शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Friday, 14 January 2011

मेरा इक तू साईं|

ॐ सांई राम

सगरे जगत में दूजा नहीं, मेरा इक तू साईं

रहना  मुझको, संग संग तेरे, बनके तेरी परछाई

 

लेके उमीदें तेरे दर पे आते

है  सारे सवाली

मांगे मुरादें लेके जाएं

भर भर दामन खाली

मेरे मालिक मेरे दाता

भाग बना दे भाग्य विधाता

अब दुख सहा न जाता

 

सगरे जगत में दूजा नहीं, मेरा इक तू साईं

रहना  मुझको, संग संग तेरे, बनके तेरी परछाई

 

तेरे चरणों की धुल उठाके,

माथे पर मैं लगाऊं

तेरी मिट्टी में जन्म लिया है,

तुझ में हे मिल जाऊं

चाहे बना दे चाहे मिटा दे,

जो चाहे वोह मुझको सज़ा दे

जीवन पार लगादे.

 

सगरे जगत में दूजा नहीं,

मेरा इक तू साईं

रहना  मुझको, संग संग तेरे,

बनके तेरी परछाई

 

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Thursday, 13 January 2011

ॐ सांई राम - Aaj Ka Sai Sandesh - Happy Lohri


ॐ सांई राम



 
  काका की नोकरानी  द्वारा दासगणु की शंका का निवारण        बाबा के वचनों में पूर्ण विश्वास कर वे शिर्डी से विलेपार्ला (बम्बई के उपनगर) में पहुँच कर काका दीक्षित के यहाँ ठहरे|दुसरे दिन दासगणु सुबह की मीठी नींद का आनंद ले रहे थे,तभी उन्हें एक निर्धन बालिका के सुंदर गीत का स्पष्ट और मधुर स्वर सुनाई पड़ा|गीत का मुख्या विषय था-एक लाल रंग की साड़ी वह कितनी सुन्दर थी,उसका जरी का आँचल कितना बढ़िया था,उसके छोर और किनारे कितने सुन्दर थे,इत्यादि|उन्हें वह गीत अति रुचिकर प्रतीत हुआ|इसी कारण उहोने बहार आकर देखा यह गीत एक बालिका -नाम्या की बहन-जो काका दीक्षित की नोकरानी है-गा रही है|बालिका बर्तन माँज रही थी और केवल एक फटे कपड़े से तन ढंके हुए थी|इतनी दरिद्र परिस्थिति में भी उसकी प्रसन्न- मुद्रा देखकर श्री दासगणु को दया आ गयी  और श्री दासगणु ने श्री ऍम.व्ही. प्रधान से उस निर्धन बालिका को एक उत्तम  साड़ी देने की प्रार्थना की|जब रावबहादुर ऍम.व्ही.प्रधान ने उस निर्धन बालिका को एक उत्तम धोती का जोड़ा दिया,तब एक शुद्धापीड़ित व्यक्ति को जैसे भाग्यवश मधुर भोजन प्राप्त होने पर प्रसन्नता होती है,वैसे ही उसकी प्रसन्नता का पारवार ना रहा|दुसरे दिन उसने नयी साड़ी पहनी और अत्यंत हर्षित होकर नाचने-कूदने लगी और अन्य बालिकाओं के साथ वह फुगड़ी खेलने में मग्न रही|अगले दिन उसने नयी साड़ी सँभाल कर संदूक में रख दी और पूर्ववत फटे-पुराने कपड़े पहन कर आई,फिर पिछले दिन के समान ही प्रसन्न दिखाई दी|यह देखकर श्री दासगणु की दया आश्चर्य में परिणित हो गयी|उनकी ऐसे धारणा थी की निर्धन होने के ही कारण उसे फटे चीथड़े कपड़े पहनने पड़ते हैं,परन्तु आज अब तो उसके पास नयी साड़ी थी,जिसे उसने सम्भाल कर रख लिया,और फटे कपड़े पहन कर भी उसी गर्व और आनंद का अनुभव करती रही|उसके मुख पर दुःख या निराशा का कोई निशान भी नहीं रहा|इस प्रकार उन्हें अनुभव हुआ की दुःख और सुख का अनुभव मानसिक स्थिति पर निर्भर है|इस घटना पर गूढ़ विचार करने के पश्चात वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे की भगवान् ने जो कुछ दिया है,उसी में समाधान वृति रखनी चाहिए और यह निश्चयपूर्वक समझना चाहिए वह चराचर में व्याप्त है|आर जो भी स्थिति उसकी दया से प्राप्त है,वह अपने अवश्य ही लाभप्रद होगी|इस वशिष्ट घटना में बालिका की निर्धना अवस्था, उसके फटे पुराने कपड़े और नयी साड़ी देने वाला तथा उसकी स्वीकृति देने वाला,ये सब इश्वर द्वारा ही प्रेरित था |श्री दासगणु को उपनिषद के पाठ की प्रत्यक्ष शिक्षा मिल गयी अर्थात जो कुछ अपने पास है,उसी में समाधानवृति माननी चाहिए|सार यही है कि जो कुछ होता है,सब उसकी इच्छा से नियंत्रित है,अत: उसी में संतुष्ट रहने में हमारा कल्याण है|
                                            *जय साईं राम *                         साईं की कृपा हम सब पर बनी रहे |



ॐ सांई राम

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Kindly Provide Food for Birds & Other Animals.
This is also a True Service.
सुख के आने की उम्मीद पे सांई,
दुःख क्यों द्वार खटखटाता है,
यह तो मेरे कर्म है सांई,
मेरा मन क्यों तुझ को दोष लगाता है!!

तूँ तो सब का सहारा है सांई,
हर कोई तुझ को प्यारा है सांई,
तूँ तो अपने बंदों में फर्क न करता,
मेरा मन क्यों मुझको भटकाता है सांई,
ये तो मेरे कर्म है सांई....

तूँ तो दयावान है सांई,
तुझसे मिलता समाधान है सांई,
मैं यह जानूँ, देकर मुझको
दुःख तूँ आज़माता है!!!

तेरी कृपा सब पर होती सांई,
आँखें फिर क्यों दामन को भिगोती सांई,
तुझ को देकर दोष स्वयम् का,
मन ही मन वो पछताता है,
ये तो मेरे कर्म है सांई....
मैं ना चाहूँ इतना सुख सांई,
जिसमे हो तुझे भुलाने का दुःख सांई,
कभी-कभी ही लेकिन फिर भी
मुझ पे तूँ अपना हक तो जमाता है,
ये तो मेरे कर्म है सांई..

ॐ सांई राम - Happy Lohri

ॐ सांई राम
 

Origin of Lohri

The origin of the Lohri can be traced back to the tale of Dulla Bhatti. By the end of the first week of January, small groups of boys ring the doorbell of houses and start chanting the Lohri songs related to Dulla Bhatti. In turn, the people give them popcorn, peanuts, crystal sugar, sesame seeds (til) or gur as well as money. Turning them back empty-handed is regarded inauspicious.

Lohri marks the end of winter on the last day of Paush, and beginning of Magha (around January 12 and 13), when the sun changes its course. It is associated with the worship of the sun and fire and is observed by all communities with different names, as Lohri is an exclusively Punjabi festival. The questions like When it began and why is lost in the mists of antiquity.

The origin of Lohri is related to the central character of most Lohri songs is Dulla Bhatti, a Muslim highway robber who lived in Punjab during the reign of Emperor Akbar. Besides robbing the rich, he rescued Hindu girls being forcibly taken to be sold in slave market of the Middle East. He arranged their marriages to Hindu boys with Hindu rituals and provided them with dowries. Understandably, though a bandit, he became a hero of all Punjabis. So every other Lohri song has words to express gratitude to Dulla Bhatti.

Some believe that Lohri has derived its name from Loi, the wife of Sant Kabir, for in rural Punjab Lohri is pronounced as Lohi. Others believe that Lohri comes from the word 'loh', a thick iron sheet tawa used for baking chapattis for community feasts. Another legend says that Holika and Lohri were sisters. While the former perished in the Holi fire, the latter survived. Eating of til (sesame seeds) and rorhi (jaggery) is considered to be essential on this day. Perhaps the words til and rorhi merged to become tilorhi, which eventually got shortened to Lohri.

Ceremonies that go with the festival of Lohri usually comprises of making a small image of the Lohri goddess with gobar (cattle dung), decorating it, kindling a fire beneath it and chanting its praises. The final ceremony is to light a large bonfire at sunset, toss sesame seeds, gur, sugar-candy and rewaries in it, sit round it, sing, dance till the fire dies out. People take dying embers of the fire to their homes. In Punjabi village homes, fire is kept going round the clock by use of cow-dung cakes.

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Gautam Budh Nagar, Uttar Pradesh. INDIA.