शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

************************************

निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

************************************

Saturday, 25 June 2011

सांई से रिश्ता ..... Om Sai Ram

ॐ सांई राम




जबसे बढ़ा सांई से रिश्ता
दुनियां छूटी जाय
हम आऐ सांई के द्वारे
धरती कहीं भी जाय

चहूं ओर तूफ़ान के धारे,
मैली हवा वीरान किनारे
जीवन नैया सांई सहारे
फिर भी चलती जाय
जबसे बढ़ा सांई से रिश्ता
दुनिया छूटी जाय

नाम सिमर ले जब तक दम है,
बोझ ज़ियादा वक्त भी कम है
याद रहे दो दिन की उमरिया
पल पल घटती जाय
जबसे बढ़ा………………





मेरे बाबा सुन लो, मन की पुकार को।
शरण अपनी ले लो, ठुकरा दूँगा संसार को।

 
ठुकराया है दुनिया ने, देकर खूब भरोसा
अब न खाने वाला, इस दुनिया से धोखा
 
करो कृपा न भूलूँ मैं, तेरे इस उपकार को।
शरण अपनी ले लो, ठुकरा दूँगा संसार को।

जीवन बन गया बाबा, सचमुच एक पहेली
जाने कब सुलझेगी, मेरे जीवन की पहेली
राह दिखाना भोले, अपने भक्त लाचार को।
शरण अपनी ले लो, ठुकरा दूँगा संसार को।

तेरे सिवा न कोई है, जिसको कहूँ मैं अपना
लगता होगा पूरा न , जो भी देखा है सपना
तुम्ही जानो कैसे, मिलेगा चैन बेकरार को।
शरण अपनी ले लो, ठुकरा दूँगा संसार को।


For Daily SAI SANDESH http://groups.google.com/group/shirdikesaibaba/boxsubscribe?p=FixAddr&email
Current email address :
shirdikesaibaba@googlegroups.com

Visit us at :
 
 For Daily Sai Sandesh Through SMS:
Type ON SHIRDIKESAIBABAGROUP
In your create message box
and send it to
+919870807070

Please Note : For Donations

Our bank Details are as follows :

A/c-Title -Shirdi Ke Sai Baba Group
A/c.No-0036DD1582050
IFSC -INDB0000036
IndusInd Bank Ltd,
N-10/11,Sec-18,
Noida-201301. 
 
For more details Contact : Anand Sai  (Mobile)+919810617373
or mail us
Click at our Group address :

Friday, 24 June 2011

शिरडी वाले सांई बाबा दुनिया भूल गया मैं...!!

 ॐ सांई राम

 

अंधेरी ज़िन्दगी में एक सवेरा दे दो,
धरती आसमां के बीच बसेरा दे दो,
जीवन के तूफान में एक किनारा दे दो,
साईं नाथ अपने चरणों में आसरा दे दो,
अपनी रहमत का नज़ारा दे दो ||


शिरडी वाले सांई बाबा तू ही है एक हमारा,
जो भी तेरे दर पर आता मिलता उसे सहारा,
तुझसे लगन लगाके जोत जलाके,
भूल गया भूल गया मैं तो भूल गया,
ओ सांई बाबा सारी दुनिया भूल गया ||

सुबह शाम शिरडी वाले में फेरु तेरी माला,
तुझमें मन्दिर तुझमें मस्जिद तुझमें ही गुरुद्वारा,
तू है सारे जग का मालिक तू सारे जग का रखवाला,
तेरी भक्ति में सांई जी भूल गया भूल गया,
ओ सांई बाबा सारी दुनिया भूल गया ||

अंधियारे को दूर करे पानी से दीप जलाये,
तेरे दर पे जो आये उसे सच्ची राह दिखाये,
उसको सब कुछ भी मिल जाये जो तुझमें खो जाये,
शिरडी वाले सांई बाबा दुनिया भूल गया मैं,
ओ मैं तो भूल गया भूल गया,
ओ सांई बाबा सारी दुनिया भूल गया..... ||
 

For Daily SAI SANDESH Click at our Group address : http://groups.google.com/group/shirdikesaibaba/boxsubscribe?p=FixAddr&email
Current email address :
shirdikesaibaba@googlegroups.com

Visit us at :
http://shirdikesaibabaji.blogspot.com
 
 For Daily Sai Sandesh Through SMS:
Type ON SHIRDIKESAIBABAGROUP
In your create message box
and send it to
+919870807070

Please Note : For Donations

Our bank Details are as follows :

A/c-Title -Shirdi Ke Sai Baba Group
A/c.No-0036DD1582050
IFSC -INDB0000036
IndusInd Bank Ltd,
N-10/11,Sec-18,
Noida-201301. 
 
For more details Contact : Anand Sai  (Mobile)+919810617373
or mail us

Thursday, 23 June 2011

सांई प्रेम से भोग लगावें, जूठन मोहे मिल जावे..

ॐ सांई राम
घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय

घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ

जहां बनाऊँ कुटी मैं सांई
वहीं धाम तेरा बन जाए

तेरे चरण की धूल उठाऊँ
फिर दीवारो पे लेप लगाऊ

सांई जी दया करके
दरवाज़े पर श्रद्धा सबूरी लिखना

घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय
उस घर के अन्दर सांई
तेरा इक मन्दिर होवे

मन्दिर अन्दर मेरे सांई
तेरी सुन्दर मूरत होवे

मन भावों का हार बनाऊँ
तब इच्छा पूरी होवे

साँझ सवेरे उन भावों का
तुमको हार पहनाऊँ
घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय

भक्तिभाव से भरा हुआ
उस घर में परिवार होवे
श्यामा-तात्या हों संग में
और भगत म्हालसापति होवे
भक्तमंडली वहां विराजे
और लक्ष्मी बाई होवे
चारों पहर की होय आरती
नित-नित दर्शन होवे
घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय

गुरूवार के रोज़ वहां
सांई तेरा भंडारा होवे
हलुआ पूरी और खिचड़ी
भोग वहां लगता होवे
सांई के हाथों हांडी में
कुछ भोजन पकता होवे
सांई प्रेम से भोग लगावें
जूठन मोहे मिल जावे
घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय

चैत मास में नवमी के दिन
उर्स भरे मेला होवे
यशुदा नन्दन पालने झूलें
राम जन्म  सुन्दर होवे
सांई नाथ कि चले पालकी
मैं भी नाचूँ गाऊँ

घर मेरा ऐसा बनाना सांई नाथ
जिसमें सारी उमर कट जाय ||






For Daily SAI SANDESH Click at our Group address : http://groups.google.com/group/shirdikesaibaba/boxsubscribe?p=FixAddr&email
Current email address :
shirdikesaibaba@googlegroups.com

Visit us at :
 
 For Daily Sai Sandesh Through SMS:
Type ON SHIRDIKESAIBABAGROUP
In your create message box
and send it to
+919870807070

Please Note : For Donations

Our bank Details are as follows :

A/c-Title -Shirdi Ke Sai Baba Group
A/c.No-0036DD1582050
IFSC -INDB0000036
IndusInd Bank Ltd,
N-10/11,Sec-18,
Noida-201301. 
 
For more details Contact : Anand Sai  (Mobile)+919810617373
or mail us
 
 

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 9


ॐ सांई राम
आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं

हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है

हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा

किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है
श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 9
---------------------------------
विदा होते समय बाबा की आज्ञा का पालन और अवज्ञा करने के परिणामों के कुछ उदाहरण, भिक्षा वृत्ति और उसकी आवश्यकता, भक्तों (तर्खड कुटुम्व) के अनुभव
--------------------------------
गत अध्याय के अन्त में केवल इतना ही संकेत किया गया था कि लौटते समय जिन्होंने बाबा के आदेशों का पालन किया, वे सकुशल घर लौटे और जिन्होंने अवज्ञा की, उन्हें दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ा । इस अध्याय में यह कथन अन्य कई पुष्टिकारक घटनाओं और अन्य विषयों के सात विस्तारपूर्वक समझाया जायेगा ।

शिरडी यात्रा की विशेषता
--------------------------
शिरडी यात्रा की एक विशेषता यह थी कि बाबा की आज्ञा के बिना कोई भी शिरडी से प्रस्थान नहीं कर सकता था और यदि किसी ने किया भी, तो मानो उसने अनेक कष्टों को निमन्त्रण दे दिया । परन्तु यदि किसी को शिरडी छोड़ने की आज्ञा हुई तो फिर वहाँ उसका ठहरना नहीं हो सकता था । जब भक्तगण लौटने के समय बाबा को प्रणाम करने जाते तो बाबा उन्हें कुछ आदेश दिया करते थे, जिनका पालन अति आवश्यक था । यदि इन आदेशों की अवज्ञा कर कोई लौट गया तो निश्चय ही उसे किसी न किसी दुर्घटना का सामना करना पड़ता था । ऐसे कुछ उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं ।

तात्या कोते पाटील
----------------------
एक समय तात्या कोते पाटील गाँगे में बैठकर कोपरगाँव के बाजार को जा रहे थे । वे शीघ्रता से मसजिद में आये । बाबा को नमन किया और कहा कि मैं कोपरगाँव के बाजार को जा रहा हूँ । बाबा ने कहा, शीघ्रता न करो, थोड़ा ठहरो । बाजार जाने का विचार छोड़ दो और गाँव के बाहर न जाओ । उनकी उतावली को देखकर बाबा ने कहा अच्छा, कम से कम शामा को साथ लेते जाओ । बाबा की आज्ञा की अवहेलना करके उन्होंने तुरन्त ताँगा आगे बढ़ाया । ताँगे के दो घोड़ो में से एक घोड़ा, जिसका मूल्य लगभग तीन सौ रुपया था, अति चंचल और द्रुतगामी था । रास्ते में सावली विहीर ग्राम पार करने के पश्चात ही वह अधिक वेग से दौड़ने लगा । अकस्मात ही उसकी कमी में मोच आ गई । वह वहीं गिर पड़ा । यघरि तात्या को अधिक चोट तो न आई, परन्तु उन्हें अपनी साई माँ के आदेशों की स्मृति अवश्य हो आई । एक अन्य अवसर पर कोल्हार ग्राम को जाते हुए भी उन्होंने बाबा के आदेशों की अवज्ञा की थी और ऊपर वर्णित घटना के समान ही दुर्घटना का उन्हें सामना करना पड़ता था ।

एक यूरोपियन महाशय
-------------------------
एक समय बम्बई के एक यूरोपियन महाशय, नानासाहेब चांदोरकर से परिचय-पत्र प्राप्त कर किसी विशेष कार्य से शिरडी आये । उन्हें एक आलीशान तम्बू में ठहराया गया । वे तो बाबा के समक्ष नत होकर करकमलों का चुम्बन करना चाहते थे । इसी कारण उन्होंने तीन बार मसजिद की सीढ़ियों पर चढ़ने का प्रयत्न किया, परन्तु बाबा ने उन्हें अपने समीप आने से रोक दिया । उन्हें आँगन में ही ठहरने और वहीं से दर्शन करने की आज्ञा मिली । इस विचित्र स्वागत से अप्रसन्न होकर उन्होंने शीघ्र ही शिरडी से प्रस्थान करने का विचार किया और बिदा लेने के हेतु वे वहाँ आये । बाबा ने उन्हें दूसरे दिन जाने और शीघ्रता न करने की राय दी । अन्य भक्तों ने भी उनसे बाबा के आदेश का पालन करने की प्रार्थना की । परन्तु वे सब की उपेक्षा कर ताँगे में बैठकर रवाना हो गये । कुछ दूर तक तो घोड़े ठीक-ठीक चलते रहे । परन्तु सावली विहीर नामक गाँव पार करने पर एक बाइसिकिल सामने से आई, जिसे देखकर घोड़े भयभीत हो गये और द्रुत गति से दौड़ने लगे । फलस्वरुप ताँगा उलट गया और महाशय जी नीचे लुढ़क गये और कुछ दूर तक ताँगे के साथ-साथ घिसटते चले गये । लोगों ने तुरन्त अस्पताल में शरण लेनी पड़ी । इस घटना से भक्तों ने शिक्षा ग्रहण की कि जो बाबा के आदेशों की अवहेलना करते हैं, उन्हें किसी न किसी प्रकार की दुर्घटना का शिकार होना ही पड़ता है और जो आज्ञा का पालन करते है, वे सकुशल और सुखपूर्वक घर पहुँच जाते हैं ।

भिक्षावृत्ति की आवश्यकता
----------------------------
अब हम भिक्षावृत्ति के प्रश्न पर विचार करेंगें । संभव है, कुछ लोगों के मन में सन्देह उत्पन्न हो कि जब बाबा इतने श्रेष्ठ पुरुष थे तो फिर उन्होंने आजीवन भिक्षावृत्ति पर ही क्यों निर्वाह किया ।
इस प्रश्न को दो दृष्टिकोण समक्ष रख कर हल किया जा सकता हैं ।

पहला दृष्टिकोण – भिक्षावृत्ति पर निर्वाह करने का कौन अधिकारी है ।
------------------
शास्त्रानुसार वे व्यक्ति, जिन्होंने तीन मुख्य आसक्तियों –
1. कामिनी
2. कांचन और
3. कीर्ति का त्याग कर, आसक्ति-मुक्त हो सन्यास ग्रहण कर लिया हो
– वे ही भिक्षावृत्ति के उपयुक्त अधिकारी है, क्योंकि वे अपने गृह में भोजन तैयार कराने का प्रबन्ध नहीं कर सकते । अतः उन्हें भोजन कराने का भार गृहस्थों पर ही है । श्री साईबाबा न तो गृहस्थ थे और न वानप्रस्थी । वे तो बालब्रहृमचारी थे । उनकी यह दृढ़ भावना थी कि विश्व ही मेरा गृह है । वे तो स्वया ही भगवान् वासुदेव, विश्वपालनकर्ता तथा परब्रहमा थे । अतः वे भिक्षा-उपार्जन के पूर्ण अधिकारी थे ।

दूसरा दृष्टिकोण
-----------------
पंचसूना – (पाँच पाप और उनका प्रायश्चित) – सब को यह ज्ञात है कि भोजन सामग्री या रसोई बनाने के लिये गृहस्थाश्रमियों को पाँच प्रकार की क्रयाएँ करनी पड़ती है –

1. कंडणी (पीसना)
2. पेषणी (दलना)
3. उदकुंभी (बर्तन मलना)
4. मार्जनी (माँजना और धोना)
5. चूली (चूल्हा सुलगाना)

इन क्रियाओं के परिणामस्वरुप अनेक कीटाणुओं और जीवों का नाश होता है और इस प्रकार गृहस्थाश्रमियों को पाप लगता है । इन पापों के प्रायश्चित स्वरुप शास्त्रों ने पाँच प्रकार के याग (यज्ञ) करने की आज्ञा दी है, अर्थात्

1. ब्रहमयज्ञ अर्थात् वेदाध्ययन - ब्रहम को अर्पण करना या वेद का अछ्ययन करना
2. पितृयज्ञ – पूर्वजों को दान ।
3. देवयज्ञ – देवताओं को बलि ।
4. भूतयज्ञ – प्राणियों को दान ।
5. मनुष्य (अतिथि) यज्ञ – मनुष्यों (अतिथियों) को दान ।

यदि ये कर्म विधिपूर्वक शास्त्रानुसार किये जायें तो चित्त शुदृ होकर ज्ञान और आत्मानुभूति की प्राप्ति सुलभ हो जाती हैं । बाबा दृार-दृार जाकर गृहस्थाश्रमियों को इस पवित्र कर्तव्य की स्मृति दिलाते रहते थे और वे लोग अत्यन्त भाग्यशाली थे, जिन्हें घर बैठे ही बाबा से शिक्षा ग्रहण करने का अवसर मिल जाता था ।

भक्तों के अनुभव -
-----------------
अब हम अन्य मनोरंजक विषयों का वर्णन करते हैं । भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है – जो मुझे भक्तिपूर्वक केवल एक पत्र, फूल, फल या जल भी अर्पण करता है तो मैं उस शुदृ अन्तःकरण वाले भक्त के दृारा अर्पित की गई वस्तु को सहर्ष स्वीकार कर लेता हूँ ।

यदि भक्त सचमुच में श्री साईबाबा की कुछ भेंट देना चाहता था और बाद में यदि उसे अर्पण करने की विस्मृति भी हो गई तो बाबा उसे या उसके मित्र दृारा उस भेंट की स्मृति कराते और भेंट देने के लिये कहते तथा भेंट प्राप्त कर उसे आशीष देते थे । नीचे कुछ ऐसी कुछ ऐसी घटनाओं का वर्णन किया जाता हैं ।

तर्खड कुटुम्ब (पिता और पुत्र)
-------------------------------
श्री रामचन्द्र आत्माराम उपनाम बाबासाहेब तर्खड पहले प्रार्थनासमाजी थे । तथारि वे बाबा के परमभक्त थे । उनकी स्त्री और पुत्र तो बाबा के एकनिष्ठ भक्त थे । एक बार उन्होंने ऐसा निश्चय किया कि पुत्र व उसकी माँ ग्रीष्मकालीन छुट्टियाँ शिरडी में ही व्यतीत करें । परन्तु पुत्र बाँद्रा छोड़ने को सहमत न हुआ । उसे भय था कि बाबा का पूजन घर में विधिपूर्वक न हो सकेगा, क्योंकि पिताजी प्रार्थना-समाजी है और संभव है कि वे श्री साईबाबा के पूजनादि का उचित ध्यान न रख सके । परन्तु पिता के आश्वासन देने पर कि पूजन यथाविधि ही होता रहेगा, माँ और पुत्र ने एक शुक्रवार की रात्रि में शिरडी को प्रस्थान कर दिया ।

दूसरे दिन शनिवार को श्रीमान् तर्खड ब्रहमा मुहूर्त में उठे और स्नानादि कर, पूजन प्रारम्भ करने के पूर्व, बाबा के समक्ष साष्टांग दण्डवत् करके बोले- हे बाबा मैं ठीक वैसा ही आपका पूजन करता रहूँगा, जैसे कि मेरा पुत्र करता रहा है, परन्तु कृपा कर इसे शारीरिक परिश्रम तक ही सीमित न रखना । ऐसा कहकर उन्होंने पूजन आरम्भ किया और मिश्री का नैवेघ अर्पित किया, जो दोपहर के भोजन के समय प्रसाद के रुप में वितरित कर दिया गया ।

उस दिन की सन्ध्या तथा अगला दिन इतवार भी निर्विघ्र व्यतीत हो गया । सोमवार को उन्हें आँफिस जाना था, परन्तु वह दिन भी निर्विघ्र निकल गया । श्री तर्खड ने इस प्रकार अपने जीवन में कभी पूजा न की थी । उनके हृदय में अति सन्तोष हुआ कि पुत्र को दिये गये वचनानुसार पूजा यथाक्रम संतोषपूर्वक चल रही है । अगले दिन मंगलवार को सदैव की भाँति उन्होंने पूजा की और आँफिस को चले गये । दोपहर को घर लौटने पर जब वे भोजन को बैठे तो थाली में प्रसाद न देखकर उन्होंने अपने रसोइये से इस सम्बन्ध में प्रश्न किया । उसने बतलाया कि आज विस्मृतिवश वे नैवेघ अर्पण करना भूल गये है । यह सुनकर वे तुरन्त अपने आसन से उठे और बाबा को दण्वत् कर क्षमा याचना करने लगे तथा बाबा से उचित पथ-प्रदर्शन न करने तथा पूजन को केवल शारीरिक परिश्रम तक ही सीमित रखने के लिये उलाहना देने लगे । उन्होंने संपूर्ण घटना का विवरण अपने पुत्र को पत्र दृारा कुचित किया और उससे प्रार्थना की कि वह पत्र बाबा के श्री चरणों पर रखकर उनसे कहना कि वे इस अपराध के लिये क्षमाप्रार्थी है । यह घटना बांद्रा में लगभग दोपहर को हुई थी और उसी समय शिरडी में जब दोपहर की घटना बाँद्रा में लगभग दोपहर को हुई थी और उसी समय शिरडी में जब दोपहर की आरती प्रारम्भ होने ही वाली थी कि बाबा ने श्रीमती तर्खड से कहा – माँ, मैं कुछ भोजन पाने के विचार से तुम्हारे घर बाँद्रा गया था, दृार में ताला लगा देखकर भी मैंने किसी प्रकार गृह में प्रवेश किया । परन्तु वहाँ देखा कि भाऊ (श्री. तर्खड) मेरे लिये कुछ भी खाने को नहीं रख गये है । अतः आज मैं भूखा ही लौट आया हूँ । किसी को भी बाबा के वचनों का अभिप्राय समझ में नहीं आया, परन्तु उनका पुत्र जो समीप ही खड़ा था, सब कुछ समझ गया कि बाँद्रा में पूजन में कुछ तो भी त्रुटि हो गई है, इसलिये वह बाबा से लौटने की अनुमति माँगने लगा । परन्तु बाबा ने आज्ञा न दी और वहीं पूजन करने का आदेश दिया । उनके पुत्र ने शिरडी में जो कुछ हुआ, उसे पत्र में लिख कर पिता को भेजा और भविष्य में पूजन में सावधानी बर्तने के लिये विनती की । दोनों पत्र डाक दृारा दूसरे दिन दोनों पश्रों को मिले । किया यह घटना आश्चर्यपूर्ण नहीं है ।

श्रीमती तर्खड
-----------------
एक समय श्रीमती तर्खड ने तीन वस्तुएँ अर्थात्
1. भरित (भुर्ता यानी मसाला मिश्रित भुना हुआ बैगन और दही)
2. काचर्या (बैगन के गोल टुकड़े घी में तले हुए) और
3. पेड़ा (मिठाई) बाबा के लिये भेजी ।

बाबा ने उन्हे किस प्रकार स्वीकार किया, इसे अब देखेंगे ।

बाँद्रा के श्री रघुवीर भास्कर पुरंदरे बाबा के परम भक्त थे । एक समय वे शिरडी को जा रहे थे । श्रीमती तर्खड ने श्रीमती पुरंदरे को दो बैगन दिये और उनसे प्रार्थना की कि शिरडी पहुँचने पर वे एक बैगन का भुर्ता और दूसरे का काचर्या बनाकर बाबा को भेंट कर दें । शिरडी पहुँचने पर श्रीमती पुरंदरे भुर्ता लेकर मसजिद को गई । बाबा उसी समय भोजन को बैठे ही थे । बाबा को वह भुर्ता बड़ा स्वादिष्ट प्रतीत हुआ, इस कारण उन्होंने थोडा़-थोड़ा सभी को वितरित किया । इसके पश्चात ही बाबा ने काचर्या माँग रहे है । वे बड़े राधाकृष्णमाई के पास सन्देशा भेजा गया कि बाबा काचर्या माँग रहे है । वे बड़े असमंजस में पड़ गई कि अव क्या करना चाहिये । बैंगन की तो अभी ऋतु ही नीं है । अब समस्या उत्पन्न हुई कि बैगन किस प्रकार उपलब्ध हो । जब इस बात का पता लगाया गया कि भर्ता लाया कौन था । तब ज्ञात हुआ कि बैगन श्रीमती पुरंदरे लाई थी तथा उन्हें ही काचर्या बनाने का कार्य सौंपा गया था । अब प्रत्येक को बाबा की इस पूछताछ का अभिप्राय विदित हो गया और सब को बाबा की सर्वज्ञता पर महान् आश्चर्य हुआ ।

दिसम्बर, सन् 1915 में श्री गोविन्द बालाराम मानकर शिरडी जाकर वहाँ अपने पिता की अन्त्येष्चि-क्रिया करना चाहते थे । प्रस्थान करने से पूर्व वे श्रीमती तर्खड से मिलने आये । श्रीमती तर्खड बाबा के लिये कुछ भेंट शिरडी भेजना चाहती थी । उन्होंने घर छान डाला, परन्तु केवल एक पेड़े के अतिरिक्त कुछ न मिला और वह पेड़ा भी अर्पित नैवेघ का था । बालक गोविन्द ऐसी परिस्थिति देखकर रोने लगा । परन्तु फिर भी अति प्रेम के कारण वही पेड़ा बाबा के लिये भेज दिया । उन्हें पूर्ण विश्वास था कि बाबा उसे अवश्य स्वीकार कर लेंगे । शिरडी पहुँचने पर गोविन्द मानकर बाबा के दर्शनार्थ गये, परन्तु वहाँ पेड़ा ले जाना भूल गये । बाबा यह सब चुपचाप देखते रहे । परन्तु जब वह पुनः सन्ध्या समय बिना पेड़ा लिये हुए वहाँ पहुँचा तो फिर बाबा शान्त न रह सके और उन्होंने पूछा कि तुम मेरे लिये क्या लाये हो । उत्तर मिला – कुछ नहीं । बाबा ने पुनः प्रश्न किया और उसने वही उपयुर्क्त उत्तर फिर दुहरा दिया । अब बाबा ने स्पष्ट शब्दों में पूछा, क्या तुम्हें माँ (श्रीमती तर्खड) ने चलते समय कुछ मिठाई नहीं दी थी । अब उसे स्मृति हो आई और वह बहुत ही लज्जित हुआ तथा बाबा से क्षमा-याचना करने बाबा ने तुरन्त ही पेड़ा खा लिया । वह दौड़कर शीघ्र ही वापस गया और पेड़ा लाकर बाबा के सम्मुख रख दिया । बाबा ने तुरन्त ही पेड़ा खा लिया । इस प्रकार श्रीमती तर्खड की भेंट बाबा ने स्वीकार की और भक्त मुझ पर विश्वास करता है इसलिये मैं स्वीकार कर लेता हूँ । यह भगवदृचन सिदृ हुआ ।

बाबा का सन्तोषपूर्वक भोजन
-----------------------------------
एक समया श्रीमती तर्खड शिरडी आई हुई थी । दोपहर का भोजन प्रायः तैयार हो चुका था और थालियाँ परोसी ही जा रही थी कि उसी समय वहाँ एक भूखा कुत्ता आया और भोंकने लगा । श्रीमती तर्खड तुरन्त उठी और उन्होंने रोटी का एक टुकड़ा कुत्ते को डाल दिया । कुत्ता बड़ी रुचि के साथ उसे खा गया । सन्ध्या के समय जब वे मसजिद में जाकर बैठी तो बाबा ने उनसे कहा माँ आज तुमने बड़े प्रेम से मुझे खिलाया, मेरी भूखी आत्मा को बड़ी सान्त्वना मिली है । सदैव ऐसा ही करती रहो, तुम्हें कभी न कभी इसका उत्तम फल अवश्य प्राप्त होगा । इस मसजिद में बैठकर मैं कभी असत्य नहीं बोलूँगा । सदैव मुझ पर ऐसा ही अनुग्रह करती रहो । पहले भूखों को भोजन कराओ, बाद में तुम भोजन किया करो । इसे अच्छी तरह ध्यान में रखो । बाबा के शब्दों का अर्थ उनकी समझ में न आया, इसलिये उन्होंने प्रश्न किया, भला । मैं किस प्रकार भोजन करा सकती हूँ मैं तो स्वयं दूसरों पर निर्भर हूँ और उन्हें दाम देकर भोजन प्राप्त करती हूँ । बाबा कहने लगे, उस रोटी को ग्रहण कर मेरा हृदय तृप्त हो गया है और अभी तक मुझे डकारें आ रही है । भोजन करने से पूर्व तुमने जो कुत्ता देखा था और जिसे तुमने रोटी का टुकडा़ दिया था, वह यथार्थ में मेरा ही स्वरुप था और इसी प्रकार अन्य प्राणी (बिल्लियाँ, सुअर, मक्खियाँ, गाय आदि) भी मेरे ही स्वरुप हैं । मै ही उनके आकारों में ड़ोल रहा हूँ । जो इन सब प्राणियों में मेरा दर्शन करता है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है । इसलिये दैत या भेदभाव भूल कर तुम मेरी सेवा किया करो ।

इस अमृत तुल्य उपदेश को ग्रहण कर वे द्रवित हो गई और उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी, गला रुँध गया और उनके हर्ष का पारावार न रहा ।

शिक्षा
--------
समस्त प्राणियों में ईश्वर-दर्शन करो – यही इस अध्याय की शिक्षा है । उपनिषद्, गीता और भागवत का यही उपदेश है कि ईशावास्यमिदं सर्वम् – सब प्राणियों में ही ईश्वर का वास है, इसका प्रत्यक्ष अनुभव करो ।

अध्याय के अन्त में बतलाई घटना तथा अन्य अनेक घटनाये, जिनका लिखना अभी शेष है, स्वयं बाबा ने प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत कर दिखाया कि किस प्रकार उपनिषदों की शिक्षा को आचरण में लाना चाहिये ।

इसी प्रकार श्री साईबाबा शास्त्रग्रंथों की शिक्षा दिया करते थे ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Sai Satcharitra - Chapter 9

ॐ सांई राम

Chapter 9

Effect of compliance and Non-compliance with Baba's Orders at the Time of Taking Leave - A few Instances - Mendicancy and Its Necessity - Devotees' (Tarkhad family's) Experiences - Baba fed sumptuously - How?
At the end of the last chapter, it was barely stated that the Bhaktas, who obeyed Baba's orders at the time of taking leave, fared well and those, who disobeyed them, suffered many a mishap. This statement will be amplified and illustrated, with a few striking instances; and by other matters dealt with in this Chapter.
Characteristic of Shirdi - Pilgrimage
One special peculiarity of Shirdi-pilgrimage was this, that none could leave Shirdi, without Baba's permission; and if he did, he invited untold sufferings, but if any one was asked to quit Shirdi, he could stay there no longer. Baba gave certain suggestions or hints, when Bhaktas went to bid good-bye and take leave. These suggestions had to be followed. If they were not followed or were departed from, accidents were sure to befall them, who acted contrary to Baba's directions. We give below a few instances.
Tatya Kote Patil
Tatya Kote was once going in a tanga to Kopargaon bazar. He came in haste to the Masjid, saluted Baba, and said that he would go to Kopargtaon bazar. Baba said, "Don't make haste, stop a little, let go the bazar, don't go out of the village". On seeing has anxiety to go, Baba asked him to take Shama (Madhavrao Deshpande) at least with him. Not minding this direction, Tatya Kote immediately drove his tanga. Of the two horses one, which cost Rs.300/- was very active and restless. After passing Sawul well, it began to run rashly, got a sprain in its waist and fell down. Tatya was not much hurt, but was reminded of Mother Sai's direction. On another occasion while proceeding to Kolhar village, he disregarded Baba's direction, and drove in a tanga, which met with a similiar accident.
European Gentleman
One European gentleman of Bombay once came to Shirdi, with an introductory note from Nanasaheb Chandorkar, and with some object in view. He was comfortably accommodated in a tent. He wanted to kneel before Baba and kiss His hand. Therefore, he tried thrice to step into the Masjid, but Baba prevented him from doing so. He was asked to sit in the open court-yard below and take Baba's darshan from there. Not pleased with this reception he got, he wanted to leave Shirdi at once and came to bid good-bye. Baba asked him to go the next day and not to hurry. People also requested him to abide by Baba's direction. Not listening to all this, he left Shirdi in a tanga. The horses ran at first all right, but when Sawul well was passed, a bicycle came in front, seeing which the horses were frightened and ran fast. The tanga was turned topsy-turvy and the gentleman fell down and was dragged some distance. He was immediately released; but had to go and lie in Kopargaon hospital for the treatment of the injuries. Because of such experiences all people learnt the lesson, that those who disobeyed Baba's instruction met with accidents in one way or the other, and those who obeyed them were safe and happy.
The Necessity of Mendicancy
Now to return to the question of mendicancy. A question may arise in the minds of some that if Baba was such a great personage - God in fact, why should He have recourse to the begging bowl, all His lifetime? This question may be considered and replied from two standpoints. (1) Who are the fit persons, who have a right to live by the begging-bowl? Our Shastras say that those persons, who, getting rid of, or becoming free from the three main Desires, viz. (1) for progeny, (2) for wealth, (3) for fame, accept Sannyas, are the fit persons to live by begging alms. They cannot make cooking arrangements and dine at home. The duty of feeding them rests on the shoulders of house-holders. Sai Baba was neither a house-holder nor Vanaprastha. He was a celibate sannyasi, i.e., sannyasi from boyhood. His firm conviction was that the universe was His home, He was the Lord Vasudeo - the Supporter of the universe and the Imperishable Brahman. So He had the full right to have recourse to the begging-bowl. (2) Now from the standpoint of (1) Pancha-soon - five sins and their atonement. We all know that in order to prepare food-stuffs and meals, the householders have to go through five actions or processes, viz. (1) Kandani-Pounding, (2) Peshani-Grinding, (3) Udakumbhi - Washing pots, (4) Marjani - Sweeping and cleaning, (5) Chulli-Lighting hearths. These processes involve destruction of a lot of small insects and creatures, and thus the householders incur a lot of sin. In order to atone for this sin, our Shastras prescribe five kinds of sacrifices, viz. (1) Brahma-Yajna, (2) vedadhyayan - offerings to Brahman or the study of the Vedas. (3) Pitra-Yajna-offerings to the ancestors, 4)Deva-Yajna - offerings to the Gods, (5) Bhoota-Yajna-offerings to the beings, (6) Manushya-Atithi-Yajna-offerings to men or uninvited guests. If these sacrifices, enjoined by the Shastras are duly performed, the purification of their minds is effected and this helps them to get knowledge and self-realization. Baba, in going from house to house, reminded the inmates of their sacred duty, and fortunate were the people, who got the lesson at their homes from Baba.
Devotee's Experiences
Now to return to the other more interesting subject. Lord Krishna has said in the Bhagawadgeeta (9-26) "Whosoever devoutly offers to me a leaf, a flower, or a fruit or water, of that pure-hearted man, I accept that pious offering." In the case of Sai Baba, if a devotee really longed to offer anything to Sai Baba, and if he afterwards forgot to offer the same, Baba reminded him, or his friend about the offering, and made him present it to Him, and then accepted it and blessed the devotee. A few instances are given below.
Tarkhad Family (father and son)
Mr. Ramachandra Atmaran alias Babasaheb Tarkhad, formerly a Prarthana-Samajist, was a staunch devotee of Sai Baba. His wife and son loved Baba equally or perhaps more. It was once proposed that Master Tarkhad should go with his mother to Shirdi and spend his May vacation there, but the son was unwilling to go, as he thought that in case he left his home at Bandra, the worship of Sai Baba in the house would not be properly attended to, as his father being a Prarthana Samajist, would not care to worship Sai Baba's enlarged portrait. However, on his father's giving an assurance of oath, that he would perform the worship exactly as the son was doing, the mother and the son left for Shirdi on one Friday night.
Next day (Saturday) Mr. Tarkhad got up early, took his bath and before proceeding with the Puja, prostrated himself before the Shrine and said - "Baba, I am going to perform the Puja exactly as my son has been doing, but please let it not be a formal drill." After he performed the Puja, he offered a few pieces of lump-sugar as naivedya (offering), which were distributed at the time of the lunch.
That evening and on Sunday, everything went on well. The following Monday was a working day and it also passed well. Mr. Tarkhad, who had never performed Puja like this in all his life, felt great confidence within himself, that every thing was passing on quite satisfactorily according to the promise given to his son. On Tuesday, he performed the morning Puja as usual and left for his work. Coming home at , he found that there was no Prasad (sugar) to partake of, when the meal was served. He asked the servant - cook, who told him that there was no offering made that morning, and that he had completely forgotten then to perform that part of the Puja (offering naivedya). After hearing that he left his seat and prostrated himself before the Shrine, expressed his regret, at the same time chiding Baba for the want of guidance in making the whole affair a matter of mere drill. Then he wrote a letter to his son stating the facts and requested him to lay it before Baba's feet and ask His pardon for his neglect.
This happened in Bandra at Tuesday .
At about the same time, when the Arati was just about to commence in Shirdi, Baba said to Mrs. Tarkhad, "Mother, I had been to your house in Bandra, with a view to having something to eat. I found the door locked. I somehow got an entrance inside and found to My regret, that Bhau (Mr. Tarkhad) had left nothing for Me to eat. so I have returned from there without eating anything."
The lady could not understand anything; but the son, who was close by, understood that there was something wrong with the Puja in Bandra and he, therefore, requested Baba to permit him to go home. Baba refused the permission, but allowed him to perform Puja there. Then, the son wrote a letter to his father, stating all that took place at Shirdi and implored his father not to neglect the Puja at home.
Both these letters crossed each other and were delivered to the respective parties the next day.
Is this not astonishing?
Mrs. Tarkhad
Let us now take up the case of Mrs. Tarkhad herself. She offered three things, viz. (1) Bharit (roasted brinjal egg plant mixed curds and spice). (2) Kacharya (circular pieces of brinjal fried in ghee), (3) Peda (sweetmeat ball). Let us see how Baba accepted them.
Once Mr. Raghuvir Bhaskar Purandare of Bandra, a great devotee of Baba started for Shirdi with his family. Mrs Tarkhad went to Mrs. Purandare, and gave her two brinjals and requested her to prepare Bharit of one bringal and Kacharya of the other, when she went to Shirdi and serve Baba with them. After reaching Shirdi, Mrs. Purandare went with her dish of Bharit to the Masjid when Baba was just about to start his meals. Baba found the Bharit very tasty. So He distributed it to all and said that He wanted Kacharyas now. A word was sent to Radha Krishna-Mai, that Baba wanted Kacharyas. She was in a fix, as that was no season of brinjals. How to get brinjals was the question? When an enquiry was made as to who brought the Bharit, it was found that Mrs. Purandare was also entrusted with the duty of serving Kacharyas. Everybody then came to know the significance of Baba's enquiry regarding Kacharyas, and was wonderstruck at Baba's all-pervasive knowledge.
In December 1915 A.D., one Govind Balaram Mankar wanted to go to Shirdi to perfrom the obsequies of his father. Before he left, he came to see Mr. Tarkhad. Then Mrs. Tarkhad wanted to send something with him to Baba. She searched the whole house but found nothing, except a Peda, which had already been offered as naivedya. Mr. Mankar was in mourning. Still out of great devotion to Baba, she sent the Peda with him, hoping that Baba would accept and eat it. Govind went to Shirdi and saw Baba, but forgot to take the Peda with him. Baba simply waited. When again he went to Baba in the afternoon, he went empty-handed without the Peda. Baba could wait no longer and, therefore, asked him straight, "What did you bring for me?" "Nothing" was the reply. Baba asked him again. The same reply came forth again. Then Baba asked him the leading question, "Did not the mother (Mrs. Tarkhad) give some sweetmeat to you for Me at the time of your starting?" The boy then remembered the whole thing. He felt abashed, asked Baba's pardon, ran to his lodging, brought the Peda and gave it to Baba. As soon as Baba got it in His hand. He put it into His mouth and gulped it down. Thus the devotion of Mrs. Tarkhad was recognized and accepted. "As men believe in Me, so do I accept them" (Gita, 4-11) was proved in this case.
Baba Fed Sumptuously, -- How?
Once, Mrs. Tarkhad was staying in a certain house in Shirdi. At noon, meals were ready and dishes were being served, when a hungry dog turned up there and began to cry, Mrs. Tarkhad got up at once and threw a piece of bread, which the dog gulped with great relish. In the afternoon, when she went to the Masjid and sat at some distance, Sai Baba said to her, "Mother, you have fed Me sumptuously up to my throat, My afflicted pranas (life-forces) have been satisfied. always act like this, and this will stand you in good stead. Sitting in this Masjid I shall never, never speak untruth. Take pity on Me like this. First give bread to the hungry, and then eat yourself. Note this well." She could not at first understand the meaning of what Baba said. So she replied -- "Baba, how could I feed You? I am myself dependent on others and take my food from them on payment." Then Baba replied -- "Eating that lovely bread I am heartily contended and I am still belching. The dog which you saw before meals and to which you gave the piece of bread is, one with Me, so also other creatures (cats, pigs, flies, cows etc.) are one with Me. I am roaming in their forms. He, who sees Me in all these creatures is My beloved. So abandon the sense of duality and distinction, and serve Me, as you did today." Drinking these nectar-like words, she was moved, her eyes were filled with tears, her throat was choked and her joy knew no bounds.
Moral
"See God in all beings" is the moral of this chapter. The Upanishads, the Geeta and the Bhagwat, all exhort us to perceive God or Divinity in all the creatures. By the instance given at the end of this Chapter and others too numerous to mention. Sai Baba has practically demonstrated to us how to put the Upanishadic teachings into practice. In this way Sai Baba stands as the best Exponent or Teacher of the Upanishadic doctrines.
Bow to Shri Sai - Peace be to all

Wednesday, 22 June 2011

श्री साईं बाबा विभूति (उदी) मंत्र संस्कृत एवं अंग्रेजी अनुवाद

ॐ सांई राम
 
संस्कृत

परमम् पवित्रं बाबा  विभूतिम
परमम् विचित्रं लीला विभूतिम
परमार्थ ईष्टार्थ मोक्ष प्रधानम
बाबा विभूतिम इदम अस्रयामी

English Translation

Sacred Holy and Supreme is Baba's VibhuthiPouring Forth in brilliant stream, this play of Vibhuthi.So auspicious is its might, it grants liberationBaba's Vibhuthi, its power protects me

When we recite this mantra, we say “I take refuge in the supremely sacred vibhuti of the Lord, the wonderful vibhuti which bestows liberation, the sacred state which I desire to attain.”
Since this mantra is so powerful, we should recite it with respect and with sincerity in order that we gain the full benefit from it.

Vibhuti is a reminder that ash is the end product of all matter. Vibhuti has also an aspect of immortality, which makes it a fit offering for worshipping God. Only the Vibhuti remains unchanged, since it is the final result of the annihilation of the five elements of creation. It is symbolic of the ultimate reality that remains when our ego is burnt away by the fire of illumination.

"The Vibhuti that you smear on your forehead is intended to convey the basic spiritual lesson that everything will be reduced to ashes, including the brow that wears it".

  
 
For Daily SAI SANDESH
 
 For Daily Sai Sandesh Through SMS:
Type ON SHIRDIKESAIBABAGROUP
In your create message box
and send it to
+919870807070

Please Note : For Donations

Our bank Details are as follows :

A/c-Title -Shirdi Ke Sai Baba Group
A/c.No-0036DD1582050
IFSC -INDB0000036
IndusInd Bank Ltd,
N-10/11,Sec-18,
Noida-201301. 
 
For more details Contact : Anand Sai  (Mobile)+919810617373
or mail us

Tuesday, 21 June 2011

शिर्डी के साईं सन्देश

ॐ सांई राम

है तू ही मालिक,
तू ही बंदानिवाज़,
जानता है तू.
हमारे दिल के राज़,
क्या जमीं क्या आसमां,
क्या सुबहो शाम,
है सभी तेरे इशारों के गुलाम
तू जो चाहे जर्रा भी हो आफ़ताब,
जिसको चाहे उसको दे तू बेहिसाब..


शिर्डी के साईं सन्देश
"चाहे इस संसार में तुम कही भी जाओ, मैं  हर जगह तुम्हारे साथ ही जाता हूँ | तुम्हारा ह्रदय ही मेरा घर है, मैं तुम्हारे अंत:करण में निवास करता हूँ" |





Hanuman Chalisa – Chanting

Hanuman Chalisa, the holy devotional work written by Goswami Tulsidas in the sixteenth century, has gained enormous popularity among Hindus living the world over. With the blessings of Shri Hanuman, Goswami Tulsidas has also written Ramayana in Hindi and this Tulsi Ramayana is known as Ram Charitha Manas. Tulsi Ramayana has revolutionized the Ram Bhakti movement by enabling common man to recite the glorious legend of Shri Rama in Hindi.

The Power of Shri Hanuman:
Shri Hanuman is understood as great jnani, yogi and a brahmachari (bachelor). He has been blessed as chiranjivi, one who lives eternally. The blessings of Siva, Vishnu, Brahma, Surya, Indra, and Vayu made Shri Hanuman invincible. He is the great lover of music and also mastered the Sanskrit language. Being the Yogacharya, Shri Hanuman is considered as an embodiment of the four yogas. His strength, valour, prowess, will power, memory, balanced emotions, sharp intellect, fearlessness, and noble actions were perfectly refined and grounded in

None in the world can equal Shri Hanuman. He had only one thought--that of serving his Shri Rama with utmost humility and devotion. He serves, protects and inspires the devotees of Shri Rama. He holds the flag with fish symbols. Shri Hanuman Chalisa praises the selfless service, courage, humble disposition, and foremost devotion shown by Shri Hanuman towards Shri Rama. Shri Hanuman will present Himself with folded hands in prayer wherever and whenever the Holy name of Shri Rama is recited. Shri Hanuman always loves to hear the mantra ‘Shri Ramajeyam.' Just chant ‘Shri Ramajeyam' mantra 108 times and pray to Shri Hanuman. Here's how to recite one of the popular Hindu chants and mantras, the Hanuman Chalisa.

Why the Name Hanuman Chalisa? Goswami Tulsidas wrote these forty verses in the praise of Shri Hanuman. Forty in Hindi is called 'chalis.' The hymn containing forty verses is called 'Chalisa.' Each such verse is called a chaupai (means 4 legs) and each chaupai of the Chalisa has two lines each--the two always rhyme. Hanuman Chalisa is simple and is the utmost rhythmical poem. The chalisa is sung in different tunes (more than 100) across the country. Even if you don't understand Hindi, you may enjoy hearing it.

Based on the structure and content of Hanuman Chalisa, the devotees have identified three parts - the invocation or preamble, the main body (chalisa) and the final prayer and request. Hanuman Chalisa speaks about Shri Hanuman's parentage, his physique and intelligence, valor and heroic acts, devotion to Shri Rama and Sita.

How to Recite Hanuman Chalisa? Most households recite Hanuman Chalisa as an invocation to Shri Hanuman. Hanuman Chalisa has been found to be highly effective in controlling evil effects.

1) You can recite it either at a temple or at your puja room.

2) Sit at your place. Close your eyes.

3) Place a picture of Shri Hanuman.

4) Offer the garland of oscimum sanctum or Tulsi or lotus flower. Avoid nerium flower. You may offer a garland made out of betel leaves. You may also offer garland made out of Vada (a South Indian snack made of Urad Dhall).

5) Light a ghee lamp.

6) Offer incense sticks.

7) Now meditate on Shri Hanuman.

8) Now chant Shri Hanuman Chalisa. After completion of each Hanuman Chalisa chanting, offer a flower to Shri Hanuman. You may recite it 12 times, 24 times, 32 times. You may also recite the hymns 108 times while going around the pipal tree.

9) You may offer Sweet Pongal, Ven Pongal, Vada, Honey, Fruits and Panakam (a beverage made from jaggery and tamarind).

Reciting specific hymns. After attending many discourses, I have understood that the recitation of specific Hindu prayers and hymns in Hanuman Chalisa will bestow specific results. I have compiled specific number of the Hymns and the benefits:

1) Chanting the Opening Invocation Hymn of Hanuman Chalisa many times will mitigate the doshas arising out of having insulted knowingly/ unknowingly one's preceptor/ a Rama Bhakta. The hardships in your life will be relieved and you will be blessed with strength and wisdom.

2) Chanting the First Hymn of the Chalisa "Jaya Hanumaan gyaan guna saagar....." will bestow Divine knowledge.

3) Chanting the Third Hymn of Chalisa "Mahaaveer vikrama Bhajrangi....." will remove the bad company of friends or relatives or get rid of your bad habits. It will guide you in your right path.

4) Chanting the Seventh and Eighth Hymns "Vidyavan guni athi chaathur....." will channel a devotee into Rama Bhakti and he will become dear to Shri Rama.

5) Chanting the eleventh Hymn "Laya sanjivan....." will mitigate the effects of poisonous bites and remove fear of snakes.

6) Chanting the Twelfth Hymn will remove misunderstanding between your sons and daughters and will bring unity and affection among them.

7) Chanting the Thirteenth, fourteenth and fifteenth Hymns will help you to reach name and fame.

8) Chanting the Sixteenth and Seventeenth Hymns will restore lost status or help in getting desired career improvements or promotions.

9) Chanting the Twentieth Hymn will remove obstacles and help in reaching your goals.

10) Chanting the Twenty-second Hymn will provide due protection from adverse planetary effects.

11) Chanting the Twenty-fourth Hymn will drive away all negative energies and evil spirits including black magical deities.

12) Chanting the Twenty-fifth Hymn will restore exuberant health and spirits. The recitation will also give you the ability to withstand physical agony and pain when you are injured or in ailment.

13) Chanting the Twenty-sixth Hymn protects you from general hardships and difficulties.

14) Chanting the Twenty-seventh and Twenty-eighth Hymns will bring fulfilment of desires by Divine Blessings.

15) Chanting the Twenty-ninth will take to the pinnacle of name and fame.

16) Chanting the Thirtieth Hymn will help you to conquer evil forces.

17) Chanting the Thirty-first Hymn will help you to master occult powers and great wealth.

18) Chanting the Thirty-second, Thirty-third, Thirty-fourth, and Thirty-fifth Hymns will certainly make you enjoy a self-contented life without any bothers / frustrations. You are assured that at the end of such a self-contented life, you will attain the Lotus feet of Shri Rama.

19) Chanting the Thirty-sixth Hymn will mitigate you from all difficulties and pains.

20) Chanting the Thirty-seventh Hymn will secure the Grace of Shri Hanuman.
If you want to accomplish some major tasks, then you are advised to chant the appropriate Hymn with devotion 1008 times on an auspicious Tuesdays.

Some recommend that devotees perform Tail Puja. What is Tail Puja? Tail Puja is one of the other important Hindu rituals. It is the offering of sandalwood paste and kumkum / sindoor to the tail of Shri Hanuman's image for 48 days.


For Daily SAI SANDESH Click at our Group address : http://groups.google.com/group/shirdikesaibaba/boxsubscribe?p=FixAddr&email
Current email address :
shirdikesaibaba@googlegroups.com

Visit us at :
 
 For Daily Sai Sandesh Through SMS:
Type ON SHIRDIKESAIBABAGROUP
In your create message box
and send it to
+919870807070

Please Note : For Donations

Our bank Details are as follows :

A/c-Title -Shirdi Ke Sai Baba Group
A/c.No-0036DD1582050
IFSC -INDB0000036
IndusInd Bank Ltd,
N-10/11,Sec-18,
Noida-201301. 
 
For more details Contact : Anand Sai  (Mobile)+919810617373

For Donation

For donation of Fund/ Food/ Clothes (New/ Used), for needy people specially leprosy patients' society and for the marriage of orphan girls, as they are totally depended on us.

For Donations, Our bank Details are as follows :

A/c - Title -Shirdi Ke Sai Baba Group

A/c. No - 200003513754 / IFSC - INDB0000036

IndusInd Bank Ltd, N - 10 / 11, Sec - 18, Noida - 201301,

Gautam Budh Nagar, Uttar Pradesh. INDIA.