शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 22 September 2018

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि

ॐ सांई राम






दृष्टि के बदलते ही सृष्टि बदल जाती है, क्योंकि दृष्टि का परिवर्तन मौलिक परिवर्तन है। अतः दृष्टि को बदलें सृष्टि को नहीं, दृष्टि का परिवर्तन संभव है, सृष्टि का नहीं। दृष्टि को बदला जा सकता है, सृष्टि को नहीं। हाँ, इतना जरूर है कि दृष्टि के परिवर्तन में सृष्टिभी बदल जाती है। इसलिए तो सम्यकदृष्टि की दृष्टि में सभी कुछ सत्य होता है और मिथ्या दृष्टि बुराइयों को देखता है। अच्छाइयाँ और बुराइयाँ हमारी दृष्टि पर आधारित हैं।

दृष्टि दो प्रकार की होती है। एक गुणग्राही और दूसरी छिन्द्रान्वेषी दृष्टि। गुणग्राही व्यक्ति खूबियों को और छिन्द्रान्वेषी खामियों को देखता है। गुणग्राही कोयल को देखता है तो कहता है कि कितना प्यारा बोलती है और छिन्द्रान्वेषी देखता है तो कहता है कि कितनी बदसूरत दिखती है।

गुणग्राही मोर को देखता है तो कहता है कि कितना सुंदर है और छिन्द्रान्वेषी देखता है तो कहता है कि कितनी भद्दी आवाज है, कितने रुखे पैर हैं। गुणग्राही गुलाब के पौधे को देखता है तो कहता है कि कैसा अद्भुत सौंदर्य है। कितने सुंदर फूल खिले हैं और छिन्द्रान्वेषी देखता है तो कहता है कि कितने तीखे काँटे हैं। इस पौधे में मात्र दृष्टि का फर्क है।

जो गुणों को देखता है वह बुराइयों को नहीं देखता है।

कबीर ने बहुत कोशिश की बुरे आदमी को खोजने की। गली-गली, गाँव-गाँव खोजते रहे परंतु उन्हें कोई बुरा आदमी न मिला। मालूम है क्यों? क्योंकि कबीर भले आदमी थे। भले आदमी को बुरा आदमी कैसे मिल सकता है?

कबीर जी ने कहा है
बुरा जो खोजन मैं चला, बुरा न मिलिया कोई,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

कबीर अपने आपको बुरा कह रहे हैं। यह एक अच्छे आदमी का परिचय है, क्योंकि अच्छा आदमी स्वयं को बुरा और दूसरों को अच्छा कह सकता है। बुरे आदमी में यह सामर्थ्य नहीं होती। वह तो आत्म प्रशंसक और परनिंदक होता है।

वह कहता है
भला जो खोजन मैं चला भला न मिला कोय,
जो दिल खोजा आपना मुझसे भला न कोय।

ध्यान रखना जिसकी निंदा-आलोचना करने की आदत हो गई है, दोष ढूँढने की आदत पड़ गई, वे हजारों गुण होने पर भी दोष ढूँढ निकाल लेते हैं और जिनकी गुण ग्रहण की प्रकृति है, वे हजार अवगुण होने पर भी गुण देख ही लेते हैं, क्योंकि दुनिया में ऐसी कोई भीचीज नहीं है जो पूरी तरह से गुणसंपन्ना हो  या  पूरी तरह से गुणहीन हो। एक न एक गुण या अवगुण सभी में होते हैं। मात्र ग्रहणता की बात है कि आप क्या ग्रहण करते हैं गुण या अवगुण।

तुलसीदासजी ने कहा है -

जाकी रही भावना जैसी,
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।

अर्थात जिसकी जैसी दृष्टि होती है
उसे वैसी ही मूरत नजर आती है।

Friday, 21 September 2018

कष्टों की काली छाया दुखदायी है, जीवन में घोर उदासी लाई है ।

ॐ सांई राम




कष्टों की काली छाया दुखदायी है, जीवन में घोर उदासी लाई है ।
संकट को टालो सांई दुहाई है, तेरे सिवा ना कोई सहाई है ।
मेरे मन तेरी मूरत समाई है, हर पल हर क्षण महिमा गाई है ।
घर मेरे कष्टों की आँधी आई है, आपने क्यों मेरी सुध भुलाई है ।
तुम भोले नाथ हो दया निधान हो, तुम हनुमान हो महा बलवान हो ।
तुम्ही हो राम और तुम्ही श्याम हो, सारे जगत में तुम सबसे महान हो ।
तुम्ही महाकाली तुम्ही माँ शारदे, करता हूँ प्रार्थना भव से तार दो ।
तुम्ही मुहम्मद हो गरीब नवाज हो, नानक की वाणी में ईसा के साथ हो ।
तुम्ही दिगम्बर तुम्ही कबीर हो, हो बुद्घ तुम्ही और महावीर हो ।
सारे जगत का तुम्ही आधार हो, निराकार भी और साकार हो ।
करता हूँ वन्दना प्रेम विश्वास से, सुनो सांई अल्लाह के वास्ते ।
अधरों में मेरे नहीं मुस्कान है, घर मेरा बनने लगा श्मशान है ।
रहम नजर करो उजड़े विरान पे, जिन्दगी संवरेगी इस वरदान से ।
पापों की धूप से तन लगा हारने, आपका ये दास लगा पुकारने ।
आपने सदा लाज बचाई है, देर ना हो जाये मन शंकाई है ।
धीरे-धीरे धीरज ही खोता है, मन में बसा विश्वास ही रोता है ।
मेरी कल्पना साकार कर दो, सूनी जिन्दगी में रंग भर दो ।
ढ़ोते-ढ़ोते पापों का भार जिन्दगी से, मैं हार गया जिन्दगी से ।
नाथ अवगुण अब तो बिसारो, कष्टों की लहर से आके उबारो ।
करता हूँ पाप मैं पापों की खान हूँ, ज्ञानी तुम ज्ञानेश्वर मैं अज्ञान हूँ ।
करता हूँ पग-पग पर पापों की भूल मैं, तार दो जीवन ये चरणों की धूल से ।
तुमने उजाड़ा हुआ घर बसाया, पानी से दीपक तुमने जलाया ।
तुमने ही शिरड़ी को धाम बनाया, छोटे से गाँव में स्वर्ग सजाया ।
कष्ट पाप श्राप उतारो, प्रेम दया दृष्टि से निहारो ।
आपका दास हूँ ऐसे ना टालिये, गिरने लगा हूँ सांई सम्भालिये ।
सांई जी बालक मैं अनाथ हूँ, तेरे भरोसे रहता दिन-रात हूँ ।
जैसा भी हूँ, हूँ तो आपका, कीजै निवारण मेरे संताप का ।
तू है सवेरा और मैं रात हूँ, मेल नहीं कोई फिर भी साथ हूँ ।
सांई मुझसे मुख ना मोड़ो, बीच मझदार अकेला ना छोड़ो ।
आपके चरणों में बसे प्राण है, तेरे वचन मेरे गुरु समान है ।
आपकी राहों पे चलता दास है, खुशी नहीं कोई जीवन उदास है ।
आंसू की धारा है डूबता किनारा, जिन्दगी में दर्द, नहीं गुजारा ।
लगाया चमन तो फूल खिलाओ, फूल खिले है तो खुशबू भी लाओ ।
कर दो इशारा तो बात बन जाए, जो किस्मत में नहीं वो मिल जाये ।
बीता जमाना ये गाकें फसाना, सरहदें जिन्दगी मौत तराना ।
देर तो हो गयी है अंधेर ना हो, फिक्र मिले लेकिन फरेब न हो ।
देके टालो या दामन बचा लो, हिलने लगी रहनुमाई सम्भालो ।
तेरे दम पे अल्लाह की शान है, सूफी संतों का ये बयान है ।
गरीब की झोली में भर दो खजाना, जमाने के वाली करो ना बहाना ।
दर के भिखारी है मोहताज है हम, शहंशाहे आलम करो कुछ करम ।
तेरे खजाने में अल्लाह की रहमत, तुम सदगुरु सांई हो समरथ ।
आए तो धरती पे देने सहारा, करने लगे क्यों हमसे किनारा ।
जब तक ये ब्रहमांड रहेगा, सांई तेरा नाम रहेगा ।
चाँद सितारे तुम्हें पुकारेंगें, जन्मोजन्म हम रास्ता निहारेंगें ।
आत्मा बदलेगी चोले हजार, हम मिलते रहेंगे हर बार ।
आपके कदमों में बैठे रहेंगे, दुखड़े दिल के कहते रहेंगे ।
आपकी मरजी है दो या ना दो, हम तो कहेंगे दामन ही भर दो ।
तुम हो दाता हम है भिखारी, सुनते नहीं क्यों अरज हमारी ।
अच्छा चलो इक बात बता दो, क्या नहीं तुम्हारे पास बता दो ।
जो नहीं देना है इन्कार कर दो, खत्म ये आपस की तकरार कर दो ।
लौट के खाली चला जाऊँगा, फिर भी गुण तो गाऊँगा ।
जब तक काया है तब तक माया है, इसी में दुःखों का मूल समाया है ।
सब कुछ जान के अनजान हूँ मैं, अल्लाह की तू शान तेरी हूँ शान में ।
तेरा करम सदा सबपे रहेगा, ये चक्र युग-युग चलता रहेगा ।
जो प्राणी गायेगा सांई तेरो नाम, उसको मिले मुक्ति पहुँचे परमधाम ।
ये मंत्र जो प्राणी नित दिन गायेंगें, राहू, केतु, शनि निकट ना आएँगे ।
टल जाएंगें संकट सारे, घर में वास करें सुख सारे ।
जो श्रद्घा से करेगा पठन, उस पर देव सभी हो प्रसन्न ।
रोग समूह नष्ट हो जायेंगें, कष्ट निवारण मन्त्र जो गाएँगें ।
चिन्ता हरेगा निवारण जाप, पल में हो दूर हो सब पाप ।
जो ये पुस्तक नित दिन बांचे, लक्ष्मी जी घर उसके सदा बिराजै ।
ज्ञान बुद्घि प्राणी वो पायेगा, कष्ट निवारण मंत्र जो ध्यायेगा ।
ये मन्त्र भक्तों कमाल करेगा, आई जो अनहोनी तो टाल देगा ।
भूत प्रेत भी रहेंगे दूर, इस मन्त्र में सांई शक्ति भरपूर ।
जपते रहे जो मंत्र अगर, जादू टोना भी हो बेअसर ।
इस मंत्र में सब गुण समाये, ना हो भरोसा तो आजमाएँ ।
ये मंत्र सांई वचन ही जानो, स्वयं अमल कर सत्य पहचानो ।
संशय ना लाना विश्वास जगाना, ये मंत्र सुखों का है खजाना ।
इस मंत्र में सांई का वास, सांई दया से ही लिख पाया दास ।।

Thursday, 20 September 2018

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय - 12

ॐ सांई राम



आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं। हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है । हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा। किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है|


श्री साई सच्चरित्र - अध्याय - १२
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काका महाजनी, धुमाल वकील, श्रीमती निमोणकर, मुले शास्त्री, एक डाँक्टर के द्घारा बाबा की लीलाओं का अनुभव ।
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इस अध्याय में बाबा किस प्रकार भक्तों से भेंट करते और कैसा बर्ताव करते थे, इसका वर्णन किया गया हैं ।


सन्तों का कार्य
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हम देख चुके है कि ईश्वरीय अवतार का ध्येय साधुजनों का परित्राण और दुष्टों का संहार करना है । परन्तु संतों का कार्य तो सर्वथा भिन्न ही है । सन्तों के लिए साधु और दुष्ट प्रायःएक समान ही है । यथार्थ में उन्हें दुष्कर्म करने वालों की प्रथम चिन्ता होती है और वे उन्हें उचित पथ पर लगा देते है । वे भवसागर के कष्टों को सोखने के लिए अगस्त्य के सदृश है और अज्ञान तथा अंधकार का नाश करने के लिए सूर्य के समान है । सन्तों के हृदय में भगवान वासुदेव निवास करते है । वे उनसे पृथक नहीं है । श्री साई भी उसी कोटि में है, जो कि भक्तों के कल्याण के निमित्त ही अवतीर्ण हुए थे । वे ज्ञानज्योति स्वरुप थे और उनकी दिव्यप्रभा अपूर्व थी । उन्हें समस्त प्राणियों से समान प्रेम था । वे निष्काम तथा नित्यमुक्त थे । उनकी दृष्टि में शत्रु, मित्र, राजा और भिक्षुक सब एक समान थे । पाठको । अब कृपया उनका पराक्रम श्रवण करें । भक्तों के लिये उन्होंने अपना दिव्य गुणसमूह पूर्णतः प्रयोग किया और सदैव उनकी सहायता के लिये तत्पर रहे । उनकी इच्छा के बिना कोई भक्त उनके पास पहुँच ही न सकता था । यदि उनके शुभ कर्म उदित नहीं हुए है तो उन्हे बाबा की स्मृति भी कभी नहीं आई और न ही उनकी लीलायें उनके कानों तक पहुँच सकी । तब फिर बाबा के दर्शनों का विचार भी उन्हें कैसे आ सकता था । अनेक व्यक्तियों की श्री साईबाबा के दर्शन सी इच्छा होते हुए भी उन्हें बाबा के महासमाधि लेने तक कोई योग प्राप्त न हो सका । अतः ऐसे व्यक्ति जो दर्शनलाभ से वंचित रहे है, यदि वे श्रद्घापूर्वक साईलीलाओं का श्रवण करेंगे तो उनकी साई-दर्शन की इच्छा बहुत कुछ अंशों तक तृप्त हो जायेगी । भाग्यवश यदि किसी को किसी प्रकार बाबा के दर्शन हो भी गये तो वह वहाँ अधिक ठहर न सका । इच्छा होते हुए भी केवल बाबा की आज्ञा तक ही वहाँ रुकना संभव था और आज्ञा होते ही स्थान छोड़ देना आवश्यक हो जाता था । अतः यह सव उनकी शुभ इच्छा पर ही अवलंबित था ।

काका महाजनी
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एक समय काका महाजनी बम्बई से शिरडी पहुँचे । उनका विचार एक सप्ताह ठढहरने और गोकुल अष्टमी उत्सव में सम्मिलित होने का था । दर्शन करने के बाद बाबा ने उनसे पूछा, तुम कब वापस जाओगे । उन्हें बाबा के इस प्रश्न पर आश्चर्य-सा हुआ । उत्तर देना तो आवश्यक ही था, इसलिये उन्होंने कहा, जब बाबा आज्ञा दे । बाबा ने अगले दिन जाने को कहा । बाबा के शब्द कानून थे, जिनका पालन करना नितान्त आवश्यक था । काका महाजनी ने तुरन्त ही प्रस्थान किया । जब वे बम्बई में अपने आफिस में पहुँचे तो उन्होंने अपने सेठ को अति उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करते पाया । मुनीम के अचानक ही अस्वस्थ हो जाने के कारण काका की उपस्थिति अनिवार्य हो गई थी । सेठ ने शिरडी को जो पत्र काका के लिये भेजा था, वह बम्बई के पते पर उनको वापस लौटा दिया गया ।

भाऊसाहेब धुमाल
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अब एक विपरीत कथा सुनिये । एक बार भाऊसाहेब धुमाल एक मुकदमे के सम्बन्ध में निफाड़ के न्यायालय को जा रहे थे । मार्ग में वे शिरडी उतरे । उन्होंने बाबा के दर्शन किये और तत्काल ही निफाड़ को प्रस्थान करने लगे, परन्तु बाबा की स्वीकृति प्राप्त न हुई । उन्होने उन्हे शिरडी में एक सप्ताह और रोक लिया । इसी बीच में निफाड़ के न्यायाधीश उदर-पीड़ा से ग्रस्त हो गये । इस कारण उनका मुकदमा किसी अगले दिन के लिये बढ़ाया गया । एक सप्ताह बाद भाऊसाहेब को लौटने की अनुमति मिली । इस मामले की सुनवाई कई महीनों तक और चार न्यायाधीशों के पास हुई । फलस्वरुप धुमाल ने मुकदमे में सफलता प्राप्त की और उनका मुवक्किल मामले में बरी हो गया ।

श्रीमती निमोणकर
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श्री नानासाहेब निमोणकर, जो निमोण के निवासी और अवैतनिक न्यायाधीश थे, शिरडी में अपनी पत्नी के साथ ठहरे हुए थे । निमोणकर तथा उनकी पत्नी बहुत-सा समय बाबा की सेवा और उनकी संगति में व्यतीत किया करते थे । एक बार ऐसा प्रसंग आया कि उनका पुत्र और अन्य संबंधियों से मिलने तथा कुछ दिन वहीं व्यतीत करने का निश्चय किया । परन्तु श्री नानासाहेब ने दूसरे दिन ही उन्हें लौट आने को कहा । वे असमंजस में पड़ गई कि अब क्या करना चाहिए, परन्तु बाबा ने सहायता की । शिरडी से प्रस्थान करने के पूर्व वे बाबा के पास गई । बाबा साठेवाड़ा के समीप नानासाहेब और अन्य लोगों के साथ खड़े हुये थे । उन्होंने जाकर चरणवन्दना की और प्रस्थान करने की अनुमति माँगी । बाबा ने उनसे कह, शीघ्र जाओ, घबड़ाओ नही, शान्त चित्त से बेलापुर में चार दिन सुखपूर्वक रहकर सब सम्बन्धियों से मिलो और तब शिरडी आ जाना । बाबा के शब्द कितने सामयिक थे । श्री निमोणकर की आज्ञा बाबा द्घारा रद्द हो गई ।

नासिक के मुने शास्त्रीः ज्योतिषी
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नासिक के एक मर्मनिष्ठ, अग्नहोत्री ब्रापमण थे, जिनका नाम मुले शास्त्री था । इन्होंने 6 शास्त्रों का अध्ययन किया था और ज्योतिष तथा सामुद्रिक शास्त्र में भी पारंगत थे । वे एक बार नागपुर के प्रसिदृ करोड़पति श्री बापूसाहेब बूटी से भेंट करने के बाद अन्य सज्जनों के साथ बाबा के दर्शन करने मसजिद में गये । बाबा ने फल बेचने वाले से अनेक प्रकार के फल और अन्य पदार्थ खरीदे और मसजिद में उपस्थित लोंगों में उनको वितरित कर दिया । बाबा आम को इतनी चतुराई से चारों ओर से दबा देते थे कि चूसते ही सम्पूर्ण रस मुँह में आ जाता तथा गुठली और छिलका तुरन्त फेंक दिया जा सकता था बाबा ने केले छीलकर भक्तों में बाँट दिये और उनके छिलके अपने लिये रख लिये । हस्तरेएखा विशारद होने के नाते, मुले शास्त्री ने बाबा के हाथ की परीक्षा करने की प्रार्थना की । परन्तु बाबा ने उनकी प्रार्थना पर कोई ध्यान न देकर उन्हें चार केले दिये इसके बाद सब लोग वाड़े को लौट आये । अब मुने शास्त्री ने स्नान किया और पवित्र वस्त्र धारण कर अग्निहोत्र आदि में जुट गये । बाबा भी अपने नियमानुसार लेण्डी को पवाना हो गये । जाते-जाते उन्होंने कहा कि कुछ गेरु लाना, आज भगवा वस्त्र रँगेंगे । बाबा के शब्दों का अभिप्राय किसी की समझ में न आया । कुछ समय के बाद बाबा लौटे । अब मध्याहृ बेला की आरती की तैयारियाँ प्रारम्भ हो गई थी । बापूसाहेब जोग ने मुले से आरती में साथ करने के लिये पूछा । उन्होंने उत्तर दिया कि वे सन्ध्या समय बाबा के दर्शनों को जायेंगे । तब जोग अकेले ही चले गये । बाबा के आसन ग्रहण करते ही भक्त लोगों ने उनकी पूजा की । अब आरती प्रारम्भ हो गई । बाबा ने कहा, उस नये ब्राहमण से कुछ दक्षिणा लाओ । बूटी स्वयं दक्षिणा लेने को गये और उन्होंने बाबा का सन्देश मुले शास्त्री को सुनाया । वे बुरी तरह घबड़ा गये । वे सोचने लगे कि मैं तो एक अग्निहोत्री ब्राहमण हूँ, फिर मुझे दक्षिणा देना क्या उचित है । माना कि बाबा महान् संत है, परन्तु मैं तो उनका शिष्य नहीं हूँ । फिर भी उन्होंने सोचा कि जब बाबा सरीखे महानसंत दक्षिणा माँग रहे है और बूटी सरीखे एक करोड़पति लेने को आये है तो वे अवहेलना कैसे कर सकते है । इसलिये वे अपने कृत्य को अधूरा ही छोड़कर तुरन् बूटी के साथ मसजिद को गये । वे अपने को शुद्घ और पवित्र तथा मसजिद को अपवित्र जानकर, कुछ अन्तर से खड़े हो गये और दूर से ही हाथ जोड़कर उन्होंने बाबा के ऊपर पुष्प फेंके । एकाएक उन्होंने देखा कि बाबा के आसन पर उनके कैलासवासी गुरु घोलप स्वामी विराजमान हैं । अपने गुरु को वहाँ देखकर उन्हें महान् आश्चर्य हुआ । कहीं यह स्वप्न तो नहीं है । नही । नही । यह स्वप्न नहीं हैं । मैं पूर्ण जागृत हूँ । परन्तु जागृत होते हुये भी, मेरे गुरु महाराज यहाँ कैसे आ पहुँचे । कुछ समय तक उनके मुँह से एक भी शब्द न निकला । उन्होंने अपने को चिकोटी ली और पुनः विचार किया । परन्तु वे निर्णय न कर सके कि कैलासवासी गुरु घोलप स्वामी मसजिद में कैसे आ पहुँचे । फिर सब सन्देह दूर करके वे आगे बढ़े और गुरु के चरणों पर गिर हाछ जोड़ कर स्तुति करने लगे । दूसरे भक्त तो बाबा की आरती गा रहे थे, परन्तु मुले शास्त्री अपने गुरु के नाम की ही गर्जना कर रहे थे । फिर सब जातिपाँति का अहंकार तथा पवित्रता और अपवित्रता कीकल्पना त्याग कर वे गुरु के श्रीचरणों पर पुनः गिर पड़े । उन्होंने आँखें मूँद ली, परन्तु खड़े होकर जब उन्होंने आँखें खोलीं तो बाबा को दक्षिणा माँगते हुए देखा । बाबा का आनन्दस्वरुप और उनकी अनिर्वचनीय शक्ति देख मुले शास्त्री आत्मविस्मृत हो गये । उनके हर्ष का पारावार न रहा । उनकी आँखें अश्रुपूरित होते हुए भी प्रसन्नता से नाच रही थी । उन्होंने बाबा को पुनः नमस्कार किया और दक्षिणा दी । मुले शास्त्री कहने लगे कि मेरे सब समशय दूर हो गये । आज मुझे अपने गुरु के दर्शन हुए । बाबा की यतह अदभुत लीला देखकर सब भक्त और मुले शास्त्री द्रवित हो गये । गेरु लाओ, आज भगवा वस्त्र रंगेंगे – बाबा के इन शब्दों का अर्थ अब सब की समझ में आ गया । ऐसी अदभुत लीला श्री साईबाबा की थी ।


डाँक्टर
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एक समय एक मामलतदार अपने एक डाँक्टर मित्र के साथ शिरडी पधारे । डाँक्टर का कहना था कि मेरे इष्ट श्रीराम हैं । मैं किसी यवन को मस्तक न नमाऊँगा । अतः वे शिरडी जाने में असहमत थे । मामलतदार ने समझाया कि तुम्हें नमन करने को कोई बाध्य न करेगा और न ही तुम्हें कोई ऐसा करने को कहेगा । अतः मेरे साथ चलो, आनन्द रहेगा । वे शिरडी पहुँचे और बाबा के दर्शन को गये । परन्तु डाँक्टर को ही सबसे आगे जाते देख और बाब की प्रथम ही चरण वन्दना करते देख सब को बढ़ा विस्मय हुआ । लोगों ले डाँक्टर से अपना निश्चय बदलने और इस भाँति एक यवन को दंडवत् करने का कारण पूछा । डाँक्टर ने बतलाया कि बाबा के स्थान पर उन्हें अपने प्रिय इष्ट देव श्रीराम के दर्शन हुए और इसलिये उन्होंने नमस्कार किया । जब वे ऐसा कह ही रहे थे, तभी उन्हें साईबाबा का रुप पुनः दीखने लगा । वे आश्चर्यचकित होकर बोले – क्या यह स्वप्न हो । ये यवन कैसे हो सकते हैं । अरे । अरे । यह तो पूर्ण योग-अवतार है । दूसरे दिन से उन्होंने उपवास करना प्रारम्भ कर दिया । उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक बाबा स्वयं बुलाकर आशीर्वाद नहीं देंगे, तब तक मसजिद में कदापि न जाऊँगा । इस प्रकार तीन दिन व्यतीत हो गये । चौथे दिन उनका एक इष्ट मित्र थानदेश से शरडी आया । वे दोनों मसजिद में बाबा के दर्शन करने गये । नमस्कार होने के बाद बाबा ने डाँक्टर से पूछा, आपको बुलाने का कष्ट किसने किया । आप यहाँ कैसे पधारे । यह जटिल और सूचक प्रश्न सुनकर डाँक्टर द्रवित हो गये और उसी रात्रि को बाबा ने उनपर कृपा की । डाँक्टर को निद्रा में ही परमानन्द का अनुभव हुआ । वे अपने शहर लौट आये तो भी उन्हें 15 दिनों तक वैसा ही अनुभव होता रहा । इस प्रकार उनकी साईभक्ति कई गुनी बढ़ गई ।
उपर्यु्क्त कथाओं की शिक्षा, विशेषतः मुले शास्त्री की, यही है कि हमें अपने गुरु में दृढ़ विश्वास होना चाहिये ।
अगले अध्याय में बाबा की अन्य लीलाओं का वर्णन होगा ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, 19 September 2018

श्री साई बावनी

ॐ सांई राम



श्री साई बावनी 

जय ईश्वर जय साई दयाल, तू ही जगत का पालनहार,

दत्त दिगंबर प्रभु अवतार, तेरे बस में सब संसार!

ब्रम्हाच्युत शंकर अवतार, शरनागत का प्राणाधार,

दर्शन देदो प्रभु मेरे, मिटा दो चौरासी फेरे !

कफनी तेरी एक साया, झोली काँधे लटकाया,

नीम तले तुम प्रकट हुए, फकीर बन के तुम आए !

कलयुग में अवतार लिया, पतित पावन तुमने किया,

शिरडी गाँव में वास किया, लोगो को मन लुभा लिया!

चिलम थी शोभा हाथों की, बंसी जैसे मोहन की,

दया भरी थी आंखों में, अमृतधारा बातों में!

धन्य द्वारका वो माई, समां गए जहाँ साई,

जल जाता है पाप वहाँ , बाबा की है धुनी जहाँ!

भुला भटका में अनजान, दो मुझको अपना वरदान,

करुना सिंधु प्रभु मेरे , लाखो बैठे दर पर तेरे!

जीवनदान श्यामा पाया, ज़हर सांप का उतराया!

प्रलयकाल को रोक लिया, भक्तों को भय मुक्त किया,

महामारी को बेनाम किया, शिर्डिपुरी को बचा लिया!

प्रणाम तुमको मेरे इश , चरणों में तेरे मेरा शीश,

मन को आस पुरी करो, भवसागर से पार करो!

भक्त भीमाजी था बीमार, कर बैठा था सौ उपचार,

धन्य साई की पवित्र उदी, मिटा गई उसकी शय व्याधि!

दिखलाया तुने विथल रूप, काकाजी को स्वयं स्वरूप,

दामु को संतान दिया, मन उसका संतुशत किया!

कृपाधिनी अब कृपा करो, दीन्दयालू दया करो,

तन मन धन अर्पण तुमको, दे दो सदगति प्रभु मुझको!

मेधा तुमको न जाना था, मुस्लिम तुमको माना था,

स्वयं तुम बन के शिवशंकर, बना दिया उसका किंकर!

रोशनाई की चिरागों में, तेल के बदले पानी से,

जिसने देखा आंखों हाल, हाल हुआ उसका बेहाल!

चाँद भाई था उलझन में, घोडे के कारण मन में,

साई ने की ऐसी कृपा , घोडा फिर से वह पा सका!

श्रद्धा सबुरी मन में रखों, साई साई नाम रटो ,

पुरी होगी मन की आस, कर लो साई का नित ध्यान !

जान का खतरा तत्याँ का , दान दिया अपनी आयु का,

ऋण बायजा का चुका दिया, तुमने साई कमाल किया!

पशुपक्षी पर तेरी लगन, प्यार में तुम थे उनके मगन,

सब पर तेरी रहम नज़र , लेते सब की ख़ुद ही ख़बर!

शरण में तेरे जो आया , तुमने उसको अपनाया,

दिए है तुमने ग्यारह वचन, भक्तो के प्रति लेकर आन!

कण-कण में तुम हो भगवान, तेरी लीला शक्ति महान,

कैसे करूँ तेरे गुणगान , बुद्धिहीन मैं हूँ नादान!

दीन्दयालू तुम हो हम सबके तुम हो दाता ,

कृपा करो अब साई मेरे , चरणों में ले ले अब तुम्हारे!

सुबह शाम साई का ध्यान , साई लीला के गुणगान,

दृढ भक्ति से जो गायेगा , परम पद को वह पायेगा!

हर दिन सुबह शाम को, गाए साई बवानी को,

साई देंगे उसका साथ , लेकर हाथ में हाथ!

अनुभव त्रिपती के यह बोल, शब्द बड़े है यह अनमोल,

यकीन जिसने मान लिया , जीवन उसने सफल किया !

साई शक्ति विराट स्वरूप , मन मोहक साई का रूप,

गौर से देखों तुम भाई, बोलो जय सदगुरु साई!


॥अनंतकोटी ब्रम्हांड नायक राजाधिराज योगीराज परंब्रम्हं
श्री सच्चिदानंद सदगुरू श्री साईनाथ महाराज की जय॥

॥सदगुरु श्री साईनाथ महाराज की जय ॥

॥श्री सदगुरु साईनाथपर्णमस्तु । शुभं भवतु ॥

Tuesday, 18 September 2018

सद्गुरु... तुम्हारा यह खेल मेरी समझ न आया

ॐ सांई राम



न तो में चोरों को पकड़ पाया
न तो अपने भीतर के चोर को भगा पाया,
में तो अपनी मस्ती का मस्ताना था
बस नाच-गाने का दीवाना था,
पुलिस का डंडा चलाता था
अपना बाजा  बजता  था...
घूमते - घूमते मैंने तुमको पाया
लेकिन तुमको समझ न पाया

मैं चोरों के पीछे भागा पर न उनको पकड़ पाया
न अपने भीतर के चोर को भगा पाया,
तुम्हारा खेल भी, मेरी समझ न आया
घूम कर मैं तुम्हारे ही पास आया...

एक दिन मैंने तुमसे फ़रमाया
प्रयाग स्नान को जाना है
उसमें डूबकी लगा
अपना जीवन सफल बनाना है,
बाबा... तुम बोले, अब कहाँ जाओगे
गंगा-जमुना यहीं पाओगे,
यह कहना था
तुम्हारे चरणों से गंगा-जमुना निकली
लोगों ने उस जल को उठाया
अपनी आँखे, अपनी जिह्वा
अपने ह्रदय से उसे लगाया
लेकिन तुम्हारा यह खेल
मेरी समझ न आया

उस दिन मैंने तुम्हारा प्यार
बस यूँ ही गवायाँ ...
बाबा ... न तो मैं चोरों को पकड़ पाया
न ही अपना चोर भगा पाया,

लेकिन बाद में बहुत पछताया
मेरा विश्वास डगमगाया था
मेरा सब्र थरथराया था,
फिर भी तुमने हिम्मत न हारी
अपने प्यार से सारी बाज़ी पलट डाली
मुझ पर अपना प्यार बरसाया
मुझे साईं लीलामृत का पान कराया
सद्गुरु... तुम्हारा यह खेल मेरी समझ न आया
तुमने ही तो
मेरे भीतर के चोर को भगाया...

Monday, 17 September 2018

श्री साईं लीलाएं - साईं बाबा की भक्तों को शिक्षाएं - अमृतोपदेश (अंतिम चरण)

ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. काका, नाथ भागवत पढ़ो, यही एक दिन तुम्हारे काम आयेगा


श्री साईं लीलाएं

साईं बाबा की भक्तों को शिक्षाएं - अमृतोपदेश

आत्मचिंतन: 

अपने आपकी पहचान करो, कि मेरा जन्म क्यों हुआ? मैं कौन हूँ? आत्म-चिंतन व्यक्ति को ज्ञान की ओर ले जाता है|

विनम्रता: 

जब तक तुममें विनम्रता का वास नहीं होगा तब तक तुम गुरु के प्रिय शिष्य नहीं बन सकते और जो शिष्य गुरु को प्रिय नहीं, उसे ज्ञान हो ही नहीं सकता|

क्षमा:

दूसरों को क्षमा करना ही महानता है| मैं उसी की भूलें क्षमा करता हूँ जो दूसरों की भूले क्षमा करता है|
श्रद्धा और सबुरी (धीरज और विश्वास): पूर्णश्रद्धा और विश्वास के साथ गुरु का पूजन करो समय आने पर मनोकामना भी पूरी होंगी|

कर्मचक्र:

कर्म देह प्रारम्भ (वर्तमान भाग्य) पिछले कर्मो का फल अवश्य भोगना पड़ेगा, गुरु इन कष्टों को सहकर सहना सिखाता है, गुरु सृष्टि नहीं दृष्टि बदलता है|

दया:

मेरे भक्तों में दया कूट-कूटकर भरी रहती है, दूसरों पर दया करने का अर्थ है मुझे प्रेम करना चाहिए, मेरी भक्ति करना|

संतोष:

ईश्वर से जो कुछ भी (अच्छा या बुरा) प्राप्त है, हमें उसी में संतोष रखना चाहिए|
सादगी, सच्चाई और सरलता: सदैव सादगी से रहना चाहिए और सच्चाई तथा सरलता को जीवन में पूरी तरह से उतार लेना चाहिए|

अनासक्ति: 

सभी वस्तुएं हमरे उपयोग के लिए हैं, पर उन्हें एकत्रित करके रखने का हमें कोई अधिकार नहीं है| प्रत्येक जीव में मैं हूँ: प्रत्येक जीव में मैं हूँ, सभी जगह मेरे दर्शन करो|

गुरु अर्पण:

तुम्हारा प्रतेक कार्य मुझे अर्पण होता है, तुम किसी दूसरे प्राणी के साथ जैसा भी अच्छा या बुरा व्यवहार करते हो, सब मुझे पता होता है, व्यवहार जो दूसरों से होता है सीधा मेरे साथ होता है| यदि तुम किसी को गाली देते हो, तो वह मुझे मिलती है, प्रेम करते हो तो वह भी मुझे ही प्राप्त होता है|

भक्त:

जो भी व्यक्ति पत्नी, संतान और माता-पिता से पूर्णतया विमुख होकर केवल मुझसे प्रेम करता है, वही मेरा सच्चा भक्त है, वह भक्त मुझमे इस प्रकार से लीन हो जाता है, जैसे नदियां समुद्र में मिलकर उसमें लीन हो जाती हैं|

एकस्वरुप:

भोजन करने से पहले तुमने जिस कुत्ते को देखा, जिसे तुमने रोटी का टुकड़ा दिया, वह मेरा ही रूप है| इसी तरह समस्त जीव-जन्तु इत्यादि सभी मेरे ही रूप हैं| मैं उन्ही का रूप धरकर घूम रहा हूं| इसलिए द्वैत-भाव त्याग के कुत्ते को भोजन कराने की तरह ही मेरी सेवा किया करो| 



कर्त्तव्य: 

विधि अनुसार प्रतेक जीवन अपना एक निश्चित लक्ष्य लेकर आता है| जब तक वह अपने जीवन में उस लक्ष्य का संतोषजनक रूप और असंबद्ध भाव से पालन नहीं करता, तब तक उसका मन निर्विकार नहीं हो सकता यानि वह मोक्ष और ब्रह्म ज्ञान पने का अधिकारी नहीं हो सकता|
लोभ (लालच): लोभ और लालच एक-दूसरे के परस्पर द्वेषी हैं| वे सनातक काल से एक-दूसरे के विरोधी हैं| जहां लाभ है वहां ब्रह्म का ध्यान करने की कोई गूंजाइश नहीं है| फिर लोभी व्यक्ति को अनासक्ति और मोक्ष को प्राप्ति कैसे हो सकती है|

लोभ (लालच):

लोभ और लालच एक-दूसरे के परस्पर द्वेषी हैं| वे सनातक काल से एक-दूसरे के विरोधी हैं| जहां लाभ है वहां ब्रह्म का ध्यान करने की कोई गूंजाइश नहीं है| फिर लोभी व्यक्ति को अनासक्ति और मोक्ष को प्राप्ति कैसे हो सकती है|

दरिद्रता: 

दरिद्रता (गरीबी) सर्वोच्च संपत्ति है और ईश्वर से भी उच्च है| ईश्वर गरीब का भाई होता है| फकीर ही सच्चा बादशाह है| फकीर का नाश नहीं होता, लकिन अमीर का साम्राज्य शीघ्र ही मिट जाता है|

भेदभाव:

अपने मध्य से भेदभाव रुपी दीवार को सदैव के लिए मिटा दो तभी तुम्हारे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा| ध्यान रखो साईं सूक्ष्म रूप से तुम्हारे भीतर समाए हुए है और तुम उनके अंदर समाए हुए हो| इसलिए मैं कौन हूं? इस प्रशन के साथ सदैव आत्मा पर ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास करो| वैसे जो बिना किसी भेदभाव के परस्पर एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, वे सच में बड़े महान होते हैं|

मृत्यु: 

प्राणी सदा से मृत्यु के अधीन रहा है| मृत्यु की कल्पना करके ही वह भयभीत हो उठता है| कोई मरता नहीं है| यदि तुम अपने अंदर की आंखे खोलकर देखोगे| तब तुम्हें अनुभव होगा कि तुम ईश्वर हो और उससे भिन्न नहीं हो| वास्तव में किसी भी प्राणी की मृतु नहीं होती| वह अपने कर्मों के अनुसार, शरीर का चोला बदल लेता है| जिस तरह मनुष्य पुराने वस्त्र त्यक कर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, ठीक उसी के समान जीवात्मा भी अपने पुराने शरीर को त्यागकर दूसरे नए शरीर को धारण कर लेती है|

ईश्वर:

उस महान् सर्वशक्तिमान् का सर्वभूतों में वास है| वह सत्य स्वरुप परमतत्व है| जो समस्त चराचर जगत का पालन-पोषण एवं विनाश करने वाला एवं कर्मों के फल देने वाला है| वह अपनी योग माया से सत्य साईं का अंश धारण करके इस धरती के प्रत्येक जीव में वास करता है| चाहे वह विषैले बिच्छू हों या जहरीले नाग-समस्त जीव केवल उसी की आज्ञा का ही पालन करते हैं|

ईश्वर का अनुग्रह:

तुमको सदैव सत्य का पालन पूर्ण दृढ़ता के साथ करना चाहिए और दिए गए वचनों का सदा निर्वाह करना चाहिए| श्रद्धा और धैर्य सदैव ह्रदय में धारण करो| फिर तुम जहाँ भी रहोगे, मैं सदा तुम्हारे साथ रहूंगा|

ईश्वर प्रदत्त उपहार:

मनुष्य द्वरा दिया गया उपहार चिरस्थायी नहीं होता और वह सदैव अपूर्ण होता है| चाहकर भी तुम उसे सारा जीवन अपने पास सहेजकर सुरक्षित नहीं रख सकते| परन्तु ईश्वर जो उपहार प्रत्तेकप्राणी को देता है वह जीवन भर उसके पास रहता है| ईश्वर के पांच मूल्यवान उपहार - सादगी, सच्चाई, सुमिरन, सेवा, सत्संग की तुलना मनुष्य प्रदत्त किसी उपहार से नहीं हो सकती है|

ईश्वर की इच्छा:

जब तक ईश्वर की इच्छा नहीं होगी-तब तक तुम्हारे साथ अच्छा या बुरा कभी नहीं हो सकता| जब तक तुम ईश्वर की शरण में हो, तो कोई चहाकर भी तुम्हें हानि नहीं पहुँचा सकता|

आत्मसमर्पण:

जो पूरी तरह से मेरे प्रति समर्पित हो चुका है, जो श्रद्धा-विश्वासपूर्वक मेरी पूजा करता है, जो मुझे सदैव याद करता है और जो निरन्तर मेरे इस स्वरूप का ध्यान करता है, उसे मोक्ष प्रदान करना मेरा विशिष्ट गुण है|

सार-तत्त्व:

केवल ब्रह्म ही सार-तत्त्व है और संसार नश्वर है| इस संसार में वस्तुतः हमार कोई नहीं, चाहे वह पुत्र हो, पिता हो या पत्नी ही क्यों न हो|

भलाई:

यदि तुम भलाई के कार्य करते हो तो भलाई सचमुच में तुम्हारा अनुसरण करेगी|

सौन्दर्य:

हमको किसी भी व्यक्ति की सुंदरता अथवा कुरूपता से परेशान नहीं होना चाहिए, बल्कि उसके रूप में निहित ईश्वर पर ही मुख्य रूप से अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए|

दक्षिणा: 

दक्षिणा (श्रद्धापूर्वक भेंट) देना वैराग्ये में बढोत्तरी करता है और वैराग्ये के द्वारा भक्ति की वृद्धि होती है|

मोक्ष:

मोक्ष की आशा में आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में, मोक्ष प्राप्ति के लिए गुरु-चरणों की सेवा अनिवार्य है|

दान:

दाता देता है यानी वह भविष्य में अच्छी फसल काटने के लिए बीज बोता है| धन को धर्मार्थ कार्यों का साधन बनाना चाहिए| यदि यह पहले नहीं दिया गया है तो अब तुम उसे नहीं पाओगे| अतएव पाने के लिए उत्तम मार्ग दान देना है|

सेवा: 

इस धारणा के साथ सेवा करना कि मैं स्वतंत्र हूं, सेवा करूं या न करूं, सेवा नहीं है| शिष्य को यह जानना चाहिए कि उसके शरीर पर उसका नहीं बल्कि उसके 'गुरु' का अधिकार है और इस शरीर का अस्तित्व केवल 'गुरु' की सेवा करने में ही सार्थक है|

शोषण:

किसी को किसी से भी मुफ्त में कोई काम नहीं लेना चाहिए| काम करने वाले को उसके काम के बदले शीघ्र और उदारतापूर्वक पारिश्रमिक देना चाहिए|

अन्नदान:

यह निश्चित समझो कि जो भूखे को भोजन कराता है, वह वास्तव में उस भोजन द्वारा मेरी सेवा किया करता है| इसे अटल सत्य समझो|

भोजन:

इस मस्जित में बैठकर मैं कभी असत्य नहीं बोलूंगा| इसी तरह मेरे ऊपर दया करते रहो| पहले भूखे को रोटी दो, फिर तुम स्वंय खाओ| इस बात को गांठ बांध लो|

बुद्धिमान:

जिसे ईश्वर की कृपालुता (दया) का वरदान मिल चुका है, वह फालतू (ज्यादा) बातें नहीं किया करता| भगवान की दया के अभाव में व्यक्ति अनावश्यक बातें करता है|

झगड़े: 

यदि कोई व्यक्ति तुम्हारे पास आकर तुम्हें गालियां देता है या दण्ड देता है तो उससे झगड़ा मत करो| यदि तुम इसे सहन नहीं कर सकते तो उससे एक-दो सरलतापूर्वक शब्द बोलो अथवा उस स्थान से हट जाओ, लेकिन उससे हाथापाई (झगड़ा) मत करो|

वासना: 

जिसने वासनाओं पर विजय नहीं प्राप्त की है, उसे प्रभु के दर्शन (आत्म-साक्षात्कार) नहीं हो सकता|

पाप:

मन-वचन-कर्म द्वारा दूसरों के शरीर को चोट पहुंचाना पाप है और दूसरे को सुख पहुंचना पुण्य है, भलाई है|

सहिष्णुता: 

सुख और दुख तो हमारे पूर्वजन्म के कर्मों के फल हैं| इसलिए जो भी सुख-दुःख सामने आये, उसे उसे अविचल रहकर सहन करो|

त्य:

तुम्हें सदैव सत्य ही बोलना चाहिए| फिर चाहे तुम जहां भी रहो और हर समय मैं सदा तुम्हारे साथ ही रहूंगा|

एकत्व:

राम और रहीम दोनों एक ही थे और समान थे| उन दोनों में किंचित मात्र भी भेद नहीं था| तुम नासमझ लोगों, बच्चों, एक-दूसरे से हाथ मिला और दोनों समुदायों को एक साथ मिलकर रहना चाहिए| बुद्धिमानी के साथ एक-दूसरे से व्यवहार करो-तभी तुम अपने राष्ट्रीय एकता के उद्देश्य को पूरा कर पाओगे|

अहंकार:

कौन किसका शत्रु है? किसी के लिए ऐसा मत कहो, कि वह तुम्हारा शत्रु है? सभी एक हैं और वही हैं|

आधार स्तम्भ:

चाहे जो हो जाये, अपने आधार स्तम्भ 'गुरु' पर दृढ़ रहो और सदैव उसके साथ एककार रूप में रहकर स्थित रहो|

आश्वासन: 

यदि कोई व्यक्ति सदैव मेरे नाम का उच्चारण करता है तो मैं उसकी समस्त इच्छायें पूरी करूंगा| यदि वह निष्ठापूर्वक मेरी जीवन गाथाओं और लीलाओं का गायन करता है तो मैं सदैव उसके आगे-पीछे, दायें-बायें सदैव उपस्थित रहूंगा|

मन-शक्ति: 

चाहे संसार उलट-पलट क्यों न हो जाये, तुम अपने स्थान पर स्थित बने रहो| अपनी जगह पर खड़े रहकर या स्थित रहकर शांतिपूर्वक अपने सामने से गुजरते हुए सभी वस्तुओं के दृश्यों के अविचलित देखते रहो|

भक्ति: 

वेदों के ज्ञान अथवा महान् ज्ञानी (विद्वान) के रूप में प्रसिद्धि अथवा औपचारिकता भजन (उपासना) का कोई महत्त्व नहीं है, जब तक उसमे भक्ति का योग न हो|

भक्त और भक्ति: 

जो भी कोई प्राणी अपने परिवार के प्रति अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के बाद, निष्काम भाव से मेरी शरण में आ जाता है| जिसे मेरी भक्ति बिना यह संसार सुना-सुना जान पड़ता है जो दिन रात मेरे नाम का जप करता है मैं उसकी इस अमूल्य भक्ति का ऋण, उसकी मुक्ति करके चुका देता हूँ|

भाग्य:

जिसे दण्ड निर्धारित है, उसे दण्ड अवश्य मिलेगा| जिसे मरना है, वह मरेगा| जिसे प्रेम मिलना है उसे प्रेम मिलेगा| यह निश्चित जानो|

नाम स्मरण:

यदि तुम नित्य 'राजाराम-राजाराम' रटते रहोगे तो तुम्हें शांति प्राप्त होगी और तुमको लाभ होगा|

अतिथि सत्कार:

पूर्व ऋणानुबन्ध के बिना कोई भी हमारे संपर्क में नहीं आता| पुराने जन्म के बकाया लेन-देन 'ऋणानुबन्ध' कहलाता है| इसलिए कोई कुत्ता, बिल्ली, सूअर, मक्खियां अथवा कोई व्यक्ति तुम्हारे पास आता है तो उसे दुत्कार कर भगाओ मत|

गुरु: 

अपने गुरु के प्रति अडिग श्रद्धा रखो| अन्य गुरूओं में चाहे जो भी गुण हों और तुम्हारे गुरु में चाहे जितने कम गुण हों|

आत्मानुभव:

हमको स्वंय वस्तुओं का अनुभव करना चाहिए| किसी विषय में दूसरे के पास जाकर उसके विचार या अनुभवों के बारे में जानने की क्या आवश्यकता है?

गुरु-कृपा: 

मां कछुवी नदी के दूसरे किनारे पर रहती है और उसके छोटे-छोटे बच्चे दूसरे किनारे पर| कछुवी न तो उन बच्चों को दूध पिलाती है और न ही उष्णता प्रदान करती है| पर उसकी दृष्टिमात्र ही उन्हें उष्णता प्रदान करती है| वे छोटे-छोटे बच्चे अपने मां को याद करने के अलावा कुछ नहीं करते| कछुवी की दृष्टि उसके बच्चों के लिए अमृत वर्षा है, उनके जीवन का एक मात्र आधार है, वही उनके सुख का भी आधार है| गुरु और शिष्य के परस्पर सम्बन्ध भी इसी प्रकार के हैं|

सहायता: 

जो भी अहंकार त्याग करके, अपने को कृतज्ञ मानकर साईं पर पूर्ण विश्वास करेगा और जब भी वह अपनी मदद के लिए साईं को पुकारेगा तो उसके कष्ट स्वयं ही अपने आप दूर हो जायेगें| ठीक उसी प्रकार यदि कोई तुमसे कुछ मांगता है और वह वास्तु देना तुम्हारे हाथ में है या उसे देने की सामर्थ्य तुममे है और तुम उसकी प्रार्थना स्वीकार कर सकते हो तो वह वस्तु उसे दो| मना मत करो| यदि उसे देने के लिए तुम्हारे पास कुछ नहीं है तो उसे नम्रतापूर्वक इंकार कर दो, पर उसका उपहास मत उड़ाओ और न ही उस पर क्रोध करो| ऐसा करना साईं के आदेश पर चलने के समान है|

विवेक:

संसार में दो प्रकार की वस्तुएं हैं - अच्छी और आकर्षक| ये दोनों ही मनुष्य द्वारा अपनाये जाने के लिए उसे आकर्षित करती हैं| उसे सोच-विचार कर इन दोनों में से कोई एक वस्तु का चुनाव करना चाहिए| बुद्धिमान व्यक्ति आकर्षक वस्तु की उपेक्षा अच्छी वस्तु का चुनाव करता है, लेकिन मूर्ख व्यक्ति लोभ और आसक्ति के वशीभूत होकर आकर्षक या सुखद वस्तु का चयन कर लेता है और परिणामतः ब्रह्मज्ञान (आत्मानुभूति) से वंचित हो जाता है|

जीवन के उतार-चढ़ाव:

लाभ और हानि, जीवन और मृत्यु-भगवान के हाथों में है, लेकिन लोग कैसे उस भगवान को भूल जाते हैं, जो इस जीवन की अंत तक देखभाल करता है|

सांसारिक सम्मान: 

सांसारिक पद-प्रतिष्ठा प्राप्त कर भ्रमित मत हो| इष्टदेव के स्वरुप तुम्हारे रूप तुम्हारे मानस पटल पर सदैव अंकित रहना चाहिए| अपनी समस्त एन्द्रिक वासनाओं और अपने मन को सदैव भगवान की पूजा में निरंतर लगाये रखो|

जिज्ञासा प्रश्न:

केवल प्रश्न पूछना ही पर्याप्त नहीं है| प्रश्न किसी अनुचित धारणा से या गुरु को फंसाने और उसकी गलतियां पकड़ने के विचार से या केवल निष्किय अत्सुकतावश नहीं पूछे जाने चाहिए| प्रश्न पूछने के मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति अथवा आध्यात्मिक के मार्ग में प्रगति करना होना चाहिए|

आत्मानुभूति: 

मैं एक शरीर हूं, इस प्रकार की धारणा केवल कोरा भ्रम है और इस धारणा के प्रति प्रतिबद्धता ही सांसारिक बंधनों का मुख्य कारण है| यदि सच में तुम आत्मानुभूति के लक्ष्य को पाना चाहते हो तो इस धारणा और आसक्ति का त्याग कर दो|

आत्मीय सुख: 

यदि कोई तुमसे घृणा और नफरत करता है तो तुम स्वयं को निर्दोष मत समझो| क्योंकि तुम्हारा कोई दोष ही उसकी घृणा और नफरत का कारण बाना होगा| अपने अहं की झूठी संतुष्टि के लिए उससे व्यर्थ झगड़ा मोल मत लो, उस व्यक्ति की उपेक्षा करके, अपने उस दोष को दूर करने का प्रयास करो जिससे कारण यह सब घटित हुआ है| यदि तुम ऐसा कर सकोगे तो तुम आत्मीय सुख का अनुभव कर सकोगे| यही सुख और प्रसन्नता का सच्चा मार्ग है|

ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Sunday, 16 September 2018

श्री साईं लीलाएं - काका, नाथ भागवत पढ़ो, यही एक दिन तुम्हारे काम आयेगा

ॐ सांई राम





कल हमने पढ़ा था.. कर्म भोग न छूटे भाई

श्री साईं लीलाएं

काका, नाथ भागवत पढ़ो, यही एक दिन तुम्हारे काम आयेगा

शिरडी आने वाले लोगों में कई लोग किसी धार्मिक ग्रंथ का पाठ करते थे| या तो मस्जिद में बैठकर बाबा के सामने पढ़ते या अपने ठहरने की जगह पर बैठकर| कई लोगों का ऐसा रिवाज भी था कि वह अपनी पसंद का ग्रंथ खरीदकर शामा के द्वारा साईं बाबा के कर-कमलों में दे देते| बाबा उस ग्रंथ को उल्टा-पुल्टाकर फिर उसे वापस कर देते थे| भक्तों की ऐसी आस्था थी कि ऐसा प्रसाद ग्रंथ पढ़ने से उनका कल्याण हो जायेगा|

कभी-कभी ऐसा भी होता था कि बाबा किसी का ग्रंथ वापस भी न करते और उसे शामा को रखने के लिए कहते| वह एक भक्त ने खरीदा है - ऐसा सोचकर शामा यदि उसे लौटाने के लिए बाबा से पूछते तो भी बाबा ग्रंथ नहीं लौटाते थे और यह ग्रंथ तेरे पास ही रहेगा ऐसा सीधा-सा जवाद देते| यानी कौन ग्रंथ पढ़े, क्या पढ़े, ये निर्णय बाबा ही करते थे|

एक बार की बात है कि काका महाजनी बाबा के दर्शन करने के लिए शिरडी आये| उन्हें एक ऐसा ही ग्रंथ 'नाथ भागवत' बाबा ने दिया था| वे उसे हर समय अपने साथ रखते थे और रोजाना पढ़ते थे| जब काका महाजनी शिरडी आये तो शामा उनसे मिलने गये और निकलते समय काका से बोले - "काका, यह भागवत मैं देखकर लौटा देता हूं|" और ग्रंथ को अपने साथ में ले गये| जब शामा मस्जिद में गये तो बाबा ने पूछा - "शामा, यह ग्रंथ कौन-सा है?" तो शामा ने वही ग्रंथ बाबा के हाथ में दे दिया और बाबा ने वह ग्रंथ देखकर उसे वापस देते हुए कहा - "यह ग्रंथ तू अपने पास ही रखना, आगे काम आयेगा|"

तब शामा ने कहा - "बाबा ! यह ग्रंथ तो काका साहब का है, मैं उन्हें इसे वापस लौटाने का वादा करके आया हूं| यह मैं कैसे रख लूं?" बाबा ने कहा - "जब मैंने इस ग्रंथ को तुम्हें रखने के लिए कहा है तब यह समझ ले कि यह आगे चलकर तुम्हारे काम आनेवाला है|" अब शामा करे भी तो क्या करे, उन्होंने काका के पास जाकर सारी बात उन्हें ज्यों-की-त्यों बता दी और वह ग्रंथ अपने पास रख लिया|

कुछ दिन बाद काका जब फिर से शिरडी आये तो वह अपने साथ एक और भागवत ग्रंथ लाये थे| मस्जिद में बाबा के दर्शन करने के बाद जब काका ने वह ग्रंथ बाबा के हाथ में दिया, तो बाबा ने उसे प्रसाद के रूप में लौटाते हुए कहा - "ऐ काका ! यही ग्रंथ आगे चलकर तेरे काम आने वाला है| इसलिए अब यह ग्रंथ किसी को मत दे देना|" बाबा ने जिस ढंग से यह बात कही थी, उसे देखते हुए काका ने वह ग्रंथ अपने सिर पर उठाया और फिर साथ में ले गये|

ऐसा ही पार्सल एक बार शिरडी के डाकघर में बाबू साहब जोग के पास आया| पार्सल खोलने पर उन्होंने देखा तो वह लोकमान्य तिलक की लिखी किताब थी, जिसका नाम था 'गीता रहस्य'| जोग उस किताब को बगल में दबाये हुए सीधे मस्जिद में पहुंचे| वहां पहुंचकर बाबा के दर्शन कर चरणवंदना करने लगे, तभी वह पार्सल नीचे गिर पड़ा|

तब बाबा ने पूछा - "बापू साहब, इसमें क्या है?" जोग ने पार्सल खोलकर वह पुस्तक निकालकर चुपचाप बाबा के श्रीचरणों के पास रख दी| बाबा ने उठाकर कुछ देर उसके पन्ने उल्ट-पुल्ट कर देखे और उस पर एक रुपया रखकर वह पुस्तक जोग को लौटाते हुए बाबा ने कहा - "इस ग्रंथ को तू मन लगाकर पढ़ना| इसी से तेरा कल्याण हो जायेगा|" श्री जोग को ऐसा लगा कि यह साईं बाबा ने उन पर बड़ा अनुग्रह किया, फिर वह ग्रंथ को लेकर लौट गये|


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===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
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