शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 13 March 2021

श्री गुरु हरिराय जी – साखियाँ - भाई भगतु व भाई फेरु की वार्ता

 ॐ साँई राम जी




श्री गुरु हरिराय जी-साखियाँ-भाई भगतु व भाई फेरु की वार्ता

भाई भगतु गुरु घर का सेवक था| जब गुरु हरि राय जी गुरु गद्दी पर बैठे तो कुछ समय बाद भगतु जी ने प्रार्थना की कि महाराज! सेवा के बिना मनुष्य की आयु बेकार है इसलिए मुझे कोई सेवा दो| गुरु जी हँस कर कहने लगे कि अब आप बहुत वृद्ध हो गए हो| अपने मनोरंजन के लिए कोई चरखा लाओ|

भगतु कहने लगे महाराज! जैसे आपकी इच्छा है वैसे सेवा बक्शो| परन्तु मुझे सेवा जरूर दो| गुरु जी प्रसन्न होकर कहने लगे तुम गुरु के लंगर के लिए खेती कराओ| गुरु की आज्ञा आते ही भगतु जी ने कर्मचारी और बैल तैयार करवाकर धरती जो जोता और बीज डाल दिया और संभाल करनी शुरू कर दी|

एक दिन खेत में काम करने वाले वालों ने कहा,भाई जी! रोटी हमें घी के साथ अच्छी तरह से दो| हम और भी अधिक उत्साह से काम करेंगे| भाई जी ने जब उनकी बात सुनी तो इधर उधर देखने लगे| उधार से एक फेरी वाला जा रहा था जिसके पास नमक,मिर्च,गुड़,घी इत्यादि था| उसको बुलाकर भाई जी कहने लगे इनको रोटी के साथ जितना घी चाहिए उतना दे दो| इस घी का मूल्य हमसे कल ले लेना| तब फेरी वाले ने काम करने वालो को अपनी कुपी में से एक एक पली घी दे दिया|

फेरी वाले ने घर जाकर घी वाली कुपी जिसमे थोड़ा सा घी बचा था, खूंटी पर टांग दिया| सुबह उठकर जब कुप्पी को तोलकर देखने लगा कि श्रमिकों को कितना घी खिलाया है| जिसके पैसे भगतु से लेने हैं| उसने जैसे ही कुप्पी को देखा व घी से लबा लब भरी हुई थी| यह कौतक देखकर फेरी वाला भगतु जी के पास गया और उनके पैरों में माथा टेका और कहने लगा कि मुझे अपना सिख बनाओ| भाई भगतु ने जब उसकी श्रद्धा देखी तो व उसे गुरु दरबार पर ले गया| भाई भगतु को देखकर गुरु जी कहने लगे परोपकारी भगतु किसको साथ लायेहो? भाई भगतु ने सारी बात बताई और यह भी कहा कि यह आपका सिख बनना चाहता है|

गुरु जी फेरी वाले से पूछने लगे कि आपका क्या नाम है और क्या करते हो| उसने कहा महाराज! मेरा नाम संगत है मैं फेरी लगाने का काम करता हूँ| गुरु जी ने वचन किया कि तू फेरी करता हुआ हमारी शरण में आया है इसलिए आज से तेरा नाम फेरु है| गुरु जी ने उसको अपना चरणामृत देकर सिख बना लिया और वचन किया फेरी का काम छोडकर सतिनाम का सिमरन किया और देग चलाया करो तुम्हें कभी कमी नहीं आएगी| इस प्रकार फेरु जी ने गुरु जी का वचन मानकर अपना ध्यान सतिनाम की याद में लगा दिया और तन मन से देग की कार चलाने लग गए|

Friday, 12 March 2021

श्री गुरु हरिराय जी-साखियाँ-भगत भगवान की वार्ता

 ॐ साँई राम जी




श्री गुरु हरिराय जी-साखियाँ-भगत भगवान की वार्ता

एक भगवान गिर सन्यासी साधु ने गुरु की बहुत महिमा सुनी कि आप ईश्वर अवतार हैं| मन में यह धारणा लेकर गुरु दर्शन के लिए आ गए कि अगर गुरु सच्चा है तो यह मुझे चतुर्भुज रूप में दर्शन देंगे| मैं तब ही इन्हें सच्चा ईश्वर का अवतार मानूंगा|

मन में यह भाव लिए जब भगवान गिर गुरु के दरबार में पहुँचे तो उनकी हैरानी की सीमा ना रही| वह अपनी सुध-बुध खो बैठे| वह पत्थर की मूर्ति बनकर कुछ समय वही खड़े रहे| उन्होंने देखा कि संगत बैठी है कीर्तन भी चल रहा है| एक चतुर्भुज स्याम मूर्ति चक्कर सिंघासन के ऊपर सुशोभित है| यह सब देखकर अपनी चेतना को कायम करते हुआ उसने गुरु के चरणों में डन्डवत होकर माथा टेका जब उठकर देखा गुरु जी अपने गुरु स्वरुप में दर्शन दे रहे हैं| भगत भगवान यह कौतक देखकर बहुत प्रभावित हुए और कहने लगे कि महाराज! मुझे अपना सिख बनाकर उपदेश दो|

गुरु जी ने उसकी श्रद्धा भक्ति देखकर चरणामृत दिया और सतिनाम का उपदेश दिया और वचन किया - "भक्त भगवान दर सहि परवान" यह उपदेश और वरदान लेकर भगत भगवान ने सिखी का खूब प्रचार किया|

Thursday, 11 March 2021

श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 47 - पुनर्जन्म

 ॐ सांई राम जी 



आप सभी  को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं , हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम  घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...

श्री साँई सच्चरित्र - अध्याय 47 - पुनर्जन्म 
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वीरभद्रप्पा और चेनबसाप्पा (सर्प व मेंढ़क) की वार्ता ।

गत अध्याय में बाबा द्घारा बताई गई दो बकरों के पूर्व जन्मों की वार्ता थी । इस अध्याय मे कुछ और भी पूर्व जन्मों की स्मृतियों का वर्णन किया जाता है । प्रस्तुत कथा वीरभद्रप्पा और चेनवसाप्पा के सम्बन्ध में है।

प्रस्तावना
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हे त्रिगुणातीत ज्ञानावतार श्री साई । तुम्हारी मूर्ति कितनी भव्य और सुन्दर है । हे अन्तयार्मिन । तुम्हारे श्री मुख की आभा धन्य है । उसका क्षणमात्र भी अवलोकन करने से पूर्व जन्मों के समस्त दुःखों का नाश होकर सुख का द्घार खुल जाता है । परन्तु हे मेरे प्यारे श्री साई । यदि तुम अपने स्वभाववश ही कुछ कृपाकटाक्ष करो, तभी इसकी कुछ आशा हो सकती है । तुम्हारी दृष्टिमात्र से ही हमारे कर्म-बन्धन छिन्न-भिन्न हो जाते है और हमें आनन्द की प्राप्त हो जाती है । गंगा में स्नान करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते है, परन्तु गंगामाई भी संतों के आगमन की सदैव उत्सुकतापूर्वक राह देखा करती है कि वे कब पधारें और मुझे अपनी चण-रज से पावन करें । श्री साई तो संत-चूडामणि है । अब उनके द्घारा ही हृदय पवित्र बनाने वाली यह कथा सुनो ।

सर्प और मेंढ़क 
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श्री साई बाबा ने कहा – एक दिन प्रातःकाल 8 बजे जलपान के पश्चात मैं घूमने निकला । चलते-चलते मैं एक छोटी सी नदी के किनारे पहुँचा । मैं अधिक थक चुका था, इस काण वहाँ बैठकर कुछ विश्राम करने लगा । कुछ देर के पश्चात् ही मैंने हाथ-पैर धोये और स्नान किया । तब कहीं मेरी थकावट दूर हुई और मुझे कुछ प्रसन्नता का अनुभव होने लगा । उस स्थान से एक पगडंडी और बैलगाड़ी के जाने का मार्ग था, जिसके दोनों ओर सघन वृक्ष थे । मलय-पवन मंद-मंद वह रहा था । मैं चिलम भर ही रहा था कि इतने में ही मेरे कानों में एक मेंढ़क के बुरी तरह टर्राने की ध्वनि पड़ी । मैं चकमक सुलगा ही रहा था कि इतने में एक यात्री वहाँ आया और मेरे समीप ही बैठकर उसने मुझे प्रणाम किया और घर पर पधारकर भोजन तथा विश्राम करने का आग्रह करने लगा । उसने चिलम सुलगा कर मेरी ओर पीने कि लिये बढ़ाई । मेंढ़क के टर्राने की ध्वनि सुनकर वह उसका रहस्य जानने के लिये उत्सुक हो उठा । मैंने उसे बतलाया कि एक मेंढक कष्ट में है, जो अपने पूर्व जन्म के कर्मों का फल भोग रहा है । पूर्व जन्म के कर्मों का फल इस जन्म में भोगना पड़ता है, अतः अब उसका चिल्लाना व्यर्थ है । एक कश लेकर उसने चिलम मेरी ओर बढ़ाई । थोड़ा देखूँ तो, आखिर बात क्या है । ऐसा कहकर वह उधर जाने लगा । मैंने उसे बतलाया कि एक बड़े साँप ने एक मेंढ़क को मुँह में दबा लिया है, इस कारण वह चिल्ला रहा है । दोनों ही पूर्व जन्म में बड़े दुष्ट थे और अब इस शरीर में अपने कर्मों का फल भोग रहे है । आगन्तुक ने घटना-स्थल पर जाकर देखा कि सचमुच एक बड़े सर्प ने एक बड़े मेंढ़क को मुँह में दबा रखा है ।

उसने वापस आकर मुझे बताया कि लगभग घड़ी-दो घड़ी में ही साँप मेंढ़क को निगल जायेगा । मैंने कहा – नहीं, यह कभी नहीं हो सकता, मैं उसका संरक्षक पिता हूँ और इस समय यहाँ उपस्थित हूँ । फिर सर्प की क्या सामर्थ्य है कि मेंढ़क को निगल जाय । क्या मैं व्यर्थ ही यहाँ बैठा हूँ । देखो, मैं अभी उसकी किस प्रकार रक्षा करता हूँ । दुबारा चिलम पीने के पश्चात् हम लोग उस स्थान पर गये । आगन्तुक डरने लगा और उसने मुझे आगे बढ़ने से रोका कि कहीं सर्प आक्रमण न कर दे । मैं उसकी बात की उपेक्षा कर आगे बढ़ा और दोनों से कहने लगा कि अरे वीरभद्रप्पा । क्या तुम्हारे शत्रु को पर्याप्त फल नहीं मिल चुका है, जो उसे मेंढ़क की और तुम्हें सर्प की योनि प्राप्त हुई है । अरे अब तो अपना वैमनस्य छोड़ो । यही बड़ी लज्जाजनक बात है । अब तो इस ईर्ष्या को त्यागो और शांति से रहो । इन शब्दों को सुनकर सर्प ने मेंढ़क को छोड़ दिया और शीघ्र ही नदी में लुप्त हो गया । मेंढ़क भी कूदकर भागा और झाड़ियों में जा छिपा ।

उस यात्री को बड़ा अचम्भा हुआ । उसकी समझ में न आया कि बाबा के शब्दों को सुनकर साँप ने मेंढ़क को क्यों छोड़ दिया और वीरभद्रप्पा व चेनबसाप्पा कौन थे । उनके वैमनस्य का कारण क्या था । इस प्रकार के विचार उसके मन में उठने लगे । मैं उसके साथ उसी वृक्ष के नीचे लौट आया और धूम्रपान करने के पश्चात उसे इसका रहस्य सुनाने लगा :-

मेरे निवासस्थान से लगभग 4-5 मील की दूरी पर एक पवित्र स्थान था, जहाँ महादेव का एक मंदिर था । मंदिर अत्यन्त जीर्ण-शीर्ण स्थिति में था, सो वहाँ के निवासियों ने उसका जीर्णोद्घार करने के हेतु कुछ चन्दा इकट्ठा किया । पर्याप्त धन एकत्रित हो गया और वहाँ नित्य पूजन की व्यवस्था कर मंदिर के निर्माण की योजनायें तैयार की गई । एक धनाढ़य व्यक्ति को कोषाध्यक्ष नियुकत कर उसको समस्त कार्य की देख-भाल का भार सौंप दिया गया । उसको कार्य, व्यय आदि का यथोचित विवरण रखकर ईमानदारी से सब कार्य करना था । सेठ तो एक उच्च कोटि का कंजूस था । उसने मरम्मत में अत्यन्त अल्पराशि व्यय की, इस कारण मंदिर का जीर्णोद्घार भी उसी अनुपात में हुआ । उसने सब राशि व्यय कर दी तथा कुछ अंश स्वयं हड़प लिया और उसने अपनी गाँठ से एक पाई भी व्यय न की । उसकी वाणी अधिक रसीली थी, इसलिये उसने लोगों को किसी प्रकार समझा-बुझा लिया और कार्य पूर्ववत् ही अधूरा रह गया । लोग फिर संगठित होकर उसके पास जाकर कहने लगे – सेठ साहेब । कृपया कार्य शीघ्र पूर्ण कीजिये । आपके प्रत्यन के अभाव में यह कार्य पूर्ण होना कदापि संभव नहीं । अतः आप पुनः योजना बनाइये । हम और भी चन्दा आपको वसूल करके देंगे । लोगों ने पुनः चन्दा एकत्रित कर सेठ को दे दिया । उसने रुपये तो ले लिये, परन्तु पूर्ववत् ही शांत बैठा रहा । कुछ दिनों के पश्चात् उसकी स्त्री को भगवान् शंकर ने स्वप्न दिया कि उठो और मंदिर पर कलश चढ़ाओ । जो कुछ भी तुम इस कार्य में व्यय करोगी, मैं उसका सौ गुना अधिक तुम्हें दूँगा । उसने यह स्वप्न अपने पति को सुना दिया । सेठ बयभीत होकर सोचने लगा कि यह कार्य तो ज्यादा रुपये खर्च कराने वाला है, इसलिये उसने यह बात हँसकर टाल दी कि यह तो एक निरा स्वप्न ही है और उस पर भी कहीं विश्वास किया जा सकता है । यदि ऐसा होता तो महादेव मेरे समक्ष ही प्रगट होकर यह बात मुझसे न कह देते । मैं क्या तुमसे अधिक दूर था । यह स्वप्न शुभदायक नहीं । यह तो पति-पत्नी के सम्बन्ध बिगाड़ने वाला है । इसलिये तुम बिलकुल शांत रहो । भगवान् को ऐसे द्रव्य की आवश्यकता ही कहाँ, जो दानियों की इच्छा के विरुदृ एकत्र किया गया हो । वे तो सदैव प्रेम के भूखे है तथा प्रेम और भक्तिपूर्वक दिये गये एक तुच्छ ताँबे का सिक्का भी सहर्ष स्वीकार कर लेते है । महादेव ने पुनः सेठानी को स्वप्न में कह दिया कि तुम अपने पति की व्यर्थ की बातों और उनके पास संचित धन की ओर ध्यान न दो और न उनसे मंदिर बनवाने के लिये आग्रह ही करो । मैं तो तुम्हारे प्रेम और भक्ति का ही भूखा हूँ । जो कुछ भी तुम्हारी व्यय करने की इच्छा हो, सो अपने पास से करो । उसने अपने पति से विचार-विनिमय करके अपने पिता से प्राप्त आभूषणों को विक्रय करे का निश्चय किया । तब कृपण सेठ अशान्त हो उठा । इस बार उसने भगवान् को भी धोखा देने की ठान ली । उसने कौड़ी-मोल केवल एक हजार रुपयों में ही अपनी पत्नी के समस्त आभूषण स्वयं खरीद डाले और एक बंजर भूमि का भाग मंदिर के निमित्त लगा दिया, जिसे उसकी पत्नी ने भी चुपचाप स्वीकार कर लिया । सेठ ने जो भूमि दी, वह उसकी स्वयं की न थी, वरन् एक निर्धन स्त्री दुबकी की थी, जो इसके यहाँ दो सौ रुपयों में गहन रखी हुई थी । दीर्घकाल तक वह ऋण चुकाकर उसे वापस न ले सकी, इसलिये उस धूर्त कृपण ने अपनी स्त्री, दुबकी और भगवान को धोखा दे दिया । भूमि पथरीली होने के कारण उसमें उत्तम ऋतु में भी कोई पैदावार न होती थी । इस प्रकार यह लेन-देन समाप्त हुआ । भूमि उस मंदिर के पुजारी को दे दी गई, जो उसे पाकर बहुत प्रसन्न हुए ।

कुछ समय के पश्चात् एक विचित्र घटना घटित हुई । एक दिन बहुत जोरों से झंझावात आया और अति वृष्टि हुई । उस कृपण के घर पर बिजली गिरी और फलस्वरु पति-पत्नि दोनों की मृत्यु हो गई । दुबकी ने भी अंतिम श्वास छोड़ दी । अगले जन्म में वह कृपण मथुरा के एक ब्राहमण कुल में उत्पन्न हुआ और उसका नाम वीरभद्रप्पा रखा गया । उसकी धर्मपत्नी उस मंदिर के पुजारी के घर कन्या होकर उत्पन्न हुई और उसका नाम गौरी रखा गया । दुबकी पुरुष बनकर मंदिर के गुरव (सेवक) वंश में पैदा हुई और उसका नाम चेनबसाप्पा रखा गया । पुजारी मेरा मित्र था और बहुधा मेरे पास आता जाता, वार्तालाप करता और मेरे साथ चिलम पिया करता था । उसकी पुत्री गौरी भी मेरी भक्त थी । वह दिनोंदिन सयानी होती जा रही थी, जिससे उसका पिता भी उसके हाथ पीले करने की चिंता में रहता था । मैंने उससे कहा कि चिंता की कोई आवश्यकता नहीं, वर स्वयं तुम्हारे घर लड़की की खोज में आ जायेगा । कुछ दिनों के पश्चात् ही उसी की जाति का वीरभद्रप्पा नामक एक युवक भिक्षा माँगते-माँगते उसके घर पहुँचा । मेरी सम्मति से गौरी का विवाह उसके साथ सम्पन्न हो गया । पहले तो वह मेरा भक्त था, परन्तु अब वह कृतघ्न बन गया । इस नूतन जन्म में भी उसकी धन-तृष्णा नष्ट न हुई । उसने मुझसे कोई उघोग धंधा सुझाने को कहा, क्योंकि इस समय वह विवाहित जीवन व्यतीत कर रहा था । तभी एक विचित्र घटना हुई । अचानक ही प्रत्येक वस्तुओं के बाव ऊँचे चढ़ गये । गौरी के भाग्य से जमीन की माँग अधिक होने लगी और समस्त भूमि एक लाख रुपयों में आभूषणों के मूल्य से 100 गुना अधिक मूल्य में बिक गई । ऐसा निर्णय हुआ कि 50 हजार रुपये नगद और 2000 रुपये प्रतिवर्ष किश्त पर चुकता कर दिये जायेंगे । सबको यह लेनदेन स्वीकार था, परन्तु धन में हिससे के कारण उनमें परस्पर विवाद होने लगा । वे परामर्श लेने मेरे पास आये और मैंने कहा कि यह भूमि तो भगवान् की है, जो पुजारी को सौंपी गई थी । इसकी स्वामिनी गौरी ही है और एक पैसा भी उसकी इच्छा के विरुदृ खर्च करना उचित नहीं तथा उसके पति का इस पर कोई अधिकार नहीं है । मेरे निर्णय को सुनकर वीरभद्रप्पा मुझसे क्रोधित होकर कहने लगा कि तुम गौरी को फुसाकर उसका धन हड़पना चाहते हो । इन शब्दों को सुनकर मैं बगवत् नाम लेकर चुप बैठ गया । वीरभद्र ने अपनी स्त्री को पीटा भी  । गौरी ने दोपहर के समय आकर मुझसे कहा कि आप उन लोगों के कहने का बुरा न मानें । मैं तो आपकी लड़की हूँ । मुझ पर कृपादृष्टि ही रखें । वह इस प्रकार मेरी सरण मे आई तो मैंने उसे वचन दे दिया कि मैं सात समुद्र पार कर भी तुम्हारी रक्षा करुँगा । तब उस रात्रि को गौरी को एक दृष्टांत हुआ । महादेव ने आकर कहा कि यह सब सम्पत्ति तुम्हारी ही है और इसमें से किसी को कुछ न दो । चेनबसाप्पा की यह सलाह से कुछ राशि मंदिर के कार्य के लिये खर्च करो । यदि और किसी भी कार्य में तुम्हे खर्च करने की इच्छा हो तो मसजिद में जाकर बाबा (स्वयं मैं) के परामर्श से करो । गौरी ने अपना दृष्टांत मुझे सुनाया और मैंने इस विषय में उचित सलाह भी दी । मैंने उससे कहा कि मूलधन तो तुम स्वयं ले लो और ब्याज की आधी रकम चेनबसाप्पा को दे दो । वीरभद्र का इसमें कोई सम्बन्ध नहीं है । जब मैं यह बात कर ही रहा था, वीरभद्र और चेनबसाप्पा दोनों ही वहाँ झगड़ते हुए आये । मैंने दोनों को शांत करने का प्रयत्न किया और गौरी को हुआ महादेव का स्वप्न भी सुनाया । वीरभद्र क्रोध से उन्हत हो गया और चेनबसाप्पा को टुकड़े-टुकड़े कर मार डालने की धमकी देने लगा । चेनबसाप्पा बड़ा डरपोक था । वह मेरे पैर पकड़कर रक्षा की प्रार्थना करने लगा । तब मैंने शत्रु के पाश से उसका छुटकारा करा दिया । कुछ समय पश्चात् ही दोनों की मृत्यु हो गई । वीरभद्र सर्प बना और चेनबसाप्पा मेंढ़क । चेनबासप्पा की पुकार सुनकर और अपने पूर्व वचन की स्मृति करके यहाँ आया और इस तरह से उसकी रक्षा कर मैंने अपने वचन पूर्ण किये । संकट के समय भगवान् दौड़कर अपने भक्त के पास जाते है । उसने मुझे यहाँ भेजकर चेनबसाप्पा की रक्षा कराई । यह सब ईश्वरीय लीला ही है ।

शिक्षा
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इस कथा की यही शिक्षा है कि जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है, जब तक कि भोग पूर्ण नहीं होते । पिछला ऋण और अन्य लोगों के साथ लेन-देन का व्यवहार जब तक पूर्ण नहीं होता, तब तक छुटकारा भी संभव नहीं है । धनतृष्णा मनुष्य का पतन कर देती है और अन्त में इससे ही वह विनाश को प्राप्त होता है ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।



-: आज का साँईं सन्देश :-
सागर में दीपक जले,
नाविक राह दिखाय ।
साँईं बाबा चरित सुन,
भवसागर तर जाय ।।
साँईं बाबा का चरित,
अमरित पावन होय ।
भाव बन्धन से मुक्त कर,
मोक्ष प्रदाता होय ।।   
 

Wednesday, 10 March 2021

श्री गुरु हरिराय जी – साखियाँ - एक माई की श्रद्धा पूरी करनी

  ॐ साँई राम जी





 श्री गुरु हरिराय जी-साखियाँ-एक माई की श्रद्धा पूरी करनी

एक बजुर्ग माई जो कि निर्धन थी| उसके मन में यह भाव था कि गुरु जी उसके हाथ का तैयार किया हुआ भोजन खाये| जिस दिन गुरु जी उसके हाथ का बना भोजन खायेगें वह किसमत वाली हो जायेगी| उसने मेहनत मजदूरी करके कुछ पैसे जोड़ लिए और गुरु जी के भोजन के लिए रसद भी तैयार करके रख ली|

एक दिन उसने स्नान करके रसोई का लेप किया और गुरु जी के लिए भोजन तैयार करने लगी| मन में उसके श्रद्धा भाव था कि गुरु जी मेरा भोजन अवश्य ग्रहण करेगें| उसने दो रोटियाँ तैयार करके उसके ऊपर घी, चीनी डालकर साफ कपड़े में लपेट लिया और गुरु दरबार की और चल पड़ी| लेकिन मन में बार बार यही भाव थे कि वह किस तरह कपड़े में लपेटा हुआ भोजन गुरु जी को देगी|

उधर गुरु जी ने माई की प्रार्थना सुन ली और उसकी श्रधा को देखकर दीवान से उठ गए| उन्होंने जल्दी जल्दी घोड़ा तैयार करवाया और शिकार के बाहने उधर ही चाल पड़े जिस तरफ से गरीब माई गुरु-गुरु का जाप करते हुए आ रही थी| जब माई ने देखा कि गुरु जी कुछ सिखो के साथ घोड़े पर सवार होकर इधर ही आ रहे हैं तो वह एक तरफ खड़ी हो गई|

माई को एक तरफ खड़ी देखकर गुरु जी ने घोड़ा उसके पास जाकर ही खड़ा कर दिया और कहने लगे - "माई हमे बहुत भूख लगी है हमें रोटी दो|" यह वचन सुनते ही माई ने कपड़े में लपेटी हुई रोटी दोनों हाथों से गुरु जी के आगे कर दी| गुरु जी ने कपड़े में से रोटी निकाली और हाथ के ऊपर रखकर खाने लगे| साथ-साथ गुरु जी ने कहना शुरू किया कि यह भोजन बहुत स्वाद है, हमें बहुत आनन्द आया है| गरीब माई की आँखों से आंसू बहने लगे|

गुरु जी ने भोजन किया और कपड़ा वापिस माई को दे दिया| गुरु जी ने वचन किया कि माई तू निहाल हो गई है| तब माई ने गुरु के चरणों पर माथा टेका और उनकी महिमा गाती हुई घर की और चल दी|

Tuesday, 9 March 2021

′′ साईं बाबा ′′ - श्रद्धा और सबुरी 15 मार्च से हर रात 8 बजे

′′ साईं बाबा ′′ - श्रद्धा और सबुरी 15 मार्च से हर रात 8 बजे हमारी एकमात्र मराठी #Abhiman भाषा विरासत कला पर
आज हम अपनी श्रृंखला ′′ साई बाबा ′′ का शीर्षक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं श्रद्धा और सबुरी



 

श्री गुरु हरिराय जी – साखियाँ - शाहजहाँ के बेटे (दारा शिकोह) को स्वस्थ करना

  ॐ साँई राम जी


श्री गुरु हरिराय जी-साखियाँ-शाहजहाँ के बेटे (दारा शिकोह) को स्वस्थ करना

शाहजहाँ के बेटे का नाम दारा शिकोह था| शाहजहाँ अपने बड़े पुत्र को ताज़ देना चाहता था| परन्तु इसका तीसरा लड़का औरंगजेब अपने भाई से इर्ष्या करता था जिसके कारण औरंगजेब ने रसोइए की ओर से शेर की मूंछ का बल अथवा कोई जहरीली चीज़ खिला दी जिससे दारा शिकोह बीमार हो गया| बादशाह ने उसका बहुत इलाज़ करवाया परन्तु दारा शिकोह ठीक ना हुआ|

शाहजहाँ ने देश के सभी हकीमो को बुलाकर पूछा तब उन्होंने उसकी बीमारी को देखकर बताया कि एक लौंग जिसका वजन एक माशा हो ओर एक हरढ़ जुसका वज़न १४ सिरसाही हो रगड़कर कर शाहिजादे को दिए जाए तब शेर का बल अथवा कोई ऐसी जहरीली चीज़ बाहर निकाल आएगी और शाहिजादा स्वस्थ हो जाएगा| राजे ने वैसा ही किया जैसे हकीमो ने बोला था| बादशाह ने सारे देश में अपने आदमी भेजे परन्तु यह चीजे कहीं ना मिली| बादशाह चिंता में पड़ गए| तब वजीर खाँ ने बताया बादशाह! मुझे किसी सिख से पता चला है यह दोनों चीजे इस मात्र की गुरु नानक जी की गद्दी पर विराजमान गुरु हरि राय जी के पास हैं अगर आप चाहे तो उनसे मंगवा को|

बादशाह ने अपने दो अहिलकर गुरु जी के पास चिट्ठी देकर भेजे और प्रार्थना की कि यह दोनों चीजे दे दो आपकी बड़ी कृपा होगी| यह चिट्ठी पढ़कर गुरु जी ने अपने तोशेखाने में से हरढ़ और लौंग मँगवाकर उन्हें दे दी| जब यह दोनों चीजे रगड़कर हकीमो ने दारा शिकोह को दी तो वह थोड़े दिनों में ही स्वस्थ हो गया| बादशाह और उसके दरबारियों ने गुरु घर की बहुत महिमा की और उनकी प्रसन्नता का ठिकाना ना रहा|

Monday, 8 March 2021

श्री गुरु हरिराय जी – साखियाँ - भाई जीवन को वरदान देना

ॐ साँई राम जी




 श्री गुरु हरिराय जी-साखियाँ-भाई जीवन को वरदान देना

करतारपुर में एक ब्राहमण का इकलौता लड़का मर गया| लड़के के माता-पिता गुरु हरि राय जी के पास आ गए और कहने लगे कि हमारे पुत्र को जीवित कर दो| नहीं तो हम भी आपके द्वार पर प्राण त्याग देंगे| तब गुरु जी ने कहा अगर कोई इस लड़के कि जगह प्राण देगा तो यह जीवित हो जाएगा| गुरु जी का यह वचन सुनकर जब उसके माँ-बाप भी प्राण देने को तैयार ना हुए तो उनकी कुरलाहट पर तरस करके भाई जीवन से सोचा एक दिन तो मरना ही है तो फिर क्यों ना गुरु के हुकम के अनुसार ही प्राण त्यागे जाए और जीवन सफल हो जाए| यह सोच कर भाई जीवन ने डेरे जाकर कपड़ा बिछाया और ऊपर लेटकर अपने प्राण त्याग दिए| इधर जैसे ही भाई जीवन ने प्राण त्यागे उधर ब्राहमण का पुत्र जीवित हो गया|

भाई का ऐसा बलिदान देखकर सबने उन्हें धन्य कहा| गुरु जी ने भाई जीवन का संस्कार भाई भगतु की शमशान भूमि के पास ही कराया और वचन दिया कि जीवन का निवास गुरु के चरणों में होगा| जब गुरु जी को यह पता लगा कि भाई जीवन की स्त्री गर्भवती है तो अपने वचन दिया कि इसको लड़का होगा जिसका वंश बहुत बड़ेगा| इस तरह गुरु जी ने भाई जीवन की प्रशंसा की और उसे वरदान देकर सबको धैर्य दिया| इस प्रकार भाई जीवन ने गुरु का हुकम मानकर अपना जीवन सफल किया और अपने वंश के लिए वरदान प्राप्त किया|

Sunday, 7 March 2021

श्री गुरु हरिराय जी – साखियाँ - काले के भतीजे को वरदान देना

  ॐ साँई राम जी




श्री गुरु हरिराय जी-साखियाँ-काले के भतीजे को वरदान देना

एक दिन काला अपने यतीम भतीजो लोहिया और संदली को साथ लेकर गुरु हरि राय जी के पास लाया| पहले उसने गुरु जी को माथा टेका फिर अपने भतीजो को ऐसा करने के लिए कहा| परन्तु वहाँ खड़े खड़े ही बच्चों के पेट बजने लगे| गुरु जी ने कहा कालेआ! यह क्या कहतें हैं| काले ने कहा महाराज! मेरा भाई मर चुका है और मेरे भतीजे पेट से भूखें हैं| यह आपसे रोटी मांगते हैं| गुरु जी खुश होकर कहने लगे कालेआ! यह अनेक औरों को भी रोटी देंगे| यह बड़े सौभाग्यशाली होंगे|

यह वरदान लेकर काला घर वापिस आ गया| वह बहुत खुश था| उसने आकर अपनी स्त्री को बताया कि वह अपने भतीजों के लिए राज्य का वरदान ले आया है| पत्नी कहने लगी कि अपने बच्चे तो इनकी प्रजा बनकर रहेंगे| तुमने इन का क्या सोचा है?

अपनी स्त्री की ऐसी बात सुनकर काला अपने बच्चों को भी गुरु जी के पास ले आया और प्रार्थना करने लगा कि गुरु जी जब से मेरी पत्नी ने मेरे भतीजों के बारे में यह सुना है कि उन्हें राज्य प्राप्त होगा और मेरे पुत्र इनकी अधीनता में रहेंगे| इनके प्रजा बनकर रह जायेगे| इसलिए मेरे पुत्रों को भी राज्य का वरदान बक्शो| आगे से गुरु जी मुस्कुरा पड़े और कहने लगे तुम्हारे पुत्र भी स्वतंत्रता से खेती करेगें और किसी का हाला नहीं भरेगे|

यह वरदान लेकर काला खुशी खुशी घर आ गया| उसने सारी बात पत्नी को बताई कि गुरु जी ने ऐसा वरदान दिया है| तब उसे शांति प्राप्त हुई|

गुरु के वरदान से काले के भतीजों के संतान नाभे और पटियाला के राजे हुए| और उसके अपने पुत्रों की संतान बिना किसी को हाला दिए अपनी खेती करते रहे|

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