शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 5:45 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 4 April 2020

मेरी चाहत है सांई , तेरा दर्शन मै पाऊं

ॐ सांई राम




मेरी चाहत है सांई , तेरा दर्शन मै पाऊं
तेरी किरपा से सांई , मैं भव से तर जाऊं



 चरणों में जगह दे दो, मै घुँघरू बन जाऊं
हृदय से लगा लो सांई , मैं माला बन जाऊं
तेरी किरपा से सांई , मैं भव से तर जाऊं
मेरी चाहत है सांई , तेरा दर्शन मै पाऊं
तेरी किरपा से सांई , मैं भव से तर जाऊं


मुझे दर्शन दे दो सांई, मैं कायल बन जाऊं
तेरी पालकी की सवारी का, मै कान्धा बन जाऊं
तेरी द्वारका माई का सांई, मै पत्थर बन जाऊं
तेरी किरपा से सांई, मैं भव से तर जाऊं
मेरी चाहत   है सांई, तेरा दर्शन मै पाऊं
तेरी किरपा से सांई, मैं भव से तर जाऊं


 मुझे शक्ति दे दो सांई, चिमटा मैं  बन जाऊं
मुझे छू  लो हाथों से, फूल मैं बन जाऊं
गर छोडो हाथ मेरा, सांई  मै मर जाऊं
तेरी किरपा से सांई, मैं भव से तर जाऊं
मेरी चाहत है सांई, तेरा दर्शन मै पाऊं
तेरी किरपा से सांई, मैं भव से तर जाऊं

यह भजन माला  बहन रविंदर जी के गुलदस्तें से ली गयी  है...

Friday, 3 April 2020

साईं सब में तू समाया, जीयूं कैसे बिन तिहारे

ॐ सांई राम



साईं सब में तू समाया, जीयूं कैसे बिन तिहारे
तेरे दर पे साईं आके, झुकते हैं सर हमारे
साईं सब में तू समाया, जीयूं कैसे बिन तिहारे
सभी देवता हैं तुझमे, मुझे दिखते हैं जो  हर दम
चलता हूँ मै तो साईं, तेरे नाम के सहारे
साईं सब में तू समाया, जीयूं कैसे बिन तिहारे


मस्ती में मै  डूबा हूँ, दुनिया से जा के कह दो
मुझे होश मै न लायें, झूठे जग के ये नज़ारे
साईं सब में तू समाया, जीयूं कैसे बिन तिहारे

साईं नाम का प्याला, उन सभी को तू पिला दे
जो तकते हैं राह तेरी, हैं सभी जो ग़म के मारे
साईं सब में तू समाया, जीयूं कैसे बिन तिहारे

यह भजन माला बहन रविंदर जी के गुलदस्तें से ली गयी है...

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Thursday, 2 April 2020

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 46

ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं, हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है, हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...


श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 46


बाबा की गया यात्रा - बकरों की पूर्व जन्मकथा

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इस अध्याय में शामा की काशी, प्रयाग व गया की यात्रा और बाबा किस प्रकार वहाँ इनके पूर्व ही (चित्र के रुप में) पहुँच गये तथा दो बकरों के गत जन्मों के इतिहास आदि का वर्णन किया गया है ।

प्रस्तावना 
............

हे साई । आपके श्रीचरण धन्य है और उनका स्मरण कितना सुखदायी है । आपके भवभयविनाशक स्वरुप का दर्शन भी धन्य है, जिसके फलस्वरुप कर्मबन्धन छिन्नभिन्न हो जाते है । यघपि अब हमें आपके सगुण स्वरुप का दर्शन नहीं हो सकता, फिर भी यदि भक्तगण आपके श्रीचरणों में श्रद्घा रखें तो आप उन्हें प्रत्यक्ष अनुभव दे दिया करते है । आप एक अज्ञात आकर्षण शक्ति द्घारा निकटस्थ या दूरस्थ भक्तों को अपने समीप खींचकर उन्हें एक दयालु माता की नाई हृदय से लगाते है । हे साई । भक्त नहीं जानते कि आपका निवास कहाँ है, परन्तु आप इस कुशलता से उन्हें प्रेरित करते है, जिसके परिणामस्वरुप भासित होने लगता है कि आपका अभय हस्त उनके सिर पर है और यह आपकी ही कृपा-दृष्टि का परिणाम है कि उन्हें अज्ञात सहायता सदैव प्राप्त होती रहती है । अहंकार के वशीभूत होकर उच्च कोटि के विद्घान और चतुर पुरुष भी इस भवसागर की दलदल में फँस जाते है । परन्तु हे साई । आप केवल अपनी शक्ति से असहाय और सुहृदय भक्तों को इस दलदल से उबारकर उनकी रक्षा किया करते है । पर्दे की ओट में छिपे रहकर आप ही तो सब न्याय कर रहे है । फिर भी आप ऐसा अभिनय करते है, जैसे उनसे आपका कोई सम्बन्ध ही न हो । कोई भी आप की संपूर्ण जीवन गाथा न जान सका । इसलिये यही श्रेयस्कर है कि हम अनन्य भाव से आपके श्रीचरणों की शरण में आ जायें और अपने पापों से मुक्त होने के लिये एकमात्र आपका ही नामस्मरण करते रहे । आप अपने निष्काम भक्तों की समस्त इच्छाएँ पूर्ण कर उन्हें परमानन्द की प्राप्ति करा दिया करते है । केवल आपके मधुर नाम का उच्चारण ही भक्तों के लिये अत्यन्त सुगम पथ है । इस साधन से उनमें राजसिक और तामसिक गुणों का हिरास होकर सात्विक और धार्मिक गुणों का विकार होगा । इसके साथ ही साथ उन्हें क्रमशः विवेक, वैराग्य और ज्ञान की भी प्राप्ति हो जायेगी । तब उन्हें आत्मस्थित होकर गुरु से भी अभिन्नता प्राप्त होगी और इसका ही दूसरा अर्थ है गुरु के प्रति अनन्य भाव से शरणागत होना । इसका निश्चित प्रमाण केवल यही है कि तब हमारा मन स्थिर और शांत हो जाता है । इस शरणागति, भक्ति और ज्ञान की मह्त्ता अद्घितीय है, क्योंकि इनके साथ ही शांति, वैराग्य, कीर्ति, मोक्ष इत्यादि की भी प्राप्ति सहज ही हो जाती है ।

यदि बाबा अपने भक्तों पर अनुग्रह करते है तो वे सदैव ही उनके समीप रहते है, चाहे भक्त कहीं भी क्योंन चला जाये, परन्तु वे तो किसी न किसी रुप में पहले ही वहाँ पहुँच जाते है । यह निम्नलिखित कथा से स्पष्ट है ।


गया यात्रा
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बाबा से परिचय होने के कुछ काल पश्चात ही काकासाहेब रदीक्षित ने अपने ज्येष्ठ पुत्र बापू का नागपुर में उपनयन संस्कार करने का निश्चय किया और गभग उसी समय नानासाहेब चाँदोरकर ने भी अपने ज्येष्ट पुत्र का ग्वालियार में शादी करने का कार्यक्रम बनाया । दीक्षित और चांदोरकर दोनों ही शिरडी आये और प्रेमपूर्वक उन्होंने बाबा को निमन्त्रण दिया । तब उन्होंने अपने प्रतिनिधि शामा को ले जाने को कहा, परन्तु जब उन्होंने स्वयं पधारने के लिये उनसे आग्रह किया तो उन्होंने उत्तर दिया कि बनारस और प्रयाग निकल जाने के पश्चात, मैं शामा से पहले ही पहुँच जाऊँगा, पाठकगण । कृपया इन शब्दों को ध्यान में रखें, क्योंकि ये शब्द बाबा की सर्वज्ञता के बोधक है ।

बाबा की आज्ञा प्राप्त कर शामा ने इन उत्सवों में सम्मिलित होने के लिये प्रथम नागपुर, ग्वालियर और इसके पश्चात काशी, प्रयाग और गया जाने का निश्चय किया । अप्पाकोते भी शामा के साथ जाने को तैयार हो गये । प्रथम तो वे दोनों उपनयन संस्कार में सम्मिलित होने नागपुर पहुँचे । वहाँ काकासाहेब दीक्षित ने शामा को दो सौ रुपये खर्च के निमित्त दिये । वहाँ से वे लोग विवाह में सम्मिलित होनें ग्वालियर गये । वहाँ नानासाहेब चांदोरकर ने सौ रुपये और उनके संबंधी श्री. जुठर ने भी सौ रुपये शामा को भेंट किये । फिर शामा काशी पहुँचे, जहाँ जठार ने लक्ष्मी-नारायण जी के भव्य मंदिर में उनका उत्तम स्वागत किया, अयोध्या में जठार के व्यवस्थापक ने भी शामा का अच्छा स्वागत किया । शामा और कोते अयोध्या में 21 दिन तथा काशी (बनारस) में दो मास ठहर कर फिर गया को रवाना हो गये । गया में प्लेग फैलने का समाचार रेलगाड़ी में सुनकर इल नोगों को थोड़ी चिन्ता सी होने लगी । फिर भी रात्रि को वे गया स्टेशन पर उतरे और एक धर्मशाला में जाकर ठहरे । प्रातःकाल गया वाला पुजारी (पंडा), जो यात्रियों के ठहरने और भोजन की व्यवस्था किया करता था, आया और कहने लगा कि सब यात्री तो प्रस्थान कर चुके है, इसलिये अब आप भी शीघ्रता करे । शामा ने सहज ही उससे पूछा कि क्या गया में प्लेग फैला है । तब पुजारी ने कहा कि नहीं । आप निर्विघ्र मेरे यहाँ पधारकर वस्तुस्थिति का स्वयं अवलोकन कर ले । तब वे उसके साथ उसके मकान पर पहुँचे । उसका मकान क्या, एक विशाल महल था, जिसमें पर्याप्त यात्री विश्राम पा सकते थे । शामा को भी उसी स्थान पर ठहराया गया, जो उन्हें अत्यन्त प्रिय लगा । बाबा का एक बड़ा चित्र, जो कि मकान के अग्रिम बाग के ठीक मध्य में लगा था, देखकर वे अति प्रसन्न हो गये । उनका हृदय भर आया और उन्हें बाबा के शब्दों की स्मृति हो आई कि मैं काशी और प्रयाग निकल जाने के पश्चात शामा से आगे ही पहुँच जाऊँगा । शामा की आँखों से अश्रुओं की धारा बहने लगी और उनके शरीर में रोमांच हो आया तथा कंठ रुँध गया और रोते-रोते उनकी घिग्घियाँ बँध गई । पुजारी ने शामा की जो ऐसी स्थिति देखी तो उसने सोचा कि यह व्यक्ति प्लेगी की सूचना पर भयभीत होकर रुदन कर रहा है, परन्तु शामा ने उसी कल्पना के विपरीत ही प्रश्न किया कि यह बाबा का चित्र तुम्हें कहाँ से मिला । उसने उत्तर दिया कि मेरे दो-तीन सौ दलाल मनमाड और पुणताम्बे श्रेत्र में काम करते है तथा उस क्षेत्र से गया आने वाले यात्रियों की सुविधा का विशेष ध्यान रखा करते है । वहाँ शिरडी के साई महाराज की कीर्ति मुझे सुनाई पड़ी । लगभग बारह वर्ष हुए, मैंने स्वयं शिरडी जाकर बाबा के श्री दर्शन का लाभ उठाया था और वहीं शामा के घर में लगे हुए उनके चित्र से मैं आकर्षित हुआ था । तभी बाबा की आज्ञा से शामा ने जो चित्र मुझे भेंट किया था, यह वही चित्र है । शामा की पूर्व स्मृति जागृत हो आई और जब गया वाले पुजारी को यह ज्ञात हुआ कि ये वही शामा है, जिन्होंने मुझे इस चित्र द्घारा अनुगृहित किया था और आज मेरे यहाँ अतिथि बनकर ठहरे है तो उसके आनन्द की सीमा न रही । दोनों बड़े प्रेमपूर्वक मिलकर हर्षित हुए । फिर पुजारी ने शामा का बादशाही ढंग से भव्य स्वागत किया । वह एक धनाढ़्य व्यक्ति था । स्वयं डोली में और शामा को हाथी पर बिठाकर खूब घुमाया तथा हर प्रकार से उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखा । इस कथा ने सिदृ कर दिया कि बाबा के वचन सत्य निकले । उनका अपने भक्तों पर कितना स्नेह था, इसको तो छोड़ो । वे तो सब प्राणयों पर एक-सा प्रेम किया करते थे और उन्हें अपना ही स्वरुप समझते थे । यह निम्नलिखित कथा से भी विदित हो जायेगा ।


दो बकरे
.........
एक बार जब बाबा लेंडी बाग से लौट रहे थे तो उन्होंने बकरों का एक झुंड आते देखा । उनमें से दो बकरों ने उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर लिया । बाबा ने जाकर प्रेम-से उनका शरीर अपने हाथ से थपथपाया और उन्हें 32 रुपये में खरीद लिया । बाबा का यह विचित्र व्यवहार देखकर भक्तों को आश्चर्य हुआ और उन्होंने सोचा कि बाबा तो इस सौदे में ठगा गया है, क्योंकि एक बकरे का मूल्य उस समय 3-4 रुपये से अधिक न था और वे दो बकरे अधिक से अधिक आठ रुपये में प्राप्त हो सकते थे ।
उन्होंने बाबा को कोसना प्रारम्भ कर दिया, परन्तु बाबा शान्त बैठे रहे । जब शामा और तात्या ने बकरे मोल लेने का कारण पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया कि मेरे कोई घर या स्त्री तो है नही, जिसके लिये मुझे पैसे इकट्ठे करके रखना है । फिर उन्होंने चार सेर दाल बाजार से मँगाकर उन्हें खिलाई । जब उन्हें खिला-पिला चुके तो उन्होंने पुनः उनके मालिक को बकरे लौटा दिये । तत्पश्चात् ही उन्होने उन बकरों के पूर्वजन्मों की कथा इस प्रकार सुनाई । शामा और तात्या, तुम सोचते हो कि मैं इस सौदे में ठगा गया हूँ । परन्तु ऐसा नही, इनकी कथा सुनो । गत जन्म में ये दोनों मनुष्य थे और सौभाग्य से मेरे निकट संपर्क में थे । मेरे पास बैठते थे । ये दोनों सगे भाई थे और पहले इनमें परस्पर बहुत प्रेम था, परन्तु बाद में ये एक दूसरे के कट्टर शत्रु हो गये । बड़ा भाई आलसी था, किन्तु छोटा भाई बहुत परिश्रमी था, जिसने पर्याप्त धन उपार्जन कर लिया था, जससे बड़ा भाई अपने छोटे भाई से ईर्ष्या करने लगा । इसलिये उसने छोटे भाई की हत्या करके उसका धन हड़पने की ठानी और अपना आत्मीय सम्बन्ध भूलकर वे एक दूसरे से बुरी तरह झगड़ने लगे । बड़े भाई ने अनेक प्रत्यन किये, परन्तु वह छोटे भाई की हत्या में असफल रहा । तब वे एक दूसरे के प्राणघातक शत्रु बन गये । एक दिन बड़े भाई ने छोटे भाई के सिर पर लाठी से प्रहार किया । तब बदले में छोटे भाई ने भी बड़े भाई के सिर पर कुल्हा़ड़ी चलाई और परिणामस्वरुप वहीं दोनों की मृत्यु हो गई । फिर अपने कर्मों के अनुसार ये दोनों बकरे की योनि को प्राप्त हुये । जैसे ही वे मेरे समीप से निकले तो मुझे उनके पूर्व इतिहास का स्मरण हो आया और मुझे दया आ गई । इसलिये मैंने उन्हें कुछ खिलाने-पिलाने तथा सुख देने का विचार किया । यही कारण है कि मैंने इनके लिये पैसे खर्च किये, जो तुम्हें मँहगे प्रतीत हुए है । तुम लोगों को यह लेन-देन अच्छा नहीं लगा, इसलिये मैंने उन बकरों को गड़ेरिये को वापस कर दिया है । सचमुच बकरे जैसे सामान्य प्राणियों के लिये भी बाबा को बेहद प्रेम था ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

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आप सभी को श्री माँ नवरात्री की नवमी एवं श्री राम नवमी के शुभ अवसर पर हार्दिक शुभ कामनायें

ॐ सांँई राम जी

आप सभी को श्री माँ नवरात्री की नवमी एवं श्री राम नवमी के शुभ अवसर पर हार्दिक शुभ कामनायें


या देवी सर्वभू‍तेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे। वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग-शून्य हो जाता है। माँ भगवती का परम सान्निध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। इस परम पद को पाने के बाद उसे अन्य किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती। माँ के चरणों का यह सान्निध्य प्राप्त करने के लिए भक्त को निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उनकी उपासना करने का नियम कहा गया है। ऐसा माना गया है कि माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है। विश्वास किया जाता है कि इनकी आराधना से भक्त को अणिमा , लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है कि यदि कोई इतना कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर माँ की कृपा का पात्र बन सकता ही है। माँ की आराधना के लिए इस श्लोक का प्रयोग होता है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करने का नियम है।

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Wednesday, 1 April 2020

जब जब तुम्हे पुकारा मुझे देख मुस्कुराये मेरे साईं चले आये

ॐ सांई राम


जब जब तुम्हे पुकारा
मुझे देख मुस्कुराये
मेरे साईं चले आये
जब कहर की आंधी आई
और कदम डगमगाए
मेरे साईं चले आये
मेरे बाबा चले आये

मेरे साईं जब भी मैंने
तनहा खुद को पाया
तुने ही सर पे मेरे
बनाया अपना साया
जब घोर तूफां आये
और दिल मेरा घबराये
मेरे साईं चले आये
मेरे साईं चले आये
दर्शन की जब तमन्ना
मुझे हर घडी सताए
भक्ति की राह पर जब
कदम चल न पाए
कभी राम बन के आये
कभी शाम बन के आये
मेरे बाबा चले आये
मेरे बाबा चले आये
माया की डंकिनी ने
जब जब मुझे सताया
मुझे अपनी ओर खींचकर
मेरे क़दमों को भटकाया
कभी संत बन के आये
या फकीर बन के आये
मेरे साईं चले आये
मेरे साईं चले आये

भजन प्रस्तुति बहन रविंदर जी के कर कमलों द्वारा

आप सभी को माँ दुर्गा अष्टमी के शुभ अवसर की हार्दिक शुभ कामनायें

ॐ सांई राम

आप सभी को माँ दुर्गा अष्टमी के शुभ अवसर की हार्दिक शुभ कामनायें


माँ दुर्गा जी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है | इनका वर्ण पूर्णत: गौर
है | इनकी गौरता की उपमा शंख, चक्र और कुंद के फूल से की गई है | इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है- ' अष्टवर्षा भवेद गौरी ' | इनके वस्त्र एवं समस्त आभूषण आदि भी श्वेत है | इनकी चार भुजाएं है | इनका वाहन वृषभ है | इनके ऊपर के दाहिना हाथ अभय-मुद्रा में तथा नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है | ऊपर वाले बायें हाथ में डमरू और नीचे वाले बायें हाथ में वर मुद्रा है | इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है | अपने पार्वती रूप में जब इन्होने शिव जी को पति रूप में पाने के लिए तपस्या की थी तो इनका रंग काला पड़ गया था | इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने इनके शरीर को पवित्र गंगा-जल से मल कर धोया तब इनका शरीर बिजली की चमक के सामान अत्यंत क्रन्तिमान-गौर हो गया | तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा |

 मां महागौरी का पूजन धन, वैभव और सुख-शांति प्रदान करता है | 

नवरात्र के  आठवें दिन मां के महागौरी स्वरूप का पूजन करने का विधान हैं। महागौरी स्वरूप उज्जवल, कोमल, श्वेतवर्णा तथा श्वेत वस्त्रधारी हैं। महागौरी मस्तक पर चन्द्र का मुकुट धारण किये हुए हैं। कान्तिमणि के समान कान्ति वाली देवी जो अपनी चारों भुजाओं में क्रमशः शंख, चक्र, धनुष और बाण धारण किए हुए हैं, उनके कानों में रत्न जडितकुण्डल झिलमिलाते रहते हैं। महागौरीवृषभ के पीठ पर विराजमान हैं। महागौरी गायन एवं संगीत से प्रसन्न होने वाली ‘महागौरी‘ माना जाता हैं।

मंत्र:
श्वेते वृषे समरूढ़ाश्वेताम्बराधरा शुचि:। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।
ध्यान:-
वन्दे वांछित कामार्थेचन्द्रार्घकृतशेखराम्।
सिंहारूढाचतुर्भुजामहागौरीयशस्वीनीम्॥
पुणेन्दुनिभांगौरी सोमवक्रस्थितांअष्टम दुर्गा त्रिनेत्रम।
वराभीतिकरांत्रिशूल ढमरूधरांमहागौरींभजेम्॥
पटाम्बरपरिधानामृदुहास्यानानालंकारभूषिताम्।
मंजीर, कार, केयूर, किंकिणिरत्न कुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांपल्लवाधरांकांत कपोलांचैवोक्यमोहनीम्।
कमनीयांलावण्यांमृणालांचंदन गन्ध लिप्ताम्॥
स्तोत्र:-
सर्वसंकट हंत्रीत्वंहिधन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदाचतुर्वेदमयी,महागौरीप्रणमाम्यहम्॥
सुख शांति दात्री, धन धान्य प्रदायनीम्।
डमरूवाघप्रिया अघा महागौरीप्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यमंगलात्वंहितापत्रयप्रणमाम्यहम्।
वरदाचैतन्यमयीमहागौरीप्रणमाम्यहम्॥
कवच:-
ओंकार: पातुशीर्षोमां, हीं बीजंमां हृदयो।क्लींबीजंसदापातुनभोगृहोचपादयो॥ललाट कर्णो,हूं, बीजंपात महागौरीमां नेत्र घ्राणों।कपोल चिबुकोफट् पातुस्वाहा मां सर्ववदनो॥
मंत्र-ध्यान-कवच- का विधि-विधान से पूजन करने वाले व्यक्ति का सोमचक्र जाग्रत होताहैं। महागौरी के पूजन से व्यक्ति के समस्त पाप धुल जाते हैं। महागौरी के पूजन करने वाले साधन के लिये मां अन्नपूर्णा के समान, धन, वैभव और सुख-शांति प्रदान करने वाली एवं  संकट से मुक्ति दिलाने वाली देवी महागौरी हैं।

Tuesday, 31 March 2020

भाग्यवान है मानव तुझको, सिमरन को जिह्वा है मिली

ॐ साईं राम



राम साईं राम साईं राम साईं राम
शाम साईं शाम साईं शाम साईं शाम
भाग्यवान है मानव तुझको
सिमरन को जिह्वा है मिली
मन में जगा ले नाम की ज्योति
ये काया है मिटने चली
राम साईं राम साईं राम साईं राम
शाम साईं शाम साईं शाम साईं शाम


जग जा अब भी ओ प्राणी
ये समय गुज़रता जायेगा
ये माटी का पुतला इक दिन
माटी में मिल जायेगा
राम साईं राम साईं राम साईं राम
शाम साईं शाम साईं शाम साईं शाम
झूठी धन दौलत पे प्राणी
क्यों इतराए घड़ी घड़ी
मन में जगा ले नाम की ज्योति
ये काया है मिटने चली
राम साईं राम साईं राम साईं राम
शाम साईं शाम साईं शाम साईं शाम
इसी नाम की नाव पे तर गयी
कृष्ण भक्त मीरा बाई
पी गयी विष का प्याला फिर भी
उसको मौत नहीं आई
राम साईं राम साईं राम साईं राम
शाम साईं शाम साईं शाम साईं शाम
मन में रख श्रद्धा सबुरी
करता जा तू सबकी भली
मन में जगा ले नाम की ज्योति
ये काया है मिटने चली
राम साईं राम साईं राम साईं राम
शाम साईं शाम साईं शाम साईं शाम

यह पेशकश बहन रविंदर गोएल जी के द्वारा प्रस्तुत की जा रही है

माँ दुर्गा की सातवी शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है|

ॐ सांँई राम

आप सभी को नवरात्रों की  हार्दिक शुभकामनाएं 

माँ दुर्गा की सातवी शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है| इनके शरीर का रंग घने अन्धकार की तरह काला होता है| बाल बिखरे हुए हैं| गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला है| इनके तीन नेत्र हैं| ये तीनो नेत्र ब्रम्हांड के समान गोल हैं| इनके श्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं| इनका वाहन गदर्भ (गधा) है| ऊपर उठे दाहिने हाथ से सबको वर प्रदान करती हैं| दाहिनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है| बायीं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का काँटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग (कटार) है| माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है परन्तु ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं| इसलिए इनसे किसी भी प्रकार से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है |

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Monday, 30 March 2020

साईं नाम जप ले बन्दे तर जायेगा

ॐ सांई राम



साईं नाम साईं नाम जपता जा,
साईं राम साईं राम रटता जा
साईं नाम जप ले बन्दे तर जायेगा
टूट गयी गर डोर तो फिर पछतायेगा
माटी का चोला माटी बन जायेगा
बन जायेगा, बन जायेगा, बन जायेगा
टूट गयी गर डोर तो फिर पछतायेगा

सारा जीवन तू डोला, कभी राम नाम नI बोला
सारा जीवन तू डोला, कभी राम नाम नI बोला
बड़ी मुश्किल से मिलता है, मानव का ये चोला
हीरा जन्म अमोल तू यूँ ही गवायेगा,
टूट गयी गर डोर तो फिर पछतायेगा
साईं नाम जप ले बन्दे तर जायेगा,
टूट गयी गर डोर तो फिर पछतायेगा

तेरे पाप पुण्य का लेखा, सब साईं ने है देखा
तेरे पाप पुण्य का लेखा, सब साईं ने है देखा
कर दे साईं को अर्पण, अपने कर्मों का लेखा
कर्मों का फल इस, जनम में ही कट जायेगा
टूट गयी गर डोर तो फिर पछतायेगा
साईं नाम जप ले बन्दे तर जायेगा
टूट गयी गर डोर तो फिर पछतायेगा
अब तो बन्दे तू संभल जा, इस जीवन में कुछ कर जा
साईं चरणों में आ के, भव सागर से तू तर जा
चाह के भी फिर तू , कुछ ना कर पायेगा
टूट गयी गर डोर, तो फिर पछतायेगा
साईं नाम जप ले, बन्दे तर जायेगा
टूट गयी गर डोर, तो फिर पछतायेगा
माटी का चोला, माटी बन जायेगा
बन जायेगा, बन जायेगा, बन जायेगा
टूट गयी गर डोर, तो फिर पछतायेगा

माँ दुर्गा के छठवें स्वरूप का नाम कात्यायनी है|

ॐ सांई राम

आप सभी को नवरात्रों की  हार्दिक शुभकामनाएं 

माँ दुर्गा के छठवें स्वरूप का नाम कात्यायनी है | इनका कात्यायनी नामप पड़ने की कथा इस प्रकार है - कत नाम के एक प्रसिद्ध महार्षि थे | उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए | इन्ही कात्य के गोत्र में महार्षि कात्यायन उत्पन हुए थे | इन्होने भगवती पराम्बा की बहुत कठिन उपासना की थी | उनकी इच्छा थी की माँ भगवती उनके घर पुत्री रूप में जन्म ले | माँ भगवती ने उनकी ये प्रार्थना स्वीकार कर ली | कुछ काल पश्चात जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बहुत बढ़ गया जब ब्रम्हा, विष्णु, महेश तीनो ने अपने अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन किया | इन देवी ने महार्षि कात्यायन के घर पुत्री रूप में जन्म लिया | महार्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की | इसी कारण ये कात्यायनी कहलाई |

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Sunday, 29 March 2020

यूँ ही एक दिन चलते-चलते सांई से हो गई मुलाकात।

ॐ सांई राम


यूँ ही एक दिन चलते-चलते सांई से हो गई मुलाकात।
 जब अचानक सांई सच्चरित्र की पाई एक सौगात।


 फिर सांई के विभिन्न रूपों के मिलने लगे उपहार।
 तब सांई ने बुलाया मुझको शिरडी भेज के तार।
 सांई सच्चरित्र ने मुझ पर अपना ऐसा जादू डाला।
 सांई नाम की दिन-रात मैं जपने लगा फिर माला।
 घर में गूँजने लगी हर वक्त सांई गान की धुन।
 
मन के तार झूमने लगे सांई धुन को सुन।
 धीरे-धीरे सांई भक्ति का रंग गाढ़ा होने लगा।
 और सांई कथाओं की खुश्बूं में मन मेरा खोने लगा।
 सांई नाम के लिखे शब्दों पर मैं होने लगी फिदा।
 अब मेरे सांई को मुझसे कोई कर पाए गा ना जुदा।
 हर घङी मिलता रहे मुझे सांई का संतसंग।

 सांई मेरी ये साधना कभी ना होवे भंग।
 सांई चरणों में झुका रहे मेरा यह शीश।
 सांई मेरे प्राण हैं और सांई ही मेरे ईश।
 भेदभाव से दूर रहूँ,शुद्ध हो मेरे विचार।
 सांई ज्ञान की जीवन में बहती रहे ब्यार |

माँ दुर्गा जी के पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है |

ॐ सांई राम

आप सभी को नवरात्रों की  हार्दिक शुभकामनाएं

माँ दुर्गा जी के पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है | ये भगवान स्कन्द " कुमार कार्तिकेय " नाम से भी जाने जाते हैं | ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे | पुराणों में इन्हें कुमार और शक्तिधर कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है | इनका वाहन मयूर है | इन्ही भगवान स्कन्द की माता होने के कारण माँ दुर्गा के इस पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है |


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