शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

************************************

निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

************************************

Saturday, 31 May 2014

रामायण के प्रमुख पात्र - श्रीलक्ष्मण

ॐ श्री साँईं राम जी


श्रीलक्ष्मणजी शेषावतार थे| किसी भी अवस्थामें भगवान् श्रीरामका वियोग इन्हें सहा नहीं था| इसलिये ये सदैव छायाकी भाँति श्रीरामका ही अनुगमन करते थे| श्रीरामके चरणोंकी सेवा ही इनके जीवनका मुख्य व्रत था| श्रीरामकी तुलनामें संसारके सभी सम्बन्ध इनके लिये गौण थे| इनके लिये श्रीराम ही माता-पिता, गुरु, भाई सब कुछ थे और उनकी आज्ञाका पालन ही इनका मुख्य धर्म था| इसलिये जब भगवान् श्रीराम विश्वामित्रकी यज्ञ-रक्षाके लिये गये तो लक्ष्मणजी भी उनके साथ गये| भगवान् श्रीराम जब सोने जाते थे तो ये उनका पैर दबाते और भगवान् के बार-बार आग्रह करनेपर ही स्वयं सोते तथा भगवान् के जागनेके पूर्व ही जाग जाते थे| अबोध शिशुकी भाँति इन्होंने भगवान् श्रीरामके चरणोंको ही दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और भगवान् ही इनकी अनन्य गति बन गये| भगवान् श्रीरामके प्रति किसीके भी अपमानसूचक शब्दको ये कभी बरदाश्त नहीं करते थे| जब महाराज जनकने धनुषके न टूटनेके क्षोभमें धरतीको वीर-विहीन कह दिया, तब भगवान् के उपस्थित रहते हुए जनकजीका यह कथन श्रीलक्ष्मणजीको बाण-जैसा लगा| ये तत्काल कठोर शब्दोंमें जनकजीका प्रतिकार करते हुए बोले - 'भगवान् श्रीरामके विद्यमान रहते हुए जनकने जिस अनुचित वाणीका प्रयोग किया है, वह मेरे हृदयमें शूलकी भाँति चुभ रही है| जिस सभामें रघुवंशका कोई भी वीर मौजूद हो, वहाँ इस प्रकारकी बातें सुनना और कहना उनकी वीरताका अपमान है| यदि श्रीराम आदेश दें तो मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको गेंदकी भाँति उठा सकता हूँ, फिर जनकके इस सड़े धनुषकी गिनती ही क्या है|' इसी प्रकार जब श्रीपरशुरामजीने धनुष तोड़नेवालेको ललकारा तो ये उनसे भी भिड़ गये|

भगवान् श्रीरामके प्रति श्रीलक्ष्मणकी अनन्य निष्ठाका उदाहरण भगवान् के वनगमनके समय मिलता है| ये उस समय देह-गेह, सगे-सम्बन्धी, माता और नव-विवाहिता पत्नी सबसे सम्बन्ध तोड़कर भगवान् के साथ वन जानेके लिये तैयार हो जाते हैं| वनमें ये निद्रा और शरीरके समस्त सुखोंका परित्याग करके श्रीराम-जानकीकी जी-जानसे सेवा करते हैं| ये भगवान् की सेवामें इतने मग्न हो जाते हैं कि माता-पिता, पत्नी, भाई तथा घरकी तनिक भी सुधि नहीं करते|

श्रीलक्ष्मणजीने अपने चौदह वर्षके अखण्ड ब्रह्मचर्य और अद्भुत चरित्र-बल पर लंकामें मेघनाद-जैसे शक्तिशाली योद्धापर विजय प्राप्त किया| ये भगवान् की कठोर-से-कठोर आज्ञाका पालन करनेमें भी कभी नहीं हिचकते| भगवान् की आज्ञा होनेपर आँसुओंको भीतर-ही-भीतर पीकर इन्होंने श्रीजानकीजीको वनमें छोड़नेमें भि संकोच नहीं किया| इनका आत्मत्याग भी अनुपम है| जिस समय तापसवेशधारी कालकी श्रीरामसे वार्ता चल रही थी तो द्वारपालके रूपमें उस समय श्रीलक्ष्मण ही उपस्थित थे| किसीको भीतर जानेकी अनुमति नहीं थी| उसी समय दुर्वासा ऋषिका आगमन होता है और वे श्रीराम का तत्काल दर्शन करनेकी इच्छा प्रकट करते हैं| दर्शन न होनेपर वे शाप देकर सम्पूर्ण परिवारको भस्म करनेकी बात करते हैं| श्रीलक्ष्मणजीने अपने प्राणोंकी परवाह न करके उस समय दुर्वासाको श्रीरामसे मिलाया और बदलेमें भगवान् से परित्यागका दण्ड प्राप्तकर अद्भुत आत्मत्याग किया| श्रीरामके अनन्य सेवक श्रीलक्ष्मण धन्य हैं|

Friday, 30 May 2014

रामायण के प्रमुख पात्र - श्रीभरत

ॐ श्री साँईं राम जी


श्रीभरतजीका चरित्र समुद्रकी भाँति अगाध है, बुद्धिकी सीमासे परे है| लोक-आदर्शका ऐसा अद्भुत सम्मिश्रण अन्यत्र मिलना कठिन है| भ्रातृप्रेमकी तो ये सजीव मूर्ति थे|

ननिहालसे अयोध्या लौटनेपर जब इन्हें मातासे अपने पिताके सर्वगवासका समाचार मिलता है, तब ये शोकसे व्याकुल होकर कहते हैं - 'मैंने तो सोचा था कि पिताजी श्रीरामका अभिषेक करके यज्ञकी दीक्षा लेंगे, किन्तु मैं कितना बड़ा अभागा हूँ कि वे मुझे बड़े भइया श्रीरामको सौंपे बिना स्वर्ग सिधार गये| अब श्रीराम ही मेरे पिता और बड़े भाई हैं, जिनका मैं परम प्रिय दास हूँ| उन्हें मेरे आनेकी शीघ्र सुचना दें| मैं उनके चरणोंमें प्रणाम करूँगा| अब वे ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं|'

जब कैकयीने श्रीभरतजीको श्रीराम-वनवासकी बात बतायी, तब वे महान् दुःखसे संतप्त हो गये| इन्होंने कैकेयीसे कहा - 'मैं समझता हूँ, लोभके वशीभूत होनेके कारण तू अबतक यह न जान सकी कि मेरा श्रीरामचन्द्रके साथ भाव कैसा है| इसी कारण तूने राज्यके लिये इतना बड़ा अनर्थ कर डाला| मुझे जन्म देनेसे अच्छा तो यह था कि तू बाँझ ही होती| कम-से-कम मेरे-जैसे कुलकलंकका तो जन्म नहीं होता| यह वर माँगनेसे पहले तेरी जीभ कटकर गिरी क्यों नहीं!'

इस प्रकार कैकेयीको नाना प्रकारसे बुरा-भला कहकर श्रीभरतजी कौसल्याजीके पास गये और उन्हें सान्त्वना दी| इन्होंने गुरु वसिष्ठकी आज्ञासे पिताकि अंत्येष्टि किया सम्पन्न की| सबके बार-बार आग्रहके बाद भी इन्होंने राज्य लेना अस्वीकार कर दिया और दल-बलके साथ श्रीरामको मनानेके लिये चित्रकूट चल दिये| श्रृंगवेरपुरमें पहुँचकर इन्होंने निषादराजको देखकर रथका परित्याग कर दिया और श्रीरामसखा गुहसे बड़े प्रेमसे मिले| प्रयागमें अपने आश्रमपर पहुँचनेपर श्रीभरद्वाज इनका स्वागत करते हुए कहते हैं - 'भरत! सभी साधनोंका परम फल श्रीसीतारामका दर्शन है और उसका भी विशेष फल तुम्हारा दर्शन है| आज तुम्हें अपने बीच उपस्थित पाकर हमारे साथ तीर्थराज प्रयाग भी धन्य हो गये|'

श्रीभरतजीको दल-बलके साथ चित्रकूटमें आता देखकर श्रीलक्ष्मणको इनकी नीयतपर शंका होती है| उस समय श्रीरामने उनका समाधान करते हुए कहा - 'लक्ष्मण! भरतपर सन्देह करना व्यर्थ है| भरतके समान शीलवान् भाई इस संसारमंे मिलना दुर्लभ है| अयोध्याके राज्यकी तो बात ही क्या ब्रह्मा, विष्णु और महेशका भी पद प्राप्त करके श्रीभरतको मद नहीं हो सकता|' चित्रकुटमें भगवान् श्रीरामसे मिलकर पहले श्रीभरतजी उनसे अयोध्या लौटनेका आग्रह करते हैं, किन्तु जब देखते हैं कि उनकी रुचि कुछ और है तो भगवान् की चरण-पादुका लेकर अयोध्या लौट आते हैं| नन्दिग्राममें तपस्वी-जीवन बिताते हुए ये श्रीरामके आगमनकी चौदह वर्षतक प्रतीक्षा करते हैं| भगवान् को इनकी दशाका अनुमान है| वे वनवासकी अवधि समाप्त होते ही एक क्षण भी विलम्ब किये बिना अयोध्या पहुँचकर इनके विरहको शान्त करते हैं| श्रीरामभक्ति और आदर्श भ्रातप्रेमके अनुपम उदाहरण श्रीभरतजी धन्य हैं|

Thursday, 29 May 2014

Urgently required blood, group AB(+)

Urgently required blood, group AB(+) for thalasemia patient, at Deen Dayal Upadhyay hospital, blood bank Hari Nagar near clock tower. Contact person at blood bank is Mr. Amit.

Patient's name Mayank Anand registration number DDUH-19 timing 9 am to 4 pm

For more details please contact at 9810617373

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 29

ॐ सांई राम

आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं

हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है

हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा

किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...
श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 29
......................

Wednesday, 28 May 2014

रामायण के प्रमुख पात्र - भगवती श्रीसीता

ॐ श्री साँई राम जी 


भगवती श्रीसीता

भगवती श्रीसीताजी की महिमा अपार है| वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास तथा धर्मशास्त्रोंमें इनकी अनन्त महिमाका वर्णन है| ये भगवान् श्रीरामकी प्राणप्रिया आद्याशक्ति हैं| ये सर्व सर्वमङ्गलदायिनी, त्रिभुवनकी जननी तथा भक्ति और मुक्तिका दान करनेवाली हैं| महाराज सीरध्वज जनककी यज्ञभूमिसे कन्यारूपमें प्रकट हुई भगवती सीता ही संसारका उद्भव, स्थिति और संहार करनेवाली पराशक्ति हैं| ये पतिव्रताओंमें शिरोमणि तथा भारतीय आदर्शोंकी अनुपम शिक्षिका हैं|

अपनी ससुराल अयोध्यामें आनेके बाद अनेक सेविकाओंके होनेपर भी भगवती सीता अपने हाथोंसे सारा गृहकार्य स्वयं करती थीं और पतिके संकेतमात्रसे उनकी आज्ञाका तत्काल पालन करती थीं| अपने पतिदेव भगवान् श्रीरामको वनगमनके लिये प्रस्तुत देखकर इन्होंने तत्काल अपने कर्तव्य कर्मका निर्णय कर लिया और श्रीरामसे कहा - 'हे आर्यपुत्र! माता - पिता, भाई, पुत्र तथा पुत्रवधू - ये सब अपने-अपने कर्म के अनुसार सुख-दुःखका भोग करते हैं| एकमात्र पत्नी ही पतिके कर्मफलोंकी भागिनी होती है| आपके लिये जो वनवासकी आज्ञा हुई है, वह मेरे लिये भी हुई है| इसलिये वनवासमें आपके साथमें मैं भी चलूँगी| आपमें ही मेरा हृदय अनन्यभावसे अनुरक्त है| आपके वियोगमें मेरी मृत्यु निश्चित है| इसलिये आप मुझे अपने साथ वनमें अवश्य ले चलिये| मुझे ले चलनेसे आपपर कोई भार नहीं होगा| मैं वनमें नियमपूर्वक ब्रह्मचारिणी रहकर आपकी सेवा करुँगी|'

अपने पति श्रीरामसे वनमें ले चलनेका निवेदन करती हुई सीता प्रेम-विह्वल हो गयीं| उनकी आँखोंसे आँसू बहने लगे| वे संज्ञाहीन-सी होने लगीं| अन्तमें श्रीरामको उन्हें साथ चलनेकि आज्ञा देनी पड़ी| माता सीता अपने सतीत्वके परम तेजसे लंकेशको भी भस्म कर सकती थीं| पापात्मा रावणके कुत्सिक मनोवृत्तिकी धज्जियाँ उड़ाती हुई पतिव्रता सीता कहती हैं - 'हे रावण! तुम्हें जलाकर भस्म कर देनेकी शक्ति रखती हुई भी मैं श्रीरामचन्द्रका आदेश न होनेके कारण एवं तपोभग्ङ होनेके कारण तुम्हें जलाकर भस्म नहीं कर रही हूँ|'

महासती सीताने हनुमान् जीकी पूँछमें आग लगनेके समय अग्निदेवसे प्रार्थना की - 'हे अग्निदेव! यदि मैंने अपने पतिकी सच्चे मनसे सेवा की है| यदि मैंने श्रीरामके अतिरिक्त किसीका चिन्तन न किया हो तो तुम हनुमान् के लिये शीतल हो जाओ|' महासती सीताकी प्रार्थनासे अग्निदेव हनुमान् के लिये सुख और शीतल हो गये और लंकाके लिये दाहक बन गये| सीताके पातिव्रत्यकी गवाही अग्निपरीक्षाके पश्चात् स्वयं अग्निदेवने दी थी| महासती सीताके सतीत्वकी तुलना किसीभी नहीं की जा सकती| भगवती सीताका चरित्र समस्त नारियोंके लिये वन्दनीय तथा अनुकरणीय है|

Tuesday, 27 May 2014

रामायण के प्रमुख पात्र - माता कैकेयी

ॐ श्री साँई राम जी


माता कैकेयी

कैकेयीजी महाराज केकयनरेशकी पुत्री तथा महाराज दशरथकी तीसरी पटरानी थीं| ये अनुपम सुन्दरी, बुद्धिमति, साध्वी और श्रेष्ठ वीराग्ङना थीं| महाराज दशरथ इनसे सर्वाधिक प्रेम करते थे| इन्होंने देवासुरसंग्राममें महाराज दशरथके साथ सारथिका कार्य करके अनुपम शौर्यका परिचय दिया और महाराज दशरथके प्राणोंकी दो बार रक्षा की| यदि शम्बरासुरसे संग्राममें महाराजके साथ महारानी कैकेयी न होतीं तो उनके प्राणोंकी रक्षा असम्भव थी| महाराज दशरथने अपने प्राण-रक्षाके लिये इनसे दो वार माँगनेका आग्रह किया और इन्होंने समयपर माँगनेकी बात कहकर उनके आग्रहको टाल दिया| इनके लिये पतिप्रेमके आगे संसारकी सारी वस्तुएँ तुच्छ थीं|

महारानी कैकेयी भगवान् श्रीरामसे सर्वाधिक स्नेह करती थीं| श्रीरामके युवराज बनाये जानेका संवाद सुनते ही ये आनन्दमग्न हो गयीं| मन्थराके द्वारा यह समाचार पाते ही इन्होंने उसे अपना मूल्यवान् आभूषण प्रदान किया और कहा - 'मन्थरे! तूने मुझे बड़ा ही प्रिय समाचार सुनाया है| मेरे लिये श्रीराम-अभिषेकके समाचारसे बढ़कर दूसरा कोई प्रिय समाचार नहीं हो सकता| इसके लिये तू मुझसे जो भी माँगेगी, मैं अवश्य दूँगी!' इसीसे पता लगता है कि ये श्रीरामसे कितना प्रेम करती थीं| इन्होंने मन्थराकि विपरीत बात सुनकर उसकी जीभतक खींचनेकी बात कहीं| इनके श्रीरामके वनगमनमें निमित्त बनने का प्रमुख कारण श्रीरामकी प्रेरणासे देवकार्यके लिये सरस्वतीदेवीके द्वारा इनकी बुद्धिका परिवर्तन कर दिया जाना था| महारानी कैकेयीने भगवान् श्रीरामकी लीलामें सहायता करनेके लिये जन्म लिया था| यदि श्रीरामका अभिषेक हो जाता तो वनगमनके बिना श्रीरामका ऋषि-मुनियोंको दर्शन, रावण-वध, साधु-परित्राण, दुष्ट-विनाश, धर्म-संरक्षण आदि अवतारके प्रमुख कार्य नहीं हो पाते| इससे स्पष्ट है कि कैकेयीजीने श्रीरामकी लीलामें सहयोग करनेके लिये ही जन्म लिया था| इसके लिये इन्होंने चिरकालिक अपयशके साथ पापिनी, कुलघातिनी, कलक्ङिनी आदि अनेक उपाधियोंको मौन होकर स्वीकार कर लिया|

चित्रकूटमें जब माता कैकेयी श्रीरामसे एकान्तमें मिलीं, तब इन्होंने अपने नेत्रोंमें आँसू भरकर उनसे कहा - 'हे राम! मायासे मोहित होकर मैंने बहुत बड़ा अपकर्म किया है| आप मेरी कुटिलताको क्षमा कर दें, क्योंकि साधुजन क्षमाशील होते हैं| देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये आपने ही मुझसे यह कर्म करवाया है| मैंने आपको पहचान लिया है| आप देवताओंके लिये भी मन, बुद्धि और वाणीसे परे हैं|'

भगवान् श्रीरामने उनसे कहा - 'महाभागे! तुमने जो कहा, वह मिथ्या नहीं है| मेरी प्रेरणासे ही देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये तुम्हारे मुखसे वे शब्द निकले थे| उसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है| अब तुम जाओ| सर्वत्र आसक्तिरहित मेरी भक्तिके द्वारा तुम मुक्त हो जाओगी|'

भगवान् श्रीरामके इस कथनसे भी यह स्पष्ट हो जाता है कि कैकेयीजी श्रीरामकी अन्तरंग भक्त, तत्त्वज्ञान-सम्पन्न और सर्वथा निर्दोष थीं| इन्होंने सदाके लिये अपकीर्तिका वरण करके भी श्रीरामकी लीलामें अपना विलक्षण योगदान दिया|

Monday, 26 May 2014

रामायण के प्रमुख पात्र - माता सुमित्रा

ॐ श्री साँई राम जी



माता सुमित्रा

महारानी सुमित्रा त्यागकी साक्षात् प्रतिमा थीं| ये महाराज दशरथकी दूसरी पटरानी थीं| महाराज दशरथने जब पुष्टि यज्ञके द्वारा खीर प्राप्त किया, तब उन्होंने खीरका भाग महारानी सुमित्राको स्वयं न देकर महारानी कौसल्या और महारानी कैकेयीके द्वारा दिलवाया| जब महारानी सुमित्राको उस खीरके प्रभावसे दो पुत्र हुए तो इन्होंने निश्चय कर लिया कि इन दोनों पुत्रोंपर मेरा अधिकार नहीं है| इसलिये अपने प्रथम पुत्र श्रीलक्ष्मणको श्रीराम और दूसरे शत्रुघ्नको श्रीभरतकी सेवामें समर्पित कर दिया| त्याग कर ऐसा अनुपम उदाहरण अन्यत्र मिलना कठिन है|

जब भगवान् श्रीराम वन जाने लगे तब लक्ष्मणजीने भी उनसे स्वयंको साथ ले चलनेका अनुरोध किया| पहले भगवान् श्रीरामने लक्ष्मणजीको अयोध्यामें रहकर माता-पिताकि सेवा करनेका आदेश दिया, लेकिन लक्ष्मणजीने किसी प्रकार भी श्रीरामके बिना अयोध्यामें रुकना स्वीकार नहीं किया| अन्तमें श्रीरामने लक्ष्मणको माता सुमित्रासे आदेश लेकर अपने साथ चलनेकी आज्ञा दी| उस समय विदा माँगनेके लिये उपस्थित श्रीलक्ष्मणको माता सुमित्राने जो उपदेश दिया उसमें दिया उसमें भक्ति, प्रीति, त्याग, पुत्र-धर्मका स्वरूप, समपर्ण आदि श्रेष्ठ भावोंकी सुन्दर अभिव्यक्ति हुई है|

माता सुमित्राने श्रीलक्ष्मणको उपदेश देते हुए कहा - ' बेटा! विदेहनन्दिनी श्रीजानकी ही तुम्हारी माता हैं और सब प्रकारसे स्नेह करनेवाले श्रीरामचन्द्र ही तुम्हारे पिता हैं| जहाँ श्रीराम हैं, वहीं अयोध्या है और जहाँ सूर्यका प्रकाश है वही दिन है| यदि श्रीसीता-राम वनको जा रहे हैं तो अयोध्यामें तुम्हारा कुछ भी काम नहीं है| जगत्में जितने भी पूजनीय सम्बन्ध हैं, वे सब श्रीरामके नाते ही पूजनीय और प्रिय मानने योग्य हैं| संसारमें वही युवती पुत्रवती कहलाने योग्य है, जिसका पुत्र श्रीरामका भक्त है| श्रीरामसे विमुख पुत्रको जन्म देनेसे निपूती रहना ही ठीक है| तुम्हारे ही भाग्यसे श्रीराम वनको जा रहे हैं| हे पुत्र! इसके अतिरिक्त उनके वन जानेका अन्य कोई कारण नहीं है| समस्त पुण्योंका सबसे बड़ा फल श्रीसीतारामजीके चरणोंमें स्वाभाविक प्रेम है| हे पुत्र! राग, रोष, ईर्ष्या, मद आदि समस्त विकारोंपर विजय प्राप्त करके मन, कर्म और वचनसे श्रीसीतारामकी सेवा करना| इसीमें तुम्हारा परम हित है|'

श्रीराम सीता और लक्ष्मणके साथ वन चले गये| अब हर तरहसे माता कौसल्याको सुखी बनाना ही सुमित्राजीका उद्देश्य हो गया| ये उन्हींकी सेवा में रात-दिन लगी रहती थीं| अपने पुत्रोंके विछोहके दुःखको भूलकर कौसल्याजीके दुःखमें दुखी और उन्हींके सुखमें सुखी होना माता सुमित्राका स्वभाव बन गया| जिस समय लक्ष्मणको शक्ति लगनेका इन्हें संदेश मिलता है, तब इनका रोम-रोम खिल उठता है| ये प्रसन्नता और उत्सर्गके आवेशमें बोल पड़ती हैं - 'लक्ष्मणने मेरी कोखमें जन्म लेकर उसे सार्थक कर दिया| उसने मुझे पुत्रवती होनेका सच्चा गौरव प्रदान किया है|' इतना ही नहीं, ये श्रीरामकी सहायताके लिये श्रीशत्रुघ्नको भी युद्धमें भेजनेके लिये तैयार हो जाती हैं| माता सुमित्राके जीवनमें सेवा, संयम और सर्वस्व-त्यागका अद्भुत समावेश है| माता सुमित्रा-जैसी देवियाँ ही भारतीय कुलकी गरिमा और आदर्श हैं|

Sunday, 25 May 2014

रामायण के प्रमुख पात्र - माता कौसल्या

ॐ श्री साँई राम जी 



माता कौसल्या

महारानी कौसल्याका चरित्र अत्यन्त उदार है| ये महाराज दशरथकी सबसे बड़ी रानी थीं| पूर्व जन्ममें महराज मनुके साथ इन्होंने उनकी पत्नीरूपमें कठोर तपस्या करके श्रीरामको पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वरदान प्राप्त किया था| इस जन्ममें इनको कौसल्यारूपमें भगवान् श्रीरामकी जननी होनेका सौभाग्य मिला था|

श्रीकौसल्याजीका मुख्य चरित्र रामायणके अयोध्याकाण्डसे प्रारम्भ होता है| भगवान् श्रीरामका राज्याभिषेक होनेवाला है| नगरभरमें उत्सवकी तैयारियाँ हो रही हैं| माता कौसल्याके आनन्दका पार नहीं है | वे श्रीरामकी मंगल-कामनासे अनेक प्रकारके यज्ञ, दान, देवपूजन और उपवासमें संलग्न हैं| श्रीराम को सिहांसनपर आसीन देखनेकी लालसासे इनका रोम-रोम पुलकित है| परन्तु श्रीराम तो कुछ दूसरी ही लीला करना चाहते हैं | सत्यप्रेमी महाराज दशरथ कैकेयीके साथ वचनबद्ध होकर श्रीरामको वनवास देनेके लिये बाध्य हो जाते हैं|

प्रात:काल भगवान् श्रीराम माता कैकेयी और पिता महाराज दशरथसे मिलकर वन जानेका निश्चय कर लेते हैं और माता कौसल्याका आदेश प्राप्त करनेके लिये उनके महलमें पधारते हैं| श्रीरामको देखकर माता कौसल्या उनके पास आती हैं| इनके हृदयमें वात्सल्य-रसकी बाढ़ आ जाती है और मुँहसे आशीर्वादकी वर्षा होने लगती है| ये श्रीरामका हाथ पकड़कर उनको उन्हें शिशुकी भाँति अपनी गोदमें बैठा लेती हैं और कहने लगती हैं - 'श्रीराम! राज्याभिषेकमें अभी विलम्ब होगा| इतनी देरतक कैसे भूखे रहोगे, दो-चार मधुर फल ही खा लो|' भगवान् श्रीरामने कहा - 'माता! पिताजीने मुझको चौदह वर्षोंके लिये वनका राज्य दिया है, जहाँ मेरा सब प्रकारसे कल्याण ही होगा| तुम भी प्रसन्नचित्त होकर मुझको वन जानेकी आज्ञा दे दी| चौदह सालतक वनमें निवास कर मैं पिताजीके वचनोंका पालन करूँगा, पुन: तुम्हारे श्रीचरणोंका दर्शन करूँगा|'

श्रीरामके ये वचन माता कौसल्याके हृदयमें शूलकी भाँति बिंध गये| उन्हें अपार क्लेश हुआ| वे मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर गयीं, उनके विषादकी कोई सीमा न रही| फिर वे सँभलकर उठीं और बोलीं - 'श्रीराम! यदि तुम्हारे पिताका ही आदेश हो तो तुम माताको बड़ी जानकार वनमें न जाओ! किन्तु यदि इसमें छोटी माता कैकयीकी भी इच्छा हो तो मैं तुम्हारे धर्म-पालनमें बाधा नहीं बनूँगी| जाओ! काननका राज्य तुम्हारे लिये सैकड़ों अयोध्याके राज्यसे भी सुखप्रद हो|' पुत्रवियोगमें माता कौसल्यका हृदय दग्ध हो रहा है, फिर भी कर्त्तव्यको सर्वोपरि मानकर तथा अपने हृदयपर पत्थर रखकर वे पुत्रको वन जानेकी आज्ञा दे देती हैं| सीता-लक्ष्मणके साथ श्रीराम वन चले गये| महाराज दशरथ कौसल्याके भवनमें चले आये| कौसल्याजीने महराजको धैर्य बँधाया, किन्तु उनका वियोग-दुःख कम नहीं हुआ| उन्होंने राम-राम कहते हुए अपने नश्वर शरीरको त्याग दिया| कौसल्याजीने पतिमरण, पुत्रवियोग-जैसे असह्य दुःख केवल श्रीराम-दर्शनकी लालसामें सहे| चौदह सालके कठिन वियोगके बाद श्रीराम आये| कौसल्याजीको अपने धर्मपालनका फल मिला| अन्तमें ये श्रीरामके साथ ही साकेत गयीं|

For Donation

For donation of Fund/ Food/ Clothes (New/ Used), for needy people specially leprosy patients' society and for the marriage of orphan girls, as they are totally depended on us.

For Donations, Our bank Details are as follows :

A/c - Title -Shirdi Ke Sai Baba Group

A/c. No - 200003513754 / IFSC - INDB0000036

IndusInd Bank Ltd, N - 10 / 11, Sec - 18, Noida - 201301,

Gautam Budh Nagar, Uttar Pradesh. INDIA.