शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 30 April 2016

सबका मालिक है साईं के अवतार में

ॐ सांई राम


  सबका मालिक है साईं के अवतार में, सबका मालिक है साईं के अवतार में
साईं रहते हैं शिर्डी के दरबार में, साईं रहते हैं शिर्डी के दरबार में

वो अमीरों फकीरों के सुलतान, और लाखों करोड़ों के अरमान हैं
वो सभी को खिलाते हैं संसार में, साईं रहते हैं शिर्डी के दरबार में

अपनी कफनी में दुनिया समाये हैं वो, देखो रूप अनोखा लाये हैं वो
गुल खिलाते हैं देखो वो अंगार में, साईं रहते हैं शिर्डी के दरबार में

जिनपे चश्मे करम साईं बाबा का हो, उनके तकदीर बन जाते हैं दोस्तो
कीजिये अर्ज़ साईं की सरकार में, साईं रहते हैं शिर्डी के दरबार में

नाम उनका हमें कितना प्यारा लगे, जैसे बहती हो अमृत की धारा लगे
गीत गाये सभी भक्त बड़े प्यार से, साईं रहते हैं शिर्डी के दरबार में

सबका मालिक है साईं के अवतार में, सबका मालिक है साईं के अवतार में
साईं रहते हैं शिर्डी के दरबार में, साईं रहते हैं शिर्डी के दरबार में

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-: आज का साईं सन्देश :-

उनसे क्यों तुलना करें,
बाबा शिर्डी साय ।
बाबा कह हेमांड जब,
मेरी समझ न आय ।।

आये मन में नम्रता,
अभिमान छुड़वाय ।
मम चतुराई देखकर,
बाबा मुझे बुलाय ।।

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Friday, 29 April 2016

कान्हा बन के जो आओ साईं राम

ॐ सांई राम


 कान्हा बन के जो आओ साईं राम तो प्यारी राधे रानी भी संग लाना 
इक अर्ज़ी मेरे घनश्याम के प्यारी राधे रानी भी संग लाना


लिख दी है मैं बस अपने दिल से तुमको साईंजी इक अर्ज़ी
मानो न मानो जानो न जानो आगे तुम्हारी है मर्ज़ी
तेरा होगा ये बड़ा ये एहसान के प्यारी राधे रानी भी संग लाना
कान्हा बन के जो आओ साईं राम तो प्यारी राधे रानी भी संग लाना

गैयन का ग्वाला बन के जो आना मुरली की धुन फिर सुनाना
नटखट झट से मटकी जो फोड़ो माखन मुझे ही खिलाना
जब छेड़ो कोई मुरली की तान तो प्यारी राधे रानी भी संग लाना
कान्हा बन के जो आओ साईं राम तो प्यारी राधे रानी भी संग लाना

राधा बिना कान्हा होली न खेले कान्हा बिना राधा रानी
होली खेलो संग हमरे ओ साईं रंगों में रंग जाये दीवानी
जब हाथों में हो थोडा सा गुलाल, जब रंगों में हो साईं का कमाल
तो प्यारी राधे रानी भी संग लाना
कान्हा बन के जो आओ साईं राम तो प्यारी राधे रानी भी संग लाना
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-: आज का साईं सन्देश :-
राजवंशी राजा हुए,
यादव वंश सुहाय |
देवगिरी राजा बड़े,
महादेव कहलाय ||

हेमान्द्री से राज सचिव,
उच्च कोटि विद्वान् |
मैं मूरख व मन्दमति,
मुझे न कोई जान ||
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Thursday, 28 April 2016

श्री साई सच्चरित्र अध्याय 33

ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं
हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है
हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा
किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...


श्री साई सच्चरित्र अध्याय 33

उदी की महिमा, बिच्छू का डंक, प्लेग की गाँठ, जामनेर का चमत्कार, नारायण राव, बाला बुवा सुतार, अप्पा साहेब कुलकर्णी, हरीभाऊ कर्णिक ।
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पूर्व अध्याय में गुरु की महानता का दिग्दर्शन कराया गया है । अब इस अध्याय में उदी के माहात्म्य का वर्णन किया जायेगा ।
प्रस्तावना
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आओ, पहले हम सन्तों के चरणों में प्रणाम करें, जनकी कृपादृरष्टि मात्र से ही समस्त पापसमूह भस्म होकर हमारे आचरण के दोष नष्ट हो जायेंगे । उनसे वार्तालाप करना हमारे लिये शिक्षाप्रद और अति आनन्ददायक है । वे अपने मन में यह मेरा और वह तुम्हारा ऐसा कोई भेद नहीं रखते । इस प्रकार के भेदभाव की कल्पना उनके हृदय में कभी भी उत्पन्न नहीं होती । उनका ऋण इस जन्म में तो क्या, अनेक जन्मों में भी न चुकाया जा सकेगा ।
उदी (विभूति)
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यह सर्वविदित है कि बाबा सबसे दक्षिणा लिया करते थे तथा उस धन राशि में से दाने करने के पश्चात् जो कुछ भी शेष बचता, उससे वे ईधन मोल लेकर सदैव धूनी प्रज्वलित रखते थे । इसी धूनी की भस्म ही उदी कहलाती है । भक्तों के शिरडी से प्रस्थान करते समय यह भस्म मुक्तहस्त से उन सभी को वितरित कर दी जाती थी ।
इस उदी से बाबा हमें क्या शिक्षा देते है । उदी वितरण कर बाबा हमें शिक्षा देते है कि इस अंगारे की नाईं गोचर होने वाले ब्रहमांड का प्रतिबिम्ब भस्म के ही समान है । हमारा तन भी ईधन सदृश ही है, अर्थात् पंचभूतादि से निर्मित है, जो कि सांसारिक भोगादि के उपरांत विनाश को प्राप्त होकर भस्म के रुप में परिणत हो जायेगा ।
भक्तों को इस बात की स्मृति दिलाने के हेतु ही कि अन्त में यह देह भस्म सदृश होने वाला है, बाबा उदी वितरण किया करते थे । बाबा इस उदी के द्घारा एक और भी शिक्षा प्रदान करते है कि इस संसार में ब्रहमा ही सत्य और जगत् मिथ्या है । इस संसार में वस्तुतः कोई किसी का पिता, पुत्र अथवा स्त्री नहीं हैं । हम जगत में अकेले ही आये है और अकेले ही जायेंगे । पूर्व में यह देखने में आ चुका है और अभी भी अनुभव किया जा रहा है कि इस उदी ने अनेक शारीरिक और मानसिक रोगियों को स्वास्थ्य प3दान किया है । यथार्थ में बाबा तो भक्तों को दक्षिणा और उदी द्घारा सत्य और असत्य में विवेक तथा असत्य के त्याग का सिद्घान्त समझाना चाहते थे । इस उदी से वैराग्य और दक्षिणा से त्याग की शिक्षा मिलती है । इन दोनों के अभाव में इस मायारुपी भवसागर को पार करना कठिन है, इसलिये बाबा दूसरे के भोग स्वयं भोग कर दक्षिणा स्वीकार कर लिया करते थे । जब भक्तगतण बिदा लेते, तब वे प्रसाद के रुप में उदी देकर और कुछ उनके मस्तक पर लगाकर अपना वरदर-हस्त उनके मस्तक पर रखते थे । जब बाबा प्रसन्न चित्त होते, तब वे प्रेमपूर्वक गीत गाया करते थे । ऐसा ही एक भजन उदी के सम्बन्ध में भी है । भजन के बोल है, रमते राम आओ जो आओ जी, उदिया की गोनियाँ लाओजी । यह बाबा शुदृ और मधुर स्वर में गाते थे ।
यह सब तो उदी के आध्यात्मिक प्रभाव के सम्बन्ध में हुआ, परन्तु उसमें भौतिक प्रभाव भी ता, जिससे भक्तों को स्वास्थ्य समृद्घि, चिंतामुक्ति एवं अनेक सांसारिक लाभ प्राप्त हुए । इसलिये उदी हमें आध्यात्मिक और सांसारिक लाभ पहुँचाती है । अब हम उदी की कथाएँ प्रारम्भ करते है । 
बिच्छू का डंक
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नासिक के श्री. नारायण मोतीराम जानी बाबा के परम भक्त थे । वे बा के अन्य भक्त रामचंद्र वामन मोडक के अधीन काम करते थे । एक बार वे अपनी माता के साथ शिरडी गये तथा बाबा के दर्शन का लाभ उठाया । तब बाबा ने उनकी माँ से कहा कि अब तुम्हारे पुत्र को नौकरी छोड़कर स्वतंत्र व्यवसाय करना चाहिये । कुछ दिनों में बाबा के वचन सत्य निकले । नारायण जानी ने नौकरी छोड़कर एक उपाहार गृह आनंदाश्रम चलाना प्रारम्भ कर दिया, जो अच्छी तरह चलने लगा । एक बार नारायण राव के एक मित्र को बिच्छू ने काट खाया, जिससे उसे असहनीय पीड़ा होने लगी । ऐसे प्रसंगों में उदी तो रामबाण प्रसिदृ ही है । काटने के स्थान पर केवल उसे लगा ही तो देना है । नारायण ने उदी खोजी, परन्तु कहीं न मिल सकी । उन्होंने बाबा के चित्र के समक्ष खड़े होकर उनसे सहायता की प्रार्थना की और उनका नाम लेते हुए, उनके चित्र के सम्मुख जलती हुई ऊदबत्ती में से एक चुटकी भस्म बाबा की उदी मानकर बिच्छू के डंक मारने के स्थान पर लेप कर दिया । वहाँ से उनके हाथ हटाते ही पीड़ा तुरंत मिट गई और दोनों अति प्रसन्न होकर चले गये ।
प्लेग की गाँठ
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एक समय एक भक्त बाँद्रा में था । उसे वहाँ पता चला कि उसकी लड़की, जो दूसरे स्थान पर है, प्लेगग्रस्त है और उसे गिल्टी निकल आई है । उनके पास उस समय उदी नहीं थी, इसलिये उन्होंने नाना चाँदोरकर के पास उदी भेजने के लिये सूचना भेजी । नानासाहेब ठाणे रेल्वे स्टेशन के समीप ही रास्ते में थे । जब उनके पास यह सूचना पहुँची, वे अपनी पत्नी सहित कल्याण जा रहे थे । उनके पास भी उस समय उदी नहीं थी । इसीलिये उन्होंने सड़क पर से कुच धूल उठाई और श्री साईबाबा का ध्यान कर उनसे सहायता की प्रार्थना की तथा उस धूल को अपनी पत्नी के मस्तक पर लगा दिया । वह भक्त खड़े-खड़े यह सब नाटक देख रहा था । जब वह घर लौटा तो उसे जानकर अति हर्ष हुआ कि जिस समय से नानासाहेब ने ठाणे रेल्वे स्टेशन के पास बाबा से सहायता करने की प्रार्थना की, तभी से उनकी लड़की की स्थिति में पर्याप्त सुधार हो चला था, जो गत तीन दिनों से पीड़ित थी ।

जामनेर का विलक्षण चमत्कार
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सन् 1904-05 में नानासाहेब चाँदोरकर खानदेश जिले के जामनेर में मामलतदार थे । जामनेर शिरडी से लगभग 100 मील से भी अधिक दूरी पर है । उनकी पुत्री मैनाताई गर्भावस्था में थी और प्रसव काल समीप ही था । उसकी स्थिति अति गम्भीर थी । 2-3 दिनों से उसे प्रसव-वेदना हो रही थी । नानासाहेब ने सभी संभव प्रयत्न किये, परन्तु वे सब व्यर्थ ही सिदृ हुए । तब उन्होंने बाबा का ध्यान किया और उनसे सहायता की प्रार्थना की । उस समय शिरडी में एक रागीर बुवा, जिन्हें बाबा बापूगीर बुवा के नाम से पुकारते थे, अपने घर खानदेश को लौट रहे थे । बाबा ने उन्हें अपने समीप बुलाकर कहा कि तुम घर लौटते समय थोड़ी देर के लिये जामनेर में उतरकर यह उदी और आरती श्री. नानासाहेब को दे देना । रामगीर बुवा बोले कि मेरे पास केवल दो ही रुपये है, जो कठिनाई से जलगाँव तक के किराये को ही पर्याप्त होंगे । फिर ऐसी स्थिति में लगाँव से और 30 मील आगे जाना मुझे संभव होगा । बाबा ने उत्तर दिया कि चिंता की कोई बात नहीं । तुम्हारी सब व्यवस्था हो जायेगी । तब बाबा ने शामा से माधव अडकर द्घारा रचित प्रसिदृ आरती की प्रतिलिपि कराई और उदी के साथ नानासाहेब के पास भेज दी । बाबा के वचनों पर विश्वास कर रामगीर बुवा ने शिरडी से प्रस्थान कर दिया और पौने तीन बजे रात्रि को जलगाँव पहुँचे । इस समय उनके पास केवल दो आने ही शेष थे, जिससे वे बड़ी दुविधा में थे ।
इतने में ही एक आवाज उनके कानों में पड़ी कि शिरडी से आये हुए बापूगीर बुवा कौन है । उन्होंने आगे बढ़कर बतलाया कि मैं ही शिरडी से आ रहा हूँ और मेरा ही नाम बापूगीर बुवा है । उस चपरासी ने, जो कि अपने आपको नानासाहेब चाँदोरकर द्घारा भेजा हुआ बतला रहा था, उन्हें बाहर लाकर एक शानदार ताँगे में बिठाया, जिसमें दो सुन्दर घोड़े जुते हुए थे । अब वे दोनों रवाना हो गये । ताँगा बहुत वेग से चल रहा था । प्रातःकाल वे एक नाले के समीप पहुँचे, जहाँ ताँगेवाले ने ताँगा रोककर घोड़ों को पानी पिलाया । इसी बीच चपरासी ने रामगीर बुवा से थोड़ा सा नाश्ता करने को कहा । उसकी दाढ़ी-मूछें तथा अन्य वेशभूषा से उसे मुसलमान समझकर उन्होंने जलपान करना अस्वीकार कर दिया । तब उस चपरासी ने कहा कि मैं गढ़वाल का क्षत्रिय वंशी हिन्दू हूँ । यह सब नाश्ता नानासाहेब ने आपके लिये ही भेजा है तथा इसमें आपको कोई आपत्ति और संदेह नहीं करना चाहिये । तब वे दोनों जलपान कर पुनः रवाना हुए और सूर्योदय काल में जामनेर पहुँच गये । रामगीर बुवा लघुशंका को गये और थोड़ी देर में जब वे लौटकर आये तो क्या देखते है कि वहाँ पर न तो ताँगा था, और न ताँगेवाला और न ही ताँगे के घोड़े । उनके मुख से एक शब्द भी न निकल रहा था । वे समीप ही कचहरी में पूछताछ करने गये और वहाँ उन्हें बतलाया कि इस समय मामलतदार घर पर ही है । वे नानासाहेब ेक घर गये और उन्हें बतलाया कि मैं शिरडी से बाबा की आरती और उदी लेकर आ रहा हूँ । उस समय मैनाताई की स्थिति बहुत ही गंभीर थी और सभी को उसके लिये बड़ी चिंता थी । नानासाहेब ने अपनी पत्नी को बुलाकर उदी को जल में मिलाकर अपनी लड़की को पिला देने और आरती करने को कहा । उन्होंने सोचा कि बाबा की सहायता बड़ी सामयिक है । थोड़ी देर में ही समाचार प्राप्त हुआ कि प्रसव कुशलतापूर्वक होकर समस्त पीड़ा दूर हो गई है । जब रामगीर बुवा ने नानासाहेब को चपरासी, ताँगा तथा जलपान आदि रेलवे स्टेशन पर भेजने के लिये धन्यवाद दिया तो नानासाहेब को यह सुनकर महान् आश्चर्य हुआ और वे कहने लगे कि मैंन न तो कोई ताँगा या चपरासी ही भेजा था और न ही मुझे शिरडी से आपके पधारने की कोई पूर्वसूचना ही थी ।
ठाणे के सेवानिवृत श्री. बी. व्ही. देव ने नानासाहेब चाँदोरकर के पुत्र बापूसाहेब चाँदोरकर और शिरडी के रामगीर बुवा से इस सम्बन्ध में बड़ी पूछताछ की और फिर संतुष्ट होकर श्री साईलीला पत्रिका, भाग 13 (नं 11,12,13) में गघ और पघ में एक सुन्दर रचना प्रकाशित की । भाई श्री. बी. व्ही. नरसिंह स्वामी ने भी (1) मैनाताई (भाग 5, पृष्ठ 14), (2) बापूसाहेब चाँदोरकर (भाग 20, पृष्ठ 50) और (3) रामगीर बुवा (भाग 27, पृष्ठ 83) के कथन लिये है, जो कि क्रमशः 1 जून 1936, 16 सितम्बर 1936 और दिसम्बर 1936 को छपे है और यह सब उन्होंने अपनी पुस्तक भक्तों के अनुभव भाग 3 में प्रकाशित किये है । निम्नलिखि प्रसंग रामगीर बुवा ने कथनानुसार उद्घत किया जाता है ।
एक दिन मुझे बाबा ने अपने समीप बुलाकर एक उदी की पुड़िया और एक आरती की प्रतिलिपि देकर आज्ञा दी कि जामनेर जाओ और यह आरती तथा उदी नानासाहेब को दे दो । मैंने बाबा को बताया कि मेरे पास केवल दो रुपये ही है, जो कि कोपरगाँब से जलगाँव जाने और फिर वहाँ से बैलगाड़ी द्घारा जामनेर जाने के लिये अपर्याप्त है । बाबा ने कहा अल्ला देगा । शुक्रवार का दिन था । मैं शीघ्र ही रवाना हो गया । मैं मनमाड 6-30 बजे सायंकाल और जलगाँव रात्रि को 2 बजकर 45 मिनट पर पहुँचा । उस समय प्लेग निवारक आदेश जारी थे, जिससे मुझे असुविधा हुई और मैं सोच रहा था कि कैसे जामनेर पहुँचूँ । रात्रि को 3 बजे एक चपरासी आया, जो पैर में बूट पहिने था, सिर पर पगड़ी बाँधे व अन्य पोशाक भी पहने था । उसने मुझे ताँगे में बिठा लिया और ताँगा चल पड़ा । मैं उस समय भयभीत-सा हो रहा था । मार्ग में भगूर के समीप मैंने जलपान किया । जब प्रातःकाल जामनेर पहुँचा, तब उसी समय मुझे घुशंका करने की इच्छा हुई । जब मैं लौटकर आया, तब देखा कि वहाँ कुछ भी नहीं है । ताँगा और ताँगेवाला अदृश्य है ।
नारायण राव
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नारायण राव को बाबा के दर्शनों का तीन बार सौभाग्य प्राप्त हुआ । सन् 1918 में बाबा के महासमाधि लेने के तीन वर्ष पश्चात् वे शिरडी जाना चाहते थे, परन्तु किसी कारणवश उनका जाना न हो सका । बाबा के समाधिस्थ होने के एक वर्ष के भीतर ही वे रुग्ण हो गये । किसी भी उपचार से उन्हें लाभ न हुआ । तब उन्होंने आठों प्रहर बाबा का ध्यान करना प्रारंभ कर दिया । एक रात को उन्हें स्वप्न हुआ । बाबा एक गुफा में से उन्हें आते हुए दिखाई पड़े और सांत्वना देकर कहने लगे कि घबराओ नहीं, तुम्हें कल से आराम हो जायेगा और एक सप्ताह में ही चलने-फिरने लगोगे । ठीक उतने ही समय में नारायणराव स्वस्थ हो गये । अब यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या बाबा देहधारी होने से जीवित कहलाते थे और क्या उन्होंने देह त्याग दी, इसलिये मृत हो गये । नहीं । बाबा अमर है, क्योंकि वे जीवन और मृत्यु से परे है । एक बार भी अनन्य भाव से जो उनकी शरण में जाता है, वह कहीं भी हो, उसे वे सहायता पहुँचाते है । वे तो सदा हमारे बाजू में ही खड़े है और चाहे जैसा रुप लेकर भक्त के समक्ष प्रकट होकर उसकी इच्छा पूर्ण कर देते है ।
अप्पासाहेब कुलकर्णी
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सन् 1917 में अप्पासाहेब कुलकर्णी के शुभ दिन आये । उनका ठाणे को स्थानानंतरण हो गया । उन्होंने बालासाहेब भाटे द्घारा प्राप्त बाबा के चित्र का पूजन करना आरम्भ कर दिया । उन्होंने सच्चे हृदय से पूजा की । वे हर दिन फूल, चन्दन और नैवेघ बाबा को अर्पित करते और उनके दर्शनों की बड़ी अभिलाषा रखते थे । इस सम्बन्ध में इतना तो कहा जा सकता है कि उत्सुकतापूर्वक बाबा के चित्र को देखना ही बाबा के प्रत्यक्ष दर्शन के सदृश है । नीचे लिखी कथा से यह बात स्पष्ट हो जाती है ।
बाला बुवा सुतार
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बम्बई मे एक बालाबुवा नाम के संत थे, जो कि अपनी भक्ति, भजन और आचरण के कारण आधुनिक तुकाराम के नाम से विख्यात थे । सन् 1917 में वे शिरडी आये । जब उन्होंने बाबा को प्रणाम किया तो बाबा कहने लगे कि मैं तो इन्हें चार वर्षों से जानता हूँ । बालाबुवा को आश्चर्य हुआ और उन्होंने सोचा कि मैं तो प्रथम बार ही शिरडी आया हूँ, फिर यह कैसे संभव हो सकता है । गहन चिन्तन करने पर उन्हें स्मरण हुआ कि चार वर्ष पूर्व उन्होंने बम्बई में बाबा के चित्र को नमस्कार किया था । उन्हें बाबा के शब्दों की यथार्थता का बोध हो गया और वे मन ही मन कहने लगे कि संत कितने सर्वव्यापक और सर्वज्ञानी होते है तथा अपने भक्तों के प्रति उनके हृदय में कितनी दया होती है । मैंने तो केवल उनके चित्र को ही नमस्कार किया था तो भी यह घटना उनको ज्ञात हो गई । इसलिए उन्होंने मुझे इस बात का अनुभव कराया है कि उनके चित्र को देखना ही उनके दर्शन करने के सदृश है ।
अब हम अप्पासाहेब की कथा पर आते है । जब वे ठाणे में थे तो उन्हें भिवंडी दौरे पर जाना पड़ा, जहां से उन्हें एक सप्ताह में लौटना संभव न था । उनकी अनुपस्थिति में तीसरे दिन उनके घर में निम्नलिखित विचित्र घटना हुई । दोपहर के समय अप्पासाहेब के गृह पर एक फकीर आया, जिसकी आकृति बाबा के चित्र से ही मिलती-जुलती थी । श्री मती कुलकर्णी तथा उनके बच्चों ने उनसे पूछा कि आप शिरडी के श्री साईबाबा तो नहीं है । इस पर उत्तर मिला कि वे तो साईबाबा के आज्ञाकारी सेवक है और उनकी आज्ञा से ही आप लोगों की कुशल-क्षेम पूछने यहाँ आये है । फकीर ने दक्षिणा माँगी तो श्री मती कुलकर्णी ने उन्हें एक रुपया भेंट किया । तब फकीर ने उन्हें उदी की एक पुड़िया देते हुए कहा कि इसे अपने पूजन में चित्र के साथ रखो । इतना कहकर वह वहाँ से चला गया । अब बाबा की अदभुत लीला सुनिये ।
भिवंडी में अप्पासाहेब का घोड़ा बीमार हो गया, जिससे वे दौरे पर आगे न जा सके । तब उसी शाम को वे घर लौट आये । घर आने पर उन्हें पत्नी के द्घारा फकीर के आगमन का समाचार प्राप्त हुआ । उन्हें मन में थोड़ी अशांति-सी हुई कि मैं फकीर के दर्शनों से वंचित रह गया तथा पत्नी द्घारा केवल एक रुपया दक्षिणा देना उन्हें अच्छा न लगा । वे कहने लगे कि यदि मैं उपस्थित होता तो 10 रुपये से कम कभी न देता । तब वे फिर भूखे ही फकीर की खोज में निकल पड़े । उन्होंने मसजिद एवं अन्य कई स्थानों पर खोज की, परन्तु उनकी खोज व्यर्थ ही सिदृ हुई । पाठक अध्याय 32 में कहे गये बाबा के वचनों का स्मरण करें कि भूखे पेट ईश्वर की खोज नहीं करनी चाहिये । अप्पासाहेब को शिक्षा मिल गई । वे भोजन के उपरांत जब अपने मित्र श्री. चित्रे के साथ घूमने को निकले, तब थोड़ी ही दूर जाने पर उन्हें सामने से एक फकीर द्रु तगति से आता हुआ दिखाई पड़ा । अप्पासाहेब ने सोचा कि यह तो वही फकीर प्रतीत होता है, जो मेरे घर पर आया था तथा उसकी आकृति भी बाबा के चित्र के अनुरुप ही है । फकीर ने तुरन्त ही हाथ बढ़ाकर दक्षिणा माँगी । अप्पासाहेब ने उन्हें एक रुपया दे दिया, तब वह और माँगने लगा । अब अप्पासाहेब ने दो रुपये दिये । तब भी उसे संतोष न हुआ । उन्होंने अपने मित्र चित्रे से 3 रुपये उधार लेकर दिये, फिर भी वह माँगता ही रहा । तब अप्पासाहेब ने उसे घर चलने को कहा । सब लोग घर पर आये और अप्प्साहेब ने उन्हें 3 रुपये और दिये अर्थात् कुल 9 रुपये, फिर भी वह असन्तुष्ट प्रतीत होता था और माँगे ही जा रहा था । तब अप्पासाहेब ने कहा कि मेरे पास तो 10 रुपये का नोट है । तब फकीर ने नोट ले लिया और 9 रुपये लौटाकर चला गया । अप्पासाहेब ने 10 रुपये देने को कहा था, इसलिये उनसे 10 रुपये ले लिये और बाबा द्घारा स्पर्शित 9 रुपये उन्हें वापस मिल गये । अंक 9 रुपये अर्थपूर्ण है तथा नवविघा भक्ति की ओर इंगित करते है (देखो अध्याय 21) । यहाँ ध्यान दें कि लक्ष्मीबाई को भी उन्होंने अंत समय में 9 रुपये ही दिये थे।
उदी की पुड़िया खोलने पर अप्पासाहेब ने देखा कि उसमें फूल के पत्ते और अक्षत है । जब वे कालान्त में शिरडी गये तो उन्हें बाबा ने अपना एक केश भी दिया । उन्होंने उदी और केश को एक ताबीज में रखा और उसे वे सदैव हाथ पर बाँधते थे । अब अप्पासाहेब को उदी की शक्ति विदित हो चुकी थी । वे कुशाग्र बुद्घि के थे । प्रथम उन्हें 40 रुपये मासिक मिलते थे, परन्तु बाबा की उदी और चित्र प्राप्त होने के पश्चात उनका वेतन कई गुना हो गया तथा उन्हें मान और यश भी मिला । इन अस्थायी आकर्षणों के अतिरिक्त उनकी आध्यात्मिक प्रगति भी शीघ्रता से होने लगी । इसलिये सौभाग्यवश जिनके पास उदी है, उन्हें स्नान करने के पश्चात मस्तक पर धारण करना चाहिये और कुछ जल में मिलाकर वह तीर्थ की नाई ग्रहण करना चाहिये ।
हरीभाऊ कर्णिक
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सन् 1917 में गुरु पूर्णमा के शुभ दिना डहाणू, जिला ठाणे के हरीभाऊ कर्णिक शिरडी आये तथा उन्होंने बाबा का यथाविधि पूजन किया । उन्होंने वस्तुएं और दक्षिणा आदि भेंट कर शामा के द्घारा बाब से लौटने की आज्ञा प्राप्त की । वे मसजिद की सीढ़ियों पर से उतरे ही थे कि उन्हें विचार आया कि एक रुपया और बाबा को अर्पण करना चाहिये । वे शामा को संकेत से यह सूचना देना चाहते थे कि बाबा से जाने की आज्ञा प्राप्त हो चुकी है, इसलिए मैं लौटना नहीं चाहता हूँ । परन्तु शामा का ध्यान उनकी ओर नहीं गया, इसलिए वे घर को चल पड़े । मार्ग में वे नासिक के मुख्य द्गार के भीतर बैठा करते थे, भक्तों को वहीं छोड़ कर हरीभाऊ के पास आये और उनका हाथ पकड़कर कहने लगे कि मुझे मेरा रुपया दे दो । कर्णिक को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने सहर्ष रुपया दे दिया । उन्हें विचार आया कि मैंने बाबा को रुपया देने का मन में संकल्प किया था और बाबा ने यह रुपया नासिक के नरसिंह महाराज के द्घारा ले लिया । इस कथा से सिदृ होता है कि सब संत अभिन्न है तथा वे किसी न किसी रुप में एक साथ ही कार्य किया करते है ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।
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Wednesday, 27 April 2016

साईं ने दिये जो ग्यारह वचन

ॐ सांई राम


 साईं ने दिये जो ग्यारह वचन वो, तू पढ़ ले तर जायेगा
इन वचनों को समझ सके तो, चैन तू मनवा पायेगा
साईं ने दिये जो ग्यारह वचन वो, तू पढ़ ले तर जायेगा

शिर्डी पावन भूमि इस पर, पाँव रखेगा जो आके
तत्क्षण उसके पाप मिटेंगे, लौटेगा वो हर वर पाके
जो भी चढ़ेगा समाधि मेरी, उसका दुःख मिट जायेगा
साईं ने दिये जो ग्यारह वचन वो, तू पढ़ ले तर जायेगा

छोड़ गया मैं देह परन्तु, आऊँगा भक्तों के लिये
सिद्धिदायिनी मेरी समाधि, दृढ विश्वास तू रख इसमें
नित्य हूँ जीवित सत्य यही है, भक्त ये अनुभव पायेगा
साईं ने दिये जो ग्यारह वचन वो, तू पढ़ ले तर जायेगा

मेरी शरण में आके सवाली, लौटा कभी नहीं कोई खाली
मुझ को भजे जिस भाव से जो भी, पाये मुझे उस भाव में ही
सत्य वचन है मत कर संशय, साईं तेरा भार उठायेगा
साईं ने दिये जो ग्यारह वचन वो, तू पढ़ ले तर जायेगा

मदद मिलेगी सब को ही जानो, पायेगा जो भी माँगेगा
मन मन वचन से जो है मेरा, ऋणी हूँ सदा ही मैं उसका
धन्य है वो जो भिन्न न मुझसे, मुझ में वो आन समायेगा
साईं ने दिये जो ग्यारह वचन वो, तू पढ़ ले तर जायेगा

साईं ने दिये जो ग्यारह वचन वो, तू पढ़ ले तर जायेगा
इन वचनों को समझ सके तो, चैन तू मनवा पायेगा
साईं ने दिये जो ग्यारह वचन वो, तू पढ़ ले तर जायेगा


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-: आज का साईं सन्देश :-  
बाबाजी की बात सुन, वे अचरज कर जाय |
वाड़े वाली बात को, साईं कैसे पाय ||
'हेमांड पन्त' नाम से, बाबाजी बुलवाय |
'हेमांद्री' सा नाम पा,गोविन्द जी चकराय ||
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Tuesday, 26 April 2016

OM SHREE HANUMANTE NAMAH

ॐ सांई राम



Sri Hanuman was born of Anjani from Pavana, the wind-god. He was named Hanuman after the name of the city of Hanumpur over which his maternal uncle Parti Surya ruled. Hanuman's body was hard as a stone. So Anjani named him Vajranga. He is also known by the names "Mahavir" or mightiest hero (because he exhibited several heroic feats), Balibima and Maruti.

The world has not yet seen and will not see in future also a mighty hero like Sri Hanuman. During his life he worked wonders and exhibited superhuman feats of strength and valour. He has left behind him a name which, as long as the world lasts, will continue wielding a great influence over the minds of millions of people.
He is one of the seven Chiranjivis. He was the only learned scholar who knew the nine Vyakaranas. He learnt the Sastras from the sun-god. He was the wisest of the wise, strongest of the strong and bravest of the brave. He was the Sakti of Rudra. He who meditates on him and repeats his name attains power, strength, glory, prosperity and success in life. He is worshipped in all parts of India, particularly in Maharashtra.

He was born at the most auspicious hour of the morning of the 8th of the Lunar month, Chaitra, at 4 o'clock on the most blessed day, Tuesday.

He had the power to assume any form he liked; to swell his body to an enormous extent and to reduce it to the length of a thumb. His strength was superhuman. He was the terror of Rakshasas. He was well versed in the four Vedas and other sacred books. His valour, wisdom, knowledge of the scriptures and superhuman strength attracted everybody who came near him. He had extraordinary skill in warfare.
He was the chosen messenger, warrior and servant of Sri Rama. He was the votary and devotee of Lord Rama. Rama was his all in all. He lived to serve Rama. He lived in Rama. He lived for Rama. He was a minister and intimate friend of Sugriva.
From his very birth he exhibited extraordinary physical strength and worked many miracles.

When he was a child he put the sun into his mouth. All the gods were very much troubled. They came with folded hands to the child and humbly entreated him to release the sun. The child set free the sun at their request.

Hanuman saw Sri Rama for the first time in Kishkindha. Sri Rama and Lakshmana came there in the course of their search of Sita whom Ravana had carried away.
A Rishi pronounced a curse on Hanuman for his wrong action, that he would remain unconscious of his great strength and prowess till he met Sri Rama and served him with devotion. As soon as Hanuman beheld Sri Rama he became conscious of his strength and power.

In Lanka, Hanuman exhibited his immense strength and extraordinary powers. He destroyed the beautiful grove which was a pleasure resort of Ravana. He uprooted many trees and killed many Rakshasas. Ravana was very much infuriated at this. He sent Jambumali to fight against Sri Hanuman who took the trunk of a tree and hurled it against Jambumali and killed him. Ravana sent his son Aksha to fight against Hanuman. He was also killed. Then he sent Indrajit. Hanuman threw a great tree upon Indrajit. Indrajit fell down senseless on the ground. After some time Indrajit recovered his consciousness. He threw the noose of Brahma on Hanuman. Hanuman allowed himself to be bound by the noose. He wanted to honour Brahma. Indrajit ordered the Rakshasas to carry the monkey to his father's court. Even a hundred Rakshasas were not able to lift Hanuman.

Hanuman made himself as light as possible. The Rakshasas then lifted him up. When they placed him over their shoulders he suddenly became heavy and crushed them to death. Then Hanuman asked the Rakshasas to remove the rope. They removed the rope and Hanuman proceeded to the council hall of Ravana.

Ravana said, "O mischievous monkey, what will you say in your defence? I will put you to death." Hanuman laughed and said, "O wicked Ravana, give back Sita to Lord Rama and ask his pardon; otherwise you will be ruined and the whole of Lanka will be destroyed." These words of Hanuman made Ravana very furious. He asked the Rakshasas to cut off the head of Hanuman.

Vibhishana intervened and said, "O brother, it is not lawful and righteous to kill a messenger. You can inflict some punishment only."

Ravana consented. He wanted to deprive Hanuman of his tail and make him ugly. He ordered the Rakshasas to wrap Hanuman's tail with cloths soaked in oil and ghee. Hanuman extended his tail to such length and size that all the cloths in Lanka would not cover it. Then he reduced his tail of his own accord. The Rakshasas wrapped the tail with cloths soaked in oil and ghee and lighted the cloths. Hanuman expanded his body to an enormous size and began to jump from place to place. The whole of Lanka caught on fire. All the palatial buildings were burnt down to ashes.
Hanuman then jumped into the sea in order to cool and refresh himself. A drop of his perspiration fell into the mouth of a great fish which gave birth to a mighty hero named Makara Dhvaja. Makara Dhvaja is considered the son of Hanuman.

Thereupon Hanuman went to the Asoka grove and told Sita all that he had done.
Then he crossed the sea through the air and came to the place where his army was placed. He told them all that had happened. Thereupon they all marched quickly to carry the good news to Sri Rama and Sugriva. They reached the city of Kishkindha. Hanuman gave Sita's ring to Lord Rama. Sri Rama rejoiced heartily. He praised Hanuman and embraced him saying, "O mighty hero I cannot repay your debt."
When all the brothers and sons of Ravana were killed, Ravana sent for his brother Ahi Ravana who was the king of the nether world. Ahi Ravana came to Lanka. Ravana asked his help to fight against Sri Rama and Lakshmana.

Ahi Ravana consented to help his brother. At the dead of night he assumed the form of Vibhishana, the brother of Ravana and an ally and devotee of Sri Rama. He reached the place where Rama and Lakshmana were sleeping. Hanuman was keeping watch. He thought that it was Vibhishana who was coming. Therefore he allowed him to enter the camp. Ahi Ravana quietly took the two brothers upon his shoulders and repaired to his kingdom.

When the day dawned, Hanuman found out that Sri Rama and Lakshmana were missing. He found out that Ahi Ravana had carried them to his kingdom. At once he proceeded to the nether world and received information that Ahi Ravana had made arrangements to kill the two brothers in sacrifice. Hanuman assumed a tiny form, entered the temple and sat over the image of the goddess. The image went down into the earth. Hanuman took her seat. When Ahi Ravana was about to sacrifice the two brothers, Hanuman appeared in his own form and killed him. He installed Makara Dhvaja, his own son on the throne, took the brothers on his shoulders and brought them to Lanka.

Hanuman killed many heroes in the great war. Dhumar, Vajro, Roshat, Ankhan and several other great warriors were killed by him.

When the great war was over, Vibhishana was installed on the throne of Lanka. The time of banishment was about to be over. Sri Rama, Lakshmana, Sita and Sri Hanuman sat in the Pushpaka Vimana or aeroplane and reached Ayodhya in time.
The coronation ceremony of Lord Rama was celebrated with great eclat and pomp. Sita gave Hanuman a necklace of pearls of rare quality. Hanuman received it with great respect and began to break the pearls with his teeth. Sita and other ministers who were sitting in the council hall were quite astonished at this queer act of Hanuman.

Sita asked Hanuman, "O mighty hero, what are you doing? Why do you break the pearls?" Sri Hanuman said, "O venerable mother, it is the most valuable necklace indeed as it has come to me through thy holy hand. But I want to find out whether any of the pearls contain my beloved Lord Rama. I do not keep a thing devoid of him. I do not find him in any of the pearls." Sita asked, "Tell me whether you keep Lord Rama within you." Sri Hanuman immediately tore open his heart and showed it to Sri Rama, Sita and others. They all found Lord Rama accompanied by Sita in the heart of Sri Hanuman.

Lord Rama rejoiced heartily. He came down the throne and embraced Hanuman and blessed him. Sri Hanuman passed the rest of his life in the company of the Lord.
When Sri Rama ascended to his supreme abode, Sri Hanuman also wished to follow him. But the Lord asked him to remain in this world as his representative and attend all the assemblies of men where discourses on his deeds were held and heard, and help his devotees in cultivating devotion.

He is a Chiranjeevi. He is everywhere. He who has eyes and devotion beholds him and receives his blessing.

Hanuman ranks first amongst the heroes of the world. His heroic deeds, wonderful exploits and marvellous feats of strength and bravery cannot be adequately described. His sense of duty was extremely laudable. He had great skill in all military tactics and methods of warfare. His crossing the sea of thirty miles in one leap and lifting the crest of a mountain in the palm of the hand, his carrying of the brothers on his shoulders from the nether world to Lanka are all astounding, superhuman feats which baffle human description.

He conquered innumerable difficulties which cropped up in his way through his courage, patience and undaunted spirit. He made untiring search to find Sita. At the time of danger he exhibited marvellous courage and presence of mind. He was steady and firm in his actions. He was always successful in his attempts. Failure was not known to him. He gave up his life in the service of the Lord. He had not a tinge of selfishness in his actions. All his actions were offerings unto Lord Rama. No one reached the peak in Dasya Bhava like Sri Hanuman. He was a rare jewel among devotees, the supreme head among Pundits, the king among celibates and the commander among heroes and warriors.

O mighty Hanuman, untiring and devoted Sevak of Sri Rama, joy of Anjana, king of Brahmacharins, show us the secrets of Brahmacharya and the ways to attain purity in thought, word and deed. May India have such heroes and Brahmacharins ever more!

Where Hanuman is, there are Sri Rama and Sri Sita and wherever Sri Rama and Sri Sita are praised and their deeds recited, there Hanuman is.
Glory to Hanuman, the blessed devotee of Lord Rama. Glory, glory to Sri Anjaneya, the mighty hero, undaunted warrior and learned Brahmacharin, the like of whom the world has not yet seen and will not see in time to come.
May his blessings be upon you all. Let us sing his glory now:

Jaya Siya Ram Jaya, Jaya Siya Ram
Jaya Hanuman Jaya, Jaya Hanuman.

Monday, 25 April 2016

ओ जाने वाले आ जा तेरी याद सताये।



दरवाजे पर हर दस्तक तेरे कदमों की आहट सुनाती हैं।
ना तड़पा और मेरे बच्चे तेरी याद बहुत ही सताती हैं।।

कलयुग में अवतार लेके आये मेरे साईं जी

ॐ सांई राम


कलयुग में अवतार लेके आये मेरे साईं जी
दुनिया का उद्धार करने आये मेरे साईं जी

सतयुग में ये नरसिंह थे और त्रेता में श्री राम
द्वापर में ये कृष्ण भये कलयुग में साईं भगवान्
इस युग का आधार बनके आये मेरे साईं जी
राम, कृष्ण का सार लेके आये मेरे साईं जी
कलयुग में अवतार लेके आये मेरे साईं जी
दुनिया का उद्धार करने आये मेरे साईं जी

साईं जी साईं जी मेरे प्यारे साईं जी
साईं जी साईं जी मेरे प्यारे साईं जी

कलयुग में अवतार लिया तो पहुंचे शिर्डी धाम
सबका मालिक एक है भेजा दुनिया को पैग़ाम
दर्शन दे दो अब तो साईं अखियाँ क्यों तरसाई रे
दर्शन करने सारी दुनिया तुमरे दर पे आई रे
कलयुग में अवतार लेके आये मेरे साईं जी
दुनिया का उद्धार करने आये मेरे साईं जी

साईं जी साईं जी मेरे प्यारे साईं जी
साईं जी साईं जी मेरे प्यारे साईं जी

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-: आज का साईं सन्देश :-

वे दोनों मस्जिद गये,
बाबा बैठे आय |
साईं कहते प्रेम से,
बहस न करना भाय ||

वाड़े साठे बैठकर,
काहे बहस कराय |
बात कहे हेमांड जो,
मुझको दो समझाय ||
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Sunday, 24 April 2016

गुरुदेव मेरे गुरुदेव मेरे

ॐ साईं राम



गुरुदेव मेरे गुरुदेव मेरे ,सब रंग तेरे रंगरेज तेरे
मुझ दीन के घर जब आओगे ,स्वागत में पलक बिछाऊंगा

अँसुवन जल से पग धोऊंगा ,और धो धो कर पी जाऊँगा
तू लेकर अपनी शरण मुझे ,फिर चाहे जिस रंग में रंग दे
रंगरेज मेरे सब रंग तेरे ,गुरुदेव मेरे गुरुदेव मेरे
जाने कितने दिन बाद मैने ,यह अपना भवन बुहारा है
तुमको कोई भी कष्ट न हो ,इस तरह से इसे संवारा है
इच्छा है मेरी यही प्रभु ,तुम मुझको अब तो अपना लो
गुरुदेव मेरे गुरुदेव मेरे , सब रंग तेरे रंगरेज मेरे
तुम सारे जग के मालिक हो ,तुम तो घट घट के वासी हो
तुमको ये कहाँ पसंद ,किसी के चेहरे चढ़ी उदासी हो
हे देव अगर संभव हो तो ,इन आंखो को दर्शन दे दो
तू ले कर अपनी शरण मुझे ,फिर चाहे जिस रंग में रंग दो
गुरु देव मेरे सब रंग तेरे रंगरेज मेरे सब रंग तेरे 
 
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-: आज का साईं सन्देश :-
ठहरे शिर्डी पन्त जी,
घर साठे का होय |
बाबा साहब भी रहें,
चर्चा करते दोय ||

गुरु काहे को चाहिये,
मेरे मन का भाय |
बिना गुरु जीवन नहीं,
बालाजी बतलाय ||
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