शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 7 December 2013

योग और प्याज

ॐ सांई राम


योग और प्याज

एक समय एक योगाभ्यासी नाना साहेब चांदोरकर के साथ शिर्डी आया. उसने पतंजलि योगसूत्र तथा योगशास्त्र के अन्य ग्रंथों का विशेष अध्यन किया था, परन्तु वह व्यावहारिक अनुभव से वंचित था. मन एकाग्र ना हो सकने के कारण वह थोड़े समय के लिए भी समाधी नहीं लगा सकता था. यदि सैबबा कि कृपा प्राप्त हो जाये तो उनसे थोड़ी अधिक समय तक समाधी अवस्था प्राप्त करने कि विधि ज्ञात हो जाएगी, इस विचार से वह शिर्डी आया और जब मस्जिद में पहुंचा तो साईं बाबा को प्याज सहित सूखी रोटी खाते देख कर उसे विचार आया कि यह कच्ची प्याजसहित सूखी रोटी खाने वाला व्यक्ति मेरी कठिनाई को किस प्रकार हल कर पायेगा? साईं बाबा अंतर्ज्ञान से उसका विचार जानकार तुरंत नानासाहेब से बोले कि " ओ नाना ! जिसमे प्याज हजम करने कि शक्ति है , उसको ही उसे खाना चाहिए, अन्य को नहीं." इन शब्दों से अत्यंत विस्मित होकर योगी ने साईं चरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण कर दिया. शुद्ध और निष्कपट भाव से अपनी कठिनाइयाँ बाबा के समक्ष प्रस्तुत करके उनसे उनका हल प्राप्त किया, और इस प्रकार संतुष्ट और सुखी होकर बाबा के दर्शन और उदी लेकर वह शिर्डी से चला गया................. ॐ साईं राम



श्री सांई सच्चरित्र क्या कहती है ??

यूँ ही एक दिन चलते-चलते

सांई से हो गई मुलाकात।

जब अचानक सांई सच्चरित्र की

पाई एक सौगात।

फिर सांई के विभिन्न रूपों के मिलने लगे उपहार।

तब सांई ने बुलाया मुझको शिरडी भेज के तार।

सांई सच्चरित्र ने मुझ पर अपना ऐसा जादू डाला।

सांई नाम की दिन-रात मैं जपने लगा फिर माला।

घर में गूँजने लगी हर वक्त सांई गान की धुन।

मन के तार झूमने लगे सांई धुन को सुन।

धीरे-धीरे सांई भक्ति का रंग गाढ़ा होने लगा।

और सांई कथाओं की खुश्बूं में मन मेरा खोने लगा।

सांई नाम के लिखे शब्दों पर मैं होने लगा फिदा।

अब मेरे सांई को मुझसे कोई कर पाए गा ना जुदा।

हर घङी मिलता रहे मुझे सांई का संतसंग।

सांई मेरी ये साधना कभी ना होवे भंग।

सांई चरणों में झुका रहे मेरा यह शीश।

सांई मेरे प्राण हैं और सांई ही मेरे ईश।

भेदभाव से दूर रहूँ,शुद्ध हो मेरे विचार।

सांई ज्ञान की जीवन में बहती रहे ब्यार॥

Friday, 6 December 2013

GOD ???

ॐ साँई राम जी



GOD ???
Generator   Operator    Destroyer
ब्रह्मा           विष्णु         महेश




Thursday, 5 December 2013

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 2

ॐ सांई राम
आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की ओर से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं |

हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है |

हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा| किसी भी प्रकार की  त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है|

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 2

ग्रन्थ लेखन का ध्येय, कार्यारम्भ में असमर्थता और साहस, गरमागरम बहस, अर्थपूर्ण उपाधि हेमाडपन्त, गुरु की आवश्यकता । 
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गत अध्याय में ग्रन्थकार ने अपने मौलिक ग्रन्थ श्री साई सच्चरित्र (मराठी भाषा) में उन कारणों पर प्रकाश डाला था, जिननके दृारा उन्हें ग्रन्थरतना के कार्य को आरन्भ करने की प्रेरणा मिली । अब वे ग्रन्थ पठन के योग्य अधिकारियों तथा अन्य विषयों का इस अध्याय में विवेचन करते हैं ।



ग्रन्थ लेखन का हेतु
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Wednesday, 4 December 2013

प्यार बांटते साई

ॐ साँई राम जी


प्यार बांटते साई


प्राणिमात्र की पीड़ा हरने वाले साई हरदम कहते, 'मैं मानवता की सेवा के लिए ही पैदा हुआ हूं। मेरा उद्देश्य शिरडी को ऐसा स्थल बनाना है, जहां न कोई गरीब होगा, न अमीर, न धनी और न ही निर्धन..।' कोई खाई, कैसी भी दीवार..बाबा की कृपा पाने में बाधा नहीं बनती। बाबा कहते, 'मैं शिरडी में रहता हूं, लेकिन हर श्रद्धालु के दिल में मुझे ढूंढ सकते हो। एक के और सबके। जो श्रद्धा रखता है, वह मुझे अपने पास पाता है।'




साई ने कोई भारी-भरकम बात नहीं कही। वे भी वही बोले, जो हर संत ने कहा है, 'सबको प्यार करो, क्योंकि मैं सब में हूं। अगर तुम पशुओं और सभी मनुष्यों को प्रेम करोगे, तो मुझे पाने में कभी असफल नहीं होगे।' यहां 'मैं' का मतलब साई की स्थूल उपस्थिति से नहीं है। साई तो प्रभु के ही अवतार थे और गुरु भी, जो अंधकार से मुक्ति प्रदान करता है। ईश के प्रति भक्ति और साई गुरु के चरणों में श्रद्धा..यहीं से तो बनता है, इष्ट से सामीप्य का संयोग।


दैन्यता का नाश करने वाले साई ने स्पष्ट कहा था, 'एक बार शिरडी की धरती छू लो, हर कष्ट छूट जाएगा।' बाबा के चमत्कारों की चर्चा बहुत होती है, लेकिन स्वयं साई नश्वर संसार और देह को महत्व नहीं देते थे। भक्तों को उन्होंने सांत्वना दी थी, 'पार्थिव देह न होगी, तब भी तुम मुझे अपने पास पाओगे।'


अहंकार से मुक्ति और संपूर्ण समर्पण के बिना साई नहीं मिलते। कृपापुंज बाबा कहते हैं, 'पहले मेरे पास आओ, खुद को समर्पित करो, फिर देखो..।' वैसे भी, जब तक 'मैं' का व्यर्थ भाव नष्ट नहीं होता, प्रभु की कृपा कहां प्राप्त होती है। साई ने भी चेतावनी दी थी, 'एक बार मेरी ओर देखो, निश्चित-मैं तुम्हारी तरफ देखूंगा।'




1854 में बाबा शिरडी आए और 1918 में देह त्याग दी। चंद दशक में वे सांस्कृतिक-धार्मिक मूल्यों को नई पहचान दे गए। मुस्लिम शासकों के पतन और बर्तानिया हुकूमत की शुरुआत का यह समय सभ्यता के विचलन की वजह बन सकता था, लेकिन साई सांस्कृतिक दूत बनकर सामने आए। जन-जन की पीड़ा हरी और उन्हें जगाया, प्रेरित किया युद्ध के लिए। युद्ध किसी शासन से नहीं, कुरीतियों से, अंधकार से और हर तरह की गुलामी से भी! यह सब कुछ मानवमात्र में असीमित साहस का संचार करने के उपक्रम की तरह था। हिंदू, पारसी, मुस्लिम, ईसाई और सिख..हर धर्म और पंथ के लोगों ने साई को आदर्श बनाया और बेशक-उनकी राह पर चले।

Tuesday, 3 December 2013

श्री साईं अमृत वाणी


ॐ साँई राम जी 



 श्री साईं अमृत वाणी


 श्री सच्चिदानन्द सतगुरु साईं नाथ महाराज की जय

नमो नमो पावन साईं , नमो नमो कृपाल गौसाई

साईं अमृत पद पावन वाणी , साईं नाम धुन सुधा समानी ||१||

नमो नमो संतन प्रतिपाला , नमो नमो श्री साईं दयाला
परम सत्य है परम विज्ञान , ज्योति स्वरूप साईं भगवान् ||२||

नमो नमो साईं अविनाशी , नमो नमो घट घट के वासी
साईं धवनी नाम उच्चारण , साईं राम सुख सिद्धि कारण ||३||

नमो नमो श्री आत्म रामा ,नमो नमो प्रभु पूर्ण कामा
अमृतवाणी साईं राम , साईं राम मुद मंगल धाम ||४||

साईं नाम मंत्र जप जाप , साईं नाम मते त्रयी ताप
साईं धुनी में लगे समाधी , मिटे सब आधि व्याधि उपाधि ||५||

साईं जाप है है सरल समाधि , हरे सब आधि व्याधि उपाधि
रिद्धी-सिद्धी और नव निधान , डाटा साईं है सब सुख खान ||६||

साईं साईं श्री साईं हरी , भक्ति वैराग्य का योग
साईं साईं श्री साईं जप , दाता अमृत भोग ||७||

जल थल वायु तेज आकाश , साईं से पावे सब प्रकाश
जल और पृथ्वी साईं माया , अंतहीन अंतरिक्ष बनाया ||८||

नेति नेति कह वेड बखाने , भेद साईं का कोइ न जाने 
साईं नाम है सब रस सार , साईं नाम जग तारण हार||९||

साईं नाम के भरो भण्डार , साईं नाम का सद्व्यवहार
इहाँ नाम की करो कमाई , उहाँ न होय कोई कठिनाई ||१०||


झोली साईं नाम से भरिए , संचित साईं नाम धन करिए

जुड़े नाम का जब धन माल , साईं कृपा ले अंत संभाल ||११||

साईं साईं पद शक्ति जगावे , साईं साईं धुन जभी रमावे
साईं नाम जब जगे अभंग , चेतन भाव जगे सुख संग ||१२||

भावना भक्ति भरे भजनीक , भजते साईं नाम रमणीक
भजते भक्त भाव भरपूर , भ्रम भय भेदभाव से दूर ||१३||

साईं साईं सुगुणी जन गाते , स्वर संगीत से साईं रिझाते
कीर्तन कथा करते विद्वान , सर सरस संग साधनवान ||१४||

काम क्रोध और लोभ ये , तीन पाप के मूल
नाम कुल्हाड़ी हाथ ले , कर इनको निर्मूल ||१५||

साईं नाम है सब सुख खान , अंत कर सब का कल्यान 
जीवन साईं से प्रीति करना , मरना मन से साईं न बिसरना ||१६|| 

साईं भजन बिन जीवन जीना , आठो पहर हलाहल पीना
भीतर साईं का रूप समावे , मस्तक पर प्रतिमा चा जावे ||१७|| 

जब जब ध्यान साईं का आवे , रोम रोम पुलकित हो जावे
साईं कृपा सूरज का उगना , हृदय साईं पंकज का खिलना ||१८|| 

साईं नाम मुक्ता मणि , राखो सूत पिरोय
पाप ताप न रहे , आत्मा दर्शन होय ||१९||

सत्य मूलक है रचना सारी , सर्व सत्य प्रभु साईं पासरी 
बीज से तरु मकडी से तार , हुआ त्यों साईं से जग विस्तार ||२०||


साईं का रूप हृदय में धारो , अन्तरमन से साईं पुकारो

अपने भगत की सुनकर टेर , कभी न साईं लगाते देर ||२१||

धीर वीर मन रहित विकार , तन से मन से कर उपकार
सदा ही साईं नाम गुण गावे , जीवन मुक्त अमर पद पावे ||२२||

साईं बिना सब नीरस स्वाद , ज्यों हो स्वर बिना राग विषाद
साईं बिना नहीं सजे सिंगार , साईं नाम है सब रस सार ||२३||

साईं पिता साईं ही माता , साईं बंधु साईं ही भ्राता
साईं जन जन के मन रंगन , साईं सब दुःख दर्द विभंजन ||२४||

साईं नाम दीपक बिना , जन मन में अंधेर
इसी लिये है मम मन , नाम सुमाला फेर ||२५||

जपते साईं नाम महा माला ,लगता नरक द्वार पे ताला
राखो साईं पर इक विश्वास , सब ताज करो साईं करो आस ||२६||

जब जब चडे साईं का रंग , मन में छाए प्रेम उमंग
जपते साईं साईं जप पाठ , जलते कर्मबंध यथा काठ ||२७||

साईं नाम सुधा रस सागर , साईं नाम ज्ञान गुण आगर
साईं जप रवि तेज समान , महा मोह तम हरे अज्ञान ||२८||

साईं नाम धुन अनहद नाद , नाम जपे मन हो विस्माद
साईं नाम मुक्ति का दाता , ब्रह्मधाम वह खुद पहुंचाता ||२९||

हाथ से करिए साईं का कार , पग से चलिए साईं के द्वार
मुख से साईं सिमरण करिए , चित सदा चिंतन में धरिए ||३०||


कानों से यश साईं का सुनिए , साईं धाम का मार्ग चुनिए

साईं नाम पद अमृतवाणी , साईं नाम धुन सुधा समानी || ३१||

आप जपो औरों को जपावो , साईं धुनि को मिलकर गावो
साईं नाम का सुन कर गाना , मन अलमस्त बने दिवाना ||३२||

पल पल उठे साईं तरंग , चडे नाम का गुडा रंग
साईं कृपा है उच्चतर योग , साईं कृपा है शुभ संयोग ||३३||

साईं कृपा सब साधन मर्म , साईं कृपा संयम सत्य धर्म
साईं नाम को मन में बसाना , सुपथ साईं कृपा का है पाना ||३४||

मन में साईं धुन जब फिरे , साईं कृपा तब ही अवतरे
रहूँ मैं साईं में हो कर लीन , जैसे जल में हो मीन अदीन ||३५||

साईं नाम को सिमरिये , साईं साईं इक तार
परम पाठ पावन परम , करता भाव से पार ||३६||

साईं कृपा भरपूर मैं पाऊं , परम प्रभु को भीतर लाऊं
साईं ही साईं कह मीत , साईं से कर साची प्रीत ||३७||

साईं साईं का दर्शन करिए , मन भीतर इक आनन्द भरिय
साईं की जब मिल जाए शिक्षा , फिर मन में कोई रहे न इच्छा ||३८||

जब जब मन का तार का हिलेगा , तब तब साईं का प्यार मिलेगा
मिटेगी जग से आनी जानी ,जीवन मुक्त होय यह प्राणी ||३९||

शिर्डी के साईं हरि , तीन लोक के नाथ

बाबा हमारे पावन प्रभु , सदा के संगी साथ || ४०||

साईं धुन जब पकडे जोर , खींचे साईं प्रभु अपनी ओर

मंदिर बस्ती बस्ती , चा जाए साईं नाम की मस्ती ||४१||

अमृत रूप साईं गुण गान , अमृत कथन साईं व्याख्यान
अमृत वचन साईं की चर्चा , सुधा सम गीत साईं की अर्चा ||४२||

शुभ रसना वही कहाये , साईं नाम जहां नाम सुहाये
शुभ कर्म है नाम कमाई , साईं राम परम सुखदाई ||४३||

जब जी चाहे दर्शन पाइये , जय जय कार साईं की गाइये
साईं नाम की धुनि लगाइये , सहज ही भाव सागर तर जाइये ||४४||

बाबा को जो भजे निरंतर , हर दम ध्यान लगावे
बाबा में मिल जाये अंत में , जन्म सफल हो जाये ||४५||

धन्य धन्य हे साईं उजागर , धन्य धन्य करुणा के सागर
साईं नाम मुदमंगलकारी , विघ्न हरो सब पातक हारी ||४६||

धन्य धन्य श्री साईं हमारे , धन्य धन्य भकतन रखवारे
साईं नाम शुब शकुन महान , स्वस्ति शान्ति शिवकर कल्याण ||४७||

धन्य धन्य सब जग के स्वामी , धन्य धन्य श्री साईं नमामी
साईं साईं मन मुख से गाना , मानो मधुर मनोरथ पाना ||४८||

साईं नाम जो जन मन लावे , उस में शुभ सभी बस जावे
जहां हो साईं नाम धुन नाद , भागे वहां से विषम विषाद ||४९||

साईं नाम मन तप्त बुझावे , सुधा रस सींच शान्ति ले आवे
साईं साईं जपिये कर भाव , सुविधा सुविधि बने बनाव ||५०||


छल कपट और खोट है , तीन नरक के द्वार

झूठ करम को छोड़ कर , करो सत्य व्यवहार ||५१||

लेने वाले हाथ दो, साईं के सौ द्वार
एक द्वार को पूज ले, हो जाएगा पार ||५२||

जहां जगत में आवो जावो , साईं सुमीर साईं को गावो
साईं सभी में एक समान , सब रूप को साईं का जान ||५३||

मैं और मेरा कुछ नहीं अपना , साईं का नाम सत्य जग सपना
इतना जान लेहु सब कोय , साईं को भजे साईं को होय ||५४||

ऐसे मन जब होवे लीन , जल में प्यासी रहे न मीन
चित चडे इक रंग अनूप , चेतन हो जाए साईं स्वरूप ||५५||

जिसमें साईं नाम शुभ जागे , उसके पाप ताप सब भागे
मन से साईं नाम जो उच्चारे , उसके भागे भ्रम भय सारे ||५६||

सुख दुःख तेरी देन है , सुख दुःख में तूं आप
रोम - रोम में है तूं साईं , तूं ही रहयो व्याप ||५७||

जय जय साईं सच्चिदानन्दा , मुरली मनोहर परमानन्दा
पारब्रम्हा परमेश्वर गोविंदा , निर्मल पावन ज्योति अखंडा ||५८||

एकै इ सब खेल रचया , जो दीखे वो सब ही माया
एको एक एक भगवान् , दो को ही तूं माया जान ||५९||

बाहर भरम भूले संसार , अन्दर प्रीतम साईं अपार

जा को आप चाहे भगवंत , सो ही जाने साईं अनन्त ||६०||

जिस में बस जाए साईं सुनाम , होवे वह जन पूर्ण काम

चित में साईं नाम जो सिमरे , निश्चय भव सागर से तरे ||६१||

साईं सिमरन होवे सहाई , साईं सिमरन है सुखदाई
साईं सिमरन सब से ऊँचा , साईं शक्ति सुख ज्ञान समूचा ||६२||

सुख दाता आपद हरन , साईं गरीब निवाज
अपने बच्चों के साईं , सभी सुधारे काज ||६३||

माता पिता बांधव सूत द्वारा , धन जन साजन सखा प्यारा
अंत काल दे सके न सहारा , साईं नाम तेरा तारन हारा ||६४||

आपन को न मान शरीर , तब तूं जाने पर की पीर
घाट में बाबा को पहचान , करन करावन वाला जान ||६५||

अंतरयामी जा को जान , घाट में देखो आठों याम
सिमरन साईं नाम है संगी , सुख स्नेही सुकद शुभ अंगी ||६६||

युग युग का है साईं सहेला , साईं भक्त नहीं रहे अकेला
बाधा बड़ी विषम जब आवे , वैर विरोध विघ्न बड़ जावे ||६७||

साईं नाम जपिये सुख दाता , सच्चा साथी जो हितकर त्राता
पूंजी साईं नाम की पाइये , पाथेय साथ नाम ले जाएये ||६८||

साईं जाप कही ऊँची करणी , बाधा विघ्न बहु दुःख हरणी
साईं नाम महा मंत्र जपना , है सुव्रत नेम ताप तपना ||६९||

बाबा से सांची प्रीत , यह है भगत जानो की रीत
तूं तो बाबा का अंग , जैसे सागर बीच तरंग ||७०||

दीन दुःखी के सामने , झुकता जिसका शीश
जीवन भर मिलता उसे , बाबा का आशीष ||७१||

लेने वाले हाथ दो , साईं के सौ द्वार
एक द्वार को पूज ले , हो जाएगा पार ||७२ ||

विशेष आभार : श्री अंकित कपूर जी 

Monday, 2 December 2013

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि

ॐ साँई राम जी



दृष्टि के बदलते ही सृष्टि बदल जाती है, क्योंकि दृष्टि का परिवर्तन मौलिक परिवर्तन है। अतः दृष्टि को बदलें सृष्टि को नहीं, दृष्टि का परिवर्तन संभव है, सृष्टि का नहीं। दृष्टि को बदला जा सकता है, सृष्टि को नहीं। हाँ, इतना जरूर है कि दृष्टि के परिवर्तन में सृष्टिभी बदल जाती है। इसलिए तो सम्यकदृष्टि की दृष्टि में सभी कुछ सत्य होता है और मिथ्या दृष्टि बुराइयों को देखता है। अच्छाइयाँ और बुराइयाँ हमारी दृष्टि पर आधारित हैं।

दृष्टि दो प्रकार की होती है। एक गुणग्राही और दूसरी छिन्द्रान्वेषी दृष्टि। गुणग्राही व्यक्ति खूबियों को और छिन्द्रान्वेषी खामियों को देखता है। गुणग्राही कोयल को देखता है तो कहता है कि कितना प्यारा बोलती है और छिन्द्रान्वेषी देखता है तो कहता है कि कितनी बदसूरत दिखती है।

गुणग्राही मोर को देखता है तो कहता है कि कितना सुंदर है और छिन्द्रान्वेषी देखता है तो कहता है कि कितनी भद्दी आवाज है, कितने रुखे पैर हैं। गुणग्राही गुलाब के पौधे को देखता है तो कहता है कि कैसा अद्भुत सौंदर्य है। कितने सुंदर फूल खिले हैं और छिन्द्रान्वेषी देखता है तो कहता है कि कितने तीखे काँटे हैं। इस पौधे में मात्र दृष्टि का फर्क है।

जो गुणों को देखता है वह बुराइयों को नहीं देखता है।

कबीर ने बहुत कोशिश की बुरे आदमी को खोजने की। गली-गली, गाँव-गाँव खोजते रहे परंतु उन्हें कोई बुरा आदमी न मिला। मालूम है क्यों? क्योंकि कबीर भले आदमी थे। भले आदमी को बुरा आदमी कैसे मिल सकता है?
कबीर जी ने कहा है
बुरा जो खोजन मैं चला, बुरा न मिलिया कोई,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

कबीर अपने आपको बुरा कह रहे हैं। यह एक अच्छे आदमी का परिचय है, क्योंकि अच्छा आदमी स्वयं को बुरा और दूसरों को अच्छा कह सकता है। बुरे आदमी में यह सामर्थ्य नहीं होती। वह तो आत्म प्रशंसक और परनिंदक होता है।

वह कहता है
भला जो खोजन मैं चला भला न मिला कोय,
जो दिल खोजा आपना मुझसे भला न कोय।

ध्यान रखना जिसकी निंदा-आलोचना करने की आदत हो गई है, दोष ढूँढने की आदत पड़ गई, वे हजारों गुण होने पर भी दोष ढूँढ निकाल लेते हैं और जिनकी गुण ग्रहण की प्रकृति है, वे हजार अवगुण होने पर भी गुण देख ही लेते हैं, क्योंकि दुनिया में ऐसी कोई भीचीज नहीं है जो पूरी तरह से गुणसंपन्ना हो या पूरी तरह से गुणहीन हो। एक न एक गुण या अवगुण सभी में होते हैं। मात्र ग्रहणता की बात है कि आप क्या ग्रहण करते हैं गुण या अवगुण।


तुलसीदासजी ने कहा है -

जाकी रही भावना जैसी,
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।

अर्थात जिसकी जैसी दृष्टि होती है
उसे वैसी ही मूरत नजर आती है।

Sunday, 1 December 2013

सद्गुरु... तुम्हारा यह खेल मेरी समझ न आ

ॐ सांई राम



न तो में चोरों को पकड़ पाया 
न तो अपने भीतर के चोर को भगा पाया,
में तो अपनी मस्ती का मस्ताना था 
बस नाच-गाने का दीवाना था, 
पुलिस का डंडा चलाता था 
अपना बाजा बजता था... 
घूमते - घूमते मैंने तुमको पाया 
लेकिन तुमको समझ न पाया 
मैं चोरों के पीछे भागा पर न उनको पकड़ पाया 
न अपने भीतर के चोर को भगा पाया, 
तुम्हारा खेल भी, मेरी समझ न आया
घूम कर मैं तुम्हारे ही पास आया... 
एक दिन मैंने तुमसे फ़रमाया 
प्रयाग स्नान को जाना है 
उसमें डूबकी लगा 
अपना जीवन सफल बनाना है, 
बाबा... तुम बोले, अब कहाँ जाओगे
गंगा-जमुना यहीं पाओगे, 
यह कहना था 
तुम्हारे चरणों से गंगा-जमुना निकली 
लोगों ने उस जल को उठाया 
अपनी आँखे, अपनी जिह्वा 
अपने ह्रदय से उसे लगाया 
लेकिन तुम्हारा यह खेल 
मेरी समझ न आया 
उस दिन मैंने तुम्हारा प्यार 
बस यूँ ही गवायाँ ... 
बाबा ... न तो मैं चोरों को पकड़ पाया 
न ही अपना चोर भगा पाया, 
लेकिन बाद में बहुत पछताया 
मेरा विश्वास डगमगाया था
मेरा सब्र थरथराया था,
फिर भी तुमने हिम्मत न हारी 
अपने प्यार से सारी बाज़ी पलट डाली 
मुझ पर अपना प्यार बरसाया 
मुझे साईं लीलामृत का पान कराया 
सद्गुरु... तुम्हारा यह खेल मेरी समझ न आया 
तुमने ही तो 
मेरे भीतर के चोर को भगाया...

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For donation of Fund/ Food/ Clothes (New/ Used), for needy people specially leprosy patients' society and for the marriage of orphan girls, as they are totally depended on us.

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Gautam Budh Nagar, Uttar Pradesh. INDIA.