शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 5 February 2011

वास्तविक सुख

ॐ सांई राम

वास्तविक सुख 
 एक बार एक सेठ की राह चलते एक साधु से मुलाकात हो गई। चलते-चलते सफर को आसान बनाने के लिए दोनों सुख और अध्यात्म पर चर्चा करने लगे। सेठ ने कहा, 'मेरे पास जीवन में उपभोग के सभी साधन हैं पर सुख नहीं है।'

साधु ने मुस्कराकर पूछा, 'कैसा सुख चाहते हो।'

सेठ ने कहा, 'वास्तविक सुख। यदि कोई मुझे वह सुख प्रदान कर दे तो मैं इसकी कीमत भी दे सकता हूं।' साधु ने फिर पूछा, 'क्या कीमत दोगे? सेठ ने कहा, 'मेरे पास बहुत धन है। मैं उसका एक बड़ा हिस्सा इसके बदले में दे सकता हूं। लेकिन मुझे वास्तविक सुख चाहिए।'

साधु ने देखा कि सेठ के हाथों में एक पोटली है जिसे वह बार-बार अपने और नजदीक समेटता जाता था। अचानक साधु ने पोटली पर झपट्टा मारा और भाग खड़ा हुआ। सेठ के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी। पोटली में कीमती रत्न थे। सेठ चिल्लाता हुआ साधु के पीछे लपका लेकिन हट्टे-कट्टे साधु का मुकाबला वह थुलथुल सेठ कैसे करता। कुछ देर दौड़ने के बाद वह थककर बैठ गया।

वह अपने बहुमूल्य रत्नों के ऐसे अचानक हाथ से निकल जाने से बेहद दुखी था। तभी अचानक उसके हाथों पर रत्नों की वही पोटली गिरी। सेठ ने तुरंत उसे खोलकर देखा तो सारे रत्नों को सुरक्षित पाया। उसने पोटली को हृदय से लगा लिया। तभी उसे साधु की आवाज सुनाई दी जो उसके पीछे खड़ा था। साधु ने कहा, 'सेठ, सुख मिला क्या?' सेठ ने कहा, 'हां महाराज, बहुत सुख मिला। इस पोटली के यूं अचानक चले जाने से मैं बहुत दुखी था मगर अब मुझे बहुत सुख है।'

साधु ने कहा, 'सेठ, ये रत्न तो तुम्हारे पास पहले भी थे पर तब भी तुम सुख की तलाश में थे। बस, इनके जरा दूर होने से ही तुम दुखी हो गए यानी तुम्हारा सुख इस धन से जुड़ा है। यह फिर अलग होगा तो तुम फिर दुखी हो जाओगे। यह सुख नकली है। अगर वास्तविक सुख की तलाश है तो तुम्हें उसकी वास्तविक कीमत भी देनी होगी। जो यह नकली धन नहीं है बल्कि वह है सेवा और त्याग।'

Friday, 4 February 2011

Sabka Malik Ek

ॐ सांई राम

Sabka Malik Ek
उसके यहां कोई भेदभाव नहीं

कुछ दिनों पहले उड़ीसा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ के मंदिर में एक गैर हिंदू चला गया। उसके 'अनधिकृत प्रवेश' के कारण भगवान को स्नान कराया गया और मंदिर की साफ-सफाई हुई। कितनी बेतुकी बात है? जो भगवान सबको पवित्र करता है, वही अपवित्र हो गया? किसी पेड़ की छाया में जब कोई हिंदू या मुसलमान खड़ा होकर सुस्ताना चाहता है, तो क्या पेड़ उसकी जाति देख कर अपनी छाया देता है? वह तो कभी नहीं कहता कि तुम मुसलमान हो, तुम सिख हो, तुम हिंदू हो, तुम ईसाई हो, तुम बुद्ध हो। भगवान क्या पेड़ से भी गए-बीते हो गए। क्या उनमें पेड़ जैसी उदारता भी नहीं?

किसी व्यक्ति के छूने से पेड़ पवित्र या अपवित्र नहीं होता। उसे कुदरत ने पैदा किया है। परंतु पूजा स्थल मनुष्य ने बनाए हैं। जो मनुष्य ने बनाया है, उसमें दीवारें हैं, उसमें छूत-अछूत का भेद है। वह कहता कि फलाँ आ सकता है, फलाँ नहीं आ सकता। नाम वह भगवान की लेता है पर हुक्म अपनी चलाता है, तुम आ सकते हो, पर तुम नहीं आ सकते।

मनुष्य का बनाया हुआ है यह भेद-भाव, बनाने वाले ने तो कोई अंतर नहीं रखा। मनुष्य के बनाए नलके या कुएँ में छुआ छूता होता है, कहीं वह ऊँची जात वालों की होती है, कहीं वह नीची जात वालों की होती है। लेकिन भगवान की बनाई हुई जो नदी है वह किसी से छुआछूत नहीं करती। उसमें कोई भी जाकर पानी पी सकता है। हमारा समाज ही सिखाता है, आपस में बैर रखना। धर्म व ईश्वर की तरफ से ऐसा कोई विधान नहीं है। जो अज्ञानी है, वह चाहे जगन्नाथ पुरी में बैठे या वाराणसी में, यह तथ्य समझ नहीं पा रहा।

एक समय तीन ब्राह्माण गंगा स्नान करने गए, परंतु उके पास लोटा नहीं था। वहीं पर कबीर भी स्नान कर रहे थे। पंडितों की परेशानी भांपकर कबीर ने कहा, मेरा यह लोटा है इसे ले जाओ। वे ब्राह्माण कबीर को अछूत मानते थे, इसलिए लोटा लेने को तैयार नहीं हुए। कबीर ने उसे मिट्टी से तीन बार घिस कर उसे साफ करके दिया, तब ब्राह्माणों ने लोटा ले लिया और गंगा स्नान के लिए जाने लगे। कबीर ने पीछे से आवाज लगाई, 'लेकिन पंडितों, आप लोगों से पहले मैं इस गंगा में डुबकी लगा चुका हूँ, अब उसे मिट्टी से कैसे साफ करूँ?' तीनों को बात समझ में आ गई, वे बड़े शर्मसार हुए और क्षमा मांगने लगे।

आदमी-आदमी के बीच सचमुच में कोई अंतर नहीं है। जब तक सांस आती है, हम जीवित हैं और जब अंतिम सांस जाएगी, तब सबका एक ही हाल होना है। चाहे दफनाओ, जलाओ, चाहे पेड़ पर लटका कर चीलों को खिलाओ, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्या चीज है वह जिसके कारण हम जीवित हैं? उस शक्ति को जानना, उसका अनुभव करना -सारे भेदभाव की दीवारों को ध्वस्त कर देता है। मनुष्य-मनुष्य में भेदभाव करने वाले धर्म के ठेकेदार नहीं समझते कि किसी भी मनुष्य के मंदिर प्रवेश से मंदिर अपवित्र नहीं होता और न ही कोई नलका या कुएँ का पानी पीने से अपवित्र होता है। कहा है, 'हित अनहित पशु पक्षी हि जाना, मानुष तन गुण ज्ञान निधाना।' अपना भला-बुरा तो पशु- पक्षी भी अच्छी तरह से जानते हैं, लेकिन मनुष्य में और भी कई विशेषताएँ हैं, दूसरे प्राणियों की तुलना में तो वह ज्ञान का खजाना है।

अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

Thursday, 3 February 2011

Shree Sai-Samadhi Ka Phool....

ॐ सांई राम

मानवीय जीवन में ज्ञान का दीपक जलाते हैं सदगुरू

ॐ सांई राम

मानवीय जीवन में ज्ञान का दीपक जलाते हैं सदगुरू

जिस प्रकार से अंधकार को मिटाने के लिए उसके पीछे लाठी लेकर नहीं भागना पड़ता बल्कि उसे दूर करने के लिए दीपक दीया या बिजली का बल्ब जलाया जाता है, रोशनी करना जरूरी है वैसे ही सदगुरू अपनी शरण में आने वाले के मन में व्याप्त अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर करने के लिए ज्ञान का दीपक जला देते हैं।

जैसे प्रकाश के जलते ही अंधकार स्वत: नष्ट होने लगता है वैसे ही सदगुरु की संगत से अंधकार खत्म होने लगता है और मनुष्य की दृष्टि ही बदल जाती है। गुरु के आशीर्वाद से नाशवान पदार्थो के प्रति अरुचि होने लगती हैं और सद पथ पर चलने की प्रेरणा मिलती है जिससे परमात्मा का साक्षात्कार सुलभ हो जाता है इसलिए मनुष्य के लिए जीवन में सच्चे गुरु का चुनाव आवश्यक है। गुरु की संगत से प्रकाश का मार्ग प्रशस्त होता है और प्रभु की प्राप्ति का रास्ता सुगम हो जाता हैं। बाबा को पाने के लिए पहले मनुष्य को अपना मन निर्मल करते हुए अहम व लोभ का त्याग करना होगा। जो मनुष्य जीवन भर मोह जाल में फंस कर प्रभु का नाम लेना भी भूल जाते है उन्हें कभी सच्ची मानसिक शांति नहीं मिलती और जीवन में हर खुशी अधूरी ही रह जाती हैं। सच्चा गुरु वही है जो अपने शिष्य को सही मार्ग दिखलाए और उसे प्रभु प्राप्ति व मानसिक शांति पाने का रास्ता बताते हुए उसका उद्धार करे।

जो मनुष्य अहंकार का त्याग नहीं करता व मैं की भावना में ही उलझा रहता है वह कभी बाबा का प्रिय पात्र नहीं बन सकता। हर प्राणी को समान समझते हुए उससे ऐसा व्यवहार करना चाहिए जैसा आप उससे अपेक्षा रखते हैं।

हर मनुष्य में परोपकार की भावना होनी चाहिए। साथ ही नेकी कर दरिया में डाल वाली मानसिकता भी होनी चाहिए। मनुष्य को कभी भी किसी पर उपकार करके उसका एहसान नहीं जताना चाहिए। किसी पर एहसान करके जताने से अच्छा है कि एहसान किया ही न जाए।

Wednesday, 2 February 2011

धर्म तोड़ना नहीं, जोड़ना सिखाता है

ॐ सांई राम



धर्म तोड़ना नहीं, जोड़ना सिखाता है:

समभाव में ही धर्म है और विषमता में हमेशा अधर्म होता है। मानव कभी खेत में पैदा नहीं होता है। वह तो मानव की आत्मा में पैदा होता है। हमें यह विश्व बंधुता व मानव से आपस में प्यार करना सिखाता है।

धर्म हमें कभी लड़ना, भिड़ना, झगड़ना आपस में किसी प्रकार की हिंसा करना नहीं सिखाता है। मानव हर समय माला जाप, मंदिरों में घंटे बजाकर व नारे लगाकर अपने को धार्मिक दिखाता है। सही मायने में वह धर्म नहीं है। आज धर्म को संप्रदायों में बाट दिया है। भगवान के नाम पर लड़ना, मजहब के नाम पर लड़ना इंसान की प्रवृत्ति बन गई है। धर्म के नाम पर हमारे विचारों में भेद तो हो सकते हैं, लेकिन हमारे मनों के अंदर भेद नहीं होना चाहिए। धर्म हमारे घरों के अंदर क्लेश नहीं सिखाता, हमें भाई-भाई को अलग होना नहीं सिखाता। आज हम भगवान को भी बांट रहे हैं। यह मेरा भगवान है यह तेरा भगवान है।

जैसे संतरा बाहर से एक दिखाई देता अंदर से अलग-अलग होता है। उसी प्रकार हमें भी बनना है। हमें कैंची की तरह नहीं जो हमेशा काटने का काम करती है, सूई की तरह बनना है जो हमेशा दूर हुए को मिलाती है। धर्म गुरु हमारे अंदर से अंधकार को दूर करते हैं। मुस्लिम जायरीन हज करते समय सफेद कपड़े पहनते हैं व नंगे पैर चलते हैं, सिर में खुजाते तक नहीं कहीं कोई जूं न मर जाए। हमें अपने प्राणों की बलि देकर भी सत्य व धर्म की रक्षा करनी चाहिए। धर्म संगठन में नहीं है। संगठन तो चार का भी होता है। आतंकवादियों का भी होता है। हमें नेक बनना है। बिनोबा जी ने कहा था कि अगर इंसान अपने धर्म में दृढ़ हो व दूसरों के धर्म में सम्मान की भावना हो और अधर्म से घृणा करता हो वह सही मायने में धार्मिक है। कोई भी धर्म हमें किसी का दिल तोड़ना नहीं जोड़ना सिखाता है।

Tuesday, 1 February 2011

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ॐ सांई राम

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सत्संग से प्रभु प्राप्ति सुगम

ॐ सांई राम

सत्संग से प्रभु प्राप्ति सुगम

जिस प्रकार गन्ने को धरती से उगाकर उससे रस निकालकर मीठा तैयार किया जाता है और सूर्य के उदय होने से अंधकार मिट जाता है उसी प्रकार सत्संग में आने से मनुष्य को प्रभु मिलन का रास्ता दिख जाता है और उसके जीवन का अंधकार मिट जाता है। सत्संग में आने से मानव का मन साफ हो जाता है और मानव पुण्य करने को प्रेरित होता है जिससे उसे प्रभु प्राप्ति का मार्ग सुगमता से प्राप्त होता है।

मानव द्वारा किए गए पुण्य कर्म ही उसे जीवन की दुश्वारियों से बचाते हैं और जीवन के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलने में सहायक होते हैं। जीवन में असावधानी की हालत में व विपरीत परिस्थितियों में यही पुण्य कर्म मनुष्य की सहायता करते हैं। अगर मनुष्य का जीवन में कोई सच्चा साथी है तो वह है मनुष्य का अर्जित ज्ञान और उसके द्वारा किए गए पुण्य कर्म। मगर इसके लिए मनुष्य को अपनी बुद्धि व विवेक के द्वारा ही उचित अनुचित का फैसला करना होता है। कोई भी मानव अपनी बुद्धि व विवेक अनुसार ही जीवन में अच्छे-बुरे व सार्थक-निरर्थक कार्यो में अंतर को समझता है। सत्संग वह मार्ग है जिस पर चलकर मानव अपना जीवन सफल बना सकता है। जिस प्रकार का शास्त्रों के श्रवण से ही सुशोभित होता है न कि कानों में कुण्डल पहनने से। इसी प्रकार हाथ की शोभा सत्पात्र को दान देने से होती है न कि हाथों में कंगन पहनने से। करुणा, प्रायण, दयाशील मनुष्यों का शरीर परोपकार से ही सुशोभित होता है न कि चंदन लगाने से।

शरीर का श्रृंगार कुण्डल आदि लगाकर या चंदन आदि के लेप करना ही पर्याप्त नहीं है क्योंकि यह सब तो नष्ट हो सकता है परन्तु मनुष्य का शास्त्र ज्ञान सदा उसके साथ रहता है। मनुष्यों द्वारा किए गए दान व परोपकार उसके सदा काम आते हैं और परमार्थ मार्ग पर चलने वाला मनुष्य ही मानव जाति का सच्चा शुभ चिंतक होता है। प्रेम से सुनना समझना व प्रेम पूर्वक उसका मनन कर उसका अनुसरण करना ही मनुष्य को फल की प्राप्ति कराता है। लेकिन मनुष्य की चित्त वृत्ति सांसारिक पदार्थो में अटकी होने के कारण वह असत्य को ही सत्य मानता है। इसी कारण वह दुखों को भोगता है। शरीर को चलाने वाली शक्ति आत्मा अविनाशी सत्य है और वही कल्याणकारी है। 

Monday, 31 January 2011

साधना से बढ़ता है बाबा सांईश्वर के प्रति प्रेम

ॐ सांई राम

।। जय सांई राम ।।

साधना से बढ़ता है बाबा सांईश्वर के प्रति प्रेम


प्रेम आत्मा का दर्पण है। प्रेम की ताकत के आगे बाबा भी बेबस हो जाते हैं अर्थात प्रेम में वह शक्ति है कि मानव बाबा को पा सकता है। बाबा से प्रेम करने वाला भक्त मृत्यु से नहीं डरता क्योंकि वह अपना तन-मन उनको को समर्पित कर चुका होता है। ज्ञानी साधकों का भगवान के प्रति प्रेम गहरा और घना होता है और जैसे-जैसे वे साधना करते जाते हैं वैसे-वैसे समय के साथ उनका प्रेम बढ़ता ही जाता है।

प्रेम का भाव छिपाने से भी छिपता नहीं है। प्रेम जिस हृदय में प्रकट होकर उमड़ता है उस को छिपाना उस हृदय के वश में भी नहीं होता है और वह इसे छिपा भी नहीं पाता है। यदि वह मुंह से प्रेम-प्रीत की कोई बात न बोल पाए तो उसके नेत्रों से प्रेम के पवित्र आंसुओं की धारा निकल पड़ती है अर्थात् हृदय के प्रेम की बात नेत्रों से स्वत: ही प्रकट हो जाती है। प्रेमी जिज्ञासु को चाहिए कि वह प्रेम और सेवा-भक्ति में सदा सुदृढ़ रहे। ऐसा करने पर उसे अवश्य ही मोक्ष का फल मिलेगा। संत जनों के व गुरुओं के सदुपदेश से जब उसे आत्म बोध हो जाएगा तो उसका इस संसार में आवागमन मिट जाएगा। बाबा मानव के बाहरी साज श्रृंगार से प्रभावित नहीं होते हैं बल्कि उसके लिए तो अलौकिक श्रृंगार की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार सुहागन अपने पति को मोहित करने अर्थात पाने के लिए श्रृंगार करती है उसी प्रकार बाबा से प्रेम करने वाले भक्त को प्रेम रूपी पायल पहन कर नेत्रों में अंजन लगाकर सिर में शील का सिंदूर भरना होगा अर्थात बाबा को पाने के लिए इन सब गुणों को धारण करना जरूरी है।

यह संसार बाबा की भक्ति और प्रेम का दरबार है। यहां सत कर्म करके हमें बाबा की कृपा अर्थात मोक्ष पाने का प्रयास करना चाहिए मगर इसके लिए मानव में त्याग भाव का होना जरूरी है। बाबा की कृपा व उनका प्रेम केवल उन्हीं को मिल सकता है जिन्हें संत जनों का साथ व गुरुओं से ज्ञान मिला हो।

Sunday, 30 January 2011

आज का चिन्तन

ॐ सांई राम

।। जय साँई राम ।।

इस तपते भूखंड पर
उड़ते गरम रेत के बीच
जब मैं झुकूं नल पर
तब ओ प्यास
मुझे मत करना कमजोर
पियूं तो एक चुल्लू कम
कि याद रहे दूसरों की प्यास भी
खाऊँ तो एक कौर कम
कि याद रहे दूसरों की भूख भी
बाबा से हर दम यह दुआ मांगता रहता हूँ कि जियूं इस तरह अपने इस जन्म को।

एक ओर दूसरों की प्यास का खयाल रख एक चुल्लू पानी कम पीने,  दूसरों की भूख का खयाल रख एक कौर कम खाने की चेतना से भरे चरित्र की तलाश हमारे बाबा साँई इस दुनिया में कर रहे है। लेकिन दूसरी ओर ठीक तभी यहीं इसी दुनिया में हत्यारे, आततायी व दंगाई माँ से पुत्रों को, भाईयों से बहन को, पत्नियों से पति को, कण्ठों से गीत को, जल से मिठास को और पेड़ों से हरियाली को छीन लेने का षड़यंत्र कर पूरी धरती को अशांत करने में लगे हुए हैं। जो इस सदी की भयावह घटना के रूप में सामने आता है।

बाबा साँई को तलाश है एक ऐसे इन्सान की और एक ऐसे भक्त की जो समझ सके मेरे बाबा साँई की पीड़ा को। आओ समय निकाले अपनी भागम भाग के जीवन से ओर करे धन्यवाद अपने साँई का हर उस अन्न के कौर का और हर एक चुल्लू पानी का जो हमे जीवन देता है। बाबा साँई हमसे इस भाव की ही तो अपेक्षा रखते है। आइये बाबा की इन अपेक्षाओं पर खरा उतरें।

Source : Ramesh Ramnani , DwarkaMai

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