शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

************************************

निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

************************************

Saturday, 31 December 2011

तेरे दर पे तो मै, आया साईं

ॐ सांई राम


तेरे दर पे तो मै, आया साईं

अब मुझको तू ठुकराना

मै हार गया, मेरे साईं

मै पा न सका , कोई ठिकाना


Friday, 30 December 2011

THE STORY OF ENTRY OF KALIYUGA

ॐ सांई राम

 
गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णु

गुरुर देवो महेश्वराः

गुरुर साक्षात् परब्रह्म

तस्मै श्री गुरुवे  नमः


Thursday, 29 December 2011

साईं राम मै तो बैठा हूँ तेरे चरणों में

ॐ सांई राम


साईं राम मै तो बैठा हूँ तेरे चरणों में

आके बस जाओ तुम मेरी पलकों मे

साईं राम ......

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 38 & English Chapter-38

ॐ सांई राम

आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं , हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 38

बाबा की हंड़ी, नानासाहेब द्अघारा देव-मूर्ति की उपेक्षा, नैवेघ वितरण, छाँछ का प्रसाद ।
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गत अध्याय में चावड़ी के समारोह का वर्णन किया गया है । अब इस अध्याया में बाबा की हंडी तथा कुछ अन्य विषयों का वर्णन होगा ।

Wednesday, 28 December 2011

तुझमे साईं मुझमे साईं, सबसे साईं समाया

ॐ सांई राम


तुझमे साईं मुझमे साईं, सबसे साईं समाया

सबसे कर ले प्रेम जगत में , सब में साईं समाया रे....

तुझमे राम .....


Tuesday, 27 December 2011

Invitation for Palki Shobha Yatra on 01/01/2012 at 5 AM

ॐ सांई राम
नव वर्ष के शुभ अवसर पर शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप (रजि.) के सभी सदस्य  01 जनवरी 2012 को श्री साईंनाथ महाराज जी की महा पालकी शोभा यात्रा का आयोजन बड़े ही धूम- धाम से कर रहे है |

नए साल का पहला दिन, श्री साईं जी नाम हर एक जुबां पर और साईं नाथ महाराज जी की पालकी को काँधे पे सजा कर नए साल की पहली किरण का स्वागत सभी श्री साईं भक्तों के साथ मिल कर करें |

पालकी सुबह 5:00 बजे फ्लेट नम्बर 707, डी. डी. ए., एल. आई. जी. फ्लेट्स, हस्तसाल, उत्तम नगर, नयी दिल्ली - 110059 से आरम्भ हो कर श्री साईं मेमोरिअल, साईं मंदिर, लोधी कालोनी, नयी दिल्ली तक जाएगी, आप सभी सहपरिवार एवं मित्रों सहित सादर आमंत्रित है | आप सभी से अनुरोध है की आप सभी उपस्थित हो कर बाबा जी की महा पालकी का आनंद उठाये एवं बाबा जी का आशीर्वाद प्राप्त करे |

आप सभी का सहयोग ही हमारी सच्ची प्रेरणा है | आप अधिक जानकारी के लिए हमें समपर्क कर सकते है हमारा दूरभाष नंबर 9810618245 / 9911104300 / 9810617373 / 9868595826 है |

निवेदक
दिलीप अग्रवाल (प्रधान)
शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप (रजि.)
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तेरे दर से आस लगी बाबा

ॐ सांई राम




तेरे दर से आस लगी बाबा

मुझे खाली हाथ न मोड़ना

चाहे टूटे नाता इस जग से

मुझसे नाता न तोड़ना


Monday, 26 December 2011

ॐ सांई राम




ऐ मेरे बहके हुए मन
छोड़ सारे तू करम
जप ले साईं नाम
साईं नाम में जियूं
साईं नाम में मरुँ
इक यही अरमान
ऐ मेरे बहके हुए मन
छोड़ सारे तू करम
जप ले साईं नाम


Sunday, 25 December 2011

पिता... ! साईं जी के चरणों में मेरा नमन...!

ॐ सांई राम



पिता
-------
माँ घर का गौरव है तो पिता घर के अस्तित्व होते है.....माँ के पास अश्रुधारा तो पिता के पास सयंम होता है.....दोनो समय का भोजन माँ बनाती है तो , जीवन भर के भोजन की व्यवस्था करने वाले पिता को हम सहज ही भूल जाते है......कभी लगी ठोकर या चोट तो " ओ माँ " ही निकला मुंह से , लेकिन रास्ता पार करते समय कोई ट्रक पास आके ब्रेक लगाये....तो " बाप रे " यही मुंह से निकलता है......क्यो...
कि छोटे छोटे संकटों के लिये माँ है , पर बड़े संकट आने पर पिता ही याद आते है......जो दुखों की बारिश में छतरी बन तनते हैं......घर के दरवाज़े पर नजरबट्टू बन टंगते हैं....समेट लेते हैं सबका अंधियारा अपने भीतर और खुद आंगन में एक दीपक बन जलते हैं , ऐसे होते हैं पिता......पिता एक वट वृक्ष है , जिनकी शीतल छाया मे सम्पूर्ण परिवार सुख से रहता है.....

Saturday, 24 December 2011

5 Moral Evils... Kaam, Krodh, Lobh, Moh & Ahankaar

ॐ सांई राम
 5 Moral Evils... Kaam, Krodh, Lobh, Moh & Ahankaar

Kaam: refers to lust and illegitimate sex. It is one of the greatest evils that tempts people away from God. It makes an individual weak-willed and unreliable. Normal sexual relationship as a house-holder is not restricted in any way. But sex against the will of the partner is taboo, as it can cause unlimited sorrows.
Krodh: is anger and needs to be controlled. A person overcome by 'krodh' loses his balance of mind and becomes incapable of thinking. 'krodh' takes a person away from God as hatred has no place in any religious practice.
Lobh: means greed, a strong desire to possess what rightfully belongs to others. It makes an individual selfish and self-centred. It takes a person away from his religious and social duties. A person can become blind with greed if an effort to control the desire for unlimited possessions is not made.
Moh: refers to the strong attachment that an individual has to worldly possessions and relationships. It blurs the perspective of a human being and makes him narrow minded. It deviates a person from his moral duties and responsibilities and leads him towards a path of sin.
Ahankar: means false pride due to one's possessions, material wealth, intelligence or powers. It gives an individual a feeling that he is superior to others and therefore they are at a lower level than him. It leads to jealousy, feelings of enmity and restlessness amongst people.
8 VIRTUES TO COMBAT THE 5 EVILS

Wisdom (gyan): is the complete knowledge of a set of religious principles. It can be achieved by hearing good, thinking good and doing good. A man of wisdom tries to achieve a high moral standard in his life and interaction with others. According to me, the first steps to wisdom is to consider oneself as an ignorant person who has to learn a lot in life.
Truthful Living (sat): This is more than 'truth'. It means living according to the way of God i.e. the thoughts should match the words that a person speaks and his actions should also match his words. Truthful living brings a person closer to God.

रिश्ते नाते छोड़ सभी जो साईं का दीवाना हुआ

ॐ सांई राम


रिश्ते नाते छोड़ सभी जो
साईं का दीवाना हुआ
रिश्ते नाते छोड़ सभी जो
साईं का दीवाना हुआ
साईं उन सब का है बन्दे
जो सब के लिए बेगाना हुआ

Friday, 23 December 2011

Save Girl Child - Respect Women !!

ॐ सांई राम


मुझसे क्या भूल हुई साईं.....

ॐ सांई राम
 
 
मुझसे क्या भूल हुई साईं
जो यूँ मुझसे मुह मोड़ लिया
जपूं मै तेरा ही नाम सदा
फिर भी नाता क्यों तोड़ लिया
तेरी रहमत हो जाये अगर
जन्नत भी यहीं दिख जाये
मैंने छोड़ के सब पीर पैगम्बर
तेरे चरणों से मन को जोड़ लिया
लाखों देखे योगी तपस्वी
पा न सका प्रभु दर्शन कभी
जब से देखी तेरी सूरत साईं
झूठे जग से नाता तोड़ लिया
 
मुझसे क्या भूल हुई साईं
जो यूँ मुझसे मुह मोड़ लिया
जपूं मै तेरा ही नाम सदा
फिर भी नाता क्यों तोड़ लिया
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यह भजन माला बहन रविंदर जी द्वारा प्रस्तुत की गयी है |
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Thursday, 22 December 2011

सादर निमंत्रण-नया साल साईं जी दे नाल - श्री साईं महापालकी

सज रहे है जी साईं राम देखो शिर्डी में...

ॐ सांई राम
सज रहे है जी साईं राम
देखो शिर्डी में
देखो शिर्डी में, देखो शिर्डी में
समाधी पे देखो धूम मची है
द्वारका माई भी जग-मग सजी है
स्वर्ग बना है साईं धाम, देखो शिर्डी में
देखो शिर्डी में ,देखो शिर्डी में
बाबा को मंगल स्नान कराएँ
सुनहरे चोले से बाबा को सजाएँ
भक्त कर रहे देखो प्रणाम, देखो शिर्डी में
देखो शिर्डी में ,देखो शिर्डी में
बाबा को सुंदर फूल चढ़ाये
कोई सुनहरी माला चढ़ाये
कर रहे सब गुणगान , देखो शिर्डी में
देखो शिर्डी में ,देखो शिर्डी में
बाबा के दर पे सवाली जो आया
झोली वो खाली भर भर के लाया
यहाँ बैठे हैं करुणा निधान, देखो शिर्डी में ,
देखो शिर्डी में ,देखो शिर्डी में
मालिक सभी का एक बताया
कोढ़ी को भी गले से लगाया
श्रधा सबुरी की शिक्षा महान देखो शिर्डी में
देखो शिर्डी में ,देखो शिर्डी में

  यह भजन बहन रविंदर जी द्वारा प्रस्तुत किया गया है |  
बाबा जी के श्री चरणों में प्रार्थना है की
 सभी को सुख और समृद्धि का दान देने की कृपा करें |  
  आप सभी को साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं  
  Happy Baba's Day  
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श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 37 & Also chapter 37 in English

ॐ सांई राम

आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं, हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है, हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 37 - चावड़ी का समारोह
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इस अध्याय में हम कुछ थोड़ी सी वेदान्तिक विषयों पर प्रारम्भिक दृष्टि से समालोचना कर चावड़ी के भव्य समारोह का वर्णन करेंगे ।

प्रारम्भ
............
धन्य है श्रीसाई, जिनका जैसा जीवन था, वैसी ही अवर्णनीय गति और क्रियाओं से पूर्ण नित्य के कार्यक्रम भी । कभी तो वे समस्त सांसारिक कार्यों से अलिप्त रहकर कर्मकाण्डी से प्रतीत होते और कभी ब्रहमानंद और कभी आत्मज्ञान में निमग्न रहा करते थे । कभी वे अनेक कार्य करते हुए भी उनसे असंबन्ध रहते थे । यघपि कभी-कभी वे पूर्ण निष्क्रिय प्रतीत होते, तथापि वे आलसी नहीं थे । प्रशान्त महासागर की नाईं सदैव जागरुक रहकर भी वे गंभीर, प्रशान्त और स्थिर दिखाई देते थे । उनकी प्रकृति का वर्णन तो सामर्थ्य से परे है ।

यह तो सर्व विदित है कि वे बालब्रहमचारी थे । वे सदैव पुरुषों को भ्राता तथा स्त्रियों को माता या बहिन सदृश ही समझा करते थे । उनकी संगति द्घारा हमें जिस अनुपम त्रान की उपलब्धि हुई है, उसकी विस्मृति मृत्युपर्यन्त न होने पाये, ऐसी उनके श्रीचरणों में हमारी विनम्र प्रार्थना है । हम समस्त भूतों में ईश्वर का ही दर्शन करें और नामस्मरण की रसानुभूति करते हुए हम उनके मोहविनाशक चरणों की अनन्य भाव से सेवा करते रहे, यही हमारी आकांक्षा है ।

हेमाडपंत ने अपने दृष्टिकोण द्घारा आवश्यकतानुसार वेदान्त का विवरण देकर चावड़ी के समारोह का वर्णन निम्न प्रकार किया है :-

चावड़ी का समारोह
...................
बाबा के शयनागार का वर्णन पहले ही हो चुका है । वे एक दिन मसजिद में और दूसरे दिन चावड़ी में विश्राम किया करते थे और यह कार्यक्रम उनकी महासमाधि पर्यन्त चालू रहा । भक्तों ने चावड़ी में नियमित रुप से उनका पूजन-अर्चन 10 दिसम्बर, सन् 1909 से आरम्भ कर दिया था । अब उनके चरणाम्बुजों का ध्यान कर, हम चावड़ी के समारोह का वर्णन करेंगे । इतना मनमोहक दृश्य था वह कि देखने वाले ठिठक-ठिठक कर रह जाते थे और अपनी सुध-बुध भूल यही आकांक्षा करते रहते थे कि यह दृश्य कभी हमारी आँखों से ओझल न हो । जब चावड़ी में विश्राम करने की उनकी नियमित रात्रि आती तो उस रात्रि को भक्तोंका अपार जन-समुदाय मसजिद के सभा मंडप में एकत्रित होकर घण्टों तक भजन किया करता था । उस मंडप के एक ओर सुसज्जित रथ रखा रहते था और दूसरी ओर तुलसी वृन्दावन था । सारे रसिक जन सभा-मंडप मे ताल, चिपलिस, करताल, मृदंग, खंजरी और ढोल आदि नाना प्रकार के वाघ लेकर भजन करना आरम्भ कर देते थे । इन सभी भजनानंदी भक्तों को चुम्बक की नाई आकर्षित करने वाले तो श्री साईबाबा ही थे ।

मसजिद के आँगन को देखो तो भक्त-गण बड़ी उमंगों से नाना प्रकार के मंगल-कार्य सम्पन्न करने में संलग्न थे । कोई तोरण बाँधकर दीपक जला रहे थे, तो कोई पालकी और रथ का श्रृंगार कर निशानादि हाथों में लिये हुए थे । कही-कही श्री साईबाबा की जयजयकार से आकाशमंडल गुंजित हो रहा था । दीपों के प्रकाश से जगमगाती मसजिद ऐसी प्रतीत हो रही थी, मानो आज मंगलदायिनी दीपावली स्वयं शिरडी में आकर विराजित हो गई हो । मसजिद के बाहर दृष्टिपात किया तो द्घार पर श्री साईबाबा का पूर्ण सुसज्जित घोड़ा श्यामसुंदर खड़ा था । श्री साईबाबा अपनी गादी पर शान्त मुद्रा में विराजित थे कि इसी बीच भक्त-मंडलीसहित तात्या पटील ने आकर उन्हें तैयार होने की सूचना देते हुए उठने में सहायता की । घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारण तात्या पाटील उन्हें मामा कहकर संबोधित किया करते थे । बाबा सदैव की भाँति अपनी वही कफनी पहिन कर बगल में सटका दबाकर चिलम और तम्बाखू संग लेकर धन्धे पर एक कपड़ा डालकर चलने को तैयार हो गये । तभी तात्या पाटील ने उनके शीश पर एक सुनहरा जरी का शेला डाल दिया । इसके पश्चात् स्वयं बाबा ने धूनी को प्रज्वलित रखने के लिये उसमें कुछ लकड़ियाँ डालकर तथा धूनी के समीप के दीपक को बाँयें हाथ से बुझाकर चावड़ी को प्रस्थान कर दिया । अब नाना प्रकार के वाघ बजने आरम्भ हो गये और उनसे भाँति-भाँति के स्वर निकलने लगे । सामने रंग-बिरंगी आतिशबाजी चलने लगी और नर-नारी भाँति-भाँति के वाघ बजाकर उनकी कीर्ति के भजन गाते हुए आगे-आगे चलने लगे । कोई आनंद-विभोर हो नृत्य करने लगा तो कोई अनेक प्रकार के ध्वज और निशान लेकर चलने लगे । जैसे ही बाबा ने मसजिद की सीढ़ी पर अपने चरण रखे, वैसे ही भालदार ने ललकार कर उनके प्रस्थान की सूचना दी । दोनों ओर से लोग चँवर लेकर खड़े हो गये और उन पर पंखा झलने लगे । फिर पथ पर दूर तक बिछे हुए कपड़ो के ऊपर से समारोह आगे बढ़ने लगा । तात्या पाटील उनका बायाँ तथा म्हालसापति दायाँ हाथ पकड़ कर तथा बापूसाहेब जोग उनके पीछे छत्र लेकर चलने लगे । इनके आगे-आगे पूर्ण सुसज्जित अश्व श्यामसुंदर चल रहा था और उनके पीछे भजन मंडली तथा भक्तों का समूह वाघों की ध्वनि के संग हरि और साई नाम की ध्वनि, जिससे आकाश गूँज उठता था, उच्चारित करते हुए चल रहा था । अब समारोह चावड़ी के कोने पर पहुँचा और सारा जनसमुदाय अत्यन्त आनंदित तथा प्रफुल्लित दिखलाई पड़ने लगा । जब कोने पर पहुँचकर बाबा चावड़ी के सामने खड़े हो गये, उस समय उनके मुख-मंडल की दिव्यप्रभा बड़ी अनोखी प्रतीत होने लगी और ऐसा प्रतीत होने लगा, मानो अरुणोदय के समय बाल रवि क्षितिज पर उदित हो रहा हो । उत्तराभिमुख होकर वे एक ऐसी मुद्रा में खड़े गये, जैसे कोई किसी के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा हो । वाघ पूर्ववत ही बजते रहे और वे अपना दाहिना हाथ थोड़ी देर ऊपर-नीचे उठाते रहे । वादक बड़े जोरों से वाघ बजाने लगे और इसी समय काकासाहेब दीक्षित गुलाल और फूल चाँदी की थाली में लेकर सामने आये और बाबा के ऊपर पुष्प तथा गुलाल की वर्षा करने लगे । बाबा के मुखमंडल पर रक्तिम आभा जगमगाने लगी और सब लोग तृप्त-हृदय हो कर उस रस-माधुरी का आस्वादन करने लगे । इस मनमोहक दृश्य और अवसक का वर्णन शब्दों में करने में लेखनी असमर्थ है । भाव-विभोर होकर भक्त म्हालसापति तो मधुर नृत्य करने लगे, परन्तु बाबा की अभंग एकाग्रता देखकर सब भक्तों को महान् आश्चर्य होने लगा । एक हाथ में लालटेन लिये तात्या पाटील बाबा के बाँई ओर और आभूषण लिये म्हालसापति दाहिनी ओर चले । देखो तो, कैसे सुन्दर समारोह की शोभा तथा भक्ति का दर्शन हो रहा है । इस दृश्य की झाँकी पाने के लिये ही सहस्त्रों नर-नारी, क्या अमीर और क्या फकी, सभी वहाँ एकत्रित थे । अब बाबा मंद-मंद गति से आगे बढ़ने लगे और उनके दोनों ओर भक्तगम भक्तिभाव सहित, संग-संग चले लगे और चारों ओर प्रसन्नता का वातावरण दिखाई पड़ने लगा । सम्पूर्ण वायुमंडल भी खुशी से झूम उठा और इस प्रकार समारोह चावड़ी पहुँचा । अब वैसा दृश्य भविष्य में कोई न देख सकेगा । अब तो केवल उसकी याद करके आँखों के सम्मुख उस मनोरम अतीत की कल्पना से ही अपने हृदय की प्यास शान्त करनी पड़ेगी ।

चावड़ी की सजावट भी अति भी अति उत्तम प्रकार से की गई थी । उत्तम बढ़िया चाँदनी, शीशे और भाँति-भाँति के हाँड़ी-लालटेन (गैस बत्ती) लगे हुए थे । चावड़ी पहुँचने पर तात्या पाटील आगे बढ़े और आसन बिछाकर तकिये के सहारे उन्होंने बाबा को बैठाया । फिर उनको एक बढ़िया अँगरखा पहिनाया और भक्तों ने नाना प्रकार से उनकी पूजा की, उन्हें स्वर्ण-मुकुट धारण कराया, तथा फूलों और जवाहरों की मालाएँ उनके गले में पहिनाई । फिर ललाट पर कस्तूरी का वैष्णवी तिलक तथा मध्य में बिन्दी लगाकर दीर्घ काल तक उनकी ओर अपलक निहारते रहे । उनके सिर का कपड़ा बदल दिया गया और उसे ऊपर ही उठाये रहे, क्योंकि सभी शंकित थे कि कहीं वे उसे फेक न दे, परन्तु बाबा तो अन्तर्यामी थे और उन्होंने भक्तों को उनकी इच्छानुसार ही पूजन करने दिया । इन आभूषणों से सुसज्जित होने के उपरान्त तो उनकी शोभा अवर्णनीय थी ।

नानासाहेब निमोणकर ने वृत्ताकार एक सुन्दर छत्र लगाया, जिसके केंद्र में एक छड़ी लगी हुई थी । बापूसाहेब जोग ने चाँदी की एक सुन्दर थाली में पादप्रक्षालन किया और अघ्र्य देने के पश्चात् उत्तम विधि से उनका पूजन-अर्चन किया और उनके हाथों में चन्दन लगाकर पान का बीड़ा दिया । उन्हें आसन पर बिठलाया गया । फिर तात्या पाटील तथा अन्य सब भक्त-गण उनके श्री-चरणों पर अपने-अपने शीश झुकाकर प्रणाम करने लगे । जब वे तकिये के सहारे बैठ गये, तब भक्तगण दोनों ओर से चँवर और पंखे झलने लगे । शामा ने चिलम तैयार कर तात्या पाटील को दी । उन्होंने एक फूँक लगाकर चिलम प्रज्वलित की और उसे बाबा को पीने को दिया । उनके चिलम पी लेने के पश्चात फिर वह भगत म्हालसापति को तथा बाद में सब भक्तों को दी गई । धन्य है वह निर्जीव चिलम । कितना महान् तप है उसका, जिसने कुम्हार द्घार पहिले चक्र पर घुमाने, धूप में सुखाने, फिर अग्नि में तपाने जैसे अनेक संस्कार पाये । तब कहीं उसे बाबा के कर-स्पर्श तथा चुम्बन का सौभाग्य प्राप्त हुआ । जब यह सब कार्य समाप्त हो गया, तब भक्तगण ने बाबा को फूलमालाओं से लाद दिया और सुगन्धित फूलों के गुलदस्ते उन्हें भेंट किये । बाबा तो वैराग्य के पूर्ण अतार थे और वे उन हीरे-जवाहरात व फूलों के हारों तथा इस प्रकार की सजधज में कब अभिरुचि लेने वाले थे । परन्तु भक्तों के सच्चे प्रेमवश ही, उनके इच्छानुसार पूजन करने में उन्होंने कोई आपत्ति न की । अन्त में मांगलिक स्वर में वाघ बजने लगे और बापूसाहेब जोग ने बाबा की यथाविधि आरती की । आरती समाप्त होने पर भक्तों ने बाबा को प्रणाम किया और उनकी आज्ञा लेकर सब एक-एक करके अपने घर लौटने लगे । तब तात्या पाटील ने उन्हें चिनम पिलाकर गुलाब जल, इत्र इत्यादि लगाया और विदा लेते समय एक गुलाब का पुष्प दिया । तभी बाबा प्रेमपूर्वक कहने लगे के तात्या, मेरी देखभाल भली भाँति करना । तुम्हें घर जाना है तो जाओ, परन्तु रात्रि में कभी-कभी आकर मुझे देख भी जाना । तब स्वीकारात्मक उत्तर देकर तात्या पाटील चावड़ी से अपने घर चले गये । फिर बाबा ने बहुत सी चादरें बिछाकर स्वयं अपना बिस्तर लगाकर विश्राम किया ।

अब हम भी विश्राम करें और इस अध्याय को समाप्त करते हुये हम पाठकों से प्रार्थना करते है कि वे प्रतिदिन शयन के पूर्व श्री साईबाबा और चावड़ी समारोह का ध्यान अवश्य कर लिया करें ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

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Chavadi Procession

In this chapter Hemadpant after making some preliminary observations on some points of Vedanta, describes the Chavadi procession.

Preliminary

Blessed is Sai's life, blessed is His daily routine. His ways and actions are indescribable. Sometimes He was intoxicated with Brahmanand (divine joy), and at other times content with Self knowledge. Doing so many things sometimes, He was unconcerned with them. Though He seemed at times quite actionless (doing nothing) He was not idle or dozing; He always abided in His own Self. Though He looked calm and quiet as the placid sea, He was deep and unfathomable. Who can describe His ineffable nature? He regarded men as brothers, women as sisters and mothers. He was a perfect and perpetual celibate as everybody knows. May the understanding (knowledge), we got in His company, last long unto death. Let us ever serve Him with whole-hearted devotion to His feet. Let us see Him (God) in all beings and let us ever love His name.

Hemadpant, after making some lengthy dissertations on some topics of Vedanta, which he himself considers as a digression, goes on to describe the Chavadi procession.

Chavadi Procession

Baba's dormitory has been already described. One day He slept in the Masjid and on the next, in the Chavadi (a small building containing a room or two near the Masjid). This alternate sleeping in both these buildings went on till Baba's Mahasamadhi. From 10th December 1909 devotees began to offer regular worship to Baba in the Chavadi. This we will now describe with His grace. When the turn of retiring to the Chavadi came, people flocked to the Masjid and made bhajan in the mandap (courtyard) for a few hours. Behind them was a beautiful Ratha (small car), to the right a Tulsi-vrindavan and in front Baba, and between these the devotees fond of bhajan. Men and women who had a liking for the bhajan came in time. Some took Tal, Chiplis and Kartal, Mridang, Khanjiri and Ghol (all musical instruments) in their hands and conducted the bhajan. Sai Baba was the Magnet Who drew all the devotees to Him there. Outside in the open, some trimmed their divatyas, (torches), some decorated the palanquin, some stood with cane-sticks in their hands and uttered cries of victory to Baba. The corner was decorated with buntings. Round about the Masjid, rows of burning lamps shed their light. Baba's horse 'Shyamakarna' stood fully decorated outside. Then Tatya Patil came with a party of men to Baba and asked Him to be ready. Baba sat quiet in his place till Tatya came and helped Him to get up by putting his arm under Baba's arm-pit. Tatya called Baba by the name of Mama. Really their relationship was extremely intimate. Baba wore on his body the usual kafni, took His satka (short stick) under His arm-pit and after taking His chilim (tobacco-pipe) and tobacco and placing a cloth over His shoulder became ready to start. Then Tatya threw a golden-embroidered beautiful Shela (Shawl) over His body. After this Baba, moving a little the bundle of fuel-sticks lying behind with His right toe and then extinguishing the burning lamp with His right hand, started for the Chavadi. Then all sorts of muscial instruments, tashe, band and horns and mridang, gave out their different sounds; and fire-works exhibited their different and various coloured views. Men and women singing Baba's name started walking, making bhajan to the accompaniment of mridang and veena. Some danced with joy and some carried various flags and standards. The Bhaldars announced Baba's name when He came on the steps of the Masjid. On the two sides of Baba stood persons, who held chavaris and others who fanned Baba. On the way were spread folds of cloth on which Baba walked on, being supported by devotees' hands. Tatyaba held the left hand and Mhalasapati the right and Bapusaheb Jog held the chhatra (umbrella) over His head. In this fashion Baba marched on to the Chavadi. The fully decorated red horse, named Shyamakarna led the way and behind him were all the carriers, waiters, musical players and the crowd of devotees. Hari-nama (the name of the Lord) chanted to the accompaniment of music rent the skies as also the name of Sai. In this manner the procession reached the corner when all the persons that joined this party seemed well-pleased and delighted.

On coming to this corner Baba stood facing the Chavadi and shone with a peculiar lustre. It seemed, as if the face of Baba glittered like dawn, or like the glory of the rising sun. Baba stood there with a concentrated mind, facing the north, as if He was calling somebody. All the instruments played their music while Baba moved His right arm up and down for some time. Kakasaheb Dixit at this time came forward with a silver plate containing flowers besmeared with gulal (red powder) and threw them on Baba's body off and on. The musical instruments played their best at this juncture and Baba's face beamed with steady and added radiance and beauty, and all the persons drank this lustre to their hearts' content. Words fail to describe the scene and splendour of this occasion. Some times Mhalasapati began to dance being possessed or obsessed by some deity, but all were surprised to see that Baba's concentration was not in the least disturbed. With a lantern in his hand Tatya Patil walked on Baba's left side and Bhagat Mhalasapati on the right, holding with his hand the hem of Baba's garment. What a beautiful procession and what an expression of devotion! To witness this, men and women, poor and rich, flocked together there. Baba walked very slow. Bhaktas followed on both sides with love and devotion. With joy pervading the whole atmosphere of the place, the procession reached the Chavadi. That scene and those days are gone now. Nobody can see them now or in the future; still remembering and visualising that scene and sight, we can bring solace and comfort to our minds.

The Chavadi was also fully decorated with a good white ceiling, mirrors and many sorts of lamps. On reaching it Tatya went ahead and spread an asan and placing a bolster made Baba sit there and made Him wear good angaraksha (coat). Then the devotees worshipped Him in various ways. They put on His head a mugut (crown) with a tuft above, placed garlands of flowers and jewels round His neck and marking His forehead with musk-mixed vertical lines and a dot (as Vaishnava devotees do) they started at Him for long to their hearts' content. They changed His head-dress now and then and held it aloft on the head, fearing that Baba might throw it away. Baba knew the heart of them all and meekly submitted to all their methods without objection. With these decorations He looked wonderfully beautiful.

Nanasaheb Nimonkar held the Chhatra (umbrella) with its beautiful pendants which moved in a circle with its supporting stick. Bapusaheb Jog washed the feet of Baba in a silver dish and offered 'arghya' and worship with due formalities, then besmeared His arms with sandal paste, and offered tambul (betel-leaves). Baba sat on the asan (gadi), while Tatya and others kept standing and falling at His feet. When Baba sat on the gadi supporting Himself against the bolster, devotees on both sides waved chamars and fans. Shama then prepared the chillim and handed it over to Tatyaba who drew a flame out of it by his breath and then gave it to Baba. After Baba had His smoke, it was given to Bhagat Mhalasapati and then it was passed round to all. Blessed was the inanimate chillim. It had first to undergo many ordeals of penance, such as being treated by pot-makers, dried in the open sun and burnt in fire and then it had the good fortune to get the contact of Baba's hand and His kiss. After this function was over, devotees put garlands of flowers on His neck and gave Him nose-gays and bunches of flowers for smelling. Baba who was dispassion or non-attachment incarnate, cared a fig for all these necklaces of jewels, and garlands of flowers and other decorations; but out of real love to His devotees, He allowed them to have their own way and to please themselves. Finally Bapusaheb Jog waved the arati over Baba, observing all formalities, the musical instruments playing thier auspicious tunes. When this arati was over, the devotees returned home one by one saluting Baba and taking His leave. When Tatya Patil, after offering chillim, attar (scent) and rose-water, rose to depart, Baba said to him lovingly - "Guard Me, go if you like, but return sometimes at night and enquire after Me." Replying in the affirmative Tatyaba left the Chhavadi and went home. Then Baba Himself prepared His bed. He arranged 50 or 60 white chadders one upon another and thus making His bed, went to rest.

We shall also now take rest and close this chapter with a request to the readers that they should remember Sai Baba and His Chavadi procession daily before they retire and go to bed.

Bow to Shri Sai - Peace be to all

Wednesday, 21 December 2011

आन पधारो साईं राम , मेरे आँगन में

ॐ सांई राम
आन पधारो साईं राम , मेरे आँगन में
दर्शन दे दो साईं राम, मेरे आँगन में
मेरे आँगन में - मेरे आँगन में
गंगा के जल से साईं को नहलाऊं
चोला सुनहरा बाबा को पहनाऊं
हो जाओ शोभायमान, मेरे आँगन में
मेरे आँगन में - मेरे आँगन में
तेरी शिर्डी में बाबा धूम मची है
द्वारका माई में रौनक लगी है
ऐसी रौनक लगे साईं राम , मेरे आँगन में
मेरे आँगन में - मेरे आँगन में
मेघा को शिव के दरस कराये
दास गणु जी गंगा नहाये
बन के आओ प्रभू तुम राम, मेरे आंगन में
मेरे आँगन में - मेरे आँगन में
मेरे साईं तूने माँ बायजा को तारा
शामा के तन से ज़हर को उतारा
तारो मुझको भी किरपा निधान , मेरे आँगन में
मेरे आँगन में - मेरे आँगन में
बहन रविंदर जी की प्रस्तुति
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