शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

************************************

निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

************************************

Saturday, 22 October 2011

सांई तुम भगवान हो....

ॐ सांई राम



अल्लहा. ईशा, राम तुम ही हो,
नानक की पहचान तुम ही हो,
जिसने भी जिस नाम से पुकारा तुमको
साईं तुम ने दिया उसको सहारा ||


हर दिल की दौलत तुम सांई,
सब के दिल में तुम हो रहते,
भक्तों की रक्षा करते हो,
खुद सारी पीङा हो सहते...
दया की चादर तन पे डाले,
सांई तुम भगवान हो,
दीन दुखी के मालिक तुम हो,
धरती पर वरदान हो,
दर्श दिखा के अब सुख दे दो,
तुम जीवन हो प्राण हो....

|| ॐ श्री साई नाथाय नमः ||

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JAI SHIRDI SAI BABA KI

ॐ सांई राम

Who is Shirdi Sai Baba?

Sai Baba, a Yogi, a great Indian Guru of modern times regarded by his devotees as a Saint.  Hindu devotees see him as a Sadguru, an incarnation of Shiva or Dattathreya, while Muslim devotees see him as an enlightened Peer or Qutub.  Baba's illustrious life as evidenced by well documented stories and miracles puts him in a unique place in the recent spiritual history of India.  The first temple for Baba was built in Bhivpuri, Karjat.  It is not uncommon to see at least one Shirdi Baba Mandir in every mid to large size city in present day India.  In the United States and other countries, Baba Mandhir can be found in many major cities.  Also you will find devotees in many parts of the globe and from different faiths, including Christians and Zoroastrians. 
The most important source of Baba's life comes from Shri Sai Satcharita, written in 1916 in Marathi, by Govindrao Raghunath Dabholkar, who Baba nicknamed Hemadpant.  Another biographer, Ganesh Shrikrishna Khaparde described daily life of Baba.  According to sources, very little is known about Baba's time and place of birth, family and early childhood.  What is known is Baba grew to be a Fakir(meaning a member of Muslim holy sect, who lives by begging) among Fakirs, with his attire resembling that of a Fakir.  Approximately at age 16, Baba came to the village of Shirdi (Ahmednagar district) of Maharashtra and spent most of his life in that area. In Shirdi, you will see Baba's grave (Samadhi) in the temple and also a mosque that he regularly visited.  Around 1910, Baba's fame began to spread beyond the region, with people flocking from as far as Kolkatta. Baba took Samadhi (a state before nirvana in which there is no longer consciousness of self or of any object) on October 15, 1918.

What is unique about Baba?
Baba's uniqueness was in his practice of Advaitha Vedantha and Bhakthi Yoga, Jnana Yoga, and Karma Yoga and he shunned religious orthodoxy.  His teachings included both Hinduism and Islam.  For example, Baba named the mosque that he lived Dwarakamayi, and he often said "Sab ka Malik Ek," (One God governs All), and "Allah Malik"(God is King).  Baba practiced an ascetic life and asked his followers to practice an ordinary family life.  Important features in his teachings were: Shraddha (faith) and Saburi (patience) and performing one's duties without attachment to materialistic things and being content irrespective of situations. Baba emphasized a moral code: love, forgiveness, charity, contentment, inner peace, and devotion to God and Guru.  In the mosque, Baba maintained a sacred fire that he referred to as "dhuni," from which came the custom of giving sacred ash "udhi" to visitors. 
Baba gave utmost importance to charity and act of sharing, and he said, "If any men or creature come to you, do not discourteously drive them away, receive them well and treat them with respect.  Sri Hari will be certainly pleased if you give water to the thirsty, bread to the hungry, clothes to the naked, and your verandah to strangers to sit and rest.

Baba's 11 Assurances to Devotees

  1.  No harm shall befall him who sets his foot on the soil of Shirdi.
  2.  He who comes to My Samadhi, his sorrow and suffering shall cease.
  3. Though I be no more in flesh and blood, I shall ever protect My devotees.
  4. Trust in Me and your prayer shall be answered.
  5. Know that My Spirit is immortal. Know this for yourself.
  6. Show unto Me he who sought refuge and been turned away.
  7. In whatever faith men worship Me, even so do I render to them.
  8. Not in vain is My Promise that I shall ever lighten your burden.
  9. Knock, and the door shall open. Ask and ye shall be granted.
  10. To him who surrenders unto Me totally I shall be ever indebted.
  11. Blessed is he who has become one with Me.

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Friday, 21 October 2011

आपका दास हूँ ऐसे न टालिए...........

ॐ सांई राम




सदगुरू साईं नाथ महाराज की जय
कष्टों की काली छाया दुखदायी है, जीवन में घोर उदासी लायी है l
संकट को टालो साईं दुहाई है, तेरे सिवा न कोई सहाई है l
मेरे मन तेरी मूरत समाई है, हर पल हर शन महिमा गायी है l
घर मेरे कष्टों की आंधी आई है,आपने क्यूँ मेरी सुध भुलाई है l
तुम भोले नाथ हो दया निधान हो,तुम हनुमान हो तुम बलवान हो l
तुम्ही राम और श्याम हो,सारे जग त में तुम सबसे महान हो l
तुम्ही महाकाली तुम्ही माँ शारदे,करता हूँ प्रार्थना भव से तार दे l
तुम्ही मोहमद हो गरीब नवाज़ हो,नानक की बानी में ईसा के साथ हो l
तुम्ही दिगम्बर तुम्ही कबीर हो,हो बुध तुम्ही और महावीर हो l
सारे जगत का तुम्ही आधार हो,निराकार भी और साकार हो l
करता हूँ वंदना प्रेम विशवास से,सुनो साईं अल्लाह के वास्ते l
अधरों पे मेरे नहीं मुस्कान है,घर मेरा बनने लगा शमशान है l
रहम नज़र करो उज्ढ़े वीरान पे,जिंदगी संवरेगी एक वरदान से l
पापों की धुप से तन लगा हारने,आपका यह दास लगा पुकारने l
आपने सदा ही लाज बचाई है,देर न हो जाये मन शंकाई है l
धीरे-धीरे धीरज ही खोता है,मन में बसा विशवास ही रोता है l
मेरी कल्पना साकार कर दो,सूनी जिंदगी में रंग भर दो l
ढोते-ढोते पापों का भार जिंदगी से,मैं गया हार जिंदगी से l
नाथ अवगुण अब तो बिसारो,कष्टों की लहर से आके उबारो l
करता हूँ पाप मैं पापों की खान हूँ,ज्ञानी तुम ज्ञानेश्वर मैं अज्ञान हूँ l
करता हूँ पग-पग पर पापों की भूल मैं,तार दो जीवन ये चरणों की धूल से l
तुमने ऊजरा हुआ घर बसाया,पानी से दीपक भी तुमने जलाया l
तुमने ही शिरडी को धाम बनाया,छोटे से गाँव में स्वर्ग सजाया l
कष्ट पाप श्राप उतारो,प्रेम दया दृष्टि से निहारो l
आपका दास हूँ ऐसे न टालिए,गिरने लगा हूँ साईं संभालिये l
साईजी बालक मैं अनाथ हूँ,तेरे भरोसे रहता दिन रात हूँ l
जैसा भी हूँ , हूँ तो आपका,कीजे निवारण मेरे संताप का l
तू है सवेरा और मैं रात हूँ,मेल नहीं कोई फिर भी साथ हूँ l
साईं मुझसे मुख न मोड़ो,बीच मझधार अकेला न छोड़ो l
आपके चरणों में बसे प्राण है,तेरे वचन मेरे गुरु समान है l
आपकी राहों पे चलता दास है,ख़ुशी नहीं कोई जीवन उदास है l
आंसू की धारा में डूबता किनारा,जिंदगी में दर्द , नहीं गुज़ारा l
लगाया चमन तो फूल खिलायो,फूल खिले है तो खुशबू भी लायो l
कर दो इशारा तो बात बन जाये,जो किस्मत में नहीं वो मिल जाये l
बीता ज़माना यह गाके फ़साना,सरहदे ज़िन्दगी मौत तराना l
देर तो हो गयी है अंधेर ना हो,फ़िक्र मिले लकिन फरेब ना हो l
देके टालो या दामन बचा लो,हिलने लगी रहनुमाई संभालो l
तेरे दम पे अल्लाह की शान है,सूफी संतो का ये बयान है l
गरीबों की झोली में भर दो खजाना,ज़माने के वली करो ना बहाना l
दर के भिखारी है मोहताज है हम,शंहंशाये आलम करो कुछ करम l
तेरे खजाने में अल्लाह की रहमत,तुम सदगुरू साईं हो समरथ l
आये हो धरती पे देने सहारा,करने लगे क्यूँ हमसे किनारा l
जब तक ये ब्रह्मांड रहेगा,साईं तेरा नाम रहेगा l
चाँद सितारे तुम्हे पुकारेंगे,जन्मोजनम हम रास्ता निहारेंगे l
आत्मा बदलेगी चोले हज़ार,हम मिलते रहेंगे बारम्बार l
आपके कदमो में बैठे रहेंगे,दुखड़े दिल के कहते रहेंगे l
आपकी मर्जी है दो या ना दो,हम तो कहेंगे दामन ही भर दो l
तुम हो दाता हम है भिखारी,सुनते नहीं क्यूँ अर्ज़ हमारी l
अच्छा चलो एक बात बता दो,क्या नहीं तुम्हारे पास बता दो l
जो नहीं देना है इनकार कर दो, ख़तम ये आपस की तकरार कर दो l
लौट के खाली चला जायूँगा,फिर भी गुण तेरे गायूँगा l
जब तक काया है तब तक माया है,इसी में दुखो का मूल समाया है l
सब कुछ जान के अनजान हूँ मैं,अल्लाह की तू शान तेरी शान हूँ मैं l
तेरा करम सदा सब पे रहेगा,ये चक्र युग-युग चलता रहेगा l
जो प्राणी गायेगा साईं तेरा नाम,उसको मुक्ति मिले पहुंचे परम धाम l
ये मंत्र जो प्राणी नित दिन गायेंगे,राहू , केतु , शनि निकट ना आयेंगे l
टाल जायेंगे संकट सारे,घर में वास करें सुख सारे l
जो श्रधा से करेगा पठन,उस पर देव सभी हो प्रस्सन l
रोग समूल नष्ट हो जायेंगे,कष्ट निवारण मंत्र जो गायेंगे l
चिंता हरेगा निवारण जाप,पल में दूर हो सब पाप l
जो ये पुस्तक नित दिन बांचे,श्री लक्ष्मीजी घर उसके सदा विराजे l
ज्ञान , बुधि प्राणी वो पायेगा,कष्ट निवारण मंत्र जो धयायेगा l
ये मंत्र भक्तों कमाल करेगा,आई जो अनहोनी तो टाल देगा l
भूत-प्रेत भी रहेंगे दूर ,इस मंत्र में साईं शक्ति भरपूर l
जपते रहे जो मंत्र अगर,जादू-टोना भी हो बेअसर l
इस मंत्र में सब गुण समाये,ना हो भरोसा तो आजमाए l
ये मंत्र साईं वचन ही जानो,सवयं अमल कर सत्य पहचानो l
संशय ना लाना विशवास जगाना,ये मंत्र सुखों का है खज़ाना l
इस पुस्तक में साईं का वास,जय साईं श्री साईं जय जय साईं


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Thursday, 20 October 2011

इतनी कृपा करदे ओ "साईं" ......

ॐ सांई राम



साईं की याद में मैंने,
एक दीप जला रखा है.
अपनी साँसों के तेल से,
रोशन किया रखा है.
मैं तो हूँ मेजबान,
उनके रहमो करम का
उन्हें तो अपने दिल का,
मेहमान बना रखा है.

इतनी कृपा करदे ओ "साईं"
तेरे चरणों में जीवन बिताए
हम रहे इस जगत में कही भी
तेरी चोखट को ना भूल पाए
इतने कमजोर है हम ऐ "मैया"
जोर कुछ भी चले ना हमारा
ऐसी हालत में इतना तो सोचो
हमको कैसे मिलेगा किनारा
करदे ऐसा जतन ओ "साईं"
तेरी किरपा का वरदान पाए
प्रेम बंधन में यु हमको बांधो
डोर बंधन की टूटे कभी ना
अपनी पायल का घुंघरू बना लो
दास चरणों से छूटे कभी ना
अपने चरणों से ऐसे लगालो
तेरे चरणों का गुणगान गाये
इतनी कृपा करदे ओ "साईं"
तेरे चरणों में जीवन बिताए
हम रहे इस जगत में कही भी
तेरी चोखट को ना भूल पाए !


जो जन करे रक्त दान
पावे सुख शांति और मान
साईं सवारे उसका जीवन
जिसके रक्त से बच जावे जान
ॐ साईं राम

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श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 28 & Also English Chapter 28

ॐ सांई राम
आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं
हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है
हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा
किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 28


.......................
चिडियों का शिरडी को खींचा जाना – लक्ष्मीचंद, बुरहानपुर की महिला, मेघा का निर्वाण।
-----------------------------
प्राक्कथन
...............
श्री साई अनंत है । वे एक चींटी से लेकर ब्रहमाणड पर्यन्त सर्व भूतों में व्याप्त है । वेद और आत्मविज्ञान में पूर्ण पारंगत होने के कारण वे सदगुरु कहलाने के सर्वथा योग्य है । चाहे कोई कितना ही विद्घान क्यों न हो, परन्तु यदि वह अपने शिष्य की जागृति कर उसे आत्मस्वरुप का दर्शन न करा सके तो उसे सदगुरु के नाम से कदापि सम्बोधित नहीं किया जा सकता । साधारणतः पिता केवल इस नश्वर शरीर का ही जन्मदाता है, परन्तु सदगुरु तो जन्म और मृत्यु दोनों से ही मुक्ति करा देने वाले है । अतः वे अन्य लोगों से अधिक दयावन्त है । श्री साईबाबा हमेशा कहा करते थे कि मेरा भक्त चाहे एक हजार कोस की दूरी पर ही क्यों न हो, वह शिरडी को ऐसा खिंचता चला आता है, जैसे धागे से बँधी हुई चिडियाँ खिंच कर स्वयं ही आ जाती है । इस अध्याय में ऐसी ही तीन चिडियों का वर्णन है ।
1. लाला लक्ष्मीचंद
........................
ये महानुभाव बम्बई के श्री वेंकटेश्वर प्रेस में नौकरी करते थे । से नौकरी छोड़कर वे रेलवे विभाग में आए और फिर वे मेसर्स रैली ब्रदर्स एंड कम्पनी में मुन्शी का कार्य करने लगे । उनका सन् 1910 में श्री साईबाबा से सम्पर्क हुआ । बड़े दिन (क्रिसमस) से लगभग एक या दो मास पहले सांताक्रुज में उन्होंने स्वप्न में एक दाढ़ीवाले वृदृ को देखा, जो चारों ओर से भक्तों से घिरा हुआ खड़ा था । कुछ दिनों के पश्चात् वे अपने मित्र श्री. दत्तात्रेय मंजुनाथ बिजूर के यहाँ दासगणू का कीर्तन सुनने गये । दासगणू का यह नियम था कि वे कीर्तन करते समय श्रोताओं के सम्मुख श्री साईबाबा का चित्र रख लिया करते थे । लक्ष्मीचन्द को यह चित्र देखकर महान् आश्चर्य हुआ, क्योंकि स्वप्न में उन्हें जिस वृदृ के दर्शन हुए थे, उनकी आकृति भी ठीक इस चित्र के अनुरुप ही थी । इससे वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि स्वप्न में दर्शन देने वाले स्वयं शिरडी के श्री साईनाथ समर्थ के अतिरिक्त और कोई नहीं है । चित्र-दर्शन, दासगणू का मधुर कीर्तन और उनके संत तुकाराम पर प्रवचन आदि का कुछ ऐसा प्रभाव उन पर पड़ा कि उन्होंने शिरडी-यात्रा का दृढ़ संकल्प कर लिया । भक्तों को चिरकाल से ही ऐसा अनुभव होता आया है कि जो सदगुरु या अन्य किसी आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में निकलता है, उसकी ईश्वर सदैव ही कुछ न कुछ सहायता करते है । उसी राज्ञि को लगभग आठ बजे उनके एक मित्र शंकरराव ने उनका द्घार खटखटाया और पूछा कि क्या आप हमारे साथ शिरडी चलने को तैयार है । लक्ष्मीचन्द के हर्ष का पारावार न रहा और उन्होंने तुरन्त ही शिरडी चलने का निश्चय किया । एक मारवाड़ी से पन्द्रह रुपये उधार लेकर तथा अन्य आवश्यक प्रबन्ध कर उन्होंने शिरडी को प्रस्थान कर दिया । रेलगाड़ी में उन्होंने अपने मित्र के साथ कुछ देर भजन भी किया । उसी डिब्बे में चार यवन यात्री भी बैठे थे, जो शिरडी के समीप ही अपने-अपने घरों को लौट रहे थे । लक्ष्मीचन्द ने उन लोगों से श्री साईबाबा के सम्बन्ध में कुछ पूछताछ की । तब लोगों ने उन्हें बताया कि श्री साईबाबा शिरडी में अनेक वर्षों से निवास कर रहे है और वे एक पहुँचे हुए संत है । जब वे कोपरगाँव पहुँचे तो बाबा को भेंट देने के लिए कुछ अमरुद खरीदने का उन्होंने विचार किया । वे वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्यमय दृश्य देखने में कुछ ऐसे तल्लीन हुए कि उन्हें अमरुद खरीदने की सुधि ही न रही । परन्तु जबवे शिरडी के समीप आये तो यकायक उन्हें अमरुद खरीदने की स्मृति हो आई । इसी बीच उन्होंने देखा कि एक वृद्घा टोकरी में अमरुद लिये ताँगे के पीछे-पीछे दौड़ती चली आ रही है । यह देख उन्होंने ताँगा रुकवाया और उनमें से कुछ बढिया अमरुद खरीद लिये । तब वह वृद्घा उनसे कहने लगी कि कृपा कर ये शेष अमरुद भी मेरी ओर से बाबा को भेंट कर देना । यह सुनकर तत्क्षण ही उन्हें विचार आया कि मैंने अमरुद करीदने की जो इच्छा पहले की थी और जिसे मैं भूल गया था, उसी की इस वृद्घा ने पुनः स्मृति करा दी । श्री साईबाबा के प्रति उसकी भक्ति देख वे दोनों बड़े चकित हुए । लक्ष्मीचंद ने यह सोचकर कि हो सकता है कि स्वप्न में जिस वृदृ के दर्शन मैंने किये थे, उनकी ही यह कोई रिश्तेदार हो, वे आगे बढ़े । शिरडी के समीप पहुँचने पर उन्हें दूर से ही मसजिद में फहराती ध्वजाये दीखने लगी, जिन्हें देख प्रणाम कर अपने हाथ में पूजन-सामग्री लेकर वे मसजिद पहुँचे और बाबा का यथाविधि पूजन कर वे द्रवित हो गये । उनके दर्शन कर वे अत्यन्त आनन्दित हुए तथा उनके शीतल चरणों से ऐसे लिपटे, जैसे एक मधुमक्खी कमल के मकरन्द की सुगन्ध से मुग्ध होकर उससे लिपट जाती है । तब बाबा ने उनसे जो कुछ कहा, उसका वर्णन हेमाडपंत ने अपने मूल ग्रन्थ में इस प्रकार किया है साले, रास्ते में भजन करते और दूसरे आदमी से पूछते है । क्या दूसरे से पूछना । सब कुछ अपनी आँखों से देखना । काहे को दूसरे आदमी से पूछना । सपना क्या झूठा है या सच्चा । कर लो अपना विचार आप । मारवाड़ी से उधार लेने की क्या जरुरत थी । हुई क्या मुराद की पूर्ति । ये शब्द सुनकर उनकी सर्वव्यापकता पर लक्ष्मीचन्द को बड़ा अचम्भा हुआ । वे बड़े लज्जित हुए कि घर से शिरड तक मार्ग में जो कुछ हुआ, उसका उन्हें सब पता है । इसमें विशेष ध्यान देने योग्य बात केवल यह है कि बाबा यह नहीं चाहते थे कि उनके दर्शन के लिये कर्ज लिया जाय या तीर्थ यात्रा में छुट्टी मनायें ।
साँजा (उपमा)
................
दोपहर के समय जब लक्ष्मीचंद भोजन को बैठे तो उन्हें एक भक्त ने साँजे का प्रसाद लाकर दिया, जिसे पाकर वे बड़े प्रसन्न हुए । दूसरे दिन भी वे साँजा की आशा लगाये बैठे रहे, परन्तु किसी भक्त ने वह प्रसाद न दिया, जिसके लिये वे अति उत्सुक थे । तीसरे दिन दोपहर की आरती पर बापूसाहेब जोन ने बाबा से पूछा कि नैवेघ के लिये क्या बनाया जावे तब बाबा ने उनसे साँजा लाने को कहा । भक्तगण दो बडे बर्तनों में साँजा भर कर ले आये । लक्ष्मीचंद को भूख भी अधिक लगी थी । साथ ही उनकी पीठ में दर्द भी था । बाबा ने लक्ष्मीचंद से कहा – (हेमाडपंत ने मूल ग्रन्थ में इस प्रकार वर्णन किया है) तुमको भूख लगी है, अच्छा हुआ । कमर में दर्द भी हो । लो, अब साँजे की ही करो दवा । उन्हें पुनः अचम्भा हुआ कि मेरे मन के समस्त विचारों को उन्होंने जान लिया है । वस्तुतः वे सर्वज्ञ है ।
कुदृष्टि
........
इसी यात्रा में एक बार उनको चावड़ी का जुलूस देखने का भी सौभाग्य प्राप्त हो गया । उस दिन बाबा कफ से अधिक पीड़ित थे । उन्हें विचार आया कि इस कफ का कारण शायद किसी की नजर लगी हो । दूसरे दिन प्रातःकाल जब बाबा मसजिद को गये तो शामा से कहने लगे कि कल जो मुझे कफ से पीड़ा हो रही थी, उसका मुख्य कराण किसी की कुदृष्टि ही है । मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि किसी की नजर लग गई है, इसलिये यह पीड़ा मुझे हो गई है । लक्ष्मीचन्द के मन में जो विचार उठ रहे थे, वही बाबा ने भी कह दिये । बाबा की सर्वज्ञता के अनेक प्रमाण तथा भक्तों के प्रति उनका स्नेह देखकर लक्ष्मीचंद बाबा के चरणों पर गिर पड़े और कहने लगे कि आपके प्रिय दर्शन से मेरे चित्त को बड़ी प्रसन्नता हुई है । मेरा मन-मधुप आपके चरण कमल और भजनों में ही लगा रहे । आपके अतिरिक्त भी अन्य कोई ईश्वर है, इसका मुझे ज्ञान नहीं । मुझ पर आप सदा दया और स्नेह करें और अपने चरणों के दीन दास की रक्षा कर उसका कल्याण करें । आपके भवभयनाशक चरणों का स्मरण करते हुये मेरा जीवन आनन्द से व्यतीत हो जाये, ऐसी मेरी आपसे विनम्र प्रार्थना है ।
बाबा से आर्शीवाद तथा उदी लेकर वे मित्र के साथ प्रसन्न और सन्तुष्ट होकर मार्ग में उनकी कीर्ति का गुणगान करते हुए घर वापस लौट आये और सदैव उनके अनन्य भक्त बने रहे । शिरडी जाने वालों के हाथ वे उनको हार, कपूर और दक्षिणा भेजा करते थे ।
2. बुरहानपुर की महिला
............................
अब ह दूसरी चिड़िया (भक्त) का वर्णन करेंगे । एक दिन बुरहानपुर में एक महिला से स्वप्न में देखा कि श्री साईबाबा उसके द्घार पर खड़े भोजन के लिये खिचड़ी माँग रहे है । उसने उठकर देखा तो द्गारपर कोई भी न था । फिर भी वह प्रसन्न हुई और उसने यह स्वप्न अपने पति तथा अन्य लोगों को सुनाया । उसका पति डाक विभाग में लौकरी करता था । वे दोनों ही बड़े धार्मिक थे । जब उसका स्थानान्तरण अकोला को होने लगा तो दोनों ने शिरडी जाने का भी निश्चय किया और एक शुभ दिन उन्होंने शिरडी को प्रस्थान कर दिया । मार्ग में गोमती तीर्थ होकर वे शिरडी पहुँचे और वहाँदो माह तक ठहरे । प्रतिदिन वे मसजिद जाते और बाबा का पूजन कर आनन्द से अपना समय व्यतीत करते थे । यघपि दम्पति खिचड़ी का नैवेघ भेंट करने को ही आये थे, परन्तु किसी कारणवश उन्हें 14 दिनों तक ऐसा संयोग प्राप्त न हो सका । उनकी स्त्री इस कार्य में अब अधिक विलम्ब न करना चाहती थी । इसीलिये जब 15वें दिन दोपहर के समय वह खिचड़ी लेकर मसजिद में पहुँची तो उसने देखा कि बाबा अन्य लोगों के साथ भोजन करने बैठ चुके है । परदा गिर चुका था, जिसके पश्चात् किसी का साहस न था कि वह अन्दर प्रवेश कर सके । परन्तु वह एक क्षण भी प्रतीक्षा न कर सकी और हाथ से परदा हटाकर भीतर चली आई । बडे आश्चर्य की बात थी कि उसने देखा कि बाबा की इच्छा उस दिन प्रथमतः किचड़ी खाने की ही थी, जिसकी उन्हें आवश्यकता थी । जब वह थाली लेकर भीतर आई तो बाबा को बड़ा हर्ष हुआ और वे उसी में से खिचड़ी के ग्रास लेकर खाने लगे । बाबा की ऐसी उत्सुकता देख प्रत्येक को बड़ा आश्चर्य हुआ और जिन्होंने यह खिचड़ी की वार्ता सुनी, उन्हें भक्तों के प्रति बाबा का असाधारण स्नेह देख बड़ी प्रसन्नता हुई ।
मेघा का निर्वाण
...................
अब तृतीय महान् पक्षी की चर्चा सुनिये । बिरमगाँव का रहने वाला मेघा अत्यन्त सीधा और अनपढ़ व्यक्ति था । वह रावबहादुर ह.वि. साठे के यहाँ रसोइयाका काम किया करता था । वह शिवजी का परम भक्त था, और सदैव पंचाक्षरी मंत्र नमः शिवाय का जप किया करता था । सन्ध्योपासना आदि का उसे कुछ भी ज्ञान न था । यहाँ तक कि वह संध्या के मूल गायत्रींमंत्र को भी न जानता था । रावबहादुर साठे का उस पर अत्यन्त स्नेह था । इसलिये उन्होंने उसे सन्ध्या की विधि तथा गायत्रीमंत्र सिखला दिया । साठेसाहेब ने श्री साईबाबा को शिवजी का साक्षात् अवतार बताकर उसे शिरडी भेजने का निश्चय किया । किन्तु साठेसाहेब से पूछने पर उन्होंने बताया किश्री साईबाबा तो यवन है । इसलिये मेघा ने सोचा कि शिरडी में एक यवन को प्रणाम करना पड़े, यह अच्छी बात नहीं है । भोला-भाला आदमी तो वह था ही, इसलिये उसके मन में असमंजस पैदा हो गया । तब उसने अपने स्वामी से प्रार्थना की कि कृपा कर मुजे वहाँ न भेजे । परन्तु साठेसाहेब कहाँ मानने वाले थे । उनके सामने मेघा की एक न चली । उन्होंने उसे किसी प्रकार शिरडी भेज ही दिया तथा उसके द्घारा अपने ससुर गणेश दामोदर उपनाम दादा केलकर को, जो शिरडी में ही रहते थे-एक पत्र भेजा कि मेघा का परिचय बाबा से करा देना । शिरडी पहुँचने पर जब वह समजिद मे घुसा तो बाबा अत्यन्त क्रोधित हो गये और उसे उन्होंने मसजिद में आने की मनाही कर दी । वे गर्जना कर कहने लगे किउसे बाहर निकाल दो । फिर मेघा की ओर देखकर कहने लगे कि तुम तो एक उच्च कुलीन ब्राहमण हो और मैं निमन जाति का एक यवन । तुम्हारी जाति भ्रष्ट हो जायेगी । इसलिये यहाँ से बाहर निकल जाओ । ये शब्द सुनकर मेघा काँप उठा । उसे बड़ा विसमय हुआ कि जो कुछ उसके मन में विचार उठ रहे थे, उन्हें बाबा ने कैसे जान लिया । किसी प्रकार वह कुछ दिन वहाँ ठहरा और अपनी इच्छानुसार सेवा भी करता रहा, परन्तु उसकी इच्छा तृप्त न हुई । फिर वह घर लौट आया और वहाँ से त्रिंबक (नासिक जिला) को चला गया । वर्ष भरके पश्चात् वह पुनः शिरडी आया और इस बार दादा केलकर के कहने से उसे मसजिद में रहने का अवसर प्राप्त हो गया । साईबाबा मौखिक उपदेश द्घारा मेघा कीउन्नति करने के बदले उसका आंतरिक सुदार कर रहे थे । उसकी स्थिति में पर्याप्त परिवर्तन हो कर यथेष्ट प्रगति हो चुकी थी और अब तो वह श्री साईबाबा को शिवजी का ही साक्षात् अवतार समझने लगा था । शिवपूजन ममें बिल्व पत्रों की आवश्यकता होती है । इसलिये अपने शिवजी (बाबा) का पूजन करने के हेतु बिल्वपत्रों की खोज मे वह मीलों दूर निकल जाया करता था । प्रतिदिन उसने ऐसा नियम बना लिया था कि गाँव में जितने भी देवालय थे, प्रथम वहाँ जाकर वह उनका पूजन करता और इसके पश्चात् ही वह मसजिद में बाबा को प्रणाम करता तथा कुछ देर चरण-सेवा करने के पश्चात् ही चरणामृत पान करता था । एक बार ऐसा हुआ कि खंडोबा के मंदिर का द्घार बन्द था । इस कारण वह बिना पूजन किये ही वहाँ से लौट आया और जब वह मसजिद में आया तो बाबा ने उसकी सेवा स्वीकार न की तथा उसे पुनः वहाँ जाकर पूजन कर आने को कहा और उसे बतलाया कि अब मंदिर के द्घार खुल गये है । मेघा ने जाकर देखा कि सचमुच मंदिर के द्घार खुल गये है । जब उसने लौटकर यथाविधि पूजा की, तब कहीं बाबा ने उसे अपना पूजन करने की अनुमति दी ।
गंगास्नान
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एक बार मकर संक्रान्ति के अवसर पर मेघा ने विचार किया कि बाबा को चन्दन का लेप करुँ तथा गंगाजल से उन्हें स्नान कराऊँ । बाबा ने पहले तो इसके लिए अपनी स्वीकृति न दी, परन्तु उसकी लगातार प्रार्थना के उपरांत उन्होंने किसी प्रकार स्वीकार कर लिया । गोवावरी नदी का पवित्र जल लाने के लिए मेघा को आठ कोस का चक्कर लगाना पड़ा । वह जल लेकर लौट आया और दोपहर तक पूर्ण व्यवस्था कर ली । तब उसने बाबा को तैयार होने की सूचना दी । बाबा ने पुनः मेघा से अनुरोध किया कि मुझे इस झंझट से दूर ही रहने दो । मैं तो एक फकीर हूँ, मुझे गंगाजल से क्या प्रयोजन । परन्तु मेघा कुछ सुनता ही न था । मेघा की तो यह दृढ़ा धारणा थी कि शिवजी गंगाजल से अधिक प्रसन्न होते है । इसीलिये ऐसे शुभ पर्व पर अपने शिवजी को स्नान कराना हमारा परम कर्तव्य है । अब तो बाबा को सहमत होना ही पड़ा और नीचे उतर कर वे एक पीढ़े पर बैठ गये तथा अपना मस्तक आगे करते हुए कहा कि अरे मेघा । कम से कम इतनी कृपा तो करना कि मेरे केवल सिर पर ही पानी डालना । सिर शरीर का प्रधान अंग है और उस पर पानी डालना ही पूरे शरीर पर डालने के सदृश है । मेघा ने अच्छा अच्छा कहते हुए बर्तन उठाकर सिर पर पानी डालना प्रारम्भ कर दिया । ऐसा करने से उसे इतनी प्रसन्नता हुई कि उसने उच्च स्वर में हर हर गंगे की ध्वनि करते हुए समूचे बर्तन का पानी बाबा के सम्पूर्ण शरीर पर उँडेल दिया और फिर पानी का बर्तन एक ओर रखकर वह बाबा की ओर निहारन लगा । उसने देखा कि बाबा का तो केवल सिर ही भींगा हौ और शेष भाग ज्यों का त्यों बिल्कुल सूखा ही है । यह देख उसे बड़ा आश्चर्य हुआ ।
त्रिशूल और पिंडी
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मेघा बाबा को दो स्थानों पर स्नान कराया करता था । प्रथम वह बाबा को मसजिद में स्नान करात और फिर वाड़े में नानासाहेब चाँदोरकर द्घारा प्राप्त उनके बड़े चित्र को । इस प्रकार यह क्रम 12 मास तक चलता रहा । बाबा ने उसकी भक्ति तथा विश्वास दृढ़ करने के लिये उसे दर्शन दिये । एक दिन प्रातःकाल मेघा जब अर्द्घ निद्रावस्था में अपनी शैया पर पड़ा हुआ था, तभी उसे उनके श्री दर्शन हुए । बाबा ने उसे जागृत जानकर अक्षत फेंके और कहा कि मेघा मुझे त्रिशूल लगाओ । इतना कहकर वे अदृश्य हो गये । उनके शब्द सुनकर उसने त्रिशूल लगाओ । इतना कहकर वे अदृश्य हो गये । उनके शब्द सुनकर उसने उत्सुकता से अपनी आँखें खोलीं, परन्तु देखा कि वहाँ कोई नहीं है, केवल अक्षत ही यहाँ-वहाँ बिखरे पड़े है । तब वह उठकर बाबा के पास गया और उन्हें अपना स्वप्न सुनाने के पश्चात् उसने उन्हें त्रिशूल लगाने की आज्ञा माँगी । बाबा ने कहा कि क्या तुमने मेरे शब्द नहीं सुने कि मुझे त्रिशूल लगाओ । वह कोई स्वप्न तो नही, वरन् मेरी प्रत्यक्ष आज्ञा थी । मेरे शब्द सदैव अर्थपूर्ण होते है, थोथे-पोचे नहीं । मेघा कहने लगा कि आपने दया कर मुझे निद्रा से तो जागृत कर दिया है, परन्तु सभी द्घार पूर्ववत् ही बन्द देखकर मैं मूढ़मति भ्रमित हो उठा हूँ कि कहीं स्वप्न तो नहीं देख रह था । बाबा ने आगे कहा कि मुझे प्रवेश करने के लिए किसी विशेष द्घार की आवश्यकता नहीं है । न मेरा कोई रुप ही है और न कोई अन्त ही । मैं सदैव सर्वभूतों में व्याप्त हूँ । जो मुझ पर विश्वास रखकर सतत मेरा ही चिन्तन करता है, उसके सब कार्य मैं स्वयं ही करता हूँ और अन्त में उसे श्रेण्ठ गति देता हूँ । मेघा वाड़े को लौट आया और बाबा के चित्र कके समीप ही दीवाल पर एक लाल त्रिशूल खींच दिया । दूसरे दिन एक रामदासी भक्त पूने से आया । उसने बाबा को प्रणाम कर शंकर की एक पिंडी भेंट की । उसी समय मेघा भी वहाँ पहुँचे । तब बाबा उनसे कहने लगे कि देखो, शंकर भोले आ गये है । अब उन्हें सँभालो । मेघा ने पिंडी पर त्रिशूल लगा देखा तो उसे महान् विस्मय हुआ । वह वाड़े में आया । इस समय काकासाहेब दीक्षित स्नान के पश्चात् सिर पर तौलिया डाले साई नाम का जप कर रहे थे । तभी उन्होंने ध्यान में एक पिंडी देखी, जिससे उन्हें कौतूहल-सा हो रहा था । उन्होंने सामने से मेघा को आते देखा । मेघा ने बाबा द्घारा प्रदत्त वह पिंडी काकासाहेब दीक्षित को दिखाई । पिंडी ठीक वैसी ही थी, जैसी कि उन्होंने कुछ घड़ी पूर्व ध्यान में देखी थी । कुछ दिनों में जब त्रिशूल का खींचना पूर्ण हो गया तो बाबा ने बड़े चित्र के पास (जिसका मेघा नित्य पूजन करता था ) ही उस पिंडी की स्थापना कर दी । मेघा को शिव-पूजन से बड़ा प्रेम था । त्रिपुंड खींचने का अवसर देकर तथा पिंडी की स्थापना कर बाबा ने उसका विश्वास दृढ़ कर दिया । इस प्रकार कई वर्षों तक लगातार दोपहर और सन्ध्या को नियमित आरती तथा पूजा कर सन् 1912 में मेघा परलोकवासी हो गया । बाबा ने उसके मृत शरीर पर अपना हाथ फेकरते हुए कहा कि यह मेरा सच्चा भक्त था । फिर बाबा ने अपने ही खर्च से उसका मृत्यु-भोज ब्राहमणों को दिये जाने की आज्ञा दी, जिसका पालन काकासाहेब दीक्षित ने किया ।


।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।


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Shree Sai Sachritra Chapter 28

Sparrows Drawn To Shirdi
(1) Lakhamichand - (2) Burhanpore Lady - (3) Megha
Preliminary
Sai is not finite or limited. He dwells in all beings, from ants and insects to the God Brahma. He pervades all. Sai was well-versed in the knowledge of the Vedas, as well as in the science of Self-realisation. As He was proficient in both these, He was well-fitted to be the Sad-guru. Any one, though learned, but not able to awaken the disciples and establish them in Self-realisation, does not deserve to be called a Sadguru. Generally the father gives birth to the body, and death invariably follows life; but Sadguru does away with both life and death, and so he is more kind and merciful, than any body.
Sai Baba often said that-let His man (Devotee) be at any distance, a thousand koss away from Him, he will be drawn to Shirdi like a sparrow, with a thread tied to its feet. This Chapter describes the stories of three such sparrows.
Lala Lakhamichand
This gentleman was first serving in the Railways and afterwards in Shri Venkateshwar Press in Bombay and thereafter in the firm of Messrs. Ralli Brothers as a munshi (clerk). He got the contact of Baba in 1910. One or two months before Christmas he saw in his dream at Santacruz (a suburb of Bombay) an old man with a beard, standing and surrounded by his Bhaktas. Some days later he went to the house of his friend. Mr Dattatreya Manjunath Bijur to hear the kirtan by Das Ganu. It was always the practice of Das Ganu to keep Baba's picture in front of the audience while making the kirtan. Lakhamichand was surprised to see that the features of the old man he saw in his dream, tallied exactly with those in the picture and thus he came to the conclusion, that the old man, he saw in his dream was Sai Baba himself. The sight of this picture, Das Ganu's kirtan and the life of the Saint Tukaram on which Das Ganu discoursed, all these things made a deep impression on his mind and he pined to go to Shirdi. It is always the experience of the Bhaktas that God always helps them in their search for Sad-guru and other spiritual endeavours. That very night at 8-00 p.m. a friend named Shankarrao knocked at his door and asked him whether he would accompany him to Shirdi. His joy knew no bounds and he at once decided to go to Shirdi. He borrowed Rs.15/- from his cousin and after making due preparations left for Shirdi. In the train, he and his friend Shankar Rao did some Bhajan (sang religious songs) and enquired about Sai baba with some fellow passengers-four Mahomedans, who were returning to their place near Shirdi. They all told tham that Sai baba was a great Saint living in Shirdi for many years. Then when they reached Kopergaon he wanted to buy some good guavas for offering to Baba, but he was so much enrapt with the scenery and sights there, that he forgot to purchase them. When they were nearing Shirdi, he was reminded of the guavas; just then he saw an old woman with a guava-basket on her head, running after the tanga. The tanga was stopped and he gladly purchased some select fruits, when the woman said - "Take all the rest and offer them on my behalf to Baba". The facts viz. that he had intended to purchase guavas, but that he had forgotten to do so, the old woman's encounter and her devotion to Baba, all these were a surprise to both the friends; and Lakhamichand thought in his mind, that the old woman might be some relation of the old man he saw in his dream. Then they drove on and came near Shirdi and seeing the flags on the Masjid they saluted them. With Puja materials in hand, they then went to the Masjid and worshipped Baba with due formality. Lakhmichand was much moved and was extremely happy to see Baba. He was enrapt with Baba's Feet as a bee with a sweet smelling lotus. Then Baba spoke as follows :-
"Cunning fellow, he does bhajan on the way and enquires from others. Why ask others? Everything we should see with our own eyes; where is the necessity to question others? Just think for yourself whether your dream is true or not? Where was the necessity of the darshan by taking a loan from a Marwari? Is the heart's desire now satisfied?"
Hearing these words Lakhamichand was wonderstruck at Baba's omniscience. He was at a loss to know how Baba came to know about all the things that had happened enroute from his house to Shirdi. The chief thing to note in this respect is that Baba never liked people to run into debt for taking His darshan, or celebrating any holiday or making any pilgrimage.
Sanza
At when Lakhamichand was sitting for meals he got some sanza (wheat-pudding) from a devotee as Prasad. He was pleased to have it. Next day also he expected it, but got nothing. So, he was anxious to get it again. Then on the third day at the Arati time, Bapusaheb Jog asked Baba, what naivedya he should bring. Baba told him to bring sanza. Then the Bhaktas brought two big potfuls of sanza. Lakshamichand was very hungry and there was some pain in his back. Then Baba said to him - "It is good that you are hungry, take sanza and some medicine for the pain in the back." He was again wonderstruck to see that Baba again read his mind and spoke out what was passing therein. How omniscient was He!
Evil eye
On this occasion, he once witnessed one night the procession to the chavadi. Baba then suffered much from cough. He thought that this suffering of Baba might be due to somebody's evil eye. Next morning when he went to the Masjid Baba spoke to Shama as follows - "I suffered last night from cough; is it due to some evil eye? I think that somebody's evil eye has worked on me and so I am suffering". In this case Baba spoke out what was passing in Lakshamichand's mind.
On seeing these proofs of Baba's omniscience and kindness to His Bhaktas, he fell prostrate at Baba's Feet and said - "I am much pleased with your darshan. Ever be kind and merciful to me and protect me always. There is no other God to me in this world except Your Feet. Let my mind be ever rapt in Your Bhajan and Feet. Let Your grace protect me from the miseries of the world and let me ever chant Your name and be happy".
After getting Baba' Udi and blessing he returned home with his friend, much pleased and contented and singing Baba's glory on the way. He remained a staunch devotee of baba afterwards and always sent garlands of flowers, camphor and Dakshina with any person of his acquaintance bound for Shirdi.
Burhanpore Lady
Now let us turn to another sparrow (Baba's word meaning devotee). One lady in Burhanpore saw in her dream Sai Baba coming to her door and begging khichadi (rice cooked with dal and salt) for His meals. On awakening she saw no body at her door. However, she was pleased with the vision and told it to all including her husband. He was employed in the Postal Department and when he was transferred to Akola, both husband and wife, who were devout, decided to go to Shirdi. Then on a suitable day they left for Shirdi and after visiting Gomati Tirth on the way, reached Shirdi and stayed there for two months. Every day they went to the Masjid, performed Baba's worship and passed their time happily. The couple came to Shirdi to offer Khichadi as naivedya but for the first 14 days, somehow or other, it could not be offered. The lady did not like this delay. Then on the 15th day she came at to the Masjid with her khichadi. There she found that Baba and others were already sitting for meals, and that the curtain was down. Nobody dared enter in when the curtain was let down, but the lady could not wait. She threw up the curtain with her hand and entered. Strange to say that Baba seemed that day, hungry for khichadi and wanted that thing first and when the lady came in with the dish, Baba was delighted, and began to eat morsel after morsel of khichadi. On seeing the earnestness of Baba in this respect, everybody was wonderstruck and those, who heard the story of khichadi, were convinced about His extraordinary love for His devotees.
Megha
Now let us go to the third and bigger 'sparrow'. Megha of Viramgaon was a simple and illiterate Brahmin cook of Rao Bahadur H. V. Sathe. He was a devotee of Shiva and always chanted the five syllabled mantra 'Namah Shivaya'. He did not know the Sandhya nor its chief mantra, the Gayatri. Rao Bahadur Sathe was interested in him, got him taught the Sandhya and the Gayatri. Sathe told him that Sai Baba of Shirdi was the embodied form of the God Shiva and made him start for Shirdi. At the Broach Railway station he learnt that Sai Baba was a Moslem and his simple and orthodox mind was much perturbed at the prospect of bowing to a Moslem, and he prayed to his master not to send him there. His master, however, insisted on his going there and gave him a letter of introduction to his (Sathe's) father-in-law, Ganesh Domodar, alias Dada Kelkar at Shirdi, to introduce him to Sai Baba. When he reached Shirdi and went to the Masjid, Baba was very indignant and would not allow him to enter. "Kick out the rascal" roared Baba, and then said to Megha - "You are a high caste Brahmin and I am a low Moslem; you will lose your caste by coming here. So get away." Hearing these words Megha began to tremble. He was wondering as to how Baba had come to know about what was passing in his mind. He stayed there for some days, serving Baba in his own way, but was not convinced. Then he went home. After that he went to Tryambak (Nasik District) and stayed there for a year and a half. Then again he returned to Shirdi. This time, at the intercession of Dada Kelkar, he was allowed to enter the Masjid and stay in Shirdi. Sai Baba's help to Megha was not through any oral instruction. He worked upon Megha internally (mentally) with the result that he was considerably changed and benefited. Then Megha began to look upon Sai Baba as an incarnation of Shiva. In order to worship Shiva, bela leaves are required and Megha used to go miles and miles every day to bring them and worship his Shiva (Baba). His practice was to worship all the Gods in the village and then come to the Masjid and after saluting Baba's gadi (asan) he worshipped Baba and after doing some service (shampooing His Legs) drank the washings (Tirth) of Baba's Feet. Once it so happened that he came to the Masjid without worshipping God Khandoba, as the door of the temple was closed. Baba did not accept his worship and sent him again, saying that the door was open then. Megha went, found the door open, worshipped the Deity, and then returned to Baba as usual.
Ganges-Bath
On one Makar-Sankranti day, Megha wanted to besmear the body of Baba with sandal-paste and bathe Him with Ganges water. Baba was first unwilling to undergo this operation, but at his repeated requests, He consented. Megha had to traverse a distance of eight koss (going and returning) to bring the sacred water from the Gomati river. He brought the water, made all preparations for the bath at and asked Baba to get ready for the same. Then Baba again asked him to be freed from his bath saying that, as a Fakir He had nothing to do (or gain) with Ganges water; but Megha did not listen. He knew that Shiva is pleased with a bath of Ganges water and that he must give his Shiva (Baba) that bath on that auspicious day. Baba then consented, came down and sat on a pat (wooden board) and protruding his head said - "Oh Megha, do at least this favour; head is the most important organ of the body, so pour the water over that only-it is equivalent to the full or whole bath." "Alright" said Megha and lifting the water pot up, began to pour it on the head but in doing this he was so much overwhelmed with love that he cried out 'Har Gange' and emptied the pot on the whole body. He kept the pot aside and began to look at Baba, but to his surprise and amazement he found that Baba's head was only drenched but the body quite dry.
Trident and Pindi
Megha worshipped Baba in two places; in the Masjid he worshipped Baba in person and in the Wada, Baba's big picture, given by Nanasaheb Chandorkar. This he did for 12 months. Then in order to appreciate his devotion and confirm his faith, Baba gave him a vision. Early one morning when Megha was still lying down on his bed with eyes closed but internally awake, he saw clearly Baba's Form. Baba knowing him to be awake threw Akshata (rice-grains marked red with Kumkum) and said, "Megha, draw a Trident" and disappeared. Hearing Baba's words, he eagerly opened his eyes but did not see Baba, but saw only rice grains spread here and there. He then went to Baba, told Him about the vision and asked permission to draw Trident. Baba said - "Did you not hear My words asking you to draw Trident? It was no vision but direct order and My words are always pregnant with meaning and never hollow." Megha said - "I thought you woke me up, but all the doors were closed, so I thought it was a vision". Baba rejoined - "I require no door to enter. I have no form nor any extension; I always live everywhere. I carry on, as a wirepuller, all the actions of the man who trusts Me and merges in Me."
Megha returned to the Wada, and drew a red Trident on the wall near Baba's picture. Next day a Ramadasi Bhakta came from Poona, saluted Baba and offered Him Pindi (an image of Shiva). At this time Megha also turned up there. Baba said to him - "See, Shankar has come, protect (i.e., worship) Him now." Megha was surprised to see Pindi following Trident immediately. Then also in the Wada, Kakasaheb Dixit was standing with a towel on his head after having taken his bath, and was remembering Sai, when he saw a Pindi before his mental vision. While he was wondering about this, Megha came and showed him the Pindi presented to him by Baba. Dixit was happy to know that the Pindi exactly tallied with the One he saw a few minutes before in his vision. In a few days after the drawing of the Trident was complete, Baba installed the Pindi near the big picture which Megha was worshipping. The worship of Shiva was dear to Megha and by arranging the drawing of the Trident and the installation of the Pindi, Baba confirmed his faith therein.
After continuous service of Baba for many years, doing regular worship and Arati every and evening, Megha passed away in 1912. Then Baba passed His hands over his corpse and said - "This was a true devotee of Mine." Baba also ordered that at His own expense the usual funeral dinner should be given to the Brahmins, and this order was carried out by Kakasaheb Dixit.


Bow to Shri Sai - Peace be to all

Wednesday, 19 October 2011

"सबका मालिक एक है"

ॐ सांई राम
 
 

 रंग अलग है रूप
अलग है ,भाव सब में एक है
घाट अलग है ,लहरे अलग है,
जल तो सब में एक है ||
 
काले गोरे पीले तन में,
खून का रंग तो एक है ,
प्रेम की भाषा अलग अलग है,
प्रेम तो सब में एक है ||
 
 
पेड,पोधे अलग अलग है,
तत्व तो सब में एक है
मताए सबकी अलग अलग है,
ममता तो सब एक है ||
 
 
गाव, शहर, देश सबके अलग अलग है,
पर घरती तो एक है ,
गाय अलग अलग रंगों की है,
दूध का रंग तो एक है ||
 
 
खाना सबका अलग अलग है,
पर भूख सबकी एक है,
वेशभूषा सबकी अलग अलग है,
जीवन सबका एक है ||
 
 
सोच सबकी अलग अलग है,
पर ज्ञान सबमे एक है ,
सब करते साईं का शुकराना,
अलग अलग तरीके से,
जिसने हमें ये समझाया की
"सबका मालिक एक है"
!! शुभ प्रभात !!

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BEST WISHES FOR AHOI ASHTAMI VRAT TODAY

ॐ सांई राम
From: AMIT GUPTA <aga@holtecnet.com>
Date: 19 October 2011 08:44
Subject: BEST WISHES FOR AHOI ASHTAMI VRAT TODAY

On 19 October, Wednesday 2011, the fast of Ahoi Ashtami is observed. This fast is also known with the name of Ahoi Aathe. This Vrat is observed on Ashtami Tithi(eighth day) of Kartik Masa by the women having child. Fast of Ahoi Ashtami is specially for aspire for child's long life.

One thing is to be payed attention, regarding this Vrat. It is observed on the day on which Diwali is falling. Like, in the year 2011, Ahoi Ashtami will not be celebrated on Ashtami, rather it will be celebrated on Saptami Tithi. Because in 2011, Diwali is on Wednesday, hence, the Vrat will be observed on Saptami Tithi this year.

Method of Ahoi Ashtami Fast

This fast is observed to keep up the good luck of the child. Hence, only mothers have this fast. As per a belief, this day is considered as the beginning of Diwali. The mothers' observing this fast, wake up early in the morning a keep water in a utensil made of mud(Kora Karawa). They worship Goddess Ahoi. They fast for the whole day and don't eat anything. In the evening Goddess Ahoi is offered fruits and worshiped again.

And, Ahoi is worshiped in the evening when stars come out in the sky. Stars are offered the pure water stored in Karawa. And, Ahoi is made on wall with wheatish color. Which is worshiped in the evening. Some thing sweet is prepared and offered to the Goddess, then water is drunk from the hands of child, ending the fast. A detailed method of this Vrat is as follows.

Detailed Procedure of Ahoi Ashtami Vrat

Mother's observing this fast should wake up early in the, take bath and do worshiping with a wish of her child's longevity and enriched life. And, they pray to Goddess Ahoi that- "O mother Ahoi, I am keeping this fast for my child's growth, good luck and long life, so, please give me energy to complete this fast". And, saying this, they should take the resolution for this fast. As per a belief, observing this fast increases the longevity of child and bestow him with good health and happiness. Additionally, Goddess Parvati is a worshiped. Because she also the protector of child.

Women observing the fast should avoid getting angry on this day. And, bring bad thoughts to mind, on the day of fasting reduced the goodness of Vrat. Also, on the day of fast, women should not sleep in the day time. To worship Goddess Ahoi, her picture should be made with wheatish color. This picture displays, Goddess, lion and the seven sons. In the evening time, these images or pictures are worshiped.

After worshiping, the story of Goddess Ahoi is heard. Then, blessing are taken by touching feet of father and mother-in-law as well as other elders of the family. The fast is ended when stars come out in the sky. The Aarti is performed for stars. After which, the fast is closed by drinking water from the hands of child.

Ahoi Ashtami Fast Story

As per the story of Ahoi Ashtami, there lived a moneylender in some city. He had seven sons. Only seven days were left for Diwali's arrival, so cleaning work was going own in the house. For this, his wife went near river to bring some mud for painting the house. The place she was digging to get mud, had a den of cub, nearby. One of the cub, was killed by the spade of lady.

Seeing this, wife of moneylender got upset. Mournfully she went back home. By the curse of cub, moneylender's elder son died. Then his second son died, followed by the third one. Within a year's time all his children were dead.

The lady started living depressed because, all her sons were dead. One day, while crying she narrated her story to the nearby living ladies, that she did not do the sin knowingly. Accidentally, cub child got killed by her. After which, all my seven sons died. Listening this, an old lady in her neighbourhood consoled her. And told her, "the repentance you have done has cleaned half of your sin.

On the day of Ahoi Ashtami, you should take the shelter of Goddess Bhagwati and draw the face of cub and her children. Worship them and ask for apologies, this will be fruitful for you. By the God's grace your sin will be washed off." Wife of moneylender, followed the words of that old lady, and kept fast on Ashtami Tith of Krishna Paksh of Kartik Mas. Then, she worshiped Goddess Ahoi and followed this procedure every year. With time she conceived seven sons. From that time, the tradition of Ahoi fast began.

Aarti of Goddess Ahoi

जय अहोई माता, जय अहोई माता!

तुमको निसदिन ध्यावत हर विष्णु विधाता। टेक।।

ब्राहमणी, रुद्राणी, कमला तू ही है जगमाता।

सूर्य-चंद्रमा ध्यावत नारद ऋषि गाता।। जय।।

माता रूप निरंजन सुख-सम्पत्ति दाता।।

जो कोई तुमको ध्यावत नित मंगल पाता।। जय।।

तू ही पाताल बसंती, तू ही है शुभदाता।

कर्म-प्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता।। जय।।

जिस घर थारो वासा वाहि में गुण आता।।

कर न सके सोई कर ले मन नहीं धड़काता।। जय।।

तुम बिन सुख न होवे न कोई पुत्र पाता।

खान-पान का वैभव तुम बिन नहीं आता।। जय।।

शुभ गुण सुंदर युक्ता क्षीर निधि जाता।

रतन चतुर्दश तोकू कोई नहीं पाता।। जय।।

श्री अहोई माँ की आरती जो कोई गाता। उर उमंग अति उपजे पाप उतर जाता।। जय।।

Udyapan(Conclusion) of Ahoi Ashtami Vrat

The lady who does not have a son or her son is not getting married should necessarily do Udyapan of this fast. For this, in a plate, four Puri with Halwa are kept at seven places. Additionally, yellow colored sari, blouse and money is offered to the mother-in-law. Her mother-in-law should keep the outfit with her and distributed the eatables that is Halwa, Puri among the neighbours. Or, send it to the house of some other girl.

 
 

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Tuesday, 18 October 2011

साईं राम जी हर प्राणी में वास करते है ...

ॐ सांई राम
 

एक गांव मे एक मंदिर मे एक पुजारी था और बो बड़े नियम से भगवान की पूजा करता था और उसको या गांव वालो को कोई भी परेशानी होती थी तो बो कहता था धैर्य रखो भगवान सब ठीक कर देगा और सचमुच परेशानिया ठीक हो जाती थी .......एक बार गांव मे बहुत जोर की बाढ़ आ गयी और सब डूबने लगा तो लोग पुजारी के पास गए तो उसने कहा की धैर्य रखो सब ठीक हो जायेगा मैं भगवान की इतनी पूजा करता हूँ सब ठीक हो जायेगा ,लेकिन पानी बढ़ने लगा और गांव वाले भागने लगे और पुजारी से बोले की अब तो पानी मंदिर मे भी आने लगा हें आप भी निकल चलो यहाँ से लेकिन पुजारी ने फिर बही कहा की मैं इतनी पूजा करता हूँ तो मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा तुम लोग जाओ मैं नहीं जाऊँगा.....फिर कुछ दिनों मे पानी और बढ़ा और मंदिर मे घुस गया तो पुजारी मंदिर पर चढ गया ...फिर उधर से एक नाव आई और उसमे कुछ बुजुर्ग लोगो ने पुजारी से कहा की सब लोग भाग गए हें और यह आखिरी नाव हें आप भी आ जाओ इसमें क्योकि पानी और बढ़ेगा ऐसा सरकार का कहना हें नहीं तो आप डूब जाओगे तो पुजारी ने फिर कहा की मेरा कुछ नहीं होगा क्योकि मैने इतनी पूजा करी हें जिंदगी भर तो भगवान मेरी मदद करेगे और फिर बो नाव भी चली गयी ......कुछ दिनों मे और पानी और बढ़ा तो पुजारी मंदिर मे सबसे ऊपर लटक गया और पानी जब उसकी नाक तक आ गया तो बो त्रिशूल पर लटक गया और भगवान की प्रार्थना करने लगा की भगवान बचाओ मैने आपकी बहुत पूजा की हें तो कुछ देर मे एक सेना का हेलिकॉप्टर आ गया और उसमे से सैनिको ने लटक कर हाथ बढ़ाया और कहा की हाथ पकड़ लो किन्तु फिर बो पुजारी उनसे बोला की मैने जिंदगी भर भगवान की पूजा करी हें मेरा कुछ नहीं होगा और उसने किसी तरह हाथ नहीं पकड़ा और परेशान होकर सैनिक चले गए ...फिर थोड़ी देर मे पानी और बढ़ा और उसकी नाक मे घुस गया और पुजारी मर गया.......


मरने के बाद पुजारी स्वर्ग मे गया और जैसे ही उसे भगवान जी दिखे तो बो चिल्लाने लगा की जिंदगी भर मैने इतनी इमानदारी से आप लोगो की पूजा करी फिर भी आप लोगो ने मेरी मदद नहीं की ...तो भगवान जी बोले की अरे पुजारी जी जब पहली बार जो लोग आप से चलने को कह रहे थे तो बो कौन था अरे बो मैं ही तो था ...फिर नाव मे जो बुजुर्ग आप से चलने को कह रहे थे बो कौन था बो मैं ही तो था और फिर बाद मे हेलिकॉप्टर मे जो सैनिक आप को हाथ दे कर कह रहा था बो कौन था बो मैं ही तो था किन्तु आप मुंझे उस रूप मे पहचान ही नहीं पाए तो मैं क्या करू ..... अरे मैं जब किसी मनुष्य की मदद करूँगा तो मनुष्य के रूप मे ही तो करूँगा चाहे बो रूप डॉक्टर का हो या गुरु का हो या किसी अच्छे इंसान का या माँ , बाप भाई या बहन का या दोस्त का लेकिन उस रूप मे आप लोग मुंझे पहचान ही नहीं पाते हो तो मैं क्या करू ..... मेरी बाणी को पहचानने के लिए ध्यान बहुत जरूरी हें और योग भी तभी इंसान मेरी बाणी को इंसान मे भी पहचान जायेगा क्योकि सच्चे आदमियो मे मेरी ही बाणी होती हें

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