शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 28 September 2013

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी – साखियाँ - जेब काटने वाले चोर को शिक्षा

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी – साखियाँ





जेब काटने वाले चोर को शिक्षा

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के दरबार में सदा एक मेला सा लगा रहता था| एक दिन चार सिख गुरु जी के पास आए| उन्होंने आकर प्रार्थना की कि किसी ने उनकी जेब काट ली है व पैसे नकदी निकाल लिए हैं| उनकी बात सुनकर गुरु जी ने सिखों को हुक्म दिया कि संगत की भीड़ में एक आदमी जिसने सिर पर लाल पगड़ी बांधी है, कमर पर धोती है तथा उसके हाथ में माला व माथे पर चन्दन का सफ़ेद तिलक लगा हुआ है, उसे पकड़कर हमारे पास ले आओ|

सिखों ने गुरु जी की बात सुनी व गुरु जी की बताई निशानी के अनुसार एक आदमी के हाथ पैर बांधकर गुरु जी के समक्ष ले आए| गुरु जी ने उसकी तलाशी करवाई| चुराया हुआ सारा समान व धन उसके पास से ही निकला| तब गुरु जी ने उस जेब कतरे को कैद में डलवा दिया|

कुछ दिनों के बाद आपने उसे बुलाकर कहा तूने जेब काटने के लिए हमारी आराधना करके प्रण किया था, मैं तीन जेबें काटकर फिर यह काम नहीं करूंगा| परन्तु तूने अपने प्रण से फिर कर चौथी बार जेब क्यों काटी? इसलिए तुम्हें कैद की सजा दी जाती है| परन्तु यदि अब तुम यह प्रण हमारे सामने कर लो कि आगे से कोई ऐसा काम नहीं करोगे, तो तुम्हें छोड़ देते हैं|

उस चोर ने गुरु की बात सुनकर उनसे क्षमा माँगी व यह प्रण किया कि वह आगे से ऐसा कोई काम नहीं करेगा| गुरु जी ने उसे बुलाकर उपदेश दिया व कैद से निकाल दिया|

Friday, 27 September 2013

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी – साखियाँ - ब्राहमणों की परीक्षा करनी

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी – साखियाँ










ब्राहमणों की परीक्षा करनी

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने ब्राहमणों का चुनाव करने के लिए दूर दूर के क्षेत्रों से जैसे कश्मीर, मथुरा, प्रयाग व काशी आदि दक्षिण पूर्व दिशा से सारे पंडितो को आनंदपुर आने के लिए अपने सिख भेजकर बुलवाया|

बहुत से पंडित एकत्रित हो गए| गुरु जी ने उनके लिए एक ओर लंगर में खीर, पूड़े तथा लड्डू आदि तैयार करवाए| दूसरी ओर गुरु जी ने मासाहारी भोजन तैयार करवाया| इसके पश्चात गुरु जी ने सबको कहा कि जो वैष्णव भोजन खीर पूड़े आदि खायेगा उसे पांच रूपये दक्षिणा मिलेगी तथा जो मांस वाला भोजन खायेगा उसे पांच मोहरे दक्षिणा मिलेगी|

गुरु जी के यह वचन सुनकर बहुत से पंडित मांस खाने वाले लंगर में जाकर बैठ गए| बाकी थोड़े से ही वैष्णव भोजन खीर पूड़े वाले लंगर में रह गए| दोनों लंगर में सबने भोजन खा लिया|

गुरु जी ने मासाहारी ब्राहमणों को सम्बोधित करके कहा कि तुमने लोभवश होकर अपना ब्राहमण धर्म भ्रष्ट किया है| मांस खाना क्षत्रियों का धर्म है ब्राहमणों का नहीं| इस करके तुम्हें पांच-पांच मोहरों की जगह पांच-पांच रूपये दक्षिणा दी जाती है|

इसके पश्चात गुरु जी ने वैष्णवों को कहा कि तुमने लोभवश होकर अपना ब्राहमण धर्म नहीं छोड़ा जो कि लोक व परलोक में सहायक होता है| तुम्हें शाबाश है| उनको गुरु जी ने प्रसन्न होकर पांच - पांच मोहरे दक्षिणा दी| आपने बड़े ही सत्कार से उनको विश्राम कराया|

Thursday, 26 September 2013

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 42 - महासमाधि की ओर

ॐ सांई राम

आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं , हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम  घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...



श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 42 - महासमाधि की ओर

Wednesday, 25 September 2013

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी – साखियाँ - गधे को शेर की पौशाक पहना कर सिखों को शिक्षा

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी – साखियाँ











गधे को शेर की पौशाक पहना कर सिखों को शिक्षा

एक दिन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिक्खों को शिक्षा देने के लिए शेर की खाल रात के समय एक गधे को पहना दी| उस गधे को बाहर खेतों में छोड़ दिया| हरे खेत खाकर गधा बहुत मस्त हो गया|

एक दिन रात के समय वह अपने ही मालिक कुम्हार के घर आकर खड़ा हो गया| कुछ देर बाद कुम्हार के गधे हींगे तो वह भी बाहर से हींगने लगा| कुम्हार ने जब उसकी यह आवाज़ सुनी तो गधे से ऊपर से शेर की खाल उतार दी|उसे दो चार डंडे भी मारे और दूसरे गधों के साथ बांध दिया| यह बात सारे लोगों में फ़ैल गई कि जिसको शेर समझकर उससे डरते थे, वह कुम्हार का गधा था| जिस पर से खाल उतरकर कुम्हार ने उसपर छट लाद दी है|

यह बात सुनकर गुरु जी ने सिक्खों को बताया कि यह तुम्हें बाणा उदहारण के द्वारा समझाया है कि जिस तरह एक गधा शेर का बाणा धारण करके लोगों के खेत खाता रहा और उसे शेर समझकर उसके पास कोई न गया| परन्तु जब वह अपने भाईयों से मिलकर अपनी भाषा बोला तो उसको कुम्हार ने डंडे मारकर आगे लगा लिया और पीठ पर छट लादकर अन्य गधों के साथ बांध दिया| इसी तरह सिक्खी बाणा है, जो इसको धारण करके इसपर कायम रहेगा, उससे सारे लोग भय खायेंगे| परन्तु जो सिक्खी बाणे पर असूलों को त्याग देगा, उसपर सब कोई अपने हुक्म की छट लादेगा और खरी खोटी बोली के डंडे मारेगा|

यह दृष्टांत सुनकर सारे सिक्खों ने प्रण किया कि वह कभी भी सिक्खी बाणे और असूलों का त्याग नहीं करेंगे|

Tuesday, 24 September 2013

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी – साखियाँ - लंगर की परीक्षा करनी

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी – साखियाँ











लंगर की परीक्षा करनी

आनंदपुर में सिक्ख संगत ने अपने अपने डेरों में लंगर लगाए हुए थे| गुरू जी ने जब इनकी शोभा सुनी कि गुरु की नगरी में आने वाला कोई भी रोटी से भूखा नहीं रहता तो एक दिन रात के समय गुरु जी आप एक गरीब सिक्ख का वेष धारण करके इनकी परीक्षा लेने चल पड़े|

एक सिक्ख के डेरे पर जाकर आपने कहा हमें जल्दी भोजन दो, भूख लगी है| उसने कहा कुछ देर बैठ जाओ भोजन तैयार हो रहा है, मिल जाएगा|

उससे हटकर आप जी दूसरे सिक्ख के डेरे गए और वहाँ भी भोजन माँगा| परन्तु उसने कहा दाल भाजी तैयार हो रही है, फिर आकर भोजन छक लेना|

फिर इसके पश्चात गुरु जी तीसरे व चौथे सिक्ख के डेरे भोजन के लिए गए| तो एक ने कहा "आनन्द साहिब" का पाठ तथा अरदास करके लंगर बटेगा| दूसरे ने कहा सारी संगत एकत्रित हो जाए, तो पंक्ति लगाकर लंगर बाँटा जाएगा, आप बैठ जाओ|

इसके पश्चात आप जी भाई नन्द लाल जी के डेरे भोजन के लिए गए| आप ने वहाँ जाकर भी भोजन माँगा| भाई के पास जो कुछ तैयार था गुरु जी के आगे लाकर रख दिया| गुरु जी छक कर बहुत प्रसन्न हुए और अपने महलों में आ गए|

दूसरे दिन जब सिक्खों के लंगर की बातें चली तो गुरु जी ने अपनी रात की सारी वार्ता सुनाकर बताया की हमे केवल भाई नन्द लाल के लंगर से ही भोजन मिला है| बाकी सबने कोई ना कोई बात करके हमें लंगर नहीं छकाया| जो सिक्ख भूखे को शीघ्र ही भोजन देने का यत्न करता है, वही सिक्ख हमें प्यारा है| भूखे को रोटी-पानी देने के लिए कोई समय नहीं विचारना चाहिए| जिस अन्न के दाने से प्राण बच जाते है, उसका पुण्य फल सभी दानों से अधिक है|

सतिगुरु जी की तरफ से अन्न दान महिमा सुनकर सबने प्रण कर लिया कि आगे से किसी को भूखा नहीं भेजा जाएगा|

Monday, 23 September 2013

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी – साखियाँ - शुद्ध गुरुबाणी पढ़ने का महत्व

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी – साखियाँ











शुद्ध गुरुबाणी पढ़ने का महत्व

एक दिन एक सिक्ख श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की शरण में "दखणी ओंकार" का पाठ पढ़ रहा था| गुरु जी उसकी मीठी व सुन्दर आवाज़ के साथ बाणी का पाठ बड़े प्रेम से सुन रहे थे| परन्तु जब उसने यह चरण -

करते की मिति करता जाणै के जाणै गुरु सूरा ||

पढ़ी तो आपने एक सेवादार को कहा कि इसके मुँह के ऊपर थपड़ मारो व इसे दूर ले जाओ| जब यह बात हुई तो संगत ने बड़े हैरान होकर प्रार्थना की कि सच्चे पातशाह! इस सिक्ख से आपने इस तरह क्यों किया है? यह तो बड़े प्रेम से गुरुबाणी पढ रहा था|

गुरु जी ने उत्तर दिया यह सिक्ख बाणी का पाठ गल्त कर रहा था| इससे यह व्यवहार इस लिए किया गया है क्योंकि यह पढ़ रहा था -

करते की मिति करता जाणै के जाणै गुरु सूरा ||

जिसका गल्त अर्थ यह बनता है कि कर्ते की महिमा कर्ता ही जनता है, गुरु शूरवीर क्या जान सकता है| सवाल यह है कि यदि करते की मिति को गुरु नहीं जान सकता, तो फिर उस गुरु ने सिक्ख को क्या उपदेश देना है|

सो भाई सिक्खों! गुरु जी की बाणी के शुद्ध पाठ उच्चारण का बहुत बड़ा महत्व है| इसका शुद्ध पाठ किया करो| इस चरण का शुद्ध पाठ यह है कि -
"के जाणै गुरु सूरा" - जिसका अर्थ है - कर्ते की महिमा कर्ता आप ही जानता है या शूरवीर गुरु जानता है|

आप जी के यह वचन सुनकर सारे सिक्खों ने शुद्ध पाठ करने का प्रण किया|

Sunday, 22 September 2013

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी – साखियाँ - आज्ञा मानने की व्याख्या

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी – साखियाँ










आज्ञा मानने की व्याख्या

एक दिन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी दीवान की ओर आ रहे थे कि रास्ते में एक सिक्ख दीवार पर लेप कर रहा था| दीवार के ऊपर लेप मारते समय उससे गुरु जी के पाजामे के ऊपर चिकड़ के छींटे पड़ गए|

गुरु जी ने सेवकों से कहा इस लिपाई करने वाले को जोर से थप्पड़ मारो| यह बात सुनकर कई सिक्खों ने जोर से थप्पड़ लगा दिए| बहुत थप्पड़ों की मार से वह गरीब सिक्ख बेहोश हो गया| उसकी यह दशा देखकर गुरु जी ने अपने सेवकों को कहा मैंने एक सिक्ख को थप्पड़ मारने की आज्ञा दी थी| परन्तु आप सब ने हो इस गरीब को एक एक थप्पड़ मारकर बेहोश कर दिया है|

सिक्खों ने कहा महाराज! हमने तो आपका हुक्म माना है| गुरु जी ने कहा यदि हमारा हुक्म मानते हो तो इस सिक्ख को कोई अपनी लड़की का रिश्ता दे दो| गुरु जी का यह वचन सुनकर सभ चुप हो गए| सबको चुप देखकर गुरु जी ने कहा, गुरु का हुक्म तब ही यथार्थ है यदि गुरु के सारे हुक्म माने जाए| परन्तु तुमसे सिक्खी दूर है| आसान हुक्म मान लेते हो तथा कठिन समय चुप धारण कर लेते हो|

गुरु जी के यह वाक्य सुनकर कंधार के एक सिक्ख अजायब सिंह ने अपनी लड़की का रिश्ता उस गरीब सिक्ख को दे दिया तथा गुरु की अटूट खुशी प्राप्त की|

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी – साखियाँ - चरण पाहुल तथा खंडे के अमृत की शक्ति

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी – साखियाँ












चरण पाहुल तथा खंडे के अमृत की शक्ति

सिक्खों ने पांच प्रकार की सिक्खी का उल्लेख सुनकर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी से प्रार्थना कि महाराज! हमें पाहुल व अमृत का उल्लेख बताओ| गुरु जी ने फरमाया कि भाई! तंत्र-मन्त्र आदि कार्य कि सिद्धि के लिए प्रसिद्ध है,परन्तु वाहिगुरू-मन्त्र जो चारों वर्णों को एक करने वाला है,इससे सभी सिद्ध हो जाते है| लोहे का शस्त्र (खंडा), जल तथा मिष्ठान से तैयार किया हुआ अमृत एक बड़ा तन्र्त्र है, जो स्त्री व पुरुष को बलवान बना देता है|

श्री गुरु नानक देव जी से लेकर अब तक गुरु घर में चरण पाहुल की मर्यादा थी| जिससे सिक्ख की गुरु चरणों में बहुत प्रीति होती है| चरण धोकर उसके ऊपर गुरु मन्त्र पड़कर सिक्ख को पिला देना व भजन करने का उपदेश देना, इस विधि से केवल मन्त्र के बल से सतो गुणी चरणामृत बनता है|

परन्तु जल तथा मिष्ठान्न लोहे के बाटे में डाल कर उसमें लोहे का खंडा घुमा कर अमृत तैयार किया जाता है| यह तंत्र है, जिसमें बिजली की तरह ऐसी शक्ति पैदा होती है, जो अमृत पान करने वाले के अंदर वीर रस व धर्म की दृढ़ता भर देती है, इस अमृत को तैयार करते समय जो जो गुरुबाणी का पाठ एक मन होकर सिंह करते है, वह मन्त्र है| गुरुसिख को जो पाँच ककार धारण कराये जाते है, वह यंत्र है|

इन तीनों तंत्र, मन्त्र व यंत्र के इकठ में एक त्रिगुणी बलवान शक्ति पैदा हो जाती है| इस लिए खंडे का अमृत चरणामृत से कई प्रकार से बढकर शक्ति रखता है|

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