शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 6 July 2013

श्री गुरु रामदास जी जीवन- गुरु गद्दी मिलना

श्री गुरु रामदास जी जीवन- गुरु गद्दी मिलना



गुरु अमरदास जी की दो बेटियां बीबी दानी व बीबी भानी जी थी| बीबी दानी जी का विवाह श्री रामा जी से और बीबी भानी जी का विवाह श्री जेठा जी (श्री गुरु रामदास जी) के साथ हुआ| दोनों ही संगत के साथ मिलकर खूब सेवा करते| गुरु जी दोनों पर ही खुश थे| इस कारण दोनों में से एक को गुरुगद्दी के योग्य निर्णित करने के लिए आपने उनकी परीक्षा ली|

एक दिन सांय काल गुरु जी ने बाउली के पास खड़े होकर रामा को कहा कि एक तरफ चबूतरा बनाओ जिसपर बैठकर हम बाउली की कारसेवा देखते रहें| फिर बाउली के दूसरी तरफ जाकर जेठा जी को एक चबूतरा तैयार करने की आज्ञा दी| दूसरे दिन दोनों ने ईंट गारे के साथ चबूतरे बनाए| गुरु जी ने पहले रामा जी का चबूतरा देखकर कहा यह ठीक नहीं बना| रामा ने कहा महाराज! मैंने आपके बताये अनुसार ठीक बनाया है| पर गुरु जी ने उसे दोबारा चबूतरा बनाने की आज्ञा दे दी| दूसरी ओर गुरु अमरदास जी ने जेठा जी का चबूतरा देखकर कहा, तुम हमारी बात नहीं समझे| इन्हें भी दोबारा बनाने की आज्ञा दे दी| जेठा जी ने चुप-चाप बिना कुछ कहे उसी समय ही चबूतरा तोड़ दिया और हाथ जोड़कर कहने लगे महाराज! मैं अल्पबुद्धि जीव हूँ मुझे फिर से समझा दो| गुरु जी ने छड़ी के साथ लकीर खीचकर कहा कि इस तरह का चबूतरा बनाओ|

दूसरे दिन जब गुरूजी फिर दोनों के द्वारा बनाए गए चबूतरो को देखने के लिए गए तो फिर पहले रामा जी तरफ गए| गुरु जी ने फिर से वही कहा इन्हें गिरा दो और कल फिर बनाओ| रामा जी ने चबूतरा गिराने से इंकार कर दिया| परन्तु गुरु जी ने एक सेवक से चबूतरा गिरवा दिया| फिर गुरूजी जेठा जी के पास गए| गुरु जी का उत्तर सुनते ही उन्होंने चुप-चाप चबूतरा गिरा दिया और कहा मुझे क्षमा कीजिये मैं भूल गया हूँ| आपकी आज्ञा के अनुसार ठीक चबूतरा नहीं बाना पाया| गुरु जी फिर दोनों को समझाकर चले गए|

तीसरे दिन जब फिर दोनों ने चबूतरे तैयार कर लिए तो गुरु जी ने रामा के चबूतरे को देखकर कहा तुमने फिर उस तरह का चबूतरा नहीं बनाया जिस तरह का हमने कहा था| इसको गिरा दो, परन्तु उसने कहा मुझसे और अच्छा नहीं बन सकता आपको अपनी बात याद नहीं रहती, फिर मेरा क्या कसूर है? आप किसी और से बनवा लो| गुरु जी उसका उत्तर सुनकर चुप-चाप जेठा जी की तरफ चल पड़े| गुरु जी ने जेठा जी को भी वही उत्तर दिया कि तुमने ठीक नहीं बनाया, आप हमारे समझाने पर नहीं समझे| जेठा जी हाथ जोड़कर कहने लगे महाराज! मैं कम बुद्धि करके आपकी बात नहीं समझ सका| आपजी की कृपा के बिना मुझे समझ नहीं आ सकती| आपका यह उत्तर सुनकर गुरु जी बहुत प्रसन्न हुए और कहने लगे कि हमें आपकी यह सेवा बहुत पसंद आई| आप अहंकार नहीं करते और सेवा मैं ही आनन्द लेतें हैं|

एक दिन गुरु जी अपने ध्यान स्मरण से उठे और बीबी भानी से कहने लगे, पुत्री! हम आप दोनों कि सेवा से बहुत खुश है, इसलिए हम अपनी बाकि रहती आयु श्री रामदास जी को देकर बैकुन्ठ धाम को चले जाते है| इसके पश्चात् रामदास जी को कहने लगे कि आपकी निष्काम भगति ने हमें प्रभावित किया है| अब हम दोनों में कोई भेद नहीं है| हमारी बाकि आयु ६ साल ११ महीने और १८ दिन है,आप हमारे आसान पर बैठ कर गुरु घर कि मर्यादा को चलाना| यह वचन करते आप ने पांच पैसे और नारियल श्री रामदास जी के आगे रखकर गुरु नानक जी कि गुरु गद्दी कि तीन परिक्रमा करके माथा टेक दिया| अपने पुत्रों व सारी संगत के सामने कहने लगे कि आज से गुरुगद्दी के यह मालिक है| इन्ही को माथा टेको| मोहरी जी गुरु कि बात मान गये, मगर मोहन जी ने ऐसा करने से मना कर दिया कि गुरु गद्दी पर हमारा हक है, यह कहकर माथा नहीं टेका| तत्पश्चात सारी संगत ने श्री रामदास जी को गुरु मानकर माथा टेक दिया|


श्री गुरु रामदास जी का वैराग्य

सतगुरु का परलोक गमन सुनकर सभी भगत जन गुरु जी के पास दूर-२ से आकार माथा टेकते तो मोहन जी व मोहरी जी इसे अच्छा नहीं समझते थे| गुरु रामदास जी एकांत कमरे में जा कर बैठ गये और सतगुरु के वियोग में सात शब्द उच्चारण किए, जो श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के पन्ना ९४ पर दर्ज है| शब्द की पहली पंक्ति यहाँ दर्ज है|
मझ महला ४ चउ पदे घरु १||

१.हरि हरि नामु मै हरि मनि भाइिआ||
वडभागी हरि नामु धिआइिआ||

२.मधुसूदन मेरे मन तन प्राना ||
हउ हरि बिनु दूजा अवरु ना जाना||

३.हरि गुण पड़ीए हरि गुण गुणीए ||
हरि हरि नामु कथा नित सुणीए||

४.हरि जन संत मिलहु मेरे भाई||
मेरा हरि प्रभु दसहु मै भुख लगाई||

५.हरि गुरु गिआनु हरि रसु हरि पाइिआ||
मनु हरि रंगि राता हरि रसु पीआइिआ||

६.हउ गुण गोविंद हरि नामु धिआई||
मिलि संगति मनि नामु वसाई ||

७.आवहु भैणे तुसी मिलहु पिआ री आं||
जो मेरा प्रीतमु दस तिसकै हउ वारीआं||

आप जी कि जीवन कथा में लिखा है कि इन वैरागमयी शब्दों को पड़कर आप के नेत्रों ससे जल धारा बह निकलती थी,
जिस लिए प्रेमी सिख चांदी कि कटोरियां आप कि आँखों के नीचे रख देते थे,ताकि आप के वस्त्र गीले ना होँ|यथा-

हउ रहि न सका बिनु देखे प्रीतमा, मै नीरू वहैं वहि चलै जीउ ||
(पहला शब्द पन्ना ८४)



जब ऐसे ही कुछ समय बीत गया तो संगतो में निराशा फ़ैल गयी| संगत कि ऐसी दशा देखकर बाबा बुड्डा जी व मोहरी जी गुरु जी के पास आकार बेनती करने लगे कि संगतो को दर्शन दें| तब आप जी ने बाहर आकार संगतो को शांत किया|

Friday, 5 July 2013

श्री गुरु रामदास जी जीवन-परिचय

श्री गुरु रामदास जी जीवन-परिचय



प्रकाश उत्सव (जन्म की तारीख): 24 सितम्बर 1534
Parkash Ustav (Birth date):  September 24, 1534 
पिता: बाबा हरि दास
Father: Baba Hari Das 
माँ: माता दया कौर
Mother: Mata Daya Kaur 
महल (पति या पत्नी): बीबी भानी
Mahal (spouse): Bibi Bhani 
साहिबज़ादे (वंश): प्रिथी चंद, महादेव और अर्जुन देव
Sahibzaday (offspring): Prithi Chand, Mahadev and Arjun Dev 
ज्योति ज्योत (स्वर्ग करने के उदगम): गोइंदवाल में 1 सितम्बर 1581
Joti Jyot (ascension to heaven): September 1, 1581 at Goindwal 



श्री गुरु रामदास जी  का जन्म श्री हरिदास मल जी सोढी व माता दया कौर जी की पवित्र कोख से कार्तिक वदी 2 संवत 1561 को बाज़ार चूना मंडी लाहौर में हुआ| इनके बचपन का नाम जेठा जी था| बालपन में ही इनकी माता दया कौर जी का देहांत हो गया| जब आप सात वर्ष के हुए तो आप के पिता श्री हरिदास जी भी परलोक सिधार गए| इस अवस्था में आपको आपकी नानी अपने साथ बासरके गाँव में ले गई| बासरके आपके ननिहाल थे| यहाँ आकर आप भी अन्य क्षत्री बालकों की तरह घुंगणियाँ (उबले हुए चने) बेचते थे| जब श्री गुरु अमरदास जी चेत्र सुदी 4 संवत 1608 में गुरुगद्दी पर आसीन हुए तो आप जेठा जी का और भी ख्याल रखते थे| आपकी सहनशीलता, नम्रता व आज्ञाकारिता के भाव देखकर गुरु अमरदास जी ने अपनी छोटी बेटी की शादी 22 फागुन संवत 1610 को जेठा जी (श्री गुरु रामदास जी) से कर दी| श्री रामदास जी के घर तीन पुत्र पैदा हुए: 

· श्री बाबा प्रिथी चँद जी संवत 1614 में 

· श्री बाबा महादेव जी संवत 1617 में 

· श्री (गुरु) अर्जन देव जी वैशाख 1620 में 

विवाह के बाद भी श्री (गुरु) रामदास जी पहले की तरह ही गुरु घर के लंगर और संगत की सेवा में लगे रहते|

बीबी भानी अपने गुरु जी की बहुत सेवा करती| प्रातःकाल उठकर अपने गुरु पिता को गरम पानी के साथ स्नान कराती और फिर गुरुबाणी का पाठ करके लंगर में सेवा करती| एक दीन बीबी ने देखा कि चौकी का पावा टूट गया है जिसपर बैठकर गुरु जी स्नान करते हैं| उस पावे के नीचे बीबी ने अपना हाथ रख दिया ताकि गुरु जी के वृद्ध शरीर को चोट ना लगे| बीबी के हाथ में पावे का कील लग गया और खून बहने लगा| जब गुरु जी स्नान करके उठे तो बीबी से बहते खून का कारण पूछा| बीबी ने सारी बात गुरु जी को बताई| बीबी की बात सुनकर गुरु जी प्रसन्न हो गए और आशीर्वाद देने लगे कि संसार में आपका वंश बहुत बढ़ेगा जिसकी सारा संसार पूजा करेगा|

Thursday, 4 July 2013

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 30

ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं
हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है
हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा
किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...




श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 30
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शिरडी को खींचे गये भक्त
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1. वणी के काका वैघ
2. खुशालचंद
3. बम्बई के रामलाल पंजाबी ।
इस अध्याय में बतलाया गया है कि तीन अन्य भक्त किस प्रकार शिरडी की ओर खींचे गये ।

Wednesday, 3 July 2013

श्री गुरु अमर दास जी ज्योति - ज्योत समाना

श्री गुरु अमर दास जी ज्योति - ज्योत समाना




अपने अंतिम समय को नजदीक अनुभव करके श्री गुरु अमरदास जी ने गुरुगद्दी का तिलक श्री रामदास जी को देकर सब संगत को आप जी ने उनके चरणी लगाया|इसके पश्चात् परिवार व सिखों को हुक्म मानने का उपदेश दिया जो बाबा सुन्दर जी, बाबा नन्द के पोत्र ने इसका वर्णन करके श्री गुरु अर्जुन देव जी को सुनाया-
रामकली सदु
१ ओंकार सतिगुरु परसादि||

जगि दाता सोइि भगति वछ्लु तिहु लोइि जीउ||
गुर सबदि समावए अवरु न जाणै कोइि जीउ||
अवरो न जाणहि सबदि गुर के एकु नामु धिआवहे||
परसादि नानक गुरु अंगद परम पदवी पावहे||
आइिआ ह्कारा चलणवारा हरि राम नामि समाइिआ||
जगि अमरू अटलु अतोलु ठाकरू भगति ते हरि पाइिआ||१||
इस प्रकार सबको धैर्य और हुक्म मानने का वचन करके गुरु जी ने भादरव सुदी पूर्णिमा संवत १६६१ को अपने परलोक गमन कि तयारी कर ली| संगत को वाहिगुरू का सुमिरन व शब्द कितन करने कि आज्ञा करके आप कुश के आसन पर सफ़ेद चादर तान कर लेट गये| शरीर त्याग कर अकाल पुरख के चरणों में जा पहुँचे| 


कुल आयु व गुरुगद्दी का समय (Shri Amar Das Ji Total Age and Ascension to Heaven)


श्री गुरु अमरदास जी २२ साल ५ महीने और ११ दिन गुरुगद्दी पर आसीन रहे|

आप ६५ साल ३ महीने और २३ दिन इस जगत में शरीर करके सुशोभित रहे|

Tuesday, 2 July 2013

श्री गुरु अमर दास जी–साखियाँ - मृत राजकुमार को जीवित करना

श्री गुरु अमर दास जी–साखियाँ मृत राजकुमार को जीवित करना



एक दिन बल्लू आदि सिखो ने गुरु जी से बिनती की महाराज! अनेक जातियों के लोग यहाँ दर्शन करने आतें हैं पर उनके रहने के लिए कोई खुला स्थान नहीं है, इसलिए कोई खुला माकन बनाना चाहिए| यह विनती सुनकर गुरु जी ने बाबा बुड्डा जी व अपने भतीजे सावण मल के साथ पांच सिखों को रियासत हरीपुर के राजा के पास भेजा और कहा वहाँ से मकानों के लिए लकड़ी के गठे बांधकर ब्यास नदी के रास्ते से भेजने का प्रबंध करो| सावण मल ने कहा महाराज! पहाड़ी लोग गुरु की पूजा करने वाले नहीं हैं वे मूर्ति पूजक हैं| लकड़ी खरीदने के लिए बहुत सा धन चाहिए| गुरु जी ने कहा कि सब शक्तियाँ ही आपके अधीन होंगी तुम जिस तरह भी चाहोगे उनका प्रयोग करके राजा को गुरु घर का प्रेमी बना लेना फिर वह अपने आप ही आपकी जरूरत को पूरा कर देगा| यह बात कहकर गुरु जी ने अपने हाथ का रुमाल सावण मल को देते हुए कहा कि इसको हाथ में पकड़कर तुम जी कुछ भी चाहोगे वो हो जायेगा| आपकी इच्छा यह रूमाल पूरी करेगा| रूमाल लेकर सावण मल अपने साथ पांच सिखो को हरीपुर ले गया| उस दिन एकादशी का व्रत था जिसमे राजे की तरफ से आज्ञा थी कि कोई अन्न को हाथ ना लगाये| परन्तु सावण मल और उसके साथियों ने प्रसाद तैयार करके खाया और आने वाले को भी दिया| राजे को खबर हुई तो उसने अन्न खाने व व्रत ना रखने का कारण पूछा| सावण मल ने कहा गुरु जी का लंगर सदैव ही चलता रहता है| वह किसी भी तरह के भ्रमों में विश्वाश नहीं रखते| यह उत्तर सुनकर राजा के गुरु एक बैरागी साधु ने कहा इनको कैद कर लो| अपने गुरु के कहने पर राजे ने सावण मल को कैद कर लिया|

दूसरे ही दिन राजे के पुत्र को हैजा हो गया और वह मृत्यु को प्राप्त हो गया| मंत्री ने कहा आपने गुरु के निर्दोष सिख को कैद किया है, यह उन्ही के निरादर का फल है जिससे राजकुमार को मौत हासिल हुई है| शीघ्र ही कैद से निकालकर क्षमा मांगो| राजे ने ऐसा ही किया तब सावण मल ने कहा अगर राजा गुरु का सिख बन जाये तो मैं उसके पुत्र को जीवित कर दूँगा| जब राजे को इस बात का पता लगा तो उसने कहा अगर मेरा पुत्र जीवित हो गया तो मैं और मेरा परिवार गुरु जी के सिख बन जायेगें| जब सावण मल को महल में बुलाया गया तब सावण मल ने राजे को कहा आप चुपचाप बैठकर सत्य नाम का स्मरण करो और रोना - धोना बंद कर दो| इसके पश्चात सावण मल ने जपुजी साहिब का पाठ मृत लड़के के पास जाकर करना शुरू कर दिया और गुरु जी के रूमाल का कोना धोकर लड़के के मुँह में डाला और फिर रूमाल पकड़कर उसके सिर पर सत्य नाम कहते हुए घुमाया तो राजकुमार उठ कर बैठ गया| गुरु जी के ऐसे कौतक को देखकर राजा व रानी सावण मल के चरणों में गिर पड़े| उसने सावण मल को बहुत सा धन और वस्त्र भी भेंट किये| इसके पश्चात सारे रियासत के लोग ही गुरु के सिख बन गये|

दो चार दिन तो खुशी में ही बीत गये| तो एक दिन राजे ने सावण मल को यहाँ आने का करण पूछा| सावण मल ने कहा, महाराज! ब्यास नदी के किनारे गोइंदवाल नगर में गुरु अमरदास जी रहतें हैं उनके दर्शन करने के लिए दूर दूर से सिख सेवक आते हैं, उनके लिए मकान बनवाने के लिए बहुत सी लकड़ी की जरूरत है| राजे ने उसी समय अपने आदमियों को हुकुम दिया कि मकानों में काम आने वाली दियार आदि लकड़ी काटकर उनके बेड़े पर बांधकर ब्यास में तैरा दो| इस प्रकार बहुत सी लकड़ी गोइंदवाल पहुँच गई| उसी समय सावण मल को गुरु जी की बात याद आ गई और ऐसे कौतक को देखकर वह मन ही मन गुरु की उपमा करने लगे|

Monday, 1 July 2013

श्री गुरु अमर दास जी–साखियाँ - सावण मल के अहंकार को तोड़ना

श्री गुरु अमर दास जी–साखियाँ सावण मल के अहंकार को तोड़ना



गुरु अमरदास जी ने सावण मल को लकड़ी की जरूरत पूरी होने के पश्चात गोइंदवाल वापिस बुलाया| परन्तु सावण मल मन ही मन सोचने लगा अगर मैं चला गया तो गुरु जी मुझसे वह रुमाल ले लेंगे जिससे मृत राजकुमार जीवित हुआ था| इससे मेरी कोई मान्यता नहीं रहेगी| सारी शक्ति वापिस चली जायेगी| अच्छा तो यही रहेगा कि मैं गोइंदवाल ही ना जाऊँ| ऐसा विचार मन में आते ही सावण मल ने गुरु की आज्ञा का उलंघन कर दिया| गुरु जी ने उसकी सारी शक्ति वापिस खींच ली| शक्ति चले जाने से सावण मल बहुत पछताया और अपनी भूल की क्षमा माँगने के लिए गोइंदवाल जाने को तैयार हो गया| इस प्रकार गुरु घर का निरादर करके सावण मल शक्तियों से भी हाथ धो बैठा|

जिस शक्ति के जाने के भय से वह रियासत को नहीं छोड़ रहा था गुरु जी ने उसके उसी रियासत में बैठे ही वह शक्ति उससे छीन ली और उसके अहंकार को भी तोड़ दिया|

Sunday, 30 June 2013

श्री गुरु अमर दास जी – साखियाँ - एक माई का पुत्र जीवित करना

श्री गुरु अमर दास जी – साखियाँ - एक माई का पुत्र जीवित करना



एक विधवा माई जो की गोइंदवाल में रहती थी उसका पुत्र बुखार से मर गया| वह रात्रि से समय ऊँची ऊँची रोने लगी| उसका ऐसा विर्लाप सुनकर गुरु अमरदास जी माई के घर गये और अपने चरण बच्चे के माथे पर धरे| गुरु जी के चरण माथे पर लगते ही बेटा जीवित हो गया| गुरु जी ने अपने सेवक बल्लू को कहा कि मरे हुए को जिन्दा करना इश्वर के हुकम के विरुद्ध है इस करण आगे से जब तक हमारा शरीर रहेगा तब तक कोई बच्चा माता - पिता के सामने नहीं मरेगा|

ऐसा वचन करके गुरु जी अपने आसन पर सुशोभित हो गये|

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