शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 7 July 2018

श्री साईं लीलाएं- जब जौहर अली बाबा जी के चेले बने

ॐ सांई राम



कल हमने पढ़ा था.. कुश्ती के बाद बाबा में बदलाव 

श्री साईं लीलाएं
जब जौहर अली बाबा जी के चेले बने

साईं बाबा और मोहिद्दीन की कुश्ती के कुछ वर्षों के बाद जौहर अली नाम का एक मुस्लिम फकीर रहाता में अपने शिष्यों के साथ रहने आयावह हनुमान मंदिर के पास एक मकान में डेरा जमाकर रहने लगावह अहमदनगर का रहने वाला थाजौहर अली बड़ा विद्वान थाकुरान शरीफ की आयातें उसे मुंहजुबानी याद थींमीठी बोली उसकी अन्य विशेषता थीधीरे-धीरे रहाता के श्रद्धालु जन उससे प्रभावित होकर उसके पास आने लगेउसके पास आने वाला व्यक्ति उसका बड़ा सम्मान करता थापूरे रहाता में उसकी वाहवाही होने लगी थीधीरे-धीरे उसने रहाता के लोगों का विश्वास प्राप्त कर बहुत सारी आर्थिक मदद भी हासिल कर ली थी|


इसके बाद उसने हनुमान मंदिर के पास में ही ईदगाह बनाने का निर्णय लियालेकिन इस विषय को लेकर वहां के लोगों के साथ उसका विवाद हो गयाविवाद बढ़ जाने पर उसे रहाता छोड़कर शिरडी में शरण लेनी पड़ीशिरडी में वह साईं बाबा के साथ मस्जिद में रहने लगावहां पर भी उसने अपनी मीठी बोली के बल पर लोगों का दिल जीत लिया|साईं बाबा उसे पूरी तरह से पहचानते थेमगर उसे टोकते न थेसाईं बाबा के कुछ न कहने पर बाद में उस फकीर की इतनी हिम्मत बढ़ गयी कि वह लोगों को यह बताने लगा कि साईं बाबा उसके शिष्य हैंएक दिन उसने साईं बाबा से कहा - "तू मेरा चेला बन जा|" साईं बाबा ने कोई ऐतराज नहीं किया और उसी पल 'हांकर दीवह फकीर उन्हें लेकर रहाता चला गयागुरु (जौहर अली) अपने शिष्य ( साईं बाबा) की योग्यता को नहीं जानता थालेकिन शिष्य (साईं बाबा) गुरु (जौहर अली) के अवगुणों को भली-भाँति जानते थेइतना सब कुछ जानते हुए भी साईं बाबा ने कभी भी जौहर अली का अपमान नहीं किया और पूरी निष्ठा भाव से अपने गुरु के प्रति कर्त्तव्य का निर्वाह करते हुएगुरु की तरह सेवा कीउसकी प्रत्येक बात सर-आँखों पर रखी और तो और साईं बाबा ने उसके यहां पानी तक भी भरा|लेकिन जब कभी साईं बाबा की इच्छा होती तो वह अपने गुरु जौहर अली के साथ शिरडी में भी आया करते थेपर उनका रहना-सहना रहाता में ही थालेकिन बाबा के भक्तों को उनका रहाता में रहना अच्छा नहीं लगता थाउन्हें अपने साईं बाबा वापस चाहिये थेइसलिये सारे भक्त मिलकर बाबा को रहाता से वापस शिरडी लाने के लिए गएवहां पर भक्तों की साईं बाबा से ईदगाह के पास मुलाकात हुईबाबा के भक्तों ने उन्हें अपने रहाता आने का कारण बताया तो बाबा ने उन्हें फकीर के गुस्से के बारे में समझाते हुए वापस भेजना चाहापरंतु उन लोगों ने वापस जाने से इंकार कर दियाउनके बीच अभी बातचीत चल ही रही थी कि तभी वह फकीर वहां आ पहुंचा और जब उसे यह पता चला कि वह लोग उसके शिष्य (साईं बाबा) को लेने आये हैं तो वह गुस्से में लाल-पीला हो गया|वह फकीर बोला - "तुम इस बच्चे को ले जाना चाहते होयह नहीं जायेगा|" फिर दोनों पक्षों में काफी वाद-विवाद होने लगाअंत में लोगों की जिद्द के आगे फकीर सोच में पड़ गया और अंत में यह निर्णय हुआ कि गुरु-शिष्य दोनों ही शिरडी में रहेंआखिर दोनों शिरडी वापस आकर रहने लगे|इस तरह उन्हें बहुत दिन शिरडी में रहते हुए बीत गएतब एक दिन शिरडी के एक महात्मा देवीदास और जौहर अली दोनों में धर्म-चर्चा होने लगीतो उसमें अनेक दोष पाए गयेमहात्मा देवीदास साईं बाबा के चाँद पाटिल के साले के लड़के की बारात में शिरडी आने से 12 वर्ष पूर्व शिरडी आये थेउस समय उनकी उम्र लगभग 10-12 वर्ष की रही होगी और वह हनुमान मंदिर में रहते थेवे सुंदर और बुद्धिमान थेयानी वे ज्ञान और त्याग की साक्षात् मूर्ति थेतात्यापाटिलकाशीनाथ तथा अन्य कई लोग उन्हें गुरु की तरह मानते और उनका सम्मान करते थेतब हारने के डर से जौहर अली रात में ही भागकर बैजापुर गांव में चला गयाफिर कई वर्षों के बाद एक दिन वह शिरडी आया और साईं बाबा के चरणों में गिरकर रोकर माफी मांगने लगाउसने साईं बाबा की महत्ता को दिल से स्वीकार कर लियाउसका भ्रम मिट चुका था कि वह स्वयं गुरु है और साईं बाबा उसके शिष्य|उसकी सच्ची भावना जानकर साईं बाबा ने उसे समझाया और फिर आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग बताया|

कल चर्चा करेंगे..रोहिला के प्रति प्रेम 

==ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ==
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें । 

Friday, 6 July 2018

श्री साईं लीलाएं - कुश्ती के बाद बाबा में बदलाव

ॐ सांई राम




परसों हमने पढ़ा था.. संकटहरण श्री साईं 

श्री साईं लीलाएं

कुश्ती के बाद बाबा में बदलाव
अपने शुरूआती जीवन में साईं बाबा भी पहलवान की तरह रहते थेशिरडी में मोहिद्दीन तंबोली नाम का एक पहलवान रहा करता थाबाबा से एक बार किसी बात पर कहा-सुनी हो गईजिसके फलस्वरूप उसने बाबा को कुश्ती लड़ने कि चुनौती दे डालीबाबा अंतर्मुखी थेफिर भी उन्होंने उसकी चुनौती को स्वीकार कर लिया|


फिर दोनों में बहुत देर तक कुश्ती होती रहीआखिर में बाबा उससे कुश्ती में हार गयेमोहिद्दीन से कुश्ती में हार जाने के बाद बाबा के रहन-सहन और पहनावे में अचानक बदलाव आ गयाअब बाबा कफनी पहना करतेलंगोट बांधते और सिर पर सफेद कपड़ा बांधतेजिससे सिर ढंक जाएआसन व सोने के लिये बाबा टाट का एक टुकड़ा ही प्रयोग में लिया करते थेबाबा फटे-पुराने कपड़े पहनकर ही संतुष्ट रहते थेबाबा सदैव अलमस्त रहते और कपड़ाखाना इस चीजों पर उनका ध्यान तक नहीं होता|


साईं बाबा सदैव यही कहते थे - "गरीबी अव्वल बादशाहीअमीरी से लाख सवाईगरीबों का अल्लाह भाई|' इसका अर्थ यह है कि अमीरी से बड़ी बादशाहत गरीबी में हैइसका कारण यह है कि गरीब का भाईबंधु या सहायक अल्लाहईश्वर हैयदि इस पर विचार किया जाये तो अमीर को अनेकों तरह की चिंताएं हर समय घेरे रहती हैंवह सदैव उन्हीं में पड़ा रहता हैलेकिन गरीब व्यक्ति सदैव ईश्वर को ही याद करता रहता हैवैसे भी अभावों में हीगरीबी में ही ईश्वर याद आता है अन्यथा कोई ईश्वर को याद नहीं करताजो व्यक्ति ईश्वर की भक्ति में लीन रहता हैवह निश्चिंत रहता हैनिश्चिंत रहने वाला व्यक्ति ही वास्तव में बादशाह हैइसीलिए शायद बाबा ऐसा उच्चारण किया करते थे|कुश्ती का शौक पुणे तांबे के वैश्य संत गंगागीर को भी थावे भी अक्सर शिरडी आते-जाते रहते थेएक समय जब वह कुश्ती लड़ रहे थे तब अचानक ही उनके मन में कुश्ती त्याग देने का भाव पैदा हो गयाफिर एक अवसर अपर उन्हें ऐसा महसूस हुआजैसे कोई उनसे कह रहा हो कि भगवान के साथ खेलते हुए शरीर को त्याग देने में ही इस जीवन की सार्थकता है|वस्तुत: यह उनकी अन्तर्रात्मा की आवाज थीजिसका अर्थ यह था कि परमात्मा के श्रीचरणों में लगन लगाओइस अन्तर्रात्मा की आवाज को सुनने के बाद संत गंगागीर के मन में इस संसार से पूरी तरह वैराग्य पैदा हो गया और वे पूर्णरूपेण आध्यात्म की ओर प्रवृत्त हो गए|इसके बाद में उन्होंने पुणे तांबे के नजदीक ही एक मठ बनाया और उसमें अपने शिष्यों के साथ रहने लगेवहीं पर रहकर उन्होंने मोक्ष की प्राप्ति की|मोहिद्दीन से कुश्ती में हार जान के बाद साईं बाबा में भारी परिवर्तन पैदा हो गया थाबाबा अब पूरी तरह से अंतर्मुखी हो गये थेबाबा अब न तो किसी से मिलते-जुलते थे और न ही किसी से बात किया करते थेयदि कोई उनके पास अपनी समस्या आदि लेकर जाता था तो बाबा उसका मार्गदर्शन अवश्य करते थेउनके श्रीमुख से परमार्थ विचार ही निकलते और उन अमृत बोलों को सुनने वाले धन्य हो जाते|कुश्ती की घटना के बाद बाबा की जीवनचर्या भी पूरी तरह से बदल गयी थीअब बाबा का ठिकाना दिन में नीम के पेड़ के नीचे होता जहां पर वे बैठकर अपने स्वरूप (आत्मा) में लीन रहतेइच्छा होने पर गांव की मेड़ पर नाले के किनारे एक बबूल के पेड़ की छाया में बैठ जाते थेसंध्या समय बाबा वायु सेवन के लिए स्वेच्छानुसार विचरण करते थे|इच्छा होने पर बाबा कभी-कभार नीम गांव भी चले जाया करते थेवहां के बाबा साहब डेंगले से साईं बाबा को विशेष लगाव थाबाबा साहब डेंगले के छोटे भाई नाना साहब डेंगले थेउन्होंने दो विवाह किएफिर भी वे संतान सुख से वंचित थेएक बार नाना साहब को उनके बड़े भाई बाबा साहब ने शिरडी जाकर साईं बाबा के दर्शन कर उनसे आशीर्वाद लेने को कहानाना साहब ने अपने बड़े भाई की आज्ञा का पालन करते हुए शिरडी जाकर साईं बाबा के दर्शन किएसाईं बाबा के दर्शन और आशीर्वाद के परिणामस्वरूप एक निश्चित अवधि के बाद नाना साहब को पुत्र की प्राप्ति हो गई|ऐसे ही लोगों की मुरादें पूरी होती रहीं और साईं बाबा की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैलती चली गयीअब चारों ओर से अधिक संख्या में लोग बाबा के दर्शन करने के लिए रोजाना शिरडी आने लगेबाबा अपने किसी भी भक्त को निराश नहीं करते और अपना आशीर्वाद देकर उसकी मनोकामना को पूर्ण करते|द्वारिकामाई मस्जिद में साईं बाबा को उनके भक्त दिनभर घेरकर बैठे रहते थेरात को बाबा टूटी-फूटी हुई मस्जिद में सोया करते थेबाबा का रहने का ठिकाना द्वारिकामाई मस्जिद थावह दो हिस्सों में टूटी-फूटी इमारत थीबाबा वहीं रहतेसोते और वहीं बैठक लगातेबाबा के चिलमतम्बाकूटमरेललम्बी कफनीसिर के चारों ओर लपेटने के लिए एक सफेद कपड़ा और सटका थाकुल जमा सामन था जो बाबा सदैव अपने पास रखा करते थेबाबा अपने सिर पर उस सफेद कपड़े को कुछ इस ढंग से बांधा करते थे कि कपड़े का एक किनारा बाएं कान के ऊपर से होकर पीठ पर गिरता हुआ ऐसा लगता था जैसे कि बाबा ने बालों का जूड़ा बना रखा होबाबा उस सिर पर बांधने वाले कपड़े को कई-कई सप्ताह तक नहीं धोया करते थे|साईं बाबा सदैव नंगे पैरों ही रहा करते थेउन्होंने अपने पैरों में कभी भी जूते-चप्पल या खड़ाऊँ आदि पहनने का उपयोग नहीं किया थाआसन पर बैठने के नाम पर बाबा के पास टाट का एक टुकड़ा थाजिसे वे दिन के समय अपने बैठने के काम में लिया करते थेसर्दी से बचने के लिए एक धूनी हर समय जलती रहती थी और आज भी वह धूनी मौजूद हैबाबा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके धूनी तापते थेधूनी में वे छोटे-छोटे लकड़ियों के टुकड़े डालते रहते थेऐसा करके बाबा अपनी अहंइच्छा और आसक्तियों की आहुति दिया करते थेकभी-कभी लकड़ी के गट्ठर पर हाथ रखे बाबा धूनी को टकटकी लगाये देखते रहते थेबाबा की जुबान पर सदैव 'अल्लाह मालिकका उच्चारण रहता था|बाबा के पास हर समय भक्तों का तांता लगा रहता थाउस मस्जिद की पुरानी हालत और स्थानाभाव को देखते हुए बाबा के शिष्यों ने सन् 1912 में उसे मरम्मत करके नया रंग-रूप प्रदान कर दियाबाबा जब कभी भाव-विभोर हो जाया करते थे तो वे तब अपने पैरों में घुंघरूं बांधकर काफी देर तक नाचते-गाते रहेत थेयह दृश्य बहुत खूबसूरत होता था|

कल चर्चा करेंगे..जब बाबा जौहर अली के चेले बने 

===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

Thursday, 5 July 2018

श्री साई सच्चरित्र – अध्याय-1

 सांई राम




आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की ओर साईंवार की हार्दिक शुभ कामनाएं, हम प्रत्येक साईवार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...

श्री साई सच्चरित्र – अध्याय-1
गेहूँ पीसने वाला एक अद्भभुत सन्त वन्दना - गेहूँ पीसने की कथा तथा उसका तात्पर्य
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पुरातन पद्घति के अनुसार श्री हेमाडपंत श्री साई सच्चरित्र का आरम्भ वन्दना करते हैं 

1.
प्रथम श्री गणेश को साष्टांग नमन करते हैंजो कार्य को निर्विध समाप्त कर उस को यशस्वी बनाते हैं कि साई ही गणपति हैं 


2.
फिर भगवती सरस्वती कोजिन्होंने काव्य रचने की प्रेरणा दी और कहते हैं कि साई भगवती से भिन्न नहीं हैंजो कि स्वयं ही अपना जीवन संगीत बयान कर रहे हैं 


3.
फिर ब्रहाविष्णुऔर महेश कोजो क्रमशः उत्पत्तिसि्थति और संहारकर्ता हैं और कहते हैं कि श्री साई और वे अभिन्न हैं  वे स्वयं ही गुरू बनकर भवसहगर से पार उतार देंगें 


4.
फिर अपने कुलदेवता श्री नारायण आदिनाथ की वन्दना करते हैं  जो कि कोकण में प्रगट हुए  कोकण वह भूमि हैजिसे श्री परशुरामजी ने समुद् से निकालकर स्थापित किया था  तत्पश्चात् वे अपने कुल के आदिपुरूषों को नमन करते हैं 


5.
फिर श्री भारदृाज मुनि कोजिनके गोत्र में उनका जन्म हुआ  पश्चात् उन ऋषियों को जैसे-याज्ञवल्क्यभृगुपाराशरनारदवेदव्याससनक-सनंदनसनत्कुमारशुकशौनकविश्वामित्रवसिष्ठवाल्मीकिवामदेवजैमिनीवैशंपायननव योगींद्इत्यादि तथा आधुनिक सन्त जैसे-निवृतिज्ञानदेवसोपानमुक्ताबाईजनार्दनएकनाथनामदेवतुकारामकान्हानरहरि आदि को नमन करते हैं 


6.
फिर अपने पितामह सदाशिवपिता रघुनाथ और माता कोजो उनके बचपन में ही गत हो गई थीं  फिर अपनी चाची कोजिन्होंने उनका भरण-पोषण किया और अपने प्रिय ज्येष्ठ भ्राता को नमन करते हैं 


7.
फिर पाठकों को नमन करते हैंजिनसे उनकी प्रार्थना हैं कि वे एकाग्रचित होकर कथामृत का पान करें 


8.
अन्त में श्री सच्चिददानंद सद्रगुरू श्री साईनाथ महाराज कोजो कि श्री दत्तात्रेय के अवतार और उनके आश्रयदाता हैं और जो ब्रहा सत्यं जगनि्मथ्या का बोध कराकर समस्त प्राणियों में एक ही ब्रहा की व्यापि्त की अनुभूति कराते हैं 
 श्री पाराशरव्यासऔर शांडिल्य आदि के समान भक्ति के प्रकारों का संक्षेप में वर्णन कर अब ग्रंथकार महोदय निम्नलिखित कथा प्रारम्भ करते हैं 


गेहूँ पीसने की कथा
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सन् 1910 में मैं एक दिन प्रातःकाल श्री साई बाबा के दर्शनार्थ मसजिद में गया  वहाँ का विचित्र दृश्य देख मेरे आश्चर्य का ठिकाना  रहा कि साई बाबा मुँह हाथ धोने के पश्चात चक्की पीसने की तैयारी करने लगे  उन्होंने फर्श पर एक टाट का टुकड़ा बिछाउस पर हाथ से पीसने वाली चक्की में गेहूँ डालकर उन्हें पीसना आरम्भ कर दिया  मैं सोचने लगा कि बाबा को चक्की पीसने से क्या लाभ है  उनके पास तो कोई है भी नही और अपना निर्वाह भी भिक्षावृत्ति दृारा ही करते है  इस घटना के समय वहाँ उपसि्थत अन्य व्यक्तियों की भी ऐसी ही धोरणा थी  परंतु उनसे पूछने का साहस किसे था  बाबा के चक्की पीसने का समाचार शीघ्र ही सारे गाँव में फैल गया और उनकी यह विचित्र लीला देखने के हेतु तत्काल ही नर-नारियों की भीड़ मसजिद की ओर दौड़ पडी़  उनमें से चार निडर सि्त्रयां भीड़ को चीरता हुई ऊपर आई और बाबा को बलपूर्वक वहाँ से हटाकर हाथ से चक्की का खूँटा छीनकर तथा उनकी लीलाओं का गायन करते हुये उन्होंने गेहूँ पीसना प्रारम्भ कर दिया  पहिले तो बाबा क्रोधित हुएपरन्तु फिर उनका भक्ति भाल देखकर वे षान्त होकर मुस्कराने लगे  पीसते-पीसते उन सि्त्रयों के मन में ऐसा विचार आया कि बाबा के  तो घरदृार है और  इनके कोई बाल-बच्चे है तथा  कोई देखरेख करने वाला ही है  वे स्वयं भिक्षावृत्ति दृारा ही निर्वाह करते हैंअतः उन्हें भोजनाआदि के लिये आटे की आवश्यकता ही क्या हैं  बाबा तो परम दयालु है  हो सकता है कि यह आटा वे हम सब लोगों में ही वितरण कर दें  इन्हीं विचारों में मगन रहकर गीत गाते-गाते ही उन्होंने सारा आटा पीस डाला  तब उन्होंने चक्की को हटाकर आटे को चार समान भागों में विभक्त कर लिया और अपना-अपना भाग लेकर वहाँ से जाने को उघत हुई  अभी तक शान्त मुद्रा में निमग्न बाब तत्क्षण ही क्रोधित हो उठे और उन्हें अपशब्द कहने लगेसि्त्रयों क्या तुम पागल हो गई हो  तुम किसके बाप का माल हडपकर ले जा रही हो  क्या कोई कर्जदार का माल हैजो इतनी आसानी से उठाकर लिये जा रही हो  अच्छाअब एक कार्य करो कि इस अटे को ले जाकर गाँव की मेंड़ (सीमापर बिखेर आओ  मैंने शिरडीवासियों से प्रश्न किया कि जो कुछ बाबा ने अभी किया हैउसका यथार्थ में क्या तात्पर्य है  उन्होने मुझे बतलाया कि गाँव में विषूचिका (हैजाका जोरो से प्रकोप है और उसके निवारणार्थ ही बाबा का यह उपचार है  अभी जो कुछ आपने पीसते देखा थावह गेहूँ नहींवरन विषूचिका (हैजाथीजो पीसकर नष्ट-भ्रष्ट कर दी गई है  इस घटना के पश्चात सचमुच विषूचिका की संक्रामतकता शांत हो गई और ग्रामवासी सुखी हो गये 

यह जानकर मेरी प्रसन्नता का पारावार  रहा  मेरा कौतूहल जागृत हो गया  मै स्वयं से प्रश्न करने लगा कि आटे और विषूचिका (हैजारोग का भौतिक तथा पारस्परिक क्या सम्बंध है  इसका सूत्र कैसे ज्ञात हो  घटना बुदिगम्य सी प्रतीत नहीं होती  अपने हृतय की सन्तुष्टि के हेतु इस मधुर लीला का मुझे चार शब्दों में महत्व अवश्य प्रकट करना चाहिये  लीला पर चिन्तन करते हुये मेरा हृदय प्रफुलित हो उठा और इस प्रकार बाब का जीवन-चरित्र लिखने के लिये मुझे प्रेरणा मिली  यह तो सब लोगों को विदित ही है कि यह कार्य बाबा की कृपा और शुभ आशीर्वाद से सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया  आटा पीसने का तात्पर्य
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शिरडीवासियों ने इस आटा पीसने की घटना का जो अर्थ लगायावह तो प्रायः ठीक ही हैपरन्तु उसके अतिरिक्त मेरे विचार से कोई अन्य भी अर्थ है  बाब शिरड़ी में 60 वर्षों तक रहे और इस दीर्घ काल में उन्होंने आटा पीसने का कार्य प्रायः प्रतिदिन ही किया  पीसने का अभिप्राय गेहूँ से नहींवरन् अपने भक्तों के पापोदुर्भागयोंमानसिक तथा शाशीरिक तापों से था  उनकी चक्की के दो पाटों में ऊपर का पाट भक्ति तथा नीचे का कर्म था  चक्की का मुठिया जिससे कि वे पीसते थेवह था ज्ञान  बाबा का दृढ़ विश्वास था कि जब तक मनुष्य के हृदय से प्रवृत्तियाँआसक्तिघृणा तथा अहंकार नष्ट नहीं हो जातेजिनका नष्ट होना अत्यन्त दुष्कर हैतब तक ज्ञान तथा आत्मानुभूति संभव नहीं हैं  यह घटना कबीरदास जी की उसके तदनरुप घटना की स्मृति दिलाती है  कबीरदास जी एक स्त्री को अनाज पीसते देखकर अपने गुरू निपतिनिरंजन से कहने लगे कि मैं इसलिये रुदन कर रहा हूँ कि जिस प्रकार अनाज चक्की में पीसा जाता हैउसी प्रकार मैं भी भवसागर रुपी चक्की में पीसे जाने की यातना का अनुभव कर रहा हूँ  उनके गुरु ने उत्तर दिया कि घबड़ाओ नहीचक्की के केन्द्र में जो ज्ञान रुपी दंड हैउसी को दृढ़ता से पकड़ लोजिस प्रकार तुम मुझे करते देख रहे हो  उससे दूर मत जाओबसकेन्द्र की ओप ही अग्रसर होते जाओ और तब यह निशि्चत है कि तुम इस भवसागर रुपी चक्की से अवश्य ही बच जाओगे 

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु  शुभं भवतु ।।

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