शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Friday, 19 May 2017

श्री साईं लीलाएं - घोड़े की लीद का रहस्य

ॐ सांई राम



परसों हमने पढ़ा था.. धर्मग्रंथ गुरु के बिना पढ़ना बेकार है    

श्री साईं लीलाएं
घोड़े की लीद का रहस्य

अनंतराव पाटणकर पूना के रहनेवाले थे| उन्होंने वेद और उपनिषदों का अध्ययन कर लिया था| उनका तत्वज्ञान भी समझ लिया था| लेकिन इतना सब करने के बाद भी उनका मन शांत न था|

उनके मन में साईं बाबा के दर्शन करने की प्रबल इच्छा थी| बाद में उन्होंने शिरडी में जाकर साईं बाबा के दर्शन किये, तो उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई| बाबा की चरणवंदना करने के बाद वे बाबा से बोले - "बाबा ! मैंने वेद, पुराण, उपनिषद् आदि अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया है, सुना भी है लेकिन मेरे मन को शांति नहीं मिली| इसलिए मेरी सारी मेहनत करनी व्यर्थ हो रही है| यह मैं समझ भी गया हूं| इसीलिए मैं आपकी शरण में आया हूं, अब आप ही  मुझे कोई रास्ता बताइये और मेरे मन को शांति मिले, ऐसा आप आशीर्वाद भी दीजिये|"

तब साईं बाबा ने उसे एक कथा सुनायी| जो इस प्रकार है - "एक बार एक सौदागर यहां आया था| उसकी घोड़ी ने उसके सामने ही लीद के नौ गोले डाल दिये| सौदागर बहुत जिज्ञासु प्रवृति था| उसने तुरंत दौड़कर अपनी धोती का एक छोर बिछाकर उसने लीद के वे नौ गोले रख लिए| इससे उसके मन को बड़ी शांति मिली|" इतना कहकर बाबा चुप हो गये|

पाटणकर ने इस पर बहुत सोच-विचार किया, परन्तु वह इस कथा का मर्म समझने में असफल ही रहे| उन्होंने दादा केलकर से इस कथा का अर्थ समझाने का निवेदन किया| इस पर दादा केलकर ने कहा, बाबा जो कुछ भी कहते हैं उसका अर्थ ठीक से मैं भी नहीं समझ पाता हूं| फिर भी बाबा ने जो कुछ कहा और जितना मैं समझ पाया हूं, वह मैं तुम्हें बताता हूं| वे बोले कि घोड़ी से अर्थ है - परमात्मा की कृपा| नौ गोलों का अर्थ है - नवद्या भक्ति| नवद्या भक्ति इस प्रकार से है - श्रवण, कीर्तन, नामस्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वंदन, सेवा, संयम व आत्म-निवेदन| यही भक्ति के नौ प्रकार हैं|

जब तक इनमें किस भी भक्ति के द्वारा स्वयं को परमात्मा से जोड़ा न जाए, तो वह कृपा नहीं करता| जब तक मन में ईश्वर के प्रति भक्ति और प्रेम-भाव नहीं रहेगा| तब तक जब, तप, व्रत, योग, वेद-पुराण आदि पढ़ना-पढ़ाना सब व्यर्थ है| देवता प्यार के भूखे होते हैं, बिना लगन से किया हुआ भजन देवता को आकर्षित नहीं कर सकता - और जो ईश्वर से प्रेम करता है, उसे फिर किसी साधन की आवश्यकता नहीं पड़ती| इन नौ साधनों में से किसी एक पर मन से किया गया प्रयास ही पर्याप्त है| ईश्वर उसी से संतुष्ट होता है| ईश्वरभक्ति ही सर्वोपरि है| सबके प्रति मन में प्रेमभाव रखोगे तो मन शांत होगा| स्वयं को सौदागर की उत्सुकतापूर्वक सत्य को खोजकर नवद्या भक्ति को पा जाओ| तभी मन स्थिर होकर मानसिक शांति मिलेगी| बाबा ने तुम्हें यही भक्ति का संदेश दिया है|" दादा से यह सब सुनकर पाटणकर खुश हो गये|

दूसरे दिन जब पाटणकर बाबा के दर्शन करने मस्जिद गये तो बाबा ने पूछा - "क्यों, क्या तुमने लीद के नौ गोले बांध लिये?" बाबा के इस प्रश्न का संकेत समझकर पाटणकर बोले - "बाबा ! आपकी कृपा के बिना यह कैसे संभव हो सकता है?" इस पर बाबा हँस पड़े और उसका कल्याण हो, इसके लिए बाबा ने आशीर्वाद दिया| पाटणकर ने बाबा के श्रीचरणों पर अपना सिर झुका दिया|

कल चर्चा करेंगे..लोग दक्षिणा भी देते थे और गालियाँ भी       

ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

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