शिर्डी के साँई बाबा जी की समाधी और बूटी वाड़ा मंदिर में दर्शनों एंव आरतियों का समय....

"ॐ श्री साँई राम जी
समाधी मंदिर के रोज़ाना के कार्यक्रम

मंदिर के कपाट खुलने का समय प्रात: 4:00 बजे

कांकड़ आरती प्रात: 4:30 बजे

मंगल स्नान प्रात: 5:00 बजे
छोटी आरती प्रात: 5:40 बजे

दर्शन प्रारम्भ प्रात: 6:00 बजे
अभिषेक प्रात: 9:00 बजे
मध्यान आरती दोपहर: 12:00 बजे
धूप आरती साँयकाल: 7:00 बजे
शेज आरती रात्री काल: 10:30 बजे

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निर्देशित आरतियों के समय से आधा घंटा पह्ले से ले कर आधा घंटा बाद तक दर्शनों की कतारे रोक ली जाती है। यदि आप दर्शनों के लिये जा रहे है तो इन समयों को ध्यान में रखें।

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Saturday, 20 July 2013

श्री गुरु अर्जन देव जी - साखियाँ - मूसन का कटा सिर जोड़ना

श्री गुरु अर्जन देव जी - साखियाँ





 


मूसन का कटा सिर जोड़ना
लाहौर शहर के शाहबाज़पुर गाँव में संमन (पिता) और मूसन (पुत्र) आजीविका के लिए मजदूरी करते थे| एक दिन संगत की देखा देखी गुरु जी को संगत समेत भोजन करने की प्रार्थना की| परन्तु जब उन्होंने देखा कि संगत को खिलने के लिए उनके पास पूरे पैसे नहीं हैं और न ही प्रबंध हो सकता है| तो उन्होंने रात को साहूकार के कोठे की छत फाडकर छेद कर लिया| इस छेद में से मूसन नीचे उतर गया और अपने जरूरत की चीजें घी, शक्कर और आटा आदि अपने पिता को पकडाता रहा|

सब चीजें पकड़ाकर मूसन जैसे ही उपर आने लगा तो घर वालों की नींद खुल गई| उन्होंने मूसन की टाँगे पकड़ ली| मूसन ने अपने पिता से कहना शुरू किया कि पिताजी! आप मेरा सिर काटकर ले जाए| अगर आप ऐसा नहीं करेगें तो लोग मुझे सिर से पहचान लेंगे और कहेंगे कि गुरु के सिख चोर हैं| गुरु के नाम को धब्बा लगवाना ठीक नहीं है|

पिता ने वैसे ही किया जैसे पुत्र ने कहा था| उधर जब साहूकार ने बिना सिर के मुर्दा देखा तो वह यह सोचकर कि कत्ल का इल्जाम मेरे सिर ना लग जाए, भागा-भागा संमन के पास गया| उसने जाकर कहा कि मैं तुम्हें बहुत पैसे दूँगा| इसके लिए तुम्हें मेरे घर से मुर्दा उठाना होगा| इसे ऐसी जगह फैंक आओ जहाँ इसे कोई न देख सके|

संमन शीघ्रता से साहूकार के घर गया और अपने मृत बेटे को उठाकर के आया| उसने उसे अपने घर के पीछे वाले कमरे में सिर जोड़कर कपड़े से ढककर रख दिया| इसके पश्चात वह साहूकार के पास गया और अपनी जरूरत के अनुसार पैसे लेकर, गुरु जी व संगत के लिए खाना बनाने के लिए हलवाई को बुला लाया| सारा लंगर तैयार हो गया| गुरु जी भी संगत सहित आगए| पंगते भी लग गई| सबको खाना परोस दिया गया|

तब गुरु जी ने संमन से पूछा कि मूसन कहाँ है| वह संगत की सेवा में हाजिर क्यों नहीं हुआ? संमन चुप-चाप खड़ा रहा| उसकी चुप्पी को देखकर गुरु जी ने मूसन को आवाज़ लगाई कि आकर संगतो की सेवा करे| गुरु जी की आवाज़ सुनकर मूसन हाज़िर हो गया और के चरणों में माथा टेक हाथ जोड़कर खड़ा हो गया|

गुरु जी बाप-बेटे की गुरु घर के प्रति श्रद्धा देखकर संमन को सम्बोधित करके बोले -

चउबोले महला ५||
संमन जउ इस परेम की दमकिहु होती साट||
रावन हुते सु रंक नहि जिनि सिर दीने काट||१||
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब पन्ना १३६३)

अर्थात - हे संमन सिख! जो प्रेम तुमने दिखलाया है, अगर इस के बदलाव पैसों के साथ हो सकता होता, तो फिर लंका पति रावण कंगाल नहीं था जिसने अपने इष्ट शिव जी को अपना सिर ग्यारह बार काटकर प्रेम भेंट किया था| प्रेम तन और मन माँगता है धन नहीं|

यह वचन करके गुरु जी ने दोनों बाप बेटों को शाबाशी दी|


Friday, 19 July 2013

श्री गुरु अर्जन देव जी - साखियाँ - सुख प्राप्ति का साधन

श्री गुरु अर्जन देव जी - साखियाँ






सुख प्राप्ति का साधन

 
एक दिन श्री गुरु अर्जन देव जी के पास दो सिख हाजिर हुए| उन्होंने आकर गुरु जी से प्रार्थना की कि गुरु जी! हम सदैव दुखी रहते हैं| हमे सुख किस प्रकार प्राप्त हो सकता है? हम अपने दुखों से निजात पाना चाहते हैं| इसलिए गुरु जी आप ही हमें दुखों से बाहर निकाल सकते हैं| हमे इसका कोई उपाय बताएँ|

गुरु जी पहले उनकी बात ध्यान पूर्वक सुनते रहें| जब उन्होंने अपनी सारी बात गुरु जी के आगे रख दी तो गुरु जी ने कहना शुरू किया भाई! अरोग शरीर, सुशील स्त्री, आज्ञाकारी पुत्र और धन-धान्य के सुख पिछले जन्म में किए दान पुण्य के फल स्वरूप ही मिलते हैं| भाव मनुष्य को पिछले जन्म के अनुसार ही फल प्राप्त होता है|

आगे गुरु जी कहने लगे की ग्रहस्थी का बड़ा धर्म दान पुण्य करना और नेक कमाई ही है| इसलिए आप भी नेक कमाई, पुण्य दान और सत्संग किया करो| इससे आपके दुखों का नाश होगा| दुख आपको छुह भी नहीं पाएंगे| आपको सुखो की प्राप्ति होगी|

Thursday, 18 July 2013

श्री साई सच्चरित्र अध्याय 32

ॐ सांई राम


आप सभी को शिर्डी के साईं बाबा ग्रुप की और से साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं, हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है, हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...

श्री साई सच्चरित्र अध्याय 32
गुरु और ईश्वर की खोज, उपवास अमान्य
........................................
इस अध्याय में हेमाडपंत ने दो विषयों का वर्णन किया है ।
1. किस प्रकार अपने गुरु से बाबा की भेंट हुई और उनके द्घारा ईश्वरदर्शन की प्राप्ति कैसे हुई ।
2. श्रीमती गोखले को जो तीन दिन से उपवास कर रही थी, उसे पूरनपोली के भोजन कराये ।

Wednesday, 17 July 2013

श्री गुरु अर्जन देव जी - साखियाँ - मन की शांति का साधन

श्री गुरु अर्जन देव जी - साखियाँ



मन की शांति का साधन


एक दिन सुल्तान्पुत के निवासी कालू, चाऊ, गोइंद, घीऊ, मूला, धारो, हेमा, छजू, निहाला, रामू, तुलसा, साईं, आकुल, दामोदर, भागमल, भाना, बुधू छीम्बा, बिखा और टोडा भाग मिलकर गुरु अर्जन देव जी के पास आए| उन्होंने आकर प्रार्थना की कि महाराज! हम रोज सवेरे उठकर स्नान करके गुरबानी का पाठ करने के बाद ही अपनी कृत करते हैं| मन को संयम में रखते हैं| संयम में रखने के बाद भी मन में कलहे ही रहती है| गुरु जी कृपा करके ऐसा उपदेश दो जिससे कलह समाप्त हो और मन को शांति मिले|

गुरु जी ने उनकी बात सुनी और कहने लगे कि जब तक मन से रजो गुण और तमो गुण का त्याग ना किया जाए तब तक मन को शांति नहीं मिल सकती| इसलिए इनका त्याग जरूरी है| आगे से सिख पूछने लगे महाराज! इस गुणों की परीक्षा किस प्रकार की जा सकती है|

गुरु जी फरमाने लगे हिंसा (जीव हत्या) और क्रोध तमो गुण में आते हैं| लोभ और अभिमान यह रजो गुण में आते हैं| इसलिए इनका त्याग जरूरी है|

तमो गुण के लक्षण-

· रात का बासी, खट्टा और चटपटा भोजन खाना

· बहुत अधिक सोना

· झूठ बोलना

· गन्दा रहना

· परायी निन्दा करनी

· बुरी संगत करनी


रजो गुण के लक्षण-

· भड़कीले वस्त्र पहनना

· मांस का सेवन करना

· अपना बडप्पन चाहाना


शांति गुण के लक्षण-

· उज्जवल सफ़ेद वस्त्र पहनने

· स्नान आदि में नियमित होना

· चावल दाल आदि स्वच्छ भोजन करना

· थोड़ा सोना व थोड़ा खाना

· एक मन होकर कथा कीर्तन सुनना


राजसी गुण के लक्षण-

· जिसका कभी मन टिके और कभी न टिके व राजसी गुण की निशानियाँ हैं|


तामसिक गुण के लक्षण-

· जिसका मन कभी टिके ही न, शब्द वाणी की समझ भी कोई न आए उसे तामसिक गुण वाला समझे|


अन्त में गुरु जी कहने लगे जब आप इन शांति वाले गुणों को अपनाओगे तो आपको शांति अपने आप ही प्राप्त हो जायेगी|

Tuesday, 16 July 2013

श्री गुरु अर्जन देव जी - साखियाँ - गुरमुख और मनमुख

श्री गुरु अर्जन देव जी - साखियाँ



गुरमुख और मनमुख



एक दिन कुला, भुला और भागीरथ तीनों ही मिलकर गुरु अर्जन देव जी के पास आए| उन्होंने आकर प्रार्थना की कि हमें मौत से बहुत डर लगता है| आप हमें जन्म मरण के दुख से बचाए|

गुरु जी कहने लगे, आप गुरमुख बनकर मनमुखो वाले कर्म करने छोड़ दें| उन्होंने कहा महाराज! हमें यह समझाए कि गुरमुख और मनमुख में क्या अन्तर होता है| हमें इनके लक्षणों से अवगत कराए|

गुरमुख के लक्षण-

· गुरु के वचनों को याद रखना

· अपने उपर नेकी करने वालो की नेकी को याद रखना

· सबकी भलाई सोचना और चाहना

· किसी के काम में विघन नहीं डालना

· खोटे कर्मों का त्याग करना

· नेक कर्मों को ग्रहण करना

· गुरु के उपदेश को ग्रहण करके अपने आत्म स्वरुप को जानने वाला और अनेक में एक को देखने वाला गुरमुख होता है|


मनमुख के लक्षण-

· सबसे ईर्ष्या करनी

· किसी का भला होता देख दुखी होना

· अपनी इच्छा से काम करने

· कभी किसी का भला न सोचना

· जो नेकी करे उसकी बुराई करनी

· सबके बुरे में अपना भला समझना

· कथा कीर्तन ध्यान न लेना

· गुरु उपदेश को ध्यान से न सुनना

· पुण्य और स्नान से परहेज करना

· उपजीविका के लिए झूठ बोलना| 

गुरु जी के यह वचन सुनकर तीनों को संतुष्टि हुई| उन्होंने गुरमुखता के मार्ग पर प्रण कर लिया| फिर वह गुरु जी को माथा टेक कर अपने काम काज में लग गए|

Monday, 15 July 2013

श्री गुरु अर्जन देव जी - श्री गुरु अर्जन देव जी गुरु गद्दी मिलना


श्री गुरु अर्जन देव जी - 
श्री गुरु अर्जन देव जी गुरु गद्दी मिलना






श्री गुरु अर्जन देव जी गुरु गद्दी मिलना

आप अपने ननिहाल घर में ही पोषित और जवान हुए| इतिहास में लिखा है एक दिन आप अपने नाना श्री गुरु अमर दास जी के पास खेल रहे थे तो गुरु नाना जी के पलंघ को आप पकड़कर खड़े हो गए| बीबी भानी जी आपको ऐसा देखकर पीछे हटाने लगी| गुरु जी अपनी सुपुत्री से कहने लगे बीबी! यह अब ही गद्दी लेना चाहता है मगर गद्दी इसे समय डालकर अपने पिताजी से ही मिलेगी| इसके पश्चात गुरु अमर दास जी ने अर्जन जी को पकड़कर प्यार किया और ऊपर उठाया| आपजी का भारी शरीर देखकर वचन किया जगत में यह भारी गुरु प्रकट होगा| बाणी का जहाज़ तैयार करेगा और जिसपर चढ़कर अनेक प्रेमियों का उद्धार होगा| इस प्रथाए आप जी का वरदान वचन प्रसिद्ध है-
"दोहिता बाणी का बोहिथा||"गुरु रामदास जी द्वारा श्री अर्जन देव जी को लाहौर भेजे हुए जब दो वर्ष बीत गए| पिता गुरु की तरफ से जब कोई बुलावा ना आया| तब आपने अपने ह्रदय की तडप को प्रकट करने के लिए गुरु पिता को चिट्ठी लिखी -
राग माझ || महला ५ चउपदे घरु १ ||
१. मेरा मनु लोचै गुर दरसन ताई || बिलाप करे चात्रिक की निआई || त्रिखा न उतरै संति न आवै बिनु दरसन संत पिआरे जीउ || १ || हउ घोली जीउ घोली घुमाई गुर दरसन संत पिआरे जीउ || १ || रहाउ ||

जब इस चिट्ठी का कोई उत्तर ना आया तो आपने दूसरी चिट्ठी लिखी -

२. तेरा मुखु सुहावा जीउ सहज धुनि बाणी || चिरु होआ देखे सारिंग पाणी || धंनु सु देसु जहा तूं वसिआ मेरे सजण मीत मुरारे जीउ || २ || हउ घोली हउ घोल घुमाई गुरु सजण मीत मुरारे जीउ || १ || रहाउ ||
जब इस चिट्ठी का भी उत्तर ना आया तब आपने तीसरी चिट्ठी लिखी - 

३. एक घड़ी न मिलते ता कलियुगु होता || हुणे कदि मिलीए प्रीअ तुधु भगवंता || मोहि रैणि न विहावै नीद न आवै बिनु देखे गुर दरबारे जीउ || ३ || हउ घोली जीउ घोलि घुमाई तिसु सचे गुर दरबारे जीउ || १ || रहाउ ||
गुरूजी ने जब आपकी यह सारी चिट्ठियाँ पड़ी तो गुरूजी ने बाबा बुड्डा जी को लाहौर भेजकर गुरु के चक बुला लिया| आप जी ने गुरु पिता को माथा टेका और मिलाप की खुशी में चौथा पद उच्चारण किया - 

४. भागु होआ गुरि संतु मिलाइिआ || प्रभु अबिनासी घर महि पाइिआ || सेवा करी पलु चसा न विछुड़ा जन नानक दास तुमारे जीउ || ४ || हउ घोली जीउ घोलि घुमाई जन नानक दास तुमारे जीउ || रहाउ || १ || ८ || (पन्ना ९३ - ९७)
गुरु पिता प्रथाए अति श्रधा और प्रेम प्रगट करने वाली यह मीठी बाणी सुनकर गुरु जी बहुत खुश हुए| उन्होंने आपको हर प्रकार से गद्दी के योग्य मानकर भाई बुड्डा जी और भाई गुरदास आदि सिखो से विचार करके आपने भाद्र सुदी एकम संवत् 1639 को सब संगत के सामने पांच पैसे और नारियल आपजी के आगे रखकर तीन परिक्रमा करके गुरु नानक जी की गद्दी को माथा टेक दिया| आपने सब सिख संगत को वचन किया कि आज से श्री अर्जन देव जी ही गुरुगद्दी के मालिक हैं| इनको आप हमारा ही रूप समझना और सदा इनकी आज्ञा में रहना| 

बाबा प्रिथी चंद जी का तीक्षण वोरोध और झगड़ा देखकर गुरु जी ने बाबा बुड्डा जी आदि बुद्धिमान सिखो को कहा कि हमारा अन्त समय नजदीक आ गया है और हम गोइंदवाल जाकर शांति से अपना शरीर त्यागना चाहते हैं| दूसरे दिन प्रातःकाल गुरु जी श्री अर्जन देव जी, बीबी भानी जी सहित कुछ सिख सेवको को साथ लेकर गोइंदवाल पहुँच गए| दूसरे दिन सुबह दीवान सजाकर संगत को वचन किया हमारा अन्तिम समय नजदीक आगया है और हमने गुरु गद्दी श्री अर्जन देव जी को दे दी है|

इस प्रकार गुरु राम दास जी ने 1639 विक्रमी मुताबिक 1 सितम्बर 1591 को गोइंदवाल जाकर गुरु पद का तिलक दे दिया और आप भाद्रव सुदी तीज को पांच तत्व का शरीर त्यागकर अपने आत्मिक स्वरूप में विलीन हो गए| हरबंस भट्ट अपने सवैये में लिखते हैं-
हरिबंस जगति जसु संचर्यउ सु कवणु कहैं स्री गुरु मुयउ||१|| 

देव पुरी महि गयउ आपि परमेसुर भायउ||

हरि सिंघासणु दीअउ सिरी गुरु तह बैठायउ||

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब पन्ना १४०९)

Sunday, 14 July 2013

श्री गुरु अर्जन देव जी जीवन-परिचय


श्री गुरु अर्जन देव जी जीवन-परिचय




Parkash Ustav (Birth date): April 15, 1563, at Goindwal in Distt. Amritsar, Punjab. 
प्रकाश उत्सव (जन्म की तारीख): 15 अप्रैल 1563, जिला में गोइंदवाल में. अमृतसर, पंजाब.

Father: Guru Ramdas ji
पिता: गुरु रामदास जी


Mother: Bibi Bhani ji
माँ: बीबी भानी जी


Sibling: Prithi chand, Mahadev (brothers)
सहोदर: प्रीथी चंद, महादेव (भाई)


Mahal (spouse): Mata Ganga ji D/o Krishen Chand, Meo village, Distt. Jullandhar
महल (पति या पत्नी): माता गंगा जी पुत्री कृष्ण चंद, मेव गांव, जिला. जालंधर


Sahibzaday (offspring): Hargobind ji
साहिबज़ादे (वंश): हरगोबिंद जी


Joti Jyot (ascension to heaven): May 30, 1606
ज्योति ज्योत (स्वर्ग करने के उदगम): 30 मई 1606


रामदासि गुरु जगत तारन कउ गुरु जोति सु अर्जन माहि धरी||

श्री गुरु अर्जन देव जी का जन्म 18 वैशाख 7 संवत 1620 को श्री गुरु राम दास जी के घर बीबी भानी जी की पवित्र कोख से गोइंदवाल अपने ननिहाल घर में हुआ|

आप अपने ननिहाल घर में ही पोषित और जवान हुए| इतिहास में लिखा है एक दिन आप अपने नाना श्री गुरु अमर दास जी के पास खेल रहे थे तो गुरु नाना जी के पलंघ को आप पकड़कर खड़े हो गए| बीबी भानी जी आपको ऐसा देखकर पीछे हटाने लगी| गुरु जी अपनी सुपुत्री से कहने लगे बीबी! यह अब ही गद्दी लेना चाहता है मगर गद्दी इसे समय डालकर अपने पिताजी से ही मिलेगी| इसके पश्चात गुरु अमर दास जी ने अर्जन जी को पकड़कर प्यार किया और ऊपर उठाया| आपजी का भारी शरीर देखकर वचन किया जगत में यह भारी गुरु प्रकट होगा| बाणी का जहाज़ तैयार करेगा और जिसपर चढ़कर अनेक प्रेमियों का उद्धार होगा| इस प्रथाए आप जी का वरदान वचन प्रसिद्ध है-
"दोहिता बाणी का बोहिथा||"



बीबी भानी जी ने जब पिता गुरु से यह बात सुनी तो बालक अर्जन जी को उठाया और पिता के चरणों पर माथा टेक दिया| इस तरह अर्जन देव जी ननिहाल घर में अपने मामों श्री मोहन जी और श्री मोहरी जी के घर में बच्चों के साथ खेलते और शिक्षा ग्रहण की|

जब आप की उम्र 16 वर्ष की हो गई तो 23 आषाढ़ संवत 1636 को आपकी शादी श्री कृष्ण चंद जी की सुपुत्री गंगा जी तहसील फिल्लोर के मऊ नामक स्थान पर हुई| आप जी की शादी के स्थान पर एक सुन्दर गुरुद्वारा बना हुआ है| इस गाँव में पानी की कमी हो गई थी| आपने एक कुआं खुदवाया जो आज भी उपलब्ध है|

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