का ही स्मरण करोगे तो मैं तुम्हें भवसागर से पार उतार दूँगा । इन शब्दों पर विश्वास करो, तुम्हें अवश् लाभ होगा । मेरी पूजा के निमित्त कोई सामग्री या अष्टांग योग की भी आवश्यकता नहीं है । मैं तो भक्ति में ही निवास करता हूँ । अब आगे देखियो कि अनाश्रितों के आश्रयदाता साई ने भक्तों के कल्याणार्थ क्या-क्या किया ।



भीमाजी पाटील: सत्य साई व्रत
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नारायण गाँव (तालुका जुन्नर, जिला पूना) के एक महानुभाव भीमाजी पाटील को सन् 1909 में वक्षस्थल में एक भयंकर रोग हुआ, जो आगे चलकर क्षय रोग में परिणत हो गया । उन्होंने अनेक प्रकार की चिकित्सा की, परन्तु लाभ कुछ न हुआ । अन्त में हताश होकर उन्होंने भगवान से प्रार्थना की, हे नारायण । हे प्रभो । मुझ अनाथ की कुछ सहायता करो । यह तो विदित ही है कि जब हम सुखी रहते है तो भगवत्-स्मरण नहीं करते, परन्तु ज्यों ही दुर्भाग्य घेर लेता है और दुर्दिन आते है, तभी हमें भगवान की याद आती है । इसीलिए भीमाजी ने भी ईश्वर को पुकारा । उन्हें विचार आया किक्यों न साईबाबा के परम भक्त श्री. नानासाहेब चाँदोरकर से इस विषय में परामर्श लिया जाय और इसी हेतु उन्होंने अपना स्थिति पूर्ण विवरण सहित उनके पास लिख भेजी और उचित मार्गदर्शन के लिये प्रार्थना की । प्रत्युत्तर में श्री. नानासाहेब ने लिख दिया कि अब तो केवल एक ही उपाय शेष है और वह है साई बाबा के चरणकमलों की शरणागति । नानासाहेब के वचनों पर विश्वास कर उन्होंने शिरडी-प्रस्थान की तैयारी की । उन्हें शिरडी में लाया गया और मसजिद में ले जाकर लिटाया गया । श्री. नानासाहेब और शामा भी इस समया वहीं उपस्थित थे । बाबा बोले कि यह पूर्व जन्म के बुरे कर्मों का ही फल है । इस कारण मै इस झंझट में नहीं पड़ना चाहता । यह सुनकर रोगी अत्यन्त निराश होकर करुणपूर्ण स्वर में बोला कि मैं बिल्कुल निस्सहाय हूँ और अन्तिम आशा लेकर आपके श्री-चरणों में आया हूँ । आपसे दया की भीख माँगता हूँ । हे दीनों के शरण । मुझ पर दया करो । इस प्रार्थना से बाबा का हृदय द्रवित हो आया और वे बोले कि अच्छा, ठहरो । चिन्ता न करो । तुम्हारे दुःखों का अन्त शीघ्र होगा । कोई कितना भी दुःखित और पीड़ित क्यों न हो, जैसे ही वह मसजिद की सीढ़ियों पर पैर रखता है, वह सुखी हो जाता हैं । मसजिद का फकीर बहुत दयालु है और वह तुम्हारा रोग भी निर्मूल कर देगा । वह तो सब लोंगों पर प्रेम और दया रखकर रक्षा करता हैं । रोगी को हर पाँचवे मिनट पर खून की उल्टियाँ हुआ करती थी, परन्तु बाबा के समक्ष उसे कोई उल्टी न हुई । जिस समय से बाबा ने अपने श्री-मुख से आशा और दयापूर्ण शब्दों में उक्त उदगार प्रगट किये, उसी समय से रोग ने भी पल्टा खाया । बाबा ने रोगी को भीमाबाई के घर में ठहरने को कहा । यह स्थान इस प्रकार के रोगी को सुविधाजनक और स्वास्थ्यप्रद तो न था, फिर भी बाबा की आज्ञा कौन टाल सकता था । वहाँ पर रहते हुए बाबा ने दो स्वप्न देकर उसका रोग हरण कर लिया । पहने स्वप्न में रोगी ने देखा कि वह एक विघार्थी है और शिक्षक के सामने कविता मुखाग्र न सुना सकने के दण्डस्वरुप बेतों की मार से असहनीय कष्ट भोग रहा है । दूसरे स्वप्न में उसने देखा कि कोई हृदय पर नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे की ओर पत्थार घुमा  रहा है, जिससे उसे असहृय पीड़ हो रही हैं । स्वप्न में इस प्रकार कष्ट पाकर वह स्वस्थ हो गया और घर लौट आया । िफर वह कभी-कभी शिऱडी आता और साईबाबा की दया का स्मरण कर साष्टांग प्रणाम करता था । बाबा अपने भक्तों से किसी वस्तु की आशा न रखते थे । वे तो केवल स्मरण, दृढ़ निष्ठा और भक्ति के भूखे थे । महाराष्ट्र के लोग प्रतिपक्ष या प्रतिमास सदैव सत्यनारायण का व्रत किया करते है । परन्तु अपने गाँव पहुँचने पर भीमाजी पाटीन ने सत्यनारायण व्रत के स्थान पर एक नया ही सत्य साई व्रत प्रारम्भ कर दिया ।


बाला गणपत दर्जी
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एक दूसरे-भक्त, जिनका नां बाला गणपत दर्जी था, एक समय जीर्ण ज्वर से पीड़ित हुए । उन्होंने सब प्रकार की दवाइयाँ और काढ़े लिये, परन्तु इनसे कोई लाभ न हुआ । जब ज्वर तिलमात्र भी न घटा तो वे शिरडी दौडे़ आये और बाबा के श्रीचरणों की शरण ली । बाबा ने उन्हें विचित्र आदेश दिया कि लक्ष्मी मंदिर के पास जाकर एक काले कुत्ते को थोड़ासा दही और चावल खिलाओ । वे यह समझ न सके कि इस आदेश का पालन कैसे करें । घर पहुँचकर चावल और दही लेकर वे लक्ष्मी मंदिर पहुँचे, जहाँ उन्हें एक काला कुत्ता पूँछ हिलाते हुए दिखा । उन्होंने वह चावल और दही उस कुत्ते के सामने रख दिया, जिसे वह तुरन्त ही खा गया । इस चरित्र की विशेषता का वर्णन कैसे करुँ कि उपयुर्क्त क्रिया करने मात्र से ही बाला दर्जी का ज्वर हमेशा के लिये जाता रहा ।


बापूसाहेब बूटी 
                                                              ----------------
श्रीमान् बापूसाहेब बूटी एक बार अम्लपित्त के रोग से पीड़ित हुए । उनकी आलमारी में अनेक औषधियाँ थी, परन्तु कोई भी गुणकारी न हो रही थी । बापूसाहेब अम्लपित्त के काण अति दुर्बल हो गये और उनकी स्थिति इतनी गम्भीर हो गई कि वे अब मसजिद में जाकर बाबा के दर्शन करने में भी असमर्थ थे । बाबा ने उन्हें बुलाकर अपने सम्मुख बिठाया और बोले, सावधान, अब तुम्हें दस्त न लगेंगे । अपनी उँगली उठाकर फर कहने लगे उलटियाँ भी अवश्य रुक जायेंगी । बाबा ने ऐसी कृपा की कि रोग समूल नष्ट हो गया और बापूसाहेब पूर्ण स्वस्थ हो गये । एक अन्य अवसर पर भी वे हैजा से पीडि़त हो गये । फलस्वरुप उनकी प्यास अधिक तीव्र हो गई । डाँ. पिल्ले ने हर तरह के उपचार किये, परन्तु स्थिति न सुधरी । अन्त में वे फिर बाबा के पास पहुँचे और उनसे तृशारोग निवारण की औशधि के लिये प्रार्थना की । उनकी प्रार्थना सुनकर बाबा ने उन्हें मीठे दूध में उबाला हुआ बादाम, अखरोट और पिस्ते का काढ़ा पियो । - यह औषधि बतला दी ।

दूसरा डाँक्टर या हकीम बाबा की बतलाई हुई इस औषधि को प्राणघातक ही समझता, परन्तु बाबा की आज्ञा का पालन करने से यह रोगनाशक सिदृ हुई और आश्चर्य की बात है कि रोग समूल नष्ट हो गया ।

आलंदी के स्वामी
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आलंदी के एक स्वामी बाबा के दर्शनार्थ शिरडी पधारे । उनके कान में असहृ पीड़ा थी, जिसके कारण उन्हें एक पल भी विश्राम करना दुष्कर था । उनकी शल्य चिकित्सा भी हो चुकी थी, फिर भी स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन न हुआ था । दर्द भी अधिक था । वे किंकर्तव्यविमूढ़ होकर वापिस लौटने के लिये बाबा से अनुमति माँगने गये । यह देखकर शामा ने बाबा से प्रार्थना की कि स्वामी के कान में अधिक पीड़ा है । आप इन पर कृपा करो । बाबा आश्वासन देकर बोले, अल्लाह अच्छा करेगा । स्वामीजी वापस पूना लौट गये और एक सप्ताह के बाद उन्होंने शिरडी को पत्र भेजा कि पीड़ा शान्त हो गई है । परन्तु सूजन अभी पूर्ववत् ही है । सूजन दूर हो जाय, इसके लिए वे शल्यचिकित्सा (आपरेशन) कराने बम्बई गये । शल्यचिकित्सा विशेषक्ष (सर्जन) ने जाँच करने के बाद कहा कि शल्यचिकित्सा (आपरेशन) की कोई आवश्यकता नहीं । बाबा के शब्दों का गूढ़ार्थ हम निरे मूर्ख क्या समझें ।



काका महाजनी
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काका महाजनी नाम के एक अन्य भक्त को अतिसार की बीमारी हो गई । बाबा का सेवा-क्रम कहीं टूट न जाय, इस कारण वे एक लोटा पानी भरकर मसजिद के एक कोने में रख देते थे, ताकि शंका होने पर शीघ्र ही बाहर जा सकें । श्री साईबाबा को तो सब विदित ही था । फिर भी काका ने बाबा को सूचना इसलिये नहीं दी कि वे रोग से शीघ्र ही मुक्ति पा जायेंगे । मसजिद में फर्श बनाने की स्वीकृति बाबा से प्राप्त हो ही चुकी थी, परन्तु जब कार्य प्रारम्भ हुआ तो बाबा क्रोधित हो गये और उत्तेजित होकर चिल्लाने लगे, जिससे भगदड़ मच गई । जैसे ही काका भागने लगे, वैसे ही बाबा ने उन्हें पकड़ लिया और अपने सामने बैठा लिया । इस गडबड़ी में कोई आदमी मूँगफली की एक छोटी थैली वहाँ भूल गया । बाबा ने एक मुट्ठी मूँगफली उसमें से निकाली और छील कर दाने काका को खाने के लिये दे दिये । क्रोधित होना, मूँगफली छीलना और उन्हें काका को खिलाना, यह सब कार्य एक साथ ही चलने लगा । स्वंय बाबाने भी उसमें से कुछ मूँगफली खाई । जब थैली खाली हो गई तो बाबा ने कहा कि मुझे प्यास लगी है । जाकर थोड़ा जल ले आओ । काका एक घड़ा पाना भर लाये और दोनों ने उसमें से पानी पिया । फिर बाबा बोले कि अब तुम्हारा अतिसार रोग दूर हो गया । तुम अपने फर्श के कार्य की देखभाल कर सकते हो । थोडे ही समय में भागे हुए लोग भी लौट आये । कार्य पुनः प्रारम्भ हो गया । काका कारो अब प्रायः दूर हो चुका था । इस कारण वे कार्य में संलग्न हो गये । क्या मूँगफली अतिसार रोग की औषधि है । इसका उत्तर कौन दे । वर्तमान चिकित्सा प्रणाली के अनुसार तो मूँगफली से अतिसार में वृद्घि ही होती है, न कि मुक्ति । इस विषय में सदैव की भाँति बाबा के श्री वचन ही औषधिस्वरुप थे ।


हरद के दत्तोपन्त
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हरदा के एक सज्जन, जिनका नाम श्री दत्तोपन्त था, 14 वर्ष से उदररोग से पीड़ित थे । किसी भी औषधि से उन्हें लाभ न हुआ । अचानक कहीं से बाबा की कीर्ति उनके कानों में पड़ी कि उनकी दृष्टि मात्र से ही रोगी स्वस्थ हो जाते हैं । अतः वे भी भाग कर शिरडी आये और बाबा के चरणों की शरण ली । बाबा ने प्रेम-दृष्टि से उनकी ओर देखकर आशीर्वाद देकर अपना वरद हस्त उनके मस्तक पर रखा । आशीष और उदी प्राप्त कर वे स्वस्थ हो गये तथा भविष्य में फिर कोई हुड़ा न हुई ।


इसी तरह के निम्नलिखित तीन चमत्कार इस अध्याय के अन्त में टिप्पणी में दिये गये हैं –

1. माधवराव देशपांडे बवासीर रोग से पीडि़त थे । बाबा की आज्ञानुसार सोनामुखी का काढ़ा सेवन करने से वे नीरोग हो गये । दो वर्ष पश्चात् उन्हें पुनः वही पीड़ा उत्पन्न हुई । बाबा से बिना परामर्श लिये वे उसी काढ़े का सेवन करने लगे । परिणाम यह हुआ कि रोग अधिक बढ़ गया । परन्तु बाद में बाबा की कृपा से शीघ्र ही ठीक हो गया ।

2. काका महाजनी के बड़े भाई गंगाधरपन्त को कुछ वर्षों से सदैव उदर में पीड़ा बनी रहती थी । बाबा की कीर्ति सुनकर वे भी शिरडी आये और आरोग्य-प्राप्ति के लिये प्रार्थना करने लगे । बाबा ने उनके उदर को स्पर्श कर कहा, अल्लाह अच्छा करेगा । इसके पश्चात् तुरन्त ही उनकी उदर-पीड़ा मिट गई और वे पूर्णतः स्वस्थ हो गये ।
3. श्री नानासाहेब चाँदोरकर को भी एक बार उदर में बहुत पीड़ा होने लगी । वे दिनरात मछली के समान तड़पने लगे । डाँ. ने अनेक उपचार किये, परन्तु कोई परिणाम न निकला । अन्त मेंवे बाबा की शरण में आये । बाबा ने उन्हें घी के साथ बर्फी खाने की आज्ञा दी । इस औषधि के सेवन से वे पूर्ण स्वस्थ हो गये । इन सब कथाओं से यही प्रतीत होता है कि सच्ची औषधि, जिससे अनेंकों को स्वास्थ्य-लाभ हुआ, वह बाबा के केवल श्रीमुख से उच्चरित वचनों एवं उनकी कृपा का ही प्रभाव था ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 23 December 2015

साईं राम जी हर प्राणी में वास करते है ...

ॐ सांई राम



एक गांव मे एक मंदिर मे एक पुजारी था और बो बड़े नियम से भगवान की पूजा करता था और उसको या गांव वालो को कोई भी परेशानी होती थी तो बो कहता था धैर्य रखो भगवान सब ठीक कर देगा और सचमुच परेशानिया ठीक हो जाती थी .......एक बार गांव मे बहुत जोर की बाढ़ आ गयी और सब डूबने लगा तो लोग पुजारी के पास गए तो उसने कहा की धैर्य रखो सब ठीक हो जायेगा मैं भगवान की इतनी पूजा करता हूँ सब ठीक हो जायेगा ,लेकिन पानी बढ़ने लगा और गांव वाले भागने लगे और पुजारी से बोले की अब तो पानी मंदिर मे भी आने लगा हें आप भी निकल चलो यहाँ से लेकिन पुजारी ने फिर बही कहा की मैं इतनी पूजा करता हूँ तो मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा तुम लोग जाओ मैं नहीं जाऊँगा.....फिर कुछ दिनों मे पानी और बढ़ा और मंदिर मे घुस गया तो पुजारी मंदिर पर चढ गया ...फिर उधर से एक नाव आई और उसमे कुछ बुजुर्ग लोगो ने पुजारी से कहा की सब लोग भाग गए हें और यह आखिरी नाव हें आप भी आ जाओ इसमें क्योकि पानी और बढ़ेगा ऐसा सरकार का कहना हें नहीं तो आप डूब जाओगे तो पुजारी ने फिर कहा की मेरा कुछ नहीं होगा क्योकि मैने इतनी पूजा करी हें जिंदगी भर तो भगवान मेरी मदद करेगे और फिर बो नाव भी चली गयी ......कुछ दिनों मे और पानी और बढ़ा तो पुजारी मंदिर मे सबसे ऊपर लटक गया और पानी जब उसकी नाक तक आ गया तो बो त्रिशूल पर लटक गया और भगवान की प्रार्थना करने लगा की भगवान बचाओ मैने आपकी बहुत पूजा की हें तो कुछ देर मे एक सेना का हेलिकॉप्टर आ गया और उसमे से सैनिको ने लटक कर हाथ बढ़ाया और कहा की हाथ पकड़ लो किन्तु फिर बो पुजारी उनसे बोला की मैने जिंदगी भर भगवान की पूजा करी हें मेरा कुछ नहीं होगा और उसने किसी तरह हाथ नहीं पकड़ा और परेशान होकर सैनिक चले गए ...फिर थोड़ी देर मे पानी और बढ़ा और उसकी नाक मे घुस गया और पुजारी मर गया.......




मरने के बाद पुजारी स्वर्ग मे गया और जैसे ही उसे भगवान जी दिखे तो बो चिल्लाने लगा की जिंदगी भर मैने इतनी इमानदारी से आप लोगो की पूजा करी फिर भी आप लोगो ने मेरी मदद नहीं की ...तो भगवान जी बोले की अरे पुजारी जी जब पहली बार जो लोग आप से चलने को कह रहे थे तो बो कौन था अरे बो मैं ही तो था ...फिर नाव मे जो बुजुर्ग आप से चलने को कह रहे थे बो कौन था बो मैं ही तो था और फिर बाद मे हेलिकॉप्टर मे जो सैनिक आप को हाथ दे कर कह रहा था बो कौन था बो मैं ही तो था किन्तु आप मुंझे उस रूप मे पहचान ही नहीं पाए तो मैं क्या करू ..... अरे मैं जब किसी मनुष्य की मदद करूँगा तो मनुष्य के रूप मे ही तो करूँगा चाहे बो रूप डॉक्टर का हो या गुरु का हो या किसी अच्छे इंसान का या माँ , बाप भाई या बहन का या दोस्त का लेकिन उस रूप मे आप लोग मुंझे पहचान ही नहीं पाते हो तो मैं क्या करू ..... मेरी बाणी को पहचानने के लिए ध्यान बहुत जरूरी हें और योग भी तभी इंसान मेरी बाणी को इंसान मे भी पहचान जायेगा क्योकि सच्चे आदमियो मे मेरी ही बाणी होती हें

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